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25.10.12

कानजीलाल वर्सेस कजरीवाल ? O.M.G..!


कानजीलाल  वर्सेस  कजरीवाल ? O.M.G..!




प्यारे दोस्तों,

आपने  फिल्म `ऑ..ह  माय  गॉड` देखी  है?  इस  फिल्म में  भगवान की  सत्ता को  ललकारने वाले  `कानजी  लालजी  मेहता` नामक  एक आम आदमी का  किरदार (श्री परेश  रावलजी) आपको  याद  है? हाँ, तब  तो   फिर, ये  कानजीलाल के  सारे  संवाद भी  याद  होंगे..! पता  नहीं  क्यों, मुझे  आम  आदमी  कजरीवाल के  (MENGO PEOPLE ) मन  की  पीड़ा  और  ये कानजीलाल के  मन  की  पीड़ा,  एक  जैसी  लग  रही  है, आईए  देख ही  लेते  हैं..!

(नोट- यह  व्यंग आलेख  सिर्फ  मनोरंजन के  उद्देश्य  से  लिखा  गया  है, किसी  व्यक्ति-धर्म-पक्ष-परिवार-समाज से  इसका  कोई  लेनादेना  नहीं  है  - मार्कण्ड दवे ।)

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१. (वारासणी में   चोर बाज़ार  की  अपनी  दुकान के  लिए  होलसेल  मूर्तियाँ  ख़रीदते हुए ।)

कानजीलाल- " एक  बड़े  पेट वाले  गणपति  देना, एक  ढाईसो वाले  क्रिश्ना  देना और आठ  वो  बोड़ी-बिल्डर  हनुमान  देना..! कितना  हो  गया? अब  इतना  लिया है तो  फिर  तीन  सांईबाबा  तो  बोनस  मिलेगा  ना?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " एक  राष्ट्रीय  दामाद  लपेट  में  लिया, एक  कानून  मंत्री  भी  निपटा लिया  और   विरोधी  पार्टी  का  एक  चिल्लर  भी  ढ़ेर  हो  गया..! टोटल  तीन  हो  गया ? अब  इतनी सारी  मेहनत  के  बाद,  हिलस्टेशन  लवासा जाकर  बोनस  में   और  ग़हराई से  तफ़तीश  तो  करनी  पडेगी  ना..!"

२. ( भगवान का  अपमान  करने  पर  अपनी  पत्नी की  आस्था का  मज़ाक  उड़ाते हुए ।)

कानजीलाल- "मुझे  एक  बात  बता,  पत्नी  के  उपवास  रख़ने  से  पति  के  पाप  कैसे  धूल  सकते  हैं?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मुझे  एक  बात  बता, अन्ना-रामदेव  के  उपवास  रखने  से,  इन  बेईमानों  का  ह्यदय  परिवर्तन  कैसे  हो  सकता  है?"

३. ( दहीं-हांडी कार्यक्रम में गोविंदा बने अपने  बेटे से  नाराज़ होकर ।)

कानजीलाल- "अ..रे..! मेरा  बेटा  ना  गोविंदा  बनेगा,  ना  चंकी  पांडे  बनेगा, बेवकूफ़..! मेरा  बेटा  बड़ा  होकर  क्रिकेटर  बनेगा  क्रिकेटर..समझी?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मेरी  पार्टी  का  कोई  भी सदस्य  ना  लुच्चा  बनेगा, ना  लफ़ंगा  बनेगा, ठग्गीजी.! मेरा   हरेक  साथी  चुनाव  जीत  कर, देश  के  लिए   एक मिसाल  बनेगा  मिसाल..समझे?"

४. (राजस्थानी  ग्राहक  को  ठगने  के  आशय से ।)

कानजीलाल- " बद्रीनाथ  में  जब  मंदिर  बन  रहा  था  ना  तब  ज़मीन  फाड़कर  ये  मूर्ति  प्रगट  हुई  थी..! द्वारिका  के  बहुत  बड़े  साधु  जब  पदयात्रा  पर  निकले  थे तब  मैंने  उन्हें  एक  लोटा  पानी  पिलाया था  बस,  बदले  में  प्रसन्न  हो  कर  उन्होंने  मुझे  ये  मूर्ति  दी  और  ये  मूर्ति  आते  ही  मेरा  नसीब  पलट  गया ..!" 

/वर्सेस/

कजरीवाल- " दिल्ली  में  जब  भ्रष्टाचार  विरोधी  आंदोलन  चल  रहा  था   तब  अन्नाजी  के  साथ  मैं  भी  उसमें  शामिल  हुआ था  बस, बदले  में   उनसे  मतभेद  के  चलते  मुझे  ये  प्रेरणा  मिली (?) फिर,  उन्होंने  प्रसन्न  हो  कर  मुझे  आशिर्वाद  दिया  और  उनसे  अलग  होते  ही, इन   भ्रष्ट  मंत्रीओं  का  नसीब  चौपट   हुआ..!

५. (दहीं-हाँडी  कार्यक्रम  को  रूकवाने  के  आशय से  ।) 

कानजीलाल- " सुनिए, सुनिए, सुनिए, शांत  हो  जाईए..शांत  हो  जाईए..! अभी-अभी  धर्मधुरंधर  सिद्धेश्वर  महाराज ने  ये  बताया  है  कि, जगह-जगह  दहीं-हांडी  के  कार्यक्रम  में  उमड़ी  भीड़  को  देख  कर  किशन-कन्हैया  बहुत  प्रसन्न  हुए  हैं  और  आज  वो  अपने  भक्तों  के  हाथों से  दूध  और  मक्खन  खायेंगें..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " सुनिए, सुनिए, सुनिए, शांत  हो  जाईए..शांत  हो  जाईए..! अभी-अभी अधर्म  धुरंधर  बे-असरकारी  सूत्रों ने  बताया  है  कि, जगह-जगह  नाना  प्रकार  की  समस्याओं  के विरुद्ध  चल  रहे  आंदोलनों  में  उमड़ी  दुःखी  भारी  भीड़  को  देख  कर  मनमोहन  भगवान  बहुत  आहत  हुए  हैं  और  आज  वो  सभी  भ्रष्ट मंत्रीओं  को  अपने हाथों  से  हथकड़ीयाँ  पहना  कर  उन्हें  जेल  भेजेगें..!"

