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21.9.11

भूकंप

पत्रकार- खास आदमी सेः सर आपको भूकंप का अनुभव हुया. खास आदमीः हां अखवार मे पढ़ा था। वही पत्रकार गरीब आदमी सेः सर आपको भूकंप का अनुभव हुया- गरीब आदमी हाँ जब घर के खाली बरतन गिरे तब पता चला।

15.5.09

...तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की आदत....

विनीत जी, एक बात और, आपने लिखा है...

...............इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि....आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर... को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है......

उपरोक्त जो न्याय करने की आपकी बौद्धिक मुखमुद्रा है, वह दिक्कत पैदा करने वाली है और बहस को आगे बढ़ाने से रोकती है। यह खुद को पंच, महंत और मठाधीश मानकर कही गई बात है। संजय तिवारी, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी ये सभी लोग अगर कोई पहले से ही कोई धीर-गंभीर महंतई नुमान निष्कर्स निकालकर प्रयोग करेंगे तो तय मानिए पिटेंगे। आप जब प्रयोग करते हैं तो आपको बेहद खुले दिल दिमाग से सब कुछ रिसीव करना होता है और उन्हें एनालाइज करना होता है। कई बार डाक्टर किसी को बता देते हैं कि आपको एड्स के लक्षण हैं, आपको हेपाटाइटिस है लेकिन जब वो बारीकी से ठीक जगह चेक कराया जाता है तो पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं है लेकिन वो बेचारा मरीज खुद को एड्स व हेपाटाइटिस का मरीज मानकर अपना आधा खून सुखा चुका होता है।

आपने एक लाइन में इस छोर और उस छोर वाली जो नारेबाजी युक्त सरलीकृत लाइन खींच दी है उससे आपने लोगों को मजबूर कर दिया है वे न खुलें और इसी लाइन रूपी मानक के इर्द गिर्द अपने विचार प्रकट करें। हो सकता है कोई मेरे जैसा हो जो साफ-साफ बताना चाहे कि वो अपने मार्केटिंग व बिजनेस के एक्सपीरियेंस के दौरान किस तरह कंपनियों के साथ बातचीत करता है, उनसे एसोसिएशन बनाता है, तो वो तो कुछ नहीं करेगा क्योंकि उसे लगेगा कि यहां तो गांधी जी की औलादें बैठी हैं और वो बेचार कहां धन कमाने के लिए यहां वहां भटकने वाला सामान्य सा आदमी।

भाई, कौव्वों की तरह किसी पर तुरंत कांव-कांव करने का काम अगर मेरे चिर विरोधी कर रहे होते तो उन्हें मैं कुछ नहीं कहता क्योंकि चरम मूर्ख और मंद बुद्धि को आप कुछ सिखा ही नहीं सकते और न ही उनसे कोई उम्मीद कर सकते हैं। मूर्ख व मंद बुद्धि कहीं जाएगा तो सबसे पहला काम वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन अपने बोलने से करेगा, वो अपनी बात नहीं करेगा, दुनिया जहान और दूसरों की लंबी-लंबी बात पेलेगा। हो सकता है एकाध मूर्ख मेरे लिखे पर गरियाने इस ब्लाग पर भी कमेंट देने आ जाएं :) लेकिन जब बात विनीत कुमार की हो रही है तो उम्मीद बंधती है कि चलो अपने समय में एकाध दो ऐसे लड़के खड़े हो रहे हैं जो चीजें को बेहद रीयलिस्टिक, माडर्न एप्रोच और तटस्थ तरीके से एनालाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। ध्यान रखिए, जल्दबाजी कभी मत करिए। किसी सूचना व तथ्य पर जब तुरंत कोई निष्कर्स निकालते हैं तो वो कुछ और होगा और थोड़े बहुत नए इनपुट व एंगल के बाद थोड़ा ठहरकर निकालेंगे तो कुछ और निकलेगा। तर्क मैथ और साइंस की तरह नहीं होता जिसमें आप दो दूना चार कर देते हैं और चैलेंज कर देते हैं कि दो दूना चार के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। एक ही चीज के लिए लाख तरीके के निष्कर्स निकाले जा सकते हैं, यह तर्क की खूबी और खराबी होती है। यह तर्क करने वाले पर होता है कि उसे साबित क्या करना है। तो कोशिश यही हो कि चीजें ज्यादा रीयलिस्टिक और माइक्रो एनालिसिस लिए हुए हों, निष्कर्स निकालने का काम हमेशा पाठकों पर छोड़िए। जनता की तरह पाठक भी बहुत समझदार होता है, वो हर गाली और हर आशीर्वाद का मतलब समझता है।

तुरंत न्याय करने वाली और तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की प्रवृत्ति जिसमें हम किसी को तुरंत चोर और किसी को तुरंत महान बता देते हैं, दरअसल यह भी मालिक के नौकर वाली मानसिकता व माहौल की उपज है। उसी पाखंड की उपज है जिसमें आमतौर पर चोर महाराज अपने अपराधबोध को कम करने के लिए महान की मुद्रा में होते हैं और जो वाकई ईमानदार है वो अपनी ईमानदारी के आत्विश्वसा में ऐसा कुछ कर कह जाता है कि उस पर बेईमान का लेबल चस्पा हो जाता है। यही जल्दबाजी, न्यायपूर्ण और पाखंड भरी मुखमुद्रा आप लोगों से कभी भड़ास डाट काम पर दलाली होती है तो कभी यशवंत बलात्कारी हिंदी की महान शैतान कथा जैसी पोस्टें लिखने-लिखाने पर मजबूर करती हैं। आमतौर पर हम हिंदी वाले इन फतवों से बहुत डरते हैं लेकिन जिस दिन इन फतवों को जीवन का जरूरी हिस्सा मानकर सहज रूप से लेते हुए अपने को एकाग्र कर आगे चलने की कोशिश करना सीख लेते हैं, उस दिन लगने लगता है कि यार हम अब तक कहां और किस तरह के माइंडसेट के लोगों के बीच जी रहे थे!!!!!!!

संजय जी के आर्टिकल पर किसी पवनसुत ने एक लाइन का कमेंट किया है कि चुनाव में माल कमाने के बात दुकान बढ़ा रहे हो भाई। ये कमेंट संजय जी को विचलित कर गया। यह संजय जी का आंतरिक द्वंद्व है जिसमें वो किसी भीड़ की तरफ से उछाले गए जुमले से प्रभावित हो जाते हैं। आप ये मानकर चलिए कि जब आप भीड़ से थोड़ा उपर उठते हैं तो भीड़ आपको अपने हिसाब से एनालाइज करती है। कुछ बताएंगे कि चोरी से बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि दलाली किया है, कुछ कहेंगे कि मेहनती और प्रतिभाशाली था, इसलिए बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि कोई विकल्प नहीं था इसलिए मजबूरी में बढ़ गया है..... जाकी रही भावना जैसी।

संजय तिवारी जी की पोस्ट पर मैंने जो कमेंट किया है, उसमें संजय जी के दर्द को ही आगे बढ़ाया है, अपने अऩुभव को उड़ेलते हुए। संजय जी अपनी पीड़ा कह गए, हो सकता है यह पीड़ा शैलश जी और मैं कुछ दिन बाद कहूं या फिर हो सकता है कि हम लोग हाथ पांव मारकर अपने को जिला ले जाएं ...कुछ भी हो सकता है क्योंकि हम नए और कच्चे खिलाड़ी हैं बाजार के खेल के।

पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, रिलायंस और धीरूभाई अंबानी पर उस जमाने में भ्रष्टाचार के इतने आरोप, किस्से, चर्चे क्यों थे.....??? मेरे एक वरिष्ठ उद्यमी मित्र ने बताया कि धीरूभाई अंबानी देश के बड़े उद्यमियों की जमी-जमाई जमात में अच्छे खासे तरीके से घुसपैठ कर रहे थे और उन स्थापित व परंपरागत अरबपतियों के धंधे को चुनौती पेश कर रहे थे इसलिए उन सभी ने मिलकर प्रेस व सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए धीरूभाई को खलनायक साबित कराने की भरसक कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए। उस मित्र का कहना है कि धीरूभाई ने उतना ही या उससे भी कम भ्रष्टाचार किया था जितना वे जमे-जमाए उद्यमी करते थे लेकिन धीरूभाई आरोपी इसलिए बन गए क्योंकि उन्हें बाजार के स्थापित दिग्गज यूं ही अपने बराबर खड़ा देख पाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी दुनिया में किसी देसी और नए का घुसपैठ मंजूर नहीं था। उनकी इलीट मेंटलटी उन्हें उकसा रही थी कि इस नए उद्यमी को नष्ट करो वरना हम सबके धंधे को चौपट कर देगा। बड़ी बड़ी कंपनियां सत्ता और विपक्ष में बैठे लोगों को अरबों-खरबों का चंदा इसलिए देती हैं क्योंकि उन्हें सरकारों से अपने अनुकूल नीतियां बनवानी होती हैं।

