Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label MARKAND DAVE. Show all posts
Showing posts with label MARKAND DAVE. Show all posts

18.9.14

ख़्वाबों की बातें । (गीत)


ख़्वाबों की  बातें । (गीत)

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
फिर  शब-ए- तन्हाई  में, रोया  करते  हैं  वो..!
 
शब-ए-तन्हाई= रात का अकेलापन;
१.
ज़िंदगी में  कई  हादसे,  आप ने  झेले मगर..!
टूटे ख़्वाबों का  शिकवा  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
शिकवा=शिकायत,
२.
बिखरा सा  वो   ख़्वाब  और  अँधेरी  वो  रात..!
हाँ, मातम अब उनका, मनाया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
३.
ख़्वाबों की  तसदीक़, हम  करें  भी  तो  कैसे..!
शब  होते  हमें, रुकसत  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
तसदीक़ = सच्चाई की परीक्षा; शब=रात,
४.
इस  ग़म में, हम भी जागे  हैं   कई  रात,  पर..!
अब  हमें, दूर से   सलाम  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया  करते  हैं  वो..!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१७-०९-२०१४.

24.5.14

मन । (गीत)

 http://mktvfilms.blogspot.in/2014/05/blog-post_24.html  

मेरा मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
किसी   बात   पर,  वफ़ा   कायम  नहीं ?
 

१.
 

मन के  द्वार,  हर  दिन  है  जश्न  मगर..!
उसके   तो    क...भी    ऐसे , करम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

२.
 

निपटता   है   मन  और  थकता  हूँ  मैं..!
बस,  आगे   और  इक  भी  कदम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

निपटना = तय करना;
 

३.
 

वश  में    होता   है    मन   कहा   मगर..!
इस   बात  में   कभी,   कोई   दम  नहीं..!
मेरा  मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

४.
 

वफ़ा  की    चाह,  रब  को  भी  है   मगर..!
चंट  ने   कहा,  ऐसा  कोई   नियम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

चंट = धूर्त-कपटी मन;
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०५-२०१४.

13.5.14

Short story-11. `बला ।`


 Short story-11. `बला ।`

करीब साठ साल की आयु के सेठ प्रताप राय के यहाँ, उनकी, करीब तेईस साल की, दूसरी पत्नी `सतवंती`ने सेठ जी को नन्हा वारिस दिया था । इसीलिए आज सुबह से, धार्मिक हवन आयोजन के चलते कोठी में काफी चहलपहल थी ।
 
पर..,ये क्या..! युवा पंडित `रतिराज` हवन में शुद्ध घी की आहुति दे रहे थे कि अचानक, एक छिपकली का बच्चा, ऊपर छत से, हवन-कुण्ड में आ गिरा..! पूजा में बैठी सेठानी `सतवंती` और 'रतिराज', दोनों ने  यह दृश्य देखा । हालाँकि,कोई दूसरा इसे देख ले उस से पहले ही, युवा पंडित,'रतिराज` ने  ज़ोर-ज़ोर से तुरंत, "॥ ॐ बला टली स्वाहा ॥' मंत्र जाप करते हुए हवन-कुण्ड  में शुद्ध घी का पुरा पात्र  उड़ेल दिया जिस से, छिपकली का बच्चा पलभर में भस्म हो गया...!
 
धार्मिक कर्म संपन्न होने के पश्चात, `सतवंती`ने अपने कर कमलों से, युवा पंडित 'रतिराज' को दान-दक्षिणा देते हुए धीमे स्वर में कहा," सुनिए, आप के लिए तीन लिफाफे है..! पहला-आप ने, मेरी सारी बला का तोड़ निकाला, दूसरा-निर्विघ्न हवन कर्म संपन्न कराया और तीसरा- इस घर में वारिस के लिए जो आशीर्वाद दिया, इसके बदले इस लिफाफे में  आप की दक्षिणा के मैंने एक लाख रुपये ज्यादा रखें हैं..! 

और हाँ आज के बाद, हम कभी आमने-सामने नहीं होंगे । 
समझना, आप के जीवन से भी  `सतवंती` नाम की एक `बला` टल गई..!"
मार्कण्ड दवे ।
दिनांकः १३-०५-२०१४.



MARKAND DAVE

10.5.14

Short story-10. प्याऊ ।



 Short story-10. प्याऊ ।

https://www.youtube.com/watch?v=0WwDHXiXcIE&feature=youtu.be

http://mktvfilms.blogspot.in/2014/05/short-story-10.html

"अय बुढ़िया..! चुनाव सर पर है,आज प्रधान मंत्री जी आने वाले है, उनकी सुरक्षा का जिम्मा हम पर है, चल उठा तेरा प्याऊ का सामान और भाग यहाँ से..!" गाँव की कच्ची सड़क के किनारे स्थित पेड़ के नीचे, आते-जाते राहदारी को शीतल जल पिलाने वाली बूढ़ी मैया पर, दरोगा साहब ने रोब दिखाया और डंडे से प्याऊ की सारी मटकी फोड़ कर, ज़ोर-ज़ोर से गुर्राने लगे..!

