[भड़ास] New comment on लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो....
डॉ.सुभाष भदौरिया. has left a new comment on your post "लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो...":
यशवंत सिंह जी
आपने आदरणीया मनीषाजी से माफी माँगकर बहुत ही नेक काम किया है.रंगेसियारों को वे पहिचानने की नज़र रखती हैं.उनके दोगलेपन को उन्होंने खुद उजागर किया है.
देर अबेर वे हम पापियों को भी पहिचानेंगी.
आमीन.
अन्य आदरणीय मनीषाजी से मैं माफी मांग रहा हूँ कि उनके दिल को ठेस लगी होगी. साथ में डॉ.रूपेशजी से जो एक गंभीर समस्या की ओर इंगित कर रहे हैं.पर उन पर शंका कर पूरे मामले को कहाँ से कहाँ ले जाया गया.
उनके पीछे आड़ लेकर वार करने वाले मठाधीशों कठमुल्लों के फ़तवों की हमें परवाह नहीं है.
आ गये कमज़र्फ कंधा ले के आँसू पोछने.
लाइन लग गई यार ढोंगियों की फाइर काल के नाम पर.
अपनी एक ग़ज़ल के कुछ अशआर अपने तमाम भड़ासी दोस्तों को नज़र कर रहा हूँ.
ग़ज़ल
जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आनबान रखते है.
शब्द भेदी हैं हम को पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.
जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.
वैसे तो हम जमी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखतें हैं.
ग़ालिबो मीर के हैं हम वारिस,
अपने शेरों में जान रखते है.
जय भड़ास.
Posted by डॉ.सुभाष भदौरिया. to भड़ास at 2/3/08 7:15 PM
2.3.08
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं, दुश्मनों का भी मान रखते हैं...डा. सुभाष भदौरिया
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यशवंत सिंह yashwant singh
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लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरों, भड़ासियों, साथियों, मनीषा पांडेय जी के लिए संदेश
और ये रहा ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे का पहला पार्ट
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके चिलांडुओं को लगा था कि वो एक साथ भौंकना शुरू करेंगे और भड़ासी डर कर उनके शरण में आ जाएंगे, त्राहिमाम करते हुए। पर हुआ उल्टा इन कुत्तों को न सिर्फ खदेड़ा गया बल्कि बताया भी गया कि दरअसल तुम लोग जिस हिप्पोक्रेसी के जरिए दुनिया को चूतिया बनाए हो और अपने को प्रगतिशीलता का पितामह साबित कर रहे हो, वो दरअसल विचार व व्यवहार का दोगलापन था, जिसे ढेर सारे दिन तुम ढंकने मे सफल रहे लेकिन भड़ास ने इसे उजागर कर दिया। इसी के चलते बजाय भड़ास का नुकसान होने के, ब्लागिंग के मठाधीश का मोहल्ला ही दरक गया। वहां भगदड़ मची हुई है। वो सदमें में है। हर बार का सफल दांव अब उसी को नष्ठ करने पर तुला हुआ है। उसे अब अपनी शक्ल भी छिपाने में मुश्किल हो रही है।
मठाधीश ने तो पहले तानाशाह की तरह फरमान जारी किया और चिलांडुओं से भी कहा कि वो भी फरमान का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटें...भड़ास बंद करो का। लेकिन जब उनके उखाड़े कुछ नहीं उखड़ा, बल्कि भड़ासियों ने उनकी झांटें नोचना शुरू कर दिया तो मठाधीश ने अपना पुराना कूटनीतिक दांव खेला, बिलो द बेल्ट प्रहार का खेल शुरू किया, जिसे वो हमेशा खेला करता है। पर हम इससे डरे नहीं, झुके नहीं, रोये नहीं, गिड़गिड़ाये नहीं.....इसके जवाब में भड़ास ने मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलने की शुरुवात की है। हमें मरना पसंद है, झुकना व रिरियाना नहीं। इसी क्रम में तमाम विरोधों के बावजूद आज दो मार्च से ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलना शुरू कर रहा हूं।
मैं जानता हूं कि तमाम वरिष्ठ ब्लागरों और भड़ासियों को मेरे द्वारा विवाद को खींचा जाना नागवार गुजरेगा लेकिन उनसे मैं करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूं कि वो बस इस पहले पार्ट को मुझे लिख लेने दें, जिसे अंतिम पार्ट मैं मान लूंगा और मैं अपनी तरफ से इस पूरे चैप्टर को क्लोज कर दूंगा, ये मेरा वादा है। भले ही इसके बाद मठाधीश और चिलांडु शाब्दिक लफ्फाजियों और हिप्पोक्रेसी के जरिए अपनी जीत की दुहाई देते हुए राग दरबारी गाएं और दुनियां को अपनी जीत का जश्न दिखाएं लेकिन वो अपनी आत्मा के आइने में झांकेंगे तो उन्हें सच दिखाई देगा।
सो ये जो पहला पार्ट लिख रहा हूं, उसे अंतिम पार्ट मानते हुए पढ़ें...