यह एक रुटीन और सहज कार्य है जो हर देश में संपादित किया जाता है लेकिन यह इतना उच्च भ्रष्टाचार होता है कि इस भ्रष्टाचार को सीबीआई रा सीआईडी जैसी तमाम खुफिया संस्थाओं के ईमानदारी के राडार कैच ही नहीं कर पाते। ऐसा क्यों है कि अनिल और मुकेश अंबानी चुनाव नतीजों से ठीक पहले आडवाणी समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मिलने लगे हैं, क्योंकि सरकार बनवाने गिराने में इन धनपशुओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। तो ये काम उद्यमी बहुत पहले से करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे क्योकि इनके टर्मनोलोजी में यह सब कुछ करना कतई भ्रष्चाचार नहीं होता बल्कि यह उनके जीवन जीने के हिस्से का अनिवार्य 'नैतिक अंग' होता है।

नीत्शे को मैं सपोर्ट नहीं करता लेकिन उनकी जो बात है, गुलाम मानसिकता और प्रभु मानसिकता, वो काफी कुछ आधुनिक लोकतंत्रों में देखने को मिल जाता है। नीत्शे के हिसाब से देखें तो हम लोग ब्लाग पर ये जो कुछ अल्ल बल्ल सल्ल कर रहे हैं ये गुलाम मानसिकता वालों की चोंचलेबाजी है जो अपना जीवन आदर्श व सिद्धांतों के द्वंद्व के बीच ही गंवा-गुजार देते हैं। नीत्शे के मुताबिक प्रभु मानसिकता वालों के एजेंडे में ये ईमानदारी, नैतिकता, मानवीयता, करुणा जैसे शब्द होते ही नहीं। उन्हें हमेशा विजेता रहना है इसलिए वे किसी भी तरह विजेता रहना चाहते हैं और विजेता बनने के लिए वो सब कुछ करते हैं जिससे विजेता बनने की राह आसान होती हो। पर नीत्शे को सपोर्ट नहीं किया जा सकता। नीत्शे जैसे लाखों दर्शनशास्त्री हैं और इन्हें पढ़कर केवल यह जाना जा सकता है कि मनुष्यों के दुनिया देखने के तरीके कितने हैं और हमारा खुद का तरीका क्या है।

तो विनीत जी, आपसे गुजारिश है कि बहसों का निष्कर्स शुरू में ही मत निकाला करिए। यह गलती पहले मैं भी करता था लेकिन मुझे अब लगने लगा है कि मैं कुछ नहीं जानता। मुझे बहुत कुछ जानना सीखना है। जिस दिन यह समझ गया उस दिन से मैं अब कहीं भी खुद के विचार लिखने से परहेज करने लगा हूं क्योकि मैं वो नहीं लिखना चाहता जो मैं महसूस नहीं करता और जो जीता नहीं।

आभार के साथ
यशवंत

(यह कमेंट विनीत कुमार के ब्लाग गाहे-बगाहे पर प्रकाशित पोस्ट "संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ?" पर प्रकाशित किया गया है)

27.10.08

डा० नरेन्द्र कोहली से पहली मुलाकात

पूर्वांचल की ह्र्दयनगरी एवं महायोगी गोरक्षनाथ जी की तपोभूमि गोरखपुर में २४ एवं २५ अक्टूबर,२००८ को डा० नरेन्द्र कोहली, डा० प्रमोद कुमार सिंह एवं डा० के०एन०तिवारी जैसे महान साहित्यकारों एवं विद्वानों का प्रवास रहा। प्रवास का कारण दिग्विजयनाथ डिग्री कालेज, गोरखपुर में "रामचरितमानस
में आदर्श परिवार की परिकल्पना: आज के संदर्भों में" तथा पूर्वोत्तर रेलवे में "आतंकवाद से संघर्ष: भारतीय महाग्रंथों के संदर्भ में" विषयों पर आयोजित संगोष्ठियों में उन्हें आमंत्रित किया गया था। डा० कोहली और डा० सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। डा० सिंह मगध विश्वविद्यालय के पूर्व
प्राचार्य रह चुके हैं उनकी विद्वता का लोहा सारा साहित्य-समाज मानता है। डा० कोहली उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, व्यंग्यकार तथा निबंधकार हैं। अपने समकालीन साहित्यकारों से पर्याप्त भिन्न हैं। साहित्य की समृद्धि तथा समाज की प्रगति में उनका योगदान प्रत्यक्ष है।
ऎसे महान साहित्यकारों से पहली बार मुझे साक्षात्कार करने एवं सानिध्य का अवसर मिला। इसके लिए मैं डा० रण विजय सिंह जी का ह्र्दय से आभारी हूं जिन्होंने मुझे इन महान विभूतियों की सेवा-सत्कार का दायित्व सौंपा। मन में काफ़ी प्रश्न उमड़ रहे थे, परन्तु उनसे क्रास क्वेश्चन करने की अपेक्षा
सिर्फ़ उनकी ही बातें सुनने से मन नहीं भर रहा था। २५-१०-०८ को उनको वैशाली एक्सप्रेस से प्रस्थान करना था। गाड़ी अपने निर्धारित समय से करीब तीन से भी अधिक घन्टे विलम्ब से सवा आठ बजे गोरखपुर आई। डा० कोहली और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य डा० के०एन०तिवारी को इसी गाड़ी से
दिल्ली जाना था। मेरा सारा समय इन्हीं महान साहित्यकारों के साथ बीता। यह मेरे जीवन का अविस्मरणीय समय रहा।

12.10.08

और मैं चला 'लहरों का सरताज़' बनने

और मैं पहुँचा 'लहरों का सरताज़' बनने ११ अक्टूबर को मैं जब घर पहुँचा तो मैंने अपने मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म फिट कर दिया क्यूंकि मुझे लहरों का सरताज बनने के लिए ऑडिशन देने जाना था. १२ अक्टूबर को सुबह सुबह मैं चाणक्य पुरी के नवल बाग़ में पहुँच गया. वहां पहले से ही करीबन ४०० लोग लाइन लगाये बैठे थे. मैंने एक भाई से पुछा की क्या यही लाइन है नेशनल जेओगार्फिक चैनल के शो 'लहरों के सरताज़' के ऑडिशन के लिए. उस व्यक्ति ने जवाब दिया जी बिल्कुल. मैंने अपनी गाडी साइड में पार्क की और और मैं भी उन्ही के साथ बैठ गया. जिन बन्दों के साथ मैं बैठा था वो सोनीपत से आए थे ऑडिशन देने. थोड़ी देर बाद हमारी बातचीत शुरू हो गई और हमने गप्पे लगना शुरू कर दिया. बातों बातों में कब सुबह हो गयी पता हेई नही चला. मैंने सुबह ६ बजे देखा तो मेरे पीछे लाइन इतनी लम्बी हो गयी थी की उसमे लोगों के सर के सिवा कुछ और नज़र ही नही आ रहा था. करीबन सात बजे प्रवेश शुरू हो गया और मैं भी सभी के साथ अन्दर पहुँच गया. वहां पर मुझे एक चेस्ट जैकेट दी गयी जिस पर नम्बर लिखा हुआ था. मेरा नम्बर था २४९. मैं वहां पर सबके साथ बैठ गया और आगे के प्रोग्राम् का वेट करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद मेरे साथ के करीबन ५०० बन्दों को एक साथ खड़ा करके १६०० मीटर की दौड़ के लिए कहा गया. ये आर्डर हमें नेवी के कुछ अधिकरियों ने दिया. दौड़ शुरू हो गयी. शुरू में बहुत से बच्चे तेज़ी से भागे और सबसे आगे निकल गए पर थोड़ी देर में ही वो थककर या तो बैठ गए या फिर गिर गए. मैं अपने एक ले में दौड़ता रहा कोई जल्दबाजी नही की. जिसका परिणाम ये हुआ की मैं १३ वें नम्बर पर अपने लक्ष्य पर पहुँच गया. इस दौड़ में नियम के मुताबिक ६० लोगों को लेना था. मैंने ये दौड़ जीतकर मानो सारा जहाँ जीत लिया हो. जो जीता था ये रेस सब चिल्ला रहे थे. मैं भी सभी के साथ खुशियाँ मन रहा था. मैं इसलिए खुश था की जो लड़के मेरे साथ सोनीपत वाले लाइन में बहार थे वो भी रेस जीत चुके थे. और हम सब एक साथ मिलकर लंच खा रहे थे. लगभग एक घंटे बाद दूसरे राउंड की प्रक्रिया शुरू हुयी. जिसमे मैं बहार हो गया क्यूंकि उसमे बन्दर बनकर चलना था. वैसे मुझे अभी लगता है की मैं सही था और उन लोगों ने चीटिंग की नही तो मेरा दूसरा राउंड बन्दर वाला भी क्लेअर था. लेकिन ये भी हो सकता है की मैं बाहर हो गया और मन को दिलासा दिलाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ. लेकिन जो भी रहा ये मेरी ज़िंदगी का सबसे अनोखा और रोमांचक पल था जिसमे मुझे ये पता चला की हजारों की भीड़ में कैसे कोई एक जीतता है. इस पर मैं इतना ही कहूंगा जय नेवी और जय जवान अमित द्विवेदी

20.8.08

तोरी मरजी है क्या बता दे बिधना रे...

