
25.10.12
कानजीलाल वर्सेस कजरीवाल ? O.M.G..!

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Markand Dave
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10.10.12
राष्ट्रीय दामाद से पंगा? (व्यंग गीत)
राष्ट्रीय दामाद से पंगा? (व्यंग गीत)
लगता है, `बनाना रिपब्लिक` अनादि से है भिखमंगा..!
(अनादि= अनंत )
१.
मंत्रीजी उवाच, `पुरानी पत्नी वो मज़ा नहीं देती ?`
सच होगा शायद, साबित हो गया शौहर घोर लफंगा ?
अरे मूर्ख, राष्ट्रीय दामाद से क्यूँ लिया तुने पंगा..!
२.
मंत्रीजी उवाच,`उनके लिए हमारी जान भी हाज़िर है ?`
सच कहा, सारा देश मरता है तो मरे, भूखा-नंगा..!
अरे मूर्ख, राष्ट्रीय दामाद से क्यूँ लिया तुने पंगा..!
३.
यहाँ कौन करेगा जांच, राष्ट्रीय रद्दी दामादों की ?
सुना है, उनके मन-मंदिर से ज़्यादा शौचालय है चंगा ?
अरे मूर्ख, राष्ट्रीय दामाद से क्यूँ लिया तुने पंगा..!
(रद्दी= अनुपयोगी)
४.
देश की बरबादी का दूसरा नाम रख दो `इतालिया` ?
फिर, बिना शरम कहो, मेरे अलावा पूरा देश है नंगा..!
अरे मूर्ख, राष्ट्रीय दामाद से क्यूँ लिया तुने पंगा..!
(इतालिया= चारागाह= वह भूमि जो पशुओं के चरने के लिए खाली छोड़ दी गई हो । http://goo.gl/GkvaE )
नोट- अ..रे.., बुरा मत मानना, आप मज़ाक भी नहीं समझते क्या?
मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०९-०९-२०१२.

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24.9.12
हमारे वोट, पेड़ पर उगते हैं क्या ? (व्यंग गीत)
हुआ ऐसा, एक नेताजी को पीछे से आवाज़ लगा दी..!
1.
चुनाव सर पर था और प्र-खर समाज प्रचुर जोश में था..!
अतः वो दौड़े चले आए और फिर लं..बी खर-तान लगा दी..!
यूँ लगा मानो कि ग़लती से हमने, गधे की दुम दबा दी..!
2.
"ज़रा धीरे नेताजी, आप की तरह, जनता बहरी है क्या ?"
बोले, "चाहे सो कहो, दिलवा दोगे ना फिर वही राजगद्दी ?"
यूँ लगा मानो कि ग़लती से हमने, गधे की दुम दबा दी..!
3.
हमने कहा, " क्यों जी हमारे वोट, पेड़ पर उगते हैं क्या ?
अब इतना समझ लो, हमने आपकी किस्मत उल्टी धुमा दी..!"
यूँ लगा मानो कि ग़लती से हमने, गधे की दुम दबा दी..!
4.
बोले, " हर आँगन में हम, रुपयों का एक पेड़ लगवा देंगे..!"
हम पर करें वह दूसरा खर-प्रहार , हमने पीठ ही धुमा ली..!
यूँ लगा मानो कि ग़लती से हमने, गधे की दुम दबा दी..!
मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०९-२०१२.
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15.9.12
नेताजी, ऐसा क्यूँ होता है ? (व्यंग गीत)
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30.8.12
खल नेताजी की कमाई । (व्यंग)
संसद से सड़क तक देख, लड़ाई होती भारी है ।
१.
इटली कि किटली जब, चूल्हे पे चढ़ जाती है..!
अच्छे अच्छों को उनकी, नानी याद दिलाती है ।
चले न चले संसद पर, कमाई रहती भारी है ।
२.
चमचें हाज़िर है कई, पुरखों की लाज रखने ।
हंगामा मचाने बस, एक इशारा ही काफ़ी है ।
चले न चले संसद पर, कमाई रहती भारी है ।
३.
नेताजी की देख सारी, हमदर्दी भी जाली है ।
बुरी नज़रवाले तेरी, जुबान कितनी काली है..!
चले न चले संसद पर, कमाई रहती भारी है ।
४.
सब्र कर, सपनों में तेरे नानी, तेरी भी आयेगी ।
बाप के बाद अब, बेटे ने भी बाँह चढाई है ।
चले न चले संसद पर, कमाई रहती जारी है ।
५.
वोट का मोल है क्या, अबोध जनता कब जानेगी?
पर तब तक, खल नेता की जेबें रहनी भारी है ।
चले न चले संसद पर, कमाई रहती जारी है ।
मार्कण्ड दवे । दिनांकः ३०-०८-२०१२.
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24.8.12
नेताजी,मानता हूँ ।
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30.12.11
आधुनिक बोधकथाएँ. ७ - " मैं संसदताई । "
"लोकशाही को ठोकशाही बनाने की ली है ठान..!!
