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2.6.11

हम हैं, मोबाईल जैसे । PART - 2

हम  हैं, मोबाईल जैसे । 
PART - 2

सौजन्य-गूगल


http://mktvfilms.blogspot.com/2011/06/part-2.html

प्यारे दोस्तों,

हालाँकि,इस संसार की भारी भरकम भीड़ में, कोई भी आदमी अपनी मर्ज़ी से, कहीं भी खो सकता है, जब की किसी इन्सान की कमज़ोर याददास्त और `आदरणीय श्रीबंटीजी` नाम के कई सदगृहस्थ के हाथों की करामात के कारण कई बार, मोबाईल महाशय भी, चोरी होने की या खो जाने की आनंददायक विलासिता भोग सकते है..!!

मेरे एक मित्र के वृद्ध माता-पिता गाँव में अकेले रह रहे हैं,उनकी शादी की पचासवीँ  सालगिरह के अवसर पर, मित्र ने उन्हें एक मोबाईल भेंट किया,ये बात जान कर मैंने आनंद व्यक्त किया..!! मित्र ने मुझे कहा," क्या करूँ? गाँव के सारे रिश्तेदार, मेरे माता-पिता को ताना मारते थे,आपका बेटा शहर में इतना भी नहीं कमाता कि, आपको एक मोबाईल ख़रीद कर दिला सकें?इसलिए खुशी के इस मौके पर,मैंने उन्हें मोबाईल भेंट किया,वैसे भी पिताजी की खराब तबियत को लेकर मुझे अक्सर चिंता लगी रहती थीं ।"

मित्र के इस उम्दा कार्य का मैंने समर्थन किया,पर मुझे पता नहीं था सिर्फ एक हफ्ते में ही मित्र के पिताजी का स्वास्थ्य इतना खराब हो जाएगा कि,उनको शहर के अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा..!!

मित्र का फोन आते ही, मैं भी अस्पताल पहुँच गया,पता चला उनके पेट में कुछ गांठ जैसा था और तुरंत ऑपरेशन करने की आवश्यकता थी, अतः मित्र के पिताजी को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया था ।

करीब दो घंटे बाद, सफल ऑपरेशन होने के पश्चात, अंकल को ऑपरेशन थियेटर से बहार ला कर वार्ड में शिफ्ट करने की तैयारी चल रही थी, ऐन उसी वक़्त ऑपरेशन करनेवाले डॉक्टर साहब ने, अपना महँगा स्लिम मोबाईल गुम होने की`इमरजेंसी` ज़ाहिर कर दी..!!

मेरे मन में आशंका के कारण ख़ौफ़ जाग उठा..!! जिस प्रकार `तारक मेहता का उल्टा चश्मा` सीरियल में, जेठालाल के पड़ोसी आत्माराम तुकाराम भींडे के गले में ग़लती से सीटी (whistle) अटक जाती है, इसी प्रकार इस भुलक्कड़ डॉक्टर ने अपना मोबाईल अंकल का ऑपरेशन करते समय कहीं, अंकल के पेट में तो नहीं छोड़ दिया? हाँ,  ऐसा हो भी सकता है..!! आयें दिन अखबार में भी, ऐसी ख़बरें छपती रहती है, कहीं यहाँ भी..!!

वैसे डॉक्टर के भुलक्कड़ स्वभाव से भलीभाँति परिचित नर्स ने उपाय दर्शाते हुए डॉक्टर को सुझाव दिया,"सर, मैं अपने मोबाईल से आपका नंबर लगाती हूँ, आपके मोबाईल की रिंग बजेगी तो फौरन पता चल जाएगा कि मोबाईल कहाँ है?"

पर डॉक्टर साहब ने ये कह कर इस सुझाव की हवा निकाल दी कि," रिंग कहाँ से बजेगी,ऑपरेशन के वक़्त, ख़लल न हो ये सोच कर, मैंने अपना मोबाईल वायब्रेटर मोड़ पर रखा है..!!"

हो गया ना सत्यानाश? मेरे मित्र ने घबराहट में नर्स से आखिर पूछ ही लिया, " पेट से मोबाईल निकालने के लिए, डॉक्टर साहब अब  पिताजी का ऑपरेशन दोबारा करेंगे क्या?

नर्स कुछ कहती, इस से पहले ही, वार्ड बॉय कहीं से डॉक्टर का मोबाईल ढूंढ कर ले आया और हम सब की जान में जान आयी..!!  

हालाँकि,अत्यंत टेन्शन में मेरे मित्र ने अपनी सारी भड़ास निकाली," या..र, इस वक़्त मुझे इतना गुस्सा आ रहा है ना, कि इस गंजे डॉक्टर के बचेकूचे बाल भी नोंच  लूं? ऑपरेशन के समय साथ में, इतना स्लिम मोबाईल रखने की क्या जरूरत थी?"

मैंने मित्र को प्रसिद्ध कहावत याद दिलाई," दोस्त, इनको पोसाता होगा तभी तो इतना महँगा मोबाईल रखते होंगे? वैसे भी तुमने ये कहावत सुनी नहीं है,

"खल्वाटो निर्धन क्वचित।"

अर्थात्- शायद ही कोई गंजा इन्सान निर्धन हो..!!


मोबाईल जब से आम हुआ है, उस में भी अमीर-ग़रीब की भेद रेखा के कारण आदमी खास हो गया है । कई लोग तो एक साथ तीन-चार मोबाईल या सीम कार्ड रखते हैं..!! शायद, एक मोबाईल  फ्री ` SMS` के लिए, एक सिर्फ इन कमिंग के लिए और एक आउट गोईंग के लिए? मुझे लगता है आजकल मोबाईल कंपनी बदलने पर भी वही नंबर जारी रखने की, जो सहुलियत दी गई है, इसके बजाय अगर एक कानून पारित कर के प्रत्येक नागरिक की राष्ट्रीय पहचान के आईडेन्टिइकेशन नंबर को ही अगर मोबाईल नंबर के रूप में दर्ज किया जाए तो, बांग्ला देशी शरणार्थी,आतंकवादी को पकड़ने, जैसी कई ग़ंभीर समस्याओं का समाधान,  एक पल में मिल जाए..!!

हमारे, लेन्डलाईन फोन प्रेमी, एक मित्र का मानना है कि, एक दिन पूरा देश मोबाईल को कूड़ेदान में फेंक कर, वापस लेन्डलाईन का उपयोग करने लगेंगे क्योंकि, ताज़ा समाचार के अनुसार वैज्ञानिको ने दावा किया है कि, मोबाईल फोन का अधिक उपयोग करने पर, कैंसर होने का ख़तरा है । ये लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि, मोबाईल को सीने के पास  रखने से हार्ट एटेक और पैंट की जेब में रखने से नपुंसक होने का ख़तरा है? अगर इसे सच माना जाए तो, मोबाईल भी मच्छर की तरह कानों में गुनगुनाता रहता है ऐसे में, प्रातःस्मरणीय, आदरणीय पूज्य श्रीनानाजी पाटेकरजी का, ये सुप्रसिद्ध ब्रह्म वाक्य सच साबित हो सकता है कि," एक मच्छर (मोबाईल) आदमी को हिज़ड़ा बना सकता है?"

एक मित्र ने अफसोस ज़ाहिर किया,"या..र, अगर मोबाईल, इन्सानों जैसा है तो, हमें फ्रेश होने के लिए,रोज़ कम से कम एक बार नहाना पड़ता हैं और मोबाईल को पानी से दूर क्यों रखा जाता है?"

मैंने कहा," एक बार मोबाईल को भी नहला कर देख लेना?"

मित्र ने कहा," कल मैं पकौड़े खा रहा था, उसी समय पास में पड़े मेरे मोबाईल पर, ढेर सारी चटनी गिरी और मोबाईल चटनी से लथपथ हो गया, मैंने तुरंत उसे सिंक के नल नीचे पानी से अच्छी तरह धोया, मगर तब से वह मुझ से रूठा हुआ है..!!"

वैसे, मोबाईल में एक और सुविधा होती है, कॉन्फ़्रेंस करने की, जिस में एक साथ कई पुरूष किसी ठोस वजह से या फिर, कई सन्नारीयाँ बिना वजह, कई  घंटो तक बातचीत कर सकते हैं..!!साहित्य जगत में,कई कवि मित्रों ने, अपनी रचनाओं में, पुरूष को भँवरे और नारी को पुष्प की उपमा दी है, हालांकि भ्रमर को सदैव यह भ्रम रहता है कि, मेरी पत्नी, मेरे मुकाबले कम अक्ल है, पर सिर्फ नारी ही ऐसा प्राणी है जो,मोबाईल में रोंग नंबर लगने पर भी, एक-डेढ़ घंटे तक बात कर सकती है..!!

