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25.2.08

खराब दिन: चोखेरबालियों ने धक्के देकर भगा दिया, पिल्ले के कारण पत्नी ने गरिया दिया

आज जब आनलाइन हुआ और ब्लाग ओपेन किया तो देखा कि डैशबोर्ड में मेरे दो ब्लागों में से सिर्फ एक ही बचा है, और वो है भड़ास। अभी हाल में ही जिस चोखेरबाली ब्लाग का हिस्सा बना था, वो डैशबोर्ड पर गायब था। माने, चोखेरबाली की चीफ माडरेटर ने मुझे बिना बताये, सूचित किये, बिना सो काज जारी किए, मुझ गरीब को धक्के (इसी को तो धक्के देकर निकालना कहा जाता है ना!!!) मारकर ब्लाग से बहरिया दिया। मजेदार तो ये देखिए कि आज मेरा दिन सुबह से खराब चल रहा है। हर जगह कुछ ऐसा हो रहा है कि मन और दिल छोटा हुआ जा रहा है। इसी सब चक्कर के कारण आज आफिस भी सेकेंड हाफ में लंच के बाद पहुंचा और ब्लाग ज्यों खोला तो देखा कि चोखेरबालियों ने मेरे साथ छल कर दिया है। मेरे जैसे सीधे साधे दिलवाले बंदे को जाने किस दुश्मन के कान भरने के कारण अपने साये से जुदा कर दिया। अब तो सिर्फ वियोग, जुदाई और आह है जुबां पर। इसी वक्त में गीता का वो वचन याद आता है....वत्स, जो हुआ, वो अच्छे के लिए हुआ, जो हो रहा है, अच्छे के लिए हो रहा है, जो होगा, अच्छे के लिए होगा। धन्य हो अपना हिंदू धर्म जो हर हाल में जीने के लिए तर्क मुहैया करा देता है वरना लाखों करोड़ों भारतवासी मारे डिप्रेशन के रोज रोज आत्महत्या कर रहे होते।

आज जो दिन खराब चल रहा है उसके पीछे वजह सिर्फ और सिर्फ स्त्रियां हैं।

सुबह से मेरी पत्नी मेरा भेजा खा रही हैं, पानी पी पी कर गरियाते हुए। हुआ यूं कि कल आधी रात को जब पान खाने चौराहे पर निकला तो एक मरिया सा बच्चा सा देसी पिल्ली कुनकुनाता हुआ मेरे पैरों के पास आ पहुंचा और लगा मेरा पैंट फाड़ने, अपने प्यारे से छोटे से नुकीले दांतों से। फिर लगा पैर की अंगुलियां सूंघने, चूमने। उसके बदन की हड्डियां दिख रही थीं। मैंने उसे गौर से देखा और उसकी हरकत पर मुझे प्यार आ गया। मैंने उसे गोद में उठा लिया और मुंह में पान दबाने के बाद अपने घर पहुंचा। सकल परिवार निद्रा में था, सो उसे एक खाली कमरे में, जहां अतिथि लोगों के रुकने की व्यवस्था है, एक जगह प्यार से बिठा दिया। उसे मुर्गे की टंगड़ी दी जिसे एक बार मैं खुद साफ करके डस्टबीन में रखे हुए था। वो प्यारा पिल्ला यूं पूंछ हिलाते हुए कूं कूं करके खा रहा था कि मेरा रोम रोम पुलकित हो गया। मैंने मन ही मन तय कर लिया कि मुझे अब इस पिल्ले को एक अच्छी जिंदगी प्रदान करनी है।

मैंने अपने एक सीनियर मित्र को फोन किया चंडीगढ़, जिनके छोटे भाई पशुओं के डाक्टर हैं, डाक्टर साहब का नंबर लेने के लिए कि अगर सड़क पर खेला खाया देसी पिल्ला घर ले आया हूं तो उसे कौन कौन सी सुई लगवा दूं ताकि मेरे जैसे शहरी को कोई रोग न हो सके। असल में मेरे अंदर का हेल्थ वाला जिन्न जाग गया था कि कहीं ऐसा न हो जाए, साला जिसे मैं प्यार कर रहा हूं वो पिल्ली मुझे कोई गंभीर रोग दे जाये, दिमागी बुखार, मियादी बुखार, प्लेग टाइप का। सो, मैंने उनसे नंबर लिया पर डाक्टर साहब का फोन लगातार बिजी जा रहा था। खैर, पिल्ले को खिला पिलाकर बढ़िया से एक स्टूल के नीचे बिछौन बिछाकर सुला दिया और मैं भी खुशी खुशी दूसरे कमरे में सो गया। सुबह मेरी नींद तब खुली जब श्रीमती जी चिल्ला रहीं थीं, कि ये आदमी तो सुधरेगा नहीं। रोज कोई न कोई बवाल। पता नहीं कहां से यह सड़ा पिल्ला लाकर रख दिया घर में, पूरा हग मूत के गंदा कर दिया। बाप रे....रात का नशा वैसे ही सुबह होने के कारण हिरन हो चुका था, रही सही ऊर्जा श्रीमती जी की चिल्लाहट के चलते खत्म हो गई। सो, सुबह के वक्त इतनी बुरी बुरी बातें कान तक न पहुंचने देने के लिए मैंने रजाई को चारों तरफ से खींचकर भींचकर उसके भीतर मुंह छिपा लिया। और गंभीर नींद में होने, सोने का नाटक करने लगा।

