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7.4.11

हजारे के सुझाव उचित, लेकिन स्वयं लोकपाल बिल बनाने की मांग असंवैधानिक!

हजारे के सुझाव उचित, लेकिन स्वयं लोकपाल बिल बनाने की मांग असंवैधानिक!

यह सही है कि लोकपाल बिल में सुधार के लिये जो भी सुझाव दिये गये हैं, उन्हें मानने के लिये केन्द्र सरकार पर दबाव डालना जरूरी है और इसके लिये सरकार को मजबूर करना चाहिये, न कि इस बात के लिये कि लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने के लिये सरकार अकेली सक्षम नहीं है और अकेले सरकार द्वारा बिल का ड्राफ्ट बनाना अलोकतान्त्रिक एवं निरंकुशता है|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

इस बात में कोई शक नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जानी चाहिये और समाजसेवी अन्ना हजारे एवं उनके साथियों की ओर से लोकपाल बिल की कमियों के बारे में कही गयी बातें पूरी तरह से न्यायोचित भी हैं| जिनका हर भारतवासी को समर्थन करना चाहिये| इसके उपरान्त भी यह बात किसी भी दृष्टि से संवैधानिक या न्यायोचित नहीं है कि-

‘‘सरकार अकेले लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करती है तो यह लोकशाही नहीं है और यह निरंकुशता है|’’

ऐसा कहकर तो हजारे एवं उनके साथी सरकार की सम्प्रभु शक्ति को ही चुनौती दे रहे हैं| हम सभी जानते हैं कि भारत में लोकशाही है और संसद लोकशाही का सर्वोच्च मन्दिर है| इस मन्दिर में जिन्हें भेजा जाता है, वे देश की सम्पूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं| निर्वाचित सांसदों द्वारा ही संवैधानिक तरीके से सरकार चुनी जाती है| ऐसे में सरकार के निर्णय को ‘‘निरंकुश’’ या ‘‘अलोकतान्त्रिक’’ कहना असंवैधानिक है और संविधान से परे जाकर हजारे एवं उनके साथियों से पूछकर लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने के लिये भारत की सरकार को मजबूर करना भारतीय लोकतन्त्र को नष्ट करने के समान है|

यदि संसद में चुने जाने वाले लोग भ्रष्ट हैं तो इसमें संसद या संविधान का दोष कहॉं है, यह तो हमारा दोष है| हम ही ऐसे लोगों को चुनकर भेजते हैं| या अधिक से अधिक निर्वाचन प्रणाली में दोष हो सकता है| लोकपाल बिल के बहाने लोकतन्त्र एवं संसद को चुनौती देना और गॉंधीवाद का सहारा लेना-नाटकीयता के सिवा कुछ भी नहीं है| यह संविधान का ज्ञान नहीं रखने वाले देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं के साथ खुला खिलवाड़ है| यह उन लोगों को सड़कों पर उतरने के लिये मजबूर करना है, जो नहीं जानते कि उनसे क्या करवाया जा रहा है| यह देश की संवैधानिक व्यवस्था को खुली चुनौती है! यदि सरकार इस प्रकार की प्रवृत्तियों के समक्ष झुक गयी तो आगे चलकर किसी भी बिल को सरकार द्वारा संसद से पारित नहीं करवाया जा सकेगा|

यह सही है कि लोकपाल बिल में सुधार के लिये जो भी सुझाव दिये गये हैं, उन्हें मानने के लिये केन्द्र सरकार पर दबाव डालना जरूरी है और इसके लिये सरकार को मजबूर करना चाहिये, न कि इस बात के लिये कि लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने के लिये सरकार अकेली सक्षम नहीं है और अकेले सरकार द्वारा बिल का ड्राफ्ट बनाना अलोकतान्त्रिक एवं निरंकुशता है|

