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4.12.12

जी न्यूज के बहाने पत्रकारिता का अंदरखाने


आशीष कुमार
पहले दो संपादकों की गिरफ्तारी के पूरे प्रकरण पर गिरफ्तारी, गिरफ्तारी से पहले और उसके बाद के घटनाक्रमों का सिलसिलेवार तरीके से जांच पड़ताल करते हैं ताकि कुछ मथकर ऊपर आ सके। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जी न्यूज के संपादक व बिजनेस हेड़ सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक व बिजनेस हेड़ समीर अहलूवालिया को नवीन जिंदल प्रकरण में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
जिस रात दोनों को गिरफ्तार किया गया जी न्यूज के सलाहकार संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी ने रात दस बजे के अपने प्रोग्राम बड़ी खबर में इसे आपातकाल से जोड़ कर दिखाया। पुण्य प्रसून वाजपेयी अपनी स्टाईल में दोनों हाथों की हथेलियों को रगड़ते हुए, जंजीरों में जकड़े मीडिया शब्द के क्रोमा के आगे खड़े होकर बड़ी उर्जा व तर्कों के साथ इसे मीडिया पर सेंसरशिप व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के रूप में दिखा रहे थे। इस दौरान उन्होंने बहुत से वर्जनों के बीच वरिष्ट पत्रकार कमर वाहिद नकबी और ब्रॉस्डकॉस्टिंग एडिटर एसोसिएशन के अध्यक्ष एनके सिंह का वर्जन भी लिया। कमर वाहिद नकबी के बयानों को अपने पक्ष में तोड़ मरोड़कर पेश किया गया।
जी न्यूज के बिजनेस सहित सभी समाचार चैनलों पर इसे आपातकाल के दौरान की हालतों से जोड़कर दिखाया गया। विभिन्न राष्ट्रीय पार्टियों के प्रवक्ता व मुख्य नेताओं के बयानों को अपने पक्ष में दिखाया गया। टीवी के प्राइम टाइम में बहसों का दौर चला। जमकर फेसबुकबाजी हुई। खांटी पत्रकारों को पत्रकारिता की समीक्षा करने का सुनहरा मौका मिला। सरकार को मीडिया के मामले आक्रमक होने का मौका मिला। मौका दिया जी न्यूज के मालिक के व्यवसायिक हितों और उसके संपादकों व चैनल के प्रति पैसे बटोरने की हवस ने, शायद उनकी नीयत में भी कुछ रहा होगा। कोई बेवजह सफेद कपड़े पहनकर कोयले की खदान में क्यों घुसेगा।
नेताओं को तो बोलने का मौका मिलना चाहिए। जब मीडिया के साथ सांत्वना दिखाने और जी न्यूज के आंसू पोछने को मौका मिला तो वह कहां चूकने वाले थे, उन्होंने भी बिना जाने-समझे इसे अधिकारों का हनन और आपातकाल बता दिया। इस पूरे प्रकरण में छोटी सी गलती और मालिक के प्रति वफादारी दिखाने के चक्कर में पत्रकारिता जगत के छात्रों के लिए आदर्श पुण्य प्रसून वाजपेयी पर भी लोगों को उंगली उठाने का मौका मिल गया।
चलिए इसकी जड़ तक जाने के लिए सुधीर चौधरी की कुंडली और नवीन मामले की भी पड़ताल कर लेते हैं। लाइव इंडिया से जी न्यूज पहुंचे सुधीर चौधरी मल रूप हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं। उनके व्यवहार में हरियाणवी ठसक व रिस्क लेने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। पत्रकारिता जगत में उनकी कार्यशैली को लेकर पहले भी उंगली उठती रहीं हैं। नवीन जिंदल प्रकरण का मुद्दा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों की स्वतंत्र संस्था बीईए में उठने पर सुधीर चौधरी का जवाब था कि वह एक संपादक के साथ चैनल के बिजनेस हेड़ भी हैं, जिसके नाते वह नवीन जिंदल से 100 करोड़ का विज्ञापन मांगने गए थे। यह तो यू ट्यूब पर सबके लिए उपलब्ध वीडियो को देखकर कोई आम आदमी बता सकता है कि विज्ञापन मांगा जा रहा है या और कुछ भी हो रहा है। बचाव में तरह-तरह के तर्क देने की कोशिश की गई। कहीं कुछ मछलियां हीं पूरे तलाब को गंदा तो नहीं कर रहीं। लेकिन यह सच है कि यह मछलियां कुछ जरुर हैं लेकिन बहुत बड़ी-बड़ी हैं।

