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24.5.14

मन । (गीत)

 http://mktvfilms.blogspot.in/2014/05/blog-post_24.html  

मेरा मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
किसी   बात   पर,  वफ़ा   कायम  नहीं ?
 

१.
 

मन के  द्वार,  हर  दिन  है  जश्न  मगर..!
उसके   तो    क...भी    ऐसे , करम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

२.
 

निपटता   है   मन  और  थकता  हूँ  मैं..!
बस,  आगे   और  इक  भी  कदम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

निपटना = तय करना;
 

३.
 

वश  में    होता   है    मन   कहा   मगर..!
इस   बात  में   कभी,   कोई   दम  नहीं..!
मेरा  मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

४.
 

वफ़ा  की    चाह,  रब  को  भी  है   मगर..!
चंट  ने   कहा,  ऐसा  कोई   नियम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

चंट = धूर्त-कपटी मन;
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०५-२०१४.

14.5.14

HINDI SONG- SHAM `शाम । (गीत)`



HINDI SONG- SHAM
`शाम । (गीत)`

http://mktvfilms.blogspot.in/2014/05/hindi-song-sham.html

https://www.youtube.com/watch?v=KJ2VBbgD6TI&feature=youtu.be

इज़हार-ए-इश्क  बिना  शाम  हो गई..!
हसरतों की  जैसे  कत्लेआम  हो गई..!

इज़हार-ए-इश्क = प्यार की अभिव्यक्ति;
हसरत=अभिलाषा;


१.

निगाहों में  प्यार, ज़ुबान से  इनकार ?
रुसवाईयाँ   शायद, बेलगाम  हो गई..!
इज़हार-ए-इश्क  बिना  शाम  हो गई..!

२.

लरजते लबों ने कह दिया था  सबकुछ ?
और  खामोशी, मुफ्त  बदनाम  हो गई..!
इज़हार-ए-इश्क   बिना   शाम  हो गई..!

लरजना-काँपना; लब=होंठ;


३.

बेबस हैं वो तो, मजबूर  इधर हम भी?
सिसकीयाँ ये कैसी, खुलेआम हो गई..!
इज़हार-ए-इश्क  बिना  शाम  हो गई..!

सिसकी=रोने का शब्द;

४.

न  रस्में, न कसमें, न वश में  हमारे..!
ये जिंदगी बस जैसे, इलज़ाम हो गई..!
इज़हार-ए-इश्क  बिना शाम  हो गई..!

रस्म- विधि;

मार्कण्ड दवे ।

दिनांकः १४-०५-२०१४.


30.4.14

मुनाफा । (गीत)

 
मुनाफा । (गीत)

होने  पर  मेरे, दर्द   में,  इजाफा  ही  इजाफा  है..!
न होने पर देख, कितना मुनाफा ही  मुनाफा  है..!
 
इजाफा = बढ़ोत्तरी;  मुनाफा = फायदा

१.
है  मुस्कान  गर  होना,  क्या रोना  है, ना  होना ?
न समझा  मैं, समझे ना वो,अजूबा ही अजूबा है..!
होने  पर  मेरे,  दर्द  में,   इजाफा  ही  इजाफा  है..!
 
अजूबा = अचरज;

२.
क्या पाया, क्या खोया, पी कर बेबसी हूँ  जिंदा..!
सँवरता,  बिगड़ता  यहाँ, नसीबा ही  नसीबा  है..!
होने  पर   मेरे,  दर्द  में,   इजाफा  ही  इजाफा  है..!
 
बेबसी = लाचारी;

३.

हाल  वफ़ा का  ऐसा कि, जिंदगी  ख़फ़ा  हो  गई..!
न होने पर समझा कि, ये वज़ीफ़ा ही वज़ीफ़ा  है..!
होने  पर   मेरे,  दर्द  में,   इजाफा  ही  इजाफा  है..!
 
वज़ीफ़ा = उपकार,अनुदान;

४.

टूटते   सितारे   देख,  क्या  मांगु  रब    तुम से ?
जब होना न होना, सिर्फ लतीफ़ा ही लतीफ़ा  है..!
होने पर  मेरे,  दर्द  में,  इजाफा  ही  इजाफा  है..!
 