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ब्लागिंग का जो मठाधीश है, उसने अपने करियर के ग्रोथ के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा और प्रगतिशीलता का जिस तरह बेहतरीन इस्तेमाल किया है, उसका इस दौर का कोई दूसरा नमूना नहीं हो सकता है। इसके लिए रांची और पटना और दिल्ली के ढेर सारे पत्रकार साथियों, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं और इसके मित्रों से बात की जा सकती है।
मेरे पास जो तथ्य मिले हैं, जो बातें बताईं गई हैं, जो मेल मिले हैं.....उसे मैं यहां जारी कर एक नई बहस को नहीं जन्म देना चाहूंगा लेकिन उसका लब्बोलुवाब यही है कि विचारधारा का अपनी तरक्की व उन्नति के लिए इस्तेमाल देखना हो तो मठाधीश का करयिर देखिए। जिस शख्स ने इसे कभी मदद की हो, इसने उसी की खाट खड़ी की। एक उदाहरण देना चाहूंगा। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी के संरक्षण में इस शख्स ने करियर की उंचाइयां पाईं लेकिन जब एक न्यूज चैनल को ज्वाइन कर लिया तो उसने एक मैग्जीन में लेख लिखकर हरिवंश जी को जाने क्या क्या नहीं कहा। अरे भाई, थोड़ी तो कृतज्ञता होनी चाहिए दिल मे या दिल्ली आकर ऐसे प्रोफेशनल हो गए हो कि सिवाय खुद को, कोई दिखता ही नहीं है। ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे।
इसी तरह प्रगतिशीलत व विचारधारा के नाम पर इसने ब्लागिंग में लोगों का इस्तेमाल किया, दुराव फैलाया और एक-एक कर सारे वरिष्ठ ब्लागरों से पहले दोस्ती की, सीखा और फिर जब काम निकल गया, उनका इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें किनारे लगाकर, ठिकाने लगाकर खुद को बढ़ाता चला गया।
आज मठाधीश को जानने वाले जितने भी ब्लागर हैं, उनमें से किसी एक से बात कीजिए, वो बतायेगा कि मठाधीश किस कदर तानाशाह और अलोकतांत्रिक शख्सीयत है जो विचारधारा को प्रोफेशनली इस्तेमाल कर ब्लागिंग में खुद की शख्सीयत बढ़ाता है। जो पसंद न आए, उसे नष्ट कर दो, उसे अलगाव में डाल दो, उसे अकेले में छोड़ दो, उसके करीब के लोगों को उससे काट दो, उसे कहीं तवज्जो न दो, उसके नामलेवा लोगों को धमका लो.......ये सारी बातें सभी को पता हैं। इन्हें एक-एक उदाहरण के जरिए भी समझाया जा सकता है लेकिन मैं इसे फिर कभी लिखूंगा, अगर जरूरत पड़ी तो।
ब्लागिंग के मठाधीश ने शायद इतिहास से सबक नहीं लिया कि जिसको भी यह गुमान हो गया कि वो ही सर्वोच्च और सबसे ज्यादा ताकतवर है, उसका यह घमंड उन सामान्य लोगों ने तोड़ दिया, जिसे वो अपने मुट्ठी में दबोचने लायक माना करते थे। तो इसी तरह से बिना समझे, बिना विचारे, बिना बहसियाये, बिना समझाए, बिना कहे, बिना विश्वास में लिए...एकाएक भड़ास को बंद करने का नेक विचार, नेक ऐलान ब्लागिंग के मठाधीश सर्वनाश ने चिलांडुओं के साथ किया, उससे उन्हें यह विश्वास था कि उनकी इतनी मजबूत सत्ता, गुट व ताकत के चलते भड़ास वाले भों भों करते हुए रोएंगे व उनके पैर पकड़कर माफी वाफी मांग लेंगे....
लेकिन मैं यह बताना चाहता हूं कि भड़ास ने न तुम सबको नंगा कर दिया है, बल्कि ब्लागिंग व पत्रकारिता जगत में घृणा के लायक बना दिया है, जिसके तुम लोग काबिल हो। और रही बात हम भड़ासियों को तो ये जान लो....
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम बुरे लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम अच्छे हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम चूतिये हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम विद्वान हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम कुंठित लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम मोक्ष पाए हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम अपूर्ण लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम्हीं अंतिम सत्य हैं
हम भदेस, फ्रस्टेट, देसज, असफल लोगों के कंधे
कमजोर भले हों, पर इतने नहीं कि झुक जाएं
उनके सामने जो हर चीज को सही गलत होने के लिए
सार्टिफिकेट देते घूमते फिरते हैं, आईएसआई मार्का
तुम लोग तो सफल होने के लिए ही पैदा हुए थे,
छा जाने के लिए ही इस धरती पर जन्मे थे,
विजय करने के लिए ही राजधानी पहुंचे थे,
इतिहास बनाने के लिए जी रहे हो, कर रहे हो
पर हमने तो हमेशा इतनी बड़ी बड़ी बातों के आगे
खुद को तुच्छ, नीच, मलिन माना और
चुपचाप जीते रहे, नून तेल के लिए मरते रहे
हर शाम पीकर बकते रहे, बड़ बड़ बकते रहे
गाली वाली देकर, कुछ लिखकर, कुछ बोलकर
बताते रहे कि हम लोग, आप एलीट व सभ्य
लोगों के आगे बड़े बुरबक हैं, और प्लीज जीने दें हमें
अपने तरीके से, अपनी गंदगी में लोटते हुए, हंसते हुए, रोते हुए
पर आपको नहीं था यह मंजूर कि आपकी प्रसिद्धि की हवेलियों के आसपास
बसी रहे, बढ़ती रहे कोई मलिन बस्ती जहां असभ्य लोग
खाते हगते मूतते हंसते रोते जीते सोते एक ही कमरे में गुजार लेते हों जिंदगी
आपको तो चाहिए हर रोज उनसे जीने का करारनामा
जिसमें लिखा हो कि हम नीच लोग, सताए लोग
आप महान वैचारिक सभ्य लोगों को वचन देते हैं कि
हम हर रोज उठते हुए आपको नमन करेंगे, यहां जीने देने के लिए
और जब भी दिखेंगे आप, या आपकी तरफ से आएगी कोई हवा
हम सम्मान में उठ खड़े होंगे और सिर झुकाकर कहेंगे हुजूर हुजूर हुजूर
पर माफ करना मठाधीश, तु्म्हारे चिलांडुओं....