बूढ़ी मैया बिना कुछ बोले, प्याऊ का बाकी सामान ले कर सामने वाले झोंपड़े में चली गई । थोड़ी ही देर में, प्रधान मंत्री जी का काफ़िला आया और वही पेड़ के नीचे रुक गया..! 

प्रधान मंत्री जी ने दरोगा जी से पूछा, " यहाँ एक बूढ़ी मैया का प्याऊ था ना, कहाँ  है?"
 
यह प्रश्न सुन कर दरोगा हकलाने लगा । इतने में सामने से शीतल जल की एक छोटी मटकी और  प्याला ले कर बूढ़ी मैया आती दिखाई दी । प्रधान मंत्री जी फौरन उसकी तरफ दौड़े और उन्होंने ने मैया का चरणस्पर्श किया," कैसी हो मैया ?"
 
निर्दोष भाव से हँस कर बूढ़ी मैया बोली,

" बेटा, इतना बड़ा आदमी हो गया, फिर भी तेरे बचपन के दिन, तुझे अब भी याद है? "
मार्कण्ड दवे ।
 
दिनांकः ०९-०५-२०१४.


26.4.14

Short Story-7. `पाप-पुण्य ।`


Short Story-7.  `पाप-पुण्य ।`
 
"मैं  किसी  पाप-पुण्य  में  नहीं  मानता..! Please forgive me and now get lost." कहते हुए मनचले देवांग ने, गर्लफ्रेन्ड मनीषा से पीछा छुड़ा लिया ।

अत्यंत दुःखी मन और 'भारी पैर' के साथ, कॉलेज की बॉय्स हॉस्टल की सीढ़ियां उतर कर, मनीषा  `भारी पैर, हल्का करने`, हॉस्टल के सामने स्थित अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ गई..!

 छह माह पश्चात्, कॉलेज की बॉय्स हॉस्टेल के उसी कमरे में, नयी गर्लफ्रेन्ड पायल के सामने देवांग, वही घीसा-पीटा डायलोग, बोल रहा था, "मैं  किसी  पाप-पुण्य  में  नहीं  मानता..! Please forgive me and..!"

 " एक मिनट...!" अचानक ज़ोर से चीखती हुई, मनीषा कमरे में दाखिल हुई," देवांग, आज के बाद, तुम ऐसा पाप दोहरा भी नहीं सकोगे ? जिस पायल को तुम आज छोड़ रहे  हो, वह मेरी फ्रेन्ड  है  और..अ..अ..अ..!" मनीषा ने एक लंबी सांस भरी और आक्रोशित मन से फिर चिल्लाई,

" तेरे  जैसे  किसी  मनचले की  वजह से  पिछले  एक  साल से, 
वह HIV+  की मरीज़ है । तेरे साथ, मैंने  ही उसे  प्लांट किया था,
अब  हिसाब  बराबर, Now you get lost..!  पायल, चल  यहाँ से...!"

मनीषा के चीखने की आवाज़ सुन कर इकट्ठा हुए, बॉय्स हॉस्टल के सारे लड़के अवाक्  थे और शायद हॉस्टल की (पुण्यशाली?) सीढ़ीयां भी....!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २६-०४-२०१४.



--

24.4.14

वतन परस्ती । (गीत ।)


वतन परस्ती । (गीत ।)

फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!
क्या  ये  लोकतंत्र  है,  या   कोई  जबरदस्ती?

फिरकापरस्त = क़ौमवादी; वतनपरस्ती = देशभक्ति ।

अन्तरा-१.

पेट नोच कर, प्यास छीन कर, सांस लूट कर..!
साँप - नेवले ने कर ली है  क्या, अमन-दोस्ती?
फिरकापरस्त,    सिखाते   हमें    वतनपरस्ती..!

अन्तरा-२.

न  मरते,  ना  मारते  हमें, सियासत वाले..!
मानो, वहशी  बिल्ले  करते,  मूषक मस्ती?
फिरकापरस्त,  सिखाते हमें  वतनपरस्ती..!

वहशी = जंगली; मूषक= चूहा । 

अन्तरा-३.

जाग ज़रा, `मत`कर ऐसा, दिखा उनको अब..!
पूरब-पच्छिम, उत्तर-दकन, ना  लचर बस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!

दकन=दक्षिण; लचर बस्ती = कमज़ोर जनता ।

अन्तरा-४.

लोकतंत्र   में,  वोट-मंत्र  ताक़त  न  सस्ती ।
चल,  मिटा   देते   हैं,  ऐसे-वैसों की  हस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते  हमें  वतनपरस्ती..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०४-२०१४.



--

21.4.14

Micro Short story - 5. `विष पान ।`


Micro Short story - 5.
`विष पान ।`
बैंक के वोशरूम में, कैशियर शिव अत्यंत दुःखी मन के साथ, हाथ में ज़हर की शीशी लिए  बैठा  था कि अचानक, वॉशररूम का दरवाजा किसी ने खटखटाया, " शिव, मैनेजर साहब ने फौरन तलब किया है..!"  किसी कठपुतली की भाँति, खुद को घसीटता हुआ, शिव मैनेजर की केबिन तक पहुंचा ।

" शिव, ये मि. शर्मा हैं, दो लाख रुपये का आज हिसाब नहीं मिल रहा है, वह गलती से तुमने इन्हें दे दिया था, अब कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी..!"