जी न्यूज के कर्मचारियों का दबी जुबान से मानते हैं कि सुधीर चौधरी के जी न्यूज में आने की भी एक कहानी है। जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा को हरियाणा में रियल एस्टेट के करोबार को फैलाने में राजनीतिक कारणों से अड़चनों का सामना करना पड़ रहा था। कहा जाता है कि जी न्यूज के संपादक एनके सिंह की हुड्डा के साथ ट्यूनिंग सही नहीं थी, जिसके कारण वह सुभाष चंद्रा की व्यवसायिक अड़चनों का दूर नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में सुधीर चौधरी को मौका मिला। मुख्यमंत्री दीक्षित से जुगाड़ लगाकर व हरियाणा में रियल एस्टेट करोबार में आ रहीं दिक्कतों को दूर करने का भरोसा देकर सुधीर चौधरी जी न्यूज पहुंच गए। एके सिंह को जी न्यूज छोड़ना पड़ा। वह लाइव इंडिया पहुंच गए। बाद की कहानी जगजाहिर है।
एक मछली ने मीडिया पर उंगली उठाने का मौका दे दिया। वैसे यह मामला मीडिया की नैतिकता से जुड़ा हुआ था। सुधीर चौधरी प्रकरण मीडिया सेंसरशिप का न होकर एक आपराधिक मामला था। संपादकों की गिरफ्तारी पर मीडिया की त्वरित कार्रवाई और आपातकाल से तुलना करने के कारण उसने खुद अपने पैरों पर कुल्हाडी चलाई। सच तो यह है कि मीडिया के नियामन से जुड़ी संस्थाएं मीडियाकर्मियों या संस्थाओं के आपराधिक मामलों को नहीं देख सकतीं या देखती हैं। यदि कोई मीडिया संस्था या मीडियाकर्मी अपराध करेगा तो उसको पुलिस और न्यायपालिका ही डील करेगी। मीडिया कंटेंट और मीडियाकर्मियों के अपराधों को अलग करके देखना होगा। मीडिया के नियामक संस्थाएं कंटेंट व उसकी आचार संहिता को लेकर ही कुछ सकती हैं। मसलन, मीडिया में साफ छवि के लोग ही होने चाहिए ताकि आम आदमी का मीडिया पर विश्वास बना रहे। यदि संपादक मर्सिडिज, बीएमडब्ल्यू, फोरचूनर से चलेंगे और फाइव स्टार जीवन शैली अपनाएंगे तो उसका खर्च वहन करने के लिए ऐन केन प्रकारेण तो करना पड़ेगा जो तलाब गंदा करने का कारक भी बन सकता है। 

