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28.2.08

लड़की का नाम रुचिका, लड़के का नाम नासिर....संदर्भ वो पतिता फिर भाग गई ...पार्ट टू

पिछले दिनों पतिता सीरिज में दो पार्ट में मैंने दो स्त्रियों की सच्ची कहानी लिखी, दूसरी कहानी मेरठ के जिस लड़की की थी, जिसने एक मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह किया था और घर से भाग गई थी.......लंबी कहानी, उसका इंटरव्यू दैनिक जागरण मेरठ संस्करण में प्रकाशित किया था उस वक्त। उस बारे में मेरे अनन्य मित्र और दैनिक जागरण मेरठ की शोध व लाइब्रेरी टीम के इंचार्ज राकेश जुयाल ने मुझे मेल से जानकारी दी कि उस लड़की का नाम रुचिका था, और वो लड़का नासिर नाम का था। बाद में हाईकोर्ट ने उन दोनों को एक साथ रहने व समाज के ठेकेदारों को उनकी जिंदगी से दूर रहने का निर्णय सुनाया था।

साथी राकेश जुयाल का दिल से आभार जो उन्होंने यह महत्वपूर्ण तथ्य मेल के जरिए मुझे भेजा। मैं उनके पत्र को यहां हू ब हू प्रकाशित कर रहा हूं ताकि जिन लोगों ने उस स्टोरी को पढ़ी होगी, वे ये तथ्य भी जान लें। जिन लोगों ने वो स्टोरी नहीं पढ़ी होगी वो.....वो पतिता फिर भाग गई...पार्ट टू....शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास में प्रकाशित पोस्ट जरूर पढ़ें।
जय भड़ास
यशवंत
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RJuyal to me
show details 23 Feb (5 days ago)

यशवंत जी वो लड़की रुचिका जिसे आपने क्फ्.फ्.भ् को पहले पेज पर बाई लाइन अपने नाम से छापा था ,दुविधा के दोराहे पर खड़ी हुई जिंदगानी , शीर्षक से प्रकाशित किया था । ख्फ् मई को रुचिका फिर नासिर के साथ भाग गई
ख्� मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की हां के बाद चले महानगर के प्रेम दीवाने
जाति-धर्म से ऊपर प्रेम की जीत हुई जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया ।

राकेश जुयाल


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23.2.08

वो पतिता फिर भाग गई.....!!! पार्ट-2

मेरठ की वो लड़की। बेहद सुंदर। जीभर के जिसे देख ले, उसे प्यार हो जाये। परिवार की सबसे बड़ी लड़की। हायर मिडिल क्लास की लड़की। शहरी परिवेश के परिवार की लड़की। स्मार्ट और अक्लमंद लड़की।

स्कूल आते जाते एक नौजवान से उसे प्यार हो गया। नौजवान भी कोई खास नहीं। टपोरी टाइप। वो भी यंग स्मार्ट और फौलादी बदन वाला। दिन के वक्त का ज्यादातर हिस्सा सड़क पर बाल संवारते, बाइक भगाते बिताता था। वह अपने कौशल और स्किल से उस लड़की पर डोले डालने लगा। लड़की को अच्छा लगता था। कभी गुस्साने का दिखावा करती तो कभी मुस्करा कर आगे बढ़ जाती। बकौल कवि हरिप्रकाश उपाध्याय की कविता के शब्दों में कहें तो सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने प्रेम करने के जो तरीके सिखाये, इन दोनों नौजवान दिलों ने उनसे सबक लेकर प्रेम करना सीख लिया।

और एक दिन.............!!!!

लड़की उस लड़के संग भाग गई।

मचा हल्ला। कोहराम। जितने मुंह उतनी बातें। प्रेम में दुनियादारी घुस गई। पकड़ो, मारो, हिंदु, मुस्लिम, आईएसआई, धर्म परिवर्तन, शादीशुदा....। मतलब आप लोग समझ गए होंगे। लड़का मुसलमान था। शादीशुदा था। आईएसआई का एजेंट था। ये मैं नहीं कह रहा हूं, लड़की के परिजनों ने जिन हिंदुवादी नेताओं को पकड़ा उन लोगों ने सड़क पर उतरकर ये सारी बातें माइक से कहीं।