शर्मा जी बोले, "मुझे याद है..! लॉकर से निकाले हुए लाखों के ज़ेवर, जब मैं यहीं भूल गया था, तब आप ने ही तो सारे ज़ेवर सही-सलामत मुझे वापस किए थे..!"

शिव ने आँसू की बूँदो के साथ, मैनेजर साहब के टेबल पर, ज़हर की शीशी और स्यूसाईड नोट भी रख दिया, जिसे पढ़ कर, उपस्थित सभी लोग रो पड़े..!  

हाँ, आँसू  तो थे मगर, खुशी के,  क्योंकि, भोला-भाला शिव विष पान से बाल-बाल बच गया?

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २१-०४-२०१४.



--

18.4.14

Micro short story-6 `अनपढ़-गँवार । `


Micro short story-6 
`अनपढ़-गँवार । `
सुबह-११.०० बजे ।
 
"बेटे, कामवाली बाई के लड़के, छोटू के साथ मत खेलना, देखा नहीं, 
उसके बाप ने शराब पी कर, कामवाली बाई को कितना पीटा है..! 
ये अनपढ़-गँवार लोग है, इन से दोस्ती रखना अच्छी बात नहीं है ।" 
सिर्फ छह साल का मंथन, कुछ समझा-कुछ ना समझा पर ,
उसने मम्मी के सामने अपना सिर हिला  दिया..!
 
रात - ११.०० बजे ।
 
" आज फिर से, आप शराब पी कर आए, 
मंथन जाग जाएगा तो क्या सोचेगा ? क्या..! 
हाँ, जाओ, आज फिर से मैंने, आप की गर्लफ्रेंड को, 
फोन पर फटकार लगाई है, क्या कर लोगे ? 
ओ..ह, नो..नो.. यु आर हर्टींग मी..
प्लिझ, मत मारो मुझे..सहन नहीं  होता..! 
ओह..अ..अ..अ..गो..ड़..!"
 
दूसरे दिन-सुबह- ९.०० बजे ।
 
" कल रात पापा ने शराब पी कर आप को बहुत पीटा था ना मम्मी? 
अब तो हम भी अनपढ़-गँवार हो गए, 
क्या अब मैं छोटू से साथ खेल सकता हूँ ?"
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १८-०४-२०१४.



--

14.4.14

आँसू । (गीत)


आँसू । (गीत)


जा, समंदर को,  लहूलुहान कर  दे ।
आँसूओं से  गहरी, पहचान कर  ले ।

( समंदर = दुनिया )

 
अन्तरा-१.

 
तन्हा है  लम्हा, गुमशुदा  है  दिल..!
चप्पे - चप्पे,  इक  दरबान  धर  दे ।
जा, समंदर को  लहूलुहान कर  दे ।

गुमशुदा = लापता ।

 
अन्तरा.-२

 
रुके,  ना   थमे,  यही  तो  वक्त  है..!
दम है  तो, उस पर निशान कर ले ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।


अन्तरा-३.

हँसी, न  खुशी, ग़मज़दा है  सांसें..!
बच्चों के  नाम,  मुस्कान  कर  दे ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।

ग़मज़दा = दुःखी ।

अन्तरा-४.

न  तेरा,  न  मेरा,  समंदर झमेला..!
खुद को जहाँ का, मेहमान  कर  ले ।
जा, समंदर को  लहूलुहान  कर  दे ।

झमेला = भीड़-भाड़ ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १४-०४-२०१४.



--

11.4.14

Micro short story -4. `शायद..!`


Micro short story -4. `शायद..!`

http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/micro-short-story-4.html

"ये क्या है नंदिनी? आज, पहली बार काम में इतनी गलतियां..! क्या बात है, बहुत उदास लग रही हो..!"  
मैनेजर साहब ने नंदिनी से  आख़िर पूछ ही लिया ।

" सर, मेरे तीन साल के बेटे को किडनी में स्टोन का प्रॉब्लम हुआ है, उसके ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये चाहिए मगर, मेरी हालत..!" कहते-कहते नंदिनी की सुंदर आंखे भर आयीं ।

करीब दस मिनट के बाद, पहली बार, स्मार्ट,युवा और हेन्डसम, बोस के सामने नंदिनी खड़ी थी ।

बोस ने, नंदिनी को सर से पाँव तक घूरते हुए, कहा, " समय नहीं है, सीधा पाइन्ट पर..! लोन मिल जाएगा, 
क्या तुम समझौते (Compomise) के लिए तैयार हो?"

नंदिनी ने केबिन का दरवाजा पुरा खोला, बोस के गाल पर, एक करारा चाँटा मारा और पीछे मुड़ कर देखे बिना ही, ऑफिस की लिफ्ट की ओर आगे बढ़ गई । 

केबिन के बाहर भौंचक्का सा खड़ा  हुआ पुरा स्टाफ, सबकुछ समझ रहा था, अधिकतर महिला कर्मचारी..!

शायद, नंदिनी भी इतनी नासमझ नहीं थी..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ११-०४-२०१४.