पर....बच न पया।

खुद मुझे उस कमरे की सफाई करनी पड़ी ताकि मणिमाला दीदी (श्रीमती जी का नाम है भइया) का गुस्सा कम हो सके। सच्ची बताऊं, जब मैं पिल्ले का गुह साफ कर रहा था तो उसकी बदबू से मुझे उबकाई आते आते रह गई, लगा आज असली में उलटी कर दूंगा (भड़ास पर तो शाब्दिक उलटी करते हैं)। पर जय भगवान जी, सांस रोकककर, करेजा मजबूत कर साफ सूफ किया। इस दरम्यान मैं यह तक पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि मेरा प्यारा पिल्ला है कहां। मुझे खुद समय़ में आ चुका था कि प्यारे पिल्ले के मुझ जैसे मालिक की इस कदर घिग्घी बंधी हुई है तो पिल्ला महोदय को जाने कब गांड़ पर दो लात मारकर सड़क का रास्ता दिखा दिया गया होगा।

सबसे दुखद यह रहा कि सोचकर पिल्ला यह लाया था कि बच्चे खुश होंगे। पर बच्चे सुबह से ही मेरे खिलाफ हो चुके थे और माला दीदी के सुर में सुर मिला रहे थे। उस साले पिल्ले ने बच्चों की किताबों पर सू सू कर दी थी सो बच्चों का नाराज होना लाजिमी था।

भइया....किसी तरह जान छुड़ाकर आफिस पहुंचा तो यहां चोखेरबाली को अपने से गायब पाया। हे भगवान, कहीं किसी ने तंत्र मंत्र तो नहीं कर दिया कि इस फागुन में तुझे स्त्रियों का बैर झेलना होगा। अगर कोई भड़ासी ज्योतिषी या तांत्रिक हो तो कृपया मेरी कुंडली वुंडली देखकर बताये कि कौन सा ग्रह किस ग्रह की गांड़ में घुसा है जिससे ये सारी दिक्कतें आ रही हैं।

जय भड़ास
यशवंत

23.2.08

वो पतिता फिर भाग गई.....!!! पार्ट-2

मेरठ की वो लड़की। बेहद सुंदर। जीभर के जिसे देख ले, उसे प्यार हो जाये। परिवार की सबसे बड़ी लड़की। हायर मिडिल क्लास की लड़की। शहरी परिवेश के परिवार की लड़की। स्मार्ट और अक्लमंद लड़की।

स्कूल आते जाते एक नौजवान से उसे प्यार हो गया। नौजवान भी कोई खास नहीं। टपोरी टाइप। वो भी यंग स्मार्ट और फौलादी बदन वाला। दिन के वक्त का ज्यादातर हिस्सा सड़क पर बाल संवारते, बाइक भगाते बिताता था। वह अपने कौशल और स्किल से उस लड़की पर डोले डालने लगा। लड़की को अच्छा लगता था। कभी गुस्साने का दिखावा करती तो कभी मुस्करा कर आगे बढ़ जाती। बकौल कवि हरिप्रकाश उपाध्याय की कविता के शब्दों में कहें तो सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने प्रेम करने के जो तरीके सिखाये, इन दोनों नौजवान दिलों ने उनसे सबक लेकर प्रेम करना सीख लिया।

और एक दिन.............!!!!

लड़की उस लड़के संग भाग गई।

मचा हल्ला। कोहराम। जितने मुंह उतनी बातें। प्रेम में दुनियादारी घुस गई। पकड़ो, मारो, हिंदु, मुस्लिम, आईएसआई, धर्म परिवर्तन, शादीशुदा....। मतलब आप लोग समझ गए होंगे। लड़का मुसलमान था। शादीशुदा था। आईएसआई का एजेंट था। ये मैं नहीं कह रहा हूं, लड़की के परिजनों ने जिन हिंदुवादी नेताओं को पकड़ा उन लोगों ने सड़क पर उतरकर ये सारी बातें माइक से कहीं।

और एक दिन लड़की पकड़ ली गई।

ज्यादा दूर नहीं भागे थे वो। यहीं गाजियाबाद में एक फ्लैट लेकर रह रहे थे। लड़की को मां की याद आई, फोन किया। परिजनों ने उसे पुचकारा। सब कुछ स्वीकारने और बढ़िया से शादी करने का लालच दिया। लड़के फंस गई, उसने अपना एड्रेस बता दिया। घर वाले हिंदुवादी नेताओं और पुलिस के साथ आए और लड़की को उठा ले गए। लड़के को खूब मारा पीटा और उसे छोड़ दिया।

मेरठ में यह मुद्दा सिर्फ प्रेम विवाह और भागने के कारण नहीं बल्कि हिंदू बनाम मुस्लिम के मुद्दे के कारण खूब चर्चित हुआ। हिंदू व मुस्लिम नेताओं के मैदान में आ जाने से मामला ला एंड आर्डर तक जाता दिखा।

दैनिक जागरण के सिटी चीफ के बतौर मैंने खुद उस लड़की से बात करने की ठानी और उसके दिल की राय प्रकाशित करने का निर्णय लिया। एक संपर्क द्वारा उस लड़की के घर पहुंचे जहां वह लगभग कैद में रखी गई थी। मैंने सबसे विनती की कि मुझे अकेले में बात करने दिया जाए। और उस लड़की से बातें करने के बाद मेरा माथा भन्ना गया। सिर्फ वह बेहद खूबसूरत ही नहीं थी बल्कि बेहद बौद्धिक और समझदार भी थी। उसने जो बातें कहीं उसे मैंने एज इट इज छाप दिया।

उसके जो कहा, उसका लब्बोलुवाब ये था...