मशहूर पत्रकार, ब्लागर और अब फिल्म निर्देशक पंकज शुक्ल इन दिनों अपनी फिल्म भोले शंकर के निर्माण के बारे में अपना पूरा अनुभव अपने एक नए ब्लाग क़ासिद पर लिख रहे हैं। उन्होंने एक मेल के जरिए अनुरोध किया....बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म भोले शंकर की मेकिंग इन दिनों मैं अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं, कृपया सुझावों और टिप्पणियों से अवगत कराएं। तो मैंने सोचा कि मैं अकेले क्यों सुझाव और टिप्पणियां दूं, क्यों न सारे भड़ासियों को इस शुभ काम में शामिल किया जाए। इसी उद्देश्य से पंकज के ब्लाग क़ासिद से साभार एक पोस्ट यहां डाल रहा हूं और आप सभी से उम्मीद करता हूं कि पंकज भाई के ब्लाग क़ासिद पर जाकर उनके अनुभवों से दो चार हों।
यहां यह बता दें कि पंकज भाई अपने जैसे ही सामान्य परिवार और ठेठ हिंदी पृष्ठभूमि के साथी हैं। आज वो जहां पर हैं, उसमें किसी गाडफादर का कोई हाथ नहीं है। वे सिर्फ अपनी प्रतिभा और अपने दम पर आगे बढ़ते चले गए। उनसे हम सभी को प्रेरणा मिलती है।
बरेली में अमर उजाला से करियर की शुरुआत की और पत्रकारिता में अपने मेहनत के बल पर धीरे-धीरे बढ़ते चले गए। वे अमर उजाला, कानपुर में भी रहे। इसके बाद दिल्ली आए। प्रिंट से इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर मुखातिब हो गए उसके बाद मीडिया की दुनिया को छोड़कर मायानगरी की ट्रेन पकड़ ली। वहां फिल्म बनाने का जो सपना देखा था, उसे उन्होंने अपनी प्रतिभा, अपने संघर्ष और एक जूनून के जरिए पूरा कर दिखाया। भोले शंकर फिल्म की रिलीज का इंतजार हम सभी भड़ासियों को है। इस फिल्म के पांच सौ टिकट तो हम भड़ासी खरीदेंगे ही।
पंकज भाई से बस एक अनुरोध है कि अगर अगली फिल्म कोई प्लान कर रहें हों तो उसमें मुझे और डा. रूपेश श्रीवास्तव को विलेन और उसके गैंग का रोल जरूर दे दें वरना....जानी, हम भड़ासी बड़े खूंखार और बदनाम लोग हैं। हम पत्थर से तेल और तेल से पत्थर निकालना जानते हैं.....:)
-यशवंत
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भोले शंकर (7)
गतांक से आगे..



मनोज तिवारी ने "भोले शंकर" में कुछ और भी बहुत उम्दा गीत गाए हैं। लेकिन, मनोज तिवारी और मोनालिसा पर फिल्माया गया रोमांटिक गीत - "केहू सपना में अचके जगा के" प्यार में खोए प्रेमियों के लिए सावन की फुहारें लेकर आएगा। और, इस गीत में मनोज तिवारी के लिए अपनी आवाज़ दी है मशहूर गायक उदित नारायण ने। अगर फिल्म में मेरे फेवरिट गाने की बात करें तो मुझे पसंद है फिल्म का वो विरह गाना जो पूनम ने गाया है।

सारेगामापा फाइनलिस्ट रहीं पूनम की निज़ी ज़िंदगी के बारे में सुनकर मैंने अपनी पत्नी को कई बार घर में रोते देखा है। पूनम को प्लेबैक सिंगिंग के लिए कई लोगों ने वादे किए, लेकिन कितने पूरे हुए, इस बारे में ना तो कभी ज़ी टीवी ने कुछ भी बताने की कोशिश की और ना ही कभी मीडिया में कहीं कोई चर्चा सुनाई दी। पूनम का आवाज़ में दर्द बहुत है, कुछ तो जीवन के संघर्ष का और कुछ उसकी आवाज़ पर ऋचा शर्मा का असर का। "भोले शंकर" के संगीत पर चर्चा के दौरान ही मैंने पूनम का नाम उस गाने के लिए संगीतकार धनंजय मिश्रा को सुझाया, जो फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है। भोले की बचपन की दोस्त पारवती की पूरी जवानी की कहानी इस गाने में दूसरे सिरे पर पहुंच जाती है। पूनम की गायिकी के बारे में बात करने से पहले कुछ बातें इस गीत को लिखने के बारे में भी बताता चलूं।

गीतकार बिपिन बहार ने जितनी मेहनत फिल्म के ओपनिंग सॉन्ग "रे बौराई चंचल किरनिया" के लिए की है, उससे कम मेहनत इस गाने के लिए भी नहीं हुई। मैंने बिपिन को समझाना शुरू किया। धनंजय मेरा मुंह ताक रहे हैं। मैंने बिपिन को बताया, "पारवती ने बस अभी अभी भोले को बरसों बाद देखा है। भोले बचपन में शहर जाते समय लड़कई में उससे बोले जाता है, "ए पारवती, जब हम पढ़ लिख लेम, त तोहरा से बियाह करब"। बस पारवती उसी दिन से भोले की याद में गुम है। भोले लौटता है, तो पारवती के घर पर उसकी शादी कहीं और किए जाने की बात चल रही है। दोनों संस्कारी घरों से हैं और जैसा कि अक्सर गांवों में होता है, दोनों में से कोई घरवालों का विरोध नहीं कर पाते। पारवती की शादी तय हो चुकी है। वो रात के अंधेरे में भगवान से अपने दिल का दर्द सुना रही है। गाने का ये पहला हिस्सा है। दूसरे हिस्से में आते आते हमें पारवती की शादी होते हुए दिखानी है। और तीसरे हिस्से में हमें पारवती की विदाई दिखानी है। शॉट कुछ यूं होगा कि कैमरा गांव से बाहर निकलती डोली को कैच करता है, उसे फॉलो करते हुए आगे बढ़ता है और जैसे ही डोली फ्रेम से आउट होती है, कैमरा पैन करते हुए दूर एक टीले पर खड़े भोले को कैच करता है। भोले वहां पारवती को दिलासा देने वाला गाना गा रहा है।

"बिपिन बहार पूरा नरेशन सुनने के बाद आधा घंटा तक कुछ बोले नहीं। फिर बोले, "भइया, इ कइसन होई।" मैंने कहा, "काहे ना होई।" मैंने पूरे गाने का स्टोरी बोर्ड बिपिन को फिर से समझाया। इस बार एक एक एक्शन और उसके भाव के साथ में। अब तक शांत बैठे रहे धनंजय मिश्रा के चेहरे के भाव इस बार बदलने लगे। उनके हाथों में जुंबिश हुई और मुंह से कुछ राग निकले, और साथ ही निकला गाने का पहला बोल- "तोरी मरजी है क्या, बता दे बिधना रे...., काहे मोरा पिया ना मिला...ना मिला रे...काहे मोरा पिया ना मिला।" बस इसके बाद तो जैसे बिपिन बहार को राह मिल गई। भाई ने तीन दिन में गाना लिख डाला। लेकिन आखिरी हिस्से पर आकर वो अब भी अटके हुए थे। बोले, "भइया इ बताइं, भोले को पारवती से प्यार था कि नहीं।" मैंने कहा, "जिस उमर में हमने भोले और पारवती को साथ खेलते दिखाया। उस उमर में बच्चे प्यार का मतलब समझते हैं क्या? गांव की लड़की है, बस किसी सयाने पर दिल हार बैठी। लेकिन भोले को इसका इल्म तक नहीं। हां, मां कुछ इशारा करती है तो बात उसकी समझ में आती है। लेकिन तब तक देर हो चुकी है। तो भोले क्या गाएगा?" बिपिन बहार फिर चुप, "भोले क्या गाएगा?"दो दिन तक माथा पच्ची चलती रही। और फिर निकले बोल- "किस्मत ना बा अपना हाथ में, खुश रहे तू सजनवा के साथ में।"