--

8.4.14

Micro short stories -03. Intellectual Prostitute - प्रबुद्ध गणिका ।


Micro short stories -03. 
Intellectual Prostitute 

- प्रबुद्ध गणिका ।
 http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/micro-short-stories-03-intellectual.html
चुनाव की सरगर्मी बड़ी तेज हो गई थीं । तथाकथित सेक्युलर टीवी न्यूज़ चैनल के एन्कर्स - रिपोर्टर्स,जनता का मुड़ भाँप ने के लिए, यहाँ से वहाँ भाग दौड़ कर रहे थे ऐसे में, `कब-तक टीवी चैनल का रिपॉर्टर,`लपक शर्मा`एक बदनाम मोहल्ले से गुजरा ।

" इस वक्त मैं, अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय कर ने वाली महिलाओं के मोहल्ले से लाईव रिपोर्टिंग कर रहा हूँ । आइए, यहाँ की लोकल महिलाओं से, ये किसे वोट देंगी उसके बारे में जान ने की कोशिश करें..!"

चैनल के स्टूडियो में बैठे एंकर, `लसून क्रांतिकारी` ने,  रिपोर्टर `लपक शर्मा` के कान में कहा," ल..प..क, उन से ये सवाल पूछिए, क्या  ये महिलाएं हमारे न्यूज़ हर रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा चुनावी विश्लेषण कवरेज?"

लपक शर्मा, (कुछ सेक्स वर्कर्स से ।), " सब से पहले ये बताइए, क्या आप हमारा न्यूज़ चैनल `कब-तक - चुनाव ` रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा प्रोग्राम?"

अपने आप को अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय करने वाली बताने पर अत्यंत चिढ़ीं हुई, पढ़ीलिखी एक सेक्स वर्कर ने, लपक शर्मा को 
बौद्धिक तमाचा मारते हुए कहा,

" ये सारी महिलाएँ, आप जैसी, `प्रबुद्ध गणिकाओं -(Intellectual Prostitutes)` के प्रोग्राम कभी नहीं देखतीं..!"

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०८-०४-२०१४.



--

7.4.14

आते-जाते रहेंगे । (गीत)


आते-जाते रहेंगे । (गीत)
http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/blog-post.html
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!
और जालिम ? बस, यूँ ही मुस्कुराते  रहेंगे ।

अन्तरा-१.

वास्ता हो जिन्हें वो, जानते हैं, मज़ा उसका..!
हैं   ग़मखोर, गज़ब  हम भी आज़माते रहेंगे..!
ग़मों का   क्या  है, वो तो  आते - जाते रहेंगे..!
 
ग़मखोर = सहनशील ।

अन्तरा-२.

गर है , तबाह करना, मकसद उनका, यारों..!
कमज़ोर   नहीं   हम   भी, दर्द   सहते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या  है, वो तो  आते - जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-३.

दमदार ग़म परखना, पाला है शौक हमने..!
ताउम्र      क़र्ज़     उनका,     चुकाते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-४.

थामा है, कब से  हमने, प्याला  ज़हर  का..!
फरहत के,  गीत अक्सर, गुनगुनाते रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

फरहत = खुशी.


मार्कंड दवे । दिनांकः ०७-/०४/२०१४.




--

4.4.14

Micro Short Stories -1 अय बुड्ढ़े..!


(अय बुड्ढ़े..!)

" अय बुड्ढ़े, एक बार कह दिया ना,..! 
साहब, मीटिंग में बहुत बिज़ी हैं, सुनाई नहीं देता क्या? 
चल भाग यहाँ से, कहाँ-कहाँ से आ जाते है भिखमंगे, चल हट..!

लाचार बुड्ढा आदमी, 
ऑफिस प्यून के  ज़ोर के धक्के से, ऑफिस के दरवाजे से बाहर जा गिरा ।

सीसीटीवी कैमरे पर सारा नज़ारा देख रहे साहब ने,
टी-२० वर्ल्ड कप की रोमांचक मैच की आवाज  कम करते हुए,
चिढ़ कर वृद्धाश्रम के संचालक को फोन पर धमकाया,

" इतने सारे रुपये की मदद के बावजूद, 
पिताजी को क्यों ऑफिस आने देते हो?
 
वृद्धाश्रम बंद करवा दूँ क्या?"

मार्कंड दवे । दिनांकः ४/४/२०१४.




--

31.3.14

सियासत के रंग ।(गीत)


सियासत के रंग ।(गीत)

ये  सियासत के रंग  भी  बड़े अजीब  होते  हैं..!
अवाम  से ज्यादा  जहाँ, नेता  गरीब  होते  हैं ।

अन्तरा-१.

यहाँ - वहाँ, जहाँ - तहाँ, मिले जाने कहाँ - कहाँ..!
कलेजा  कतरने वालों के  हज़ार  मुरीद  होते  हैं..!
ये   सियासत के   रंग  भी  बड़े   अजीब  होते  हैं..!

मुरीद= अनुयायी


अन्तरा-२.

पेट में  दहकते  शोले, खेत में   चहकते  निवाले..!
मुँह  तक  आते-आते, सिर्फ वादे  करीब  होते  है ?
ये  सियासत के  रंग  भी   बड़े   अजीब  होते  हैं..!

अन्तरा-३.