मुझे पहले से पता था कि वो शादीशुदा है लेकिन अब वो तलाक दे चुका है। जो आदमी तलाकनामा मुझे दिखा चुका है और उसे मेरे ही साथ रहना है तो फिर क्या दिक्कत है।

वो बेहद शरीफ लड़का है। उसे लोग फर्जी तौर पर आईएसआई का एजेंट बता रहे हैं। मैं उसके साथ रहना चाहती हूं क्योंकि वो मुझे अच्छा लगता है। मुझे नहीं चाहिए ये सुख। मैं उसके साथ गरीबी में जी लूंगी।

ये देखिए तस्वीरें, जो छिपाकर ले आई हूं। हम लोगों ने बाकायदा निकाह किया है और निकाह मैंने अपनी मर्जी से किया है।

ये देखिए तस्वीरें जिसमें उनके घर के सारे लोग हैं और कितने प्यार से मुझे घर में ले जाया गया। रखा गया। पार्टी हुई। वहां के जो छोटे बच्चे हैं वो मुझे इतने प्यारे लगते हैं, कि मैं उन्हें याद करके रोती हूं। हम लोगों को उनका घर छोड़कर इसलिए गाजियाबाद जाना पड़ा क्योंकि पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार कर लेती।

मैं तो मां की ममता में पकड़ ली गई। इन्होंने (मां ने) मेरे साथ धोखा किया है। ये समझा रही हैं कि मुस्लिम से शादी करने से नाक कट गई। मैं कहती हूं कि क्या सुनील दत्त ने नरगिस से शादी करके अपने खानदान की नाक कटा ली। मुझे समझ में नहीं आता, इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद लोग इतनी घटिया बातों को क्यों जीते रहते हैं।


-----उस कम उम्र की लड़की (मेरे खयाल से ग्रेजुएशन सेकेंड इयर में थी वो) के इतने मेच्योर व शानदार विजन को देखकर मैं दंग रह गया। उसने मेरी राय इस बारे में जानने की कोशिश की तो मैंने कहा कि तुमने सौ फीसदी ठीक किया है। अगर तुम उसके साथ खुश हो और तुम्हें उस पर भरोसा है तो बाकी किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।

मैंने उसकी कही हुई सारी बातें उसकी तीन तस्वीरों के साथ दैनिक जागरण पहले पन्ने पर बाटम में प्रकाशित किया। और मामला फिर गरम हो गया।

पूरे मेरठ में एक बात का जमकर प्रचार किया जाता है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को सायास तरीके से फंसाते हैं और शादी कर लेते हैं। ऐसे वो अपने मजहब के विस्तार व हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मकसद से करते हैं। पर मैं ये बात नहीं मानता। पहली बात तो हम ये क्यों मान लेते हैं कि हिंदू लड़कियां गाय बकरी हैं जिनके पास कोई दिमाग नहीं है और वो जो फैसला ले रही हैं उसमें उनका दिमाग नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कों का हिप्पोनेटिज्म काम आता है। अरे भाई, लड़कियां दिमाग रखती हैं। उन्हें अपने फैसले लेने दो। ये तो तुम्हारे अपने धर्म और संस्कार की दिक्कत है ना कि वो लड़कियां तुम्हारे वर्षों के रटाये जिलाये संस्कारों को प्रेम के धागे के चलते झटके में तोड़ डालती हैं। इसका मतलब तु्म्हारे संस्कारों व सिखाये विचारों में दम नहीं है, तुम्हारी ट्रेनिंग में कमजोरी है।

खैर, बहस भटक रही है। वापस लौटता हूं मुद्दे पर।

इंटरव्यू छपने के बाद उस लड़की पर पहरा और बढ़ा दिया गया और किसी भी मीडिया से मिलने पर एकदम से पाबंदी लगा दी गई क्योंकि उसके खुले विचारों को मैंने हू ब हू जागरण में प्रकाशित कर दिया था। कहां उसकी मां ये मानकर चल रही थीं कि उनके पक्ष में सब छपेगा, और कहां इंटरव्यू ने लड़की के पक्ष को मजबूत कर दिया।

वो लड़की हिंदूवादियो और परिजनों के लिए विलेन बन चुकी थी। उधर लड़के ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि मेरी पत्नी को जबरन ले गये हैं वो लोग। खैर, लड़की को रोज दर्जन भर लोग समझाने पहुंचने लगे उसके घर। शुरू में तो वो चीखती चिल्लाती उनसे बहस करती रही, जबान लड़ाती रही। लेकिन समझानों वालों की बेहिसाब संख्या देखकर वो मौन हो गई। वो केवल सामने बोलते लोगों को निहारती और शांत रहती।

धीरे धीरे ये मामला शांत हो रहा था। लोग लगभग इस प्रकरण को भूलने लगे थे। वो लड़की गंदी लड़की, खराब लड़की, पतित लड़की घोषित की जा चुकी थी। न सिर्फ परिवार द्वारा समाज द्वारा बल्कि पूरे शहर के हिंदुओं द्वारा।

