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8.3.08

साहिबान, मेहरबान, कद्रदान...भड़ासी हो गए हैं नशेबाज, कंपनी की तरफ मुफ्त में होगा इलाज!!!

नशा तो नशा होता है (ब्लागिंग को छोड़कर:), वो चाहें बीड़ी सिगरेट का हो या चिलम या खैनी या दारू की। इससे त्रस्त लोगों के दिल से पूछो। छोड़ने के लिए जाने कितने जतन किए लेकिन सब बेकार। खासकर भड़ासियों में तो नशाखोरी की लत बढ़ती ही जा रही है, ये मैं अपनी तीसरी आंख से देख कर बता रहा हूं। सो इन नशेबाज भड़ासियों का इलाज करने को दूसरा लौह पुरुष भड़ासी डा. रूपेश श्रीवास्तव ने कमर कस लिया है। पिछली बार तो भड़ासी नशेबाजों को डाक्टर साहब ने अपना ही मूत्र पीने की नेक सलाह दे दी थी लेकिन मैं कभी हिम्मत नहीं कर पाया। उसके अलावा भी उन्होंने ढेर सारे उपाय बताए थे जिसे आप भड़ास की पिछली पोस्टों में या फिर डाक्टर साहब के ब्लाग आयुषवेद पर जाकर पढ़ सकते हैं। इस बार डाक्टर साहब ने फूल पत्ती घास फूस के पिटारे से निकाला है एक अद्भुत रामबाण। डाक्टर रूपेश का दावा है कि इस रामबाण औषधि से बनी चाय को पंद्रह दिन पी लीजिए, फिर देखिए, नशे के बारे में सोचते हुए आपको उबकाई आने लगेगी....(हे भगवान, ये दिन कभी न दिखाएं, मरने के बाद ही ऐसा मौका आए)।

तो साहिबान, मेहरबान, कद्रदान....बस चलने वाली है, दो मिनट का टेम है, इस बीच मैं आप लोगों को कंपनी की तरफ से विशेष छूट पर ये दवा दिखा रहा हूं। पिछले पंद्रह साल से इस बस अड्डे पर मैं यह दवा बेच रहा हूं और जिन भाइयों की दवा खत्म हो जाती है वो हर बार यहीं से आकर ले जाते हैं। आप भी एक बार आजमाएं। जिस तरह पुराने लोगों ने एक बार आजमाया था और उसके बाद वे लोग इस दवा के आदी हो गए, उसी तरह आप भी दवा के आदी हो जाएंगे।

तो साथियों, मेहरबान, बंदर छाप दंतमंजन ले जाएं। दांत में लगाएं और दांतों से मुक्ति पाएं। न रहेंगे दांत और न जरूरत पड़ेगी किसी मंजन की।

भाइयों मेहरबान, दो मिनट का वक्त है तो मैं डाक्टर रूपेश जी की नशा छोड़नी वाली शर्तिया दवा के बारे में बताना चाहूंगा। कंपनी की तरफ से विशेष छूट में या यों कहिए लगभग मुफ्त में ये दवा आपको दी जा रही है। अगर इस दवा को 15 दिन तक आजमाने के बाद भी आप नशा नहीं छोड़ पाते हैं तो फिर आप अपने लौंडों से बोल दीजिए कि वो आपकी कब्र खोदकर अभी से तैयार रखें। तो चलिए, सज्जनों देवियों......दवा के बारे में बतियाते हैं....


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कई नशों से छुटकारे के लिए एक ही रामबाण औषधि

