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15.5.09

...तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की आदत....

विनीत जी, एक बात और, आपने लिखा है...

...............इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि....आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर... को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है......

उपरोक्त जो न्याय करने की आपकी बौद्धिक मुखमुद्रा है, वह दिक्कत पैदा करने वाली है और बहस को आगे बढ़ाने से रोकती है। यह खुद को पंच, महंत और मठाधीश मानकर कही गई बात है। संजय तिवारी, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी ये सभी लोग अगर कोई पहले से ही कोई धीर-गंभीर महंतई नुमान निष्कर्स निकालकर प्रयोग करेंगे तो तय मानिए पिटेंगे। आप जब प्रयोग करते हैं तो आपको बेहद खुले दिल दिमाग से सब कुछ रिसीव करना होता है और उन्हें एनालाइज करना होता है। कई बार डाक्टर किसी को बता देते हैं कि आपको एड्स के लक्षण हैं, आपको हेपाटाइटिस है लेकिन जब वो बारीकी से ठीक जगह चेक कराया जाता है तो पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं है लेकिन वो बेचारा मरीज खुद को एड्स व हेपाटाइटिस का मरीज मानकर अपना आधा खून सुखा चुका होता है।

आपने एक लाइन में इस छोर और उस छोर वाली जो नारेबाजी युक्त सरलीकृत लाइन खींच दी है उससे आपने लोगों को मजबूर कर दिया है वे न खुलें और इसी लाइन रूपी मानक के इर्द गिर्द अपने विचार प्रकट करें। हो सकता है कोई मेरे जैसा हो जो साफ-साफ बताना चाहे कि वो अपने मार्केटिंग व बिजनेस के एक्सपीरियेंस के दौरान किस तरह कंपनियों के साथ बातचीत करता है, उनसे एसोसिएशन बनाता है, तो वो तो कुछ नहीं करेगा क्योंकि उसे लगेगा कि यहां तो गांधी जी की औलादें बैठी हैं और वो बेचार कहां धन कमाने के लिए यहां वहां भटकने वाला सामान्य सा आदमी।

भाई, कौव्वों की तरह किसी पर तुरंत कांव-कांव करने का काम अगर मेरे चिर विरोधी कर रहे होते तो उन्हें मैं कुछ नहीं कहता क्योंकि चरम मूर्ख और मंद बुद्धि को आप कुछ सिखा ही नहीं सकते और न ही उनसे कोई उम्मीद कर सकते हैं। मूर्ख व मंद बुद्धि कहीं जाएगा तो सबसे पहला काम वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन अपने बोलने से करेगा, वो अपनी बात नहीं करेगा, दुनिया जहान और दूसरों की लंबी-लंबी बात पेलेगा। हो सकता है एकाध मूर्ख मेरे लिखे पर गरियाने इस ब्लाग पर भी कमेंट देने आ जाएं :) लेकिन जब बात विनीत कुमार की हो रही है तो उम्मीद बंधती है कि चलो अपने समय में एकाध दो ऐसे लड़के खड़े हो रहे हैं जो चीजें को बेहद रीयलिस्टिक, माडर्न एप्रोच और तटस्थ तरीके से एनालाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। ध्यान रखिए, जल्दबाजी कभी मत करिए। किसी सूचना व तथ्य पर जब तुरंत कोई निष्कर्स निकालते हैं तो वो कुछ और होगा और थोड़े बहुत नए इनपुट व एंगल के बाद थोड़ा ठहरकर निकालेंगे तो कुछ और निकलेगा। तर्क मैथ और साइंस की तरह नहीं होता जिसमें आप दो दूना चार कर देते हैं और चैलेंज कर देते हैं कि दो दूना चार के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। एक ही चीज के लिए लाख तरीके के निष्कर्स निकाले जा सकते हैं, यह तर्क की खूबी और खराबी होती है। यह तर्क करने वाले पर होता है कि उसे साबित क्या करना है। तो कोशिश यही हो कि चीजें ज्यादा रीयलिस्टिक और माइक्रो एनालिसिस लिए हुए हों, निष्कर्स निकालने का काम हमेशा पाठकों पर छोड़िए। जनता की तरह पाठक भी बहुत समझदार होता है, वो हर गाली और हर आशीर्वाद का मतलब समझता है।