हमारे चंपकचाचा का कहना है," मैंने नया मोबाईल ख़रीदा है, जिसे  अपने सात साल के पोते को गुरू मानकर उसी से,ऑपरेट करना,  सीख रहा हूँ, इतना ही नहीं, इसी अज्ञानता के कारण, बच्चों पर, `तुम से ज्यादा दीवाली मैंने देखी है`, ऐसी धाक जमाना, मैंने छोड़ दिया है..!!"


हालांकि,अगर आप युवा हैं और आपके मोबाईल में प्यार भरे SMS,MMS आते हों तो, आपका मोबाईल किसी छोटे बच्चे के हाथों में देना बहुत बड़ा जोख़िम साबित हो सकता है क्योंकि, आजकल के बच्चे विकिलिक्स वाले जूलियन असांजे  से कतई कम नहीं होते? अभी-अभी एक मौसी का भांड़ा फोड़ते हुए एक भांजे ने उनका मोबाईल मौसी के हाथ में वापस थमाया कि," मौसी ये लीजिए आपका मोबाईल, कोई आपको, `I LOVE YOU` कह रहा है..!!"

एक लग्नवांच्छुक युवा मित्र का कहना है कि,"अंकल, आजकल लड़की देखने जाता हूँ तो मैं उसे मोबाईल का उपयोग ठीक ढंग से आता है की नहीं ये बात अवश्य पूछता हूँ क्योंकि, जिसे मोबाईल का ज्ञान न हो वह रसोई क्या ख़ाक अच्छी बनाएगी?" वैसे, ये तर्क, मेरी तो समझ से परे हैं,क्योंकि लग्नवांच्छुक कन्या भी ऐसा ही कह सकती है कि, जिस लड़के को ठीक से मोबाईल पकड़ना नहीं आता, वह भविष्य में हमारे बच्चों को हाथ में उठा कर, क्या ख़ाक खिला पाएगा..!!

आजकल का युवाजगत बड़ा ही उदार दिल होता है, चाहे अपना मोबाईल हो या प्रेमी-प्रेमिका, बड़ी आसानी से एक दूसरे के साथ, उनकी अदल-बदल कर लेते हैं..!! शायद वह एक ही मॉडल से बहुत जल्द उक़ता जाते होंगे?

हालाँकि,शादीशुदा जोड़े की तो बात ही कुछ ओर है,सब से पहले तो उनको, अपने पति या पत्नी से छिपा कर, प्रेमिका या प्रेमी का नंबर अपने मोबाईल में सेव (save)  करने की महारत हासिल करनी पड़ती है? इस से भी ज्यादा मुश्किल है, पत्नी की उपस्थिति में, प्रेमिका के साथ मोबाईल पर, कोडवर्ड में प्रेमालाप करना..!! मुझे तो लगता है, अगर इस विषय का, कोई ट्यूशन क्लासिस शुरू करें तो, एक ही साल में वह ट्यूशन क्लास प्रोप्रायटर मर्सीडिस् कार में घूमता हुआ दिखाई दें?  

एक शादीशुदा मित्र का कहना है," मुझे मेरी पत्नी जब  माह की आखिर तारीख में, ज़बरदस्ती किसी बड़े शॉपिंग मॉल में, ढेर सारा शॉपिंग करने के लिए, ले जाती है तब, अपनी पत्नी से, जानबुझ कर, भीड़ में अलग खो कर मैं, मेरे मोबाईल का सीम कार्ड निकाल देता हूँ, बाद में मुझे ढूंढने में, पत्नी का इतना सारा वक़्त जाया होता है कि,शॉपिंग कम होने के कारण, मेरा पॉकेट खाली होने से बच जाता है..!!"

अब अंत में, इन्सान और मोबाईल की एक अजीब  सी समानता के बारे में बात कर लें, एक इन्सान दूसरे इन्सान को माईक्रो तनाव दे कर, उसे बिना हथियार जीते जी अधमरा सा कर सकता है, मोबाईल भी हमें उसके माईक्रो तरंग की मार से अधमरा सा कर सकता है ।

दोस्तों, अभी-अभी मेरे मोबाईल पर एक मैसेज आया है,

"  Long Time Ago.... Only  idiots  used.... to read  my SMS And Today, The  history  continues..."

मैंने  यह संदेश पढ़ लिया है । मगर, आप चिंता मत करना, आप में से किसी को भी, यह मैसेज फारवर्ड करने की बजाय, मैं इसे डिलीट कर रहा हूँ..!!

इस महान उपकार के बदले, आप मेरा धन्यवाद करना चाहें तो, बिना हिचकिचाहट `थेंक्स` कह सकते हैं..!!

वैसे, मेरे इस आलेख को अंत तक पढ़ने के लिए, मैं तो आप का धन्यवाद ज़रूर करना चाहूँगा..!!

THANKS, MY DEAR FRIENDS..!!

मार्कण्ड दवे । दिनांक- ०२-०६-२०११.

1.6.11

हम हैं, मोबाईल जैसे । PART -1

हम  हैं, मोबाईल जैसे । 
PART -1
सौजन्य-गूगल


 " कभी यहाँ, कभी वहाँ, हम तो हैं मोबाईल जैसे..!!
  कभी  तेरे, कभी उसके,हम तो है मोबाईल जैसे..!!"


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प्यारे दोस्तों,

एक ही गाँव में,एक ही गली में पले-बड़े हुए और साथ-साथ खेले, बचपन के मेरे दो मित्र, अचानक रास्ते में मुझे मिल गए । साथ में चाय-पानी करने के बाद एक दोस्त ने,मुझे कहा,"अच्छा तो हम चलते हैं दोस्त, हम तो मोबाईल जैसे हैं, मिलते रहेंगे..!!"

मैंने दूसरे मित्र से पूछा," ये `मोबाईल जैसा` कथनाश्रय का सही मतलब क्या है?"

जवाब मिला," छोड़ना या..र..!! हमें इस से क्या लेना-देना?"

हालांकि,`मोबाईल जैसा` कथनाश्रय का सही अर्थ जानने के लिए मैं तो बेताब हो गया..!!

घर पहुँचते ही, मैंने अर्धांगिनी से पूछा," अभी-अभी मुझे किसी ने,`हम तो हैं मोबाईल जैसे` कहा था, इसका क्या मतलब?"

संशयात्मक स्वर में पत्नी ने पूछा," वो कौन थीं?"

"कौन थीं नहीं? था..था..था..? अपनी ही जाति का, बचपन का, मेरा दोस्त था..!!"

"क्या नाम है उनका?"

"जाने दे, तुम उसे नहीं जानती..!! बहुत सालों बाद मिला ।"

" उनके पास मोबाईल है?"

 "शायद..!! हाथ में मोबाईल जैसा कुछ देखा तो था?"

" आपने उनका नंबर लिया?"

" हाँ, उसने अपना विज़िटिंग कार्ड दिया तो है..!!"

" अगर वह अपनी जाति का है तो फिर, उसे  पूछो ना?"

" तुम मोबाईल जैसे क्यूँ  हो, ऐसा किसी से, थोड़े ही ना पूछा जाता है?"

" नहीं..नही, वह अपनी जाति का है ना? तो मेरी भाँजी के लिए, ढंग का कोई रिश्ता हो तो, उसे  पूछो ना?"
 
"तुम भी ना या..र..!! बात को कहाँ से कहाँ ले गई?"

क्या बताउं..!! मेरी पत्नी अक्सर ऐसा ही करती है ।

हालाँकि, मोबाईल जैसे इन्सान का संभावित अर्थ तलाशते-तलाशते, संभावित दामाद तलाशने का व्यायाम शुरु करने का मेरा कोई इरादा नहीं था, अतः  मैं  मौन हो  गया..!! मगर इस विषय पर, मेरा गहन चिंतन जारी रहा..!!

मैं सोचता हूँ, मेरा मित्र अगर मोबाइल ऐसा है तो, क्या उसे ऑल्ड मॉडल का मोबाईल मानना चाहिए? पर, चालीस साल पहले, हमारे जन्म के समय तो, मोबाईल का आविष्कार ही नहीं हुआ था..!!

अरे..या..र..!! समस्या इतनी भारी हो गई थीं कि, गहन सोच के कारण मैं सारी रात करवट बदलता रहा ।

दूसरे दिन, सुबह-सुबह मोर्निंग वॉक करते समय, बदकिस्मती से यही सवाल, एक आध्यात्मिक आस्थावाले साहित्यकार से,  मैंने  पूछ लिया । उन्हों ने मेरी आँखों में आँखे डालकर मुझे समझाया,

"तुम्हारे इस मोबाईल जैसे मित्र, पिछले जन्म में अवश्य संत रहे होंगे..!!"

मैंने पूछा, " क्यों,आप ऐसा क्यों कहते हैं?"

