फूलो की खुशबू को चुराया नही जाता
पर लोग चुराने की कोशिश करते है।
सूरज की रोशनी को छुपाया नही जाता
पर छुपाने की कोशिश कर लेते है।
दोस्ती में दूरी माने नहीं रखती है
पर लोग कान भर कर दूरी बढ़ा देते है।
कान के कच्चे दोस्ती को भुला देता है।
मांगी जिसने चांदनी उसे चांदनी मिली
रोशनी मांगने वाले को रोशनी मिली
मैं भगवान से दोस्ती मांगी
मुझे आप जैसे पक्के कान दोस्त मिले।
अजीत
27.2.08
दोस्ती में दूरी माने नहीं रखती....
Posted by
Ajit Kumar Mishra
1 comments
20.2.08
साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
((Guru, BHADAS par post karne ke liye ek kavita bhej raha hoon.
kripaya ise publish karne ka kasht karen.... Pankaj))
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((पंकज भाई, भड़ास पर लोग अपनी अपनी पोस्ट खुद पब्लिश करते हैं। यहां वो वाली व्यवस्था नहीं है कि संपादक जी देखेंग, जाचेंगे फिर छापेंगे। अगर आप भड़ास के मेंबर हैं तो आप सीधे पोस्ट लिखें और उसी क्षण पब्लिश कर दें। आपके अनुरोध पर आप द्वारा प्रेषित कविता नीचे डाल रहा हूं, आगे से आप खुद सीधे पोस्ट करें तो हम सबको अच्छा लगेगा। भड़ास का मेंबर बनने के लिए उपर बाईं ओर जो लिखा है भेज रहा हूं नेह निमंत्रण, उस पर क्लिक करें। फिर अपनी जीमेल आईडी व पासवर्ड फीड करें, बस हो गए भड़ासी...यशवंत))
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साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
ये कायकू कैता है मेरे कू बोलने का नइ
अपुन नइ बोलेंगा तो और कोन बोलगा मेरे वास्ते
तू इदरीच आके मेरे कू जास्ती बोलने से रोकता है भिडु
कि ये साला भाई लोग खल्लास करेगा जरूर मेरे को किसी दिन
ये साले भंडुवे ठुल्ले रोज आकर वसूलते हैं अपना हिस्सा
और फिर भी दांत दिखाके कैसा एहसान दिखाता है नेता के माफिक
भाई तो कभी भी आ जाता है हफ्ता वसूलने पूरे लश्कर के साथ
अपुन कैसा चूतिया के माफिक खाली देखता रह जाता है खोली के माफिक
ये भड़ुंवागिरी तो भिडु मरवाने से बुरा है अपुन जानता है
मगर सेठ लोग जो साला मार-मार के लोगों को माल बनाता है
और यहां कमाठीपुरा में अपुन लोगों पर धौंस दिखाता है
कभी पोलिस का तो कभी नोटों के बंडल का ताबड़तोड़
ये जो पेज थ्री पार्टियों में डीलिंग करते हैं बड़े-बड़े धंधों का
हार्लिक्सी नस्ल की लौंडियों को पेश करके रोशनी के भीतर के अंधरे में
सेठ लोग ये साला बड़ी-बड़ी फैक्ट्री चलाता, पैसा बनाता और इज्जतदार हो जाता है
भंडुवागिरी करके वह साला समाज और सरकार दोनों का बाप बन जाता है
अब तो हमारा यह सरकारी और सामाजिक बाप
कमाठीपुरा को उजाड़ने का ले आया है आर्डर
चलाएगा बुलडोजर और साफ करके खेत बना डालेगा हमारी खोली को
जहां बननेवाले बड़े-बड़े मॉल में आएंगी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में
बड़े-बड़े सेठों के घर में सप्लाई की जानेवाली हाई क्लास की सोशलाइटें
हमारा काम ताबड़तोड़ करेंगे सेठ लोग बिल्कुल पेशेवर की माफिक
दस पेटी, बीस पेटी माल इधर से उधर होगा मिनटों में
अपुन गटर के कीड़े की माफिक कुलबुलाते हुए जीने के लिए भी
गिड़गिड़ाता रह जाएगा और आक्खा मुंबई से बुहारकर फेंक दिया जाएगा
हमारा कौन-सा देश है भिडु
साला तुम भी नहीं बोलता कुछ
वह देश ढूंढकर ला दे मेरे कू सारे जहां से अच्छा गाता है
बच्चा लोग म्यूनिस्पेलिटी के स्कूल में
अपुन को न कोई जीते जी जीने देता न मरने पर श्मशान में जगह देता
जिंदगी भर साला हरामी, आवारा सुन-सुनकर लात खाते हुए जीना....
मैं पूछता हूं सेठों, भाई लोगों से और दांत निकाले नेता लोगों से
कहां है मेरा देश, कौन है मेरे जीने के अधिकारों का पहरूआ?
बोलता कोई नहीं, साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
--पंकज पराशर
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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