तुरंत न्याय करने वाली और तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की प्रवृत्ति जिसमें हम किसी को तुरंत चोर और किसी को तुरंत महान बता देते हैं, दरअसल यह भी मालिक के नौकर वाली मानसिकता व माहौल की उपज है। उसी पाखंड की उपज है जिसमें आमतौर पर चोर महाराज अपने अपराधबोध को कम करने के लिए महान की मुद्रा में होते हैं और जो वाकई ईमानदार है वो अपनी ईमानदारी के आत्विश्वसा में ऐसा कुछ कर कह जाता है कि उस पर बेईमान का लेबल चस्पा हो जाता है। यही जल्दबाजी, न्यायपूर्ण और पाखंड भरी मुखमुद्रा आप लोगों से कभी भड़ास डाट काम पर दलाली होती है तो कभी यशवंत बलात्कारी हिंदी की महान शैतान कथा जैसी पोस्टें लिखने-लिखाने पर मजबूर करती हैं। आमतौर पर हम हिंदी वाले इन फतवों से बहुत डरते हैं लेकिन जिस दिन इन फतवों को जीवन का जरूरी हिस्सा मानकर सहज रूप से लेते हुए अपने को एकाग्र कर आगे चलने की कोशिश करना सीख लेते हैं, उस दिन लगने लगता है कि यार हम अब तक कहां और किस तरह के माइंडसेट के लोगों के बीच जी रहे थे!!!!!!!

संजय जी के आर्टिकल पर किसी पवनसुत ने एक लाइन का कमेंट किया है कि चुनाव में माल कमाने के बात दुकान बढ़ा रहे हो भाई। ये कमेंट संजय जी को विचलित कर गया। यह संजय जी का आंतरिक द्वंद्व है जिसमें वो किसी भीड़ की तरफ से उछाले गए जुमले से प्रभावित हो जाते हैं। आप ये मानकर चलिए कि जब आप भीड़ से थोड़ा उपर उठते हैं तो भीड़ आपको अपने हिसाब से एनालाइज करती है। कुछ बताएंगे कि चोरी से बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि दलाली किया है, कुछ कहेंगे कि मेहनती और प्रतिभाशाली था, इसलिए बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि कोई विकल्प नहीं था इसलिए मजबूरी में बढ़ गया है..... जाकी रही भावना जैसी।

संजय तिवारी जी की पोस्ट पर मैंने जो कमेंट किया है, उसमें संजय जी के दर्द को ही आगे बढ़ाया है, अपने अऩुभव को उड़ेलते हुए। संजय जी अपनी पीड़ा कह गए, हो सकता है यह पीड़ा शैलश जी और मैं कुछ दिन बाद कहूं या फिर हो सकता है कि हम लोग हाथ पांव मारकर अपने को जिला ले जाएं ...कुछ भी हो सकता है क्योंकि हम नए और कच्चे खिलाड़ी हैं बाजार के खेल के।

पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, रिलायंस और धीरूभाई अंबानी पर उस जमाने में भ्रष्टाचार के इतने आरोप, किस्से, चर्चे क्यों थे.....??? मेरे एक वरिष्ठ उद्यमी मित्र ने बताया कि धीरूभाई अंबानी देश के बड़े उद्यमियों की जमी-जमाई जमात में अच्छे खासे तरीके से घुसपैठ कर रहे थे और उन स्थापित व परंपरागत अरबपतियों के धंधे को चुनौती पेश कर रहे थे इसलिए उन सभी ने मिलकर प्रेस व सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए धीरूभाई को खलनायक साबित कराने की भरसक कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए। उस मित्र का कहना है कि धीरूभाई ने उतना ही या उससे भी कम भ्रष्टाचार किया था जितना वे जमे-जमाए उद्यमी करते थे लेकिन धीरूभाई आरोपी इसलिए बन गए क्योंकि उन्हें बाजार के स्थापित दिग्गज यूं ही अपने बराबर खड़ा देख पाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी दुनिया में किसी देसी और नए का घुसपैठ मंजूर नहीं था। उनकी इलीट मेंटलटी उन्हें उकसा रही थी कि इस नए उद्यमी को नष्ट करो वरना हम सबके धंधे को चौपट कर देगा। बड़ी बड़ी कंपनियां सत्ता और विपक्ष में बैठे लोगों को अरबों-खरबों का चंदा इसलिए देती हैं क्योंकि उन्हें सरकारों से अपने अनुकूल नीतियां बनवानी होती हैं।

