जब हमें तेरी रुसवाईयाँ डसती हैं ।
7.8.12
तेरी रुसवाई । (गीत)
जब हमें तेरी रुसवाईयाँ डसती हैं ।
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Markand Dave
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5.8.12
जब सारा आलम सो गया । (गीत ।)
जब सारा आलम सो गया । (गीत ।)
जब सारा आलम सो गया, दर्द मेरा ये जाग रहा ।
अंतरा-१.
रात अमा, घना अंधेरा, नज़र न आये कहीं सवेरा ।
अन्तरा-२.
नाकामी की करवट संगत, चीख रहे ये सन्नाटे ।
अंतरा-३.
कलमा भरूँ, सजदा करूं या रहूँ यूँ ही ग़मज़दा ।
अंतरा-४.
अय रात तुम ठहरना ज़रा, अय दिल तुम सँभलना ज़रा ।
14.11.11
मेरे वतन की मिट्टी । (गीत)
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Markand Dave
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4.5.11
मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
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प्यारे दोस्तों,
गीतकार-स्वरांकन-संगीत-गायक-मार्कंड दवे ।
स्वरायोजन-प्रसुन चौधरी.
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मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
DOWNLOAD LINK-
http://www.4shared.com/audio/Z30y-312/maut_ki_aahat.html
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ज़िंदगी अब तो गिन-गिन के बदला लेती है ।
उनको अब जीने की रीत देखो सिखाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
कहानी मेरी ही अब मुझ को सुनाई जाती है ।
हर साँस मे ...................
३.
आखरी ख़्वाहिश सभी से तो पूछी जाती है ।
हर साँस मे ...................
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/blog-post_9627.html
मार्कड दवे । मई -२३.२००९.
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Markand Dave
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3.7.09
नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई, इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
समलैंगिकता नैतिकता से जादे कानूनी दांव-पेच के मसला बन के रह गइल बा...आज हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसला के बाद समलैंगिक समाज के लोग के खुशी के ठिकाना नइखे. मगर भारत जइसन पारंपरिक देश में समलैंगिकता पर असमंजस के स्थिति बा.. कोर्ट के कहनाम बा कि धारा 377 जनता के मौलिक अधिकार के हनन बा.. एह से दिल्ली हाईकोर्ट भारतीय दंड़ संहिता के धारा 377 के अपराध के श्रेणी से हटा दिहले बा... न्यायालय के कहनाम बा कि अगर आपसी रजामंदी से कवनो वयस्क पुरुष चाहे महिला आपस में संबंध बनावत बाड़न त ऊ धारा 377 के श्रेणी में ना आई.... कोर्ट के ई फैसला के बाद समलैंगिक लोग में खुशी के लहर दौड़ गइल बा... एगो लइका अपना बाबूजी के समझावत बा- --------------
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई
हाई कोर्ट देले बाटे अइसन एगो फैसला
गे लोग के मन बढल लेस्बियन के हौसला
भइया संगे मूंछ वाली भउजी घरे आई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
खतम भइल धारा अब तीन सौ सतहत्तर
घूमतारे छूटा अब समलैंगिक सभत्तर
रीना अब बनि जइहें लीना के लुगाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
पछिमे से मिलल बाटे अइसन इंसपिरेशन
अच्छे भइल बढी ना अब ओतना पोपुलेशन
बोअत रहीं बिया बाकि फूल ना फुलाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
इ पछुआ बयार हवे रउरा ना बुझाई
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई,
इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
रचनाकार : मनोज भावुक
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: गीत, भड़ास, भोजपुरी, मनोज भावुक, समलैंगिकता
4.3.08
गीतकार रमेश रमनः गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला.....