उस लड़की के चेहरे की रौनक गायब हो चुकी थी। हां, मुझे याद आया। उसकी मां अध्यापिका थीं। उन्होंने बेटी को खुले माहौल में पाला था और कभी किसी चीज के लिए बंदिश नहीं लगाई। अब उन्हें अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये नहीं सोच पा रही थी कि चलो बेटी ने गलत ही सही, फैसला ले लिया है तो उसका साथ दें। समझाया बुझाया फिर भी नहीं मान रही है तो उसे उसकी मन की करने दो। बहुत बिगड़ेगा तो क्या बिगड़ेगा। वो मुस्लिम युवक उसे छोड़ देगा, जैसी की आशंका परिजनों द्वारा जताई जा रही थी। तो इससे क्या होगा? क्या किसी के छोड़ने से किसी की ज़िंदगी खत्म हो जाती है। मैं तो मानता हूं कि मुश्किलें और चुनौतियां हमेशा आदमी की भलाई के लिए ही आती हैं। ज्यादातर महान लोगों ने जीवन के हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना किया और उससे जीतकर या हारकर, उससे सबक लेकर और आगे बढ़ गए। हो सकता है, वो लड़की खुद अपने जीवन के अऩुभवों से जो सबक लेती उससे वो समझ पाती कि उसने जो निर्णय लिया है वो सही या गलत है।

बात फिर भटक रही है। मैं कह रहा था कि समय बीतने के साथ माहौल लगभग शांत हो चुका था।

और एक दिन फिर खबर आई। वो लड़की उस लड़के के साथ फिर भाग गई।

हुआ यूं कि समय बीतने के साथ लड़की ने थोड़ा नाटक किया। उसने मां के सामने झुकने का नाटक किया। बाहर निकलने की थोड़ी थोड़ी आजादी उसे मिलने लगी। उसे भागते न देखकर उसे थोड़ी और आजादी दे दी गई। नौंचदी मेले में घूमने के लिए भी कह दिया गया। उसके साथ कोई घर का हमेशा होता था। मेले में वो भाई के साथ गई और जाने कब भाई को महसूस हुआ कि उसकी बहन उसके साथ नहीं है। खूब ढूंढा तलाशा गया पर वो नहीं मिली। बाद में मालूम चला, दोनों फिर भाग गये। इस बार बेहद दूर चले गए।

उसके बाद क्या हुआ, मुझे कोई खबर नहीं मिली। पर मैं उस लड़की के चेहरे को आज भी नहीं भूल पाता हूं।

सच्ची कहूं तो मैं उसे अंदर ही अंदर प्यार करने लगा था। वो लड़की पतित घोषित कर दी गई थी, समाज के द्वारा, शहर के द्वारा, परिवार के द्वारा। उस लड़की का नाम दूसरे घरों की लड़कियों के सामने इसलिए लिया जाता था ताकि बताया जा सके कि पतित, गंदी, बुरी लड़कियां होती कैसी हैं और वो कितना नुकसान कर देती हैं, अपना, खानदान का और समाज का। उन दिनों मेरठ के बाकी घरों की लड़कियों को उनकी माएं उस जैसी कभी न बनने की नसीहत देती थीं। मुझे खुद याद है कि मेरे मोहल्ले पांडवनगर में कई घरों की माएं अपनी बच्चियों से हंसते हुए बतियाती थीं और उस बेशरम लड़की के किस्से पढ़कर, सुनाकर ईश्वर से अनुरोध करती थीं कि हे ईश्वर ऐसी पतित लड़कियां किसी मां-पिता को न देना।

मैं उस लड़की का नाम भूल चुका हूं। मेरे मेरठ के साथी अगर इसे पढ़ रहे हों तो जरूर बतायें उसका नाम, कमेंट के रूप में लिखकर। पर उस पतिता प्यारी गुड़िया को मैं आज भी दिल से प्यार करता हूं। उसके लिए दुवा करता हूं कि वो जहां रहे, सुखी रहे।

जय भड़ास
यशवंत

22.2.08

इस पतित औरत को सलाम....पार्ट वन

आगरा में बस से ज्यों उतरा, आटो पकड़ने कि लए आगे बढ़ा। चौराहे पर आटो स्टैंड। दूसरी ओर पुलिस चौकी। आटो में बैठा ही था कि एकदम से शोर मचा। पीछे मुड़ा तो एक 35-40 की उम्र की गरीब सी, साड़ी पहने महिला अपने चप्पलों से एक 30 वर्ष के युवक की पिटाई कर रही थी। एकदम से हल्ला हुआ कि फलाना पिट रहा है। सभी आटो ड्राइवर दौड़े, उसे बचाने को। उधर से पुलिस वाले भी चल पड़े। देखते ही मजमा इकट्ठा हो गया। मालूम हुआ मामला छेड़खानी का है। महिला गरियाये जा रही थी। वो युवक बचाव में पीछे खिसक रहा था। उसके मुंह पर चप्पलें गिरती जा रहीं थीं। आटो वाले महिला को मिलकर गरियाने लगे और उसके चप्पलों की चंगुल से अपने साथी को बचाने लगे। पुलिस वाले खरामा खरामा आ रहे थो सो तब तक ढेर सारी चप्पलें उस युवक रूपी आटो ड्राइवर पर गिर चुकी थीं। पुलिस ने उसे पकड़ कर अपने कब्जे में लिया। महिला बोले जा रही थी। छेड़ रहा था। पीछे से उंगली की। एक बार तो चुप रही। फिर ये दूसरी बार आकर उंगली कर रहा था। समझता है कि वेश्या हूं। अकेले हूं तो इसका मतलब हुआ वेश्या हूं। अपने मां को जाकर उंगली कर। हरामजाते, कुत्ते, कमीने, सुअर की औलाद....।