६. ( दहीं-हाँडी  कार्यक्रम  का कबाड़ा  करने के  बाद ।)

कानजीलाल- " भगवान  का  ड़र  किसी  ओर  को  दिखाना  महाराज..! देखता  हूँ,  क्या  करेगा  भगवान..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मरने-मरवाने  का  ड़र  किसी  ओर  को  दिखाना  न्यायमंत्रीजी..! देखता  हूँ,  आपके  निर्वाचन  क्षेत्र  में  जाने-आने  पर  क्या  करेगें  बलवान..!


७. (इन्श्योरेन्सवालों  का  क्लॅम  पास  करने से  मना  करने के  बाद ।)

कानजीलाल- " हाँ,  मेरे  जैसे  पचास  कानजी के  केस  तो  चल  रहे  होंगें, मगर तुम्हारे  इस  किशन  पर  तो  किसीने  केस  नहीं  किया  होगा  ना..!  मैं   तुम्हारे  भगवान  पर  ही  केस  करूँगा..!  

/वर्सेस/

कजरीवाल- " हाँ, मेरे  जैसे  पचासों  NGO`S  के  केस  भ्रष्ट मंत्रीओं  पर  चल  रहे होंगे, मगर  आजतक  उनके  दामादों  पर  तो  किसीने  ऊँगली  नहीं  उठाई  होगी  ना.!  मैं   इस  देश के  सब से  बड़े  दामाद  पर  ही  ऊँगली  उठाऊँगा..!"

८. (कॉर्ट  रूम  में अपना केस  ख़ुद  लड़ते  हुए ।)

कानजीलाल-" दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं  है..! मि. लॉर्ड,  सारे  के  सारे  वकील  भगवान से  ड़रे  हुए  हैं  तो,  मज़बूरी  में  ये  केस  अब  मुझे  ही  लड़ना  पड़ेगा..!" 

/वर्सेस/

कजरीवाल- " दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं  है, मि. जनता,  सारे  के  सारे  पक्ष-सांसद  एक  दूसरे से  मिले  हुए  हैं  तो  फिर,   मज़बूरी  में  सरकार  की  अक्ल  अब  मुझे  ही  ठिकाने  लानी  पड़ेगी  ना..!

९. (कॉर्ट  रूम ।) 

कानजीलाल-" ये  तो  इन्स्योरन्सवालों  ने  कहा  कि,  भगवानने  तुम्हारी  दुकान गिराई  है, भगवान  से  पैसा  ले  लो, इसीलिए  मैंने  ये  केस  किया  है  वर्ना  हम  तो धंधेवाले  गुजराती  लोग  है, हमें  इस  झंझट में  पड़ना  ही  नहीं  है..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  तो  सरकार  के  सारे  मंत्रीओ ने  हमें  बारबार उकसाया  कि, सरकार  की  ख़ामीयाँ   निकालना  आसान  है, एक  बार  राजनीति में  आकर  देखो, इसीलिए  हम ने  राजनीतिक  दल  बनाया  है  वर्ना,  हम तो  आम  आदमी  है, हमें  इस  झंझट में  पड़ना  ही  नहीं  है..!"

१०. (कॉर्ट रूम-"आई  ऑब्जेक्ट मि.लॉर्ड, भगवान के  सेवा कार्य  को  धंधा  कह  रहे हैं, मि.कानजी?)

कानजीलाल-" ये  धंधा  ही  है  मि.लॉर्ड..! जैसे  म्यूज़ियम में  मोम का  पुतला  दिखा कर  पैसे  लिए  जाते  हैं  बस, वैसे  ही  ये  लोग  मंदिर  में  पत्थर  का  पुतला  दिखा  कर  पैसे  ले  लेते  हैं..!  और,  पुजारीओं  की  तो  सैलरी  भी  होती  है..! इनके  धंधे  में तो  कभी   रिशेसन (Recession = मूल्यपतन)  भी  नहीं  आता..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  सारे नेता लोग  इसे  धंधा  ही  मानते  है..!  पांच साल के  बाद  जैसे  ही नया चुनाव  आता  है  तुरंत, ये लोग  जनता के  सामने  बड़े-बड़े   झूठे  वायदे  दोहरा  कर  चुनाव  जीत  जाते  हैं  ..! और, सरकार से  सैलेरी, जनता से  रिश्वत, उद्योगपतिओं  के  साथ  धंधा  जमा  कर, सब कुछ  एक साथ  लूटते  हैं..! फिर, राजनीति  के  धंधे  में  तो  कभी  रिशेसन भी  (मंदी)  नहीं  आता..!""

११.(कॉर्ट रूम- "लेकिन, मंदिर वाले  आपको  पैसा  क्यूँ  दे?")