तुम ये भूल गए कि कई लोग डर डर के जीने से बेहतर
एक रोज मरना समझते हैं
और जो मर मर के जीने से इनकार कर दे तो वो
तुम्हारी अट्टालिकाओं में घुसकर अपने सिर से दीवारों को फोड़ सकता है
और तुम्हारे फौज फाटे बस यूं ही हल्ला करते हुए
दाएं बाएं कुछ सक्रिय दिखने की कोशिश भर करते रहेंगे
प्लीज, आगे से ध्यान रखना, गंदे लोगों को भी जीने का हक है माई लार्ड
(यह पहला और अंतिम पार्ट उन अनाम कमेंटों के जवाब में है, जो मठाधीश ने मेरे खिलाफ अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रखे हैं, अगर उसी जैसे फिर अनाम कमेंट आए तो पहले पार्ट के आगे दूसरा पार्ट भी शुरू होगा, फिलहाल हिसाब बराबर कर लेने के कारण इस पहले पार्ट को ही अंतिम पार्ट घोषित करता हूं, हालांकि मठाधीश अभी हरकत से बाज नहीं आएगा और अपने पुराने पिट चुके दांव आजमाता रहेगा, रुक रुक कर चिंतनशील मुद्रा में जाने किस किस एंगिल से बौद्धिक बाजीगरी की पिपहिरी बजाता रहेगा, पर हम लोगों के पास और भी काम हैं भाया, सो इस मुद्दे को सलाम..........यशवंत)
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प्रकरण खत्म, साथ देने के लिए आप सभी साथियों का आभार
मैं इन्हीं गद्द और पद्द भरी बातों के साथ इस प्रकरण को समाप्त घोषित करता हूं। अपने भाई और कवि हरेप्रकाश उपाध्यय, डा. रूपेश श्रीवास्तव, मनीष राज, अंकित माथुर.....समेत सभी लोगों से इसलिए माफी चाहता हूं कि मैंने इस प्रकरण को लंबा खींचा, पर दोस्तों ये जरूरी था वरना हम लोग अब तक निगले जा चुके होते और बिना हमारा पक्ष सुने ही हमारे चरित्र पर अदालत से फैसला दिलाकर हमें फांसी पर लटकाया जा चुका होता। मैं निजी तौर पर वादा करता हूं कि मैं भड़ास पर खुद किसी पोस्ट में किसी महान ब्लागर का उल्लेख अब नहीं करूंगा और न ही किसी को अपना गुरु वुरु मानूंगा। हम लोग अपने दम पर लड़े भिड़े और आगे बढ़े लोग हैं जो अपनी मस्ती की धुन में पूरी टीम भावना के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं ताकि देसजपने की खुशबू या बदबू उन राजमहलों तक भी पहुंचे जहां हमारा जाना वर्जित है।
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भड़ासी अपने पोस्टों में दूसरे ब्लागरों का नाम न लें, किसी पर टिप्पणी न करें
मैं आप लोगों से भी अनुरोध करूंगा कि अब किसी पोस्ट में किसी ब्लाग का नाम, किसी ब्लागर का नाम जो भड़ास का मेंबर न हो, न लिया जाए। हम लोगों के लिए भड़ास निकालने के ढेर सारे बिंदु अभी बाकी है, क्यों खामखा किसी के मुंह लगा जाए। हर हम लोग अपनी रक्षा हर हालत में करेंगे, एकजुटता के साथ, यह वादा है। भड़ास को हम कई हिस्सों में बांट सकते हैं जैसा आर्थिक भड़ास, राजनीतिक भड़ास, सांस्कृतिक भड़ास, देसज भड़ास, शहरी भड़ास, व्यंग्य भड़ास, गुस्सा भड़ास....और आप पाएंगे कि हमने अभी कई सेक्शन पर कुछ लिखा ही नहीं।
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सीनियर ब्लागरों को विशेष आभार....
मैं अंत में उन ढेर सारे वरिष्ठ ब्लागरों को दिल से शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुश्किल घड़ी में हम भड़ासियों का साथ दिया और हौसला बंधाया। मैं उन लोगों की सलाह पर ही इस विवाद को यहीं विराम देता हूं। साथी बोधिसत्व, अभय तिवारी, दिलीप मंडल, संजय तिवारी, मसिजीवी, अशोक पांडे, अरुण अरोरा, प्रमेंद्र प्रताप सिंह.....समेत ढेरों ऐसा ब्लागर साथी हैं जिनके लिखे, कहे से मैं प्रेरणा पाकर यह सारा झगड़ा खुद अपनी तरफ से खत्म कर रहा हूं।
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मनीषा पांडेय जी, हम भड़ासी बिना शर्त माफी मांगते हैं
मैं बेदखल की डायरी वाली मनीषा पांडेय से कहना चाहूंगा कि अगर हमारे बार-बार सफाई देने के बावजूद उन्हें यह लगा कि भड़ास ने उनकी भावनाओं को दुख पहुंचाया है, खिल्ली उड़ाई है, टारगेट कर लिखा है, बदनाम करने की साजिश की है....तो मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं। हम लोगों की कभी ऐसी मंशा नहीं रही। हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी लड़ाई के साथ खुद को जोड़कर देखते हैं। ऐसे में हम किसी भी आम खास महिला साथी को टारगेट बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो कुछ सब हुआ वो गलफहमी व संवादहीनता के चलते हुआ। मैं इसी के साथ विश्वास दिलाता हूं कि भड़ास में जो कुछ छपा है, कहा गया है, उसके पीछे कतई आप नहीं थीं। आपके लिखे पर मुझे जो कुछ कहना था मैं उन्हीं दिनों एक पोस्ट के जरिए आपको संबोधित करते हुए आपके आरोपों के जवाब में कह दिया था। उसके बाद आपको टारगेट नहीं किया गया। यह दुर्योग था कि उन्हीं दिनों मुंबई के एक लैंगिक विकलांग साथी ने अपना ब्लाग शुरू किया और कुछ पोस्टें भड़ास पर भी डालनी शुरू कीं, और वो साथी ये काम डा. रूपेश के सहयोग से कर रहीं थीं। आपसे विवाद के बहुत पहले से मुंबई की उस लैंगिक विकलांग साथी के नाम का जिक्र डा. रूपेश अपनी पोस्टों में करते रहे हैं, ये बात हम लोगों ने कई बार कही है।
खैर, अब सफाई देने का वक्त नहीं है, और माफी मांगते समय सफाई देनी भी नहीं चाहिए। माफी के साथ कोई शर्त नहीं होती सो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं और आपकी गरिमा का सम्मान करते हुए आपकी मेधा की भूरि भूरि तारीफ करते हैं। अब तो ये कहने का वक्त है कि अगर दिल में कोई मलाल हो तो, प्लीज... उसे निकाल दीजिए। आपके लिखे का मैं हमेशा कायल रहा हूं, और रहूंगा, वैचारिक मतभेद तो होते रहते हैं लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। उम्मीद है, भूल चूक लेनी देनी को माफ करते हुए आप मुझ अज्ञानी मूरख समेत सारे नासमझ भड़ासियों को भी क्षमा कर देंगी, जिनके मन में किसी के लिए कोई पाप नहीं होता है और जो होता है वो सबके सामने होता है। आपकी माफी के इंतजार में....यशवंत
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अंत में भड़ासियों के लिए संदेश
हे प्यारे भड़ासियों, अब मस्त रहिए, डटे रहिए, किसी दूसरे के ब्लाग को न देखिए। भड़ास पर आप लिखते रहिए, आपस में लड़ते रहिए, आपस में सुलह करते रहिए, हम खुद ही इतनी संख्या में हैं कि हमें लड़ने के लिए भड़ास के बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है लेकिन अगर बाहर से भड़ास को चुनौती मिलती है तो हम सब मिलकर नाक तोड़ देंगे, इसकी गारंटी करिए। ये जंग थी, जिसमें न कोई हारा है न कोई जीता है। जैसे को तैसा वाले अंदाज में बातें की गईं हैं। लेकिन अब इसे खत्म करना चाहिए। बहुत हुआ।
और मैं ये चैप्टर अब बंद करता हूं। आपसे भी अनुरोध करता हूं कि कोई भी साथी अब अपनी पोस्ट में पीछे हुए किसी विवाद का कोई जिक्र नहीं करे। और हो सके तो हमें अपने विरोधियों, दुश्मनों से भी माफी मांग लेनी चाहिए तो वो अपनी महानता कायम रख सकें और हम हारे हुए लोग फिर हारकर जीने का सुख ले सकें। जीने का मजा इसी में है प्यारे.....