यह एक रुटीन और सहज कार्य है जो हर देश में संपादित किया जाता है लेकिन यह इतना उच्च भ्रष्टाचार होता है कि इस भ्रष्टाचार को सीबीआई रा सीआईडी जैसी तमाम खुफिया संस्थाओं के ईमानदारी के राडार कैच ही नहीं कर पाते। ऐसा क्यों है कि अनिल और मुकेश अंबानी चुनाव नतीजों से ठीक पहले आडवाणी समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मिलने लगे हैं, क्योंकि सरकार बनवाने गिराने में इन धनपशुओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। तो ये काम उद्यमी बहुत पहले से करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे क्योकि इनके टर्मनोलोजी में यह सब कुछ करना कतई भ्रष्चाचार नहीं होता बल्कि यह उनके जीवन जीने के हिस्से का अनिवार्य 'नैतिक अंग' होता है।

नीत्शे को मैं सपोर्ट नहीं करता लेकिन उनकी जो बात है, गुलाम मानसिकता और प्रभु मानसिकता, वो काफी कुछ आधुनिक लोकतंत्रों में देखने को मिल जाता है। नीत्शे के हिसाब से देखें तो हम लोग ब्लाग पर ये जो कुछ अल्ल बल्ल सल्ल कर रहे हैं ये गुलाम मानसिकता वालों की चोंचलेबाजी है जो अपना जीवन आदर्श व सिद्धांतों के द्वंद्व के बीच ही गंवा-गुजार देते हैं। नीत्शे के मुताबिक प्रभु मानसिकता वालों के एजेंडे में ये ईमानदारी, नैतिकता, मानवीयता, करुणा जैसे शब्द होते ही नहीं। उन्हें हमेशा विजेता रहना है इसलिए वे किसी भी तरह विजेता रहना चाहते हैं और विजेता बनने के लिए वो सब कुछ करते हैं जिससे विजेता बनने की राह आसान होती हो। पर नीत्शे को सपोर्ट नहीं किया जा सकता। नीत्शे जैसे लाखों दर्शनशास्त्री हैं और इन्हें पढ़कर केवल यह जाना जा सकता है कि मनुष्यों के दुनिया देखने के तरीके कितने हैं और हमारा खुद का तरीका क्या है।

तो विनीत जी, आपसे गुजारिश है कि बहसों का निष्कर्स शुरू में ही मत निकाला करिए। यह गलती पहले मैं भी करता था लेकिन मुझे अब लगने लगा है कि मैं कुछ नहीं जानता। मुझे बहुत कुछ जानना सीखना है। जिस दिन यह समझ गया उस दिन से मैं अब कहीं भी खुद के विचार लिखने से परहेज करने लगा हूं क्योकि मैं वो नहीं लिखना चाहता जो मैं महसूस नहीं करता और जो जीता नहीं।

आभार के साथ
यशवंत

(यह कमेंट विनीत कुमार के ब्लाग गाहे-बगाहे पर प्रकाशित पोस्ट "संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ?" पर प्रकाशित किया गया है)

.........ये जो मालिक लोग हैं और ये जो उनके नौकर लोग हैं.........

विनीत जी,

आजकल मैं कुछ इस तरह से सोच रहा हूं..............मान लीजिए कि एक दुनिया है, जिसमें दो तरह के लोग होते हैं, एक मालिक लोग, दूसरे मालिक की कंपनियों में नौकरी करने वाले लोग। ये जो मालिक लोग हैं, उनका सोचने का तरीका बिलकुल अलग होता है। उनके घर पैदा हुआ लौंडा बचपन से ही बिजनेस, कंटेंट, प्रोडक्ट, मार्केटिंग, रेवेन्यू, मैन पावर, रिसेसन, प्राफिट, शेयर, सेंसेक्स, वेंचर, प्रोजेक्ट, इनवेस्टमेंट, शेयरहोल्डिंग, इनफ्रास्ट्रक्चर, इकानामिक पालिसी जैसे दर्जनों विशिष्ट शब्दों को सुनते-सीखते बढ़ता है और फिर सहज स्वाभाविक रूप से अपने बाप के अब तक के सफल (पूंजी के लिहाज से) काम को और ज्यादा सफल बनाने के लिए हर माडर्न हथियार (टेक्नालाजी, मैनेजमेंट, विजन..) का इस्तेमाल करते हुए जुट जाता है। इस मालिक की कंपनियों में काम करने वाले जो दूसरे तरह के लोग होते हैं, उनके लौंडे बचपन से गांधी जी, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, नौकरी, सिपाही, डिप्टी कलेक्टर, किसानी, भाईचारा, नैतिकता जैसे धीर-गंभीर शब्द सुनते-सीखते हैं और जब बड़े होकर बाजार में उतरते हैं तो अपने को या तो इस बाजार में फिट नहीं पाते या फिर बाजार को कोसते हुए खुद को अलग कर लेते हैं। जो बाजार में घुस जाते हैं वे काफी लंबे समय तक बाजार के फंडे को सीखने बूझने में ही वक्त लगा देते हैं और जब तक सीख समझ पाते हैं तब तक उनके रिटायरमेंट की उम्र आ जाती है।