कानजीलाल-" क्यों  कि, मैंने  मंदिरो में  भी  लाखों के  प्रिमीयम  भरे  हैं..!  ये  देखिए, ये  सारी  रिसीप्ट,  उस  प्रिमीयम की  है,  जो  मैं  पिछले  अठ्ठारह  सालों से  भरता  आया  हूँ..! मि.लॉर्ड, ये  मस्जिद का  चंदा, ये  दरगाह की चद्दर, चर्च की  कैंडल, फ़क़ीर की  झोली, बाबा की  अगरबत्ती, माँ  की  चूंदड़ी (चूनरी), टोटल  दस-साढ़े दस लाख रूपया  मैं  सारी  दुकानो  में  भर  चुका  हूँ..! मेरी  सासुमाँ  बीमार  रहती  थी  तो  मंदिर वालों ने  कहा, ग्यारह  हज़ार  दो, पूजा  कराओ..फिर देखो, पूजा  कराई  और  सासुमाँ  टपक  गई..! चलो, वो  तो  अच्छा  हुआ  पर, ग्यारह  हज़ार  भी  गए? ये  लोग  तो  रिफंड भी  नहीं  देते..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " उनको  जवाब तो  देना  पड़ेगा क्यों कि, सरकार  ने  जनता से  टैक्स  वसूल  किया  है..! देखिये, आयकर, वेल्थ  टैक्स, कैपिटल  गेईन  टैक्स, सेल्स टैक्स, सर्विस  टैक्स, रोड  टैक्स, वगैरह, वगैरह..! टोटल, आज़ादी से  आजतक, इतने  सालों  में  जनता ने   करोड़ो-अरबों  रूपया  सरकारी  दुकानों में (दफ़्तरों में) भरे  हैं..! सरकार ने  कहा  था  कि, इस  टैक्स के  बदले में  आपके  लिए  आरामदायक  सुख-सुविधा  मुहैया  कराई  जाएगी  पर, ये तो  भ्रष्टाचार  कर  के  सारे  पैसे  हज़म  कर  गये  और  पूछने  पर जवाब  देने के  बजाय, हम पर  लाठीयाँ  बरसाते  है?"

१२. ( कॉर्ट रूम- छोटी-छोटी बातों के लिए भगवान पर केस नहीं किया जाता । )

कानजीलाल-"मि.लॉर्ड, ये  छोटी  बात  नहीं  है ।  मुझे  अगर  न्याय  नहीं  मिला  तो,  मैं  और  मेरा  परिवार  रास्ते  पर  आ  जायेंगें..! ये मंदिर वाले  कहते  हैं, श्रद्धा से  दान दो,  आप का  कभी  बुरा  नहीं  होगा  और  इन्स्योरन्स वाले  कहते  हैं, टाईम  पर प्रिमीयम  भरो, बुरा  हुआ  तो  हम  है  ना..! तो  मैंने तो  दान भी  दिया  है  और प्रिमीयम  भी  भरे  हैं..! और  आज  दोनों के  दोनों ने  हाथ  उपर  कर  लिए  हैं ?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  छोटी-मोटी  लूट  नहीं  है..! जनता  को  अगर  न्याय  नहीं  मिलेगा तो  सब के सब  रास्ते  पर  उतर  आयेगें..! चुनाव के  वक़्त  इन्हों ने   ही   कहा  था कि, आप  हमें  वोट  दो  हम  आप  का  कल्याण  कर  देगें..! अब  भ्रष्टाचार  करने  के  बाद  कहते  हैं  कि, हमने  कुछ ग़लत  या  बुरा  काम  किया  है  तो  कॉर्ट  में  जाओ..! महँगाई  और सरकारी  टैक्स  भरते-भरते   हमारी  जेबें  ख़ाली  हो  गई  है  और  इन्होंने  हाथ  उपर  कर  दिए  है , हम  कॉर्ट  कैसे  जाएं?"

१३.(कॉर्ट रूम के बाहर- एक्ट ऑफ गॉड  के  ४००  करोड़ के  मुकद्दमे  दायर  होने के  बाद ।)

कानजीभाई-" महाराज, ये तो  सरकारी  जगह है, यहाँ से  तो  सुरक्षित  निकल जाओगे  लेकिन, इन  लोगों से  मंदिरो में, मस्जिदों मे, गिरिजाघरों में, किस-किस से  बचोगे?"

/वर्सेस/

कजरीवाल-" नेताजी, जब तक सरकारी गाड़ी और सुरक्षा साथ है, सुरक्षित रहोगे लेकिन, अगला  चुनाव  हार कर  जब  सारे  देश में  घूमोगे  तब  किस-किस से बचोगे?"

१४.( टीवी  इंटरव्यू  में ।)

कानजीलाल- " जिस तरह वो  माफ़िया वाले  गन  दिखा  कर  ड़राते  हैं,  ये लोग भगवान  दिखा  कर  ड़राते  हैं..! आप के  बच्चे की  कुंडली  मांगलिक  है, उसे  कालसर्प  योग है, वगैरह..वगैरह..! क्या  है  ये, उसे  साँस  तो  लेने  दो ?

/वर्सेस/

कजरीवाल-" जिस तरह  वो  माफ़िया वाले  गन  दिखा कर  ड़राते  है, ये  नेता  लोग देशी-विदेशी  विरोधीओं  को  दिखा कर  हमें  ड़राते  हैं..! आप को  आतंक  से  ख़तरा  है, आप को  विरोधी  पार्टीओं की  नीतिओं  से  ख़तरा  है,  वगैरह..वगैरह..! क्या  है  ये, हमें  किसे  वोट  देना  है, ख़ुद  ही  तय  करने  दो?"

१५.(टीवी  इंटरव्यू  में- आप के हिसाब से धर्म की परिभाषा क्या है, धर्म या मज़हब एक इन्सान की  ज़िंदगी में  क्या  काम  करता  है ?)