"हमारे आदि जगदगुरू श्रीशंकराचार्यजी ने कहा है कि,जगत में ब्रह्म एक ही है,अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ । जिस प्रकार मोबाईल के नित नये मॉडल बाज़ार में आते रहते हैं पर, उसका प्रमुख कार्य सब के संवाद वहन करना होता है..!! इसी प्रकार इन्सान भी मोबाईल के कई मॉडल कि भाँति, माता-पिता-सखा-मालिक-नौकर जैसे कई अलग-अलग रूप धर कर, सभी के साथ, एक ही समय पर, अलग-अलग संवाद साधता है..!! आया कुछ समझ में?"

चेहरे पर नकारात्मक भाव धर कर, मगर मेरी मूँड़ी सकारात्मक भाव से हिलाता हुआ, वहाँ से मैं चल दिया..!!

अब मैंने तय कर लिया कि, इस प्रश्न का हल मैं खुद ढ़ूंढूंगा..!!

मानो, ऐसा निश्चय करते ही, मुझे असीम ज्ञान प्राप्त हुआ हो, मेरा उत्तर मुझे मिल ही गया..!!

हाँ, सचमुच,इन्सान मोबाईल जैसा ही होगा क्योंकि..!!

* मोबाईल में भी, कभी-कभी जैसे रोंग नंबर लग जाता है, इसी तरह ज़िंदगी में हमें अचानक,अनपेक्षित और बिना वजह, कई लोग टकरा जाते हैं?

* मोबाईल के माफिक इन्सान का स्वभाव भी घूमते-फिरतेराम जैसा नहीं है क्या?

* मोबाईल नंबर के माफिक इन्सान भी किसी ना किसी वजह से, स्थानांतर कर के,अपना  ऍड्रेस बदलता  रहता हैं ना?

* मोबाईल में जिस तरह वायरस घुस जाता है, इसी तरह इन्सान  भी कभी ना कभी, लोभ-लालच-मोह-माया के शैतानी वायरस से ग्रस्त हो जाता है ना?

* मोबाईल फोन की डायरेक्टरी मोबाईल कंपनी के पास होती है,  इसी प्रकार इन्सान की डायरेक्टरी,जनगणना द्वारा सरकार के पास होती है..!!

* मोबाईल में किसी भी इन्सान की बातचीत,अगर रास न आए तो, फोन बीच में ही काट दिया जाता है, इसी प्रकार किसी के साथ अन -बन होते ही, इन्सान एक दूसरे से, तुरंत संबंध विच्छेद कर देता हैं ?

* पुराने मॉडल के मोबाईल को कुत्ते भी नही सूँघते,इसी प्रकार जेनरेशन गेप के नाम पर, बड़े- बुजुर्ग के सामने एक नज़र करने को भी कोई तैयार नहीं होता?

* मोबाईल में अनेक विन्डॉ होती है, इन्सान के मन में भी कई ऐसी विन्डॉ होती है,जहाँ ज़िंदगीभर वह खुद भी पहुँच नहीं पाता है..!!

वैसे इन्सान के जीवन में सारी समस्याएं, मन की अज्ञात विन्डॉज़ तक पहुंचने की असमर्थता के कारण ही पैदा होती  है..!!

शायद इसीलिए `गर्ग उपनिषद` में कहा गया है ।

"यः वा  एतद् अक्षरम् गार्गि अविदित्वा ।
अस्मात्  लोकात् प्रैति सः कृपणः ॥"


अर्थात् - जो मनुष्य, सच्चे मानव की तरह जीवन की समस्याओं का निवारण नहीं करता और आत्म साक्षात्कार के विज्ञान को जाने बिना ही, कुत्ते बिल्ली की मौत, मर कर इस दुनिया से विदा होता है, वह `कृपण` है ।

दोस्तों,मुझे लग रहा है, इन्सान मोबाईल जैसा है कि नहीं, ये बात भले ही विवादित हो, पर मोबाईल हूबहू इन्सान जैसा ही है ये बात अवश्य निर्विवाद सत्य है क्योंकि,

* जिस प्रकार इन्सान को,ग़लत जगह, ग़लत बात में, अपनी टाँग अड़ा कर, अप्रिय बकवास कर के, किसी दूसरे की इज़्ज़त उछालने की बूरी आदत होती है, इसी प्रकार मोबाईल भी समय और स्थान देखे बिना, कहीं भी टोकरी बजा कर, सार्वजनिक क्षोभ और अपराध भाव उत्पन्न कराता है..!!( जैसे की,पत्नी की उपस्थिति में प्रेमिका की रिंग?)

* जिस प्रकार समाज में अमीर-ग़रीब का भेद होता है,इसी प्रकार मोबाईल समाज में भी महँगे और सस्ते (चाईनीझ?) का भेद होता है..!!

* जिस प्रकार इन्सान` अभी बोला,अभी रद्द कर दिया` व्यवहार अपनाता है, इसी तरह मोबाईल धारक `आज ये कंपनी- ये नंबर; कल वो कंपनी- वो नंबर` बदलता रहता है..!!

* इन्सान जिस प्रकार गिरगिट की भाँति बार-बार अपना रंग बदलता रहता है,इसी प्रकार मोबाईल भी अनेक रंग के आवरण चढ़ा कर नित नया रूप धारण करता है..!!

* जिस तरह इन्सान की जेब अक्सर खाली हो जाती है,इसी तरह मोबाईल का बैंलेन्स भी अक्सर शून्य हो जाता है..!!

* और अंत में, इन्सान और मोबाईल के निर्माता द्वारा तय की गई आयु समाप्त होते ही, दोनों की बैटरी डाउन हो कर, उनका `राम नाम सत्य है` हो जाता है..!!

सारा दिन मोबाईल अपने कान पर चिपका कर, समय के अभाव का रोना रोने वाले, तमाम पतिदेवों की, तमाम पत्नीदेवीओं को `ओशो वाणी` याद रखनी चाहिए..!!

"बंधन या मुक्ति वस्तु में नहीं, दृष्टि में होती है ।
मुक्त होने की एक प्रक्रिया है -पूर्ण बोध ।"

और हमारी ओर से पूर्ण बोध यह है कि, हे मोबाईल सौतन से पीड़ित पत्नीदेवीओं, आप अपने पतिदेवों के कान में, मोबाईल से भी अधिक प्रेम भरी गुफ़्तगू, पूरा दिन-रात करतीं रहे, ताकि उनको मोबाईल महा माया सौतन की याद ही न आएं..!!

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दोस्तों, अब इसी आलेख के पार्ट-२ में पढ़ियेगा मोबाईल चोरी या गुम होने की समस्या और उसे खोजने के अफ़लातून उपाय, कल यहीं पर..!!

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/06/part-1.html
 
मार्कण्ड दवे । दिनांक- ०१-०६-२०११.

20.4.11

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)
(Courtesy Google images)

प्रिय मित्र,
 
एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"
 
विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"
 
हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!
 
मानव नामक नर-प्राणी,  वयस्क होते ही, अपना जीवन साथी पसंद करने के बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता और समझदारी से,कुछ ख्याल को पाल-पोष कर,उसके अनुरूप किसी नारी के साथ विवाह के बंधन में बंध जाता है । 

फिर आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!
 
पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!
 
वैसे, अगर कोई पति अपने सारे विचार पत्नी के विचारों से एकाकार कर दें, इसमें कोई बुराई नहीं है ..!! पर हाँ, पत्नी के अलावा, परिवार के बाकी सदस्य को, अपने बेटे-भाई के ऐसे भोलेपन पर एतराज़ ज़रूर हो सकता है?
 
हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!
 
इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)
 
इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!
 
पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!!
 
हिंदुस्तान में पत्नी की परिभाषा |
 
भारत में हिंदु धर्म के अनुसार, `पत्नी` ऐसी नारी है, जो अपने पति के साथ, अपनी पहचान सहित, घर संसार के सभी विषय,चीज़ में,समान अधिकार रखती हो,जीवन के निर्णय एक दूसरे के साथ मिलकर करती हो,अपने परिवार के सभी सदस्य के आरोग्य,अभ्यास एवं अन्य ज़िम्मेदारी का वहन करती हो । 
 
हमारे देश में करीब, ९० % विवाह,पति-पत्नी के दोनो परिवारों की सहमति से  (Arranged Marriages) किए जाते हैं । जिस में धर्म,जाति,संस्कृति और एक जैसी आर्थिक सक्षमता-समानता को ध्यान में रख कर, ये विवाह संबंध जोड़े जाते हैं।

सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!
 
मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है ।
 
हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!
 
