13.11.08
मेरी ब्लॉग यात्रा!
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Anonymous
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Labels: डॉक्टर रुपेश, यशवंत सिंह, यात्रा, रजनीश, विनीत उत्पल
30.3.08
दिल्ली-अहमदाबाद-मुंबईः पहली जहाज यात्रा, पहली मुलाकातें, उनकी बातें, वो ढेर सारी यादें......
तीन चार दिनों की यात्रा के बाद आज दोपहर दिल्ली पहुंचा तो भड़ास पर अंदर बाहर ढेर सारा पानी बह चुका था। अंदर माने इनबाक्स में मेल सैकड़ों की संख्या में पड़े थे और बाहर माने भड़ास पर ढेर सारी चीजें लिखी पढ़ी कही जा चुकी थीं। मनीष की संगीता पर पोस्ट और उस पर प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि भड़ास दरअसल अब वाकई एक वैकल्पिक मीडिया का रूप लेता जा रहा है। पारंपरिक मीडिया जिन मुद्दों और बातों को छू तक नहीं सकता, भड़ास जैसे कम्युनिटी ब्लाग पर वे बातें पूरी बेबाकी से आती हैं और लोगों को सोचने व करने पर मजबूर कर देती हैं। लगे रहिए दोस्तों, ऐसे ही छोटी चीजें कभी बड़ी बना करती हैं और ऐसे ही छोटी चीजें कभी बड़े आंदोलन का रूप ले लिया करती हैं। इस दौरान मुश्किलें भी हजार आती हैं लेकिन अगर माद्दा है तो फिर फौलादी सीने तूफानों से टकराया करते हैं। कीप इट अप। मनीष से प्रेरणा लेकर हिंदी के ढेर सारे पट्ठों, शेरों, शूरवीरों, बहादुरों को अपनी चुप्पी तोड़कर हिंदी के विजय के इस दौर में आनलाइन माध्यम में हिंदी में लिखना और अपनी न कही गई बातों को प्रकाशित करना शुरू कर देना चाहिए। भड़ास आपकी मदद के लिए तैयार है।
मैंने अपनी पहली हवाई यात्रा उसी रोमांच के साथ की जिस रोमांच के साथ मैंने जीवन में पहली बार साइकिल चलाना सीखा था। जहाज पर बैठने के बाद मेरी गुर्दन मुड़ी ही रही, नीचे धरती को एकटक देखता और निहारता रहा। किस तरह धरती की हर चीज धीरे धीरे छोटी होते होते एकदम से अदृश्य हो गईं और बादलों का संसार धरती पर कब्जा जमाए दिखा। बड़े बड़े शहर यूं नजर आए जैसे चींटी। नदियां, पहाड़, शहर, गांव सब एक ऊंचाई पर आने के बाद एकाकार हो गए और सब कुछ धुआं धुआं बादल बादल धूसर धूसर मिट्टी मिट्टी पानी पानी प्रकाश प्रकाश आसमान आसमान के रूप में दिखने लगा।
मुझे जो निजी तौर पर दिक्कतें आईं उसे जरूर बताना चाहूंगा। मैं सीट बेल्ट बांध नहीं पाया। जिधर से बांधने की कोशिश कर रहा था वो उल्टा वाला साइड था। आखिरकार पसीना पोंछते हुए मैंने अपने पड़ोसी से पूछा...भइया, इ बेल्टवा कइसे बांधा जाता है...। उस उन बंधु ने अपने चेहरे पर बिना यह शो कि लगता है तुम देहाती हो, पूरे सम्मान के साथ फटाक से मेरा बेल्ट बांध दिया और इस कदर फिर अपने काम में डूब गये जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मैं अपेक्षा यह कर रहा था कि वो थोड़ा मुस्करायेंगे, पूछेंगे, समझायेंगे....पर ऐसा कुछ न हुआ। शरीफ आदमी थे।
दूसरी दिक्कत ये रही कि सुबह पांच छह गिलास पानी पीने के आदत के चलते जब एयरपोर्ट पर पहुंचा तो सू सू करने की स्थिति बन गई थी लेकिन मैं इसलिए ज्यादा दाएं बाएं नहीं घूमा टहला कि कहीं कोई समझ न ले कि इ ससुरा पहली बार आया लगता है...बोले तो मन ही मन तय कर लिया था कि अबकी एक अच्छे देहाती की तरह चुपचाप सब भांपना देखना है और जहाज पर चढ़कर यात्रा कर के नीचे उतर लेना है। अगली बार दो कदम और आगे बढ़ेंगे और मूतेंगे भी। तो सू सू करने का जो प्रेशर बना था उसे हवाई जहाज में भी दबाए रहा। हालांकि मैं देख रहा था कि भाई लोग किस तरह उठ उठ कर टायलेट की तरफ जा रहे थे पर मैंने रिस्क नहीं लिया। दूसरे, उठने पर नीचे वाला सीन, धरती वाला दृश्य मिस करने का भी रिस्क था, सो अहमदाबाद में एरपोटर् के बाहर एक कोना पकड़कर हलका हुआ।
