प्रिये पाठको और दोस्तों,
मुझे यह बताते हुए बड़ी खुशी हो रही है की मैं वापस अपने ब्लॉग पर आ गया हूँ, काफ़ी कोशिश की अपने आपको अपने कंप्यूटर और अपने ब्लॉग से दूर रखने की लेकिन नाकामयाब रहा, इस बीच कोई पोस्ट तो नहीं लिखी लेकिन हाँ टिप्पणी ज़रूर करता रहा....
अब मैं वापस आ गया हूँ बहुत जल्द आपको मेरी पोस्ट पढने को मिलेगी,आगे पढ़ें ....
18.5.09
मैं वापस आ गया.....!!!!
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काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif
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14.4.09
हिजड़े चाँद से नहीं गिरते
(बरेली के पत्रकार साथी रहमान भी ब्लागिंग में कूद पड़े हैं। उनके ब्लाग 'आजाद आवाज' पर दो पोस्टें हैं जिनमें से एक यहां प्रकाशित कर रहा हूं। उनके ब्लाग का पता है- www.azadawaz.blogspot.com, रहमान की ब्लागिंग की पारी का हम स्वागत करते हैं- यशवंत)
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कार्यक्रम के बीच में दर्शकों की तरफ से शुरू की गई बहस से मीनाक्षी उद्वलित हो उठीं और उन्होंने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसके बारे में उस वक्त तो कोई चर्चा नहीं हुई, लेकिन कार्यक्रम के बाद वक्ताओं के बीच ये जेरेबहस रहा। मीनाक्षी के वक्तव्य के दौरान एक दर्शक ने सवाल किया कि आप लोग खुद ही समाज से दूर रहते हो और जबरन अपनी संख्या बढ़ाते हो। इस मीनाक्षी जज्बाती हो उठीं। उन्होंने जवाब में समाज को उसका ही चेहरा दिखा दिया। कहा कि हिजड़े चांद से नहीं टपकते, न ही वह जंगल से आते हैं। इसी के साथ उन्होंने हया नाम की अपनी बेटी को मंच पर बुला लिया। कुछ देर बाद ही दर्शकों के बीच से एक पांच-छह साल की एक सुंदर सी दुबली-पतली सी बच्ची गुलाबी फ्राक पहने नजरें झुकाए खड़ी थी। उसके मंच पर आते ही सन्नाटा छा गया। मीनाक्षी ने कहना शुरू कियाः ये बच्ची भी आप ही के सभ्य समाज से आई है। छह साल पहले इसके मां-बाप मेरे पास आए थे और कहा कि मीनाक्षी तुम इसे अपना लो, नहीं तो हमारे पास इसे जहर का इंजेक्शन लगवाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मीनाक्षी ने ये कहकर हाल में सनसनी फैला दी कि ये बच्ची भी किन्नर है। उन्होंने बताया कि इसके मां-बाप पहले इसे अनाथालाय ले गए थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये किन्नर है तो उन्होंने इसे अपनाने से ही मना कर दिया।
उस वक्त को बात आई-गई हो गई, लेकिन इस सबके बीच एक बच्ची से उसकी सुकून और सम्मान भरी जिंदगी छीन ली गई। उसे सबके बीच में असमान्य होने का एहसास करा दिया गया था। रही-सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। उसने बच्ची की फोटो सहित इस पूरे वाकिये को फ्लैश कर दिया। उसका चेहरा भी ब्लर करने की जहमत नहीं उठाई गई। अब ये बच्ची न तो कथित सभ्य समाज में सामान्य जीवन जी सकेगी और स्कूल में भी सभी बच्चे उसे अलग तरीके से ट्रीट करेंगे और चिढ़ाएंगे। जाहिर है कि अब उसके पढ़-लिखकर सामान्य जीवन जीने की संभावना शून्य कर दी गई।
हमारा आपसे सवाल है कि इस मामले में बुद्धिजीवियों का क्या रुख होना चाहिए था?
मीडिया का क्या सावधानी बरतनी चाहिए थी?
अब वह बच्ची सामान्य जीवन कैसे जी सकेगी?
और आखिर में, हिजड़ों पर ये आयोजन फिजियो डा. एसई हुदा की सोच का नतीजा था। मरीजों से निकल कर थर्ड जेंडर के लिए ऐसे आयोजन का जोखिम उठाना सराहनीय है।
4.11.08
भूतों को उल्टी-टट्टी नहीं होती है?