परोक्ष रूप से यह मांग भी की जा रही है कि लोकपाल बिल बनाने में अन्ना हजारे और विदेशों द्वारा सम्मानित लोगों की हिस्सेदारी/भागीदारी होनी चाहिये| आखिर क्यों हो इनकी भागीदारी? हमें अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर विश्‍वास क्यों नहीं है| यदि विश्‍वास नहीं है तो हमने उन्हें चुना ही क्यों? हजारे की यह जिद उचित नहीं कही जा सकती| संविधान से परे जाकर किसी को भी ऐसा हक नहीं है कि वह सरकार के निर्णय को लोकशाही के विरुद्ध सिद्ध करने का प्रयास करने का दुस्साहस करे और देश केलोकतान्त्रिक माहौल को खराब करे|

यदि सरकार एक बार ऐसे लोगों के आगे झुक गयी तो सरकार को हर कदम पर झुकना होगा| कल को कोई दूसरा अन्ना हजारे जन्तर-मन्तर पर जाकर अनशन करने बैठ जायेगा और कहेगा कि-
इस देश का धर्म हिन्दु धर्म होना चाहिये|

कोई दूसरा कहेगा कि इस देश से मुसलमानों को बाहर निकालना चाहिये|

कोई स्त्री स्वतन्त्रता का विरोधी मनुवादी कहेगा कि महिला आरक्षण बिल को वापस लिया जावे और इस देश में स्त्रियों को केवल चूल्हा चौका ही करना चाहिये|

इसी प्रकार से समानता का तार्किक विश्‍लेषण करने वाला कोई अन्य यह मांग करेगा कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों का आरक्षण समाप्त कर दिया जाना चाहिये|

ऐसी सैकड़ों प्रकार की मांग उठाई जा सकती हैं|

जिस प्रकार से रूबिया अपहरण मामले में सरकार ने आतंकियों का छोड़कर गलती की थी, जो लगातार आतंकियों द्वारा दौहराई जाती रही है, उसी प्रकार से यदि हजारे की मांग को मानकर सरकार संसद की सर्वोच्चता की चुनौती के आगे झुक गयी तो हमेशा-हमेशा को संसद की सर्वोच्चता समाप्त हो जायेगी|

सरकार को लोकपाल बिल में वे सभी बातें शामिल करनी चाहिये जो हजारे एवं अन्य लोगों की ओर से प्रस्तुत की जा रही हैं| इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, क्योंकि इस देश की व्यवस्था में अन्दर तक घुस चुके भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो लोकपाल को स्वतन्त्र एवं ताकतवर बनाया जाना सम-सामयिक जरूरत है| लेकिन इस प्रकार की मांग ठीक नहीं है कि निर्वाचित प्रतिनिधि कानून बनाने से पूर्व समाज के उन लोगों से पूछें, जिन्हें समाज ने कभी नहीं चुना| यह संविधान और लोकतन्त्र का खुला अपमान है|

8.8.08

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते

दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते। यह जान कर मुझ जैसे संविधान पर आस्था रखने वाले लोगों को धक्का लगा होगा क्योंकि लाखों वीरों की शहादतों के बाद अगर हमें आजाद देश में कुछ हासिल हुआ है तो वह है हमारा अपना निजी संविधान जिसको आधार बना कर देश को लोकतांत्रिक तरीके से चला कर सभी के अधिकारों की रक्षा करी जा सकती है। जो लोग कहते हैं कि कानून में खामियां है सत्यतः वे कानून को समझते ही नहीं और बस बकवास कर देते हैं ऐसे लोगों ने कभी संविधान को समझने की चेष्टा ही नहीं करी होती क्योंकि संविधान बनाने वाले लोग मूर्ख नहीं बल्कि देश की आत्मा और उसके घटकों जैसे सभ्यता,धर्म,नैतिकता,भाषा व क्षेत्र की विविधताएं आदि के गहरे जानकार थे लेकिन आज जो स्वरूप अमें दिखाई दे रहा है वह संविधान का सही चेहरा नहीं बल्कि उस पर कब्जा जमा चुके जुडीशियल माफ़िया का है जिसके कारण हमें और हमारे जैसे लोगों को कानून की बात से ही खीझ होने लगती है। अबकी बार यह बयान सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया है नेताओं द्वारा सरकारी आवासों पर किये गए गैरकानूनी कब्जे को लेकर करी जाने वाली कार्यवाही मे सुधार लाकर कठोरता लाने के विषय में है। कार्यपालिका और विधायिका ने मिल कर एक बार फिर माफ़िया का रूप धर लिया है और न्यायपालिका ऐसे लाचार और पंगु सा होकर यह बयानबाजी कर रही है। कुल मिला कर बात यह है कि कानून की बंदिशें सिर्फ़ कमजोर और गरीब लोगों के लिये हैं जो ताकतवर हैं उन्हें कुछ भी अपराध करने पर दोष नहीं लगता। जिन्हें रामचरितमानस की जानकारी है तो वे जानते हैं कि ये सत्य तो गोस्वामी तुलसीदास जी तभी कह गये थे .. समरथ को नहिं दोस गोसाईं....। अब राज ठाकरे हो या सिमी जैसे संगठन ये सब रामचरितमानस के इस सत्य को समझ गये हैं तभी तो पेले पड़े हैं।