आटो वालों में रोष व्याप्त था। मैंने अपने ड्राइवर को घुड़की लगाई....अबे चल, यहीं झगड़ा सुलझाता रहेगा। अपना ड्राइवर आया और गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी के साथ आटो वाले का भी मुंह चल रहा था.....साली, धंधा करती है। कई दिनों से इसी चौराहे पे दिखती है। देखने पे मुस्करा भी देती है। इसने आज भाई को फंसा दिया।

मैं चुपचाप उसकी बात सुनता रहा। वह आगे बोला, एक झटके में मेरी शक्ल देखने के बाद सामने सड़क पर निगाह केंद्रित करते हुए....बताओ भाई साहब आप, शरीफ घर की औरत किसी को मारने की हिम्मत कर सकती है। ये साली खुद ही बेइज्जत औरत है। शरीफ महिला तो यह कहने में संकोच करेगी कि उसके साथ क्या हुआ। वह तो चुपचाप चली जायेगी। लेकिन ये जो धंधे वाली होती हैं ना, ये किसी को भी फंसा देती हैं।

बिना चेहरे पर कोई भाव लाये उसकी बात सुनता रहा, सोचता रहा। मेरे बगल में बैठे पुरुष सहयात्री आटो चालक की हां में हां मिलाते हुए बोले...बेचारा अच्छा खासा पिट गया। देखो, वो पीट रही थी तो वो चुपचाप पिट रहा था, कुछ नहीं बोला।

मैंने भी वाणी को शब्द दिया....असल में उस साले को यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि छेड़ने के बाद इस तरह उसे चप्पल खाने पड़ेंगे। और जब चप्पल गिरने लगे तो एकदम से उसे अवाक होना पड़ा, अपनी इज्जत जाती दिखी तो उसे चुपचाप रहने में ही भलाई समझ में आई होगी।

आटो ड्राइवर फिर बोल उठा....भाई साहब, आप जानते नहीं हैं। यहां धंधेवालियों की पूरी बस्ती है। वे सब ऐसे ही घूमती रहती हैं। आप बताओ, उसकी शक्ल और उसकी आवाज से आप उसे शरीफ घर की मान रहे थे।

मैंने जवाब दिया...भाई, वो जो तुम्हारा दोस्त था, वो भी शरीफ नहीं दिख रहा था। क्या तुम लोगों की यूनियन का अध्यक्ष था क्या?

उसने कहा...नहीं अध्यक्ष तो नहीं, लेकिन दबंग लड़का है। ड्राइवरों की हर दिक्कत में साथ रहता है।

आटो ड्राइवर की बात से समझ में आ गया कि वो आटो ड्राइवर जो पिट रहा था, चौराहे के आटो ड्राइवरों का रहनुमा टाइप का था, इसलिए वो बिना आटो चलाए, सिर्फ आटो स्टैंड की उगाही से अच्छा खासा पैसा बना लेता था और जिस फिल्मी स्टाइल में गोविंदा मार्का कपड़े व चेहरे की स्टाइल बना रखी थी, उसमें उसके अंदर एक ठीकठाक डान दिख रहा था। पुलिस वाले भी उसे जिस कूल तरीके से ले गये, उससे लगा कि उनका भी चहेता होगा क्योंकि चौराहे कि पुलिस चौकी है, सो ट्रकों से वसूली में और दारू मुर्गा की व्यवस्था में ये साथ देता होगा।

मैंने ये सच्ची घटना आगरा के कई पत्रकार मित्रों के साथ शेयर की और उस औरत के हिम्मत की दाद दी, जिस वहां चौराहे पर खड़े बहुतायत ड्राइवरों व यात्रियों ने बुरी औरत, पतित औरत घोषित कर दिया था। मैं और मेरी सोच अल्पमत में लेकिन इस पतित औरत ने जो साहस का काम किया, उससे ढेर सारी शरीफ औरतों को सबक मिलेगा। जैसा कि मेरे आटो का ड्राइवर कह रहा था, शरीफ औरतें छेड़खानी होने के बाद भी नहीं बोलतीं, ये साली तो बिना कुछ हुए चिल्ला रही थी।