लतीफ़ा = चुटकुला, मज़ाक;


मार्कण्ड दवे । 
दिनाकः २९-०४-२०१४.


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24.4.14

वतन परस्ती । (गीत ।)


वतन परस्ती । (गीत ।)

फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!
क्या  ये  लोकतंत्र  है,  या   कोई  जबरदस्ती?

फिरकापरस्त = क़ौमवादी; वतनपरस्ती = देशभक्ति ।

अन्तरा-१.

पेट नोच कर, प्यास छीन कर, सांस लूट कर..!
साँप - नेवले ने कर ली है  क्या, अमन-दोस्ती?
फिरकापरस्त,    सिखाते   हमें    वतनपरस्ती..!

अन्तरा-२.

न  मरते,  ना  मारते  हमें, सियासत वाले..!
मानो, वहशी  बिल्ले  करते,  मूषक मस्ती?
फिरकापरस्त,  सिखाते हमें  वतनपरस्ती..!

वहशी = जंगली; मूषक= चूहा । 

अन्तरा-३.

जाग ज़रा, `मत`कर ऐसा, दिखा उनको अब..!
पूरब-पच्छिम, उत्तर-दकन, ना  लचर बस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!

दकन=दक्षिण; लचर बस्ती = कमज़ोर जनता ।

अन्तरा-४.

लोकतंत्र   में,  वोट-मंत्र  ताक़त  न  सस्ती ।
चल,  मिटा   देते   हैं,  ऐसे-वैसों की  हस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते  हमें  वतनपरस्ती..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०४-२०१४.



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14.4.14

आँसू । (गीत)


आँसू । (गीत)


जा, समंदर को,  लहूलुहान कर  दे ।
आँसूओं से  गहरी, पहचान कर  ले ।

( समंदर = दुनिया )

 
अन्तरा-१.

 
तन्हा है  लम्हा, गुमशुदा  है  दिल..!
चप्पे - चप्पे,  इक  दरबान  धर  दे ।
जा, समंदर को  लहूलुहान कर  दे ।

गुमशुदा = लापता ।

 
अन्तरा.-२

 
रुके,  ना   थमे,  यही  तो  वक्त  है..!
दम है  तो, उस पर निशान कर ले ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।


अन्तरा-३.

हँसी, न  खुशी, ग़मज़दा है  सांसें..!
बच्चों के  नाम,  मुस्कान  कर  दे ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।

ग़मज़दा = दुःखी ।

अन्तरा-४.

न  तेरा,  न  मेरा,  समंदर झमेला..!
खुद को जहाँ का, मेहमान  कर  ले ।
जा, समंदर को  लहूलुहान  कर  दे ।

झमेला = भीड़-भाड़ ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १४-०४-२०१४.



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7.4.14

आते-जाते रहेंगे । (गीत)


आते-जाते रहेंगे । (गीत)
http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/blog-post.html
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!
और जालिम ? बस, यूँ ही मुस्कुराते  रहेंगे ।

अन्तरा-१.

वास्ता हो जिन्हें वो, जानते हैं, मज़ा उसका..!
हैं   ग़मखोर, गज़ब  हम भी आज़माते रहेंगे..!
ग़मों का   क्या  है, वो तो  आते - जाते रहेंगे..!
 
ग़मखोर = सहनशील ।

अन्तरा-२.

गर है , तबाह करना, मकसद उनका, यारों..!
कमज़ोर   नहीं   हम   भी, दर्द   सहते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या  है, वो तो  आते - जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-३.

दमदार ग़म परखना, पाला है शौक हमने..!
ताउम्र      क़र्ज़     उनका,     चुकाते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-४.

थामा है, कब से  हमने, प्याला  ज़हर  का..!
फरहत के,  गीत अक्सर, गुनगुनाते रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

फरहत = खुशी.


मार्कंड दवे । दिनांकः ०७-/०४/२०१४.




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27.3.14

हाथ की लकीरें । (गीत)


हाथ की लकीरें । (गीत)

हाथ  की  लकीरें, कितनी रूहानी  हो  गई..!
जिंदगी  पल - पल   जैसे, रूमानी  हो  गई ।

रूहानी= आध्यात्मिक;  रूमानी=रोमांच पैदा करने वाली

अन्तरा-१.

