यशवंत जी बड़ा दुख हुआ भड़ास के दो सशक्त स्तम्भों के विरत हो जाने की ख़बर से...वैसे लोकतन्त्र में सभी को अधिकार है साथ चलने या अलग होने का ..लेकिन किसी भी भड़ासी के लिए भड़ास का लोकतान्त्रिक होने पर होने वाले गर्व पर आक्षेप है ये..इसलिए मैं आपके माध्यम से दोनों ही वरिष्ठजनों तक अपनी बात पहुचाना चाहता हूं कि ..दोनों को उनके इस कठोर निर्णय के लिए हार्दिक बधाई...वो इसलिए कि देर रात तकरीबन चार बजे के करीब मैने भड़ास पर अपनी पहली पोस्ट डाली थी ..तब तक पं सुरेश नीरव जी अपनी पूरी चमक भड़ास पर बिखेर रहे थे..लेकिन सुबह होते ही उनकी इच्छानुरूप ब्लाग से उनकी हर निशानी को मुक्त कर दिया गया...ये साबित करता है..कि भड़ास पूर्णतया लोकतान्त्रिक है..ये घटना ठीक उसी तरह से है..जैस एक बड़े तूफान के बाद इंसान की ताकत की पहचान होती है...पूरी उम्मीद है भड़ासी साथी भड़ास पर आये इस छोटे से तूफान से, दोनों ही अनन्य साथियों के साथ, भड़ास की किस्ती मझधार से निकाल लायेंगें....क्योकि हमें सच्चाई के मनकों को जोड़ना है..उन्हें तोड़ना नहीं..
ईश्वर सभी को ताकत दे..औऱ स्वतन्त्र अभिव्क्ति की क्षमता भी
10.7.08
भड़ास के दो साथियों का सम्मान, लोकतन्त्र की पहचान कराने के लिए
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राधेश्याम दीक्षित
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Labels: पं. सुरेश नीरव, भड़ासी, लोकतन्त्र
22.6.08
अरे हट जा ताऊ पाछे....दो ब्लागरों का स्वागत करें बढ़कर आगे...
दो ब्लागर साथी भड़ासी बन गए हैं। पीसी रामपुरिया और राजीव कुमार। पीसी रामपुरिया के ब्लाग का नाम है रामपुरिया....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा http://rampuriapc.blogspot.com/। राजीव कुमार के ब्लाग हैं दो टूक http://rajivguw.blogspot.com/ और विचार http://rajivkumar.mywebdunia.com/। राजीव पत्रकार हैं जो पूर्वोत्तर में हैं। पीसी रामपुरिया बिजनेसमैन हैं जो लोकल हरियाणवी लैंग्वेज में मस्त ताऊनामा पेश करते हैं। दोनों ब्लागरों की प्रोफाइल व ब्लाग जोरदार हैं। इन साथियों के भड़ासी बनने पर हम इनका सादर सत्कार करते हैं, अभिनंदन करते हैं और अपने डा. रूपेश जी व पंडित जगदीश त्रिपाठी जी से अनुरोध करूंगा कि वे जल्द ही इन दोनों भलेमानुसों को बुरामानुस बनाने की दीक्षा शुरू कर दें ताकि जो भी इन्हें देखे, पढ़े, जाने....भड़ासी है, भड़ासी है कहकर संबोधित करना शुरू कर दे और ये लोग खूब सोचकर भी यह तय न कर पाएं कि उन्हें भड़ासी कहा जाना उनका सम्मान है या अपमान है :) भई, हम तो इसे सम्मान मानते हैं पर कुछ सड़ियल भाई लोग इसे अपमान बताते हैं। ये आपको तय करना है कि सड़ियल लोगों के कहे के हिसाब से जीना है या अपनी सोच व विचार से जिंदगी के सफर को तय करना है। चलिए, भाषण काफी दे लिया, अब आप लोगों को इन दोनों ब्लागरों के ब्लाग से कुछ चीजें चुराकर पढ़ाते हैं, और हां, इनके ब्लाग को भड़ास के कोने में भी जगह दे दी गई है।
जय भड़ास
यशवंत
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ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
-पीसी रामपुरिया-
ताऊ लद्दा को भैंस चराते चराते अग्रेंजी बोलने का शौकचढ गया। और ताऊ को ठीक से हिन्दी भी नहीबोलनी आवै थी। पर क्या हो सकता है? ताऊ कै दिमागमे आ गयी, तो आ गयी। बहुत दिन तो घर पर ही प्रेक्टिस करता रहा, पर बात बणी नही। और ताऊ नैये पक्का इरादा कर लिया कि अग्रेंजी बोलना सीख के रहेगा। ताऊ बडा उदास हो रहा था। फ़िर किसी ने उसको बताया किपडोस के मोहल्ले मे एक मास्टरनी जी अग्रेंजी की क्लासलेती है और बहुत जल्दी अग्रेंजी सिखा देती है। सो मेरा मट्टा,ताऊ तो मास्टरनी के पास पहुंच लिया। और फ़ीस भी जमा करा दी । दो तीन महिने मे ताऊ थोडी बहुत अन्ग्रेजी की ऐसी तैसी करनेलग गया । इब एक दिन ताउ लद्दा के घर उसकी रिश्ते कीसाली आयी हुयी थी। ताऊ क्लास से शाम को घर आया, औरअपनी साली पर अग्रेंजी का रौब झाडने के लिये बोला -आइ लव यू ...रज्जो । साली भी पढी लिखी थी और अपने जीजा पर जान भीछिडकती थी, सो जवाब मे बोली - जीजा, आइ लव यू टू..! ताऊ लद्दा भी कहां चुप रहनै वाला था? ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