मायने ये है...पहली बात तो वो औरत धंधेवाली होगी, ये मैं नहीं मानता क्योंकि हर सक्रिय लड़की के साथ मर्द कई आरोप व रहस्य मढ़ देते हैं, दूसरी बात अगर वो धंधे वाली होगी भी तो उसने जो साहस किया, सिर्फ यही साहस उन तमाम शरीफजादियों के चेहरे पर तमाचा हैं जो सिर्फ कला कला के लिए में विश्वास करती हैं और बातें बघारती हैं। मैं इस पतित औरत को इन शरीफ औरतों से महान का दर्जा देता हूं जो छिड़ने के बाद भी चुपचाप शर्म से गाल लाल किये चली जाती हैं। तीसरी बात अगर ये औरतें, जो धंधा करती हैं या नहीं करती हैं, खुलकर अपने साहस के साथ आगे आती हैं और मर्दों से भरे चौराहे पर खड़े एक लफंगे को जूतियाती है तो उसने संदेश दे दिया है, हे प्रगतिशीलों, हे वाचालों, हे गाल बजाने वालों, देखो....हम जो करते हैं ना, अपनी मर्जी से करते हैं। धंधा करते भी हैं तो अपनी मर्जी से, चप्पल मारते भी हैं तो अपनी मर्जी से.....। तुम साले, अपनी दुनिया में नियम कानून व मुक्ति के मैराथन की दौड़ की तैयारियों में लगे रहो.....।

इस महिला को मैंने उस समय भी मन ही मन सलाम किया था। सोचा था, लिखूंगा पर लिख नहीं पाया। लेकिन अब जब कुछ लोग झंडाबरदार होकर महिलाओं को कथित मसीहा बनकर उभरी हैं और बहस को अपने हिसाब से चलाने पर आमादा हैं, उन्हें मैं उदाहरणों के जरिए समझाने की कोशिश करूंगा कि जिस पतनशीलता की बात कर रहा हूं वो क्या है भड़ासी भोंपू का राग क्या है।

जय चोखेरबालियां, जय भड़ास
यशवंत सिंह

21.2.08

चोखेरबाली में भड़ासी आ गए तो मुझे अब सोचना होगा...!!!

((स्त्रियों के चर्चित ब्लाग चोखेरबाली का सदस्य बनने का न्योता मिला तो तुरंत जाकर ज्वाइन कर लिया। बुरे लोगों पर कौन भरोसा करता है, लेकिन चोखेरबाली ने किया तो लगा, चलो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बुरे लोगों को इस लायक मानते हैं कि वे कथित अच्छे लोगों से ज्यादा बेहतर हैं। खैर, चोखेरबाली पहुंचा तो वहां अपने स्वभाव अनुरूप एक पोस्ट भी दे मारा। और जहां जायें डाढ़ो रानी वहां लाये ओला पानी के अंदाज में मेरे लिखे पर कुछ लोगों को एतराज हो गया। ये कहां से चले आये म्लेच्छ कहीं के, भड़ासी कहीं के। भगाओ इन्हें। अगर ये रहेंगे तो हम न रहेंगे.....आदि आदि। तो भइया, अब हम का कहें, आज के जुग में सच सच बोल दो तो चुभ जाती है। एक ने हुवां किया तो नीचे कई लोग हुवां हुवां करने लगे, कुछ लोग आंचल में मुंह छुपाए कहने लगे कि जिधर उड़ेगा ये आंचल, उधर की राह हम भी चल पड़ेंगे .....खैर, यहां मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि भड़ासियों को पता चल सके कि भड़ासानंद आजकल कहां कहां मुंह मार रहे हैं। तो लीजिए चोखेरबाली पर जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसमें आए कमेंट को बूझिए....जय भड़ास, यशवंत))


Wednesday, February 20, 2008
सिर्फ और सिर्फ पतन, कोई मूल्य वूल्य की शर्त न थोपो
यशवंत सिंह
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मनीषा ने जो लिखा, मैं पतित होना चाहती हूं, दरअसल ये एक जोरदार शुरुआत भर है। उन्होंने साहस बंधाया है। खुल जाओ। डरो नहीं। सहमो नहीं। जिन सुखों के साथ जी रही हो और जिनके खोने का ग़म है दरअसल वो कोई सुख नहीं और ये कोई गम नहीं। आप मुश्किलें झेलो पर मस्ती के साथ, मनमर्जी के साथ। इसके बाद वाली पोस्ट में पतनशीलता को एक मूल्य बनाकर और इसे प्रगतिशीलता के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। यह गलत है।

दरअसल, ऐसी ऐतिहासिक गल्तियां करने वाले लोग बाद में हाशिए पर पाए जाते हैं। कैसी प्रगतिशीलता, क्यों प्रगतिशीलता? क्या महिलाओं ने ठेका ले रखा है कि वो एक बड़े मूल्य, उदात्त मूल्य, गंभीर बदलाव को लाने का। इनके लिए पतित होने का क्या मतलब? ये जो शर्तें लगा दी हैं, इससे तो डर जाएगी लड़की। कहा गया है ना...जीना हो गर शर्तों पे तो जीना हमसे ना होगा.....। तो पतित होना दरअसल अपने आप में एक क्रांति है। अपने आप में एक प्रगतिशीलता है। अब प्रगतिशीलता के नाम पर इसमें मूल्य न घुसेड़ो। कि लड़ाई निजी स्पेस की न रह जाए, रिएक्शन भर न रह जाए, चीप किस्म की चीजें हासिल करने तक न रह जाए, रात में घूमने तक न रह जाए, बेडरूम को कंट्रोल करने तक न रह जाए....वगैरह वगैरह....। मेरे खयाल से, जैसा कि मैंने मनीषा के ब्लाग पर लिखे अपने लंबे कमेंट में कहा भी है कि इन स्त्रियों को अभी खुलने दो, इन्हें चीप होने दो, इन्हें रिएक्ट करने दो, इन्हें साहस बटोरने दो.....। अगर अभी से इफ बट किंतु परंतु होने लगा तो गये काम से।

मेरे कुछ सुझाव हैं, जिस पर अगर आप अमल कर सकती हैं तो ये महान काम होगा.......