और एक दिन लड़की पकड़ ली गई।

ज्यादा दूर नहीं भागे थे वो। यहीं गाजियाबाद में एक फ्लैट लेकर रह रहे थे। लड़की को मां की याद आई, फोन किया। परिजनों ने उसे पुचकारा। सब कुछ स्वीकारने और बढ़िया से शादी करने का लालच दिया। लड़के फंस गई, उसने अपना एड्रेस बता दिया। घर वाले हिंदुवादी नेताओं और पुलिस के साथ आए और लड़की को उठा ले गए। लड़के को खूब मारा पीटा और उसे छोड़ दिया।

मेरठ में यह मुद्दा सिर्फ प्रेम विवाह और भागने के कारण नहीं बल्कि हिंदू बनाम मुस्लिम के मुद्दे के कारण खूब चर्चित हुआ। हिंदू व मुस्लिम नेताओं के मैदान में आ जाने से मामला ला एंड आर्डर तक जाता दिखा।

दैनिक जागरण के सिटी चीफ के बतौर मैंने खुद उस लड़की से बात करने की ठानी और उसके दिल की राय प्रकाशित करने का निर्णय लिया। एक संपर्क द्वारा उस लड़की के घर पहुंचे जहां वह लगभग कैद में रखी गई थी। मैंने सबसे विनती की कि मुझे अकेले में बात करने दिया जाए। और उस लड़की से बातें करने के बाद मेरा माथा भन्ना गया। सिर्फ वह बेहद खूबसूरत ही नहीं थी बल्कि बेहद बौद्धिक और समझदार भी थी। उसने जो बातें कहीं उसे मैंने एज इट इज छाप दिया।

उसके जो कहा, उसका लब्बोलुवाब ये था...

मुझे पहले से पता था कि वो शादीशुदा है लेकिन अब वो तलाक दे चुका है। जो आदमी तलाकनामा मुझे दिखा चुका है और उसे मेरे ही साथ रहना है तो फिर क्या दिक्कत है।

वो बेहद शरीफ लड़का है। उसे लोग फर्जी तौर पर आईएसआई का एजेंट बता रहे हैं। मैं उसके साथ रहना चाहती हूं क्योंकि वो मुझे अच्छा लगता है। मुझे नहीं चाहिए ये सुख। मैं उसके साथ गरीबी में जी लूंगी।

ये देखिए तस्वीरें, जो छिपाकर ले आई हूं। हम लोगों ने बाकायदा निकाह किया है और निकाह मैंने अपनी मर्जी से किया है।

ये देखिए तस्वीरें जिसमें उनके घर के सारे लोग हैं और कितने प्यार से मुझे घर में ले जाया गया। रखा गया। पार्टी हुई। वहां के जो छोटे बच्चे हैं वो मुझे इतने प्यारे लगते हैं, कि मैं उन्हें याद करके रोती हूं। हम लोगों को उनका घर छोड़कर इसलिए गाजियाबाद जाना पड़ा क्योंकि पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार कर लेती।

मैं तो मां की ममता में पकड़ ली गई। इन्होंने (मां ने) मेरे साथ धोखा किया है। ये समझा रही हैं कि मुस्लिम से शादी करने से नाक कट गई। मैं कहती हूं कि क्या सुनील दत्त ने नरगिस से शादी करके अपने खानदान की नाक कटा ली। मुझे समझ में नहीं आता, इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद लोग इतनी घटिया बातों को क्यों जीते रहते हैं।


-----उस कम उम्र की लड़की (मेरे खयाल से ग्रेजुएशन सेकेंड इयर में थी वो) के इतने मेच्योर व शानदार विजन को देखकर मैं दंग रह गया। उसने मेरी राय इस बारे में जानने की कोशिश की तो मैंने कहा कि तुमने सौ फीसदी ठीक किया है। अगर तुम उसके साथ खुश हो और तुम्हें उस पर भरोसा है तो बाकी किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।

मैंने उसकी कही हुई सारी बातें उसकी तीन तस्वीरों के साथ दैनिक जागरण पहले पन्ने पर बाटम में प्रकाशित किया। और मामला फिर गरम हो गया।