अहमदाबाद में आफिस का काम निपटाने के बाद वरिष्ठ ब्लागर संजय बेंगाणी से मिलने उनके अड्डे पहुंचा। संजय और पंकज जी ने बेहद प्रेम से अपनी टिफिन से खाना खिलाया और देर तक बतियाये। मैं बेहद सहज और अपनापा महसूस करता रहा। लगा, जैसे कि अभी दिल्ली में ही हूं, अपने घर के आसपास। संजय जी ने कुछ बातें इस मुलाकात के बारे में अपने ब्लाग पर कहीं हैं जिसे आप पढ़ व देख सकते हैं। उन्होंने विस्तार से लिखने के बारे में मुझे कहा है पर मैं क्या लिखूं, कुछ सूझ नहीं रहा, सिवाय इसके कि हिंदी ब्लागिंग ने हम अपरिचितों को इतना परिचित करा दिया है कि अब कोई शहर बेगाना, अनजाना नहीं लगता। हर शहर में अपने लोग मिल जाते हैं। और ये अपने लोग ही हैं जो पूरी दुनिया में फैले हैं, बस संजय पंकज की तरह हम सभी अपनी हिंदी और अपने हिंदी वालों पर गर्व करना शुरू कर दें, लिखना शुरू कर दें, देखिए...जमाना अपना है।
संजय जी से मिलने के बाद सुभाष भदौरिया जी का फोन नंबर पता कराया। और सफलता भी मिली। कानपुर आईनेक्स्ट के अपने दद्दा अनिल सिन्हा जी ने तुरंत मेरी मदद की और जाने कहां से डा. सुभाष भदौरिया का मोबाइल नंबर मुझे उपलब्ध कराया। डाक्टर साहब को फोन किया तो वे अहमदाबाद से बाहर एक कालेज में परीक्षा कराने में जुटे थे। उन्होंने वादा किया कि परीक्षा खत्म होते ही वे उस बस के पास पहुंच जाएंगे जिससे मुझे मुंबई जाना था। और डाक्टर साहब वादे के मुताबिक पहुंचे भी। डा. सुभाष भदौरिया, जिन्हें मुख्य धारा के ब्लागरों ने जाने क्या क्या कहा है और जाने किस किस तरीके से परेशान किया है, ये किस्सा पुराना है पर मैं तो हमेशा से डाक्टर साहब को एक बेहद सहज और सच्चा इंसान मानता रहा हूं। तभी तो डाक्टर साहब सच बोलकर जमाने भर के गम उठाते रहे हैं। डाक्टर साहब से पल भर की मुलाकात रही पर इस मुलाकात को जी लेने और कैद कर लेने की उनकी सहृदय बेचैनी ने मुझे भाव विभोर कर दिया। ये कैसे अनजाने रिश्ते होते हैं, जिनमें दो लोग अपने आप एक दूजे को चाहने लगते हैं। डाक्टर साहब ड्राइवर को पांच मिनट और रुकने की विनती करते रहे पर ड्राइवर किसी विलने की तरह ना में सिर हिलाकर गाड़ी बढ़ाने लगा, तब मुझे भी मजबूरन बाय बाय कहते हुए बस में घुसना पड़ा। डाक्टर साहब से पल भर की मुलाकात ढेर सारी यादें दे गईं। उनसे फिर मिलने का वादा है।
मुंबई पहुंचा तो सीधे अपने अड्डे डाक्टर रूपेश के यहां पहुंचा। डाक्टर साहब ने अपनी फोटो तो कभी भड़ास या इधर उधर डाली नहीं सो उनकी शक्ल को लेकर मैंने ढेरों कल्पनाएं कर रखी थीं। पर वो तो निकले बेहद हैंडसम नौजवान। गठीला और योगीला शरीर। इलाके के यंग एंग्री मैन। कोई बार-वार नहीं चलना चाहिए। विकास की किसी योजना में कोई धांधली नहीं होनी चाहिए। ढेरों सच्चे पंगे ले रखे हैं डाक्टर साहब ने अपने इलाके में। पनवेल में उनके आवास पर रुका तो डाक्टर साहब के मुंबई भड़ासी ब्रांच के सारे कुनबे से मुलाकात हुई। बच्चों सी मुनव्वर आपा, कोमल हृदय और सुंदर व्यक्तित्व की स्वामिनी मनीषा दीदी, अनुभवों और सोच के धनी रूपेश जी के बड़े भाई भूपेश जी....।