1- हर महिला ब्लागर अपने पतन का एलान करे और पतन के लक्षणों की शिनाख्त कराए, जैसा मनीषा ने साहस के साथ लिखा। अरे भइया, लड़कियों को क्यों नहीं टांग फैला के बैठना चाहिए। लड़कियों को क्यों नहीं पुरुषों की तरह ब्लंट, लंठ होना चाहिए....। ये जो सो काल्ड साफ्टनेस, कमनीयता, हूर परी वाली कामनाएं हैं ये सब स्त्री को देवी बनाकर रखने के लिए हैं ताकि उसे एक आम मानव माना ही न जाए। तो आम अपने को एक आम सामान्य बनाओ, खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं।

2- सबने अपने जीवन में प्रेम करते हैं, कई बार प्रेम का इजाहर नहीं हो पाता। कई बार इजहार तो हो जाता है पर साथ नहीं जी पाते....ढेरों शेड्स हैं। लेकिन कोई लड़की अपनी प्रेम कहानी बताने से डरती है क्योंकि उसे अपने पति, प्रेमी के नाराज हो जाने का डर रहता है। अमां यार, नाराज होने दो इन्हें.....। ये जायेंगे साले तो कई और आयेंगे। साथ वो रहेगा जो सब जानने के बाद भी सहज रहेगा। तो जीते जी अपनी प्रेमकहानियों को शब्द दो। भले नाम वाम बदल दो।

3- कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो।

4- महिलाओं लड़कियों का एक ई मेल डाटाबेस बनाइए और उन्हें रोजाना इस बात के लिए प्रमोट करिए कि वो खुलें। चोखेरबाली पर जो चल रहा है, उसे मेल के रूप में उन्हें भेजा जाए।

5- छात्राओं को विशेष तौर पर इस ब्लाग से जोड़ा जाए क्योंकि नई पीढ़ी हमेशा क्रांतिकारी होती है और उसे अपने अनुरूप ढालने में ज्यादा मुश्किल नहीं होतीं। उन्हें चोखेरबाली में लिखने का पूरा मौका दिया जाए।

6- एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह, ताकि आप लोग गंभीरता व मूल्यों के आवरण में जिन चीजों को कहने में हिचक रही हैं, जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने से डर रही हैं, वो सब शुरू हो जाए।

जय चोखेरबालियां
यशवंत
Posted by यशवंत सिंह yashwant singh at 6:40 PM
Labels: पतनशील लड्कियाँ


6 comments
Mired Mirage said...
बढ़िया सुझाव हैं । मैं तो आपका सुझाव पढ़ने से पहले ही कंचन सिंह चौहान जी के स्त्री बनाम पुरुष पर अपनी भड़ास टिप्पणी के रूप में लिख आई हूँ ।
घुघूती बासूती
February 20, 2008 7:17 PM

रचना said...
"खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं। "
क्यो हम वैसा लिखे जैसा भड़ासी लिखते ?? कोई खास वजह भी बताये की ऐसा भड़ास पर क्या हुआ हैं जो किसी के लिये भी प्रेरणा का सूत्र हैं ? क्या उपलब्धि हैं भड़ास की , क्या किया हैं भड़ास ने ? एक सामुहिक ब्लॉग हैं भड़ास जहाँ आप जो चाहे लिख सकते हैं , भड़ास के पुनर्जनम से पहले जो पोस्ट आया करती उसमे गाली , नारी शरीर संरचना और बहुत कुछ होता था जिसका कोई महत्व ही नहीं हैं
नहीं मुझे तो नहीं चाहीये ऐसी पतन शीलता ।
" कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो। "
क्यो क्या ऐसा करने से कोई क्रांती आ जायेगी ?? क्या इससे समाज मे फैली रुदीवादी परम्पराये खत्म हो जाएगी ?
"एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह "
कब तक स्त्री को ये सुनना है , ऐसा करो इसकी तरह रहो , हमारी तरह बनके देखो !!!! चोखेर बाली का मतलब और मकसद क्या अब हमे किसी और से समझना होगा ?? क्या हम इतने भी परिपक्व नहीं है की सोच सके हमे क्या करना हैं ?? कमाल हैं एक और सीख !!
मेरे पास तो कोई ऐसा वाकया या संस्मरण नहीं हैं जिनका जिक्र कर के मै अपनी पतन शीलता का झंडा फेहरा सकूं पर ऐसे बहुत से संस्मरण हैं जहाँ मैने समाज से हर वह अधिकार लिया जो किसी पुरूष को मिलता , अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीने का । मुझे अगर शराब और सिगरेट की जरुरत महसूस होगी तो मै इसलिये लूगी की मुझे उसकी जरुरत हैं इसलिये नहीं की यशवंत लेते हैं । मुझे बराबरी पुरूष से नहीं करनी है क्योंकी मै तो जनम से पुरूष के बराबर ही हूँ । और मुझे ये सिद्ध भी नहीं करना है , मुझे केवल उज्र हैं की समाज स्थापित उस रुढ़ीवादी सोच से जहाँ स्त्री को उसकी शरीर की संरचना की वजह से बार बार अपमानित होना पड़ता है और मै अपनी हर सम्भव कोशिश करती हूँ कि इस के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखूं । मानसिक परतंत्रता से ग्रसित है स्त्री वर्ग और बदलना जरुरी है उस सोच का
February 20, 2008 9:33 PM

swapandarshi said...
अगर भडासी, इस म्लोग मे लिखने लगे, और तय करने लगे कि क्या लिखना होगा. टो मुझे इस ब्लोग की सदस्य्ता को लेकर सोचना होगा
February 20, 2008 10:08 PM