पूरे मेरठ में एक बात का जमकर प्रचार किया जाता है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को सायास तरीके से फंसाते हैं और शादी कर लेते हैं। ऐसे वो अपने मजहब के विस्तार व हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मकसद से करते हैं। पर मैं ये बात नहीं मानता। पहली बात तो हम ये क्यों मान लेते हैं कि हिंदू लड़कियां गाय बकरी हैं जिनके पास कोई दिमाग नहीं है और वो जो फैसला ले रही हैं उसमें उनका दिमाग नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कों का हिप्पोनेटिज्म काम आता है। अरे भाई, लड़कियां दिमाग रखती हैं। उन्हें अपने फैसले लेने दो। ये तो तुम्हारे अपने धर्म और संस्कार की दिक्कत है ना कि वो लड़कियां तुम्हारे वर्षों के रटाये जिलाये संस्कारों को प्रेम के धागे के चलते झटके में तोड़ डालती हैं। इसका मतलब तु्म्हारे संस्कारों व सिखाये विचारों में दम नहीं है, तुम्हारी ट्रेनिंग में कमजोरी है।

खैर, बहस भटक रही है। वापस लौटता हूं मुद्दे पर।

इंटरव्यू छपने के बाद उस लड़की पर पहरा और बढ़ा दिया गया और किसी भी मीडिया से मिलने पर एकदम से पाबंदी लगा दी गई क्योंकि उसके खुले विचारों को मैंने हू ब हू जागरण में प्रकाशित कर दिया था। कहां उसकी मां ये मानकर चल रही थीं कि उनके पक्ष में सब छपेगा, और कहां इंटरव्यू ने लड़की के पक्ष को मजबूत कर दिया।

वो लड़की हिंदूवादियो और परिजनों के लिए विलेन बन चुकी थी। उधर लड़के ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि मेरी पत्नी को जबरन ले गये हैं वो लोग। खैर, लड़की को रोज दर्जन भर लोग समझाने पहुंचने लगे उसके घर। शुरू में तो वो चीखती चिल्लाती उनसे बहस करती रही, जबान लड़ाती रही। लेकिन समझानों वालों की बेहिसाब संख्या देखकर वो मौन हो गई। वो केवल सामने बोलते लोगों को निहारती और शांत रहती।

धीरे धीरे ये मामला शांत हो रहा था। लोग लगभग इस प्रकरण को भूलने लगे थे। वो लड़की गंदी लड़की, खराब लड़की, पतित लड़की घोषित की जा चुकी थी। न सिर्फ परिवार द्वारा समाज द्वारा बल्कि पूरे शहर के हिंदुओं द्वारा।

उस लड़की के चेहरे की रौनक गायब हो चुकी थी। हां, मुझे याद आया। उसकी मां अध्यापिका थीं। उन्होंने बेटी को खुले माहौल में पाला था और कभी किसी चीज के लिए बंदिश नहीं लगाई। अब उन्हें अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये नहीं सोच पा रही थी कि चलो बेटी ने गलत ही सही, फैसला ले लिया है तो उसका साथ दें। समझाया बुझाया फिर भी नहीं मान रही है तो उसे उसकी मन की करने दो। बहुत बिगड़ेगा तो क्या बिगड़ेगा। वो मुस्लिम युवक उसे छोड़ देगा, जैसी की आशंका परिजनों द्वारा जताई जा रही थी। तो इससे क्या होगा? क्या किसी के छोड़ने से किसी की ज़िंदगी खत्म हो जाती है। मैं तो मानता हूं कि मुश्किलें और चुनौतियां हमेशा आदमी की भलाई के लिए ही आती हैं। ज्यादातर महान लोगों ने जीवन के हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना किया और उससे जीतकर या हारकर, उससे सबक लेकर और आगे बढ़ गए। हो सकता है, वो लड़की खुद अपने जीवन के अऩुभवों से जो सबक लेती उससे वो समझ पाती कि उसने जो निर्णय लिया है वो सही या गलत है।

बात फिर भटक रही है। मैं कह रहा था कि समय बीतने के साथ माहौल लगभग शांत हो चुका था।

और एक दिन फिर खबर आई। वो लड़की उस लड़के के साथ फिर भाग गई।

हुआ यूं कि समय बीतने के साथ लड़की ने थोड़ा नाटक किया। उसने मां के सामने झुकने का नाटक किया। बाहर निकलने की थोड़ी थोड़ी आजादी उसे मिलने लगी। उसे भागते न देखकर उसे थोड़ी और आजादी दे दी गई। नौंचदी मेले में घूमने के लिए भी कह दिया गया। उसके साथ कोई घर का हमेशा होता था। मेले में वो भाई के साथ गई और जाने कब भाई को महसूस हुआ कि उसकी बहन उसके साथ नहीं है। खूब ढूंढा तलाशा गया पर वो नहीं मिली। बाद में मालूम चला, दोनों फिर भाग गये। इस बार बेहद दूर चले गए।