((पिछले दिनों हरिद्वार यात्रा पर था तो कई पोस्टों के जरिए कई कई अनुभवों, मिलाकातों, भ्रमण आदि के बारे में बताया था। पर एक चीज छूट गई थी जो शायद सबसे कोमल चीज है। हरिद्वार के बसे और देश भर में मशहूर गीतकार रमेश रमन से मुलाकात। डा. अजीत तोमर के सौजन्य से जब रमेश रमन जी से मिलने उनके आफिस पहुंचे तो उस वक्त आफिस बंद होने का समय हो चला था। ढलती हुई शाम के वक्त रमन जी के आफिस में हो शुरुवाती परिचय होने के बाद जो स्वर लहरियां फूटीं तो रुकने थमने का नाम ही नहीं लेतीं। मुझसे रहा नहीं गया, कागज कलम उठाकर तुरंत नोट करने लगा। शब्द जितने अच्छे, स्वर उतना ही उत्तम। ये संयोग, ये मेल बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। अगर संक्षेप में कहूं कि मेरी हरिद्वार यात्रा का सबसे कोमल पक्ष व सबसे संवेदनशील पक्ष कोई रहा है तो वो रमेश रमन जी से मुलाकात ही है। देर से ही सही, मैं रमन जी द्वारा लिखित कई गीतों, कविताओं को यहां नीचे भड़ासियों के लिए डाल रहा हूं। मैं तो इन सभी को उनके कोमल कंठ से मय राग के सुन आया हूं इसलिए मैं तो इन लाइनों के पिछे छिपे धुन व संगीत को भी महसूस कर पा रहा हूं व बैठे बैठे गुनगुना भी रहा हूं। आप लोग फिलहाल पढ़िए, कभी मौका मिला तो भड़ास सम्मेलन के दौरान रमन जी को बुलाया जाएगा...जय भड़ास, यशवंत))
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1.
तू अगर पुरवाई है तो
तू अगर पुरवाई है तो बादलों के साथ आ
प्यास धरती की बुझा, ये पेड़ पौधे मत हिला
खेत की क्यारी है सूखी, आ जरा यहां घूम जा
भीगे भीगे होठों से तू, क्यारी क्यारी चूम जा
झरनों को दो जिंदगी, कुछ नदी का कर भला
तू अगर पुरवाई है तो...............
धूल धरती की उड़ा मत, देख फूलों को सता मत
दर्द सोये तू जगा मत, प्यास को पागल बना मत
गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला
तू अगर पुरवाई है तो...............
प्यास की तू अंजुली भर, कुछ दान कर कुछ पुण्य कर
आके पेड़ों को नहला जा, कर कृपा इन फूलों पर
परियों की तरह उतरकर, परिंदों को झुला झूला
दू अगर पुरवाई है तो................
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2.
बिन आहट के आ जाते हो
बिन आहट के आ जाते हो
आंखों को नहला जाते हो
बहुत सताते हो पलकों को
सांसों को उलझा जाते हो
बिन आहट के......
सागर के पानी से खारे
कैसे कह दें तुम हो हमारे
कितने राज छुपा जाते हो
अंदर कुछ पिघला जाते हो
बिन आहट के .....
तुम ममता की गोद पले हो
तुम यादों के बहुत सगे हो
कितने दर्द जगा जाते हो
दिल को बहुत दुखा जाते हो
बिन आहट के ......
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3.
आम कट गया
आम कट गया
शीशम ने तो देखकर
आंखें फेर लीं
पीपल ने पूजा का
बहाना बनाकर
मौन धारण किया
बरगद को अपने बुढ़ापे
का खयाल आया
कुछ नहीं बोला
और......
आम कट गया
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4.
अस्तित्व की कविता सुनें
आओ कभी किसी वृक्ष से अस्तित्व की कविता सुनें
या फिर कभी किसी फूल से व्यक्तित्व की कविता सुनें
जीना का दर्शन सरल मिल जायेगा निश्चित है ये
आओ कभी किसी दीप से अपनत्व की कविता सुनें
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5.