भाई भड़ासियों कौन कहता है कि भूतों को उल्टी-टट्टी नहीं होती है? अब मुझे ही देख लो मुझे मरे अरसा हो चुका है पर आज उल्टी हुई तो उसे भड़ास पर उगल रहा हूं। नीचे एक पोस्ट है कि साम्राज्यवाद के प्रतीक इंडिया गेट पर सलामी देना उचित है या नहीं.......आप इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि भड़ासियों का क्या भरोसा साले अगर कुछ उल्टा-सुल्टा बोल गये और किन्ही लोगों को जम गयी तो झंडे के नीचे आने से पहले ही बिदक कर भाग जाएगा। जो कुछ तर्क-कुतर्क पेलने हों तो कल जिधर बताया गया है उधर जाना लेकिन वहां भी कुछ बोलना मत क्योंकि सारे एक ही सुर में बोलेंगे। अरे मुझ सुपर चूतियेस्ट से पूछो तो बिना दिमाग लगाए बेवकूफ़ की तरह कह दूंगा कि अरे यार जिस तरह तमाम शहरों, रेलवे स्टेशनों के नाम बदले हैं वैसे ही बस उस समय की सरकार के कर्मचारियों से अगर अब आपको खुन्नस है और वे आपको गद्दार, साम्राज्यवाद के रक्षक आदि-आदि-इत्यादि महसूस होने लगे हैं तो उनके नाम हटा कर अपने पसंदीदा शहीदों के नाम लिखवा लो और सलामी जारी रहने दो, मचमच किस बात की है पन भिड़ू लोग! तुम सब ढक्कन हो, अरे जब तक राष्ट्र के हित में रोटी-कपड़ा-मकान जैसी टुच्ची-मुच्ची समस्याओं को नजरअंदाज करके करे जा रहे इस आंदोलन में लाठियां गोलियां चल कर कुछ लोग टपक न जाएं तब तक नाम नहीं बदले जाएंगे। इसलिये अपुन तो मर चुका है वरना जरूरच जाता पन भिड़ू लोग तुम लोग जाओ न इत्ते जरूरी मुद्दे के वास्ते जान देने कूं, देश साला सिविल वार जैसी सिचुएशन में आ गया है तो जरा मरना तो बीमा पालिसी निकाल लेना ताकि घर वाले सुख से रह सकें क्योंकि साम्राज्यवाद की रक्षा करते मरने वालों के पास तो ये आप्शन इच नईं था।
जय जय भड़ास
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: टिप्पणी, डा.रूपेश श्रीवास्तव, पोस्ट, भड़ास, साम्राज्यवाद
28.8.08
तकनीक दिक्कतों से भड़ास4मीडिया कई जगह नहीं खुल रहा
bhadas4media.com भड़ास4मीडिया.काम, नंबर वन न्यूज पोर्टल आफ हिंदी मीडिया... कुछ तकनीकी दिक्कतों की वजह से बीएसएनएल, एमटीएनएल और रिलायंस के इंटरनेट कनेक्शन वाले कंप्यूटरों पर नहीं खुल रहा है। यह दिक्कत पिछले कई दिनों से है। आज इस दिक्कत को कुछ हद तक दूर कर लिया गया है। कई साथियों ने मेल कर और फोन कर इस प्रसिद्ध पोर्टल के न खुलने की शिकायत की। एक साथी ने तो मेल में यहां तक लिखा कि पत्रकारिता में जगह बनाने के लिए एक मात्र सहारा भड़ास4मीडिया भी कई दिनों से साथ नहीं दे रहा और सूचनाएं नहीं मिल पा रहीं। इन सभी से कहना चाहूंगा कि कृपया वे थोड़ा धैर्य रखें। अब साइट खुल रही होगी। अगर नहीं खुल रही है तो वो मुझे मेल करके बताएं। साथ में ये भी बताएं कि उनका नेट कनेक्शन किसका है।
पिछले ढाई महीनों में भड़ास4मीडिया की अपार लोकप्रियता का अंदाजा इसके कंटेंट हिट (पेज व्यू) से लगाया जा सकता है। यह पेज व्यू साढे तीन लाख तक पहुंच गया है। इतने कम समय में एक नई साइट का इतना पेज व्यू हासिल करना काफी बड़ी बात बताई जा रही है।