कहती है  फ़ितरत, बारबार मुझे कि देख..!
दास्तां- ए -मुहब्बत  बदगुमानी  हो  गई..!
हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो  गई..!

फ़ितरत= स्वभाव, प्रकृति; बदगुमानी=गलतफहमी

अन्तरा-२.

अभी तो जवाँ  होने  लगी थी मुहब्बत  कि..!
तवारीख़ के चंद पन्नों पर कहानी हो गई..!
हाथ की  लकीरें, कितनी  रूहानी हो  गई..!

तवारीख़=इतिहास 

अन्तरा-३.

सुना  हैं, मेरी  शख्सियत  मिज़ाजी  हो  गई..!
देख  लो, दुनिया  कितनी  सयानी  हो  गई..!
हाथ की   लकीरें, कितनी   रूहानी  हो  गई..!

शख्सियत=व्यक्तित्व;  मिज़ाजी=चिड़चिड़ेपन का दौरा,
सयानी=चालाक ।


अन्तरा-४.

धुन्धली डगर, अजान सफर, बेजान नज़र? 
यही   बात   मेरे   होने की  निशानी  हो  गई?
हाथ की   लकीरें, कितनी  रूहानी  हो  गई..!

अजान=अपरिचित ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक - २६/०३/२०१४.

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8.4.13

कहाँ खो गया है आदमी ? (गीत)



कहाँ  खो  गया है आदमी ? (गीत)






http://www.youtube.com/watch?v=_oAJUyy9YFM&feature=youtu.be

http://mktvfilms.blogspot.in/2012/09/blog-post_7.html

अरमानों की  लाशें कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!

मायूसी के  भँवर में  कहाँ,  खो  गया  है  आदमी ?

अंतरा-१.

खिलखिलाता  मातम जहाँ, आँसू  बहाती  ख़ुशियाँ..!

मनचाही  सौगात पाकर  भी,  रो  रहा   है   आदमी ?

अरमानों   की   लाशें  कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!

अंतरा-२.

ज़िच राह भटकना  यहाँ,  नित जीना, नित  मरना  है..!

सादगी का  दम  भर  कर, चरम   सो  रहा  है  आदमी..!

अरमानों  की   लाशें      कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!

(ज़िच  राह= लाचारी  भरी  ज़िंदगी; चरम= अंतिम )

अंतरा-३.

है  शग़ल  का  हाल  खस्ता, महँगा  पानी, खून  सस्ता ?

तभी  तो   आस्तीन,  इलीस   की   धो  रहा   है  आदमी..!

अरमानों  की      लाशें     कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!

(शग़ल= रोजगारी; खस्ता=ख़राब) 

(इलीस की आस्तीन= शैतान की  लहूलुहान  बाँह)

अंतरा-४.

वसीयत लिखें  फ़ज़ीअत की  तो, क्या  लिखे  ये  आदमी ?

कवल  अवम, अंगी  को  देकर ,खुश  हो  रहा  है  आदमी..!

अरमानों   की    लाशें     कितनी,   ढो   रहा    है  आदमी..!

(फ़ज़ीअत= दुर्दशा ) (अवम= आख़री) (कवल= निवाला) (अंगी=नेताजी-सरकार)

© मार्कण्ड दवे । दिनांकः०७-०९-२०१२.

29.3.13

सरकती रात का आँचल । (गीत)






सरकती रात का आँचल । (गीत)


सरकती रात का, आँचल मैं  थामे  बैठा  हूँ ।

यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।


दिदारे यार  को, तरसता रहा, मैं भी, यार भी,

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।


अंतरा-१.

आस थी इस शाम को,आयेंगे ना, आये वो..!!

बेवफ़ा, ग़मे  आशिकी,गले लगाए  बैठा  हूँ ।

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

सरकती  रात  का, आँचल  मैं थामे बैठा  हूँ ।

अंतरा-२.

प्यार में अक्सर, कहते थे  वो, मर जायेंगे ..!!

मैं  न  भूला,आज तक,जाँ  लूटाये  बैठा हूँ ।

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

सरकती रात  का, आँचल मैं थामे  बैठा हूँ ।

अंतरा-३.