कानजीलाल- " मैं  समझता हूँ  जहाँ  धर्म  है,  वहाँ  सत्य के  लिए  जगह  नहीं  है  और  जहाँ  सत्य  है, वहाँ  धर्म  की  ज़रूरत ही  नहीं  है? मेरे  हिसाब से  तो  धर्म  एक ही  काम  करता  है, या तो  वो  इन्सान को  बेबस  बनाता  है  या  आतंकवादी..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल-" मैं  समझता  हूँ,  जहाँ  किसी  पद प्राप्ति की लालसा  है,  वहाँ  देश  की सेवा  के लिए  जगह  नहीं  है  और  जहाँ  देश  सेवा की  भावना  हैं,  वहाँ  सत्ता-लालसा की  ज़रूरत ही  नहीं  है..! मेरे  हिसाब से  तो  सत्ता-लालसा  एक ही  काम  करती  है, या तो  वो  लीडर  को  भ्रष्ट  बनाती  है  या  फिर,  किसी  पक्ष, परिवार  या मंत्रीजी  का  चापलूस..!"

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ANY  COMMENT,  SIR?

मार्कण्ड दवे । दिनांकः२५--१०-२०१२.

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MARKAND DAVE
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10.10.12

राष्ट्रीय दामाद से पंगा? (व्यंग गीत)





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In practice, a banana republic is a country operated as a commercial enterprise for private profit, effected by the collusion (मिलीभगत) between the State and favoured monopolies, whereby the profits derived from private exploitation of public lands is private property, and the debts incurred are public responsibility.




राष्ट्रीय  दामाद  से  पंगा? (व्यंग गीत) 

अरे    मूर्ख,   राष्ट्रीय   दामाद  से   क्यूँ   लिया   तुने   पंगा..!

लगता  है, `बनाना   रिपब्लिक` अनादि  से   है  भिखमंगा..!

(अनादि= अनंत )


१.


मंत्रीजी   उवाच,   `पुरानी   पत्नी   वो   मज़ा   नहीं   देती ?`

सच  होगा  शायद, साबित  हो गया  शौहर   घोर  लफंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


२.


मंत्रीजी  उवाच,`उनके   लिए  हमारी   जान भी   हाज़िर   है ?` 

सच    कहा,  सारा   देश   मरता  है  तो   मरे,  भूखा-नंगा..!

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


३.


यहाँ   कौन   करेगा   जांच,  राष्ट्रीय    रद्दी   दामादों   की ?  

सुना  है, उनके  मन-मंदिर से  ज़्यादा  शौचालय  है  चंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(रद्दी=  अनुपयोगी)


४.


देश  की   बरबादी   का   दूसरा  नाम  रख   दो `इतालिया` ?

फिर, बिना  शरम  कहो,  मेरे  अलावा  पूरा   देश   है  नंगा..! 

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(इतालिया= चारागाह= वह भूमि जो पशुओं के चरने के लिए खाली छोड़ दी गई हो । http://goo.gl/GkvaE )


नोट-  अ..रे.., बुरा  मत  मानना, आप  मज़ाक  भी  नहीं  समझते  क्या? 


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०९-०९-२०१२.


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MARKAND DAVE
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24.9.12

हमारे वोट, पेड़ पर उगते हैं क्या ? (व्यंग गीत)


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हमारे  वोट,  पेड़  पर   उगते   हैं   क्या ? (व्यंग गीत)



यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

हुआ    ऐसा, एक  नेताजी  को   पीछे से    आवाज़  लगा  दी..!

1.

चुनाव  सर  पर  था  और  प्र-खर  समाज  प्रचुर  जोश में  था..!

अतः वो दौड़े  चले आए  और  फिर  लं..बी  खर-तान  लगा  दी..!

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

2.

"ज़रा   धीरे   नेताजी, आप  की   तरह, जनता   बहरी   है  क्या ?"

बोले, "चाहे   सो  कहो, दिलवा  दोगे  ना   फिर  वही  राजगद्दी ?"

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

3.

हमने   कहा, " क्यों जी   हमारे   वोट,  पेड़  पर  उगते   हैं   क्या ?

अब  इतना समझ लो, हमने आपकी  किस्मत  उल्टी  धुमा  दी..!" 

यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

4.

बोले, "  हर  आँगन  में  हम, रुपयों  का  एक  पेड़  लगवा  देंगे..!"

हम  पर करें  वह  दूसरा  खर-प्रहार , हमने  पीठ  ही  धुमा  ली..!

यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०९-२०१२. 

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MARKAND DAVE
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15.9.12

नेताजी, ऐसा क्यूँ होता है ? (व्यंग गीत)




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नेताजी, ऐसा  क्यूँ  होता  है ? (व्यंग गीत)




ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  ठंडे  चूल्हे, खाली  थाली, पापी  पेट  पर, इतना  बलात्कार..!



अंतरा-१.


नेताजी, लाल-पीली  चौपहिया में   या फिर, हवा में   टहलो   सारी  दुनिया, मगर..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है ? आजकल आम आदमी, दो  पहिये का भी   ना  रहा  हक़दार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-२.


नेताजी, धनभंडार से  घर  आप का  भरा, धानभंडार में   अनाज   है   सड़ा  हुआ..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है? आजकल  ज़िंदगी का भी  जीना,  हो  गया  इतना  दुश्‍वार..! 

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-३.


नेताजी, सब के   बीवी-बच्चे   होते  हैं, जिद्द के  भी  पक्के   होते  हैं, अब  कहिए..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  रोज़,  मन   मार   कर, हम  उन्हें  फुसलाते   रहें  लगातार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-४.


नेताजी, अपसेट मत  होना, ज़रा  हमें भी `कसाब`के  साथ  सेट  करा  दीजिए ना..!

ऐसा क्यूँ  लगता है? हम से ज्यादा मानो,`कसाब`पर उमड़ रहा  है आप का प्यार..!   