उम्मीद है, भड़ास से पैदा हुआ इसका बच्चा भड़ास4मीडिया यूं ही तरक्की करता रहेगा। ऐसा तभी होगा जब आप लोगों को प्यार बना रहेगा। अगर आपके पास भी मीडिया से जुड़ी कोई सूचना या खबर है तो उसे आप yashwantdelhi@gmail.com पर मेल करते रहें।
हां, एक अनुरोध जरूर करना चाहूंगा। भड़ास4मीडिया को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और इसे स्वतंत्र रूप से चलाने के लिए हमें आप सभी पत्रकार साथियों का सहयोग चाहिए। आप में से कोई भी अगर भड़ास4मीडिया को विज्ञापन दिला पाने में सक्षम है तो इसके लिए वो मुझसे yashwantdelhi@gmail.com पर संपर्क कर सकता है। विज्ञापन के दर और प्रपोजल मेल के जरिए भेज दिया जाएगा। मुझे यह वाकई उम्मीद है कि हजारों की संख्या में अपने हिंदी पत्रकार भाइयों की मौजूदगी में अगर एक पत्रकार एक वर्ष में केवल एक बार भी दस हजार रुपये तक का विज्ञापन दिला दे तो हम बड़े आराम से भड़ास4मीडिया का आफिस और इसके स्टाफ का खर्च वहन कर सकते हैं। यह एक सामूहिक और सामुदायिक प्रयास है, इसमें आपकी भागीदारी अपेक्षित है। उम्मीद है आप सभी इस अनुरोध को गंभीरता से लेंगे।
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि 10 पत्रकार मित्रों ने खुद पहल कर मुझे फोन किया और भड़ास4मीडिया को विज्ञापन दिलाने का वादा किया। इसमें से 7 पत्रकार मित्रों ने दस हजार रुपये से लेकर 75 हजार रुपये तक के विज्ञापन दिलाए हैं। यह सिर्फ आगाज मात्र है। उम्मीद है, हर पत्रकार साथी जो भड़ास से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है, खुद ब खुद भड़ास4मीडिया के लिए काम करेगा। तभी यह छोटा बच्चा एक बड़े वट वृक्ष का रूप धारण कर सकेगा।
रूपेश जी ने भड़ासियों के 420 होने पर जो बधाई दी है, उसे मैं भी स्वीकार करता हूं। हम सब लगातार बढ़ रहे हैं और धीरे धीरे भड़ास अपने असली मुकाम तक पहुंचने की ओर अग्रसर है। आज 22 नए लोगों को भड़ास का सदस्य बनने के लिए लिंक भेज दिया है। इन सभी ने अपने नाम, पता, काम और मोबाइल नंबर yashwantdelhi@gmail.com पर भेज दिए थे।
भड़ास4मीडिया के चलते मेरी व्यस्तताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं इसलिए भड़ास ब्लाग पर कम ही समय दे पा रहा हूं। इसी के चलते न तो कोई नई पोस्ट लिख पाता हूं और न कमेंट डाल पा रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि साथी लोग इसका बुरा नहीं मानेंगे।
डा. रूपेश जी भड़ास ब्लाग पर हमेशा मौजूद रहते हैं और हर पोस्ट को पढ़ते रहते हैं। कई पर तारीफ के तो कई पर आलोचना के रूप में अपने कमेंट लिखते रहते हैं। हम सभी को डा. रुपेश के कमेंट पर बुरा मानने के बजाय उसे अपने संरक्षक द्वारा कही गई अपनी बात के रूप में लेना चाहिए। मानना या न मानना आपकी मर्जी है और आपकी मर्जी पर कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता। यही भड़ास की खासियत है। भड़ास पर लिखने में कोई रोक नहीं है लेकिन आपकी भड़ास दूसरे की जुबान बंद कर दे, ऐसा भी न हो।
उम्मीद है आप सभी स्वस्थ और सकुशल होंगे।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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17.6.08
कहीं भविष्य में फिर कोई बदमजगी ना हो
प्रिय भाई,