सियासी  कूड़ेदान  में   तलाशे   सुकून   मगर..!
शान से  पाले अरमान, कायम  रकीब  होते  हैं..!
ये  सियासत के  रंग  भी  बड़े  अजीब  होते  हैं..!

कूड़ादान= डस्टबीन; रक़ीब = शत्रु, दुश्मन, वैरी,

अन्तरा-४.

जूझते  रहो, तुम  घुटते   रहो, बस  लूटते  रहो..!
दुनिया में सब के, अपने-अपने नसीब  होते  हैं ।
ये  सियासत के   रंग  भी   बड़े  अजीब  होते  हैं..!

घुटन=बेचैनी 

अन्तरा-५.

`नेताजी, तुम आगे  बढ़ो, हम तुम्हारे  साथ  है..!`
चीखने  वाले    सारे,   हराम - हबीब   होते   हैं ।
ये  सियासत के  रंग  भी  बड़े  अजीब  होते   हैं..!

हराम=छल-कपट,बदनीयत; हबीब = दोस्त,मित्र ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक - ३१-०३-२०१४.


-- 

19.3.14

पेट की सलवटें । (गीत)

पेट की सलवटें । (गीत)
http://mktvfilms.blogspot.in/2014/03/blog-post.html

चल, पेट की  सलवटें, मिटाने की  कोशिश करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की,  फिर  आज़माइश करें ।

अन्तरा-१.

गरीबी  का  बुखार है, फकीरी  का खुमार भी..!
चल, कड़ी  भूख  की  फिर  से  फरमाइश  करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।  

अन्तरा-२.

सुना   है,  ज़हर  की  खेती  होती  है  देश  में..!
चल, भीख में राशन की  फिर  गुजारिश  करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश करें ।  

अन्तरा-३.

बच्चों  की  कसम  है  बाबू, अब वह रोते  नहीं..!
चंद  सांसों के लिए, क्यों न फिर सिफारिश करें ?
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।

अन्तरा-३.

या रब, देख  रहा  है  ना  सब? कह  दे  उन्हें...!
इक बार फिर, हसीं वादों की  तेज बारिश करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक - १९-०३-२०१४.




--

4.2.14

भैंसा - ए - निज़ाम ।

भैंसा - ए - निज़ाम ।

http://mktvfilms.blogspot.in/2014/02/blog-post.html

नोट- ये संवाद सिर्फ मनगढ़ंत पंक्तियों के अलावा और कुछ नहीं है, इसका किसी भी खोये या बाद में ढूंढ़े गए मानव-जानवर-चीज़ वस्तु से कोई लेनादेना या सरोकार नहीं है । कृपया इसे किसी को अपने सर लेकर व्यर्थ दुःखी होने की जरूरत नहीं है, फिर चाहे अपनी मर्जी....!
 
स्थल - `रद्दी कल तक` न्यूज़रूम स्टूडियो. दिल्ली (भारत)
 
लाऊड म्यूझिक - `ढें..टें...टें....णें..एं...एं...एं...एं...एं...एं...!`
 
एंकर सुनिधि जलपरी- "हम दर्शकों को बताना चाहते हैं कि, अभी-अभी राजगढ़-यु.पी. से सबसे बड़ा ब्रैकिंग न्यूज़ आ रहा है, इससे पहले कि हम ये न्यूज़ हम आपको बतायें आइए, हमारे साथ हमारे संवाददाता  पतासुतोष ऑनलाईन जूड़ चुके हैं, हम उनसे सीधे बात करते हैं...!  पतासुतोष हमें ये बताईए, वहाँ से क्या ब्रेकिंग न्यूज़  है...!"
 
पतासुतोष - "हाँ जलपरी, आज सुबह जब मैं, नई पॉलिटीकल पार्टी `बिगडैल बाप` के रोड़ शॉ कवरेज़ के लिए, निकल ही रहा था तभी, मेरे  ख़बरी ने मुझे फोन कर के बताया कि, हमारे प्रदेश के एक कद्दावर नेता श्री भैंसा - ए - निज़ाम कि करीब सात भैंसे सुबह-सुबह अपने फाईवस्टार निवासस्थान से गायब हुई हैं । यह सुनते ही  `बिगडैल बाप` पार्टीवाला कार्यक्रम छोड़कर मैं अभी-अभी इस मौका-ए-वारदात पर पहुंचा हूँ । मैं हमारे कैमरामेन को कहूँगा कि वह अपना कैमरा ज़रा इस तरफ...!"
 
"सॉरी, पतासुतोष पर मैं यहाँ आपको रोकना चाहूंगी..!" सुनिधि जलपरी - "अभी-अभी हमारे साथ यु.पी.की अराजकतावादी पार्टी के भूतपूर्व  नेता कमरतोड़पानीसिंह जूड़ चुके हैं । आईए, हम उन्हीं से बात करते हैं..नमस्कार, तोड़पानीसिंह जी, आपका स्वागत है ।"
 
कमरतोड़पानीसिंह -"स्वागत गया भाड़ में..! जलपरी जी, पहले मेरा नाम सही-सही लीजिए ना..! ये क्या बात हुई ? मेरा नाम मि.कमरतोड़पानी है, मेरे नाम से `कमर` कहाँ गायब हो गया ?"
 