तुम्हारा मेरा साथ
तुम्हारे पास अर्थ बहुत है
मेरे पास शब्द बहुत हैं
आओ, थोड़ी दूर तक चलें
शब्दार्थ बनकर
जीवन के भावार्थ से मिलने
विश्वास रखना
तु्म्हारे अर्थ का अनर्थ नहीं होने दूंगा
तुम्हें भी ध्यान रखना होगा
कि मेरा कोई भी शब्द
अपशब्द की संज्ञा न पा जाए
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उपरोक्त सभी गीत व कविताएं गीतकार रमेश रमन द्वारा रचित हैं। आप रमन जी से उनके निवास के फोन 01334-220749 और कार्यालय के फोन 01334-227904 पर फोन कर संपर्क कर सकते हैं।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: गीत, डा. अजीत तोमर, मुलाकात, रमेश रमन, संस्मरण, हरिद्वार
21.2.08
श्रद्धांजलि... रउरा सासन के ना बड़ुए जवाब भाईजी
(यह पोस्ट डा. मांधाता सिंह द्वारा प्रेषित पोस्ट के बीच में अजीब तरीके से अटकी पड़ी थी, उसे वहां से निकाल कर अलग से डाल रहा हूं ताकि यह ध्यान में आने से रह न जाए....यशवंत)
विजेंद्र अनिल के भोजपुरी गीत
जनवरी 1945 को बक्सर जिले के बगेन में जन्मे कथाकार, कवि विजेंद्र अनिल का इसी माह तीन तारीख को देहांत हो गया। 1968 से 70 तक उन्होंने अपने गांव से ही प्रगति पत्रिका भी प्रकाशित की थी। आजीवन भाकपा माले से जुडे रहे विजेंद्र अनिल ने बदलते समय में भी अपने सरोकार नहीं बदले थे। गोरख पांडे के बाद अपनी तरह से मेहनतकश ग्रामीण किसान जनता के दुख-दर्द को उन्होंने अपने गीतों में स्वर दिया। विजेंद्र अनिल को समूचे रिजेक्ट समुदाय की तरफ से श्रद्धांजलि. यहाँ प्रस्तुत है भोजपुरी मे लिखी उनकी चर्चित कविता....
जरि गइल ख्वाब भाई जी
रउरा सासन के ना बड़ुए जवाब भाईजी,
रउरा कुरूसी से झरेला गुलाब भाई जी
रउरा भोंभा लेके सगरे आवाज करींला,
हमरा मुंहवा पर डलले बानी जाब भाई जी
हमरा झोपड़ी में मटियों के तेल नइखे,
रउरा कोठिया में बरे मेहताब भाई जी
हमरा सतुआ मोहाल, नइखे कफन के ठेकान,
रउआ चाभीं रोज मुरूगा-कवाब भाई जी
रउरा छंवड़ा त पढ़ेला बेलाइत जाइ के
हमरा छंवड़ा के मिले ना किताब भाई जी
रउरा बुढिया के गालवा प क्रीम लागेला,
हमरा नयकी के जरि गइल ख्वाब भाई जी
रउरा कनखी पर थाना अउर जेहल नाचेला,
हमरा मुअला प होला ना हिसाब भाई जी
चाहे दंगा करवाईं, चाहे गोली चलवाईं,
देसभक्तवा के मिलल बा खिताब भाई जी
ई ह कइसन लोकशाही, लड़े जनता से सिपाही,
केहू मरे, केहू ढारेला सराब भाई जी
अब ना सहब अत्याचार, बनी हमरो सरकार,
नाहीं सहब अब राउर कवनो दाब भाई जी
चाहे हथकड़ी लगाईं, चाहे गोली से उड़ाईं
हम त पढ़ब अब ललकी किताब भाई जी
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: गीत, डा. मांधाता सिंह, पलाश, भड़ास, भोजपुरी, विजेंद्र अनिल
20.2.08
साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
((Guru, BHADAS par post karne ke liye ek kavita bhej raha hoon.
kripaya ise publish karne ka kasht karen.... Pankaj))
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((पंकज भाई, भड़ास पर लोग अपनी अपनी पोस्ट खुद पब्लिश करते हैं। यहां वो वाली व्यवस्था नहीं है कि संपादक जी देखेंग, जाचेंगे फिर छापेंगे। अगर आप भड़ास के मेंबर हैं तो आप सीधे पोस्ट लिखें और उसी क्षण पब्लिश कर दें। आपके अनुरोध पर आप द्वारा प्रेषित कविता नीचे डाल रहा हूं, आगे से आप खुद सीधे पोस्ट करें तो हम सबको अच्छा लगेगा। भड़ास का मेंबर बनने के लिए उपर बाईं ओर जो लिखा है भेज रहा हूं नेह निमंत्रण, उस पर क्लिक करें। फिर अपनी जीमेल आईडी व पासवर्ड फीड करें, बस हो गए भड़ासी...यशवंत))
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साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
ये कायकू कैता है मेरे कू बोलने का नइ
अपुन नइ बोलेंगा तो और कोन बोलगा मेरे वास्ते
तू इदरीच आके मेरे कू जास्ती बोलने से रोकता है भिडु