उसके बाद क्या हुआ, मुझे कोई खबर नहीं मिली। पर मैं उस लड़की के चेहरे को आज भी नहीं भूल पाता हूं।

सच्ची कहूं तो मैं उसे अंदर ही अंदर प्यार करने लगा था। वो लड़की पतित घोषित कर दी गई थी, समाज के द्वारा, शहर के द्वारा, परिवार के द्वारा। उस लड़की का नाम दूसरे घरों की लड़कियों के सामने इसलिए लिया जाता था ताकि बताया जा सके कि पतित, गंदी, बुरी लड़कियां होती कैसी हैं और वो कितना नुकसान कर देती हैं, अपना, खानदान का और समाज का। उन दिनों मेरठ के बाकी घरों की लड़कियों को उनकी माएं उस जैसी कभी न बनने की नसीहत देती थीं। मुझे खुद याद है कि मेरे मोहल्ले पांडवनगर में कई घरों की माएं अपनी बच्चियों से हंसते हुए बतियाती थीं और उस बेशरम लड़की के किस्से पढ़कर, सुनाकर ईश्वर से अनुरोध करती थीं कि हे ईश्वर ऐसी पतित लड़कियां किसी मां-पिता को न देना।

मैं उस लड़की का नाम भूल चुका हूं। मेरे मेरठ के साथी अगर इसे पढ़ रहे हों तो जरूर बतायें उसका नाम, कमेंट के रूप में लिखकर। पर उस पतिता प्यारी गुड़िया को मैं आज भी दिल से प्यार करता हूं। उसके लिए दुवा करता हूं कि वो जहां रहे, सुखी रहे।

जय भड़ास
यशवंत

21.2.08

मनीषा जी, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...उर्फ रसमलाई बनाम दिवालियापन

मनीषा पांडेय ने अपनी पोस्ट में मेरी बातों, विचारों, इरादों को जिस तरह कनसीव किया है, और जो कलम तोड़ कर लिखा है, उसका एक एक कर जवाब देना चाहूंगा....यशवंत
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आपने कहा---
हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा।

मेरा कहना है...
दरअसल मठाधीशों का हमेशा इरादा रहता है कि बहसें उनके मुताबिक, हिसाब से चलें और उनके तरीके को ही लोग स्वीकार कर वाह वाह, शानदार, वेरी गुड कहें...जैसा कि हो रहा है....। बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.....। अगर बात निकली है तो उसके हर लेयर, पर पेंच, हर एंगिल को समझा बूझा जाएगा और लोग उसे अपने अपने तरीके से बूझेंगे। इसे रोकने की मंशा रखना, नियंत्रित करने के बारे में सोचना, इससे खफा होने एक व्यक्तिवादी और आत्मकेंद्रित सोच का परिचायक है।


आपने कहा---
पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ

मेरा कहना है...
सच्ची बात तो यही है जो मैंने कहा था, आप भड़ास निकाल रही हैं। इस भड़ास के मायने कतई भड़ास ब्लाग या भड़ास बैंड नहीं बल्कि दिल की बात कह देना है, जो आप शिद्दत से महसूस करती हैं। इस देश में जिस तरह से 99 फीसदी लोग बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बघार कर फिर अपने रोजी रोटी और कमाने खाने में जुट जाते हैं, अपने धंधे को बेहतर करने में लग जाते हैं और समाज को व अवाम को अपने हाल पर छोड़ देती हैं, अगर वही करने का इरादा है तो कोई बात नहीं। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो अपने ब्लाग पर क्रांति की अलख जगाए हुए हैं और उसके बाद बेहद निजी किस्म के शीशे के घरों में बेटा बिटिया माई बाप बियाह खाना पैसा धंधा सुख दुख....आदि किस्म की निजी चीजों को प्राथमिकता में रखे हुए हैं। वहां से बाहर निकलते ही फिर सिद्धांत बघारने लगते हैं। आप वैसा हैं या नहीं, आप जानें लेकिन यह जरूर है आप अच्छा खासा भोंपू बजा लेती हैं, रीमिक्स वाला।