"न हि विवाहान्तरं वरवधूपरीक्षा ।"  
 
अर्थातः- विवाह संपन्न होने के बाद  वर-वधु की जाति पूछना निरर्थक है ।   
 
पत्नी कैसी होनी चाहिए? सर्वगुण संपन्न पत्नी की व्याख्या यह है कि,
 
कार्येषु मंत्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा   ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री । भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

 
कार्य प्रसंग में मंत्री, गृह कार्य में दासी, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, और क्षमा करने में धरित्री; इन छे गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।
 
तमिल भाषा में, पत्नी को, “Manaivee”, अर्थात `घर का प्रमुख प्रबंधक` कहा गया है ।
 
आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"
 


आलेख के प्रारंभ में, भले ही मैंने ये लिखा है कि, नारी को समझने का प्रयत्न,पुरूष को नहीं करना चाहिए..!! पर सच्चाई ये है कि,अगर विवाह वांच्छुक युवक-युवती, उनकी पहली मुलाकात के वक़्त ही पर्याप्त सावधानी बरतें, तो विवाहित जीवन सुखद होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है ।
 
सन-१९७० के बाद, जाति के बंधन टूटने का चलन बढ़ने की वजह से, आजकल ऐसा समय आ गया है कि, युवक-युवती शादी का फैसला खुद करते हैं जिसमें बाकी परिवारवालों को, अपने मन या बेमनसे, सिर्फ सहमति जताना बाकी होता है । इसके कई कारण है,जैसे कि, आज़ाद पीढ़ी के, आज़ाद नये विचार, सेटेलाईट क्रांति के चलते, पश्चिमी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव, परिवार में बड़े-बुजुर्ग का घटता मान और घर से दूर, देश-परदेशमें नौकरी-धंधे के कारण, अपने समाज से अलग होने के संयोग, संतान के पुख्त होने के बाद,उनके स्वतंत्र निर्णय अधिकार के समर्थन में बने कड़े कानून,वगैरह,वगैरह..!! वैसे यह बात अलग है कि, मुग्धावस्था में शारीरिक आकर्षण के कारण, विवाह करने के, त्वरित लिए गए फैसले, कई बार ग़लत साबित होते हैं और पति-पत्नी दोनों,`न घर के न घाट के` हो जाते हैं..!!
 
हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? मगर कहानियाँ भी तो वास्तविक जीवन से ही लिखी जाती है, क्या पुरूष-क्या नारी? समाज में ऐसे अनिष्ट मौजूद है, इतना ही नहीं, ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि, उनकी देखा देखी, दूसरे अच्छे लोग भी, अपनी मनमानी करने के लिए, ऐसे बुरे शॉर्ट कट अपनाने लगे हैं ।
 
कर्कशा पत्नी का क्या करें?
 
हमारे देश की संस्कृति में जहाँ,`नारी को नारायणी (देवी)` का रूप माना गया हैं, उससे बिलकुल विपरीत, ऐसी कहावत भी प्रचलित है कि, "नारी अगर वश में रहे तो अपने आप से, और अगर बिगड़े तो जाएं सगे बाप से..!!" 

अर्थात नारी को प्यार से रखें तो किसी एक पुरूष के अधिपत्य में आजीवन रहती है, पर एक हद से ज्यादा, उसे प्रताडित किया जाए, तो वह अपने सगे बाप का अधिपत्य भी स्वीकारने से इनकार कर सकती है..!!"
 
हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

 
महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)
 
एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!!
 
कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?
 
प्यारे दोस्तों,सत्य तो यही है कि,
 
१. तमाम जगह और घर-परिवार में आप पत्नी का आदर करें ।
 
२. पत्नी को ग़ुलाम या बगैर वेतन की काम वाली बाई जैसा मत समझें ।
 
३. पत्नी के प्रति आपके प्यार को, मन में ही दबाकर मत रखें, समय-समय पर उसके साथ वक़्त बीता कर, उससे प्यार का इज़हार करें ।
 
४. कम से कम अपने घर में, ऑफ़िस का रूआब मत झाड़िए,याद रखें, घर में आपकी पत्नी ही आपकी बॉस होती है..!!
 
५. सिर्फ पैसा कमाने के उद्यम में मत उलझे रहें, साल में एक-दो बार पत्नी को, दूसरे-तीसरे-चौथे प्रमोदकाल (Honey-Moon) पर ले जाएं ।
 
अगर, उपर दर्शाये सारे उपाय भीम घर का माहौल सुधारने के लिए कारगर साबित न हो,तो फिर,`आशा अमर है ।`
 
सूत्र को आत्मसात करके, कर्कशा पत्नी आज नहीं तो कल सुधर जाएगी, ऐसी उम्मीद पर सारा जीवन बीताएं..!!
एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!
 
वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"


" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

16.4.11

भड़कीले सवाल-चटकीले जवाब-भाग-२.

भड़कीले सवाल-चटकीले जवाब-भाग-२.
(Courtesy Google Images)

मेरा ब्लॉग-
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.htmlप्यारे दोस्तों, पता नहीं क्यों? कुछ पति महाशय अपनी पत्नी की हमेशा बुराई करते नज़र आते हैं..!! उन्होंने  मुझे कुछ भड़कीले सवाल भी भेजे हैं? चलो, ये सारे सवाल का, सही उत्तर पाने का एक प्रयास हम करें,शायद किसी पति-पत्नी का काम बन जाएं..!!

भ.स.-" मेरे पति हमेशा मुझ पर गुस्सा होकर कहते हैं, मेरे अंदर छिपे जानवर को जगाने की कोशिश मत करना, व..र्ना...? ये सुन-सुनकर,मैं तंग आ गई, क्या करूँ?"
 
च.ज.-" कहीं से एक तिलचट्टा (Cockroach) पकड़कर उस जानवर पर फेंके, भीतर का जानवर ड़रपोक है या ख़ूँख़ार, अभी पता चल जाएगा..!!
 
भ.स.- "मेरी पत्नी जब बहुत ज्यादा खुश होती है तब, कुकिंग बुक से रॅसिपी पढ़कर, मुझे कोई भी नयी वानगी पका कर खिलाती रहती है, मगर मेरा तो पेट ही खराब हो जाता है..!! क्या करूँ?
 
च.ज." आपके घर की सभी कुकिंग बुक्स, कूरियर से अपनी सास को भेज दो..!! फिर भुगतेगा आपका ससुर,अपने कुकर्मों का फल..!!
 
भ.स.-" मेरे पति मुझे हमेशा कहा करते है, मेरे जीवन में तुम से बड़ी मुसीबत और कोई नहीं हो सकती? ऐसा सुनकर बहुत बुरा लगता है..!!"
 
च.ज." आज ही,किसी ज्वैलरी शॉप में जाइए और पति देव की औकात से ज्यादा ज्वैलरी खरीदें..!! अगर, पति देव आप पर, भड़क उठे तो कह देना, जितनी बड़ी मुसीबत, उतना ज्यादा नुकसान?"
 
भ.स."मेरी पत्नी सजधज कर रोज़ मुझ से, एक ही सवाल करती है,मैं कैसी दिख रहीं हूँ? रोज़-रोज़ झूठ बोलना मुझे पसंद नहीं है..!! क्या करूँ?"
 
च.ज.-"घर की सभी दीवारों पर शीशें लगवा लें,बाद में भाभीजी अपने आप को आईने में देखकर, खुद ही डर जाएगी क्योंकि, आईना कभी झूठ नहीं बोलता..!!"
 
भ.स. "एक नारी का कौन सा रूप, नर के लिए अच्छा होता है माँ का या पत्नी का?"
 
च.ज. " खुद ही समझ लो..!! एक नारी के (माँ) कारण हम, दुनिया में रोते हुए आते हैं और दूसरी  नारी (पत्नी) हम कहीं रोना बंद न कर दें, इस बात का हमेशा ध्यान रखती है..!!"
 
भ.स.-" मेरे पति मुझे, मेरी साँस तुम ही हो, कह कर बाद में, मेरी ग्रासनली भी तुम हो, कहते हैं..!! श्वास और ग्रासनली, कुछ ग़लत नहीं है? 
 
च.ज." वैरी स्मार्ट बॉय..!! कहीं ग़लती से भी आप श्वास- नली में फँस जाए तो, आप के पति देव तो, बे-मौत ही मर न जाए क्या?
 
भ.स.-"मैंने मेरे पति से, यूँ ही एक सवाल किया, आप को मुझ में कौन सी ख़ासियत अच्छी लगती है? उन्होंने पूछा, क्या मतलब?  जितने दिखते हैं,क्या वह उतने भोलेभाले होंगे?
 
च.ज.-" भाभीजी, आप जल्द से जल्द किसी ज्योतिषी या डॉक्टर को कन्सल्ट कीजिए..!! आप की ग्रह दशा (घरवाली)और आपके पति की `काम`-दिशा (बहारवाली) ग़लत मार्ग पर चल पड़ी लगती है..!!"
 