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की  चीख़ पुकार..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः१५-०९-२०१२.


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MARKAND DAVE
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30.8.12

खल नेताजी की कमाई । (व्यंग)



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खल  नेताजी  की  कमाई । (व्यंग)



चले   न  चले   संसद  पर,  कमाई    रहती   भारी   है ।

संसद   से  सड़क  तक  देख, लड़ाई   होती   भारी   है ।


१.


इटली  कि   किटली   जब,  चूल्हे   पे   चढ़  जाती   है..!

अच्छे   अच्छों  को   उनकी, नानी   याद   दिलाती   है ।

चले   न  चले   संसद   पर,  कमाई    रहती   भारी    है ।


२.


चमचें    हाज़िर   है    कई,  पुरखों  की   लाज   रखने । 

हंगामा   मचाने    बस,  एक   इशारा   ही    काफ़ी   है ।

चले  न  चले   संसद   पर,  कमाई   रहती   भारी    है ।


३.


नेताजी  की   देख   सारी,  हमदर्दी   भी  जाली   है ।

बुरी   नज़रवाले   तेरी,  जुबान   कितनी  काली   है..!

चले   न  चले  संसद  पर, कमाई  रहती   भारी   है ।


४.


सब्र   कर, सपनों   में  तेरे  नानी,   तेरी  भी  आयेगी ।

बाप    के   बाद   अब,  बेटे   ने   भी   बाँह  चढाई   है ।

चले   न  चले  संसद  पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।


५.


वोट  का  मोल  है  क्या,  अबोध  जनता  कब  जानेगी?

पर    तब  तक,   खल  नेता  की   जेबें  रहनी  भारी   है ।  

चले   न   चले    संसद   पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।



मार्कण्ड दवे ।  दिनांकः ३०-०८-२०१२.

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MARKAND DAVE
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24.8.12

नेताजी,मानता हूँ ।




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नेताजी, मानता  हूँ ।


मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी, हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


नेताजी, फिर  भी  आप  रह   जायेंगें   भूखे,  मैं   जानता  हूँ ।


१.

झूठे  -  मूठे   वर   देंगें,  रहने   को   ये   घर  देंगें,  खुशी   मना..!

कैसा  घर, कैसी  खुशी, महँगाई  ने  तिल-तिल  कर  हमें  मारा ।

नेताजी,  आप  तो  कभी  न   थे   इतने  सस्ते?  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर   भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


२.


हाल  -  बेहाल  हम  रहते   हैं   और   मजबूरी   में   जीते   हैं ।

कब का  भूल चूके  हैं  रोना, दर्द  पर  भी  हम  तो  हँसते   हैं..!

नेताजी,  दर्द   की  आँख   के  आप   सितारे   हैं , जानता  हूँ ।

मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


३.


मत  मारी  गई  थी  हमारी, जो   हमने  आप  का  बटन  दबाया ।

जंगल  जाने   को  बचा   था, एक ही  लोटन,  वो  भी  बिकवाया?

नेताजी,  फिर   भी   आप   रह   जायेंगे   प्यासे,  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर    भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०८-२०१२.

30.12.11

आधुनिक बोधकथाएँ. ७ - " मैं संसदताई । "




आधुनिक  बोधकथाएँ. ७ -

" मैं  संसदताई । "






"लोकशाही  को  ठोकशाही   बनाने  की  ली   है  ठान..!!
अय आम जनता, भाड़  में जा,तुं  और तेरा लोकजाल..!!"

एक स्पष्टता- इस बोधकथा का, अपने  देश  की  लोकशाही  से कोई  लेना-देना  नहीं  है ।

=====

" मैं  संसदताई । "

( दरवाज़ा- "ठक-ठक,ठक-ठक,ठक-ठक ")

संसदताई-" आती  हूँ  बाबा, ये  सुबह-सुबह  ११  बजे  कौन  आ धमका..!! कौन  है ?"

लोकजाल-" संसदताई, मैं  लोकजाल..!!"

संसदताई-" कौन ?" 

लोकजाल-" लो..क..जा..ल..अ..!!"

संसदताई- (चिढ़ते हुए)" क्या है? तुम्हें  और  कोई  काम  नहीं  है क्या ? मेरे   पुराने   ठोकसभा  घर  से  तुझे  सहीसलामत  निकाला  तो  अब,  यहाँ   रोगसभा  में  भी  आ  धमका ? क्यूँ आया  है  यहाँ ? क्या  है ?"

लोकजाल- "कुछ  नहीं  ताई..!! मुझे  तो  अण्णा ने  भेजा  है..!!"

संसदताई-"अरे...!! फिर  अण्णा?  कौन  अण्णा..कहाँ   के  अण्णा ?"

लोकजाल-" संसदताई,  वह  अण्णा,  अण्णा   हजारेवाले  अण्णा..!!"

संसदताई- " अरे..!! कायका  हजारे, कहाँ  का  ह..जा..रे..!!  सौ - दो सौ  लोगों  को  इकट्ठा  करने  से, कोई   हजारे  बन  जाता  है क्या ?"

लोकजाल-"ताई, आप  अण्णा  को  कम  आंक  रही  है, क़रीब एक  लाख़  लोगों  ने, उनके  साथ  जेल  जाने  के  लिए  अपने नाम  दर्ज  करवाये  हैं..!!" 

संसदताई-" बस..!! सिर्फ  एक  लाख़ ? मैनें  तो  सोचा  था  ८० करोड़  लोग  नाम  दर्ज  करवायेंगे..!! सा..ले, भिख़ारी कहाँ के..!! लगता है, सभी  लोगों  को, अब  जेलख़ाने  की  रोटीयां  पसंद  आने  लगी  है..!! खैर,  ये  बता, मेरे  रोगसभा  के  यह  दूसरे  घर  पर  अभी  तुं  क्यों  आया है ? अब क्या  काम  है ?"