सुनिधि जलपरी-"क्षमा कीजिएगा, आज सुबह से ही सब कुछ गायब हो रहा था इसलिए, जी..जी..बोलिए साहब, आप का क्या कहना है?"
 
कमरतोड़पानीसिंह -`देखिए, ऐसा है..! अराजकतावादी पार्टी के हमारे प्रातःस्मरणीय-परम आदरणीय-कद्दावार नेता मान्यवर श्री भैंसा - ए - निज़ाम ने हमें पार्टी से निकलवाने के लिए जो कारनामे किए थे , उसी पाप के कारण आज उन्हें ये दिन देखना पड़ रहा है...!`
 
सुनिधि जलपरी-`ठीक है..ठीक है, पर तोड़पानीसिंह जी, सॉरी अगेईन, मि.कमरतोड़पानीसिंह जी, ये बताएं आप इस घटना को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं...!`
 
कमरतोड़पानीसिंह -"देखिए ऐसा है..! इतनी गंभीर घटना के बारे में, हमें अपना देवर समझने वाली  अखंड सौभाग्यवती श्रीमती ढेंगा बहादुडी टूच्चन भौजी तो कुछ  बोलेगी नहीं, इसलिए हमें ही कहना पड़ेगा कि, प्रातःस्मरणीय-परम आदरणीय कद्दावार नेता श्री भैंसा - ए -निज़ाम साहब की सात भैंसों के एकाएक गायब होने की घटना को,`राष्ट्रीय समस्या-आपदा` घोषित करनी चाहिए, औ....र.....!"
 
"एक मिनिट..!" सुनिधि जलपरी-"सॉरी, तोड़पानी सिंह जी, मैं आप को यहाँ पर रोकना चाहूँगी....! ( टें.. टूं..टें..टूं..टें..टूं...!) लगता है हमारा संपर्क कमरसिंह जी से टूट गया है । पतासुतोष के पास चलते हैं । हाँ, पतासुतोष बताएं आप के पास क्या लेटेस्ट अपडेट्स हैं?"
 
पतासुतोष - "हाँ जलपरी, यु.पी. के बाहोश पुलिस महकमें ने, खोजी कुत्तों के साथ मिलकर सात भैंसों को अभी-अभी ढूँढ निकाला है और इस वक़्त ये सारी भैंसें मेरे साथ खड़ी है औ..अ..र हमें इंटरव्यू देने के लिए उनकी मुखिया भैंस सुश्री कायावती जी को मैंने पटा लिया हैं..!"
 
सुनिधि जलपरी-"जी, पतासुतोष, सुश्री कायावती जी से ज़रा पूछिए कि, कल रात असल में क्या हुआ था, किस गिरोह ने उनका अपहरण कर लिया था?`
 
पतासुतोष - "जी..! हाँ तो, कायावती भौजी, ज़रा ये बताएं कि..ई...ई...ई...ई...!"
 
मुखिया भैंस कायावती जी (नाराज़ होकर)-"भौजी होगी तेरी माँ..! सा...ले..! मेरा बैल, तेरा भाई कब से बन गया..रे..ए..ए..!  मेरे शौहर और हमारी कौम का इतना बड़ा अपमान?"
 
पतासुतोष - "माफ़ करना कायावती बहन जी, हाँ तो कल रात क्या हुआ था?"
 
मुखिया भैंस कायावती जी - "अरे...भाई...! किसी ने....किसी ने भी..ई..ई.., हमारा अपहरण नहीं किया, हम सातों बहन तो अपनी मर्जी से, हमारे मालिक  श्री भैंसा - ए - निज़ाम से नाराज़ होकर, खुद घर छोड़ कर भाग गई थीं...!`
 
पतासुतोष - "आप की नाराज़गी की वजह ?"
 
मुखिया भैंस कायावती जी - "अरे..! हमारे मालिक और उनकी अराजकतावादी गुंडा पार्टी ने हमारे साथ नाइन्साफ और वादाख़िलाफी की है..!"
 
पतासुतोष - "कैसा नाइन्साफ ? कैसी वादाख़िलाफी..!`
 
मुखिया भैंस कायावती जी - "हाँ, देखिए, यहाँ के सबसे बड़े कार्यक्रम `गुंड़ई महोत्सव में, हम सात बहनों का आयटम डान्स पहले से तय किया गया था पर जैसे ही, हमारे मालिक विदेश की सैर पर निकल गए तुरंत ही, अराजकतावादी पार्टी द्वारा वचन भंग कर के हम काली,मोटी भैंसों की जगह, बोलीवुड मुंबई की गोरी-गोरी स्लिम-स्लिम आयटम गर्ल और हीरोइनों को नचाया गया?"
 
(अचानक ब्लैक आउट..! इन्कलाब ज़िंदाबाद के नारे..!)
 
सुनिधि जलपरी-"पतासुतोष,पतासुतोष, क्या आप हमें सुन पा रहे हैं? अ..रे..,या...र, अब ये पतासुतोष कहाँ गायब हो गया?"
 