1.11.12

भाषा के साथ आत्मगौरव का सवाल


भाषा के साथ हमारा आत्मगौरव जुड़ा होता है। वह हमारे स्वाभिमान का प्रतीक होती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर देखा जाता है कि जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और इटली के नेता संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों द्वारा अंग्रेजी में सवाल पूछे जाने के बावजूद अपनी भाषा में जवाब देते हैं। अभी हाल का ही वाकया है एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर जर्मन की चांसलर से किसी पत्रकार ने अंग्रेजी में सवाल पूछा तो उन्होंने उसका जवाब जर्मन में दिया। जर्मनी की तरह स्पेन, फ्रांस, इटली  जैसे गैर अंग्रेजी भाषी देशों के नेताओं में निज भाषा में जवाब देने की मानसिकता के पीछे कहीं न कहीं उनका राष्ट्रीयवादी अहं छिपा रहता है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह कि इस मानसिकता को बनाने में मीडिया की भी अहम भूमिका रही है। चौकाने वाला तथ्य यह कि जर्मनी में कोई भी पापुलर नियमित समाचार पत्र अंग्रेजी में प्रकाशित नहीं होता है। टीवी चैनलों की भी यही हाल है।  सरकारी चैनल डॉयचे वेले के अंग्रेजी चैनल देश के हवाई अड्डों और फाइव स्टार होटलों में आपको शायद देखने में मिल जाएंगें, पर जर्मन केबल पर ऐसी सेवा उपलब्ध नहीं है।
स्पेन में १५५ दैनिक अखबार निकलते हैं। लेकिन इनमें से अंग्रेजी का एक भी अखबार नहीं, जो आम लोगों के बीच पापुलर हो। अलपाइस, अलमुंडो और एबीसी जैसे स्पेनी भाषा में प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्र हैं।  इनके वर्चस्व को तोड़ना किसी भी मल्टीनेशनल मीडिया कंपनी के बस की बात नहीं है। जर्मनी में करीब ३७० प्रमुख समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं, लेकिन इनमें से एक भी अखबार अंग्रेजी में नहीं है। फ्रैंकफर्ट आल्गेमाइने का अंग्रेजी पुलआउट कभी-कभार फ्रैंकफर्ट के पाठकों का नसीब हो जाता है, लेकिन दी वेल्ट, फ्रैंकफर्ट रूंडशाऊ, दी त्साइड, बिल्ड जैसे अखबारों का पुलआउट है लेकिन सभी जर्मन भाषा में प्रकाशित होते हैं। देयर स्पीलगेल जैसी मैगजीन अपने विशेष टारगेट ग्रुप को ध्यान में रखकर साल-दो-साल में कोई विशेषांक अंग्रेजी में अलग से निकाल देती है। लेकिन जर्मन भाषा की  प्रमुख पत्रिक स्टर्न और फोकस का अंग्रेजी विशेषांक शायद ही किसी ने देखा हो।
भारत में भाषाई मीडिया में काम करना भले ही ग्लैमरस नहीं माना जाता हो लेकिन जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, पौलेंड, तुर्की में इसे गौरव का प्रतीक माना जाता है। भारत में इसके पीछे सरकारी नीतिगत कारणों, अंग्रेजीदां मानसिकता, सैलरी सहित कई कारणों को गिनाया जा सकता है। लेकिन सत्यता यह कि इन सब के पीछे निज भाषा में आत्महीनता महसूस करना ही प्रमुख कारण है। जर्मन, फ्रांसीसी या स्पेन भाषा में काम करने वाले पत्रकार अपने देश में काम करने वाले अंग्रेजी या अन्य भाषाई पत्रकारों के मुकाबले २५ फीसदी तक सैलरी अधिक पाते हैं। सरकार व मंत्रालयों में भी उसका रूतबा अन्यों से कहीं अधिक होता है। लेकिन भारत का भाषाई पत्रकार जिसकी अंग्रेजी में अच्छी पकड़ नहीं है सरकार के बडे़ महकमों की रिपोर्टिंग के बारे में सोच भी नहीं सकता है रूतबे की तो बात दूर। इन देशों में लाखों लोग बेरोजगार हैं लेकिन सरकार व सर्वेक्षण करने वाली संस्थाएं मानने को तैयार नहीं कि अंग्रेजी न जानने के कारण ऐसा हो रहा है। इन देशों के 90  प्रतिशत नागिरकों को इस बात का मलाल नहीं है कि वह अंग्रेजी के मामले में कोरे हैं। कुछ वर्ष पूर्व का मामला है फ्रांस के ल-पोहर नामक साप्ताहिक ने जब अपना अंग्रेजी संस्करण निकाला तो यह पूरे देश के लिए बड़ी खबर बन गया। यह पत्रिका फ्रांस के इटली शहर से प्रकाशित होती है, जहां 15 हजार ब्रिटिश मूल के नागरिक रहते हैं। फ्रांस के छह राष्ट्रीय टीवी चैनलों में से तीन फ्रांस-2, फ्रांस-3 और फ्रांस-5 सरकारी हैं। टीएफ-1 और एम-6 तथा मूवी चैनल कनाल प्राइवेट हैं, जिन पर विशुद्ध फ्रांसीसी भाषा के कार्यक्रम दिखाएं जाते हैं। फ्रांस में सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों में  लमोंदे, ल फिगारो, लिबरेशन, परिसिअन, रेड्स, कुरियर इंटरनेशनल फ्रांसीसी भाषा के अखबार हैं। बिजनेस अखबारों में ल ट्रिब्यून, लेस इकोस और इंवेस्टिर का नाम शामिल हैं।
 यूरोप में देशी मीडिया इंडस्ट्री को देखकर चौकना लाजमी है कि दुनिया अंग्रेजी के सहारे नहीं चल रही है। इन देशों में बाजार में जो ब्रांडेड सामान मौजूद है उन पर भी देशी भाषा का जोर चलता है। सामान के रैपरों और पैकेजिंग पर शायद ही आपको अंग्रेजी भाषा देखने को मिले। इटली, पोलैंड, पुर्तगाल से लेकर तुर्की तक वहां का लोगों का भाषाई पत्रकारिता को जबरदस्त समर्थन है। यह उनके लिए गौरव व प्रतिष्ठा का विषय है। लेकिन जब हम इस मामले मे अपने देश की ओर नजर दौड़ाते हैं सबुछ उल्टा नजर आता है। अपनी भाषा बोलना आत्मग्लानि का विषय हो सकता है। 
भारत में अंग्रेजी को ही सब कुछ मान लिया गया है। इसे सरकार से लेकर स्कूलों तक रोजगार देने वाली भाषा के रूप में प्रचारित किया जा रहा। सार्वजनिक रूप से यदि आप अपनी भाषा को टूटी- फूटी बोलते हैं और अंग्रेजी को फर्राटेदार तो इसे आपके व्यक्तित्व की महानता के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इन सबके पीछे बच्चों के अभिभावक से लेकर देश नीति निर्माताओं तक सभी जिम्मेदार है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है सिविल सर्विसेज में अंग्रेजी का अनिवार्य कर देना। इस मानसिकता में सुधार लाने की जरूरत है, जिसके लिए नीति निर्माताओं, मीडिया, समाज सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।