मनोज तिवारी वैसे तो उछल कूद वाले गाने ही खूब गाते हैं, लेकिन फिल्म में मैंने उनसे दो जगह दर्द भरे नगमे गवाए हैं। पहला तो ये और दूसरा जब वो मुंबई में होते हैं और ज़िंदगी के सबसे बड़े इम्तिहान से दो चार होते हैं। और मेरा वादा है कि मनोज तिवारी की आवाज़ का इतना बेहतरीन इस्तेमाल अभी तक उनकी किसी फिल्म में नहीं हुआ है। जिस गाने की ऊपर हम बात कर रहे हैं, उसकी शुरुआत पूनम के गाने से होती है। लखनऊ की इस लड़की को अपनी फिल्म में मौका देकर एक तरह से मैंने और धनंजय ने उत्तर प्रदेश के कलाकारों को बढ़ावा देने की अपनी अघोषित नीति को आगे बढ़ाया और पूनम ने भी अपना दिल उड़ेल कर रखा दिया है इस गाने में। गाने के बोल बहुत मार्मिक हैं और इतना ही मार्मिक है इसका पिक्चराइजेशन। पूनम तुम यूं ही जगमगाती रहो।

वैसे एक दिलचस्प बात भी आपको मैं बताना चाहता हूं। जैसा कि गांव- गलियों की लड़कियों के साथ अक्सर होता है, वैसे ही पूनम भी अब तक मुंबई की चकाचौंध देखकर घबरा जाती हैं। स्टूडियो में रिकॉर्डिंग की बात चलते ही नर्वस हो जाती हैं। ऐसे में संगीतकार के हाथ पांव फूलने ही लगते हैं। मैंने दोनों को हिम्मत बंधाई और तब जाकर ये गाना रिकॉर्ड हुआ। मौली और उज्जयनी की बात अब भी रह गई, खैर इन दोनों नगीनों की बात कल पक्की रही।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक-भोले शंकर

(साभार-पंकज शुक्ल के ब्लाग क़ासिद से)

1.6.08

इंडिया गेट की क्या सच्चाई, गुलामी का प्रतीक है भाई!!!.....उर्फ गोपाल राय को आप जानते हैं?


गोपाल रायः ज़िंदगी की दूसरी पारी शुरू
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जंतर-मंतर पर कुछ घंटे

क्या आपको पता है कि इंडिया गेट किसकी याद में बना है? आप कहेंगे कि शहीदों की याद में। पर आपको जब पता चलता है कि यह प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेज साम्राज्य की रक्षा के लिए मरने वाले सिपाहियों की याद में बना है जिसकी नींव 10 फरवरी 1921 में डाली गई थी और 1931 में जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दी जा रही थी तो इन शहीदों का हत्यारा लार्ड इरविन ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित करके इसे भी हमारे मत्थे पर जड़ दिया था। यह कह कर कि यह है भारत की राष्ट्रीय निशानी, साम्राज्य की वफादारी। इंडिया गेट पर खुदे नामों में एक भी नाम हमारे स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों का नहीं है।

उपरोक्त अंश उस परचे का है जो तीसरा स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष समिति ने छपवाया है और इसी के तहत आज नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश भर की आम जनता इकट्ठी हुई थी। इस संघर्ष समिति के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय हैं।

गोपाल राय छात्र जीवन से अपने मित्र हैं। स्टूडेंट पालिटिक्स के दिनों में हम दोनों ही साथ-साथ आइसा के बैनर के साथ जुड़े, इसकी विचारधारा को लेकर आगे बढ़े और जरूरत पड़ी तो लड़े-भिड़े भी। बाद में जब मैं बीएचयू हुआ करता था तो गोपाल जी लखनऊ विवि में हुआ करते थे। आगे घटनाक्रम ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि गोपाल जी के बारे में एक दिन खबर मिली कि उन पर लखनऊ के कुछ गुंडों इस कदर हमला किया है कि वे जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। एक गोली जो उनकी गर्दन में पीछे की तरफ लगी थी, उसी में रह गई और उनके नर्वस सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया। इस मुश्किल दिनों में गोपाल के साथ बस कुछ लोग खड़े हुए। बाकी सभी ने न जाने किन किन विचारों, व्यवहारों, तर्कों के नाम पर उनसे किनारा कर लिया। जीवन मौत से जूझ रहे गोपाल को बस इतना होश था कि वो जिंदा हैं, बाकी नर्वस सिस्टम काम न करने से उनका पूरा शरीर पैरालाइज्ड हो गया था।


कुछ नए-पुराने साथियों और घरवालों ने ने मिलकर गोपाल जी को हर उस जगह दिखवाया जहां उनके ठीक होने की उम्मीद थी पर गोपाल जी सदा बिस्तर पर ही पड़े रहे। बाद में किसी तरह चंदा करके वे केरल गए जहां आयुर्वेदिक लेपन तरीके से उनके शरीर की लगातार मालिश की गई और इलाज किया गया। इससे गोपाल जी के बेजान शरीर में हरकत आ गई और शरीर के आधे हिस्से धीरे धीरे ठीक होने लगे। अब वो लगभग 80 फीसदी सही हैं पर उन दिनों में भी जब उनका शरीर चलने फिरने से इनकार करता था, गोपाल जी से जब फोन पर बात हुआ करती थी तो इस व्यक्ति की आवाज और इच्छाशक्ति उतनी ही बुलंद हुआ करती थी जितनी इससे पहले के अच्छे दिनों में।


मैं लोगों से अक्सर कहता हूं कि गोपाल राय की दशा कुछ उसी तरह की थी जो तेरे नाम फिल्म में सलमान खान की हुई थी। ये बात और है कि सलमान इस फिल्म में किसी लड़की से इकतरफा प्रेम के नाम पर उस हालत को पहुंचे थे और गोपाल राय देश व समाज की बेहतरी के लिए गुंडों से लड़ने-भिड़ने के दौरान। पर दोनों में एक चीज कामन है, इनके शरीर के जख्म। फर्क बस इतना है कि एक के जख्म सेलुलाइड परदे के लिए फिल्माए गए थे और दूसरे का जख्म रीयल लाइफ के जख्म हैं।

कभी आप भी दिल्ली आना तो गोपाल राय से जरूर मिलना। उनसे उनके जीवन की कहानी जरूर सुनना। उनसे उनके अनुभवों को जरूर साझा करना। आप को हर हाल में जीवन की हर स्थिति से लड़ने और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। हताशा, अवसाद, अकेलापन, अजनबियत.....ये शब्द क्या हैं, गोपाल जी की डिक्शनरी में तो ये हैं ही नहीं। ऐसे सच्चे लोगों के साथ उठ-बैठकर हिम्मत और जीवटता मिलती है, बढ़े चलो का दर्शन मिलता है।

गोपाल जी से एक बार मैंने पूछा--ये जो दूसरा वाला हाथ है, ये कब तक काम करेगा, इसका भी इलाज करवाइए।

उनका जवाब था--यशवंत भाई, जाने दीजिए। मुझे मेरे शरीर की याद न दिलाइए। जब मैं शरीर के अंदर की दुनिया के बारे में सोचने लगता हूं तो इसके आगे कुछ नहीं सोच पाता और उसी गहराई में ही तड़पने-भिड़ने लगता हूं। जब बाहर की दुनिया के दुख-दर्द के बारे में सोचने लगता हूं तो अपने शरीर के दर्द और दिक्कतों का अहसास ही नहीं होता।

उनका जवाब सुनकर मैं चुप और स्तब्ध था। कितना निर्दोष और सहज व्यक्तित्व है अब भी। हम लोग तो दुनियादारी और नौकरी के चक्कर में न घर के रहे न घाट के।

इन्हीं गोपाल राय ने अब तीसरा स्वाधीनता आंदोलन छेड़ा हुआ है। इस आंदोलन में शहीद भगत सिंह के भाई से लेकर किसान यूनियन तक के नेता शामिल है। कुल मिलाकर यह एक साझा राष्ट्रीय मंच है जो गांवों की जनता को आर्थिक, वैचारिक, सामाजिक आजादी प्रदान करने के लिए कृतसंकल्प है। इसी कड़ी में इंडिया गेट को आधार बनाकर जंग शुरू की गई है, जिसके मुताबिक देश के गांव अब भी गुलाम हैं। अब भी आम जन जीने के लिए जद्दोजहद कर रहा है और सरकारें गुलामी की प्रतीक इंडिया गेट को सलामी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं।

गोपाल भाई के न्योते पर आज मैं और मनीष राज जंतर मंतर पहुंचे तो वहां गांव के लोगों की अपार भीड़ और मीडिया वालों के कैमरों की भीड़ दिखी। लोग तख्तियां लिए राष्ट्रपति भवन जाने की तैयारी कर रहे थे। महिलाएं, नौजवान, बुजुर्ग सब एक ही नारा लगा रहे थे....इंडिया गेट की क्या सच्चाई, गुलामी की पहचान है भाई। भीड़ में हम भी थे। जोश में न रहा गया, हम लोग भी नारे के जयघोष में अपनी आवाज देने लगे....इंडिया गेट की क्या सच्चाई, गुलामी की पहचान है भाई।