लोकजाल-"संसदताई, आपके  घरवाले  सभी  दल  के  सांसदो ने, झूठमूठ  का  हंगामा  मचा  कर,  मुझे  ख़ाली  हाथ  वापस  लौटा दिया  है..!! आप  उनको   बराबर  डाँटिएगा..!!"

संसदताई-" क्यों  भाई..!! मैं  उन्हें  क्यों  डाँटूं ?  मैं,  क्या  तेरी, नानी  लगती  हूँ ? चल, भाग  यहाँ  से  साले..!! मेरी  इंदिराताई  के   पोते   राहुल  को  तुमने, विरोधीयों  के  साथ  मिल  कर, खून  के  आंसु  रूलाया  है  और  अब  तुम  ये  चाहते  हो  की,  मैं तुम्हारी  मदद  करूँ, भाग  यहाँ  से..!!"

लोकजाल- " ताई,  मैंने  कुछ  नहीं  किया..!!"

संसदताई-" अबे  साले  अब  भोला  बनता  है ? (रोती सूरत बनाकर) मेरी   इंदिराताई   के   नन्हे-मुन्ने  मासूम   पोते  ने,  ज़िंदगी  में  पहली  बार..पहली  बार, सांसदो  से,  तेरे    लिए..सा..ले..तेरे  लिए , बंधारणीय   दरज्जा   माँगा  था,  सब ने  मिल  कर  उस दरज्जे  की  माँग  को  दरवाज़ा  दिखा  दिया? अब  उसकी   इंदिराताई   नहीं   है, इसीलिए  सब   मेरी   इंदिराताई  के  भोले  बेटे  को   ऐसे  सता  रहे  हो  ना ?"

लोकजाल-" हैं..ई..ई..!! ये  क्या  कह  रही  हैं  संसदताई..!!"

संसदताई-" क्यों ? लग  गई  ना  पिछवाड़े  मिर्ची ? याद रखना  हमारे  बेचारे  मासूम  पोते  का  कहा  अगर  किसी ने  भी,  न  माना  तो, मैं   बारबार-लगातार, तुझे  और  तेरे  अण्णा-फण्णा, जो  भी  है..!! सब  को  ख़ून  के  आसुं  रूलाती  रहूँगी..!! सालों...कमीनों, तुम  सब  इसी  बर्ताव  के  लायक  हो..!! नालायक, चल  अब  फूट  ले यहाँ  से..!!"

(" धड़ा..म..अ.अ.अ..!!" दरवाज़ा बंद ?)

लोकजाल-" औ...फौ..औ..औ..!! संसदताई  तो  हम पर ही बिगड़  गई..!! इस  बात  को  क्या  संसदताई  और  हमारे  सारे  प्रातःस्मरणीय,  कर्तव्यनिष्ठ  माननीय (?) सांसदो  की  ओर से हमें, नये  साल  की   मूल्यवान  सौगात  समझे  क्या ? और... नये  साल  के,  इस  मूल्यवान  फ्लॉप  उपहार  का, अब  हम  सब क्या  करेंगे?"

=====

दोस्तों, "अब हम सब क्या करेंगे?" इस सवाल का आपके पास कोई जवाब है ? है  तो   फिर  बताईए..ना..आ..प्ली..ई..ई.. झ!!

आधुनिक बोध- नये साल पर मिलनेवाला हर उपहार काम का हो ये ज़रूरी नहीं है, ख़ास कर के हमने जिन पर अनहद भरोंसा  किया  हो?


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ३०-११-२०११.   

14.10.11

तौल मोल के बोल



वाणी की अनूठी महिमा है .यह साली जीभ भी कैसे कैसे रंग दिखा जाती है .बिना हड्डी के लपलपाती 
रहती है .वाणी के कारण मुर्ख और बुद्धिमान शब्द बने हैं .थोड़ी सी भी चूक एक बड़े हादसे में तब्दील हो
जाती है.वाणी आशिको के लिए वरदान भी है और व्यापारी के लाभ का कारण भी.नेता लोग जो घाघ होते
हैं वो तो बहुत कंजूसी से वाणी उपयोग करते हैं मगर चुनाव के समय वाणी का खुलकर उपयोग करते हैं .
वाणी जब भले आदमी के मुखारविंद से निकलती है तो जनमानस पर छाप छोड़ जाती है लेकिन जब अंह
और गर्व से चूर आदमी के मुंह से निकलती है तो जन जन की हथेली की छाप चेहरे पर छोड़ जाती है .

वाणी के प्रभाव से कुछ दिनों पहले बाबा फँस गए थे .योग से तंदुरुस्ती का विज्ञापन बढ़िया चल निकला
 तो भोले भक्तो को मखनिया वाणी से प्रभावित कर ऊँची कुर्सी पर लोटने के सपने देखने लगे मगर वाणी
कब फिसली कि बेचारे घर के रहे न घाट के .

वाणी जब निस्वार्थ भाव से निकलती है तब अमृत बन जाती है .एक दादाजी बुढापे में भी ऐसा बोले कि 
शक्तिशाली अजगर भी विकल्प हीन हो दंडवत हो गया था .यह अजगर भी दौ मुंह वाला था ,दोनों मुंह से 
एक साथ दोनों बातें बोलता था .कभी हाँ कभी ना के कारण अजगर कुमार मखनिया बेबी बन गया था .