Posted by P. C. Rampuria View my complete profile
साभारः रामपुरिया.....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा
(आपको उपरोक्त ब्लाग पर ताऊ से संबंधित आपको मजेदार मजेदार पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी)
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आजादी नहीं, बर्बादी में लगा है उल्फा
--राजीव कुमार--
उल्फा नेता बांग्लादेश में है। संगठन के बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। कारण बांग्लादेश में बैठे उल्फा के शीर्ष नेता वहां के कट्टरवादी संगठनों की बोली बोल रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है। नहीं तो शरण कौन देगा। इसलिए बांग्लादेश के कट्टरवादी संगठनों को खुश करने के लिए उल्फा ने बम विस्फोटों की जिम्मेवारी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर डालनी शुरु कर दी है। उल्फा अब कोई विस्फोट करता है और उसमें यदि कोई मुस्लिम व्यकि्त मारा जाता है तो वह तुरंत इससे मुकर जाता है। गुवाहाटी के आठगांव और हाजो में हुए बम विस्फोट में मुसि्लम लोग मारे गए तो उसने देर किए बिना मीडिया में इसका खंडन भेजा। इन बम विस्फोटों के पीछे असम पबि्लक वर्क्स और आरएसएस के छात्र संगठन का हाथ होने का आरोप मढ़ दिया। अन्य विस्फोटों के मामले में वह इतनी हड़बड़ी नहीं दिखाता है। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,उल्फा बांग्लादेश में बैठे अपने मास्टरों को खुश करने के लिए यह करता है। बांग्लादेश में शरण के बदले उल्फा को वह सारी बातें माननी पड़ रही है जो असम के हितों के खिलाफ है। असम को आजाद कराने का सपना देखनेवाला संगठन इस तरह असम को ही क्षति पहुंचा रहा है।
बांग्लादेश से अबाध घुसपैठ होती है। इस पर वह चुप्पी साधे हुए है। वह बोल नहीं सकता। आसरा मिलने के कारण वह बेबस है। इसके चलते बांग्लादेश की वह योजना सफल होने की ओर बढ़ रही है जिसमें उसने निचले असम के कई जिलों को लेकर वृहतर बांग्लादेश बनाने का सपना देखा है। उल्फा के कंधे पर बंदूक रखकर वह इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उल्फा का जन्म 7 अप्रेल 1979 को शिवसागर जिले के ऍतिहासिक रंगघर में हुआ था। पर उसने बांग्लादेश में शरण दस साल बाद 1989 में ली। जब उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका हुई। जब उल्फा नेताओं ने बांग्लादेश में शरण ले ली तो राज्य में धीरे-धीरे मुसि्लम आबादी बढ़ने लगी। जानकार बताते हैं कि 1989 में उल्फा का एक नेता बांग्लादेश गया। उसने बांग्लादेश नेशनल पार्टी की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री से मुलाकात की। इस बैठक के बाद ही पाकिस्तान के पेशावर में वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटलीजेंस(आईएसआई)ने उल्फा के सदस्यों को 1990-91में प्रशिक्षण दिया। यह शुरुआत थी। लेकिन इसके पहले 1983 में उल्फा के चालीस सदस्यों ने म्यांमार के काचिन में एनएससीएन से हथियारों का प्रशिक्षण पाया था। इसमें उल्फा के सेना प्रमुख परेश बरुवा भी शामिल थे।