राजेश रपरिया जी का नंबर पूछने पर पता नहीं क्यों इतना विवाद पैदा हो गया, समझ नहीं पा रहा हूं। भड़ास के ही एक साथी के ज़रिये उनका नंबर मिल गया है, बात भी हो गई है। एक दो दिन में मुलाकात भी होगी।
निवेदन है उस पोस्ट को हटा दें, कहीं भविष्य में फिर कोई बदमज़गी ना हो।
उम्मीद है निवेदन स्वीकार करेंगे।
kishore kamal
kishorekamaldelhi@gmail.com
(किशोर भाई, पोस्ट को न हटाकर उस पर आए सारे कमेंट हटा दिए हैं। आपको राजेश जी का नंबर मिल गया, इसी मकसद से वो पोस्ट पब्लिश किया गया था। ....यशवंत)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: किशोर कमल, टिप्पणी, पोस्ट, फोन नंबर, भड़ास, राजेश रपरिया, सूचना
3.3.08
भड़ास की सदस्यता के लिए नई शर्त
रमेश शर्मा नामक सज्जन ने जिस तरह रेशमा और मोइन की नंगी सेक्स स्टोरी को बेहद अश्लील तरीके से लिखकर भड़ास पर प्रकाशित किया, उससे यह जाहिर हो गया कि कुछ लोग जान बूझकर भड़ास को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक साजिश करने के लिए उतर आए हैं। मुझे तुरंत ही इस पोस्ट को डिलीट करना पड़ा और इन सज्जन की मेंबरशिप को हटाना पड़ा। इससे पहले इन साजिशकर्ताओं की तरफ से ही किसी एक सज्जन ने अनाम नाम से एक सीनियर महिला ब्लागर का नाम लेकर उनके खिलाफ भड़ास के चैट बाक्स पर अश्लील कमेंट लिख डाले। मुझे तुरत फुरत बिना देर किए उस चैट बाक्स को ही लेआउट से रिमूव करना पड़ा।
उपरोक्त दोनों ही कारनामों के दौरान संयोग ये था कि मैं खुद आनलाइन था और मेरी नजर तुरंत इन जगहों पर पड़ गई। ऐसे में इन साजिशों को देखते हुए मुझे भड़ास की सदस्यता के लिए आनलाइन ओपेन इनविटेशन देने के बजाय मांगने पर सदस्यता देने का निर्णय लेना पड़ा ताकि सदस्यता देने से पहले संबंधित सज्जन के बारे में पड़ताल की जा सके। अब भड़ास का सदस्य बनने के लिए किसी को भी अपना मोबाइल नंबर व नाम लिखकर yashwantdelhi@gmail.com पर भेजना पड़ेगा। उनसे बातचीत के बाद ही उनकी सदस्यता एप्रूव की जाएगी।
मुझे उम्मीद है कि जितने भी लोग इस वक्त भड़ास के सदस्य हैं, उनमें जिन लोगों को मैं निजी तौर पर उनके लेखन, उनके ब्लाग, उनसे परिचय होने के नाते जानता हूं, उनके अलावा जो लोग हैं, वे संयम बरतते हुए कुछ भी ऐसा नहीं लिखेंगे जिससे किसी ब्लागर या किसी पाठक को कोई कष्ट हो। भड़ास आज भी अपने मूल मंत्र पर कायम है कि अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिए, मन हलका हो जाएगा....इस मूलमंत्र से जाहिर है कि वही बात लिखिए जो आपके जीवन व विचारधारा के सुख दुख से जुड़ी हो और जिसे आप अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हों। इसमें अश्लील बातें भी आ सकती हैं लेकिन उनका एक सामाजिक संदर्भ व संदेश व निजी जीवन से कोई मतलब होना चाहिए। सिर्फ काल्पनिक व गपोड़ी सेक्स कहानियों को भड़ास के मंच पर डालना आपराधिक कृत्य होगा।
उम्मीद है मौके की नजाकत को देखते हुए आप सभी लोग भड़ास जैसे सबसे बड़े हिंदी ब्लाग की व्यवस्था बनाए रखने में मदद करेंगे और इसे बढ़ाने में दिल ओ जान से प्रयास करेंगे।
जय भड़ास
यशवंत
yashwantdelhi@gmail.com
18.2.08
साथी मनीष राज, बेगूसराय वाले.....हम हार के जीतेंगे !!!
मनीष राज जी,
बेगूसराय वाले....