अंत में मेरी प्रिय लाइन...
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
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जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: खत्म, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीश, मनीषा पांडेय, विवाद, समाप्त, स्त्री
1.3.08
एक कविताः सुन ले, ओ बे मठाधीश और मठाधीश के चिलांडु...
(((इस पोस्ट के ठीक नीचे पोस्ट है, साथी पंकज पराशर ने कई उदाहरणों के जरिये बताया है कि ब्लागिंग के जो मठाधीश आज भाषा के नाम पर भड़ास पर पाबंदी की बात कर रहे हैं, दरअसल उनकी चले तो काशीनाथ का अस्सी का मोर्चा कभी छपे ही नहीं और छप भी जाए तो काशीनाथ को इस जुर्म में फांसी पर लटका दिया जाए। मैं पंकज जी की पोस्ट पर कमेंट करने गया तो गद्य ने पद्य की शक्ल अख्तियार कर ली और बन कई एक कविता, बिलकुल धारधार, मठाधीशी के खिलाफ।
दरअसल मठाधीश कोई एक व्यक्ति नहीं होता, वह ट्रेंड होता है, वह संस्थान होता है, वह बीमारी होती है, वह माफिया होता है। और उसे समझने के लिए आपको थोड़ी अक्ल लगानी पड़ती है पर इनकी पहचान बहुत जल्दी हो जाती है।
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके कुछ चिलांडुओं पर जो कविता बन पड़ी है जो नीचे पंकज पराशर वाली पोस्ट में कमेंट के रूप में भी लिखा है, उसे थोड़ा और बड़ा करते हुए और ठीक करते हुए एक अलग पोस्ट के रूप दे रहा हूं। अच्छा लगे तो कमेंट में वाह वाह कर दीजिएगा, बुरा लगे तो गरिया दीजिएगा....जय भड़ास, यशवंत.....)))
मठाधीशों के पास आत्मा नहीं होती,
आत्मा होने का नाटक होता है,
मठाधीशों के पास तर्क नहीं होता,
तर्क होने का नाटक होता है,
मठाधीशों का कोई सरोकार नहीं होता,
सरोकार होने का नाटक होता है,
मठाधीशों के पास व्यक्तित्व नहीं होता
व्यक्तित्व होने का नाटक होता है
और नाटकों से बने इन नाटकीय व्यक्तित्वों को
....
साहित्य
समझ
संस्कृति
सोच
सिनेमा
रेडियो
थिएटर
विचारधारा
सरोकार
....
से बस इतना लेना देना होता है कि
इनकी मठाधीशी और फैले
बोले तो
इनकी पल्लगी करने वाले और बढ़ें
इनको ढेर सारे पुरस्कार मिलें
इनका हर जगह नाम लिया जाए
इन्हें हर कोई सराहे
इनका हर कहा माना जाए
ये जहां जाएं तो लोग इन्हें सजदा करें
ये जो बोलें उसे संस्कृति का बोल माना जाए
ये जो सोचें उसे राष्ट्रीय सोच माना जाए
इनके कदम जिधर चलें, उधर ही आंदोलन शुरू हो जाएं
ये जब सोएं तो दुनिया शांत रहे
ये जब हगें तो दुनिया पानी लेकर खड़ी रहे
ये जब मूतें तो लोग वाह वाह करें
ये जब सलाह दें तो उसे आदेश माना जाए
ये जिसे चाहें बंद करा दें, जिसे चाहें आजाद करा दें
ये मठाधीश हैं, ये चिलांडु हैं
जो अपने घर में गंदगी फैलाए रहें, इनकी मर्जी
पर दूसरे के घरों में घुसकर अरेस्ट वारंट दिखाते हैं
उन्हें तहजीब और नसीहत सिखाते हैं
उन्हें जीने का ढंग और भाषा की समझ बताते हैं
ये सरोकारों के नाम पर खुद को विद्वान
और बाकी विद्वानों को चूतिया मानते हैं
...................
ऐसी ढेरों कामनाओं, भावनाओं, तावनाओं, खावनाओं....से अंटे बसे इन लोगों को
भइया या तो आइना न दिखाओ
या जब दिखाओ तो खुल के गरियाओ
और कह दो
कुत्तों....सूअरों....बिल्लियों.....
तु्म्हारे बौद्धिक मैथुन से हम स्खलित नहीं होंगे
वरन हम तुम्हारे मुंह को ही तोड़ देंगे
जिसका तुम लिंग के रूप में
इस देश की भाषा और जनता के पिछवाड़े
अनाम नाम से, स्याह अंधेरे में
और कभी कभी तो दिनदहाड़े
इस्तेमाल कर रहे हो....