डाक्टर रुपेश के साथ ही मुंबई को छान मारा। वो भी लोकल ट्रेन के भीड़ भरे डिब्बे में नहीं बल्कि लोकल ट्रेन को चलाने वाले ड्राइवरों की केबिन में ससम्मान बैठकर। इसे कहते हैं डाक्टर रुपेश का जलवा। ड्राइवरों से डाक्टर साहब यूं मराठी में बतियाते कि जैसे कभी प्रतापगढ़ में पैदा ही नहीं हुए हों बल्कि जन्मना मराठियन महाराष्ट्रियन हों।
डाक्टर रुपेश के साथ ही दो वरिष्ठ ब्लागरों लोकमंच वाले शशि सिंह और बतंगड़ वाले हर्षवर्धन से मुलाकात हुई। साथ में अपने आफिस के वरिष्ठ साथी रंजन श्रीवास्तव जी भी थे। लोवर परेल के कैफे काफी डे में हाट डाग रोल खाते और लेमन डेमन पीते हुए इहां से उहां तक खूब बतियाया गया।
शशि सिंह आजकल वोडाफोन में मैनजेर हैं। मैं इस बात का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि चिरकुट माइंडसेट वाले पत्रकार जान लें कि हिंदी पत्रकार अब नाकाबिल नहीं रहा बल्कि वो अपनी काबिलियत सिर्फ कलम की कथित मजबूरी के जरिए नहीं बल्कि बिजनेस और मार्केटिंग जैसे आधुनिक दुनिया के रहस्यों को सुलझाने के जरिए कर रहा है। शशि सिंह हमेशा से मेरे लिए एक समझने वाली चीज रहे हैं, उत्साह से लबालब व्यक्तित्व ऊर्जा से भरी सोच, इंटरप्रेन्योर माइंडसेट का मालिक, कुछ अलग करने रचने जीने सीखने को हमेशा तत्पर रहने वाला युवा......। शशि सिंह से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी और हर्षवर्धन जी से पहली। हर्षवर्धन जी के बारे में मेरी सोच ये थी कि वो दिल्ली में ही किसी न्यूज चैनल में कार्यरत हैं पर वो निकले मुंबइया। इन दोनों पूरबिहों से मिलने बतियाने के बाद अगले दिन एक भयंकर वाली ब्लागर मीट हुई।
छात्र संगठन पीएसओ उर्फ आइसा के पुराने धुरंधरों दिग्गजों जिन्होंने अपने जमाने में संस्कृति से लेकर राजनीति तक को नए सिरे से समझने समझाने को क्रम को बखूबी अंजाम दिया था, अब मुंबई के भिन्न कोनों में रहते जीते लिखते सोचते हैं। इन सभी से एक साथ मुलाकात हो जाए, मैंने सोचा भी न था। इसके पीछे धारणा बस यही थी कि हम लंठ भड़ास वाले, कच्ची उम्र व सोच वाले, इन धुरंधरों के पासंग भी फिट नहीं बैठते तो ये लिफ्त क्यों मारेंगे। पर मेरी सोच मनगढ़ंत साबित हुई। वरिष्ट ब्लागर प्रमोद सिंह ने अभय तिवारी जी के घर मुलाकात तय कर दी तो मैंने लगे हाथ ढेर सारे परिचितों को वहां पहुंचने के लिए न्योत दिया। स्क्रिट राइटर सुमित अरोड़ा, डा. रुपेश और मैं तो उधर से अभय तिवारी जी, प्रमोद सिंह, अनिल रघुराज, बोधिसत्व, उदय यादव आदि थे। तीन बजे से बतकही शुरू हुई तो जाने कब पांच छह बज गया, पता ही नहीं चला। इतनी बड़ी मुंबई में एक जगह इतने सारे ब्लागरों और साथियों का इकट्ठा हो जाना मेरे लिए सपने सरीखा था। जीवन, दर्शन, हिंदी पट्टी, सोच, संवेदना, ब्लागिंग, एग्रीगेटर, निजी, सार्वजनिक, विवाद, मौलिकता, लेखन, व्यक्तित्तव, पहचान, हरामीपन...जैसे ढेरों विषयों से टकराते बूझते आखिर में भड़ास पर चर्चा ठहरी। साथी लोगों ने लतियाया, धोया, सिखाया, समझाया तो मैंने भी अपनी पेले रखी और उनकी सुनने समझने की मुद्रा बनाए रखी। इन लोगों की ढेर सारी बातों को मैं अमल करने लायक मानता हूं और इस पर कोशिश पहले ही शुरू कर दी गई है, आगे और भी कोशिशें होंगी।