वाणी के प्रभाव से अफसर भी अछूते नहीं हैं ,अपने अधीनस्थ से गुपचुप में ऐसी वाणी बुलवाई कि चक्की 
पीसने लगे, हवा का रुख राजा की और है मगर वो इसे कब मानने वाले ,पिल पड़े राजा पर और लगे अंट
संट बकने .नतीजा तो फिर वैसा ही आना था और आया भी .

बुड्ढ़े दादाजी के बोल पर पुरे देशवासियों को थिरकता देख छोटे दादाजी में भी हवा भर गयी .वो बोले -
बड़े दादा तो कुछ साल से वाणी उपयोग कर रहे हैं और सुपर हिट हो गए हैं जबकि मैं तो कई दशकों से 
वाणी विलास करता आया हूँ ,राम को रिझाता आया हूँ ,बाल वाणी विलास से निरमा की सफेदी ले चुके 
हैं मगर बात अभी तक बनी नहीं सो हठ करके बैठ गए कि मुझे एक मौका दे मैं फिर से वाणी के तेज 
से महल जीतना चाहता हूँ .जो बात बड़े दादा आगे करने वाले हैं वो मैं घोड़े पर बैठकर अभी कहना चाहता 
हूँ .सबने डांटा,डपटा मगर वो नहीं माने .आखिर हारकर पितामह से बात मनवा गए और वाणी से चेतना
जगाने लगे

वाणी तो सच्चे संतो के मुंह से सुनी जाती है और ऐसी वाणी दिल तथा दिमाग को खुराक भी देती है .माया
वाले बाबा भी जै रामजी की बोल के कथा के अमृत में बबलू की कहानी कह डालते हैं .अब बेचारा बबलू
क्या जबाब दे ? कभी कभी ही तो बबलू बोलता है और बोलते ही टांग खिचाई हो जाती है .मगर बबलू की
बात बबलू के कबीले-कुनबे के लोग सर माथे पर रख लेते हैं आखिर मदारियों को पेट जो भरना है

बड़े दादाजी की अंगुली पकड़ कर एक नौसिखिया तलवार की धार पर वैतरणी पार कर गया .जब वैतरणी
पार हो गयी और दादा ने अंगुली छोड़ी तो साहबजादे ने झोश में आकर अंगुली माँ के माथे की और ताक
 दी.कुछ नासमझ बन्दों को नागवार गुजरा और साहबजादे को प्रेक्टिकल सीख दे डाली ,साहबजादे ने
फरमाया- मैं दादा के साथ रह चूका हूँ तुमने उनकी बात मानी और मशाल जला दी ,अब मेने अकेले में
 वाणी विलास किया तो मशाल से मेरी मूंछ जला दी .ऐसा करना नाइंसाफी है कि नहीं .

इन्हें कौन समझाए सा'ब कि माँ कि गाली कौन खुद्दार बच्चा सहन कर लेगा .मगर हम तो इस वाणी
 विलास में ना पड़ेंगे क्योंकि कबीर ने कहा था -

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय
ओरन कुं शीतल करे आपहुं शीतल होय              

12.10.11

आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ !!


आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ !!

एक गली में टंगे बड़े से बोर्ड पर विज्ञापन छपा था -"आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ "हमने पुरे मनोयोग से उस 
विज्ञापन को पढ़ा .हमारी तो बांछे खिल गयी हुजुर .बड़ी बड़ी डिग्रियों के पीछे भागते भागते बाल ही सफेद 
हो गए थे हमारे .आज भी यदि इस गली से नहीं गुजरे होते तो शायद पढ़ते पढ़ते बुड्ढे हो जाते सा'ब मगर 
किस्मत के धनी थे हम भी जो अनायास ही इस बोर्ड को पढ़ बैठे और सच कहूँ तो मुझे अपना भविष्य भी 
सुनहरा नजर आया .हम आनन फानन में बोर्ड पर लिखे पते पर पहुँच गए थे .काफी भीड़ थी बाहर .लोग 
पंक्ति में खड़े खड़े धक्का मुक्की कर रहे थे .उम्र का कोई प्रतिबन्ध नहीं होने के कारण जवान ,अधेड़ ,बुड्ढे 
सभी अटे  हुए थे .हम भी पंक्ति में खड़े हो गए थे तभी हमारे आगे खड़े ताऊ ने पूछा -तुमने फार्म ले लिया ?
हमने नहीं में सिर हिलाया तो वो बोले -कोई बात नहीं मेरे पास दौ फार्म है पुरे १००/-में ख़रीदा है यदि तुझे 
चाहिए तो एक का सौ देकर मेरे से ले सकते हो या फिर पंक्ति छोड़कर पहले फार्म लो .मेने मेरे पीछे देखा 
पंक्ति काफी लम्बी हो गयी थी .मेने पचास का सौ देकर ताऊ से फार्म लेना मुनासिब समझा .अब फार्म 
भरना था .फार्म में शिक्षा का कोष्ठक नदारद था .कुछ विशेष योग्यताओ पर निशान लगाना था -क्या 
आप मक्कार हैं ? अपने खास दोस्त को कितनी बार धोखा दिया ? हर बात की शरुआत झूठ से करते हो?
चोरी करते पकडे गए या नहीं ,झूठ बोलते समय हकलाते हो या नहीं, किसी का बताया काम पूरा कर देते 
हो या गोल घुमा देते हो ,चेहरे के भाव और मन के भाव एक ही होते या अलग -अलग .फार्म पढ़ कर तो 
हमारा भेजा ही खराब हो गया था सा'ब.जैसे तैसे हमने अपना फार्म भरा .हमारे आगे खड़ा ताऊ फार्म पर 
लिखे उत्तर को पढ़ कर मुस्करा रहा था तो हमारे पीछे खड़ी यौवना वंग्य से बोली -डफर !
 हम सकपका गए थे शायद हमने फार्म गलत भर दिया था .काफी देर बाद हमारा नंबर आया .हमें एक 
कमरे में बुलाया गया .टेबल के एक तरफ एक बुड्ढा था उसने हाथ से कुर्सी पर बैठने का इशारा किया 
और हमारे फार्म को एकाग्रता से पढने लगा और फिर मुंह बिचका कर बोला -तुम नेता नहीं बन सकते ?
मेने पूछा -क्यों ? वो बोले -तेरे में एक भी गुण नहीं है नेता बनने के .तुमने अभी तक मक्कारी नहीं की ,
झूठ नहीं बोला ,धोखा नहीं दिया ,चोरी करते पकडे गये, झूठ बोलते हकला गये ,हर किसी का काम किया .
मगर ये सब तो अच्छे गुण हैं .........
वो मेरी बात काट कर बोले -तुझे उपदेशक बनना है या नेता ?
हम बोले -जी, हम नेता बनने आये थे .
वो बोले -देखो ,वैसे तो तुम नेता बनने के काबिल नहीं हो मगर तीन महीने का कोर्स पूरा करके तुम नेता
 बन सकते हो .तुम्हे एक प्रश्न पत्र दिया जाएगा.जिसके जबाब लिखे रहेंगे तुम्हे उसके अनुसार आचरण 
करना है .हमने उनके हाथ से प्रश्न पत्र ले लिया और तीन महीने बाद फिर आने का वादा कर दिया .
प्रश्न पत्र के उत्तर कुछ इस प्रकार थे  
१.मक्कार बनो 
२.खुदगर्ज रहो 
३.चापलूसी करो 
४.झूठ को सच की तरह बोलो 
५.सब्ज बाग़ दिखाओ 
६.आग में घी डालते रहो 
७.समस्या को आगे -पीछे सरकाओ 
८.आगे वाले को पीछे धकेलो 
९.ऊपर वाले की टांग खेचो ,नीचे गिराओ 
१०.झगडा कराओ और पन्च बनो 
११.बगुला भगत बनो 
१२.चेहरा साफ ,मन काला रखो 
१३.गुस्सा पीओं ,गेंढा बनो 
१४.काम निकालो ,चलते बनो 
१५.चूहे खाओ ,हज भी जाओ         