तेरी गंदी सोच, विकृत मानसिकता और अंधी हो चकी संवेदना पर हम थूकते हैं
सुन ले ओ बे मठाधीश
और मठाधीश के चिलांडु
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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ब्लागिंग के मठाधीश को एक धक्का और दो, उसके कच्चे चिट्ठे को खोल दो
ब्लागिंग को अपने उंगलियों पर नचाने की महत्वाकांक्षा रखने वाले मठाधीशों के खिलाफ भड़ास द्वारा शुरू की गई जंग रंग दिखाने लगी है। मठाधीशों के सरगना अविनाश ने जंग की पहल खुद की। भड़ास पर बैन लगाने संबंधी मांग करते हुए एक पोस्ट अपने ब्लाग पर डाली। उसने न सिर्फ अपने ब्लाग पर डाली बल्कि कुछ चिलांडुओं के साथ बैठकर साजिश भी की और उन्हें भी उकसाया कि वे भी एक साथ अपने अपने ब्लागों पर भड़ास को बैन करने संबंधी पोस्ट डालें। मुझे चिलांडुओं से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि सारा खेल सरदार करता है। और सरदार है अविनाश। जिसने अपने पूरे करियर में सिर्फ अवसरवादिता और महत्वाकांक्षा का खेल खेला है और वही खेल दुहराकर ब्लागिंग का शहंशाह बन जाने क भ्रम पाल बैठा है। उसने अपने करियर में दोस्तों, मित्रों और विचारधारा का सिर्फ और सिर्फ अपने करियर के ग्रोथ के लिए इस्तेमाल किया। उसी महत्वाकांक्षा और मठाधीशी को बढ़ाने के इरादे से भड़ास को खत्म करने की सद्दाम हुसैनी साजिश रच डाली। पर इतिहास गवाह है कि सद्दाम हुसैन का क्या हश्र हुआ? उसे अंत में गुफा में छिपना पड़ा और फांसी पर लटकना पड़ा। हम तो ये नहीं चाहते कि किसी को फांसी हो पर हम चाहते हैं कि वो अपनी करतूतों को भड़ास के आइने में देखकर खुद अपने से शर्मा जाए और घृणा करने लगे।
जब उसने पहली गलती की भड़ास को बैन करने संबंधी पोस्ट अपने ब्लाग पर डालने की तो भड़ास ने इसका करारा जवाब देते हुए उसके ब्लाग को भी बैन करने की मुहिम चलवाई क्योंकि उसने महिलाओं पर गंभीर बहस का नाटक कर एक कुत्सित और अश्लील तस्वीर अपने ब्लाग पर लगा रखी है। साथ ही हमने अविनाश के भड़ास विरोधी अभियान के पीछे असली वजहों का खुलासा कर दिया। इससे बौखलाकर अविनाश ने एक और बड़ी गलती कर दी है जो अब उसके गले की फांस बनने वाली है।
ये दूसरी गल्ती यह कि उसने अपने ब्लाग पर मेरे खिलाफ अनाम माने एनानिमस नाम से ऐसी बातें खुद लिख डालीं हैं जिसे थोड़ी भी गैरत वाला व्यक्ति अपने ब्लाग पर न तो लिख सकता है और न पब्लिश कर सकता है। पर अविनाश जैसे गिरे हुए इंसान, धूर्त आदमी, मक्कार व्यक्ति और मठाधीशी की महत्वाकांक्षा पाले व्यक्ति से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हालांकि उसने मुझसे निजी चैट में माफी मांगी है इस हरकत पर और उसने कबूल किया है कि ये अनाम कमेंट उसी ने लिखे हैं क्योंकि वह नाराज था। (देखें नीचे चैट वाली पोस्ट)।
पर उसे यह नहीं पता कि वो अगर नरक में गिरकर जंग लड़ना चाह रहा है, बिलो द बेल्ट प्रहार कर लड़ाई लड़ना चाह रहा है अनाम नाम से तो हम वहीं नरक में पहुंचकर अनाम नाम से नहीं बल्कि खुद के नाम से जंग लड़ेंगे और उसकी गर्दन को दबोचेंगे। उसकी मठाधीशी की महत्वाकांक्षा को तो तार-तार करेंगे ही, उसके जीवन के सारे कूड़े कचड़े को सरेआम कर देंगे। इसी मिशन के तहत भड़ास ने मुहिम शुरू की है। नीचे लिखी एक पोस्ट में, जिसमें मैंने आपसे अपील की है कि अगर आप अविनाश से किसी भी तरह प्रताड़ित या दुखी रहे हैं, तो मुझे फोन करिए, सारी बातें नोट कराइए, या मेरी मेल आईडी पर खुद लिखकर मेल कर दीजिए, इन सारे कच्चे चिट्ठों को कल दो मार्च से सिरीज में प्रकाशित करेंगे।
मेरे पास कुछ साथियों के मेल आए हैं। मैं उनका आभार प्रकट करता हूं और उनकी हिम्मत की दाद देता हूं जो उन्होंने अपने नाम से ही अविनाश की करतूतों को, जो मेल से मेरे पास भेजा है, छापने का अनुरोध किया है। ऐसे बहादुर इंसानों की एकता की बदौलत ही झूठ की नींव पर खड़े मोहल्लों का नाश कर देंगे।
तो दोस्तों, ब्लागिंग के मठाधीश को एक धक्का और दो...के अभियान में आप सभी को आमंत्रण भेजता हूं। आप चाहें जिस धर्म, जाति, क्षेत्र, विचारधारा या संप्रदाय से जुड़ें हों, अगर आप सिर्फ एक मुद्दे, ब्लागिंग के मठाधीश अविनाश को नेस्तनाबूत करना, के अभियान में भड़ास का साथ देना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है। मुझे आपके मेल, आपके सुझाव, आपके गाइडेंस का इंतजार रहेगा।
अगर आप कुछ लिखना कहना चाहते हैं तो पहले मुझे मेल करें ताकि उसे मठाधीश को नेस्तनाबूत करने के अभियान की सीरिज वाली पोस्टों का पार्ट बना सकूं।
मेरी मेल आईडी है yashwantdelhi@gmail.com
जय भड़ास
यशवंत सिंह
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अविनाश, नेस्तनाबूद, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीशों से पंगा
अतिमहत्वाकांक्षी अविनाश की मठाधीशी के खिलाफ भड़ास का अभियान, आप साथ दें....!!!