जंतर मंतर भी अजब इलाका है। कभी दिल्ली आएं तो यहां जरूर घूमें। जंतर मंतर तो देखें ही लेकिन यहां धरना देने वाले तरह तरह के लोगों पर भी नजर डालिए। कोई 11 साल से भूख हड़ताल पर बैठा है तो कोई तिब्बत की आजादी के लिए चीन के खिलाफ विरोध दर्शाने हेतु मुंह पर पट्टी बांधे झाड़ू लगा रहा है। कोई भोपाल गैस पीड़ितों के साथ हुए अन्याय की आवाज मुखर कर रहा है तो कोई कांशीराम को न्याय दिलाने के लिए बहन जी के खिलाफ आवाज उठा रहा है। इसी जंतर मंतर पर तीसरा स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष समिति द्वारा आयोजित जन संसद भी चल रही थी। ढेर सारी पार्टियों के नेता तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के लिए एक मंच पर इकट्ठा थे।

वहां से चलने लगा तो आंदोलन का लिट्रेचर और पर्चे उठा लाया। अभी जब उनको पढ़ रहा था तो लगा कि गोपाल भाई के इस मिशन के साथ भड़ास क्यों नहीं हो सकता। अगर कोई व्यक्ति एक सीधी सी बात पूछ रहा है कि भई, हमारे देश के लाखों वीरों ने आजादी दिलाने के लिए बलिदान दिए, उनकी याद में शहीद स्मारक बनवाने की बजाय अंग्रेजों के साम्राज्य के लिए लड़े सिपाहियों की याद में बने इंडिया गेट पर सलामी क्यों द रहे हो? इस गुलामी के प्रतीक को क्यों नहीं खत्म करते। क्यों नहीं एक राष्ट्रीय शहीद स्मारक बनाते जहां राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से लेकर आम जनता जाकर अपने देश के शहीदों को श्रद्धांजलि दे सके।

आजादी के इतने दिनों बाद भी अगर अपने शहीदों के लिए हम एक राष्ट्रीय स्मारक नहीं बनवा पाए तो हमें लानत है।

तीसरा स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष समिति ने जो पर्चे छपवाए हैं, उनके कुछ और अंश इस प्रकार हैं....

याद रहे, 26 जनवरी 1930 को भारत की जनता ने संपूर्ण आजादी हर तरीके से लेने का संकल्प रावी के किनारे पं. नेहरू व महात्मा गांधी के नेतृत्व में लिया था। 1947 के बाद उस संकल्प को भुला कर भारतीय सरकारें आज भी उस साम्राज्यवादी गुलामी के प्रतीक इंडिया गेट को सलाम करते हैं। हमें याद रहे कि पहला विश्व युद्ध अंग्रेजों ने अपनी प्रभुता के लिए और अफगानिस्तान को गुलामी में जकड़ने के लिए लड़ा था। कुछ महान इतिहासकार तो यह भी कहते हैं कि ...यह जंग तो घरेलू जंग थी इंग्लैंड के बादशाह, फ्रांस के बादशाह और जर्मन बादशाह के बीच। ये तीनों नजदीकी रिश्तेदार थे।


हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस जंग में एक तरफ तो भारतीय सिपाहियों को मरवाया गया था और दूसरी तरफ भारतवासियों को ब्रिगेडियर जनरल डायर ने तोहफा दिया था 1919 में जलियांवाला बाग का कत्लेआम करवाकर और पंजाब के शहरों व गुजरात में हवाई जहाज से बम गिराकर। हजारों भारतीयों की लाशों को बिखेरकर उनकी देशभक्ति की भावनाओं को दबाने के लिए अंग्रेजों ने इंडिया गेट के रूप में साम्राज्य के वफादारों की निशानी हमारे सीने पर खड़ी की थी।


दिल्ली पर राज करने वाली सरकारों ने सन 47 के बाद भारतीय सिपाहियों की कुर्बानी का भी मखौल उड़ाया, जब 1971 में भारतीय सिपाहियों की याद में जवान ज्योति को इसी इंडिया गेट की छत्र-छाया में बनाया। क्या आजाद भारत में उनके लिए कोई राष्ट्रीय यादगार बनाने के लिए भी जगह नहीं थी या फंड नहीं था?

अगर आप गोपाल राय को उनके मिशन के लिए साधुवाद कहना चाहें और उनकी जंग में साथ देना चाहें तो उन्हें आप 09818944908 पर फोन कर सकते हैं।

इतना जरूर कहिएगा.... गोपाल भाई, आप अकेले नहीं हो। आप की भावनाओं को दबे छुपे जीने वाले ढेर सारे लोग आपके साथ हैं और वक्त ने साथ दिया तो हम सब आपके साथ सशरीर होंगे।

पक्का मानिए, आपका ये कहना उस आदमी के जीवन संकल्प को और भी ज्यादा ऊर्जा प्रदान करेगा।

फिलहाल तो इतना ही

जय भड़ास

यशवंत

25.5.08

तीन हजार से ऊपर पोस्ट ....

आज हमारे भड़ास पर तीन हजार से ऊपर पोस्ट आ चुके हैं जो कि अपने आप में एक रिकार्ड है। क्या करें हम लोगों को रिकार्ड तोड़ने की आदत सी पड़ गयी है। प्यार से लेकर बदनामी तक के क्षेत्र में हमने रिकार्ड तोड़ डाले पर ध्यान रखा कि किसी का दिल न टूटे। आज हमारे भड़ास को बच्चा हुआ है आप सब ने उसका चंदा सा मुखड़ा http://www.bhadas4media.com पर जाकर देख ही लिया होगा, मुंह दिखाई के बाद अब बच्चे को चलना,बोलना,संस्कार देना सब आप लोगों के सहयोग से ही होने वाला है। चाचा,मामा,बुआ,दीदी,दादा सब लोग अपने हाथ आगे बढ़ाओ कि बच्चा आप की उंगली पकड़ कर खड़ा हो जाए और इतना सशक्त हो जाए कि दूसरों को सहारा दे सके। हम सब ने भड़ास के मंच पर बहुत से अच्छे-बुरे,खट्टे-मीठे अनुभव साथ में लिये हैं अब आगे देखिये कि आप सबका दिया हुआ बल हमें बिखरने न दे। हम एकजुट हैं तो ताकत है और हम किसी भी विषम परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। सहयोग और प्रेम अनिवार्य है। आप सबको एक बार फिर भड़ास4मीडिया के जन्म की बधाई हो...

6.3.08

वृंदावन का सबसे बड़ा संत... रुस्तम दादा

((दोस्तों, इसे पढ़ते हुए थोड़ा रो लेना अकेले में.....प्लीज पूरा पढ़ना...यशवंत))
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आजकल वृंदावन के बनारसीपने को जी रहा हूं। कल रात चार बजे होटल पहुंचा। बंदरों और कुत्तों से भागते, बचते, भटकते, होटल का रास्ता खोजते। कल शाम और रात के दौरान दो मीटिंग की, उसके बाद सिर्फ और सिर्फ वृंदावन के देसजपने को समझता बूझता रहा। सच कहूं, बिना शाम और रात को जिये किसी शहर को आप समझ ही नहीं सकते, समझेंगे भी तो वो आधा अधूरा और अधकचरा होगा जिसे आप अपनी संपूर्ण सत्य राय बताकर दूसरों के दिमाग पर थोप देंगे। कल की यादगार शाम और रात बिलकुल फक्कड़ी के नाम रही। हर दुकान पर मुंह मारते, पान घुलाते, अनजान और अजनबी लोगों से दोस्ती गांठते, उनसे बतियाते, खामखा दांत निपोरते हुए अपनी अति विनम्रता प्रस्तुत करने के साथ अगले आदमी को प्रभावित करते...... गपियाते ....गोलियाते....।

शहरों, लोगों, गलियों, माहौल, रातें, नदी, रिक्शा, पान.....सभी को आंखों में सजो लेने, जी लेने, महसूस कर लेने को हर पल बेचैन मैं कल रात को दिल से थैंक्यू कहा, उपरवाले को, भाई आज तो मजा बांध दिया। जीवन में हर चीज का दुहराव आज ब्रेक हुआ। ऐसा ही कुछ चाहता हूं रोज। देखो, ये नजारा देखकर पीना पिलाना भूल गया। डिप्रेसन गायब। दिल से पाप रार खत्म। लोग कितने अच्छे हैं। सब कुछ कितना सुंदर है। हर शख्स की जुबान पे है....राधे राधे। रिक्शा वाला आगे किसी को चेतावनी भी देता है तो कहना है राधे राधे। दुकान वाला अपने ग्राहक को देखते ही कहता है राधे राधे। मतलब हर बात में राधे राधे। जय हो राधे राधे।

