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16.12.08

नंगा नाच मनमोहन सिंह को अच्छा नहीं लगता

केंद्र सरकार सरहदों के पार के पाप को भले ही न मिटा पा रही हो लेकिन बह देश के अन्दर फ़ैल रहे अय्याशी के नंगे नाच को रोकने का पूरा प्रयास कर रही है !!जी हाँ भाइयो हमारी निष्क्रिय केंद्र सरकार ने सक्रिय होते हुए एक कदम उठाया है की बह लिव इन रिलेशनशिप पर अपनी मुहर नहीं लगायेगी मतलब कानूनी मान्यता नहीं देगी !!मतलब भैया सीधा है की जो लोग बिना शादी विवाह के जन्नत के मजे लूट रहे थे और भविष्य के सवरने का सपना देख रहे थे तो उनके लिए हमारा सुझाब है की कपडे पहनो और घर को निकल लो खूब लूटा मजा, खूब देखि जन्नत अब कही ऐसा न हो की न कुछ लुटाने को बचे और ऊपर से शादी की दिक्कत आ जाए सो लिव इन रिलेशनशिप में स्थायी रिश्ते बनाने की कोशिश करो या फिर बाप मताई से कहकर अपने हाँथ पीले करवा लो ॥लाल करवा लो जैसे करवाना है करवा लो..... केंद्र सरकार के चक्कर में न बैठो!क्योंकि केंद्र सरकार ने तो अपनी टाँगे उठा दी है की जो करना है सो आप करो हम कुछ नहीं करेंगे! अब केंद्र सरकार भी क्या करे आतंकवाद तो रुक नहीं रहा है सो यही सब रोक लो !!वैसे मुझे भी समझ नहीं आता की केंद्र सरकार पढ़े लिखों के पीछे ही क्यों पड़ जाती कभी आरक्षण को लेकर तो कभी उनके मजे लूटने का जरिए ही बंद कर देती है अब चलो जो होता है सो अच्छे के लिए होता है चिंता न करो मजा करो !!


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16.6.08

"भारतीय" सुधर गए या गूगल ?


विनीत खरे

मेरी एक पोस्ट "गुगल करें तो टेक्नोलॉजी और करें अश्लीलता" पर ब्लॉगर मित्रों की अलग-अलग राय थी.
ritu said... सिर्फ s ही नहीं और अक्षर भी टाइप करके देखिए...
June 9, 2008 1:06 PM

ab inconvenienti said... वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को! आप गूगल के बारे में इतना सब जानते हैं तोफ़िर यह भी मालूम ही होगा की ऑटोसजेस्ट एक स्वचालित प्रक्रिया है, इसमें प्रदर्शित शब्द हिन्दी में अब तक के सबसे अधिक खोजे गए शब्द हैं........... अब अगर ठरकी हिन्दी वाले यही सब सर्च करते हैं तो बेचारा गूगल क्या करे? गूगल 43 भाषाओं में सर्च की सुविधा देता है, पर वह चूँकि हिंदुस्तान की अति पावन संस्कृति षडयंत्र के तहत विनष्ट करना चाहता है, इसीलिए हिन्दी ऑटो सजेस्ट में ऐ से जेड तक हर अक्षर में अश्लील शब्द जानबूझकर घुसा दिए गए , हम उसका मरते दम तक विरोध करेंगे! (और 'एस' क्या सभी अक्षरों में ऐसे ही शब्द ऑटो सजेस्ट हो रहे हैं, ज़रा ये भी पता लगा लें की हिन्दी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग (और शायद सबसे लोकप्रिय साईट भी) मस्तराम मुसाफिर ब्लॉग पर रोज़ कितने हिट्स/कमेंट्स आते हैं)
June 9, 2008 2:28 PM

संजय बेंगाणी said... इस महान संस्कृति की पैदाइश, हम भारतीय अगर सेक्स को खोजते रहेंगे तो यही दिखेगा न... गूगल इसमें क्या करे? और हम भारतीयों की संस्कृति सेक्स शब्द से ही खत्म हो जाती है, पता नहीं तीस से एक सौ बीस करोड़ कैसे हो गए?
June 9, 2008 6:34 PM