भ.स." मेरे पति को फिल्म देखने का शौक नहीं है, पर हम सभी घरवालों के लिए, हर पंद्रह दिन के बाद, फिल्म के टिकट ख़रीद लाते हैं..!! मेरे `वो`कितने अच्छे हैं, नहीं?
 
च.ज." भाभीजी, पूरा घर खाली होने के पश्चात, घर में किसी और फिल्म की शूटिंग तो नहीं होती हैं ना? आपने कभी जांच पड़ताल की है क्या?"
 
भ.स." मेरे पति को चौबीसों घंटे सिरदर्द की शिकायत रहती है..!! कई डॉक्टर्स से जांच करवाई, सभी ने कहा कुछ नहीं है..!! फिर सिर दर्द क्यों?"
 
च.ज." भाभीजी, आपको तो खुश होना चाहिए..!! उनके सिर में कुछ नहीं है, इसीलिए तो उन्होंने, आप से विवाह किया है? पते की बात, है या नहीं?
 
भ.स." अगर नवविवाहित दो जोड़े (कपल) कहीं पर मिल जाए तो, चारों नर-नारी का, परस्पर व्यवहार कैसा होना चाहिए?
 
च.ज." अब क्या जवाब दें? दोनों  नारी एक दूसरे के ज़ेवर और ड्रेस देखा करेंगी और दोनों नर एक दूसरे की पत्नी को..!!"
 
=============
 
" ENJOY, NO COMMENTS ."

मार्कण्ड दवे । दिनांकः-१६-०४-२०११.

10.4.11

बाइसिकिल विरुद्ध कार (भाग -१ से आगे भाग-२ का अंतिम हिस्सा)


(सौजन्य=गुगल इमेज)
 हालाँकि सारी पनिहारीयाँ  अब तक समझ चुकी थीं की, अब क्या होनेवाला है..!! `जब भीड़ पडी भक्तन पर तब`न्याय अनुसार, मन ही मन, मैंने  भोले शंकर को याद किया । अगर, थोड़ी देर के लिए ही सही, उनकी तीसरी आँख, वो मुझे प्रदान कर सकें तो, उसे मेरी गर्दन के पीछे चिपकाकर, मेरे पीछे मैं देख पाऊँ..!! मुझे, बीच ढलान पर,ऐसी कठिन परिस्थिति में  फंसानेवाले मेरे बडे भैया को क्रोधाग्नि से शायद भस्म भी कर दूँ..!!

खैर, मेरी साइकिल ने अब तक तो, अधिकतम तीव्र गति पकड़ ली थीं । आखिरी में भोलेबाबा का नाम स्मरण करके, मैनें  मेरी दोनों आँखें ही मूंद लीं..!! तुरंत सारी समस्या ही जैसे खत्म हो गई? मुझे अवर्णनीय परम सुख का अनुभव होने लगा..!! ऐसा लगा, जैसे की मैं एक आज़ाद पंछी हूँ, जो आसमान में अपने पंख पसारे उड़ रहा है, विशाल गगन की ठंडी-ठंडी हवा का लुत्फ़, मुफ़्त में उठा रहा है? पर ये आनंद ज्यादा देर तक टिक न पाया । विशाल गगन से पृथ्वी पर, उन महिलाओं के बीच, साइकिल के साथ, मैं कब जा गिरा? उन सबको कहां-कहां लगा? उन्होंने मुझे कौन कौन सी गालीयां दीं? ये सब कुछ भी मुझे याद न रहा...!!

करीब पंद्रह मिनट बाद, जब मुझे  होश आया तब, कुछ फूटे हुए मटकों के पानी से, कुछ मारे शर्म से, भींग कर, मैं सचमुच पानी-पानी हो गया था..!! मेरा शर्ट और चड्डी दोनों फटे हुए थे..!!

मुझे साइकिल सिखाने का प्रण लेनेवाला मेरा गुरु, मेरा बड़ा भाई,  सब सलामत होने का आभास होते ही, किसी कोने के अज्ञात स्थान से, आसपास नज़र धुमाता हुआ, बाहर निकल आया और साइकिल के साथ, उसने  मुझे भी सँभालने की नाकाम कोशिश की । मैंने उसे खूब ड़ांटा और हम दोनों भाईओं को घर पहुँचते ही जमकर ड़ांट पड़ी ।

खैर, उसके बाद करीब पंद्रह दिन की अवधि में ही,जैसे तैसे, मैंने साइकल तो पुरी तरह सीख ली, मगर इन पंद्रह दिनो में उसी तालाब के टीले पर, हमने न जाने, कितनी पनिहारीओं के मटके फोडे, कितने लोगों की लधुशंका-गुरुशंका समाधि को भंग कराके, उनके `कुदरती इरादों` पर, उन्हीं के टिन पॉट (डिब्बे) का पानी फेर दिया ? आज ये सारी बातें, न तो मुझे याद है, ना मैं उसे याद रखना चाहूँगा..!!

हाँ, एक बात मुझे आज भी याद है,  साइकिल सीखने के बाद हमारे `चिल्ड्रेन समाज` में मेरा नाम और मान उसी तालाब के टीले की, ऊँची चोटी समान ऊँचा हो गया..!!

बहुत दुःख होता है, आजकल, जब मैं कार चला कर कहीं आता-जाता हूँ, मुझे, बचपन का साइकिल चलाने वाला वह रोमांच, जीवन में फिर कभी महसूस नहीं हुआ ।




दोस्तों, शायद सन- १९७५ तक,  लोग अपनी साइकिल को अपनी जान (पत्नी?) से भी ज्यादा प्यार करते थे..!! हमारे एक कंजुस पड़ोसी थे, जो की फ़र्स्ट फ्लॉर पर रहते थे । उनकी नयी खरीदी हुई साइकिल को, हम ऐसे अनाडी बच्चें नुकसान न कर दें या, कोई उसे चोरी न करें, इसलिए रोज़ रात को पड़ोसी घर लौटते ही, साइकिल को अपने दोनों हाथों से सिर पर उठाकर, फ़र्स्ट फ्लॉर पर, अपने घर में ले जाते थे । ये नज़ारा देखकर हम सारे बच्चें, हैरान हो जाते थें और सोचते थे की, गनीमत है की, उन्हों ने स्कूटर,बाईक या कार नहीं खरीदी, वर्ना  उसका वह क्या करते?

हमारे `चिल्ड्रेन समाज` के सभी बच्चें,  उनकी साइकिल चोरी होने की मन्नतें मानते थे । ऐसे में, जैसे हमारी भगवान ने सुन ली हो, एक दिन उनकी साइकिल सचमुच चोरी हो गई और चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए, उनके और मेरे बड़े भाई के साथ मैं भी थाने गया था । मुझे आज भी याद है, उस वक़्त पुलिस थाने में एक बोर्ड पर साइकिल चोरों के ढेर सारे फोटो चिपकाए, देखकर मुझे बहुत हैरानी एवं आश्चर्य भी हुआ था..!!

आजकल साइकिल ग़रीबों की रोजीरोटी कमाने का एक मात्र साधन होकर रह गया है,चाहे वो चाकू छुरीयाँ तेज़ करनेवाला हो,या साबून-अगरबत्ती-दूध-अखबार बेचने वाला छोटा व्यापारी हो..!! अब तो बचपन में रोमांच जगाने वाले सर्कस भी विलुप्त होने के कगार पर है,वर्ना उसमें बड़ी लंबी-बौनी,ऊँची-नीची साइकिल चलाते जोकर-मसखरों को देखने का आनंद,बचपन में  कुछ अलग ही होता था । और तो और,, अब न तो ड़ाकिये साइकिल पर आते हैं, ना ही पुलिस हवालदार..!! इन सब को, पेट्रोल से तेज़ दौड़ते-भागते, वाहन आज उपलब्ध होने के बावजूद सरकारी कामकाज मानो बहुत धीमा पड़ गया है?

सन-१९७२ की, निर्माता,निर्देशक,लेखक,अभिनेता मनोज कुमार और नंदा-जया भादुरी (बच्चन) की ब्लॉक बस्टर हीट फिल्म - `शोर` में अपने बेटे की खोइ  हुई वाचा का इलाज कराने के लिए, कुछ रुपये जुटाने हेतु, मनोज कुमार अविरत,रात-दिन, सार्वजनिक तौर पर, साइकिल चलाने का बीड़ा उठाते हैं । (उस फिल्म का `एक प्यार का नग्मा है` गाना बहुत लोकप्रिय हुआ था ।) हमारे गाँव के मेले में भी ग़रीब साइकिलवीर अपना पेट पालने के लिए,ऐसे ही अपना हुनर दिखाते थे और कई दिनों तक साइकिल पर ही नहाना-धोना,खाना-पीना जैसी दैनिक क्रियाएं करते थे ।

जब फिल्मों की ही बात चली है तो, साल ५०-६० की फिल्मों में हीरोइन-हीरो को प्यार में डूबने से पहले, एक दूसरे के साथ अपनी-अपनी साइकिल टकराकर सब से पहले तक़रार करना अति आवश्यक होता था । झगड़ा ज्यादा होने पर, कई फिल्मों में तो हीरो या हीरोइन एक दूसरे की साइकिल को पंचर कर देते, या फिर टायर से हवा निकाल देते थे और बाद में उनको सताने के लिए अंटसंट कोई भी गीत गा लेते थे..!!