और हां, ये बता दूं कि मुंबई के इन सभी लोगों से मेरी पहली मुलाकात थी, सिवाय सुमित अरोड़ा के जो मेरठ से मेरे साथी रहे हैं। प्रमोद सिंह की क्या पर्सनाल्टी है भाई, यूं बड़ी बड़ी मूंछें, गब्बर सिंह माफिक, भर पूरा चेहरा, ठाकुर माफिक, देह पर कुर्ता पाजामा क्रांतिकारियों की माफिक....जय हो....:)। जब आप प्रमोद सिंह के लिखे को पढ़ेंगे तो दूसरी ही तस्वीर उभरती है जिसे लेकर मैं मुंबई पहुंचा था। अभय तिवारी जी, सबसे दुबले पतले, पर सबसे गुस्सैल, क्या क्लास ली भाई ने मेरी, भड़ास और ब्लागवाणी विवाद पर:)। बोधिसत्व जी...अरे बाप रे...छह फुटा आदमी, बिलकुल हष्ट पुष्ट जैसे राष्ट्रपति के प्रधान अंगरक्षक, जैसे सीमा सुरक्षा बल के कमांडर, जैसे दुष्टों के दलन को आए महामानव....कहीं से कवि नहीं नजर आए:)। अनिल रघुराज जी, सकुचाए, चुप्पा, विनम्र, सहज.....बोलेंगे तो धारधार वरना चुप रहेंगे:)
और इन सभी की खबर ली डाक्टर रुपेश ने, नाड़ी नब्ज टटोलकर:) किसी की वात उठी हुई थी तो किसी की पित्त। अब ये भड़ासी डाक्टर और आयुर्वेद का मास्टर डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव इन मुंबइया ब्लागरों की नब्ज हमेशा देखता रहेगा ताकि कभी उंच नीच न हो जाए:)
उदय यादव जी के साथ मैं पार्टी के दिनों बनारस में काफी कुछ सीखा है, उनसे मिलना बारह पंद्रह साल बाद हो रहा था पर उदय भाई के व्यक्तित्व में कोई खास बदलाव नहीं। वही गठीला शरीर, वही मुस्कान, वही सहजता।
पहली रात डाक्टर रुपेश के पनवेल वाले घर में गुजारी तो दूसरी रात सुमित अरोड़ा के यहां, लोखंडवाला इलाके में। डाक्टर रुपेश के यहां मनीषा दीदी ने बड़े प्यार से मछली पकाई थी। चूंकि डाक्टर साहब खुद शुद्ध शाकाहारी और मांस मदिरा से दूर रहने वाले प्राणी हैं तो मछली पकाने का उपक्रम मनीषा दीदी ने मुनव्वर सुल्ताना आपा के घर पर किया।
दूसरी रात सुमित अरोड़ा के यहां पहूंचा तो भाई ने पृथ्वी थिएटर में लगातार बीमार नामक (अगर नाम न भूल रहा हूं तो) नाटक के शो के टिकट बुक करा लिए थे। इसी दौरान अजय ब्रह्मात्मज जी का फोन आ गया। यहां मैं बता दूं कि अभय तिवारी जी के यहां आने के लिए मैंने वमल वर्मा जी, आशीष महर्षि जी, अजय ब्रह्मात्मज जी को भी संदेश भेजा था पर ये तीनों अपनी व्यस्तताओं की वजह से समय नहीं निकाल पाए। तीनों ही लोगों के फोन या एसएमएस आए कि वे कोशिश करके भी उस टाइम पर उस जगह पहुंच नहीं पा रहे।
तो अजय जी के फोन आने पर बात हुई तो पता चला कि सुमित के घर के ठीक सामने पत्थर मारने भर की दूरी पर (शब्द साभार अजय ब्रह्मात्मज) ही अजय जी का भी घर है। और जब मैं बीयर गटकने के बाद सुमित के बाथरूम से नहाधोकर निकला तो सामने अजय जी को सुमित व उनके दोस्तों से बतियाता पाया। धन्य हो मुंबई वालों का प्रेम। अजय जी से जानकारी मिली की वही नाटक देखने विभा भाभी जी भी जा रही है। अगली सुबह नाश्ते पर अजय जी के घर आने का वादा कर मैं सुमित के साथ नाटक देखने निकल गया। इंटरवल में विभा जी ने खुद ही पकड़ लिया, आप यशवंत जी हैं ना....। मैंने मसाला मुंह में घुलासा हुआ था और एक अपिरिचित जगह पर एकदम से किसी महिला के इस तरह मुझे पहचान लेने से एकदम अकबकाया मैं वो पूरा मसाला गटक गया और फिर तुंरत बोल पड़ा...जी मैं ही हूं। तब भाभी जी ने बताया कि वो विभा हैं और अजय जी ने उन्हें मेरी हुलिया फोन पर बता दी थी। और साहब, मालूम है, कपड़ा कौन पहना था, हरे राम हरे कृष्णा वाला कुरता जो ऋषिकेश में घूमने के दौरान खरीदा था। सो, उस दर्शक वर्ग में एकमात्र मैं आदमी थी जो एकदम से हरा हरा नजर आ रहा था।