चौराहा said... विनीत बाबू दरअसल इसमें गूगल की कोई ग़लती नहीं है। लोग पहले जिन शब्दों से सर्च करते हैं वो उन सबको स्टोर कर लेता है बाद में नए सर्फर को ऑटो सजेस्ट में वो उन्हीं शब्दों को मुहैया करवाता है। ये दो तरफा मामला है। जैसा इनपुट होगा वैसा ही आउटपुट भी मिलेगा। और हां एक काम कीजिएगा निवेदन है कि अपनी टिप्पणियों से मेरे ब्लॉग चौराहा का जो लिंक इनकन्वीनिएंट महोदय ने आपको दिया है उसे हटाने की कृपा करिएगा। ये कोई अश्लील ब्लॉग नही है। वो मेरा एक लेख है जो हिंदी में अश्लील ब्लॉग्स के ऊपर लिखा गया था। उन्होंने उसे कुछ ग़लत संदर्भ में ही पेश कर दिया है।
June 9, 2008 8:12 PM

akumarjain said... विनीत भाई,अपना भारत तो कृष्ण जी की रासलीला और खजुराहो की शिल्पकला और वात्सायन बाबा की चौसठ कलाओं का देश है, फिर गुगल दादा से क्या होना जाना है??भाई, जब स्कूलों मे यौन शिक्षा की बात हो रही हो तो मेरे ख्याल से आपको भी बिना देर किये अपने पट इन बातों के लिये खोल देने चाहियें।
June 9, 2008 11:02 PM
विनीत खरे said... मित्रो गूगल भारत इतना समझदार है कि "S" लिखते ही वह समझ गया कि user "सेक्स" समबन्धित शब्द ही ढूंढ़ रहा है ....वाह
June 9, 2008 11:44 PM

विनीत खरे said... अगर हम हिन्दी भाषी यही तलाशते है तो google.co.in के इग्लिश वर्ज़न में ऑटो सजेस्ट मैं "S" लिखने पर ऑटो सजेस्ट क्यों नहीं आता है? क्या यह हिन्दी भाषियों को बदनाम करने की शजिश तो नहीं ?
June 10, 2008 5:57 PM

आलोक said... विनीत जी, आपका लेख और उस पर की टिप्पणियाँ पढ़ीं। लंबा जवाब था इसलिए अपने चिट्ठे पर लिखा है। अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा।
June 10, 2008 11:55 PM

akumarjain said... आलोक जी,आपका चिट्ठा छान मारा लेकिन गूगल वाली पोस्ट नही दिखाई दी। अगर आप अपने चिट्ठे के बदले पोस्ट का लिंक दे देते तो जरा सुविधा होती।
June 11, 2008 12:06 AM
आलोक said... आपको हुई असुविधा के लिए क्षमा, यह है लेख की कड़ी - गूगल सुझाव, टेक्नोलॉजी, अश्लीलता, और प्रयोक्ता का अनुभव - सुधारना आपके हाथ में है
June 12, 2008 6:24 PM

akumarjain said... आलोक जी, कडी के लिये धन्यवाद। आपके आलेख पर मैने एक छोटी सी छीटाकशी की है, उसका अवलोकन जरूर करें। मुझे लगता है कि हिंदी ब्लागिंग तथा मीडिया से जुडे बंधुओ को इसके लिये गुगल से विरोध जताना चाहिये। विरोध सामुहिक भी हो सकता है और व्यक्तिगत भी।
June 13, 2008 9:54 AM