2.8.08

लोकतंत्र गया तेल लेने........

कल दोपहर को जब मुंबई के सबसे ज्यादा जगमगाते क्षेत्र जुनैद नगर, अंधेरी(पश्चिम) में अपने किसी काम से गया तो नजारा देखा कि युवकों की एक टोली दुकानो में जा-जाकर कुछ पर्चे दे रहे हैं और कुछ ऊंची से आवाज में दुकानदारों को हिदायत(धमकीनुमा) दे रहे हैं। इतना देख कर तो मेरे जैसे प्राणी को कौतूहल स्वाभाविक है कि जान तो लें कि भइए चल क्या रहा है......? दुकानदारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पर्चे हुक्म हैं इस बात का कि यदि मुंबई महानगरपालिका के आदेशानुसार दुकानों के नामों मे बोर्ड एक माह के अंदर मराठी में नहीं करे तो अवधि समाप्त होने के बाद दुकानो को तोड़ दिया जाएगा, आग लगा दी जाएगी; ये "राजा साहब" का आदेश है......। अरे स्स्साला... हमारे तो दिमाग में भोलेनाथ तांडव करने लगे कि जल्दी से पता करो कि देश आजाद हुए इतने साल बाद कहीं फिर से लोकतंत्र समाप्त तो नहींथो गया रातोंरात और राजा-महाराजा अस्तित्त्व में आ गए हों। जब मैंने लपक कर उन युवकों को जादू की झप्पी दी और पूछा कि भाई लोग आप क्या मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी हो या राजा साहब के सिपाही तो उन्होंने हिकारत भरी नजरों से मेरी तरफ़ देख कर बताया कि हम लोग राजा साहब के सैनिक हैं इसपर हमने जान की खैर मांगते अगला सवाल पूंछ लिया कि सेनापति जी ये तो बता दीजिये कि अब हम किस राजा साहब की प्रजा हैं। पता चला कि जब बाळ ठाकरे बालासाहब ठाकरे हो सकता है तो राज ठाकरे राजा साहब ठाकरे क्यों नहीं......? मुंबईवासियों को ये भी नहीं पता कि मुंबई में लोकतंत्र तेल लेने जा चुका है अब वहां राजा-महाराजा राज्य करते हैं। अगर आजादी के बाद हमारे वीरों ने शहादतें देकर कुछ सर्वाधिक मूल्यवान कुछ पाया था तो वह था इस देश में अपना कानून,एक लिखित संविधान जिसे बनाने वाले हर धर्म, जाति,रवायतों और भाषा के साथ-साथ क्षेत्र की भी विशेषताओं को समझते हुए उनका सम्मान करते थे लेकिन ऐसे राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिये उस संविधान को ऐसा बना दिया है जो कि सिर्फ़ इनके इशारों पर नाचने वाली रंडी है(विद्वानजन इन कठोर शब्दों के लिये क्षमा करें किन्तु मैं आहत हूं)।

28.1.07

भड़ास निकालने के लिए आपका स्वागत है!!!

...तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा....

न जीने देने के लिए एक लाख बहाने होते हैं, और जीने के लिए कोई मौका नहीं। वो तो आप पर है, कैसे और किस तरह जीने के लिए वक्त चुरा पाते हैं। आज के भागमभाग, हायहाय, बाजीगरी, मोलतोल, गोलमोल....के दौर में कुछ भी साफ, सहज और सुंदर रह पाना कहां मुमकिन है। जो भव्य और सुंदर और सहज दिखाया व बताया जाता है, उसके गहरे पैठो, पता करो तो वो झूठ की नींव पर खड़ा, साजिश की नींव पर तैयार नजर आएगा। ऐसे में हम-आप कहां जाएं, जो बचपन से किताबों और बातों और जीवन में पढ़ते-सुनते-जीते आए हैं- सच्चाई, सहजता, सरलता और प्रकृति प्रदत्त सुंदरता को?

भई, जीना तो है ही, सो भड़ास जो भरी पड़ी है, उसे निकालना भी है। और, इसीलिए है यह ब्लाग भड़ासजब दिल टूट जाए, दिमाग भन्ना जाए, आंखें शून्य में गड़ जाएं, हंसी खो जाए, सब व्यर्थ नज़र आए, दोस्त दगाबाज हो जाएं, बास शैतान समझ आए, शहर अजनबियों का मेला लगे .....तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए।


भड़ास उन आम हिंदी मीडियाकर्मियों की आवाज है जो आनलाइन माध्यम से जुड़े हैं या आफलाइन, मसलन अखबार, टीवी और मैग्जीन आदि से संबद्ध हैं। ये उनकी भी आवाज है जो दिल में एक हिंदी मीडियाकर्मी बनने की हसरत रखे हैं लेकिन उन्हें अभी ठोकरें खानी पड़ रही हैं। ये उनकी भी आवाज है जो हिंदी वाले हैं, दिल वाले हैं लेकिन शहर के खेल-तमाशे में आकर खुद को तनहा पाते हैं। ऐसे सभी लोगों के दिल की धड़कन है भड़ास

आप अगर उपरोक्त किसी श्रेणी में आते हैं तो आप भड़ास से जुड़ सकते हैं, सबसे उपर बनिए भड़ासी: नेह निमंत्रण लिंक को क्लिक करके। इसके बाद आप अपनी ई-मेल आईडी डालें फिर पासवर्ड लिखें, बस हो गए भड़ासी। फिर नई पोस्ट में अपनी बात हिंदी या इंगलिश में टाइप कर भड़ास पर प्रकाशित कर सकते हैं ताकि वो करोड़ों-अरबों हिंदी भाषियों और मीडियाकर्मियों तक पहुंचे।

हम सहज, सरल और बिंदास लोग हैं जो जिंदगी को पूरी गंभीरता के साथ-साथ पूरी सहजता व मस्ती के साथ जीते हैं। हर तरह की वैचारिक, भाषाई व जातीय-धार्मिक भेदभावों को भुलाकर हम सब सिर्फ हिंदीवाले हैं, दिलवाले हैं और हमेशा हिंदी का झंडा ऊंचा करेंगे।

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर या किसी क्षण में भड़ास आपके काम आ जाए, आपका मनोबल बढ़ाए, आपके एहसास को सब तक पहुंचा पाए, यही इसका मकसद है।

और हां, याद रखिए, बहुत मुश्किल होता है भड़ास निकालना, खुलकर बोल देना, सब कुछ कह देना....और जो ऐसा करते हैं, वो दरअसल इस बुरे वक्त में अच्छे होने और अच्छा वक्त आने का भरोसा होते हैं।

तो फिर
बनिए भड़ासी
और कहिए
मेरे साथ
जय भड़ास
यशवंत सिंह
((आप अपनी भड़ास, राय, सवाल या सुझाव मुझे yashwantdelhi@gmail.com पर भेज सकते हैं))