ना जाने क्यूँ, दामन बचा कर, वो चल दिये..!!

राहें  उनकी, रोशन  रहें, दिल जलाए  बैठा हूँ ।

भरी   महफ़िल  में  ये, रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

सरकती  रात  का,  आँचल   मैं  थामे  बैठा हूँ ।

अंतरा-४.

क्या करुं,दिले जलन को,काश ये होता नहीं..!!

मर जाउंगा लो, आज  मैं, जाम थामे  बैठा  हूँ ।

भरी   महफ़िल  में   ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ । 

सरकती   रात  का, आँचल  मैं  थामे  बैठा हूँ ।


यारों   की   भीड़   में,   तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

सरकती  रात  का, आँचल  मैं  थामे  बैठा हूँ ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१३-१०-२०११.

22.3.13

काश हम भी मोबाईल होते..! (गीत)



(Google Images)

काश   हम   भी   मोबाईल    होते..! (गीत)






जलते   हैं    भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

उनके   करीब  रह   कर  हम, कितने   वर्सटाईल   होते? 

(versatile=वर्सटाईल= हरफ़न मौला,सर्वगुणसंपन्न)


अंतरा-१.


जब   वो, प्यार से  अपलक  देखते, दिल के  स्क्रीन  को..!

ओ..ह, इस अदा  पर  हम, जहान से  भी  हॉस्टईल  होते..!

जलते     हैं     भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

(अपलक देखना= ताकना; Hostile= हॉस्टाईल = आक्रामक,दुश्मन )


अंतरा-२.


उनके  निपट  पास   जाकर   हम,  गालों    को   सहलाते..!

ज़ुल्फ़ों  की   ख़ुशबू  से खेल, फिर गुडी-गुडाई  फिल  होते । 

जलते      हैं     भीतर,  काश    हम   भी    मोबाईल   होते..!


(निपट=  पूरी तरह से; नाज़= गर्व) 
(Goody-Gooday feel= गुडी-गुडाई  फिल = मधुर अपनापन का 
अहसास)


अंतरा-३. 


दिनभर  नर्म  हाथों  पर  और  रात  उनके  सिरहनों  पर ।

पास  रखती  तो, अपुन  के  भी  नवाबी   ईस्टाईल  होते..!

जलते     हैं    भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

( style=ईस्टाईल= ढंग, तरीक़ा; सिरहन= तकिये  के  पास)


अंतरा-४.


दिल का  सिम जवान  रहता, प्यार का पावर ऑन  रहता ।

दुःख है मगर, काश कि हम, इश्क के  आईन्स्टाईन  होते..!

जलते     हैं   भीतर,  काश    हम    भी    मोबाईल    होते..!


(दिल का सिम= SIM CARD; आईन्स्टाईन= निष्णात संशोधक)

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०१-०९-२०१२.



19.3.13

मुहब्बत । (गीत)



(सौजन्य-गूगल।)




कमबख़्त  मुहब्बत । (गीत)




कमबख़्त   मुहब्बत   जवाँ   होने  का   नाम  नहीं  लेती..!

और  एक  वो  है, जो  दिल से   कोई   काम   नहीं   लेती..!


अंतरा-१.


क्या-क्या  नहीं  करते  दिलबर, सनम को  लुभाने  को..!

एक वो  है जो,  हाले दिल  तक खुले आम  नहीं  करती..!


कमबख़्त  मुहब्बत  जवाँ   होने  का   नाम  नहीं  लेती..!


(खुले आम= अभिव्यक्त)  


अंतरा-२.


शरमा  के   यूँ   नज़रें   झुकाना, प्यार  नहीं   तो  क्या  है ?

फिर  वो  तो, नज़रों   को   ज़रा  भी   आराम   नहीं   देती..!

कमबख़्त   मुहब्बत   जवाँ   होने  का   नाम  नहीं   लेती..!



अंतरा-३.


दोस्तों, कोई   करें  भी तो  क्या  करे,  कैसे   माँगे   दिल..!

करारी    शिकस्त  पर  तंगदिल, कोई  इनाम  नहीं  देती ।

कमबख़्त   मुहब्बत   जवाँ    होने  का   नाम  नहीं  लेती..!