अगली सुबह देर से नींद खुली और देर से अजय जी के घर पहुंचे। तोसी कोसी का नाम ब्लागिंग के जरिए मेरी जुबान पर पहले से ही था। तोषी तो लाहौर में हैं, कोसी एकदिन पहले ही हाईस्कूल की परीक्षा देकर आजाद पंछी की माफिक मुस्करा रही थीं। विभा भाभी को प्रमोशन मिला था और उनका बर्थ डे भी था, अजय जी को पुरस्कार लेने का दिन भी वही थी, एक साथ एक ही दिन ढेर सारी खुशियां जश्न उत्सव मनाने का मौका....। ईश्वर ये खुशी बनाए रखे, सबको दे, इसी तरह। गरम गरम पूड़ियां और छोला और सब्जी और चटनी और पापड़ और .....। गले तक नाश्ता किया बोले तो पूरा भोजन ही कर लिया।
इस चार दिनी यात्रा का वृतांत कमोबेश यही है। आशीष महर्षि ने संदेश भेजा कि मिलने के लिए समय न निकाल पाने के लिए वे माफी चाहते हैं.......अरे भाया, इसमें क्षमा जैसी क्या बात आ गई यार, जिंदी रहे तो जरूर मिलेंगे भाया, दिल तो अपन लोग का मिला ही हुआ है, फिजिकल डिस्टेंस का आज के युग में कोई मतलब नहीं है।
तो डाक्टर रूपेश जी, मैंने यात्रा की समरी रख दी। कई चीजें छूट गई होंगी, कई नाम भूल गए होंगे, कई प्रसंग अनुल्लिखत होंगे.....प्लीज....उन कड़ियों को आप जोड़ दीजिएगा, एक नई पोस्ट डालकर।
अंत में, आप सभी हिंदी ब्लागर दोस्तों को, जो भारत से लेकर दुनिया भर के देशों में फैले हुए हैं, दिल से आभार के कहना चाहूंगा कि आप और हम अलग अलग होकर भी जब मिलते हैं तो यूं परिचित लगते हैं जैसे कभी अपिरचय था ही नहीं। मैं इस पूरे घटनाक्रम से अभिभूत हूं।
मुंबई जाने की सोचकर कभी फटा करती थी, वहां कौन है तेरा.....बर्तन माजना होगा, धक्के खाना होगा, कुचलकर मर जाएगा.....टाइप की बातें बताई जाती थीं। और जब पहली बार मुंबई गया तो लगा ही नहीं ये शहर दिल्ली से अलग है, परिचय के मामले में, जीने के मामले में, सहजता के मामले में, रिश्तों के मामले में...। और ये सब है हिंदी ब्लागिंग की बदौलत। मा बदौलत, यह दस्तूर कायम रहे.....।
जय भड़ास
यशवंत
6.3.08
वृंदावन का सबसे बड़ा संत... रुस्तम दादा
((दोस्तों, इसे पढ़ते हुए थोड़ा रो लेना अकेले में.....प्लीज पूरा पढ़ना...यशवंत))
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आजकल वृंदावन के बनारसीपने को जी रहा हूं। कल रात चार बजे होटल पहुंचा। बंदरों और कुत्तों से भागते, बचते, भटकते, होटल का रास्ता खोजते। कल शाम और रात के दौरान दो मीटिंग की, उसके बाद सिर्फ और सिर्फ वृंदावन के देसजपने को समझता बूझता रहा। सच कहूं, बिना शाम और रात को जिये किसी शहर को आप समझ ही नहीं सकते, समझेंगे भी तो वो आधा अधूरा और अधकचरा होगा जिसे आप अपनी संपूर्ण सत्य राय बताकर दूसरों के दिमाग पर थोप देंगे। कल की यादगार शाम और रात बिलकुल फक्कड़ी के नाम रही। हर दुकान पर मुंह मारते, पान घुलाते, अनजान और अजनबी लोगों से दोस्ती गांठते, उनसे बतियाते, खामखा दांत निपोरते हुए अपनी अति विनम्रता प्रस्तुत करने के साथ अगले आदमी को प्रभावित करते...... गपियाते ....गोलियाते....।
शहरों, लोगों, गलियों, माहौल, रातें, नदी, रिक्शा, पान.....सभी को आंखों में सजो लेने, जी लेने, महसूस कर लेने को हर पल बेचैन मैं कल रात को दिल से थैंक्यू कहा, उपरवाले को, भाई आज तो मजा बांध दिया। जीवन में हर चीज का दुहराव आज ब्रेक हुआ। ऐसा ही कुछ चाहता हूं रोज। देखो, ये नजारा देखकर पीना पिलाना भूल गया। डिप्रेसन गायब। दिल से पाप रार खत्म। लोग कितने अच्छे हैं। सब कुछ कितना सुंदर है। हर शख्स की जुबान पे है....राधे राधे। रिक्शा वाला आगे किसी को चेतावनी भी देता है तो कहना है राधे राधे। दुकान वाला अपने ग्राहक को देखते ही कहता है राधे राधे। मतलब हर बात में राधे राधे। जय हो राधे राधे।
