[भड़ास] New comment on लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो....
डॉ.सुभाष भदौरिया. has left a new comment on your post "लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो...":
यशवंत सिंह जी
आपने आदरणीया मनीषाजी से माफी माँगकर बहुत ही नेक काम किया है.रंगेसियारों को वे पहिचानने की नज़र रखती हैं.उनके दोगलेपन को उन्होंने खुद उजागर किया है.
देर अबेर वे हम पापियों को भी पहिचानेंगी.
आमीन.
अन्य आदरणीय मनीषाजी से मैं माफी मांग रहा हूँ कि उनके दिल को ठेस लगी होगी. साथ में डॉ.रूपेशजी से जो एक गंभीर समस्या की ओर इंगित कर रहे हैं.पर उन पर शंका कर पूरे मामले को कहाँ से कहाँ ले जाया गया.
उनके पीछे आड़ लेकर वार करने वाले मठाधीशों कठमुल्लों के फ़तवों की हमें परवाह नहीं है.
आ गये कमज़र्फ कंधा ले के आँसू पोछने.
लाइन लग गई यार ढोंगियों की फाइर काल के नाम पर.
अपनी एक ग़ज़ल के कुछ अशआर अपने तमाम भड़ासी दोस्तों को नज़र कर रहा हूँ.
ग़ज़ल
जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आनबान रखते है.
शब्द भेदी हैं हम को पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.
जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.
वैसे तो हम जमी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखतें हैं.
ग़ालिबो मीर के हैं हम वारिस,
अपने शेरों में जान रखते है.
जय भड़ास.
Posted by डॉ.सुभाष भदौरिया. to भड़ास at 2/3/08 7:15 PM
2.3.08
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं, दुश्मनों का भी मान रखते हैं...डा. सुभाष भदौरिया
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अंत, जवाब, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मनीषा पांडेय, विवाद, स्त्री
लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरों, भड़ासियों, साथियों, मनीषा पांडेय जी के लिए संदेश
और ये रहा ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे का पहला पार्ट
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके चिलांडुओं को लगा था कि वो एक साथ भौंकना शुरू करेंगे और भड़ासी डर कर उनके शरण में आ जाएंगे, त्राहिमाम करते हुए। पर हुआ उल्टा इन कुत्तों को न सिर्फ खदेड़ा गया बल्कि बताया भी गया कि दरअसल तुम लोग जिस हिप्पोक्रेसी के जरिए दुनिया को चूतिया बनाए हो और अपने को प्रगतिशीलता का पितामह साबित कर रहे हो, वो दरअसल विचार व व्यवहार का दोगलापन था, जिसे ढेर सारे दिन तुम ढंकने मे सफल रहे लेकिन भड़ास ने इसे उजागर कर दिया। इसी के चलते बजाय भड़ास का नुकसान होने के, ब्लागिंग के मठाधीश का मोहल्ला ही दरक गया। वहां भगदड़ मची हुई है। वो सदमें में है। हर बार का सफल दांव अब उसी को नष्ठ करने पर तुला हुआ है। उसे अब अपनी शक्ल भी छिपाने में मुश्किल हो रही है।
मठाधीश ने तो पहले तानाशाह की तरह फरमान जारी किया और चिलांडुओं से भी कहा कि वो भी फरमान का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटें...भड़ास बंद करो का। लेकिन जब उनके उखाड़े कुछ नहीं उखड़ा, बल्कि भड़ासियों ने उनकी झांटें नोचना शुरू कर दिया तो मठाधीश ने अपना पुराना कूटनीतिक दांव खेला, बिलो द बेल्ट प्रहार का खेल शुरू किया, जिसे वो हमेशा खेला करता है। पर हम इससे डरे नहीं, झुके नहीं, रोये नहीं, गिड़गिड़ाये नहीं.....इसके जवाब में भड़ास ने मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलने की शुरुवात की है। हमें मरना पसंद है, झुकना व रिरियाना नहीं। इसी क्रम में तमाम विरोधों के बावजूद आज दो मार्च से ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलना शुरू कर रहा हूं।
मैं जानता हूं कि तमाम वरिष्ठ ब्लागरों और भड़ासियों को मेरे द्वारा विवाद को खींचा जाना नागवार गुजरेगा लेकिन उनसे मैं करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूं कि वो बस इस पहले पार्ट को मुझे लिख लेने दें, जिसे अंतिम पार्ट मैं मान लूंगा और मैं अपनी तरफ से इस पूरे चैप्टर को क्लोज कर दूंगा, ये मेरा वादा है। भले ही इसके बाद मठाधीश और चिलांडु शाब्दिक लफ्फाजियों और हिप्पोक्रेसी के जरिए अपनी जीत की दुहाई देते हुए राग दरबारी गाएं और दुनियां को अपनी जीत का जश्न दिखाएं लेकिन वो अपनी आत्मा के आइने में झांकेंगे तो उन्हें सच दिखाई देगा।
सो ये जो पहला पार्ट लिख रहा हूं, उसे अंतिम पार्ट मानते हुए पढ़ें...