आपने कहा---
यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं।
मेरा कहना है...
इसका जवाब उपर दे दिया है। लड़कियां भड़ास नहीं निकालेंगी तो देवी व दुर्गा बनी रहेंगी। आप भी बनी रहिए। आपको अच्छा अच्छा गुडी गुडी कहने वाले ढेर सारे लोग हैं। भगवान ने बुद्धि और कलम दे दी है, चाहे जिसकी बखिया उघेड़िये। आप लिखते रहिए अंतरराष्ट्रीय महिला विशेषज्ञों के नाम लेकर उद्धरण देते हुए महान नारीवादी आंदोलनों के दर्शन और आंसू बहाते रहिए महिलाओं की दशा-दिशा पर। लेकिन जो कुछ झेला है, बूझा है, महसूसा है...उसे कहने का साहस नहीं होगा, भड़ास निकालने की ताकत नहीं होगी तो ढेर सारे आडंबरियों से बाहर आप भी नहीं होंगी।

आपने कहा---
यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत।

मेरा कहना है...
चलिए माना न आपने कि आप के चलते लड़कियां जो आज बेहतर हालत में हैं, नहीं हैं बल्कि इसके पीछे बाजार है। और यही बाजार लड़कियों को और पतित करेगा, और अच्छी हालत में ले जायेगा। और तरक्की करने देगा। आप लोग खामखा गाल बजाती रहेंगी, शरीफ, नेक और ईमानदार बनने के लिए।


आपने कहा---
कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मेरा कहना है...
जी, हम जानते हैं भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम। आज हम हिंदीवाले जो अंग्रेजी के दबाव में, हिंदी मीडिया की सामंती गठन, ऐंठन के दबाव में जिस विकृति को जी रहे थे, उसे निकाल कर, उसे उगल कर सहज महसूस करते हैं। भड़ास कोई बैंय या भोंपू नहीं मेडिकल साइंस की एक विधा है जिसे डा. रूपेश और मुनव्वर सुल्ताना बेहतर जानते हैं। कभी अपनी नौकरी, अपने ब्लाग और अपनी दुनिया से बाहर वक्त मिले तो भड़ास को कायदे से पढ़िए और समझिए। लेकिन जो लोग अपने को काबिल और झंडाबरदार मान चुके हैं दरअसल उन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आता। और आपने जो बात कही है कि पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई ....तो मैं ये कह सकता हूं कि आपके इस बौद्धिक दिवालियेपन के लिए भगवान आपको माफ करे। आप को खुद नहीं पता आप क्या लिख रही हैं, क्या कह रही हैं।

आपने कहा---
मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं।
मेरा कहना है...
केवल कहते रहिए। सिद्धांत दर्शन गढ़ते रहिए। अगर इसी सबसे क्रांति या उत्थान या तरक्की संभव थी तो अब तक रोज तरक्की व क्रांति होती।

आपने कहा---
सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती।

मेरा कहना है...
ऐसी ही लड़कियां गढेंगी लड़कियों के लिए एक अलग सा भड़ासी बैंड। आप देखते रहिएगा। भड़ासी बैंड गढ़ने के लिए साहस चाहिए, समाज के खिलाफ जाने कि हिम्मत चाहिए, आलोचनाओं को झेलने का बूता चाहिए। मास्टर की तरह गूढ़ बातें करने कहने से वो रामरतन की बिटिया कुछ नहीं समझेगी, शून्य में टुकुर टुकुर ताकती रहेगी। उसे साफ साफ समझाने वाली जरूर आएगी। लेकिन ये आप जैसियों से संभव नहीं है।