तो वृंदावन की गलियों में रात के वक्त जो मिनी बनारस की झलक मिली, उसे खूब जिया। इस रिक्शे से उस रिक्शे। यहां से वहां। पैदल तो फिर पैदल ही पैदल। पान घुलाय घुलाय के। चुनरी बंधाय के। टिक्का लगाय के। चेहरा हंसाय के। कोई पाप वाप नहीं है। सब राधे राधे। जीवन कितना बढ़िया है। सब मस्त हैं। राधे राधे।
पर ससुरी निगाह ऐसी है अपनी न कि दुख को बुला ही लेती है। गम को देख ही लेती है। अवसाद को बूझ ही लेती है। भीगी पलकों से भीग ही जाती है। और इन दुखों, गमों, अवसादों, भीगी पलकों के साथ संबल बन खड़ा रहने को चल पड़ता हूं। भांड़ में जाये सुख, भांड़ में जाये राधे राधे। मुझे तो इन रुस्तम के साथ जीना है, दुखी होना है, उन्हें पल दो पल की खुशी देना है ताकि लगे कि वो उतने अभागे नहीं, जितना वो खुद अपने को मानते होंगे। वो बहादुर हैं, दुर्भाग्यशाली नहीं।
65 साल के रुस्तम के रिक्शे पर बैठने और फिर उतरने के बाद गौतम बुद्ध सी अवस्था में आ गया। दुख दुख दुख दुख...। रुस्तम की लंबी दाढ़ी से ही उनकी जात धर्म का पता चल जाता है पर इसका सिर्फ प्रतीकात्मक मतलब है, रुस्तम की ही तरह इसी शहर में या उस शहर में कोई कैलाश भी हो सकता है कोई दुखहरन भी हो सकते हैं कोई गुरमीत भी हो सकते हैं कोई जोजेफ भी हो सकते हैं.....। फिर भी, उनसे पूछ लिया, आपका नाम क्या है दादा?
बोले - रुस्तम।
फिर पूछा, तो फिर इतनी उम्र में रिक्शा काहें को खींच रहे हैं, इतने दुबले पतले हैं आप, क्या दिक्कत है आखिर?
रुस्तम दादा बोले...बेटवा, सब नसीब का खेल है।
थोड़ी चाय वाय साथ पी गई और बातें आगे बढ़ी तो रुस्तम की कहानी सुन आंखें भर आईं। किसी को ऐसी स्थिति में न लाये खुदा।
रुस्तम के चार बेटें और तीन बेटियां हैं। तीनों बेटियों को ब्याह कर उनके घर भेज दिया। चार बेटों में से एक के सात बच्चे हैं, दूसरे के पांच और तीसरे के तीन। चौथा कहीं बाहर रहता है अपना परिवार लेके। बाकी तीनों घर पे, रुस्तम के साथ ही। साथ कहें या सीने पे कहें। रुस्तम के बच्चे जो कमाते हैं उसे अपने बच्चों को खिलाने में गंवा देते हैं। तो रुस्तम क्या करें? अगर अकेले होते तो वो भी दाढ़ी वाढ़ी कटवा कर, पहचान छिपा कर, गेरवा वेरवा धारण कर राधे राधे कहते किसी आश्रम में प्रसाद पाते या फिर किसी मस्जिद पर ही चले जाते, दो चार पैसे जुटाकर खा पी जी लेते....मतलब जिंदगी किसी तरह बसर करने के जो हजार तरीके विकल्प स्थितियां हैं जो दुखदायी अदुखदायी दोनों ही हैं, को अपना लेते। पर 65 साले के अब गये तब गये वाली स्थिति में दिख रहे रुस्तम की मां भी अभी जिंदगा हैं। रुस्तम की बेगम साहिबा भी उन पर निर्भर हैं। तो रुस्तम को अपने अवाला दो और जानों की देखभाल, खिलाने पिलाने जिलाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही हैं और बेटें बेटियां इनमें उनकी एक कौड़ी की मदद नहीं करते या नहीं कर पाते, जो भी हो।