पंचर से मुझे याद आया, सच बताएगा? क्या आपको अपने बाईक-कार का पंचर करना, उसमें हवा भरना, उसका पहिया बदलना आता है? नहीं ना..!!

आपको अपने वाहन के साथ ऐसा कुछ ग़जब होने पर मेकैनिक को बुलाना पड़ता होगा, पर साइकिल के अपार महिमा के दिनों में, हर इतवार के दिन, हमारे बड़े भैया, साइकिल के करीब सारे पुर्जे खोलकर साफ-सफाई-ऑयलिंग-ग्रिसिंग, किया करते थे, पंचर भी खुद बनाते थे, घर में एक छोटा सा पंप भी होता था, जिससे साइकिल में रोज़ सुबह हवा भरते थे ।

पहले साइकिल एक दूसरे के साथ टकराने पर, ज्यादा से ज्यादा कुछ छोटी-मोटी चोटें और फैक्चर होने का भय रहता था । आजकल, ९०-१०० कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से, बाईक या कार का अकस्मात होने पर, जान गँवाने का भय सताता है ।

पहले साइकिल चलाना सादगी का और शाश्वत तंदुरस्ती का प्रतीक माना जाता था, जिसके विरुद्ध, आज  के दिनों, कार चलाने वालों के घर में चोरी छिपे,एक ही जगह पर खड़ी रहने वाली और पेडल की संख्या गिनने वाली साइकिल के ज़रिए शारीरिक व्यायाम करने का चलन बढ़ रहा है । वैसे शारीरिक व्यायाम के उद्देश्य से ही सही, कोई अमीर इन्सान अगर कहीं साइकिल पर घूमता नज़र आ जाए तो, रुपये-पैसों से बर्बाद हो जाने की आशंका से, उसके बेटे-बेटी के विवाह के लिए, अच्छे रिश्ते आना भी बंद हो जाएं, इतना सारा आडंबर आजकल समाज में फैल गया है..!!

एक ही स्कूटर या बाईक पर `ट्रबल सवारी` द्वारा, सारे खानदान का बोज़ उठाए हुए, साहसिक `ट्रबल सवारीओं` की आवा-जाही देखना आम सी बात हो गई है । पर परिवार में तीन-चार साइकिल का होना जैसे सारे परिवार को शर्मसार करने वाली बात मानी जाती है?

सन-१९६० के दशक में, ऐसा नहीं था । स्कूटर और बाईक रास्ते पर बहुत कम ही दिखते थे, ऐसे में `डबल सवारी` का आनंद सिर्फ साइकिल के डंडे पर बैठ कर ही लिया जाता था ।

ज़रा कल्पना कीजिए, साइकिल के आगे, डंडे पर नयी नवल पत्नी/प्रेमिका को बिठा कर आप कहीं जा रहे हैं, आगे बैठी हुई पत्नी/प्रेमिका का `बारबार लगातार` मुलायम सम्पर्क आपके तन बदन में रोमांचक कंपन पैदा कर रहा है, फिर गेशु-ए-यार से, चंपा-चमेली के तेल की मंद-मंद नशीली ख़ुशबू  आप की नासिका में प्रवेश कर, आपके हृदय में मानो सितार बजा रही है..!! 

हा..य, हा..य, हा..आ..य..!!  क्या समाँ होता था..!!  देखिए, झूठ मत बोलना..!! ऐसी कल्पना भर से,आप के मन में, अभी गुदगुदी शुरु हो रही है ना?  तो फिर?   

मैं तो सच्चे दिल से मानता हूँ, उस वक़्त सस्ती साइकिल पर बैठी पत्नी/प्रेमिका को जितना भरोसा अपने जानु प्रीतम पर था, आजकल  उनको, महँगी कार में, पति/प्रीतम के बगल में बैठकर भी नहीं आता होगा..!!  साइकिल का उपयोग कम होने की वजह से हमारे जीवन में से सारा रोमांच ही चला गया और इसीलिए शायद आजकल तलाक भी ज्यादा हो रहे हैं?  

सन-१९७५ तक, साइकिल पर `डबल सवारी` घूमना क़ानूनन जुर्म माना जाता था,अतः ऐसे `डबल सवारी`करनेवाले सवार, दूर से ही किसी पुलिसवाले को देख लेते तो, साइकिल के डंडे पर बैठी पत्नी/प्रेमिका/मित्र कोई भी हो, उसे साइकिल से नीचे उतार कर, पुलिसवाले को पार (क्रॉस) करके, फिर से उन्हें साइकिल के डंडे पर या पीछे कैरियर पर बिठाना पड़ता था । इसी प्रकार, रात को, साइकिल के पीछे लाल रंग का रिफ्लेक्टर और साइकिल के आगे डायनेमो बत्ती (इलेक्ट्रिक लाईट)या मिट्टी के तेल का लैंप लगाकर ही, साइकिल चलाने का कानून भी अमल में था ।

साइकिल के डंडे पर किसी को बिठा कार घुमाने का सुख सिर्फ पुरुषों के भाग्य में लिखा होगा, इसीलिए साड़ी धारण करनेवाली महिलाओं के लिए, कंपनी वालों ने, आगे बगैर डंडे की, लॅडिज़ साइकिल का निर्माण करना शुरु कर दिया..!! अब महिलाएं, लैडिज़ साइकिल चला तो लेती थीं,मगर उसे स्टैंड करने के लिए, अक्सर पुरुषों की सहायता लेनी पड़ती थी, अब ऐसे में कोई पुरुष को उस साइकिलवाली महिला के आगे-पीछे बैठने की चाहत होती होगी पर, बेचारा क्या करें..!! वहाँ आगे डंडा नहीं और पीछे कैरियर पर बैठने में पक्का अहंकार आड़े आता होगा..!!

हमारे गाँव में एक बंदे ने दूसरी जाति में प्रेम विवाह किया और फिर साइकिल के डंडे पर अपनी पत्नी को बिठाकर रोज़ हमारे घर के सामने से बड़े फख़्र के साथ, निकलने लगे । ये सब देखकर कहीं हमारे संस्कार भी बदल न जाए,ऐसा सोचकर, उसी वक़्त मेरे पिताजी हमें अक्सर घर में बुला लेते थे । बाद में उस बंदे का बेटा जब दो साल का हुआ, तब उसे भी साइकिल के हेन्डल पर लोहे के जालीदार पिंजरें में बिठाकर, साइकिल पर ढाई (२=१/२) सवारी के साथ, उनको आते-जाते मैं ने अक्सर देखा था । ये सब देखकर ईर्ष्या के मारे, उसी वक़्त मैंने भी मन ही मन तय कर लिया था की, मैं भी एक दिन मेरी पत्नी और बच्चों को मेरी साइकल पर बिठाकर इस बंदे के सामने से गुजरुंगा और वह देखता रह जाएगा.!! मगर अब तो मैं चाहूँ तब भी, मेरी पत्नी और बच्चों को, मेरी कार के बॉनेट (ढक्कन) पर बैठने का सुझाव नहीं दे सकता..!! कहेंगे, बुढ्ढा सठिया गया है?    

आप को पता है? आज देश में बाईक-कार के बढते चलन के बावजूद हमारे देश के लिए, यह गर्व की बात है की, भारत आज भी साइकिल उत्पादन में, चीन के बाद सारे विश्व में, दूसरे स्थान पर है । हमारे देश की कार कंपनियाँ, जैसे, मारुति,टाटा,हुन्डाई,महिंद्रा, जनरल मोटर्स, टॉयोटा, हॉन्डा, फॉर्ड, फीयेट, स्कॉडा, हिंदुस्तान मोटर्स, फॉर्स मोटर्स, मर्सिडिझ बेंन्ज़, बी.एम.डबल्यू,वी.डबल्यू, औडी, आई.सी.एम.एल.(रिनो), निस्सान वगैरह के मुकाबले में, देश में साइकिल का उत्पादन दश गुना ज्यादा होता है । 
हमारे देश में प्रति वर्ष, १२०,०००००० (12 million bicycles) का उत्पादन होता है । साइकिल निर्माण की कंपनियाँ, हीरो, एटलस, ए-वन इत्यादि ब्रैंड की साइकिल कंपनीओं का सालाना टर्न ऑवर रुपया-१५० करोड़ का है ।

कुदरती ऑयल के अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ते दाम की वजह से, देश में आम आदमी और मध्यम वर्ग को, महँगाई की मार जिस तरह सता रही है, यह ध्यान में रखते हुए, लोग बाईक-कार को, बीच रास्ते में ही त्याग कर, एक दिन फिर से साइकिल का हेन्डल पकड़ लें, ऐसा युग शायद नज़दीक ही आता दिख रहा है । निरंतर बदलती रहती, इस दुनिया में सबकुछ संभव है..!!