  उत्तर पढ़ कर लगा हम जैसे क्या नेता बनेगें .हम जैसे थे वैसे ही रह गए .

28.9.11

तू भी चोर में भी चोर ,जाने भी दो यारो !!

तू भी चोर में भी चोर ,जाने भी दो यारो !!

दौ पडोसी चोर आपस में भीड़ पड़े .बात भी कोई खास नहीं थी ,बस पहले चोर ने दुसरे चोर को सरे आम बीच  
बाजार में चोर कह दिया था .वैसे चोर को चोर कहना मेरे लिहाज से बुरा है क्योंकि हमारी संस्कृति में अंधे
 को अँधा कहने पर अंधे को ठेस ना पहुंचे इसलिए हम सूरदास कह देते हैं ,लंगड़े  को लंगडा कहना कोई
बढ़िया बात नहीं है .हम चोर को चोर नहीं कह कर कोई अच्छा शब्द प्रयोग कर सकते हैं .वैसे भी कोई गुनाह
 करते पकड़ा ना जाए तब तक उसे संवेधानिक रूप से चोर या गुनाहगार नहीं कह सकते हैं और तो और
किसी चोर का सहयोगी चोर यदि पकड़ा भी गया तो आप पकडे गए को चोर कहने का दुसाहस कर
सकते हैं परन्तु जो अभी तक नहीं पकड़ा गया उसे भी चोर कह देना जायज हो सकता है क्या ?

इसी बात को लेकर दोनों चोर भिड पड़े थे.पहले ने कहा टेलीफोन का तार मेने नहीं चुराया था वह तो मेरे 
कबीले का बाजीगर था ,लेकिन तुमने मुझ पर आरोप लगा कर ठीक नहीं किया ,मैं आम जनता के 
सामने जाऊँगा और सच बताऊँगा. मेने जो पूरा टेलीफोन चुराया था उस योजना में तुम भी मेरे साथ थे .
मेने उस टेलीफोन का ढांचा कबाड़ी को बेचा और तुमने अन्दर के उपकरण .

दोनों को जोर जोर से आक्षेप लगाते देख काफी भीड़ जमा हो गयी थी .दोनों चोर अपना -अपना पक्ष रख 
रही थी भीड़ में से नहीं पकडे गए शातिर न्याय करने बैठ गये.बड़ी उलझन थी सा'ब! क्योंकि शातिर महोदय
 को किसी एक को सही ठहराना था .एक को सही और दुसरे चोर को चोर कह देने से एक बार तो बात बन
जाती मगर दुसरे चोर से पंगा लेना पड़  जाता .बहुत माथापच्ची के बाद हल निकाला गया .

वे बोले ,आप दोनों का दोष मुझे दिखाई नहीं देता है .आप अपने काम का ठीक से निर्वाह नहीं कर सके 
इसलिए लड़ पड़े हो .भविष्य में काम इतनी सफाई से करो की माल भी झपट लो और पकडे भी मत जाओ .
खेर ...अभी तुम लोगो के लिए यही फैसला है की तुम भी चोर और ये भी चोर इसलिए एक दुसरे को
अस्थिर मत करो ,जाने भी दो यारो ,बात आई गयी कर दो .

दोनों चोरो को यह फैसला भा गया और गिला शिकवा भूल कर गले मिल गये .भीड़ में से कुछ उनकी
एकता पर नारे लगाने लगे कुछ अपना अपना करम पीट कर बिखर गये. कबीले की शांति और सौहार्द के
लिए -जाने भी दो यारो !!