इसके बाद 1986 में काचिन में 90 उल्फा सदस्यों ने प्रशिक्षण पाया। प्रशिक्षण पानेवालों में उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा भी शामिल थे। इसके बाद ही संगठन ने बांग्लादेश का रुख किया और असम के विनाश का दौर शुरु हो गया। 1971 की जनगणना के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 50.11प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 41.50थी। लेकिन 20साल बाद पूरी छवि ही बदल गई। 1991की जनगणना में इस जिले में हिंदुओं की आबादी घटकर 39.89प्रतिशत पर आई जबकि मुसलमानों की बढ़कर 60.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। यही हाल धुबड़ी जिले में हुआ। 1971की जनगणना के अनुसार धुबड़ी जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 38.80 प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 60.40 थी। लेकिन 1991की जनगणना के अनुसार इस जिले में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर 28.73प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 70.45प्रतिशत हुई।ठीक इसी तरह बरपेटा जिले में 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या51.52प्रतिशत और मुसलमानों की 48.65प्रतिशत थी। पर बीस साल बाद मुसलमानों की बढ़कर 56.07प्रतिशत और हिंदुओं की घटकर 40.26पर आ गई। हाइलाकांदी जिले में 1971की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 47.48 प्रतिशत और मुसलमानों की 51.40प्रतिशत थी।लेकिन बीस साल बाद हिंदुओं की आबादी इस जिले में घटकर 43.71प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 54.79प्रतिशत हो गई।राज्य के अधिकांश जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या घटी है जबकि मुसलमानों की बढ़ी है।वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदुओं की जनसंख्या 64.9प्रतिशत और मुसलमानों की 30.9प्रतिशत थी जबकि 1991की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या 67.1और मुसलमानों की 28.4प्रतिशत थी।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 36 में मुस्लिम बहुसंख्यक है। भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठियों का निरतंर आना जारी है।इन सबके बीच उल्फा ने हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोजगार का अवसर दे दिया है।स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक ने निचले असम के कई जिलों को लेकर मुस्लिमों के लिए अलग से स्वायत्त परिषद बनाने की मांग की है।उधर उल्फा के सहयोग से राज्य में जेहादी तत्व सक्रिय है।इन सब ने मिलकर राज्य को गर्त में ले जाने का कार्य शुरु कर दिया है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,असम स्वाधीन होकर नहीं रह सकता। माना कि हो भी गया तो वह पराधीन ही होगा। उल्फा नेताओं को उसे बांग्लादेश के इशारे पर ही चलाना होगा।इन सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में आसरा लेने की कितनी बड़ी कीमत उल्फा नेता चुका रहे हैं।जो आनेवाले दिनों में असम के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।कारण बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण राज्य में भारी जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संपर्क पता-राजीव कुमार
पोस्ट बाक्स-12,
दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660
Posted by- Rajiv Kumar View my complete profile
साभारः दो टूक
(पूर्वोत्तर को जानने, उस इलाके से जुड़े़ नीतिगत मामलों के बारे में एक पत्रकार के नजरिये को समझने के लिहाज से यह ब्लाग बेहद उपयोगी है)
29.2.08
दूसरों के घर में गंदगी देखने वाले इरफान ने भड़ास के कहने पर अपने घर की गंदगी साफ की, विवादित कार्टून हटाया
क्यों साथी इरफान जी?