अगर साइकिल के दिन शान के साथ फिर से वापस आते हैं तो ऐसे में रास्ते के एक कोने में सड़ रही बंद बाईक-कार को साइकिल `फिल्म `शोर` का वही गीत गाकर सुनाएगी, "ज़िदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है?"

दोस्तों, मुझे पता है साइकिल का ये लेख ज्यादा  लं...बा,   हो  गया  है, पर क्या करें, साइकिल का महिमा सुनाना मुझे आवश्यक लगा, क्योंकि हम और हमारे परिवार वाले, बाईक-कार के अभ्यस्त हो जाने की वजह से अपने शरीर और पैसे दोनों की बर्बादी करने पर तूले हुए हैं?

बाय ध वॅ बॉस, क्या आप मेरी बात से सहमत हैं?

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०८-०४-२०११.


8.4.11

बाइसिकिल विरुद्ध कार भाग- १



(सौजन्य=गुगल इमेज)


" दो पहियों की यह साइकिल का,कैसा  ग़जब  है  खेल?
  पेट ख़ाली, साँस फूला है,जीवन कैसा अजीब  बे-मेल..!!"

 
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बाइसिकिल विरुद्ध कार (भाग -१)
प्यारे दोस्तों,

हमारे शहर के चौराहे पर रेड सिग्नल के कारण,करीब-करीब सभी वाहन एक दूसरे के पास-पास खड़े हुए थे । अचानक भीड़ के एक कोने में से झगड़े  की आवाज़ सुनाई दी । मानव सहज कौतूहल वश होकर मैं भी  यह तमाशा देखने वहाँ रुक गया ।
 
मैंने देखा, भारीभरकम भीड़ के बीच एक साइकिल सवार, उसके पास में खड़ी हुई ब्राँड न्यू कार पर अपना हाथ रखकर खड़ा था और साइकिल का पैड़ल कार के साथ लग जाने की वजह से कार के दरवाज़े पर कुछ हल्की सी खरोंचे आ गई थीं । अब नयी नवल  दुल्हन जैसी गाड़ी को कोई  फ़ालतू  साइकिलिस्ट  टच  करें, तो कौन गुस्सा  न  हो ? और क्या..!! बस इसी बात पर कार और साइकिलवाले के बीच झगड़ा शुरु हो गया । पहले गाली गलोच और फिर मार-पीट तक की नौबत आ गई ।
 
हालाँकि, ग्रीन सिग्नल के होते ही, लाइन में पीछे खड़े वाहन के अविरत हॉर्न बजाने के कारण कार का मालिक और वह साइकिलसवार बडबडाते हुए अपने-अपने रास्ते  चल  दिए ।
 
आज यह वाक़या याद करने का कारण? सरल है..!! उस दिन, वह कार चालकने, साइकिल सवार को," यु स्टूपिड, स्ट्रीट डॉग?" की गाली दी थीं, ये बात मेरे मन में  आजतक अंकित है । वैसे, मैं आजतक ये समझ नहीं पाया, कार चालकने साइकिलवाले को, `स्ट्रीट डॉग` क्यों कहा था..!!  बहुत चिंतन के बाद मुझे `गली के कुत्ते` और साइकिलसवार  में  कुछ  साम्य  ज़रुर  महसूस  हुआ ।
 
गली के आवारा कुत्ते भी, अच्छी वाली नयी कार को देखते ही, कार और कार मालिक के प्रति द्वेषभाव से, कुछ कर गुजरने के लिए, अप्रतिम साहस, अभिमान, शोर्य,  तिरस्कार जैसे, कई भाव एक साथ चेहरे पर धारण करके, कार के आगे - पीछे सर्वे करने के पश्चात, कार के किसी  एक पहिए को, मानो शुद्ध गंगा-जल से स्नान करा रहा हो, ऐसे लघुशंका का शुभ कार्य, अत्यंत जल्दबाज़ी में निपटाकर, विजयी अदा के साथ, `कॅटवोक` करते हुए अपने कूल्हों को झूलाता हुआ, कुत्ता अपनी कुतिया को साथ लेकर चल देता है ।
 
वैसे, आजतक किसी `कार` वाले `बेकार` इन्सान ने, कुत्ते को ` यु स्टूपीड, स्ट्रीट साइकिलिस्ट..!!` जैसी गाली  शायद ही प्रदान की हो..!!
 
मैं  सोचता हूँ, क्या उस साइकिलसवार को  `स्ट्रीट डॉग` का उपनाम देने वाले कारचालकने खुद अपनी छोटी उम्र में कभी भी तीन पहिए की और पाठशाला जाते वक़्त दो पहिए की साइकिल कभी  चलाई न होगी?
 
ग़रीब को या अमीर, सेकन्ड हेन्ड हो या नयी, तीन पहिए की हो या दो पहिए की, पर बचपन में साइकिल  सीखने का उत्साह और उससे भी अधिक छोटे बच्चों कों कहीं चोट लग न जाए, यही फ़िक्र में हमारी साइकिल के पीछे, सरपट दौड लगाते हुए हमारे बड़े बुझुर्ग की गर्मजोशी, शायद ही कोई आजतक भूल पाया हो..!!
 
मुझे याद है, सन- १९६०-७० तक, साइकिल रिपेयरिंगवाले की दुकान में, छोटे-बड़े सब को, प्रति घंटे के हिसाब से, दस पैसे से लेकर एक रुपये तक किराया वसूल करके, साइकिल भाड़े पर मिलती थीं । (शायद अभी भी मिलती होगी?)

ऐसी ही, भाडे की साइकिल लेकर,  मैंने  साइकिल चलाना सीखा था। हाँ, ये बात ओर है की, साइकिल का हेन्डल कस कर पकड़ने के साथ-साथ अपना बैलेंस संभाले रखने की जद्दोजहद में, साइकिल का पेडल चलाना मैं अक्सर भूल जाता था..!! (नन्हीं सी जान क्या-क्या याद रखें?) परिणाम स्वरूप बगैर पेडल चलाये, साइकिल एकदम धीमा हो कर, कहीं भी खड़ी रह जाती और मैं,  ध..ड़ा..म से, भूमि शरण हो जाता था । कभी-कभी तो मुझे छोटी-मोटी चोट भी लग जाती थीं ।

रोज़-रोज़ मेरी ऐसी चोट-(दार) हालत देखकर एक दिन, मेरे चचेरे बड़े भैया ने मुझे सही तरीके से साइकिल सिखाने का बीड़ा उठाया और साथ में यह प्रण भी लिया, "साइकिल सिखाते-सिखाते चाहें प्राण (मेरे)भी चले जाएं पर, वचन (उसका) न जाए..!!"

साइकिल सिखाने के लिए, किसी समर्थ महाज्ञानी गुरु की भाँति बड़े भैया ने मेरे लिए एक सरल उपाय सोचा..!!

साइकिल चलाते समय, साइकिल के हेन्डल का बैलेंस पर, मेरा ध्यान आराम के साथ लगा सकूँ और मुझे साइकिल का पेडल लगाने की जरुरत न महसूस हो..!! यही सोचकर, वह मुझे साइकिल के साथ, हमारे गाँव के तालाब के ऊँचे टीले की सब से उंची चोटी पर ले गया । उस टीले पर चढ़कर भाई ने साइकिल पकड़कर, मुझे साइकिल पर बिठा दिया । फिर साइकिल को ज़ोर का धक्का देकर , मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया ।

शुरू में थोड़ी दूर तक तो, मैं पैडल उद्यम मुक्ति का आनंद, बड़े चाव से लेता रहा, मगर आधी ढलान तक साइकिल के रगड़ने के बाद, साइकिल ने महत्तम, तीव्र गति पकड़ ली, इतना ही नहीं, तीव्र गति  के कारण साइकिल का हेन्डल दायें-बायें, ज़ोर ज़ोर से हिलने-डुलने लगा..!!

अति गति की दुर्गति में, मानो ये सत्यानाशी भी कम पड रही हो, टीले की ढलान के संकडे रास्ते पर, मेरी डामाडोल होती साइकिल के सामने, सिर पर, पानी से भरे बड़े-बड़े मटके उठाकर आती हुई, कुछ पनिहारीओं को, मैंने देखा..!!

