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28.2.08

राधे राधे, जय गोविंदा, जय श्रीकृष्णा, हरिओम, नमो नारायण....

आजकल लगातार टूर पर रहता हूं। काम कुछ इस तरह का है कि धर्म गुरुओं और धार्मिक संगठनों से हर दिन पाला पड़ता रहता है। पहली बार इतनी करीब से, इतने नजदीक से इन्हें जाना व समझा है। जैसा कि हर जगह होता है, यहां भी अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही हैं। सबसे मजेदार है इन सभी धार्मिक संगठनों, गुरुओं के अभिवादन की पंचलाइन। कोई लोग फोन करते ही राधे राधे कहकर फोन उठाते हैं तो कोई मिलते ही हरिओम कहते हैं। इनके जवाब में मुझे भी राधे राधे या फिर हरिओम कहना पड़ता है। इसी तरह जय श्रीकृष्णा, जय गोविंदा, नमो नारायण जैसे संबोधन भी कई अलग अलग बाबाओं व धर्म संगठनों के हैं।

इनके यहां जो सबसे अच्छा अनुभव होता है वो प्रसाद खाना। इतना सादा व सात्विक खाना मिलता है कि पंगत में बैठकर खाने पर मन खुश हो जाता है। पिछले दिनों हरिद्वार तो फिर इन दिनों वृंदावन में इन अनुभवों से दो चार हो रहा हूं। चूंकि अभी अनुभव प्रक्रिया लगातार जारी है सो इस पर ज्यादा लिखना उचित नहीं लेकिन मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि अपने इस कार्यकाल में मैं मार्केटिंग व बिजनेस के लिए काम करते हुए हिंदू धर्म गुरुओं, बाबाओ, आश्रमों, संगठनों को काफी करीब से जान पा रहा हूं। इनमें से ढेर सारे शीर्ष बाबाओं से तो अब लगभग दोस्ती हो चुकी है। उनके साथ उनके जीवन के अनुभवों, उनकी सांगठनिक क्षमता, उनके आध्यात्मिक अनुभवों को सुनना, सहेजना मजेदार अनुभव है।

इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा। फिलहाल तो इतना ही कहना चाहूंगा कि जैसे हम सभी भड़ासियों की पंच लाइन व अभिवादन लाइन जय भड़ास है, उसी तरह से पूरे दिन के दौरान अलग अलग बाबा लोगों से मुझे अलग अलग तरीके से अभिवादन करना पड़ता है। कई बार तो गड़बड़ा भी जाता हूं। जिनसे राधे राधे कहना होता है उनसे हरिओम कह देता हूं। पर अनुभव बढ़ने के साथ ही लोगों को अलग अलग समझने बूझने व डील करने में पक्का होता जा रहा हूं। इसी को तो कहते हैं एक ही जीवन में ढेर सारे अनुभव पा जाना .....

तो हे मन, चलो अब गंगा तीर....
आप सभी लोगों को कहता हूं....राधे राधे, हरिओम, नमो नारायण, जय श्रीकृष्णा, जय गोविंदा, राम राम....

जय भड़ास
यशवंत

26.2.08

धन्य हो लोकतंत्र, धन्य हो बाजार

दिल्ली-मथुरा रोड पर ठीक अगल बगल दो विज्ञापनों के मजमून..

...यहां शराब पीने के लिए हाल में बैठने की व्यवस्था है
(शराब की दुकान के ठीक सामने काफी मोटे मोटे अक्षरों में लिखा हुआ)

...पापा, शराब पीना छोड़े दो, बच्चों से नाता जोड़ लो
(मद्यनिषेध विभाग द्वारा जनहित में प्रसारित)

---अपन का तो यही कहना है कि भइया पहले बिठाकर पिलाते हो, फिर बच्चों की दुहाई देकर, इमोशनली ब्लैकमेल करके छुड़वाते हो...धन्य हो अपन देश का लोकतंत्र...
-----------

दिल्ली-मथुरा रोड पर ही दो और विज्ञापनों के मजमून

....खूब बातें करें, बातें खत्म कर देती है फासलों की दीवार, जीभर करें बातें

....अनचाही काल को रोक दें, बस कुछ रुपये महीने में यह सविधा उपलब्ध है


----अपन का तो कहना है भइया पहले तो खूब बातें करवाकर पैसे बटोरे, और जब इस दौरान फासलों की दीवार टूटने पर लड़ाई हो जाए तो पैसे लेकर उसकी काल रोक दो...धन्य हो इस लोकतंत्र का बाजार...
जय भड़ास
यशवंत

13.2.08

वृंदावन में सब हैं, बस कान्हा को छोड़कर

कान्हा की नगरी में हर कहीं कान्हा और राधा का नाम है। राधा हेयर कटिंग सेंटर, कान्हा टी स्टाल, गोवर्द्धन अपार्टमेंट, नंदनवन रेजीडेंशियल कालोनी, किशन के चरणों में गोल्फ का आनंद लें इस नए हाउसिंग स्कीम में......। जिधर नज़र घुमाओ, बड़ी बड़ी होर्डिंग पर सजे आधुनिक प्रवचनकारी बाबा लोग। सबके चेहरे भरे भरे, गाल खिले खिले। होठों पे मुस्कान, अधरों पर लाली। होर्डिंग के नीचे सड़क पर दुबले पतले वृंदावन के बच्चे मस्ती में चले जा रहे हैं। गरीबी इतनी की हम तो एक पल को सोचने लगे कि ये तो बिलो द पार्वटी लाइन का लगता है लेकिन फक्कड़ी इतनी की कान्हा के नगर का असर मालूम पड़ता है। आश्रम, मंदिर, र्धमशालाओं का वृंदावन बाहरी सैलानियों व श्रद्धालुओं को ताड़ने में लगा रहता है। रिक्शा, टेंपो, आटो, दुकान, मंदिर...हर कहीं बाहर से आने वालों से उम्मीद। कुछ ज्यादा पाने की तमन्ना।

मुझे इस वृंदावन में कान्हा के नाम पर कारोबार खूब दिखा पर कान्हा की संवेदना व मस्ती नहीं दिखी। जाने क्या असर है इस कलयुग का कि जहां जिसे खोजने जाओ, बस वही नहीं मिलता है और बाकी सब कुछ मिलेगा, जिससे उबकर आप भागे हैं। होली आने ही वाली है। कान्हा, मथुरा, वृंदावन, गोपियां.....बरजोरी, होली, रंग, पिचकारी....ये सारे शब्द जमाने से सुनते आए हैं हम लोग लेकिन यहां तो जो है सो पैसे के लिए और पैसे द्वारा इच्छित-सृजित दिक्खे है। भई हम तो दिल से कन्हैया को चाहते हैं सो वृंदावन वालों से दिल नहीं लगा पाए, बस कान्हा को तलाशते हुए वृंदावन की गलियों में घूमते रहे और आखिर में मायूस हुआ।

रात हुई तो बस ये गाता रहा....
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
भोर भयो गैंयन के पीछे मधुबन मोहि पठायो
चार पहर बंशी बट भटके
सांझ पहर घर आयो....

बचपन में सूरदास को बड़े चाव से पढ़ते थे हम लोग, आज तक याद है।

सुबह सुबह काफी भाषण दे लिया, अब निकलना है काम धंधे पर....तब तक के लिए जय भड़ास
यशवंत