गांव में जिस गाय-भैंस खरीदकर पशु मेले में बढ़े दाम पर बेचने वाले को दलाल कहा जाता है, इसी मुनाफे के शहरी, नियोजित और आधुनिक खेल खेलने वालों को इंटरप्रेन्योर, उद्यमी या शेयर ब्रोकर कहा जाता है। जब कोई देसज हिंदी वाला मालिक लोगों की श्रेणी में आने की कोशिश करता है तो उसकी पहली लड़ाई खुद उसी की विचारधारा से होती है। यह आंतरिक वैचारिक जंग अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग समय तक और अलग-अलग लेवल पर चलती रहती है। यह डिपेंड करता है उस व्यक्ति के माइंडसेट, उसके अनुभव, उसके पलने-पढ़ने के माहौल और सोचने के तरीके पर। जितने भी दिनों बाद, इस वैचारिक जंग में अगर आप जीतकर मालिक के माइंडसेट के करीब पहुंच जाते हैं तो आप फिर स्पष्ट विजन और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ पाते हैं।

मुनाफे और लाभ की कोई नैतिकता नहीं होती, बल्कि यूं कहें कि मुनाफा और लाभ मूलतः अनैतिक चीज है तो कोई गलत नहीं है लेकिन यह सिस्टम इस तरह बनाया जा चुका है कि बिना मुनाफे कमाए न तो किसी किराने वाले की दुकान चल सकती है और न ही अंबानी जी की कंपनी। बिना अतिरिक्त रकम कमाए न तो कोई ब्यूरोक्रेट जी सकता है और न ही कोई राजनेता। मैं उन राजनेताओं और ब्यूरोक्रेटों की बात कर रहा हूं जो मुख्यधारा में हैं, जो सत्ता के नजदीकी हैं। सत्ता का करीबी ब्यूरोक्रेट अगर अतिरिक्त कमाई नहीं भी करता है तो वह उद्यमियों कंपनियों द्वारा तरह तरह से ओबलाइज किया जाता है। तो यह जो मुनाफा और लाभ है, वह कमाने वाले के उपर होता है कि वह अपने मुनाफे और लाभ को कितना कानूनी चोला व सामाजिक जामा पहना कर दूसरी श्रेणी वाली जनता उर्फ जनता से बने समाज को दिखा पाता है। जितना नंबर एक में दिखा पाया, दिखा दिया, बाकी दो नंबर के धन के बारे में कितना कुछ कहा लिखा जा चुका है, सब जानते हैं।

संजय जी 24 कैरट वाले पत्रकार और मनुष्य हैं। वे जिस सदभावना और नेकनीयती की अपेक्षा समाज से रखते हैं, वो सदभावना और नेकनीयती अब समाज की मानसिकता में बची नहीं क्योंकि समाज की सदभावना और नेकनीयती को अतीत में ढेरों चिटफंड कंपनियों, नेताओं, अफसरों, चोरों, उचक्कों, दलालों ने कई कई बार ठगा है इसलिए सहज रूप से किसी पर भरोसा न करने की जो प्रवृत्ति डेवलप हो रही है, वह बाजार अनुकूल जरूर है लेकिन समाज व मनुष्यता विरोधी है।