डा. रूपेश श्रीवास्तव

वे लोग जो अन्जाने में ही किन्हीं व्यसनों से ग्रस्त हो गए हैं उनके लिए अपने वर्षों के श्रम ,शोध एवं अनुभव के आधार पर एक रामबाण तरीका बता रहा हूं । मुझे पूर्ण विश्वास है कि इसे आप धन कमाने के स्थान पर लोकहित में ही प्रयोग करेंगे । इसका उपयोग किसी एक विशेष नशे की आदत से छुटकारा पाने के लिए नहीं बल्कि कई तरह के नशों की आदत से छुटकारे के लिए मैंने प्रयोग कराया है और सफलता पाई है । इससे आप यदि इन नशीले पदार्थों के आदी हैं तो फिर देर किस बात की है बस अपने गुरू या इष्ट का स्मरण करके एक बार मन में यह विचार तो लाइए कि आपको उक्त नशा छोड़ना है फिर शेष काम तो यह चमत्कारी औषधि करेगी और कुछ ही दिनों में आप पाएंगे कि जादू हो रहा है कि जिस पदार्थ की आपको जानलेवा तलब होती थी वह पता नहीं कहां विलीन हो गई है । मैंने जिन पदार्थों पर इस श्रेष्ठ औषधि का प्रयोग किया है वे हैं : -
बीड़ी
सिगरेट
चिलम
चबाने वाली तम्बाकू
चाय
काफ़ी
अफ़ीम
अगर मौका लगेगा तो इसे नींद की गोलियां खाने वाले मरीजों के लिए भी अनुभव करूंगा ताकि उनकी इस नामुराद दवा (या जहर) से पीछा छूट जाए ।
पारस पीपल (यह एक बड़ा पेड़ होता है इसके पत्ते अचानक देखने में प्रसिद्ध पेड़ पीपल के पत्तों की तरह होते है तथा भिंडी के फूलों की तरह पीले फूल आते हैं तथा कुछ दिनों में ये फूल गाढ़े गुलाबी होकर मुर्झा जाते हैं ,इस पेड़ को मराठी में "भेंडी " ही कहा जाता है ) के पुराने पेड़ की छाल जो स्वतः ही पेड़ से अलग हो जाती है ,उसको लेकर खूब बारीक पीस कर मैदे की तरह बना लें व शीशी में भर लें । यह बारीक चूर्ण बारह ग्राम लेकर २५० मि.ली. पानी में हलकी आंच पर जैसे चाय बनाते हैं वैसे ही पकाएं और १०० मि.ली. पक कर रह जाने पर छान कर चाय की तरह ही हलका गर्म सा पी लीजिए । सुबह शाम नियमित रूप से पंद्रह दिनों तक सेवन कराने से मैंने पाया है कि मादक द्रव्यों की आदत छूट जाती है तथा नफ़रत सी होने लगती है । एकबार व्यसन छूट जाए तो पुनः इन दुर्व्यसनों को प्रयोग नहीं करना चाहिए फिर व्यसन से मुक्त होने के बाद मैं आदी व्यक्ति को दो माह तक बैद्यनाथ कंपनी का "दिमाग दोष हरी" नामक दवा का सेवन कराता हूं । अगर आपके क्षेत्र में पारस पीपल नहीं पाया जाता है तो किसी महाराष्ट्र में रहने वाले मित्र से मंगवाने में देर न करिए और लाभान्वित होइए । ईश्वर को धन्यवाद दीजिये कि उसने साधारण सी दिखने वाली चीज़ों में कैसे दिव्य गुण भर रखे हैं
(डा. रूपेश के आयुर्वेदिक दवाखाने पर पहुंचने के लिए आगे खड़ी सवारी पर माउस कोंच दें, वो खुद ब खुद आपको उड़ा के ले जाएगा.....रथ तैयार है, दवाखाने तक ले जाने के लिए)

जय भड़ास
प्रस्तुतकर्ताः यशवंत सिंह

21.2.08

मनीषा जी, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...उर्फ रसमलाई बनाम दिवालियापन

मनीषा पांडेय ने अपनी पोस्ट में मेरी बातों, विचारों, इरादों को जिस तरह कनसीव किया है, और जो कलम तोड़ कर लिखा है, उसका एक एक कर जवाब देना चाहूंगा....यशवंत
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आपने कहा---
हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा।

मेरा कहना है...
दरअसल मठाधीशों का हमेशा इरादा रहता है कि बहसें उनके मुताबिक, हिसाब से चलें और उनके तरीके को ही लोग स्वीकार कर वाह वाह, शानदार, वेरी गुड कहें...जैसा कि हो रहा है....। बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.....। अगर बात निकली है तो उसके हर लेयर, पर पेंच, हर एंगिल को समझा बूझा जाएगा और लोग उसे अपने अपने तरीके से बूझेंगे। इसे रोकने की मंशा रखना, नियंत्रित करने के बारे में सोचना, इससे खफा होने एक व्यक्तिवादी और आत्मकेंद्रित सोच का परिचायक है।


आपने कहा---
पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ

मेरा कहना है...
सच्ची बात तो यही है जो मैंने कहा था, आप भड़ास निकाल रही हैं। इस भड़ास के मायने कतई भड़ास ब्लाग या भड़ास बैंड नहीं बल्कि दिल की बात कह देना है, जो आप शिद्दत से महसूस करती हैं। इस देश में जिस तरह से 99 फीसदी लोग बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बघार कर फिर अपने रोजी रोटी और कमाने खाने में जुट जाते हैं, अपने धंधे को बेहतर करने में लग जाते हैं और समाज को व अवाम को अपने हाल पर छोड़ देती हैं, अगर वही करने का इरादा है तो कोई बात नहीं। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो अपने ब्लाग पर क्रांति की अलख जगाए हुए हैं और उसके बाद बेहद निजी किस्म के शीशे के घरों में बेटा बिटिया माई बाप बियाह खाना पैसा धंधा सुख दुख....आदि किस्म की निजी चीजों को प्राथमिकता में रखे हुए हैं। वहां से बाहर निकलते ही फिर सिद्धांत बघारने लगते हैं। आप वैसा हैं या नहीं, आप जानें लेकिन यह जरूर है आप अच्छा खासा भोंपू बजा लेती हैं, रीमिक्स वाला।