तो रुस्तम ने 65 की उमर में रिक्शा थाम लिया और राधे राधे वाले इस शहर में पूरी अंकड़ के साथ हांफते थूकते मुंह पोंछते सांसें संभालते भरे पेट निकली तोंद वाले स्वामियों, अनुयायियों, संप्रदायियों, यात्रियों....के बीच रिक्शे की घंटी मारते राधे राधे कहते अपने रिक्शे को वनखंडी से रमणरेती और परिक्रमा मार्ग से बस अड्डा ले जाते ले आते। कभी दस तो कभी पांच तो कभी बीस तो कभी कुछ नहीं पाते।
जोड़ गांठकर थक हारकर थूक हांफकर रुस्तम दादा रुपया लुंगी में गंठिया कर घर पहुंचते और अपने और दो स्त्रियों मां व बेगम को खिलाने जिलाने की कवायद में जुट जाते।
मैं सुनता रहा, भींगी आंखों को टपक पड़ने से रोकता रहा। इस पवित्र शहर की इस दुखी आत्मा के जीवन संघर्ष ने मुझे सबसे बड़ा संदेश दिया है। कोई भगवान वगवान नहीं, कोई खुदा वुदा नहीं। सब ढोंग पाखंड है। सब बातें है। सब झूठ है। सब बहकावा है।
रुस्तम की गलती क्या है? रुस्तम को सजा ये क्यों है? पिछला जनम, अगला जनम....सब बेकार की बातें। मन करता है कि गोली मार दूं सबको, एक एक को, सारा उत्सव खत्म हो जाए। सारी हलचल शांत हो जाए। सिर्फ और सिर्फ रुस्तम जिंदा रहे। और मैं देख सकूं उनकी खुशी.....उन्हें सताने, रुलाने, परेशान करने वाली दुनिया के खत्म हो जाने पर उनकी न रुकने वाली पागलों जैसी हंसी, उपर वाले का आभार प्रकट करत हुए कृतज्ञता भरी आंखों के साथ आसमान को निहारते।
पर ये ईंटों, सीमेंट, गाटरों की बड़ी खड़ी दुनिया में संवेदना तो कतई नहीं बसती, इनमें बसने वालों की आत्मा में चतुराई, चालाकी, धूर्तता, मक्कारी, चालबाजी, बनियागिरी, धंधेबाजी, काइयांपना, अवसरवाद.......बसता है। और राधे राधे के आध्यात्मिक इंट्रो के बाद अपने मूल रूप में पूरी विनम्रता के साथ सौदैबाजी धंधेबाजी अवसरवाद मक्कारी ....पर उतर आता है। सखी संप्रदाय के ये पुरुष जो स्त्रियों के वेष में साड़ी पहने मटकते लरजते शर्माते चले जा रहे हैं, उन्हें घंटी मारते हांफते रुस्तम राधे राधे कहकर हटाने की कोशिश करते हैं पर वो हैं कि वो खुद पर टिकी निगाहों को भरपूर समवेत जवाब देते हुए अपिने संप्रदाय के अनोखेपन का वर्णन प्रदर्शन करते चल रहे हैं। रुस्तम ने बड़ी देर की मेहनत के बाद कलेजे से सांस लेते हुए पैडल पर शरीर का पूरा जोर मार मार कर रिक्शे की जो स्पीड बनाई थी, इन सखियों के इसी मचकपने में उस पर ब्रेक लग जाता है। रिक्शा रुका तो रुस्तम की सांसते थामे नहीं थमी, धौंकनी की तरह उठते गिरते सीने से निकलती सांसें मुंह दाढ़ी समेत पूरे बदन को हिला रही थीं। ओफ्फ....क्या करें इस शांति, सुख, सौंदर्य, राधे राधे का......
रुस्तम रुके, थमे, फिर हांफते हुए पैदल ही रिक्शा खींचने लगे। हम उतर गए। रुस्तम से बतियाते, बातें करते सड़क की चढ़ाई पार करने।
रूस्तम ने बीस रुपये मांगे, बीस दिए। बातें शुरू हुईं। चाय पी गई। और उनके दुख से दुखी मैं भीगी आंखें लिए जब यह कहते हुए उनसे अलग हुआ कि रुस्तम दादा, आप बहुत बहादुर हैं। आप इस शहर के असली संत हैं, असली तपस्वी हैं, मुझे गर्व है कि मैंने आपका दर्शन किया। और....मैं आगे बढ़ गया। साथ वाले साथी ने बाद में बताया.....यशवंत, तुमने रुस्तम को रुला दिया।
सोचता हूं, रोने हंसने में कोई खास फर्क नहीं है। अच्छे बुरे में कोई खास फर्क नहीं है। संत राक्षस में कोई खास फर्क नहीं है। जीवन मरण में कोई खास फर्क नहीं है। अवसाद प्रसन्नता में कोई खास फर्क नहीं है। दुख सुख में कोई खास फर्क नहीं है। मेरे होने न होने में कोई खास फर्क नहीं है। आपके कहने न कहने में कोई खास फर्क नहीं है........