(गोबर से लिप्त चेहरे के साथ कैमरामैन..! )
 
"जलपरी, मैं  कैमरामैन सुखेश निष्कंदन..! एक और ब्रेकिंग न्यूज़ है, यहाँ से अभी-अभी `बिगडैल बाप` पार्टी का जुलूस निकला और इस में लोकसभा टिकट ब्रांड के पतासे (बतास-फेनी) बांटते हुए देख कर हमारे श्री पतासुतोष ने `बिगडैल बाप` पार्टी जोईन की है..! इतना ही नहीं, जाते-जाते उसने मुझे धक्का दिया और मेरा सारा बदन भी गोबर-गोबर कर दिया..! "
 
जलपरी-" हैं...ई...ई...ई...ई?"
 
========
 
॥ इति श्री,प्रातःस्मरणीय-परम आदरणीय मान्यवर श्री भैंसा-ए -निज़ाम` पुराणे प्रथमोध्याय संपूर्ण ॥
 
मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०३-०२-२०१४.


--

8.4.13

कहाँ खो गया है आदमी ? (गीत)



कहाँ  खो  गया है आदमी ? (गीत)






http://www.youtube.com/watch?v=_oAJUyy9YFM&feature=youtu.be

http://mktvfilms.blogspot.in/2012/09/blog-post_7.html

अरमानों की  लाशें कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!

मायूसी के  भँवर में  कहाँ,  खो  गया  है  आदमी ?

अंतरा-१.

खिलखिलाता  मातम जहाँ, आँसू  बहाती  ख़ुशियाँ..!

मनचाही  सौगात पाकर  भी,  रो  रहा   है   आदमी ?

अरमानों   की   लाशें  कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!

अंतरा-२.

ज़िच राह भटकना  यहाँ,  नित जीना, नित  मरना  है..!

सादगी का  दम  भर  कर, चरम   सो  रहा  है  आदमी..!

अरमानों  की   लाशें      कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!

(ज़िच  राह= लाचारी  भरी  ज़िंदगी; चरम= अंतिम )

अंतरा-३.

है  शग़ल  का  हाल  खस्ता, महँगा  पानी, खून  सस्ता ?

तभी  तो   आस्तीन,  इलीस   की   धो  रहा   है  आदमी..!

अरमानों  की      लाशें     कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!

(शग़ल= रोजगारी; खस्ता=ख़राब) 

(इलीस की आस्तीन= शैतान की  लहूलुहान  बाँह)

अंतरा-४.

वसीयत लिखें  फ़ज़ीअत की  तो, क्या  लिखे  ये  आदमी ?

कवल  अवम, अंगी  को  देकर ,खुश  हो  रहा  है  आदमी..!

अरमानों   की    लाशें     कितनी,   ढो   रहा    है  आदमी..!

(फ़ज़ीअत= दुर्दशा ) (अवम= आख़री) (कवल= निवाला) (अंगी=नेताजी-सरकार)

© मार्कण्ड दवे । दिनांकः०७-०९-२०१२.

5.4.13

दिल्लीवाले बाबा की तिलस्मी कहानियाँ ।



दिल्लीवाले  बाबा की  तिलस्मी  कहानियाँ ।


स्थल - अत्यन्त  अमीर  महानुभावों  की  महासभा ।

"चीं..ई..ई..ई..ई..!" कार  आकर  ठहरी  और अपने  अंगरक्षक की  बड़ी  फौज के  साथ, दिल्लीवाले बाबा सभामंडपमें  प्रवेश  करते  हैं । साथ ही  उनकी  जयजयकार  गूंजने  लगती  है ।

वत्स, चलो अब सीधा पॉईंट पर आते हैं..!

====

दिल्लीवाले बाबा- " क्यूँ  होता  है  ऐसा? आप  लोग  क्यूँ  करते  है  ऐसा? दीजिए, जवाब दीजिए..! हाँ..हाँ,  मैं  आप  सब  से  पूछ  रहा  हूँ..बोलीए..बोलीए ?"

एक  अमीर  श्रोता," अरे..या..र, ये  तो  आते ही  हम पर  भड़क  रहा  है..! हम से  कोई ग़लती  हो गई  है  क्या?"

दूसरा  अमीर  श्रोता," बिलकुल, इसे  यहाँ  आमंत्रित  करने  की..ही..ही..ही..ही..ई..!"


दिल्लीवाले   बाबा," सब  चुप  हैं....सब  के  सब  चु..उ..उ..प   हैं,  है   ना? आप  स...ब   चुप   हैं....क्योंकि, मेरी  बात  आप की  समझ से   परे   हैं..! ठीक  है..ठी..क  है..! कोई  बात  नहीं, मैं.., मैं..ई..आप को  समझाता  हूँ  और  वह  भी  एक  रोचक  कहानी के  ज़रिए..! ज़रा  ध्यान  से  सुनिएगा..!


वही  अमीर  श्रोता," या..र..अ..अ.., क्या  हम  यहाँ   कहानियाँ  सुनने को  आए  हैं?"


वही  दूसरा  अमीर  श्रोता," सुन ही  लेते  हैं, क्या  फर्क  पड़ता  है..!"