काहें निकल लिए पतली गली से? आपने अपने ब्लाग पर जो कार्टून लगा रखा था, जिसमें एक नंगी स्त्री एक नंगे पुरुष का लिंग खींचे चली जा रही थी, भड़ास की आपत्ति के बाद क्यों हटा लिया? आप तो गंदगी के खिलाफ भड़ास को टारगेट कर मुहिम छेड़े हुए था पर मुझे नहीं पता था कि आप भी इस कदर की नीच गंदगी अपने ब्लाग पर फैलाए हैं। अब जबकि मैंने भड़ासियों से कह दिया है कि वो इरफान के ब्लाग को आपत्तिजनक कार्टून के चलते प्रतिबंधित कराने के लिए मुहिम छेड़ें तो आपको तब पता चला कि गंदगी तो आपके घर में टूटी हुई बिखरी हुई पड़ी है। अरे भइया, दूसरों के घर को सुधारने के पहले अपने घर में पहले ही झाड़ू वगैरह लगा लिये होते।
आपके ब्लाग के पोस्ट शील, अश्लील, कुछ टिप्स में जो गंदा कार्टून आपने लगाया था, वो अब नहीं है।
चलिए, भड़ास के चलते सदबुद्धि तो आई।
भड़ासियों भाई, कुछ दिनों तक धैर्य से...
एक बात भड़ासियों से, भई, थोड़ा माहौल गरम है, तब तक संयत भाषा का प्रयोग करें, कभी भी किसी को टारगेट लेते हुए न लिखें। आपको पता ही है कि बाहर की दुनिया कितनी चालबाज और रणनीतिक होती है, ये कर गुजरेंगे और हम लोग बाद में नुकसान का आंकड़ा ही लगाते रहेंगे। इसलिए इन दिनों जब माहौल गर्म है, संयम और संयत रहें। अपनी बात लिखें पर गालियों को जहां जरूरी हो, वहीं इस्तेमाल करें। हालांकि आप लोगों का यह कहना सही है कि जिसे ये ब्लाग न पढ़ना हो न पढ़े, अपने ब्लाग में मगन रहे, क्यों यहां आकर गुह में मुंह मारते हैं, बावजूद इसके, हम हिंदी वालों का दिमाग अब भी फ्यूडल है और हम कतई लोकतांत्रिक नहीं हुए है इसलिए कई बार मठाधीशों को यह बात सालती रहती है कि आखिर भड़ास इतना लोकप्रिय और इतने सदस्यों वाला क्यों है। भड़ास उनकी आंख की किरकिरी बना हुआ है। इसलिए हम लोगों को अभी रणनीतिक तौर पर कुछ दिनों तक जब तक यह विवाद शांत न हो जाए, अपना काम चुपचाप करते रहना है।
अगर मान भी लो कि भड़ास पर पाबंदी लग गई तो कोई बात नहीं। यह भी हम लोगों के लिए अच्छा होगा। भड़ास फिर ब्लागस्पाट की वजाय खुद के डाट काम नाम से आएगा जिससे कोई किसी से शिकायत करे, हम लोगों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। इसीलिए तो गीता में कहा गया है कि जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा होगा....खुश रहिए, मस्त रहिए।
जय भड़ास
यशवंत सिंह
20.2.08
225 भड़ासी.....अंग्रेजों को भगाया, अब अंग्रेजी को भगायेंगे
आज भड़ासियों की संख्या 225 हो गई। बधाई सभी को। नए लोगों का स्वागत। अभी नए लोग कम लिख रहे हैं। सदस्य जितनी ज्यादा संख्या में हैं, उसके अनुपात में सक्रिय सदस्यों की संख्या काफी कम है। प्लीज, आप लोग मुंह खोलो। अपने अपने कंप्यूटर में यूनीकोड लोड करो। या गूगल बाबा के सहयोग से अंग्रेजी रोमन में लिखकर हिंदी में अनुवाद करो। पर लिखो, ताकि हम हिंदी वाले कह सकें कि जी, अब हमारा जमाना है। अंग्रेज को तो कबका भगा दिया, अब अंग्रेजी को भगाना है। इसके लिए हम हिंदीवालों को अपनी हिचक छोड़कर आनलाइन दुनिया में छा जाना है।
सभी भड़ासी यह तय कर लें कि वो हर हफ्ते किसी एक और हिंदीवाले को भड़ास का मेंबर बनायेंगे। हफ्ते में हर भड़ासी कम से कम एक पोस्ट जरूर डालेगा, भड़ास पर। इन दोनों कामों से हम हिंदीवालों की एकता मजबूत तो होगी ही, हम अपने भदेसपन को संगठित कर इन चूतिये शहर वालों को चार लात मार पायेंगे जो पिटिर पिटिर अशुद्ध अंग्रेजी बोलकर सोचते हैं कि वो सबसे काबिल लोग हैं। ऐसों को शुद्ध हिंदी में गरियाने के लिए मंच है भड़ास... बेटा, तुम साले एक नंबर के चूतिये लोग हो, भारत में पैदा हुए, यहीं पढ़े लिखे, यहीं की खा पी रहे हो और अंग्रेजी बोल के समझ रहे हो सबसे होनहार। तुम जैसों के गांड़ पर पड़ेगी अब लात। अब तो होली करीब है....मूड भी होलियाना है तो कहते हैं ना....बहुत हुआ सम्मान अंग्रेजी वालों, फाड़ेंगे अब गांड़ अंग्रेजी वालों.....!!!