आपने कहा---
यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं।
मेरा कहना है...
इसका जवाब उपर दे दिया है। लड़कियां भड़ास नहीं निकालेंगी तो देवी व दुर्गा बनी रहेंगी। आप भी बनी रहिए। आपको अच्छा अच्छा गुडी गुडी कहने वाले ढेर सारे लोग हैं। भगवान ने बुद्धि और कलम दे दी है, चाहे जिसकी बखिया उघेड़िये। आप लिखते रहिए अंतरराष्ट्रीय महिला विशेषज्ञों के नाम लेकर उद्धरण देते हुए महान नारीवादी आंदोलनों के दर्शन और आंसू बहाते रहिए महिलाओं की दशा-दिशा पर। लेकिन जो कुछ झेला है, बूझा है, महसूसा है...उसे कहने का साहस नहीं होगा, भड़ास निकालने की ताकत नहीं होगी तो ढेर सारे आडंबरियों से बाहर आप भी नहीं होंगी।

आपने कहा---
यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत।

मेरा कहना है...
चलिए माना न आपने कि आप के चलते लड़कियां जो आज बेहतर हालत में हैं, नहीं हैं बल्कि इसके पीछे बाजार है। और यही बाजार लड़कियों को और पतित करेगा, और अच्छी हालत में ले जायेगा। और तरक्की करने देगा। आप लोग खामखा गाल बजाती रहेंगी, शरीफ, नेक और ईमानदार बनने के लिए।


आपने कहा---
कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मेरा कहना है...
जी, हम जानते हैं भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम। आज हम हिंदीवाले जो अंग्रेजी के दबाव में, हिंदी मीडिया की सामंती गठन, ऐंठन के दबाव में जिस विकृति को जी रहे थे, उसे निकाल कर, उसे उगल कर सहज महसूस करते हैं। भड़ास कोई बैंय या भोंपू नहीं मेडिकल साइंस की एक विधा है जिसे डा. रूपेश और मुनव्वर सुल्ताना बेहतर जानते हैं। कभी अपनी नौकरी, अपने ब्लाग और अपनी दुनिया से बाहर वक्त मिले तो भड़ास को कायदे से पढ़िए और समझिए। लेकिन जो लोग अपने को काबिल और झंडाबरदार मान चुके हैं दरअसल उन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आता। और आपने जो बात कही है कि पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई ....तो मैं ये कह सकता हूं कि आपके इस बौद्धिक दिवालियेपन के लिए भगवान आपको माफ करे। आप को खुद नहीं पता आप क्या लिख रही हैं, क्या कह रही हैं।

आपने कहा---
मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं।
मेरा कहना है...
केवल कहते रहिए। सिद्धांत दर्शन गढ़ते रहिए। अगर इसी सबसे क्रांति या उत्थान या तरक्की संभव थी तो अब तक रोज तरक्की व क्रांति होती।

आपने कहा---
सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती।

मेरा कहना है...
ऐसी ही लड़कियां गढेंगी लड़कियों के लिए एक अलग सा भड़ासी बैंड। आप देखते रहिएगा। भड़ासी बैंड गढ़ने के लिए साहस चाहिए, समाज के खिलाफ जाने कि हिम्मत चाहिए, आलोचनाओं को झेलने का बूता चाहिए। मास्टर की तरह गूढ़ बातें करने कहने से वो रामरतन की बिटिया कुछ नहीं समझेगी, शून्य में टुकुर टुकुर ताकती रहेगी। उसे साफ साफ समझाने वाली जरूर आएगी। लेकिन ये आप जैसियों से संभव नहीं है।