दिल्लीवाले  बाबा," वैसे  कहानी  लंबी  नहीं  है..! एक बार मेरे पास,  विदेश से कुछ लोग  आए  और  उन्हों ने  मुझ से कहा, हम  हमारी  चंद  तकनीकी  समस्याएँ, आप के  किसी  निष्णात के  पास  जाकर  सुलझाना  चाहते  हैं..! मैंने  कहा, ठीक  है, आप फलाँ-फलाँ  विद्यालय  में, फलाँ-फलाँ  विद्वान  प्राद्यापक को  जाकर  मिलें, आप की सारी  समस्याओं का समाधान  तुरंत  हो जाएगा..! 

वह सभी लोग  वहाँ  गए  और  उस विद्वान  प्राद्यापक से  मिल कर  वापस  जब,  मेरे पास  आए  तब  उन्हों ने,  मुझ से,  ये  कहा   कि, हमारी   यही   समस्याओं  का  समाधान  हम  यदि  विदेश में  कराते, तब हमें  अनेक  गुना  खर्च  करना  पड़ता, यहाँ  आपके  `रेफरन्स`  से,  हम  उस  विद्वान  प्राद्यापकजी से   मिले  और   हमारी  समस्या,  बहुत  कम  खर्च  में   सुलझ  गई..!"


वही  अमीर   श्रोता, "या..र, ये  तो  बड़ी  अच्छी  वात  है..!"


दिल्लीवाले  बाबा," चलिए, अब  आप  सब  मुझे  ये  बताईए  कि, आपने  इस  कहानी से क्या  बोध  प्राप्त  किया...! यस, हाथ  उपर  करें.., कोई  नहीं? ठीक  है,  मैं  ही  बता  देता...आ...आ..,

( इतने में, वही  श्रीमंत  श्रोता ने  हाथ  उपर  किया । ) वेरी नाईस, आप  बताईए, अरे  कोई  इनको   एक   माईक  तो   देना   भैया..!"


वही  अमीर  श्रोता,(माईक  पा कर)" हैलॉ..वन-टू-थ्री-फोर..हैलॉ-हैलॉ-हैलॉ,  हाँ  सब  ठीक   है..! 

सर...जी, सब  से   पहले,  इतनी  अच्छी  कहानी  सुनाने  के लिए, हम सभी की  ओर  से,  आप  का  बहुत-बहुत  धन्यवाद जी..! इतनी  बढ़िया  कहानी, बचपन  में  मेरी  माँ  ने   कभी  नहीं  सुनाई  जी..!"


दिल्लीवाले  बाबा,"अरे, क्या  बात  करते  हो..! मेरी  माँ  तो,  रात को  मेरे  पास  आकर  रोते- रुलाते   ढ़ेरों   नई-नई   कहानियाँ  सुनाए  बगैर  आज भी  मुझे  सोने  नहीं देती..!"


वही अमीर श्रोता," सर..जी, आप  की  इस   तिलस्मी  कहानी  में   बड़ा  ही  ग़हरा  उपदेश   छिपा   हुआ  है  जी..! पहला  उपदेश - किसी को  भी   विदेश  में  नहीं  रहना  चाहिए  क्योंकि, वहाँ   हमारे  देश से  भी   ज्यादा   समस्याएँ   है, ठीक  है  जी..! 

दूसरा  उपदेश-  अगर  विदेश में  रहनेवालों को   कभी भी,  किसी भी  समस्या का  अगर  समाधान  चाहिए  हो   तो,  सब से  पहले  यहाँ  आकर   उन्हें,  आप से  मिलना  चाहिए, ठी...क  है  जी..ई..! 

अब  तीसरा  उपदेश  ये  है  कि, इस   देश  में,  आप  के   रेफरन्स  से, कहीं  भी  जानेवाले  की  समस्या,  यूँ   चुटकियों  में  सुलझ  जाती  है   औ...र  वह  भी   बहुत  कम  खर्च  में, वर्ना  इन  सारे  सरकारी  बाबुओं को  तो  सब  जानते  हैं  जी..! 

अब  चौथा  उपदेश- (बाबा का एक अंगरक्षक दौड  के  पास  आता  है  और  माईक  छिन  लेता  है ।)  अ..रे..अ..रे..भैया,  पूरा  तो  करने  दो,  मेरा  माईक, मेरा  माईक, मे..ए..ए..ए..रा    माई..ई..ई..क..!"


वही  दूसरा  अमीर  श्रोता," अ..बे, शराफ़त से  बैठ  जा..! बाबा  के   रेफरन्स  से, बाबा  की  खुद  की  समस्या का  (तुम?)  समाधान  करने  हेतु   ये   पहलवान  आया  है..! ही..ही..ही..ही..ही..!"


====


दोस्तों, आप  क्या  समझे, कुछ  नहीं? 

हालाँकि, इस  तिलस्मी  कहानी से   मैं ने   यही  उपदेश  पाया  है कि, इस  देश  के  सभी  मतदाता-नागरिक  ने,  ख़ुद  का  सही  मूल्य  कभी  न  समझा है, ना कभी  किया  है..!  जाने  दो   या..रों..! शायद, यही  तो  है,  मेरा  भारत  महान?


क्या  और  दो  कहानियाँ  बाक़ी  रह  गई ? छोड़ो   दोस्तों,  फिर  कभी,  ऐसा  प्रलाप  सुने  ना  सुनें, क्या  फ़र्क़  पड़ता  है..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०५-०४-२०१३.