पर क्या करा जाए पार्टनर, लाख गाल बजाने के बावजूद आप और हम, इसी बाजार के कल पुर्जे हैं और हम सभी कम या ज्यादा नैतिक, अनैतिक, पाखंडी, हिप्पोक्रेट, सहज होकर हंसते-रोते इसी से जी खा रहे हैं। हर आदमी को खुद अपने लिए तलवार की धार तय करना है कि वह कितना बाजारू बनेगा, कितना अनैतिक बनेगा, कितना सामाजिक रहेगा, कितना मानवीय रहेगा, कितना लोकतांत्रिक रहेगा, कितना नैतिक रहेगा। इन्हीं मीडिया हाउसों की जिस नैतिकता की हम लोग बात करते हैं, वह भी तलवार की धार की तरह ही है। इस तलवार की धार को हर मीडिया हाउस अपने लिए अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित करता है और जीता है। एनडीटीवी अपने चेहरे को ज्यादा मानवीय और नैतिक बताकर ज्यादा प्राफिट कमाने में जुटा रहता है तो वायस आफ इंडिया खुले तौर पर पैसे उगाहने में जुटा रहता है। काम दोनों एक ही कर रहे हैं लेकिन दोनों के आंडबर अलग-अलग हैं। दोनों की शब्दावलियां और दोनों के बाडी लैंग्वेज अलग-अलग हैं। कुछ उसी तरह जैसे एक प्रोफेशनल काल गर्ल प्रोफेशनल तरीके से क्लाइंट पटाकर ज्यादा माल मुनाफा कमा लेती है और वहीं ट्रेडिशनल वेश्या कुछ नोटों पर तन देने के लिए तैयार बैठी रहती है लेकिन उसकी तरफ थर्ड ग्रेड के क्लाइंट भी मुश्किल से ही पहुंच पाते हैं।

मैं इन सारे विषयों पर अलग से लिखने के मूड में हूं क्योंकि हिंदी वाले देसज लोगों के माइंडसेट में बदलाव की जरूरत है। हम नहीं कहते कि आप बेइमान बनिए लेकिन किसी बेइमान के अंडर में ईमानदारी से काम करते हुए भी आप कितने इमानदार रह पाते हैं, कहना मुश्किल है। आप फिर कहीं न कहीं उस बेईमान के धंधे को ही बढ़ाने का काम कर रहे हैं और इस प्रकार आप भी बेईमानों की जमात में शामिल हैं। तो ये जो ईमानदारी और बेईमानी जैसे शब्द हैं, इनकी माइक्रो व्याख्या की जरूरत है।

इस मुद्दे पर काफी कुछ कहना चाहता हूं लेकिन कमेंट में ही पोस्ट लिखने की स्थिति आ चुकी है, इसलिए विराम दे रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि इस बहस को स्वस्थ उद्देश्य के लिए आगे बढ़ाएंगे, खुद को अति ईमानदार और अति विद्वान साबित करने के परंपरागत और सामाजिक मोह-आग्रह के बगैर।

(यह कमेंट विनीत कुमार के ब्लाग गाहे-बगाहे पर प्रकाशित एक पोस्ट संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ? पर प्रकाशित किया है।)

9.6.08

वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को!

विनीत खरे ने अपनी नीचे लिखी पोस्ट में (गूगल करे तो टेक्नालजी, कोई और करे तो अश्लीलता) गूगल पर पर कुछ आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि हिंदी लैंग्वेज में गूगल को कनवर्ट करने के बाद अगर सर्च में एस लिखिये तो गूगल अपने आप हिंदी के सेक्स वाले ढेर सारे आप्शनल सर्च के शब्द मुहैया करा देता है। इस चीज को उन्होंने गलत ठहराया। उन्हीं की पोस्ट पर एक सज्जन ने कमेंट कर तस्वीर का दूसरा रूप दिखाया है। इनका कहना है कि हम हिंदी वाले जो चीज सबसे ज्यादा सर्च करते हैं, उसी को गूगल हमें आटो सजेस्ट करता है क्योंकि उसकी तकनीक आटोमेटेड है। कहने का आशय यह कि पहले हम्ही यह काम करते हैं, फिर गूगल हमें सुझाता है।

लीजिए, विनीत की पोस्ट पर आए कमेंट को पढ़िए

यशवंत
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ab inconvenienti has left a new comment on your post "गुगल करे तो टेक्नोलॉजी, कोई और करे तो अश्लीलता !!":

वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को!