कि ये साला भाई लोग खल्लास करेगा जरूर मेरे को किसी दिन
ये साले भंडुवे ठुल्ले रोज आकर वसूलते हैं अपना हिस्सा
और फिर भी दांत दिखाके कैसा एहसान दिखाता है नेता के माफिक
भाई तो कभी भी आ जाता है हफ्ता वसूलने पूरे लश्कर के साथ
अपुन कैसा चूतिया के माफिक खाली देखता रह जाता है खोली के माफिक
ये भड़ुंवागिरी तो भिडु मरवाने से बुरा है अपुन जानता है
मगर सेठ लोग जो साला मार-मार के लोगों को माल बनाता है
और यहां कमाठीपुरा में अपुन लोगों पर धौंस दिखाता है
कभी पोलिस का तो कभी नोटों के बंडल का ताबड़तोड़
ये जो पेज थ्री पार्टियों में डीलिंग करते हैं बड़े-बड़े धंधों का
हार्लिक्सी नस्ल की लौंडियों को पेश करके रोशनी के भीतर के अंधरे में
सेठ लोग ये साला बड़ी-बड़ी फैक्ट्री चलाता, पैसा बनाता और इज्जतदार हो जाता है
भंडुवागिरी करके वह साला समाज और सरकार दोनों का बाप बन जाता है
अब तो हमारा यह सरकारी और सामाजिक बाप
कमाठीपुरा को उजाड़ने का ले आया है आर्डर
चलाएगा बुलडोजर और साफ करके खेत बना डालेगा हमारी खोली को
जहां बननेवाले बड़े-बड़े मॉल में आएंगी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में
बड़े-बड़े सेठों के घर में सप्लाई की जानेवाली हाई क्लास की सोशलाइटें
हमारा काम ताबड़तोड़ करेंगे सेठ लोग बिल्कुल पेशेवर की माफिक
दस पेटी, बीस पेटी माल इधर से उधर होगा मिनटों में
अपुन गटर के कीड़े की माफिक कुलबुलाते हुए जीने के लिए भी
गिड़गिड़ाता रह जाएगा और आक्खा मुंबई से बुहारकर फेंक दिया जाएगा
हमारा कौन-सा देश है भिडु
साला तुम भी नहीं बोलता कुछ
वह देश ढूंढकर ला दे मेरे कू सारे जहां से अच्छा गाता है
बच्चा लोग म्यूनिस्पेलिटी के स्कूल में
अपुन को न कोई जीते जी जीने देता न मरने पर श्मशान में जगह देता
जिंदगी भर साला हरामी, आवारा सुन-सुनकर लात खाते हुए जीना....
मैं पूछता हूं सेठों, भाई लोगों से और दांत निकाले नेता लोगों से
कहां है मेरा देश, कौन है मेरे जीने के अधिकारों का पहरूआ?
बोलता कोई नहीं, साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
--पंकज पराशर
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: कविता, गाना बजाना, गीत, पद्द, पुंकज पराशर, भड़ास, संगीत
पीटें प्रेत थपोरी
खेलें मसाने में होरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
भूत पिशाच बटोरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
लखि सुंदर फागुनी छटा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भरी झोरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
गोप न गोपी श्याम न राधा
ना कोई रोक न कउनो बाधा
ना साजन ना गोरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
नाचत गावत डमरूधारी
छोड़े सर्प गरल पिचकारी
पीटें प्रेत थपोरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
भूतनाथ की मंगल होरी
देखि सिहायें बिरिज के छोरी
धनधन नाथ अघोरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
खेलें मसाने में होरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी
((गाया है पंडित छन्नू मिसिर ने, रचनाकार का नाम नहीं मालूम))
कुछ इस तरह से हमने जवानी निकाल दी
थोड़ी सी पी शराब
थोड़ी उछाल दी
कुछ इस तरह से हमने
जवानी निकाल दी
हमने सिया है इश्क में होठों को इस तरह-3
जिसने भी दी जहां में हमारी मिसाल दी
थोड़ी सी पी शराब....
अब डर नहीं किसी का जमाने में दोस्तों-3
हमने तो दुश्मनी भी मोहब्बत में ढाल दी
थोड़ी सी पी शराब....
मैं चूर हूं नशे में, मुझे कुछ खबर नहीं-3
मुझपे निगाहे शोख कब तुमने डाल दी
थोड़ी सी पी शराब....
((गाया है गुलाम अली ने, रचनाकार का नाम नहीं मालूम))
11.2.08
शिलाएं क्या...!
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Girish Billore Mukul
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