अविनाश की शक्ल के पीछे छिपे काले दिल का खुलासा करने जा रहे हैं हम। भड़ास ने अपने खिलाफ छेड़े गये सुनियोजित जंग को स्वीकार कर लिया है। इसी के तहत अविनाश से किए गए निजी चैट को सार्वजनकि कर दिया है, जैसा कि अविनाश की आदत रही है। और ये आदत जन्मी है अतिमहत्वाकांक्षा की बीमारी के कारण। ये बीमारी जिसे लग जाती है वो दीन, धरम, ईमान, मित्र, नैतिकता, सगे, संबंधी, देश, समाज, विचारधारा...सबको भूलकर सिर्फ और सिर्फ अपना लाभ, अपना नाम, और अपना पैसा देखता, जोड़ता, गिनता, गुनता है। इसीलिए जैसे को तैसा अंदाज में अविनाश से हुए चैट को सार्वजनिक कर दिया गया है जिसमें उसने भड़ास पर प्रतिबंध की बात से इनकार किया है और क्षमा भी मांगी है।
लेकिन अविनाश, तुमने जो खेल बहुत लोगों से खेला है, वही दाव यहां आजमाना चाह रहे थे, तो वो अब तुम्हें महंगा पड़ेगा। जिस मनीषा पांडेय के पैरोकार बनकर तुमने भड़ास पर पाबंदी लगाने की बात कही, उसी ने तुम्हें कहा कि तुम तो सबसे गये गुजरे हो जो निजी चैट को सार्वजनिक कर दिया।
तुम्हारे ब्लाग से विस्फोट के संजय तिवारी ने खुद को अलग कर लिया। अनिल रघुराज ने अलग करने का तुमसे अनुरोध किया है। बोधिसत्व समेत ढेर सारे ब्लागरों ने भड़ास पर पाबंदी के खिलाफ तुम्हारे अभियान से अलग होकर भड़ास को नैतिक समर्थन दिया है।
सवाल यहां भाषा, या शील, अश्लील का नहीं, भड़ास तुम्हारी दादागिरी और तुम्हारे आत्मकेंद्रित, स्वार्थी और दादागिरी वाले अंदाज का है, जिसे अब बिलकुल नहीं चलने दिया जाएगा। तुम्हारे अतीत के सारे कच्चे चिट्ठे भड़ास पर दो मार्च से डाला जाएगा। सिरीज में। पार्ट वन से लेकर पार्ट टेन तक। तुमने रांची से लेकर पटना तक और फिर दिल्ली तक किससे क्या क्या धोखाधड़ी की, किससे कब कब स्वार्थ सिद्ध किया, सब कुछ बताया सुनाया जाएगा।
अब जो हवा चल पड़ी है, वो रुकेगी नहीं क्योंकि हम शरीफों को तुमने छेड़ा है जो अपनी खोल में मस्त रहने के आदी थे, हैं और रहेंगे। यहां भोले शंकर की बारात है जिसे कल क्या होगा, कोई चिंता नहीं।
चलो, तुम थोड़ा अपनी करनी-कथनी पर सोच लो, फिर दो मार्च से मिलते हैं.....
मैं उन सभी ब्लागर साथियों, पाठकों, पत्रकारों, साहित्यकारों से अपील करता हूं कि अगर आपके मन में अविनाश की दादागिरी को लेकर कोई पेंच, कोई दुख, कोई सदमा है तो हमें जरूर बताएं। अगर आप चाहते हैं कि आपका नाम न छपे तो हम अनाम नाम से आपकी बात को छापेंगे। यहां किसी विचारधारा की बात नहीं, किसी निजी हित-अहित की बात नहीं, यहां बात ब्लागिंग में अविनाश की मठाधीशी के खिलाफ के अभियान की है, जिसे भड़ास नेतृत्व प्रदान कर रहा है। यह एक मौका है जिसमें आप सभी को भड़ास आमंत्रित कर रहा है, अपनी बात रखने के लिए। आप भड़ास से असहमत हो सकते हैं, हमारीर भाषा पर सवाल उठा सकते हैं लेकिन इसके बावजूद अगर आप तानाशाही के खिलाफ हैं, आप अवसरवादिता के खिलाफ हैं, आप स्वार्थसिद्धि के खिलाफ हैं तो हमसें हाथ मिलाएं। यह मौका है अविनाश को सबक सिखाने का।
आप अपनी बात मुझे YASHWANTDELHI@GMAIL.COM पर भेज सकते हैं। आप अगर अनुरोध करेंगे तो आपका नाम गोपनीय रखा जाएगा, यह मेरा निजी वादा है।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: जंग, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीशों के खिलाफ मोर्चा
मोहल्ला पर गंदी तस्वीर, इसे बैन कराने को गूगल से शिकायत करें
भड़ासियों के लिए एक काम...
दो ब्लागरों मोहल्ले के अविनाश और टूटी हुई बिखरी हुई के इरफान ने भड़ास पर पाबंदी लगाने की मुहिम शुरू कर दी है। ये कथित प्रगतिशील साथियों की ब्लागिंग में मठाधीशी टूटती हुई दिख रही थी तो इन्होंने अभद्र और अश्लील भाषा के नाम पर भड़ास की आवाज को कुचलने की मुहिम छेड़ दी है। इन लोगों ने भड़ास पर पाबंदी लगाने के लिए गूगल और ब्लाग एग्रीगेटरों तक अपने अभियान को पहुंचाना शुरू कर दिया है। अगर इनका वश चले तो ये मंटो, इस्मत आपा, धूमिल पर भी पाबंदी लगा दें और इनकी रचनाओं को सामने न आने दें क्योंकि इन लोगों ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है।
तो दोस्तों, कभी स्वतंत्रा और अभिव्यक्ति की पैरोकारी करने वाले इन साथियों को करारा जवाब देना बहुत जरूरी है। इनकी मठाधीशी इस बार सदा के लिए खत्म हो जाए, इसके लिए आप इन दोनों ब्लागों के आपत्तिजनक कंटेंट को देखें, इसके लिए नीचे इनके ब्लाग की शिकायत गूगल से करिए।
((असल मुद्दा कोई मनीषा या अश्लीलता नहीं है, ब्लागिंग के इन कथित प्रगतिशील मठाधीशों की मठाधीशी को चैलेंज करना है। पिछले दिनों भड़ास में अविनाश के सीडीएस के मीटिंग में जाने को लेकर जो टिप्पणी अफलातून जी ने की थी भड़ास पर उसे मैंने पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दिया, जो अविनाश को नागवार गुजरा और उन्हें पूरी सफाई देनी पड़ी। इसी तरह मोहल्ले पर इरफान ने एक पोस्ट में भड़ास और उनके ब्लाग की रेटिंग को लेकर भड़ास को दोयम बताते हुए टिप्पणी की थी जिसके जवाब में मैंने भड़ास पर इरफान को कहा था कि कृपया ऐसी राजनीति न खेलें। इससे इन मठाधीशों को ये पता चल गया कि दरअसल भड़ास इनके खांच में फिट नहीं हो रहा, और इन पर सवाल भी उठाता रहता है, तभी से ये दोनों मौके की ताक में थे। और भाई प्रमोद जी तो शामिल बाजा हैं, जिधर प्रगतिशील बैंड पार्टी को बाजा बजाने का ठेका सट्टा मिल जाए, उधर जाकर पों पों पें पें हें हें बजाने लगते हैं, ईश्वर उन्हें और उनके ब्लाग को माफ करे।))
गूगल को गंदी तस्वीरें प्रकाशित करने वाले मोहल्ला व टूटी हुई बिखरी हुई के बारे में बतायें, इसके लिए आप नीचे लिखे लिंक को क्लिक करें...