अय आम जनता, भाड़ में जा,तुं और तेरा लोकजाल..!!"
एक स्पष्टता- इस बोधकथा का, अपने देश की लोकशाही से कोई लेना-देना नहीं है ।
=====
मार्कण्ड दवे । दिनांकः ३०-११-२०११.
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14.10.11
तौल मोल के बोल
जाती है.वाणी आशिको के लिए वरदान भी है और व्यापारी के लाभ का कारण भी.नेता लोग जो घाघ होते
हैं वो तो बहुत कंजूसी से वाणी उपयोग करते हैं मगर चुनाव के समय वाणी का खुलकर उपयोग करते हैं .
वाणी जब भले आदमी के मुखारविंद से निकलती है तो जनमानस पर छाप छोड़ जाती है लेकिन जब अंह
और गर्व से चूर आदमी के मुंह से निकलती है तो जन जन की हथेली की छाप चेहरे पर छोड़ जाती है .
तो भोले भक्तो को मखनिया वाणी से प्रभावित कर ऊँची कुर्सी पर लोटने के सपने देखने लगे मगर वाणी
कब फिसली कि बेचारे घर के रहे न घाट के .
जगाने लगे
वाणी तो सच्चे संतो के मुंह से सुनी जाती है और ऐसी वाणी दिल तथा दिमाग को खुराक भी देती है .माया
वाले बाबा भी जै रामजी की बोल के कथा के अमृत में बबलू की कहानी कह डालते हैं .अब बेचारा बबलू
क्या जबाब दे ? कभी कभी ही तो बबलू बोलता है और बोलते ही टांग खिचाई हो जाती है .मगर बबलू की
बात बबलू के कबीले-कुनबे के लोग सर माथे पर रख लेते हैं आखिर मदारियों को पेट जो भरना है
बड़े दादाजी की अंगुली पकड़ कर एक नौसिखिया तलवार की धार पर वैतरणी पार कर गया .जब वैतरणी
पार हो गयी और दादा ने अंगुली छोड़ी तो साहबजादे ने झोश में आकर अंगुली माँ के माथे की और ताक
दी.कुछ नासमझ बन्दों को नागवार गुजरा और साहबजादे को प्रेक्टिकल सीख दे डाली ,साहबजादे ने
फरमाया- मैं दादा के साथ रह चूका हूँ तुमने उनकी बात मानी और मशाल जला दी ,अब मेने अकेले में
वाणी विलास किया तो मशाल से मेरी मूंछ जला दी .ऐसा करना नाइंसाफी है कि नहीं .
इन्हें कौन समझाए सा'ब कि माँ कि गाली कौन खुद्दार बच्चा सहन कर लेगा .मगर हम तो इस वाणी
विलास में ना पड़ेंगे क्योंकि कबीर ने कहा था -
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय
ओरन कुं शीतल करे आपहुं शीतल होय
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12.10.11
आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ !!
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28.9.11
तू भी चोर में भी चोर ,जाने भी दो यारो !!
को अँधा कहने पर अंधे को ठेस ना पहुंचे इसलिए हम सूरदास कह देते हैं ,लंगड़े को लंगडा कहना कोई
बढ़िया बात नहीं है .हम चोर को चोर नहीं कह कर कोई अच्छा शब्द प्रयोग कर सकते हैं .वैसे भी कोई गुनाह
किसी चोर का सहयोगी चोर यदि पकड़ा भी गया तो आप पकडे गए को चोर कहने का दुसाहस कर
सकते हैं परन्तु जो अभी तक नहीं पकड़ा गया उसे भी चोर कह देना जायज हो सकता है क्या ?
कबीले का बाजीगर था ,लेकिन तुमने मुझ पर आरोप लगा कर ठीक नहीं किया ,मैं आम जनता के
सामने जाऊँगा और सच बताऊँगा. मेने जो पूरा टेलीफोन चुराया था उस योजना में तुम भी मेरे साथ थे .
मेने उस टेलीफोन का ढांचा कबाड़ी को बेचा और तुमने अन्दर के उपकरण .
रही थी भीड़ में से नहीं पकडे गए शातिर न्याय करने बैठ गये.बड़ी उलझन थी सा'ब! क्योंकि शातिर महोदय
को किसी एक को सही ठहराना था .एक को सही और दुसरे चोर को चोर कह देने से एक बार तो बात बन
जाती मगर दुसरे चोर से पंगा लेना पड़ जाता .बहुत माथापच्ची के बाद हल निकाला गया .
इसलिए लड़ पड़े हो .भविष्य में काम इतनी सफाई से करो की माल भी झपट लो और पकडे भी मत जाओ .
खेर ...अभी तुम लोगो के लिए यही फैसला है की तुम भी चोर और ये भी चोर इसलिए एक दुसरे को
अस्थिर मत करो ,जाने भी दो यारो ,बात आई गयी कर दो .
एकता पर नारे लगाने लगे कुछ अपना अपना करम पीट कर बिखर गये. कबीले की शांति और सौहार्द के
लिए -जाने भी दो यारो !!
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