आपने कहा---
यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

मेरा कहना है...
भइया हम बुरे लोग हैं, मैंने पहले ही कहा था, फिर कह रहा हूं। और आप जैसों को ये लगता है कि हमारे सुझवा रसातल में ले जाएंगे तो ये शायद आपकी समझदारी की कमी है या फिर भड़ासियों की कमजोरी है जो आपको समझा न पाए। थोड़ा वक्त निकालिए और फिर पढ़िए गुनिए भड़ास को व भड़ासी दर्शन को।
ये तो होना ही था, आपकी पतनशील स्वीकारोक्तियां कहीं आपके खिलाफ न चली जाएं सो आपके फेस सेविंग करनी ही थी। आखिर आप भी लड़की हो और इसी समाज में आपको रहना है। बहस को गोलमोल और बौद्धिक बना देने की यह रणनीति कोई नई नहीं है। हमेशा ऐसा होता है कि जब कम पढ़े लिखे लोग फील्ड में जाकर चीजों को एक ठीक ठीक दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं तो कुछ बौद्धिक आकर उन्हें उसके हजार पेंच समझातें हैं और सारे आंदोलन को कनफ्यूज कर देते हैं। आपका कनफ्यूजन भले ही शाब्दिक आवरण में धारधार और साफ साफ लग रहा हो लेकिन आपसे कह दिया जाए कि आप स्त्री मुक्ति के लिए चार चरणों की वास्तविक स्ट्रेटजी डिफाइन करिये तो आपके पास या तो वक्त नहीं होगा या फिर आप फिर बौद्धिक प्रलाप करने लगेंगी। आपने जो सुविधायें हासिल कर ली हैं, उसे मेंटेन रखते हुए नारी मुक्ति की कल्पनाएं और कथाएं कहते रहिए, देखते हैं, उससे कितना भला होता है स्त्रियों का।
जिस दिन लड़कियों तक, स्त्रियों तक अपने लिए स्पेस पाने का संदेश पहुंच गया न तो उस दिन से आपके रोके नहीं रुकेगा उनका पतन। अभी जो पतन है सीमित मात्रा में। संदेस पहुंचने के बाद कुछ उसी तरह लड़कियां बुरी बनेंगी, पतित होंगी जिस तरह गांधी जी का संदेश पहुंचने के बाद भारत के जन जन में हुआ था। लोग अंग्रेजों के फौज पाटे से डरना भूल गए और खुलकर सामने आ गए....हां, हमें आजादी चाहिए।

आपने कहा---
आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है।

मेरा कहना है...
टापू तो आप बनाए हुए हैं, अपने तक सीमित। खुद के इर्द गिर्द बहस चलाने की रणनीति बनाकर। हम तो विस्तार अपार वाले लोग हैं। मान लो, अगर आप और हम टापू भी हैं तो इन टापूओं को क्रांति के प्रतीक टापू बनाने होंगे, इनके फैलाव बढ़ाने होंगे। इन्हें बाकी जगहों पर संदेस भेजने होंगे कि आओ, तुम भी इस जैसे टापूओं के निर्माण में जुट जाओ।
बिलकुल मुंह बिराना चाहिये इन टापूओं पर खड़े होकर। बिलकुल दिखाना चाहिए मुक्ति के पेड़ को। ताकि संदेश आम अवाम तक पहुंचे। वो इस मुक्ति को, इस सुख को, इस आजादी को जी सकने की कम से कम लालसा तो पैदा हो।
रही बात मेरी अकल पर तरस करने को तो फिर वही कहूंगा, आपका बौद्धिक दिवालियापन दरअसल आपकी आंख पर पट्टी बांधे हुए है जो आपक आपकी सोच से बाहर आने से रोके हुए है। आपके अंदर भी एक क्रांति की जरूरत है तभी यह अहन्मयता जाएगी और आप सहज व सरल हो पाएंगी। ऐसे दंभी व्यक्तित्व को अपने सिवाय सारी दुनिया मूरख और खराब दिखती है। हां में हां मिलाओ तो खुश, कुछ अलग से सोच कर कह दो तो आग लग गई। दरअसल ये दिक्कत आपकी नहीं, आप जिस ढांचे की हिंदी मीडिया व समाज से निकल कर आगे बढ़ी हैं, उसकी दी हुई ट्रेनिंग है। इससे मुक्त होना ही शिवत्व है, समझदारी हैं। तभी आप अपने समुदाय, लिंग की अगुवा और नेता बन पाएंगी। मैं ये दावे से कह सकता हूं कि दूसरों की अकल पर तरस खाने वाली मनीषा की किसी से नहीं पट सकती क्योंकि ये जो भयंकर वाला इगो है वो जानलेवा है। प्लीज, भड़ास के डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव से संपर्क कीजिए आप जिन्होंने ऐसे ढेरों मरीजों को सहज व सरल बनाया है।