जय भड़ास
यशवंत
10.2.08
भड़ास पर डलेगा भड़ासियों के ब्लागों के लिंक
बहुत दिनों से साथी लोग मांग कर रहे थे कि जो भड़ासी लोग हैं, उनके अपने निजी ब्लागों के लिंक भड़ास पर डाले जाएं ताकि भड़ास के जरिए अन्य पाठक जान सकें कि भड़ासियों के अपने अपने ब्लाग भी हैं। सो, उनकी इस मांग को उचित और वाजिब मानते हुए अब तय किया गया है कि भड़ास पर अन्य भड़ासी साथियों के ब्लागों का लिंक भी डाला जाएगा।
सभी भड़ासी साथियों से अनुरोध है कि अगर उनका ब्लाग हो, चाहे उसपे पोस्ट पड़ती हो या नहीं, पुराना हो या नया, कम लिखा गया हो या ज्यादा, उसके बार में मुझे एक मेल के जरिए सूचित कर दें। उस मेल में आप ये चीजें जरूर डालेंगे...
ब्लाग यूआरएल--
ब्लाग हिंदी नाम--
ब्लाग माडरेटर--
उदाहरण के लिए
ब्लाग यूआरएल- http://bhadas.blogspot.com
ब्लाग हिंदी नाम- भड़ास
ब्लाग माडरेटर- यशवंत सिंह और डा. रुपेश श्रीवास्तव
आप मुझे yashwantdelhi@gmail.com पर उपरोक्त सूचनाओं को मेल कर दें। जल्द ही सभी ब्लागों के लिंक भड़ास पर डाल दिए जाएंगे।
जय भड़ास
यशवंत
11.1.08
151 भड़ासी
बेहद विनम्रता से हम सूचित कर रहे हैं कि भड़ास की सदस्य संख्या अब 151 हो गई है। स्वागत है नए भड़ासियों का, इस ब्लागिंग की दुनिया में। हिंदी मीडियाकर्मियों के सबसे लोकप्रिय और सबसे बड़े कम्युनिटी ब्लाग में। नये वर्ष में आप सभी आनलाइन मीडिया और माध्यम से खूब जुड़ें, खूब लिखें, खूब सीखें-समझें और बूझें। इसके लिए मेरी शुभकामनाएं।
जिन नये साथियों ने ज्वाइन किया है और जो साथी पहसे से डटे हुए हैं, उनका हार्दिक आभार। पर अब भी लिखने वाले भड़ासियों की संख्या बेहद कम है। लोग जाने क्यों नहीं लिख रहे। यहां तो किसी क्वालिटी या किसी स्तर की बात ही नहीं की जा रही। हम तो आप जैसे हैं, वैसे गले लगाने को तैयार हैं। पर आप हैं कि टस से मस नहीं हो रहे। सिर्फ मूकदर्शक बने रहने, पढ़ते रहने में मगन हैं। कुछ भी। कुछ भी लिखिए।
हमें पता है आप कुछ भी लिखेंगे तो भी अच्छा लिखेंगे। अपने मन की बात लिखेंगे। कविता के रूप में। व्यंग्य के रूप में। कहानी के रूप में। संस्मरण के रूप में। खबर के रूप में। क्योंकि आप लिखने पढ़ने से जुड़े हैं। क्योंकि आपने लिखने पढ़ने से ही बढ़ना और बढ़ाना सीखा है। तो भड़ासियों भाइयो, आप सभी से अनुरोध है कि भड़ास पर न्यू पोस्ट डालिए। अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ को व्यक्त करिये। ताकि आपके जीवन में कुछ और रंग जुड़ सकें। कुछ भड़ास निकले। कुछ मन हलका हो।
चलिए, एक बार फिर सभी नए भड़ासियों का स्वागत।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: भड़ासी