                                                                 आशीष कुमार
                                                            पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
                                                                 देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, हरिद्वार(यूके)

10.5.10

अप्पन समाचार को एक और उपलब्धि

अप्पन समाचार को यूके की संस्था "वन वर्ल्ड मीडिया" ने स्पेशल अवार्ड के लिए विकासशील देशों से आये सैकड़ों प्रोपोजलों में से चयनित केवल चार प्रोपोजलों को शॉर्टलिस्ट किया है, जिसमें भारत से एकमात्र "अप्पन समाचार" को "शॉर्टलिस्ट विनर" घोषित किया है. जिन चार संगठनों/कामों को शोर्टलिस्ट विनर घोषित किया गया है, उनके नाम हैं-Appan Samachar (India), Rien que la Vérité (Congo), The Team (Kenya) और Voices, Equal Access (Nepal). यह अप्पन समाचार टीम के लिए ख़ुशी की बात है. मालूम हो क़ि २००३ के बाद भारत से किसी भी काम को "वन वर्ल्ड मीडिया" ने स्पेशल अवार्ड के लिए न ही शॉर्टलिस्ट विनर घोषित किया और न फाईनल विनर घोषित किया. २३ जून को यूके के किंग पैलेस में दुनियाभर की हस्तियों की उपस्थिति में एक सेमिनार भी आयोजित हो रहा है, जिसमें अप्पन समाचार की परिकल्पना एवं इसकी गतिविधियों पर भी चर्चा होनी है.

