यशवंत जी बड़ा दुख हुआ भड़ास के दो सशक्त स्तम्भों के विरत हो जाने की ख़बर से...वैसे लोकतन्त्र में सभी को अधिकार है साथ चलने या अलग होने का ..लेकिन किसी भी भड़ासी के लिए भड़ास का लोकतान्त्रिक होने पर होने वाले गर्व पर आक्षेप है ये..इसलिए मैं आपके माध्यम से दोनों ही वरिष्ठजनों तक अपनी बात पहुचाना चाहता हूं कि ..दोनों को उनके इस कठोर निर्णय के लिए हार्दिक बधाई...वो इसलिए कि देर रात तकरीबन चार बजे के करीब मैने भड़ास पर अपनी पहली पोस्ट डाली थी ..तब तक पं सुरेश नीरव जी अपनी पूरी चमक भड़ास पर बिखेर रहे थे..लेकिन सुबह होते ही उनकी इच्छानुरूप ब्लाग से उनकी हर निशानी को मुक्त कर दिया गया...ये साबित करता है..कि भड़ास पूर्णतया लोकतान्त्रिक है..ये घटना ठीक उसी तरह से है..जैस एक बड़े तूफान के बाद इंसान की ताकत की पहचान होती है...पूरी उम्मीद है भड़ासी साथी भड़ास पर आये इस छोटे से तूफान से, दोनों ही अनन्य साथियों के साथ, भड़ास की किस्ती मझधार से निकाल लायेंगें....क्योकि हमें सच्चाई के मनकों को जोड़ना है..उन्हें तोड़ना नहीं..
ईश्वर सभी को ताकत दे..औऱ स्वतन्त्र अभिव्क्ति की क्षमता भी
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10.7.08
भड़ास के दो साथियों का सम्मान, लोकतन्त्र की पहचान कराने के लिए
Posted by
राधेश्याम दीक्षित
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Labels: पं. सुरेश नीरव, भड़ासी, लोकतन्त्र
24.6.08
तो गूंगे भी कोरस में गाने लगेंगे
खुले में कहीं वो नहाने लगेंगे
बदन पर जो साबुन लगाने लगेंगे
कसम से खुदा की मैं कहता हूं यारो
तो गूंगे भी कोरस में गाने लगेंगे
००००
जो बूढ़े भी नजरें लड़ाने लगेंगे
वो मंजर भी कितने सुहाने लगेंगे
किया इश्क का न बुढ़ापे में लफड़ा
तो बच्चों को डैडी जनाने लगेंगे।
-पं. सुरेश नीरव
मो.-९८१०२४३९६६
Posted by
Arvind pathik
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Labels: दो कते, पं. सुरेश नीरव, भड़ास
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