तो वृंदावन की गलियों में रात के वक्त जो मिनी बनारस की झलक मिली, उसे खूब जिया। इस रिक्शे से उस रिक्शे। यहां से वहां। पैदल तो फिर पैदल ही पैदल। पान घुलाय घुलाय के। चुनरी बंधाय के। टिक्का लगाय के। चेहरा हंसाय के। कोई पाप वाप नहीं है। सब राधे राधे। जीवन कितना बढ़िया है। सब मस्त हैं। राधे राधे।

पर ससुरी निगाह ऐसी है अपनी न कि दुख को बुला ही लेती है। गम को देख ही लेती है। अवसाद को बूझ ही लेती है। भीगी पलकों से भीग ही जाती है। और इन दुखों, गमों, अवसादों, भीगी पलकों के साथ संबल बन खड़ा रहने को चल पड़ता हूं। भांड़ में जाये सुख, भांड़ में जाये राधे राधे। मुझे तो इन रुस्तम के साथ जीना है, दुखी होना है, उन्हें पल दो पल की खुशी देना है ताकि लगे कि वो उतने अभागे नहीं, जितना वो खुद अपने को मानते होंगे। वो बहादुर हैं, दुर्भाग्यशाली नहीं।

65 साल के रुस्तम के रिक्शे पर बैठने और फिर उतरने के बाद गौतम बुद्ध सी अवस्था में आ गया। दुख दुख दुख दुख...। रुस्तम की लंबी दाढ़ी से ही उनकी जात धर्म का पता चल जाता है पर इसका सिर्फ प्रतीकात्मक मतलब है, रुस्तम की ही तरह इसी शहर में या उस शहर में कोई कैलाश भी हो सकता है कोई दुखहरन भी हो सकते हैं कोई गुरमीत भी हो सकते हैं कोई जोजेफ भी हो सकते हैं.....। फिर भी, उनसे पूछ लिया, आपका नाम क्या है दादा?

बोले - रुस्तम।
फिर पूछा, तो फिर इतनी उम्र में रिक्शा काहें को खींच रहे हैं, इतने दुबले पतले हैं आप, क्या दिक्कत है आखिर?
रुस्तम दादा बोले...बेटवा, सब नसीब का खेल है।

थोड़ी चाय वाय साथ पी गई और बातें आगे बढ़ी तो रुस्तम की कहानी सुन आंखें भर आईं। किसी को ऐसी स्थिति में न लाये खुदा।

रुस्तम के चार बेटें और तीन बेटियां हैं। तीनों बेटियों को ब्याह कर उनके घर भेज दिया। चार बेटों में से एक के सात बच्चे हैं, दूसरे के पांच और तीसरे के तीन। चौथा कहीं बाहर रहता है अपना परिवार लेके। बाकी तीनों घर पे, रुस्तम के साथ ही। साथ कहें या सीने पे कहें। रुस्तम के बच्चे जो कमाते हैं उसे अपने बच्चों को खिलाने में गंवा देते हैं। तो रुस्तम क्या करें? अगर अकेले होते तो वो भी दाढ़ी वाढ़ी कटवा कर, पहचान छिपा कर, गेरवा वेरवा धारण कर राधे राधे कहते किसी आश्रम में प्रसाद पाते या फिर किसी मस्जिद पर ही चले जाते, दो चार पैसे जुटाकर खा पी जी लेते....मतलब जिंदगी किसी तरह बसर करने के जो हजार तरीके विकल्प स्थितियां हैं जो दुखदायी अदुखदायी दोनों ही हैं, को अपना लेते। पर 65 साले के अब गये तब गये वाली स्थिति में दिख रहे रुस्तम की मां भी अभी जिंदगा हैं। रुस्तम की बेगम साहिबा भी उन पर निर्भर हैं। तो रुस्तम को अपने अवाला दो और जानों की देखभाल, खिलाने पिलाने जिलाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही हैं और बेटें बेटियां इनमें उनकी एक कौड़ी की मदद नहीं करते या नहीं कर पाते, जो भी हो।

तो रुस्तम ने 65 की उमर में रिक्शा थाम लिया और राधे राधे वाले इस शहर में पूरी अंकड़ के साथ हांफते थूकते मुंह पोंछते सांसें संभालते भरे पेट निकली तोंद वाले स्वामियों, अनुयायियों, संप्रदायियों, यात्रियों....के बीच रिक्शे की घंटी मारते राधे राधे कहते अपने रिक्शे को वनखंडी से रमणरेती और परिक्रमा मार्ग से बस अड्डा ले जाते ले आते। कभी दस तो कभी पांच तो कभी बीस तो कभी कुछ नहीं पाते।

जोड़ गांठकर थक हारकर थूक हांफकर रुस्तम दादा रुपया लुंगी में गंठिया कर घर पहुंचते और अपने और दो स्त्रियों मां व बेगम को खिलाने जिलाने की कवायद में जुट जाते।

मैं सुनता रहा, भींगी आंखों को टपक पड़ने से रोकता रहा। इस पवित्र शहर की इस दुखी आत्मा के जीवन संघर्ष ने मुझे सबसे बड़ा संदेश दिया है। कोई भगवान वगवान नहीं, कोई खुदा वुदा नहीं। सब ढोंग पाखंड है। सब बातें है। सब झूठ है। सब बहकावा है।

रुस्तम की गलती क्या है? रुस्तम को सजा ये क्यों है? पिछला जनम, अगला जनम....सब बेकार की बातें। मन करता है कि गोली मार दूं सबको, एक एक को, सारा उत्सव खत्म हो जाए। सारी हलचल शांत हो जाए। सिर्फ और सिर्फ रुस्तम जिंदा रहे। और मैं देख सकूं उनकी खुशी.....उन्हें सताने, रुलाने, परेशान करने वाली दुनिया के खत्म हो जाने पर उनकी न रुकने वाली पागलों जैसी हंसी, उपर वाले का आभार प्रकट करत हुए कृतज्ञता भरी आंखों के साथ आसमान को निहारते।

पर ये ईंटों, सीमेंट, गाटरों की बड़ी खड़ी दुनिया में संवेदना तो कतई नहीं बसती, इनमें बसने वालों की आत्मा में चतुराई, चालाकी, धूर्तता, मक्कारी, चालबाजी, बनियागिरी, धंधेबाजी, काइयांपना, अवसरवाद.......बसता है। और राधे राधे के आध्यात्मिक इंट्रो के बाद अपने मूल रूप में पूरी विनम्रता के साथ सौदैबाजी धंधेबाजी अवसरवाद मक्कारी ....पर उतर आता है। सखी संप्रदाय के ये पुरुष जो स्त्रियों के वेष में साड़ी पहने मटकते लरजते शर्माते चले जा रहे हैं, उन्हें घंटी मारते हांफते रुस्तम राधे राधे कहकर हटाने की कोशिश करते हैं पर वो हैं कि वो खुद पर टिकी निगाहों को भरपूर समवेत जवाब देते हुए अपिने संप्रदाय के अनोखेपन का वर्णन प्रदर्शन करते चल रहे हैं। रुस्तम ने बड़ी देर की मेहनत के बाद कलेजे से सांस लेते हुए पैडल पर शरीर का पूरा जोर मार मार कर रिक्शे की जो स्पीड बनाई थी, इन सखियों के इसी मचकपने में उस पर ब्रेक लग जाता है। रिक्शा रुका तो रुस्तम की सांसते थामे नहीं थमी, धौंकनी की तरह उठते गिरते सीने से निकलती सांसें मुंह दाढ़ी समेत पूरे बदन को हिला रही थीं। ओफ्फ....क्या करें इस शांति, सुख, सौंदर्य, राधे राधे का......

रुस्तम रुके, थमे, फिर हांफते हुए पैदल ही रिक्शा खींचने लगे। हम उतर गए। रुस्तम से बतियाते, बातें करते सड़क की चढ़ाई पार करने।

रूस्तम ने बीस रुपये मांगे, बीस दिए। बातें शुरू हुईं। चाय पी गई। और उनके दुख से दुखी मैं भीगी आंखें लिए जब यह कहते हुए उनसे अलग हुआ कि रुस्तम दादा, आप बहुत बहादुर हैं। आप इस शहर के असली संत हैं, असली तपस्वी हैं, मुझे गर्व है कि मैंने आपका दर्शन किया। और....मैं आगे बढ़ गया। साथ वाले साथी ने बाद में बताया.....यशवंत, तुमने रुस्तम को रुला दिया।

सोचता हूं, रोने हंसने में कोई खास फर्क नहीं है। अच्छे बुरे में कोई खास फर्क नहीं है। संत राक्षस में कोई खास फर्क नहीं है। जीवन मरण में कोई खास फर्क नहीं है। अवसाद प्रसन्नता में कोई खास फर्क नहीं है। दुख सुख में कोई खास फर्क नहीं है। मेरे होने न होने में कोई खास फर्क नहीं है। आपके कहने न कहने में कोई खास फर्क नहीं है........