29.2.08

मनीषा दीदी का अस्तित्त्व का खौफ़ सता रहा है शीर्षस्थ ब्लागरों को

एक पल के लिए तो अंदर काफ़ी कुछ कौंध गया लेकिन जो हो रहा है वह तो मानव अस्तित्त्व में सभ्यता की शुरूआत के साथ ही शुरू हो गया था तो जब जब कोई सहज सरल सा आदमी सत्य को अपनी अनगढ़ सधुक्कड़ी भाषा में अभिव्यक्त करेगा तो स्वयंभू सभ्यजन उस पर पत्थर फेंकेंगे ही और अब तो ये लोग गनीमत है कि सूली पर नहीं चढ़ा देते । रही बात गालियों कि तो क्या गालियां इनकी विकसित होती सभ्यता के साथ ही नहीं चल रही हैं ? यकीन है कि भाषा का विकास जिस दिन हुआ होगा उस दिन ही सबसे पहली गाली दी गयी होगी । मैंने सोचा था कि यदि कभी ब्लागर मीट हुआ तो मनीषा दीदी को साथ लेकर आउंगा और आप सबसे प्रत्यक्ष ही परिचय करवाउंगा पर अब मैं सोच रहा हूं कि ऐसा सोच कर मैंने कदाचित गलती करी क्योंकि लोग अभी इतने सरल सहज नहीं हुए कि मनीषा दीदी जो कि इनके ही मानसिक षंढत्व को आइना दिखाने जा रही थीं ये लोग उन्हें ब्लागर मीट में ही पेटीकोट उठा कर चढ्ढी उतारने को कहते कि हम लोग तभी मानेंगे जब खुद हाथों से गुप्तांग छूकर देखेंगे या आखों से देखेंगे । लेकिन सच तो ये है कि इन सबको अपने अपने भीतर में एक मनीषा दीदी दिखने लगीं हैं तो ये हरकत इनकी हड़बड़ाहट का परिणाम है । मनीषराज तो औघड़ साधुओं वाली भाषा प्रयोग करते हैं उसमें कुछ बुरा नहीं है बल्कि कथित शीर्षस्थ ब्लागरो का सिंहासन हिलने लगा तो उन्हें इस पर आपत्ति होने लगी । जिसए जितने पत्थर मारने हैं मार ले हम विचार हैं मरते नहीं वरना इन लोगों ने तो कब का हमें समाप्त कर दिया होता लेकिन ये नहीं जानते कि जब तक हम कथित बुरे लोग हैं तभी तक इनके पास खुद को अच्छा कहने का पैमाना है वरना इन्हें कौन अच्छा कहेगा ? एक दूसरे की प्रशंसा ही करते जिंदगी बीतेगी । मनीषा दीदी का अस्तित्त्व अब ब्लाग से निकल कर इन सब में समा गया है अब उन्हें किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है । और एक खुला चैलेंज कि अगर जिसे मनीषा दीदी के अस्तित्त्व पर संदेह है वह मुझसे मिले लेकिन एक शर्त है कि उसे या तो मनीषा दीदी को पत्नी का दर्जा कानूनी तौर पर देना होगा या आजीवन २०,००० हजार रुपए प्रतिमाह देने होंगे या अगर ये मंजूर न हो तो स्वयं को सर्जरी करवा कर उनके जैसा बनवाना होगा इसमें उन्हें कोई कानूनी दिक्कत नहीं आएगी इसकी जिम्मेदारी मेरी है यह आपरेशन मैं वेल्लूर मेडिकल हास्पीटल ,तमिलनाडु से कानूनी तौर पर करवा दूंगा अगर कानूनी दिक्कत आयी तो मैं आजीवन उस व्यक्ति का दास बन कर रहूंगा । इन बातों से कोई ये न सोचे कि मैं यह सब खीझ कर कह रहा हूं बल्कि ये तो मेरा विश्वास है और मेरे कर्म हैं जिन्हें मैंने अपनी गुरूशक्तियों की ताकत व आशीर्वाद से सामाजिक जीवन में जिया है । जिस भी सभ्य व्यक्ति को मनीषा दीदी से मिलना हो वो मुझसे तत्काल सम्पर्क करे लेकिन ध्यान रखिए कि हर बात की कीमत होती है तो आप भी अपने संदेह के निवारण के लिए कीमत चुकाइए मैं तो ताल ठोंक कर खड़ा हूं ;सांच को आंच नहीं दो और दो पांच नहीं । जिसमें साहस हो वो आगे आए दूर खड़ा रह कर आरोप न लगाएं । अश्लीलता या श्लीलता के बीच की सीमारेखा का निर्धारण का ठेका प्रगतिशील लोगों ने ही ले रखा है क्या कि जिसे चाहा सराहा जिसे चाहा तिरस्कार कर दिया ,बस इन सभी आरोप लगाने वालों से एक बार हिम्मत जुटा कर खुद के भीतर झांकने की अपील है..............
जय जय भड़ास