गूगल को गंदी तस्वीरें प्रकाशित करने वाले मोहल्ला व टूटी हुई बिखरी हुई के बारे में रिपोर्ट
उपरोक्त लिंक पर क्लिक करेंगे तो वो उस गंदी साइट का यूआरएल मांगेगा जिसे आप नीचे दिए गए यूआरएल को कापी करके डाल दें, फिर सबमिट बटन दबा दें....यूआरएल इस प्रकार है...
http://tooteehueebikhreehuee.blogspot.com/2008/02/blog-post_19.html
ये तो हुआ टूटी हुई बिखरी हुई ब्लाग की गंदगी के बारे में रिपोर्ट, उसके बाद मोहल्ले की गंदगी को रिपोर्ट करने के फिर उपरोक्त गूगल के लिंक पर क्लिक करें और अब मोहल्ले का यूआरएल डाल कर सबमिट बटन दबा दें..., मोहल्ले का यूआरएल इस प्रकार है...इसे नीचे से कापी करके उपरोक्त लिंक में डाल दें...
http://mohalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_2166.html
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: आरोप, पाबंदी मुहिम, फ्लैग ब्लाग, भड़ास
29.2.08
आप आहत हुए, मैं क्षमा प्रार्थी हूं--अविनाश
me: गुरु आप बिलो द बेल्ट प्रहार कर रहे हो, मैं चाहता हूं कि ऐसा न हो
अगर आप चाहते हैं कि जंग हो तो मैं तैयार हो
सारी....हूं....
Avinash: माफ कीजिएगा, दिन में मैं बजट में उलझा हुआ था।
अभी अभी घर लौटा हूं।
me: पर मैं एक बार चाहता हूं कि आपसे बात हो जाए
अगर ऐसी तैसी पर उतारू हो तो बताओ
बहुत हुआ सम्मान, इस चैट को आनलाइन कर देना पर मैं आपको बड़ा भाई मानता हूं तो अंतिम अनुरोध कर रहा हूं
कि मान जाओ.....
मान जाओ....
जो अनाम कमेंट मेरे खिलाफ मोहल्ले पे लगा रखे हो अगले 12 घंटे में हटा लो, इसे धमकी समझो या छोटे भाई का अनुरोध
Avinash: जो मुझे नागवार गुज़रा, मैंने लिखा।
me: ये निजी मामला है, सिर्फ आप से कह रहा हूं इस वक्त, घर से चैट कर रहा हूं
Avinash: मैंने तो अभी कमेंट देखे भी नहीं हैं सारे। देखता हूं। आपत्तिजनक हुआ तो ज़रूर हटाऊंगा।
Sent at 23:28 on Friday
Avinash: भड़ास देखा। आपने पर्याप्त लानत मलामत की है। आपका बहुत शुक्रिया।
me: नाटक बंद करो भाई.......समझ लो, बहुत हुआ, अभी तो पहल तुमने की है, अंत क्या होगा, किसी को नहीं पात....ये मैं आपसे छोटे भाई के नाते अनुरोध कर रहा हूं.....इसे आप सार्वजनिक कर सकते हो
Avinash: इस अंदाज़ में बातें शोभनीय नहीं।
me: मुझे पता है तुम यही हरकत करते रहे हो जीवन में...तुमने शोभनीय अशोभनीय की सीमाएं तोड़ दी हैं, तभी तुम अनाम कमेंट के नाम से खुद लिख रहे हो
Avinash: आपने पी रखी है। सुबह बात करेंगे।
me: कमेंट बिलो द बेल्ट लिख रहो हो, खुद तुम...
Avinash: मोहल्ले की पोस्ट से आप आहत हुए, क्षमाप्रार्थी हूं।
me: क्योंकि तुम्हारी ये परंपरा है लिखने की, तुम जिसे पसंद नहीं करते हो, उसे खत्म कर देते हो, पर मैं खत्म हो के जी लेता हूं...
Avinash: मैं प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं।
me: तुम नाटक कर रहो हो
Avinash: मेरी पूरी पोस्ट में असहमति मुखर है, प्रतिबंध की बात नहीं।
me: ताकि तुम इस चैट को डाल सको
तुम्हें मैं अच्छी तरह समझता हूं
तुम दरअसल जो हो वो बहुत कम लोग समझते हैं
Avinash: मैं जानता हूं किस चैट को सार्वजनिक करना है, किसे नहीं।
me: तुमने पंगा लिया है बौद्धिक, तो मैं भी बौद्धिक जवाब दिया है
Avinash: आप इत्मीनान रहें। इस चैट में प्रयोग की जा रही भाषा के लिए मोहल्ले में कोई जगह नहीं है।
आपके बौद्धिक जवाब का स्वागत है।
me: पर मैं अगले 12 घंटे में वो अनाम कमेंट हटना देखना चाहता हूं मोहल्ले से जिसमें मेरे बिलो द बेल्ट प्रहार किया गया है
Avinash: उसके लिए शुक्रिया अदा करता हूं।
me: मेरे पास भी कई सारी चीजें हैं जिसे मैं अनाम डाल सकता हूं
लोग मुझे उकसा रहे हैं
मुझे तुम्हारे चरित्र से लेकर सार्वजनिक लाइफ तक के ढेर सारे सामाग्री दे रहे हैं
Avinash: शायद मैं ऐसा नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि धमकियां मुझे विचलित नहीं करतीं। अनुरोध करते, तो ज़रूर हटा लेता।
me: लेकिन ये जानते हुए कि तुम इस चैट को सार्वजनिक कर सकते हो
Avinash: क्या आपने हिज हाइनेस मनीषा की पोस्ट हटायी?
me: मैं यह अंतिम बार कह रहा हूं
भाई मान जाओ....