और शायद यही शिवत्व है, यही मुक्ति है, यही आनंद है, यही अमरता है.....जिसे पा लेना चाहिए, हम सभी को। हम भड़ासियों को। हम मनुष्यों को......ताकि

हाय हाय मार मार भाग भाग चल चल चढ़ चढ़ काट काट दौड़ा दौड़ा गिरा गिरा सफल सफल हार हार जीत जीत .....के चूतियापे से उबर कर केवल संवेदना बड़प्पन को जिया जा सके......

क्यों भाई लोग, आप लोग क्या सोचते हैं महाराज....कहिए राधे राधे.....


वंदावन के सबसे बड़े संत रुस्तम दादा को सलाम करता हूं क्योंकि ...


1- जाति धर्म मजहब अलग होने के बावजूद वे असल भारतीय हैं। राधे राधे उनकी जुबान से इसलिए नहीं फूटता कि वे बहुसंख्यक हिंदू बहुस शहर में रहते हैं, इसलिए फूटता है कि वृंदावन की ये जुबान है, मैं खुद यहां फोन आने पर राधे राधे करने लगा हूं.....वो फोन चाहे मेरे गांव गाजीपुर से क्यों न आया हो। ये वृंदावन का असर है। यह साझी संस्कृति है। यह मिट्टी की खुशबू है।

2- बुजुर्ग होने के बावजूद, बेटों के मुंह फेर लेने के बावजूद जिंदगी से हार न मानी, रार न ठानी। जिंदगी को जीने की ही राह पर चलते रहे। भले उतना ही पसीना बहाना पड़ रहे हो जितना जवानी में बहाते थे तो कोई फरक नहीं पड़ता था और अब बहा रहे हैं तो पूरा शरीर हिलने लग रहा है।

3- बेटियों बेटों पर उम्मीद करने, उनसे मांगने, उन पर निर्भर होने की बजाय....मुश्किल आने पर खुद दौड़ पड़े अपनी शहर की सड़कों पर, रिक्शा खींचते। किसी से क्यों हाथ पसारे, जब तक है दम में दम, जी लेंगे हम।

4- धर्म, नोटों, मंदिरों, रास, मस्ती, आनंद, मस्ती, ईश्वर....वाले शहर की खुशी से थोड़ा भी दुखी ना होते हुए उनके साथ दिखने रहने की कोशिश करते हुए भी अपने दुख को न बताना, न प्रकट करना, न खोलना। बस अपने काम से काम रखना। यही तो लय है।

5- एक बहादुर इंसान, जिसे किसी पल आई किसी मुश्किल से कोई घबराहट नहीं, कोई ढोंग नहीं, कोई पाखंड नहीं। बिलकुल साफ पारदर्शी जीवन। मुश्किल है तो है, हल कर। आगे बढ़। जिंदगी जी। दुखों से लड़। आगे बढ़े।

जय हो रुस्तम की
जय भड़ास
यशवंत

28.2.08

लड़की का नाम रुचिका, लड़के का नाम नासिर....संदर्भ वो पतिता फिर भाग गई ...पार्ट टू

पिछले दिनों पतिता सीरिज में दो पार्ट में मैंने दो स्त्रियों की सच्ची कहानी लिखी, दूसरी कहानी मेरठ के जिस लड़की की थी, जिसने एक मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह किया था और घर से भाग गई थी.......लंबी कहानी, उसका इंटरव्यू दैनिक जागरण मेरठ संस्करण में प्रकाशित किया था उस वक्त। उस बारे में मेरे अनन्य मित्र और दैनिक जागरण मेरठ की शोध व लाइब्रेरी टीम के इंचार्ज राकेश जुयाल ने मुझे मेल से जानकारी दी कि उस लड़की का नाम रुचिका था, और वो लड़का नासिर नाम का था। बाद में हाईकोर्ट ने उन दोनों को एक साथ रहने व समाज के ठेकेदारों को उनकी जिंदगी से दूर रहने का निर्णय सुनाया था।

साथी राकेश जुयाल का दिल से आभार जो उन्होंने यह महत्वपूर्ण तथ्य मेल के जरिए मुझे भेजा। मैं उनके पत्र को यहां हू ब हू प्रकाशित कर रहा हूं ताकि जिन लोगों ने उस स्टोरी को पढ़ी होगी, वे ये तथ्य भी जान लें। जिन लोगों ने वो स्टोरी नहीं पढ़ी होगी वो.....वो पतिता फिर भाग गई...पार्ट टू....शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास में प्रकाशित पोस्ट जरूर पढ़ें।
जय भड़ास
यशवंत
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RJuyal to me
show details 23 Feb (5 days ago)

यशवंत जी वो लड़की रुचिका जिसे आपने क्फ्.फ्.भ् को पहले पेज पर बाई लाइन अपने नाम से छापा था ,दुविधा के दोराहे पर खड़ी हुई जिंदगानी , शीर्षक से प्रकाशित किया था । ख्फ् मई को रुचिका फिर नासिर के साथ भाग गई
ख्� मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की हां के बाद चले महानगर के प्रेम दीवाने
जाति-धर्म से ऊपर प्रेम की जीत हुई जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया ।

राकेश जुयाल


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राधे राधे, जय गोविंदा, जय श्रीकृष्णा, हरिओम, नमो नारायण....

आजकल लगातार टूर पर रहता हूं। काम कुछ इस तरह का है कि धर्म गुरुओं और धार्मिक संगठनों से हर दिन पाला पड़ता रहता है। पहली बार इतनी करीब से, इतने नजदीक से इन्हें जाना व समझा है। जैसा कि हर जगह होता है, यहां भी अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही हैं। सबसे मजेदार है इन सभी धार्मिक संगठनों, गुरुओं के अभिवादन की पंचलाइन। कोई लोग फोन करते ही राधे राधे कहकर फोन उठाते हैं तो कोई मिलते ही हरिओम कहते हैं। इनके जवाब में मुझे भी राधे राधे या फिर हरिओम कहना पड़ता है। इसी तरह जय श्रीकृष्णा, जय गोविंदा, नमो नारायण जैसे संबोधन भी कई अलग अलग बाबाओं व धर्म संगठनों के हैं।

इनके यहां जो सबसे अच्छा अनुभव होता है वो प्रसाद खाना। इतना सादा व सात्विक खाना मिलता है कि पंगत में बैठकर खाने पर मन खुश हो जाता है। पिछले दिनों हरिद्वार तो फिर इन दिनों वृंदावन में इन अनुभवों से दो चार हो रहा हूं। चूंकि अभी अनुभव प्रक्रिया लगातार जारी है सो इस पर ज्यादा लिखना उचित नहीं लेकिन मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि अपने इस कार्यकाल में मैं मार्केटिंग व बिजनेस के लिए काम करते हुए हिंदू धर्म गुरुओं, बाबाओ, आश्रमों, संगठनों को काफी करीब से जान पा रहा हूं। इनमें से ढेर सारे शीर्ष बाबाओं से तो अब लगभग दोस्ती हो चुकी है। उनके साथ उनके जीवन के अनुभवों, उनकी सांगठनिक क्षमता, उनके आध्यात्मिक अनुभवों को सुनना, सहेजना मजेदार अनुभव है।

इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा। फिलहाल तो इतना ही कहना चाहूंगा कि जैसे हम सभी भड़ासियों की पंच लाइन व अभिवादन लाइन जय भड़ास है, उसी तरह से पूरे दिन के दौरान अलग अलग बाबा लोगों से मुझे अलग अलग तरीके से अभिवादन करना पड़ता है। कई बार तो गड़बड़ा भी जाता हूं। जिनसे राधे राधे कहना होता है उनसे हरिओम कह देता हूं। पर अनुभव बढ़ने के साथ ही लोगों को अलग अलग समझने बूझने व डील करने में पक्का होता जा रहा हूं। इसी को तो कहते हैं एक ही जीवन में ढेर सारे अनुभव पा जाना .....

तो हे मन, चलो अब गंगा तीर....
आप सभी लोगों को कहता हूं....राधे राधे, हरिओम, नमो नारायण, जय श्रीकृष्णा, जय गोविंदा, राम राम....