और शायद यही शिवत्व है, यही मुक्ति है, यही आनंद है, यही अमरता है.....जिसे पा लेना चाहिए, हम सभी को। हम भड़ासियों को। हम मनुष्यों को......ताकि
हाय हाय मार मार भाग भाग चल चल चढ़ चढ़ काट काट दौड़ा दौड़ा गिरा गिरा सफल सफल हार हार जीत जीत .....के चूतियापे से उबर कर केवल संवेदना बड़प्पन को जिया जा सके......
क्यों भाई लोग, आप लोग क्या सोचते हैं महाराज....कहिए राधे राधे.....
वंदावन के सबसे बड़े संत रुस्तम दादा को सलाम करता हूं क्योंकि ...
1- जाति धर्म मजहब अलग होने के बावजूद वे असल भारतीय हैं। राधे राधे उनकी जुबान से इसलिए नहीं फूटता कि वे बहुसंख्यक हिंदू बहुस शहर में रहते हैं, इसलिए फूटता है कि वृंदावन की ये जुबान है, मैं खुद यहां फोन आने पर राधे राधे करने लगा हूं.....वो फोन चाहे मेरे गांव गाजीपुर से क्यों न आया हो। ये वृंदावन का असर है। यह साझी संस्कृति है। यह मिट्टी की खुशबू है।
2- बुजुर्ग होने के बावजूद, बेटों के मुंह फेर लेने के बावजूद जिंदगी से हार न मानी, रार न ठानी। जिंदगी को जीने की ही राह पर चलते रहे। भले उतना ही पसीना बहाना पड़ रहे हो जितना जवानी में बहाते थे तो कोई फरक नहीं पड़ता था और अब बहा रहे हैं तो पूरा शरीर हिलने लग रहा है।
3- बेटियों बेटों पर उम्मीद करने, उनसे मांगने, उन पर निर्भर होने की बजाय....मुश्किल आने पर खुद दौड़ पड़े अपनी शहर की सड़कों पर, रिक्शा खींचते। किसी से क्यों हाथ पसारे, जब तक है दम में दम, जी लेंगे हम।
4- धर्म, नोटों, मंदिरों, रास, मस्ती, आनंद, मस्ती, ईश्वर....वाले शहर की खुशी से थोड़ा भी दुखी ना होते हुए उनके साथ दिखने रहने की कोशिश करते हुए भी अपने दुख को न बताना, न प्रकट करना, न खोलना। बस अपने काम से काम रखना। यही तो लय है।
5- एक बहादुर इंसान, जिसे किसी पल आई किसी मुश्किल से कोई घबराहट नहीं, कोई ढोंग नहीं, कोई पाखंड नहीं। बिलकुल साफ पारदर्शी जीवन। मुश्किल है तो है, हल कर। आगे बढ़। जिंदगी जी। दुखों से लड़। आगे बढ़े।
जय हो रुस्तम की
जय भड़ास
यशवंत
26.2.08
धन्य हो लोकतंत्र, धन्य हो बाजार
दिल्ली-मथुरा रोड पर ठीक अगल बगल दो विज्ञापनों के मजमून..
...यहां शराब पीने के लिए हाल में बैठने की व्यवस्था है
(शराब की दुकान के ठीक सामने काफी मोटे मोटे अक्षरों में लिखा हुआ)
...पापा, शराब पीना छोड़े दो, बच्चों से नाता जोड़ लो
(मद्यनिषेध विभाग द्वारा जनहित में प्रसारित)
---अपन का तो यही कहना है कि भइया पहले बिठाकर पिलाते हो, फिर बच्चों की दुहाई देकर, इमोशनली ब्लैकमेल करके छुड़वाते हो...धन्य हो अपन देश का लोकतंत्र...
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दिल्ली-मथुरा रोड पर ही दो और विज्ञापनों के मजमून
....खूब बातें करें, बातें खत्म कर देती है फासलों की दीवार, जीभर करें बातें
....अनचाही काल को रोक दें, बस कुछ रुपये महीने में यह सविधा उपलब्ध है
----अपन का तो कहना है भइया पहले तो खूब बातें करवाकर पैसे बटोरे, और जब इस दौरान फासलों की दीवार टूटने पर लड़ाई हो जाए तो पैसे लेकर उसकी काल रोक दो...धन्य हो इस लोकतंत्र का बाजार...
जय भड़ास
यशवंत