आप गूगल के बारे में इतना सब जानते हैं तो फ़िर यह भी मालूम ही होगा की ऑटोसजेस्ट एक स्वचालित प्रक्रिया है, इसमें प्रदर्शित शब्द हिन्दी में अब तक के सबसे अधिक खोजे गए शब्द हैं.

अब अगर ठरकी हिन्दी वाले यही सब सर्च करते हैं तो बेचारा गूगल क्या करे?

गूगल 43 भाषाओं में सर्च की सुविधा देता है, पर वह चूँकि हिंदुस्तान की अति पावन संस्कृति षडयंत्र के तहत विनष्ट करना चाहता है, इसीलिए हिन्दी ऑटो सजेस्ट में ऐ से जेड तक हर अक्षर में अश्लील शब्द जानबूझकर घुसा दिए गए, हम उसका मरते दम तक विरोध करेंगे!

(और 'एस' क्या सभी अक्षरों में ऐसे ही शब्द ऑटो सजेस्ट हो रहे हैं, ज़रा ये भी पता लगा लें की हिन्दी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग (और शायद सबसे लोकप्रिय साईट भी) मस्तराम मुसाफिर ब्लॉग पर रोज़ कितने हिट्स/कमेंट्स आते हैं)


Posted by ab inconvenienti to भड़ास at 9/6/08 2:20 PM

13.2.08

विदेशी धन से चलने वाली सराय जैसी दुकानों से इन दिग्गज ब्लागरों को लगाव कैसा? --अफलातून

भड़ास और मोहल्ला दोनों पर ही अविनाश जी ने एक पोस्ट के जरिए सभी भाई-बंधुओं से सराय संस्था द्वारा हिंदी ब्लागिंग पर आयोजित की गई आज की मीटिंग में हजारों-लाखों की संख्या में चलने का आह्वान किया। मैं जा न सका, वृंदावन-मथुरा में दो आफिसियल मीटिंग्स में गया था। एकाएक जाने का प्रोग्राम तय हुआ था। सो, इस मीटिंग से वंचित रहा। पर आज शाम जब दिल्ली पहुंचा हूं तो अविनाश द्वारा भड़ास और मोहल्लो- दोनों ब्लागों पर लिखित पोस्टों के नीचे बनारसी भाई अफलातून जी के कमेंट पढ़ने को मिला। कुछ देर के लिए मैं इसे पढ़कर सोचने लगा। क्या यह सवाल अफलातून जी ने यूं ही किया है या इसका कोई सीरियस पक्ष भी है। जहां तक मैं अफलातून जी को जानता हूं, वे कभी कच्ची बातें और ओछी बातें नहीं करते। वे कहते-बोलते हैं तो उसके एक तार्किक मायने होते हैं, जिससे आप सहमत और असहमत हो सकते हैं। तो फिर ये जो कमेंट है इसे बेहद सीरियस मामला मानना चाहिए और अविनाश जी समेत मसिजीवी, नीलिमा, मैथिली जी, सुनील दीपक को भी अफलू भाई के सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए ताकि कहीं किसी तरह के शक की गुंजाइश न रहे। इसी मकसद से हम अफलातून जी द्वारा उठाए गए सवाल को यहां हू ब हू प्रकाशित कर रहे हैं...जय भड़ास, यशवंत))


Aflatoon has left a new comment on your post "आज ब्‍लॉग संगत है, हजारों-लाखों में आएं":

अविनाश,
विदेशी धन(फोर्ड फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं के पैसे से) पर चलने वाली दुकानों से अविनाश जैसों का लगाव देख कर दुख हो रहा है। सराय , csds जैसी दुकानों के द्वारा बौद्धिक साम्राज्यवाद कैसे फैलाया जाता है उससे हिन्दी चिट्ठेकारों को सावधान होना होगा। मसिजीवी - नीलिमा अब यह भी बतायें कि 'चोखेर बाली'का 'सराय' जैसी दुकान से कोई सम्बन्ध है या नहीं?मैथिलीजी या सुनील दीपक विदेशी फन्डिंग एजेन्सियों से धन ले कर चलने वाली दुकानों के बारे में क्या सोचते हैं-यह उन्हें बताना होगा।

Posted by Aflatoon to भड़ास at 13/2/08 2:05 PM