(तंगदिल= कंजूस)


अंतरा-४.


थका-थका सा  प्यार, बुझा-बुझा सा  इक़रार  लगता  है..!

अब  तो, सलाम के   बदले  भी, वो  सलाम  नहीं  करती..!

कमबख़्त   मुहब्बत   जवाँ   होने  का   नाम  नहीं  लेती..!



(बुझा-बुझा  सा= रूखा)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः०८-०९-२०१२.

10.1.13

INSTRUMENTAL MARI MAHI SAGAR NE ARE DANDIYA




INSTRUMENTAL-MARI MAHISAGAR NE ARE-DANDIA.

DEAR FRIENDS,

I PLAYED INSTRUMENTAL "MARI MAHISAGAR NE ARE-DANDIA."  
ON 
MY  ELE. HAWAIIAN GUITAR .
THE CHHAND SANG BY FOLK SINGER- 
(LOK GAYAK) 
SHRI KIRITKUMAR.


DOWNLOAD FULL LENGTH-MP3 AUDIO. 


DOWNLOAD RINGTONE-MP3 AUDIO. 


FULL LENGTH VIDEO (YOU TUBE)


WITH GREAT HUMBLE, THIS IS MY ONE MAN SHOW. ENJOY & PUT YOUR PRECIOUS COMMENTS PLEASE.

MARKAND DAVE.

M.K.AUDIO-VIDEO RECORDING STUDIO.

AHMEDABAD-GUJARAT.INDIA.






7.10.12

हाथ की लकीरें । (गीत)



हाथ  की   लकीरें । (गीत)


http://mktvfilms.blogspot.in/2012/10/blog-post.html


सरगोशी   कर    रही    है,   हाथ   की   लकीरें, 

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ    आसपास   हो..!

मुस्कुरा     रही    है,  मेरे   दिल   की   धड़कन,

कहती   है,   तुम    मेरे   बहुत   खास-खास   हो..!

(सरगोशी = कानाफूसी )


अंतरा-१.


अटक  गया था   हलक़ में, जुदाई  का  वो  सबब,

आस  है  अब  कि  शाद,   दिल  का  आवास   हो..!

लगता    है,   तुम     यहीँ  कहीँ   आसपास   हो..!


( हलक़= कंठ; शाद =भरापूरा )


अंतरा-२.


इतने  क़रीब   कभी  न  थे, जब  हम  क़रीब  थे,

फिर  क्यूँ   लगा  ऐसा,  तुम  अब भी   उदास  हो..!

लगता   है,   तुम    यहीँ   कहीँ   आसपास   हो..! 


अंतरा-३.


मसल  दो,  चाहो  तो  दिल  की  मुराद  को, पर, 

चुभेगा    दग़ा    जैसे,   कोई   अगम   फाँस   हो..!

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ   आसपास   हो..!


(अगम= समझ से परे । )


अंतरा-४.


अपत   होता   है   दिल,  जब   मिलता   हूँ   तुम्हें,

सुकून  इतना  है  कि, तुम  दिल के  लिबास  हो..!

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ    आसपास   हो..!

(अपत =वस्त्रहीन; लिबास= पोशाक)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०६-०९-२०१२.

-- 
MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

28.9.12

ज़िंदगी से शिकवा । (गीत)



(GOOGLE)


ज़िंदगी से शिकवा । (गीत)



अय  ज़िंदगी, तुं  ही  बता, शिकवा  करें  भी  तो  क्या  करें..!

गले   लगाई   है   मर्ज़ी   से,   अब  करें  भी  तो  क्या  करें..!


(शिकवा= शिकायत)


अंतरा-१.


मज़ा, ख़ता, सज़ा, क़ज़ा, क्या-क्या  भर  लाई   है  दामन  में..!

ये   तो   बता,  इन   सबों  का  हम,  करें   भी   तो   क्या  करें..!

अय  ज़िंदगी,  तुं   ही   बता, शिकवा  करें  भी  तो  क्या  करें..!


(क़ज़ा=नसीब)


अंतरा-२.


ग़म,  गिला, दम   पीला, कब तक  चलेगा   ये  सिलसिला..!

तंग आ  चुके   इन  नख़रों  से, पर  करें  भी  तो  क्या   करें..!