मेरी छठी इन्द्रियने तुरंत मुझे सचेत कर दिया की, अब अकस्मात होना तय है, सिर्फ यही देखना बाकी रह जायेगा की, हम में से किस को, कितनी चोटें आई है..!!  ये भी पता था की, अगर ग़लती से भी, उन पनिहारीओं को  कुछ हुआ, तो मुझे साइकिल के साथ गिरने के बाद भी, उन महिलाओं के हस्तप्रसाद से, अनगिनत अतिरिक्त चोटें भी लगने वाली थीं..!!

इतने में ही, अपनी बातों में मशरूफ उन पानी-(दार) पनिहारीओं ने दूर से, साइकिल पर, उनकी ओर, मुझे सरपट आते देख लिया । कीसी अनहोनी से किनारा करने के लिए, सारी महिलाएं, संकडे रास्ते की  दायीं ओर, तपाक से खिसक गई..!! पर पता नहीं क्यों, मेरे न चाहते हुए भी, मेरी साइकिल का हेन्डल भी, उन पनिहारीओं की तरफ मूड ने लगा..!! फिर से, अपनी ही ओर साइकिल को सरपट आती देखकर, अब कुछ महिलाएं अपन मटका जमीन पर पटककर, गभराहट से, बांयी ओर भागी..!! फिर मेरी इच्छा विरुद्ध, साइकिल का हेन्डल बांयी ओर मुड़ ने लगा..!!  `ये क्या हो रहा है`, मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था? 

प्यारे दोस्तों, इसी लेख का और ज्यादा रोचक `भाग-२` का आनंद आप यहाँ उठा सकते हैं - धन्यवाद ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०८-०४-२०११.

25.2.08

खराब दिन: चोखेरबालियों ने धक्के देकर भगा दिया, पिल्ले के कारण पत्नी ने गरिया दिया

आज जब आनलाइन हुआ और ब्लाग ओपेन किया तो देखा कि डैशबोर्ड में मेरे दो ब्लागों में से सिर्फ एक ही बचा है, और वो है भड़ास। अभी हाल में ही जिस चोखेरबाली ब्लाग का हिस्सा बना था, वो डैशबोर्ड पर गायब था। माने, चोखेरबाली की चीफ माडरेटर ने मुझे बिना बताये, सूचित किये, बिना सो काज जारी किए, मुझ गरीब को धक्के (इसी को तो धक्के देकर निकालना कहा जाता है ना!!!) मारकर ब्लाग से बहरिया दिया। मजेदार तो ये देखिए कि आज मेरा दिन सुबह से खराब चल रहा है। हर जगह कुछ ऐसा हो रहा है कि मन और दिल छोटा हुआ जा रहा है। इसी सब चक्कर के कारण आज आफिस भी सेकेंड हाफ में लंच के बाद पहुंचा और ब्लाग ज्यों खोला तो देखा कि चोखेरबालियों ने मेरे साथ छल कर दिया है। मेरे जैसे सीधे साधे दिलवाले बंदे को जाने किस दुश्मन के कान भरने के कारण अपने साये से जुदा कर दिया। अब तो सिर्फ वियोग, जुदाई और आह है जुबां पर। इसी वक्त में गीता का वो वचन याद आता है....वत्स, जो हुआ, वो अच्छे के लिए हुआ, जो हो रहा है, अच्छे के लिए हो रहा है, जो होगा, अच्छे के लिए होगा। धन्य हो अपना हिंदू धर्म जो हर हाल में जीने के लिए तर्क मुहैया करा देता है वरना लाखों करोड़ों भारतवासी मारे डिप्रेशन के रोज रोज आत्महत्या कर रहे होते।

आज जो दिन खराब चल रहा है उसके पीछे वजह सिर्फ और सिर्फ स्त्रियां हैं।

सुबह से मेरी पत्नी मेरा भेजा खा रही हैं, पानी पी पी कर गरियाते हुए। हुआ यूं कि कल आधी रात को जब पान खाने चौराहे पर निकला तो एक मरिया सा बच्चा सा देसी पिल्ली कुनकुनाता हुआ मेरे पैरों के पास आ पहुंचा और लगा मेरा पैंट फाड़ने, अपने प्यारे से छोटे से नुकीले दांतों से। फिर लगा पैर की अंगुलियां सूंघने, चूमने। उसके बदन की हड्डियां दिख रही थीं। मैंने उसे गौर से देखा और उसकी हरकत पर मुझे प्यार आ गया। मैंने उसे गोद में उठा लिया और मुंह में पान दबाने के बाद अपने घर पहुंचा। सकल परिवार निद्रा में था, सो उसे एक खाली कमरे में, जहां अतिथि लोगों के रुकने की व्यवस्था है, एक जगह प्यार से बिठा दिया। उसे मुर्गे की टंगड़ी दी जिसे एक बार मैं खुद साफ करके डस्टबीन में रखे हुए था। वो प्यारा पिल्ला यूं पूंछ हिलाते हुए कूं कूं करके खा रहा था कि मेरा रोम रोम पुलकित हो गया। मैंने मन ही मन तय कर लिया कि मुझे अब इस पिल्ले को एक अच्छी जिंदगी प्रदान करनी है।

मैंने अपने एक सीनियर मित्र को फोन किया चंडीगढ़, जिनके छोटे भाई पशुओं के डाक्टर हैं, डाक्टर साहब का नंबर लेने के लिए कि अगर सड़क पर खेला खाया देसी पिल्ला घर ले आया हूं तो उसे कौन कौन सी सुई लगवा दूं ताकि मेरे जैसे शहरी को कोई रोग न हो सके। असल में मेरे अंदर का हेल्थ वाला जिन्न जाग गया था कि कहीं ऐसा न हो जाए, साला जिसे मैं प्यार कर रहा हूं वो पिल्ली मुझे कोई गंभीर रोग दे जाये, दिमागी बुखार, मियादी बुखार, प्लेग टाइप का। सो, मैंने उनसे नंबर लिया पर डाक्टर साहब का फोन लगातार बिजी जा रहा था। खैर, पिल्ले को खिला पिलाकर बढ़िया से एक स्टूल के नीचे बिछौन बिछाकर सुला दिया और मैं भी खुशी खुशी दूसरे कमरे में सो गया। सुबह मेरी नींद तब खुली जब श्रीमती जी चिल्ला रहीं थीं, कि ये आदमी तो सुधरेगा नहीं। रोज कोई न कोई बवाल। पता नहीं कहां से यह सड़ा पिल्ला लाकर रख दिया घर में, पूरा हग मूत के गंदा कर दिया। बाप रे....रात का नशा वैसे ही सुबह होने के कारण हिरन हो चुका था, रही सही ऊर्जा श्रीमती जी की चिल्लाहट के चलते खत्म हो गई। सो, सुबह के वक्त इतनी बुरी बुरी बातें कान तक न पहुंचने देने के लिए मैंने रजाई को चारों तरफ से खींचकर भींचकर उसके भीतर मुंह छिपा लिया। और गंभीर नींद में होने, सोने का नाटक करने लगा।

पर....बच न पया।

खुद मुझे उस कमरे की सफाई करनी पड़ी ताकि मणिमाला दीदी (श्रीमती जी का नाम है भइया) का गुस्सा कम हो सके। सच्ची बताऊं, जब मैं पिल्ले का गुह साफ कर रहा था तो उसकी बदबू से मुझे उबकाई आते आते रह गई, लगा आज असली में उलटी कर दूंगा (भड़ास पर तो शाब्दिक उलटी करते हैं)। पर जय भगवान जी, सांस रोकककर, करेजा मजबूत कर साफ सूफ किया। इस दरम्यान मैं यह तक पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि मेरा प्यारा पिल्ला है कहां। मुझे खुद समय़ में आ चुका था कि प्यारे पिल्ले के मुझ जैसे मालिक की इस कदर घिग्घी बंधी हुई है तो पिल्ला महोदय को जाने कब गांड़ पर दो लात मारकर सड़क का रास्ता दिखा दिया गया होगा।

सबसे दुखद यह रहा कि सोचकर पिल्ला यह लाया था कि बच्चे खुश होंगे। पर बच्चे सुबह से ही मेरे खिलाफ हो चुके थे और माला दीदी के सुर में सुर मिला रहे थे। उस साले पिल्ले ने बच्चों की किताबों पर सू सू कर दी थी सो बच्चों का नाराज होना लाजिमी था।

भइया....किसी तरह जान छुड़ाकर आफिस पहुंचा तो यहां चोखेरबाली को अपने से गायब पाया। हे भगवान, कहीं किसी ने तंत्र मंत्र तो नहीं कर दिया कि इस फागुन में तुझे स्त्रियों का बैर झेलना होगा। अगर कोई भड़ासी ज्योतिषी या तांत्रिक हो तो कृपया मेरी कुंडली वुंडली देखकर बताये कि कौन सा ग्रह किस ग्रह की गांड़ में घुसा है जिससे ये सारी दिक्कतें आ रही हैं।

जय भड़ास
यशवंत