आपने कहा---
यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

मेरा कहना है...
भइया हम बुरे लोग हैं, मैंने पहले ही कहा था, फिर कह रहा हूं। और आप जैसों को ये लगता है कि हमारे सुझवा रसातल में ले जाएंगे तो ये शायद आपकी समझदारी की कमी है या फिर भड़ासियों की कमजोरी है जो आपको समझा न पाए। थोड़ा वक्त निकालिए और फिर पढ़िए गुनिए भड़ास को व भड़ासी दर्शन को।
ये तो होना ही था, आपकी पतनशील स्वीकारोक्तियां कहीं आपके खिलाफ न चली जाएं सो आपके फेस सेविंग करनी ही थी। आखिर आप भी लड़की हो और इसी समाज में आपको रहना है। बहस को गोलमोल और बौद्धिक बना देने की यह रणनीति कोई नई नहीं है। हमेशा ऐसा होता है कि जब कम पढ़े लिखे लोग फील्ड में जाकर चीजों को एक ठीक ठीक दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं तो कुछ बौद्धिक आकर उन्हें उसके हजार पेंच समझातें हैं और सारे आंदोलन को कनफ्यूज कर देते हैं। आपका कनफ्यूजन भले ही शाब्दिक आवरण में धारधार और साफ साफ लग रहा हो लेकिन आपसे कह दिया जाए कि आप स्त्री मुक्ति के लिए चार चरणों की वास्तविक स्ट्रेटजी डिफाइन करिये तो आपके पास या तो वक्त नहीं होगा या फिर आप फिर बौद्धिक प्रलाप करने लगेंगी। आपने जो सुविधायें हासिल कर ली हैं, उसे मेंटेन रखते हुए नारी मुक्ति की कल्पनाएं और कथाएं कहते रहिए, देखते हैं, उससे कितना भला होता है स्त्रियों का।
जिस दिन लड़कियों तक, स्त्रियों तक अपने लिए स्पेस पाने का संदेश पहुंच गया न तो उस दिन से आपके रोके नहीं रुकेगा उनका पतन। अभी जो पतन है सीमित मात्रा में। संदेस पहुंचने के बाद कुछ उसी तरह लड़कियां बुरी बनेंगी, पतित होंगी जिस तरह गांधी जी का संदेश पहुंचने के बाद भारत के जन जन में हुआ था। लोग अंग्रेजों के फौज पाटे से डरना भूल गए और खुलकर सामने आ गए....हां, हमें आजादी चाहिए।

आपने कहा---
आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है।

मेरा कहना है...
टापू तो आप बनाए हुए हैं, अपने तक सीमित। खुद के इर्द गिर्द बहस चलाने की रणनीति बनाकर। हम तो विस्तार अपार वाले लोग हैं। मान लो, अगर आप और हम टापू भी हैं तो इन टापूओं को क्रांति के प्रतीक टापू बनाने होंगे, इनके फैलाव बढ़ाने होंगे। इन्हें बाकी जगहों पर संदेस भेजने होंगे कि आओ, तुम भी इस जैसे टापूओं के निर्माण में जुट जाओ।
बिलकुल मुंह बिराना चाहिये इन टापूओं पर खड़े होकर। बिलकुल दिखाना चाहिए मुक्ति के पेड़ को। ताकि संदेश आम अवाम तक पहुंचे। वो इस मुक्ति को, इस सुख को, इस आजादी को जी सकने की कम से कम लालसा तो पैदा हो।
रही बात मेरी अकल पर तरस करने को तो फिर वही कहूंगा, आपका बौद्धिक दिवालियापन दरअसल आपकी आंख पर पट्टी बांधे हुए है जो आपक आपकी सोच से बाहर आने से रोके हुए है। आपके अंदर भी एक क्रांति की जरूरत है तभी यह अहन्मयता जाएगी और आप सहज व सरल हो पाएंगी। ऐसे दंभी व्यक्तित्व को अपने सिवाय सारी दुनिया मूरख और खराब दिखती है। हां में हां मिलाओ तो खुश, कुछ अलग से सोच कर कह दो तो आग लग गई। दरअसल ये दिक्कत आपकी नहीं, आप जिस ढांचे की हिंदी मीडिया व समाज से निकल कर आगे बढ़ी हैं, उसकी दी हुई ट्रेनिंग है। इससे मुक्त होना ही शिवत्व है, समझदारी हैं। तभी आप अपने समुदाय, लिंग की अगुवा और नेता बन पाएंगी। मैं ये दावे से कह सकता हूं कि दूसरों की अकल पर तरस खाने वाली मनीषा की किसी से नहीं पट सकती क्योंकि ये जो भयंकर वाला इगो है वो जानलेवा है। प्लीज, भड़ास के डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव से संपर्क कीजिए आप जिन्होंने ऐसे ढेरों मरीजों को सहज व सरल बनाया है।


आपने कहा---
लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

मेरा कहना है...
हमने कभी नहीं कहा कि भइया मनीषा आओ, भड़ासी बन जाओ। हमने हमेशा भड़ास से लड़कियों और महिलाओं की ज्यादा उपस्थिति पर ऐतराज जताया है। यकीन न हो तो भड़ास को पढ़ लेना। दरअसल स्त्री को देखकर पुरुष में लार टपकाने की जो आदत है ना, भड़ासी उससे मुक्त हैं। ये ग्रंथि उनमें जरूर हो सकती है जो आपकी हर अदा पर वाह वाह करते होंगे। हम तो जो सोचते समझते हैं, सच्चा, खरा, सोने की तरह उसे उगल देते हैं। ये आप पर है कि आप इस उगलन को कितना स्वीकार्य कर पाती हैं। भड़ास आपके बगैर मजे में हैं और हमारा कोरस बहुत बढ़िया अंदाज में जन जन तक पहुंच रहा है।