आपने कहा---
लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

मेरा कहना है...
हमने कभी नहीं कहा कि भइया मनीषा आओ, भड़ासी बन जाओ। हमने हमेशा भड़ास से लड़कियों और महिलाओं की ज्यादा उपस्थिति पर ऐतराज जताया है। यकीन न हो तो भड़ास को पढ़ लेना। दरअसल स्त्री को देखकर पुरुष में लार टपकाने की जो आदत है ना, भड़ासी उससे मुक्त हैं। ये ग्रंथि उनमें जरूर हो सकती है जो आपकी हर अदा पर वाह वाह करते होंगे। हम तो जो सोचते समझते हैं, सच्चा, खरा, सोने की तरह उसे उगल देते हैं। ये आप पर है कि आप इस उगलन को कितना स्वीकार्य कर पाती हैं। भड़ास आपके बगैर मजे में हैं और हमारा कोरस बहुत बढ़िया अंदाज में जन जन तक पहुंच रहा है।

उम्मीद है, आपको सारे सवालों के जवाब मिल गए होंगे। कुछ बाकी हों तो बताइएगा।

जय भड़ास, जय चोखेरबालियां
यशवंत सिंह

18.1.08

ए गणपत, चल दारू ला ....उर्फ नशे से मुक्ति

फिल्मवाले भाई भी कैसा कैसा गाना बनाते हैं। अब इसी को लीजिये। ए गणपत,चल दारू ला, कुछ सोडा वोडा दे न यार....। साला, गाना ऐसा की सुनकर ही पीने को मन कर जाय। और पी लें तो सुबह उठन को जी न करे। शाम को पी लेने से सुबह को मन में होने वाला ढेर सारा खांची भर पछतावा अलग से, क्यों पी लिया, क्यों डिग गया, क्यों निभा नहीं पा रहा, शरीर की बिलकुल चिंता नहीं, ज़िंदगी को डुबो दी है शराब में, घर परिवार की चिंता नहीं, करियर से खिलवाड़ कर रहे हो, कब सुधरोगे, रोज तो सोचते हो लेकिन शाम को अनिर्णय की स्थिति भी मयखाने पर पहुंचा कर निर्णय करा देती है...आदि आदि जैसे आंतरिक पछतावे।

सोचता हूं, ये जो मन में होने वाली ग्लानि और अंदर ही अंदर होने वाला पछतावा है, यही हमारी ताकत है। अगर ये नहीं है तो समझिए मर गए हैं। फिर तो हर चीज यांत्रिक तरीके से कर और जी रहे हैं। हर चीज पर ढेर सारी बातें सवाल व संवेदना पैदा होती है, सकारात्मक-नकारात्मक मंथन चलता रहता है, यही तो जान है। यही तो पहचान है। यही तो ताकत है।

खैर, ये सब लिखते हुए मैं सुकून महसूस कर रहा हूं क्योंकि दरअसल आज ए गणपत, चल दारू ला सुनकर भी मयखाने के पास जाकर नहीं रुका। सीधे घर आया। मटर और चूड़ा को भूनकर नाश्ता बनाया। फिर कई तरह की सब्जियां काटकर मिक्सवेज बनाया। बच्चों के साथ बातें की, होमवर्क कराया, फिर जब वो मोहल्ले में एक बच्चे के यहां बर्थडे में पार्टिशिपेट करने गये तो मैं लैपटपियाने लगा।

मजेदार तो यह कि हर नशे से बड़े नशा अब भड़ास का बन चुका है। इस नशे में जादू सा है। लगता है जैसे एक बड़ा सा अपना परिवार है जिसमें हर वक्त हलचल सी रहती है और इस हलचल को हर पल जानने की इच्छा रहती है। लेकिन भड़ास से उबरने की सायास कोशिश भी करने लगा हूं। कहीं ऐसा न हो कि दारू का नशा छूटा है तो एक नया नशा भड़ास का पकड़ लिया जाये। जीवन में हर नशे को जीना और उससे उबरकर आगे बढ़ना ही मजा है। वरना अगर किसी में डूब गये, किसी के लती बन गये तो फिर तो पक्के नशेड़ी बन गए और समझो छुट्टी हो गई। टाइप्ड नहीं होना चाहिए। जीवन में, करियर में, अनुभवों, संगत में, सोच में, संगीत में, प्रयोग में, खाने में, पीने में....किसी में भी।

चलिये, बाद में कुछ और भड़ास निकालेंगे, लेकिन आप भी तो कुछ बोलिए, लिखिए। या सिर्फ पाठक, दर्शक बने रहने का इरादा है। इस दौर में जब तकनालजी और नेट का हथियार आपके हाथ में, तो दर्शक की बजाय सर्जक बनिए और निकालिये भड़ास।

जय भड़ास
यशवंत