Pramod Singh said...
भइया, इस टिल्‍ली-बिल्‍ली उद्यीपन में मैं, बतौर एक ब्‍लॉगर और इस सामाजिक स्‍पेस को शेयर करते हुए- रचना व स्‍वप्‍नदर्शी की प्रतिक्रियाओं के साथ हूं. यही अच्‍छा है कि सब अपना सबक स्‍वयं लें.. बस इस बात से ज़रा ताज्‍जुब होता है कि नतीजों तक पहुंचने की ऐसी हड़बड़ क्‍यों मची हुई है? मानो किसी सलाने जलसे में ईनाम बंटनेवाला है कि यह सही और यह गलत!.. बिना नाटकीयता के अलग-अलग पर्सपेक्टिव नहीं बनाते रखे जा सकते?
February 20, 2008 11:34 PM

ओमप्रकाश तिवारी said...
रचना व स्‍वप्‍नदर्शी ne sahi kaha
February 21, 2008 12:49 AM

(चोखेरबाली से साभार)

इसलिए पतित होने दो ताकि वह अपने लिए स्पेस गढ़ सके

((आजकल भड़ास के अलावा मैं कुछ दूसरों ब्लागों पर टिप्पणियां कर रहा हूं और पोस्ट लिख रहा हूं। मनीषा पांडेय का ब्लाग है बेदखल की डायरी। इस ब्लाग पर मनीषा जो लिखती हैं, उसे मैं बड़े चाव के पढ़ता हूं। उनके लिखने का अंदाज बिलकुल भड़ासियों जैसा होता है। बिलकुल साफ साफ मन की बात, सोच, इरादे लिख देती हैं। तो मनीषा ने अपने इसी अंदाज, साहस या दुस्साहस के क्रम में एक पोस्ट चोखेरबाली पर लिख मारी...हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं। इस पोस्ट को काफी पढ़ा गया। उसके बाद उन्होंने लिखा..क्या पतनशीलता कोई मूल्य है? मैंने इसी पर टिप्पणी की है, जो इस तरह है....यशवंत))

यशवंत सिंह yashwant singh said...
सारी भाई मनीषा, गलत नाम लिखने के लिए। देखो, नाम तक याद नहीं है, बस लिखने की तुम्हारी स्टाइल व कंटेंट व याद है।

आपकी तारीफ करने के क्रम में मैं अपनी एक असहमति का जिक्र नहीं कर पाया था, वो अब कर रहा हूं।

आपका उपसंहार सैद्धांतिक तौर पर अच्छा है, लिखा अच्छे से है, पर व्यावहारिक नहीं है। पतित होने के लिए जिस बड़े विजन, बड़े फलक, बड़े संदर्भों की शर्त लगा दी है वो उचित नहीं है।

भइया, लड़की को मुक्त होने दो। उस ढेर सारी चीजें न समझाओ, न बुझाओ और न रटाओ। उसे बस क से कबूतर पढाओ। माने अपनी मर्जी से जीने की बात सिखाओ। आत्मनिर्भर होने को कहो। दिल की बात को सरेआम, खुलेआम रखने का साहस दो।

मनमर्जी करेगी तो जाहिर सी बात है कि गलत भी करेगी, सही भी करेगी। दिल की बात कहेगी तो अच्छी बात भी कहेगी, बुरी बात कहेगी। पर ये क्या कि स्त्री पतित हो लेकिन विचारधारा का चश्मा लेकर, नैतिकता का आवरण ओढ़कर, महिलावादी विजन लपेटकर.....।

इस लड़की को अभी सिर्फ इसलिए पतित होने दो कि वह इससे अपने लिए स्‍पेस पा सकती है, वह इससे चीप किस्‍म की ही सही, निजी आजादी पा सकती है।

समूची मानवता, उदात्तता, रचनात्मकता...ये सब तब होंगी जब वह अपने निजी स्पेस की जंग को जीत ले। रिएक्ट करने में सफल हो जाए। इतने महान लक्ष्य अभी से देंगी तो वैसे ही महानता के बोझ से दबी स्त्री फिर और महान हो जाएगी और पतित होने से रह जाएगी।

मैं तो कहूंगा इस पतनशीलता को किसी मूल्य से न जोड़ो। इसे मूल्यहीन पतनशीलता कहना पड़े तो खुल के कहो। चीजें क्रमिक तरीके से विकसित होती हैं। अभी रिएक्ट कर लेने दों, स्पेस ले लेने दो, चीप किस्म के सुख जी लेने दो....अपने आप इससे मन उबेगा और फिर अंदरखाने बड़े सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। लेकिन अगर पतन होने के लिए पहले ही ढेर सारे मूल्य वगैरह बना दिए तो फिर सब टांय टांय फिस्स.....

एक बढ़ियावाली बहस शुरू करने के लिए आपको बधाई।
जय भड़ास
यशवंत
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