उम्मीद है, आपको सारे सवालों के जवाब मिल गए होंगे। कुछ बाकी हों तो बताइएगा।

जय भड़ास, जय चोखेरबालियां
यशवंत सिंह

इसलिए पतित होने दो ताकि वह अपने लिए स्पेस गढ़ सके

((आजकल भड़ास के अलावा मैं कुछ दूसरों ब्लागों पर टिप्पणियां कर रहा हूं और पोस्ट लिख रहा हूं। मनीषा पांडेय का ब्लाग है बेदखल की डायरी। इस ब्लाग पर मनीषा जो लिखती हैं, उसे मैं बड़े चाव के पढ़ता हूं। उनके लिखने का अंदाज बिलकुल भड़ासियों जैसा होता है। बिलकुल साफ साफ मन की बात, सोच, इरादे लिख देती हैं। तो मनीषा ने अपने इसी अंदाज, साहस या दुस्साहस के क्रम में एक पोस्ट चोखेरबाली पर लिख मारी...हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं। इस पोस्ट को काफी पढ़ा गया। उसके बाद उन्होंने लिखा..क्या पतनशीलता कोई मूल्य है? मैंने इसी पर टिप्पणी की है, जो इस तरह है....यशवंत))

यशवंत सिंह yashwant singh said...
सारी भाई मनीषा, गलत नाम लिखने के लिए। देखो, नाम तक याद नहीं है, बस लिखने की तुम्हारी स्टाइल व कंटेंट व याद है।

आपकी तारीफ करने के क्रम में मैं अपनी एक असहमति का जिक्र नहीं कर पाया था, वो अब कर रहा हूं।

आपका उपसंहार सैद्धांतिक तौर पर अच्छा है, लिखा अच्छे से है, पर व्यावहारिक नहीं है। पतित होने के लिए जिस बड़े विजन, बड़े फलक, बड़े संदर्भों की शर्त लगा दी है वो उचित नहीं है।

भइया, लड़की को मुक्त होने दो। उस ढेर सारी चीजें न समझाओ, न बुझाओ और न रटाओ। उसे बस क से कबूतर पढाओ। माने अपनी मर्जी से जीने की बात सिखाओ। आत्मनिर्भर होने को कहो। दिल की बात को सरेआम, खुलेआम रखने का साहस दो।

मनमर्जी करेगी तो जाहिर सी बात है कि गलत भी करेगी, सही भी करेगी। दिल की बात कहेगी तो अच्छी बात भी कहेगी, बुरी बात कहेगी। पर ये क्या कि स्त्री पतित हो लेकिन विचारधारा का चश्मा लेकर, नैतिकता का आवरण ओढ़कर, महिलावादी विजन लपेटकर.....।

इस लड़की को अभी सिर्फ इसलिए पतित होने दो कि वह इससे अपने लिए स्‍पेस पा सकती है, वह इससे चीप किस्‍म की ही सही, निजी आजादी पा सकती है।

समूची मानवता, उदात्तता, रचनात्मकता...ये सब तब होंगी जब वह अपने निजी स्पेस की जंग को जीत ले। रिएक्ट करने में सफल हो जाए। इतने महान लक्ष्य अभी से देंगी तो वैसे ही महानता के बोझ से दबी स्त्री फिर और महान हो जाएगी और पतित होने से रह जाएगी।

मैं तो कहूंगा इस पतनशीलता को किसी मूल्य से न जोड़ो। इसे मूल्यहीन पतनशीलता कहना पड़े तो खुल के कहो। चीजें क्रमिक तरीके से विकसित होती हैं। अभी रिएक्ट कर लेने दों, स्पेस ले लेने दो, चीप किस्म के सुख जी लेने दो....अपने आप इससे मन उबेगा और फिर अंदरखाने बड़े सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। लेकिन अगर पतन होने के लिए पहले ही ढेर सारे मूल्य वगैरह बना दिए तो फिर सब टांय टांय फिस्स.....

एक बढ़ियावाली बहस शुरू करने के लिए आपको बधाई।
जय भड़ास
यशवंत
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