मैं अब शुक्रिया, खुदा हाफिज बोल रहा हूं....
मैं सुबह 8 बजे फिर देखू्ंगा
क्या माजरा है
Avinash: शुभ रात्रि
me: बाय....शुभ रात्रि
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यशवंत सिंह yashwant singh
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अविनाश की भाषा हिटलर वाली है-- हरेप्रकाश उपाध्याय
(अविनाश की मठाधीशी के खिलाफ आवाज उठाने का वक्त आ गया है। ब्लागिंग को अपने इशारे पर नचाने की महत्वाकांक्षा पालने वाले इस शख्स के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए लोग तैयार होने लगे हैं। कल तक भड़ास की जय करने वाले इस शख्स ने आज यशवंत सिंह को यशवंत नामधारी लिखा और भड़ास को एक ऐसे मुद्दे पर प्रतिबंधित कराने की मांग कर रहा है जिस मुद्दे को भड़ास पर पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि मनीषा हिजड़ा का अस्तित्तव है और इस नाम का उल्लेख डा. रूपेश श्रीवास्तव मनीषा पांडेय प्रकरण से पहले से कर रहे हैं, अपनी पोस्टों में। पर बगैर सत्यता को जाने समझे, अविनाश भड़ास को इसलिए मिटाने पर तुल गए हैं क्योकि उनकी ब्लागिंग की सत्ता को चुनौती देने वाला कोई एकमात्र ब्लाग है तो वो है भड़ास। लीजिए प्रख्यात कवि हरेप्रकाश उपाध्याय की अविनाश के बारे में राय पढ़िए, जो उन्होंने भड़ास पर ही एक कमेंट के रूप में खुद लिखा है....जय भड़ास, यशवंत)
हरे प्रकाश उपाध्याय has left a new comment on your post "भड़ास विरोधी मोर्चाः ये तो होना ही था.....ये तो हो...":
avinash ki bhasha hitler vali hai yshvant bhai. baki koi hrj nhi hai mujhe furst mili to likhunga ki mohalla pr kyo prtibndh lga diya jay...vaise aavaj bnd krne-krane me mera koi bharosa hai nhi...hm har likh-bole ka jvab likh bol ke hi de skte hai...asahmati ka arth kisi ki aavaj shant kr dena nhi hota...aur jhan tk galiyon ki bat hai to hr kisan-mjur, dlit, gramin ki aavaj, unke bole-kahe ko prtibandhit kr diya jay...lgta avinash ko black literature se bhari aprichy ya droh hai...ve mrathi dlit sahity bhi nhi dekh paye hain...hindi dlit sahity bhi nhi...ve vhan ki bhasha...swarn aurton ke bare me njariya aadi dekhen aur sbko pratibandhit kra den...jai ho ...jai ho...
yh bhadas ki sarthakta hai ki vh jis chutiyape ke virudh uth khada hua hai...unki ab ftne lgi hai...
is tilmilhat se hi shayad kuchh nye prtik samne aayen...
nhi to tu meri sahla mai teri to chal hi rha hai...jai..jai..
ek hinjara ki kya aukat ki vh blog pr aakr bole...in ptrkron aur bhudhi-jiviyon ko lg gya n bura...jai..jai...jai ho...
Posted by हरे प्रकाश उपाध्याय to भड़ास at 29/2/08 12:45 PM
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अविनाश, आरोप, पाबंदी मुहिम, भड़ास, हरि भाई
इनकी नंगई प्रगतिशील है, हमारी प्रतिबंधित करने लायक!!!
इरफान जी अपने ब्लाग पर एक कार्टून लगाते हैं जिसमें एक पुरुष का लिंग एक महिला खींच रही है। मेरे एक अनन्य मित्र ने बताया कि उन्होंने ज्योंही इरफान के इस कार्टून को देखा, तुरंत बंद कर दिया क्योंकि बगल में उनका बेटा भी देख रहा था। क्या इसी कार्टून के कारण इरफान के ब्लाग को बैन नहीं करा देना चाहिए?
अविनाश जी के मोहल्ले में जब महिलाओं की दशा दिशा पर बात की जाती है तो ऐसी नंगी नंगी तस्वीरों का कोलाज का रूप में इस्तेमाल किया जाता है जिसे देखते हुए कोई यह नहीं कह सकता कि ये सभ्य तस्वीरें हैं। क्या इस आधार पर मोहल्ले को प्रतिबंधित नहीं करा देना चाहिए?
नहीं, इनकी नंगई जायज है, क्योंकि ये कथित रूप से प्रगतिशील नंगई है, हिप्पोक्रेटिक नंगई है.....। इन्हें भड़ासी नंगई खराब लगती है क्योंकि हम खुलकर कहते हैं कि हम उल्टी कर रहे हैं, गंदी गंदी बातें कर रहे हैं, हम बुरे लोग हैं, हम खराब लोग हैं, हम कुंठित लोग हैं, हम सहज होना चाहते हैं, हम हलका होना चाहते हैं....
लेकिन दरअसल भड़ास इन हिप्पोक्रेटों, मठाधीशों और कथित प्रगतिशीलों के काकस में फिट नहीं बैठ रहा है, सो इन्हें गुस्सा आना लाजिमी है। दरअसल ये ब्लागिंग को पुरानों के चंगुल से निकालकर अपने चंगुल में ले आये हैं सो इन्हें यह सहन नहीं होता कि कोई ऐसा ब्लाग भी सबकी चर्चा में रहे जो इनकी जी हुजूरी नहीं करता, इनके ब्लाग के झंडे के नीचे नहीं आता, इनकी कथित प्रगतिशीलता के पैमानों पर खरा नहीं उतरता।
प्रमोद सिंह की बात इसलिए नहीं करूंगा क्योंकि मुझे वे शामिल बाजा लगने लगे हैं, जिधर ज्यादा धुन बजने लगे, उधर वो भी अपनी बांस कि पिपहरी लेकर बजाने लगते हैं, पें पें पें...हें हें हें...उन पर भगवान रहम करे।
तो भइया....आप लोग अपनी नंगई को शाब्दिक आवरणों के ढांक कर बौद्धिक बने रहो, हमें प्रतिबंधित करते रहो।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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