आपने जो ये वाली पोस्ट डाली है, जिसे हटाकर मैं ये सब बातें लिख रहा हूं, वो हम भड़ासियों के बीच ही विवाद पैदा करने वाली है। इसीलिए बतौर माडरेटर व एडमिन, मैं इसे हटा कर आपके नाम एक प्यारा से ये खत लिख रहा हूं।
आपसे आज फोन पर बतियाकर अच्छा लगा। इतने दूर होकर भी आप भड़ास से जिस कदर जुड़े हुए हैं, जितने उत्साह व आत्मा से अपनी बात रखते हैं, मैं उसका कायल हूं। बात करते हैं भड़ास की दशा-दिशा संबंधी विवाद पर, जिसके एक पक्ष को मैं और आप आवाज देते हैं और दूसरे पक्ष का डा. रुपेश, पूजा समेत ढेर सारे साथी प्रतिनिधित्व करते हैं।
मैं और आप न तो पूजा की बात के खिलाफ हैं, न डा. रुपेश जी के। दरअसल, देखा जाए तो ये विवाद कोई विवाद नहीं बल्कि भड़ास को सार्थक बनाने की पहल का है। और इसी तरह के अनवरत मंथन से अमृत निकलेगा। हम सब अलग-अलग सोच, बैकग्राउंड, शहर, मजबह, पेशे....के होने के बावजूद आत्मा से भड़ासी हैं। सरल सहज लोग हैं। और ये गुण सारे भड़ासियों में है, तभी वो भड़ास के सदस्य हैं। ये अलग बात है कि मात्रा किसी में कम या ज्यादा हो सकती है।
अगर मंजिल एक है तो रास्ते अलग अलग भी हों तो क्या दिक्कत है। आत्मा एक है और शरीर अलग अलग है तो क्या दिक्कत है। पूजा ने जो कहा है, और उनके समर्थन में जो साथी हैं, वो भी उतने ही सच्चे भड़ासी हैं, जितने कि मैं और आप जो भड़ास पर अपने तरीके से लिखना जीना चाहते हैं। और ये जो एकता में विभिन्नता है, यही तो रंग बिरंगे फूलों के गुलशन की नींव है। अगर सब एक तरह के हो जाएं, एक तरह से सोचें, एक जैसा ही लिखें तो फिर मामला एक रस नहीं हो जाएगा?
डा. रुपेश जी हम लोगों से काफी बड़े हैं, काफी अनुभवी हैं, वो सच्चे मायने में भड़ासी हैं क्योंकि हम लोग तो नौकरी वौकरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं, वो तो झोला उठा कर झुग्गी झोपड़ियों और गरीबों के बीच घूम कर उन्हें न सिर्फ मुफ्त इलाज देते हैं बल्कि उन्हें संगठित करने उनके हक के लिए लड़ते हैं। वो सच्चे अर्थों में सच्चे मनुष्य हैं। वो एक तरह से हम भड़ासियों के गार्जियन भी हैं। अगर वो किसी भड़ासी का कान उमेठते हैं तो ये उसे-हमें अपना सौभाग्य मानना चाहिए।
मनीष जी, मुझे ये पोस्ट हटाने के लिए माफ करेंगे क्योंकि दरअसल इस पोस्ट में पूजा की पोस्ट के कमेंट थे और आपने बस उपर एक लाइन और नीचे एक लाइन लिखा था, जो मेरे हिसाब से इसलिए आपत्तिजनक है क्योंकि इससे भड़ासियों की एकता में दरार पैदा हो सकती थी, ऐसी मेरी आशंका थी। हो सकता है मेरी आशंका गलत रही हो लेकिन मुझे इस पोस्ट को हटाने का निर्णय लेना पड़ा।
मनीष जी, भड़ास को अभी लंबा रास्ता तय करना है सो एकता बहुत जरूरी है। यह एक बड़ा परिवार है, औघड़ों का परिवार है, बंजारों का परिवार है, सच्ते दिलों का कुनबा है। और जब इतने बंजारे, आवारे, औघड़ एक जगह इकट्ठे हों तो वहां हंगामा तो बरपेगा ही। तो इसमें जरूरी यह है कि हम हर स्थिति में मुस्कराते रहें और एक दूजे को सम्मान देते रहें।
आपका भड़ासी साथी
यशवंत सिंह