29.7.09

यह जहाज़ कर देगा हिन्दुस्तानी मीडिया को बर्बाद -exclusive-http://salaamzindagii.blogspot.com/


यह जहाज़ कर देगा हिन्दुस्तानी मीडिया को बर्बाद .....पढ़े सलाम जिंदगी पर विपिन के साथ अपनी राय और शुभकामनाये दे -सलाम ज़िन्दगी पर

26.7.09

हिंदी ब्लॉग में आई फिर एक लड़की -जिसने समेटे हुए अनेको ख्वाब और जेहन में है अनेकों दर्द .....पहला लेख जरुर पढ़े ...क्योंकि आपकी सराहना हिंदी ब्लॉग को एक

हिंदी ब्लॉग में आई एक लड़की -जिसने समेटे हुए अनेको ख्वाब और जेहन में है अनेकों दर्द .....पहला लेख जरुर पढ़े ...क्योंकि आपकी सराहना हिंदी ब्लॉग को एक नई दिशा दे सकती है और लेखिका को एक उत्साह प्रदान कर सकती है ,आर्शीवाद दे
click -salaazindagii.blogspot.com
जो दिखता है वही बिकता है

मां तुम सच बोलती हो...

वैसे मेरी मां को कोई न्यूज़ चैनल पसंद नहीं… लेकिन कहीं कुछ अच्छा या बुरा दिखता है तो रुक जाती हैं... कल भी ऐसा ही हुआ.. चैनल सर्फ कर रही थीं.. आज तक पर स्टार प्लस के सीरियल सच का सामना पर कार्यक्रम चल रहा था... जिसमें दिखाया जा रहा था कि इस सीरियल के ख़िलाफ़ किस तरह से देश में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे... कुछ सेकंड रुकने के बाद माता जी का अगला पड़ाव था एनडीटीवी इंडिया... देबांग सच का सामना को लेकर मुक़ाबला कर रहे थे... कार्यक्रम में स्टार प्लस के एंकर राजीव खण्डेलवाल भी मौजूद थे... एनडी का ये पूरा कार्यक्रम सच का सामना के ख़िलाफ़ थी... मां ने बस इतना कहा “बकवास” और आगे बढ़ गईं... आगे एक चैनल पर कोई फ़िल्मी गाना चल रहा था... छोटे-छोटे कपड़ों में लड़कियों का डांस... अब मां का गुस्सा बाहर आ गया था... कहने लगीं एक सीरियल जो सच दिखा रहा है उसके ख़िलाफ़ सब खड़े हो रहे हैं... और ये सब जो हो रहा है इसके ख़िलाफ़ नहीं खड़े हो रहे... अगर भारतीय संस्कृति सच दिखाने से ख़राब हो रही है.. तो ये क्या है.. ये तो इस संस्कृति में जैसे चार चांद लगा रहा हो.. जो सब मौन हैं.. और मज़े से घर में देखते रहते हैं..

मां से मैंने कहा सच कड़वा होता है लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते... मां ने जवाब दिया.. ग़लत जुमला है ये सच कड़वा नहीं होता.. सच तो ईश्वर है... सच हमेशा प्रिय होता है... सुननेवाले को कड़वा लगता है ये अलग बात है... कहा भी गया है सत्यम् शिवम् सुंदरम्.. सत्य ही शिव है... और शिव ही सुंदर है... यानि सत्य सबसे सुंदर है... मैंने बहस को बढ़ाने के लिए कहा अगर ऐसा है तो ये चैनलवाले बेवकूफ हैं जो इस पर बहस कर रहे हैं... मेरी मां आक्रामक हो गईं... बोल पड़ी मैं होती तो इनका मुंह नोच लेती... देश की संस्कृति की बात करते हैं... और संस्कृति में आग लगानेवाले यही हैं... और वो सच दिखानेवाला कार्यक्रम किस तरह से भारत की संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है.. ये कोई नहीं बता रहा.. सब बस यही कह रहे हैं कि किसी के बेडरूम के सवाल पूछकर सामाजिक माहौल ख़राब किया जा रहा है... समझ में नहीं आता इससे सामाजिक माहौल कैसे ख़राब हो रहा है... कोई बताए भी तो कैसे सामाजिक माहौल ख़राब हो रहा है...

ख़ैर अब मैं इससे ज़्यादा अपनी मां से बहस नहीं कर सकता था.. क्योंकि मैं भी उस कार्यक्रम का समर्थक हूं... मां से बहस करने का मतलब बस इतना था कि एक अनुभवी महिला जो समाज का हिस्सा है उनकी सोच क्या है...

2.9.08

zindginama

asa lagta ha me hawaoo me hu. aaj itni khushi mili ha.