जय भड़ास
यशवंत

24.2.08

पत्रकारिता की दास्तान.... इसका आदमी, उसका आदमी, आख़िर किसका आदमी

((नमस्कार सर, मेरा नाम चंदन है। अपने छोटे अनुभव में मैंने कई बार इसको महसूस किया है या इससे भी ज्यादा दूसरों से कइ बार कहानियों के रूप में सुना है। मौजूदा समय में न्यूज चैनल में काम कर रहा हूं। उम्मीद है कि मेरे इस पाती को आप अपने ब्लाँग में जगह देगें।
धन्यवाद सर
चंदन))


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पत्रकारिता में ये बीमारी तो पहले से थी लेकिन अब इसने महामारी का रूप ले लिया है। कस्बों और गांवों में औरतों के आदमी हुआ करते हैं लेकिन यहां आदमीयों के आदमी हैं। अन्दर आने के लिए किसी का आदमी, बने रहने के लिए किसी का आदमी और आगे बढ़ने के लिए भी किसी का आदमी होना बेहद जरूरी है। घर बैठ किसी के साथ सुरापान तो कर सकते हैं लेकिन दफ्तर के आहाते में किसी के साथ चाय की चुस्की भी ली तो उसके आदमी। नतीजा... आपका साथ देने वाला शख्स अगर दफ्तर में हावी है तो चौका वरना आप तत्काल प्रभाव से टीम के सोलहवें खिलाड़ी की मानिंद। चौके लगाने का दमखम रखते होंगे अपनी बला से लेकिन फिलहाल तो किस्मत पर ग्रहण लगता जान पड़ता है। मानो पेप्सी की बोतल लेकर ब्रेक का इंतजार करना ही भाग्य में बदा है।

शायद वो समय कुछ और रहा होगा जब दादा परदादा कहा करते थे कि सबसे मिलकर रहो लेकिन अब तो हालात ये है कि इधर के रहो या उधर के रहो। पत्रकारिता में नये हैं या युं कहें कि नौसिखये हैं तो किसी का आदमी होना और भी जरूरी है। चुंकि से इस बेलौसपन से बीमारी को पोषण मिलता है। इसलिए बचना थोड़ा मुश्किल है। डर तो है लेकिन अर्थशास्त्र की परिभाषा के अनुसार जोखिम उठाने वाले ही उद्यमी कहलाते हैं। इसलिए आप अगर इस बीमारी को जीना सीख गये तो रिलांयस मोबाइल की तरह दुनिया आपकी मुट्ठी में।

मेरे एक सहयोगी वसीम बरेलवी का एक शेर गाहे बगाहे गुनगुनाते हैं -------

मेरा अहले सफर कब किधर का हो जाए
ये वो नहीं जो हर रहगुजर का हो जाए
जीने का हक सिर्फ उसी को है दुनिया में
जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए


पर सातवीं में तो मेरे मौलवी साहब ने बताया था कि आदमी तो वही है जो इसका भी रहे और उसका भी हो। पर छोटे से अनुभव और कइ अपरिचित कहानियों के बाद मौलवी साहब भी अब झूठे लगने लगे हैं ।
--चंदन

8.2.08

दारूबाजी के फंडे

दारूबाजों के बारे में एक से एक किस्से हैं। मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके गांव में एक दारूबाज है जो महीने भर लगातार दिन रात पीता रहता है, माने की टुन्न रहता है। महीने भर ज्यों बीतता है, वह छोड़ देता है, पूरे एक महीने के लिए। फिर वह बिलकुल नहीं पीता महीने भर। उसके बाद जो महीना आता है उसमें फिर वह दिन रात टल्ली रहता है। जब उसका पीने वाला महीना आता है तो उसके पड़ोस वाले बोल पड़ते हैं--लो, पग्गल तो गया। इसके पीने के दिन शुरू हो गए।

और इन पीने वाले दिनों में पग्गल किसी से कुछ नहीं बोलता। बस, वह नशे में रहता है, चिंतन करता रहता है। खाता है और पीता है और सोता है और चिंतन करता है। बस, और कुछ नहीं करता। इन दिनों में वह न घर का न खेत का न मवेशियों का, कोई काम नहीं करता। घर उसके बाकी परिजन चलाते हैं। वह तो सिर्फ नशे में तपस्या करता रहता है।

भई, इन सज्जन के बारे में जानकर मुझे उत्सुकता हो पड़ी है इनसे मिलने के लिए। हां, ये बुलंदशहर जिले के एक गांव के रहने वाले हैं। अगर किसी टीवी वाले भइया को ठीकठाक ब्रेकिंग न्यूज चाहिए तो वहां चला जाए, उनके पीने वाले दिनों की रिकार्डिंग कर ले फिर बिना पीने वाले महीने की उनकी जिम्मेदार व सक्रिय ज़िंदगी की तस्वीर उतार ले, बस हो गया अजब-गजब और परोस दे ब्रेकिन न्यूज बनाके।

एक अपना मित्र था, कानपुर में। उसका भी एक तगड़ा नियम था। वह पीता तो था लेकिन केवल पहला पैग। आप उसके पहले पैग में या एक बूंद दारू दो और बाकी पानी भर दो या पहले पैग में गिलास में केवल निट दारू भर दो, वो मना नहीं करेगा, पी जायेगा। लेकिन उसके बाद दूसरा पैग किसी हालत में नहीं ले सकता। धरती डोल जायें, चांद-सूरज खिसक जायें, पर भाई दूसरा पैग नहीं लेता तो नहीं लेता। उसका यह फंडा हमने हमेशा देखा, बहुत जिद की दूसरा पैग पिलाने को पर भाई ने नहीं पिया तो नहीं पिया। बाद में हम लोगों ने उसके इस नियम को सराहा और सभी दारूबाजों को इसी नियम पर चलने की सलाह दी। सलाह देने में क्या जाता है। भले सलाह खुद फालो करो न करो। यही तो अपने डेमोक्रेसी में मजा है।

एक मेरे और मित्र हैं। वो या तो नहीं पीते हैं। जब पीते हैं तो एक दो पैग पर नहीं रखते। उनका मानना है कि इतना पी लो कि होश ही न रहे। मतलब, वो कम से कम अद्धा तो खत्म ही कर देते हैं। अगर बेहोशी युक्त नशा न हुआ तो फिर एक क्वाटर मंगा लेते हैं। और, आखिर में वो खाली बोतलों को सिर पर रखकर, अदभुत संतुलन साधते हुए नाचने लगते हैं। एकदम मुक्त और मोक्ष की अवस्था में आ जाते हैं। फिर वो अपने लोकधुनों को गा-गाकर रोते हैं, अपने अतीत के सुंदर जीवन को याद करते हैं और वर्तमान के चूतियापे को गरियाते हैं।

एक अन्य साथी हैं। उनका फंडा ये है कि वो अपने पैसे से न पीने की बात करते हैं। पर उन्हें दो पैग कोई पिला दे तो वो एटीएम कार्ड व नगद सामने रख देते हैं। उसके बाद उनके पैसे से चाहें जितना पियो, वो कतई बुरा नहीं मानेंगे, लेकिन अगर शुरू में ही आपने उनसे कह दिया कि आज जरा पिलाइए, तो भाई ऐसा करारा बहाना बनाकर निकल लेगा कि पूछो मत। लेकिन उन्हें आप खुद ही आफर कर दें और एक क्वाटर के दो पैग पिला दें तो फिर वो अपने पैसे से बोतल मंगा लेंगे।

तो ये दारूबाजों के दारूबाजी संबंधी चार फंडे व चार व्यक्तित्व हैं। अब ये न पूछिये, मेरा वाला फंडा क्या है। वो बाद में बताऊंगा। हां, इतना जरूर बता दूं कि मैं एक तो अच्छा खासा गैप देता हूं, नये साल के पहले दिन से ही। वीकेंड पर मटन-चिकन बनाता हूं तो साथ में एक क्वाटर भी ले आता हूं। बस, एक एक घूंट सिप करते हुए प्याज लहसुन काटते, मांस धोते और पकाते निपटा देता हूं। उसके बाद छककर खाता हूं। सुबह उठकर इतना भयंकर एक्सरसाइज करता हूं कि रात का पिया हुआ गायब हो जाता है। मतलब, ड्रिकिंग विथ नानवेज। और सुबह उठकर साइड इफेक्ट दूर करने के लिए प्राणायाम।

तो ये मेरा वाला मिलाकर पांच फंडे हो गए। अगर आपको भी कोई ऐसा दारूबाज मिला हो जिसका दारूबाजी को लेकर कोई फंडा हो तो जरूर भड़ासियों को बताएं। कम से कम मैं तो चाव से पढूंगा इसे।

डाग्डर साहब को यह पोस्ट बकवास लगे या बिंदास, पर मुझे तो ऐसी गपोड़ी चर्चाएं व बतकही करने में बड़ा मजा आता है। मैं जब भड़ास पर लिखता हूं तो देस, समाज, जिम्मेदारी व नैतिकता को भेज देता हूं तेल लेने के लिए। आनलाइन कोई तो स्पेस ऐसा हो जहां दिल की बात लिखी जा सकती हो, और वो स्पेस भड़ास देता है, मेरा अपना स्पेस.....।

जय भड़ास
यशवंत