अय  ज़िंदगी, तुं  ही  बता, शिकवा  करें  भी  तो  क्या  करें..!


अंतरा-३.


क्या  पाया, क्या खोया, समझा  जो  मेरा, वही   लुट  गया..!

अब,  तुझ  पर  हम  नाज़,  गर   करें   भी   तो   क्या   करें..!

अय  ज़िंदगी, तुं  ही  बता, शिकवा  करें  भी  तो  क्या  करें..!


(नाज़= गर्व)


अंतरा-४.


आना-जाना,   उठना - गिरना,   या  रब,  अब   और   नहीं..!

पर, बड़ी  ज़िद्दी  है  ये,   उसका   करें   भी   तो   क्या   करें..!

अय  ज़िंदगी, तुं  ही  बता, शिकवा  करें  भी  तो  क्या  करें..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः २८-०९-२०१२.

-- 
MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

26.9.12

सीख लिया है उसने । (गीत)


(GOOGLE)



सीख  लिया  है  उसने । (गीत)


नफ़रत  निभाने  का  इल्म, सीख  लिया   है   उसने ।

हमारे   आँसूओं  का  साग़र,  चख  लिया  है   उसने ।


(इल्म=  विद्या; साग़र= पैमाना)


अंतरा-१.


इस  जिगर का  लहू  शायद, कम  पड़ा  होगा, तभी तो..!

इन्तक़ाम  की    आग   को   ही,   पी   लिया  है   उसने..!

नफ़रत    निभाने  का    इल्म,  सीख  लिया  है   उसने ।


अंतरा-२.


दूर तक  उसकी  ख़ुशबू, अब भी  फैलती  होगी, मगर..!

उसे  मरकज़ में  दम  तोड़ना,  सीखा  दिया   है  उसने..!

नफ़रत   निभाने    का   इल्म,  सीख  लिया  है   उसने ।

(मरकज़= बीचों-बीच)


अंतरा-३.


नफ़रति   मज़हब  से  उसे,  ऐसी   मुहब्बत  हुई   कि..!

मुहब्बत  में   रोज़ा -ए- नफ्स, रख   लिया  है   उसने ।

नफ़रत    निभाने   का  इल्म, सीख  लिया  है   उसने ।


(नफ़रति   मज़हब = नफ़रत का धरम; रोज़ा-ए-नफ्स= मन के तीन  व्रत= कम खाना, कम सोना और 
कम बोलना )


अंतरा-४.


रूखे  - रूखे   से    सरकार ? अच्छा   नहीं  लगता   हमें..!

मगर, चुपके से  प्यार  करना, सीख  लिया   है   हमने..!

नफ़रत   निभाने   का    इल्म,  सीख  लिया  है   उसने ।


मार्कण्ड दवे । दिनांकः २६-०९-२०१२.



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MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

24.9.12

हमारे वोट, पेड़ पर उगते हैं क्या ? (व्यंग गीत)


(Google)



हमारे  वोट,  पेड़  पर   उगते   हैं   क्या ? (व्यंग गीत)



यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

हुआ    ऐसा, एक  नेताजी  को   पीछे से    आवाज़  लगा  दी..!

1.

चुनाव  सर  पर  था  और  प्र-खर  समाज  प्रचुर  जोश में  था..!

अतः वो दौड़े  चले आए  और  फिर  लं..बी  खर-तान  लगा  दी..!

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

2.

"ज़रा   धीरे   नेताजी, आप  की   तरह, जनता   बहरी   है  क्या ?"

बोले, "चाहे   सो  कहो, दिलवा  दोगे  ना   फिर  वही  राजगद्दी ?"

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

3.

हमने   कहा, " क्यों जी   हमारे   वोट,  पेड़  पर  उगते   हैं   क्या ?

अब  इतना समझ लो, हमने आपकी  किस्मत  उल्टी  धुमा  दी..!" 

यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

4.

बोले, "  हर  आँगन  में  हम, रुपयों  का  एक  पेड़  लगवा  देंगे..!"

हम  पर करें  वह  दूसरा  खर-प्रहार , हमने  पीठ  ही  धुमा  ली..!

यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०९-२०१२. 

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MARKAND DAVE
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