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ब्लागिंग का जो मठाधीश है, उसने अपने करियर के ग्रोथ के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा और प्रगतिशीलता का जिस तरह बेहतरीन इस्तेमाल किया है, उसका इस दौर का कोई दूसरा नमूना नहीं हो सकता है। इसके लिए रांची और पटना और दिल्ली के ढेर सारे पत्रकार साथियों, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं और इसके मित्रों से बात की जा सकती है।
मेरे पास जो तथ्य मिले हैं, जो बातें बताईं गई हैं, जो मेल मिले हैं.....उसे मैं यहां जारी कर एक नई बहस को नहीं जन्म देना चाहूंगा लेकिन उसका लब्बोलुवाब यही है कि विचारधारा का अपनी तरक्की व उन्नति के लिए इस्तेमाल देखना हो तो मठाधीश का करयिर देखिए। जिस शख्स ने इसे कभी मदद की हो, इसने उसी की खाट खड़ी की। एक उदाहरण देना चाहूंगा। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी के संरक्षण में इस शख्स ने करियर की उंचाइयां पाईं लेकिन जब एक न्यूज चैनल को ज्वाइन कर लिया तो उसने एक मैग्जीन में लेख लिखकर हरिवंश जी को जाने क्या क्या नहीं कहा। अरे भाई, थोड़ी तो कृतज्ञता होनी चाहिए दिल मे या दिल्ली आकर ऐसे प्रोफेशनल हो गए हो कि सिवाय खुद को, कोई दिखता ही नहीं है। ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे।
इसी तरह प्रगतिशीलत व विचारधारा के नाम पर इसने ब्लागिंग में लोगों का इस्तेमाल किया, दुराव फैलाया और एक-एक कर सारे वरिष्ठ ब्लागरों से पहले दोस्ती की, सीखा और फिर जब काम निकल गया, उनका इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें किनारे लगाकर, ठिकाने लगाकर खुद को बढ़ाता चला गया।
आज मठाधीश को जानने वाले जितने भी ब्लागर हैं, उनमें से किसी एक से बात कीजिए, वो बतायेगा कि मठाधीश किस कदर तानाशाह और अलोकतांत्रिक शख्सीयत है जो विचारधारा को प्रोफेशनली इस्तेमाल कर ब्लागिंग में खुद की शख्सीयत बढ़ाता है। जो पसंद न आए, उसे नष्ट कर दो, उसे अलगाव में डाल दो, उसे अकेले में छोड़ दो, उसके करीब के लोगों को उससे काट दो, उसे कहीं तवज्जो न दो, उसके नामलेवा लोगों को धमका लो.......ये सारी बातें सभी को पता हैं। इन्हें एक-एक उदाहरण के जरिए भी समझाया जा सकता है लेकिन मैं इसे फिर कभी लिखूंगा, अगर जरूरत पड़ी तो।
ब्लागिंग के मठाधीश ने शायद इतिहास से सबक नहीं लिया कि जिसको भी यह गुमान हो गया कि वो ही सर्वोच्च और सबसे ज्यादा ताकतवर है, उसका यह घमंड उन सामान्य लोगों ने तोड़ दिया, जिसे वो अपने मुट्ठी में दबोचने लायक माना करते थे। तो इसी तरह से बिना समझे, बिना विचारे, बिना बहसियाये, बिना समझाए, बिना कहे, बिना विश्वास में लिए...एकाएक भड़ास को बंद करने का नेक विचार, नेक ऐलान ब्लागिंग के मठाधीश सर्वनाश ने चिलांडुओं के साथ किया, उससे उन्हें यह विश्वास था कि उनकी इतनी मजबूत सत्ता, गुट व ताकत के चलते भड़ास वाले भों भों करते हुए रोएंगे व उनके पैर पकड़कर माफी वाफी मांग लेंगे....
लेकिन मैं यह बताना चाहता हूं कि भड़ास ने न तुम सबको नंगा कर दिया है, बल्कि ब्लागिंग व पत्रकारिता जगत में घृणा के लायक बना दिया है, जिसके तुम लोग काबिल हो। और रही बात हम भड़ासियों को तो ये जान लो....
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम बुरे लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम अच्छे हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम चूतिये हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम विद्वान हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम कुंठित लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम मोक्ष पाए हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम अपूर्ण लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम्हीं अंतिम सत्य हैं
हम भदेस, फ्रस्टेट, देसज, असफल लोगों के कंधे
कमजोर भले हों, पर इतने नहीं कि झुक जाएं
उनके सामने जो हर चीज को सही गलत होने के लिए
सार्टिफिकेट देते घूमते फिरते हैं, आईएसआई मार्का
तुम लोग तो सफल होने के लिए ही पैदा हुए थे,
छा जाने के लिए ही इस धरती पर जन्मे थे,
विजय करने के लिए ही राजधानी पहुंचे थे,
इतिहास बनाने के लिए जी रहे हो, कर रहे हो
पर हमने तो हमेशा इतनी बड़ी बड़ी बातों के आगे
खुद को तुच्छ, नीच, मलिन माना और
चुपचाप जीते रहे, नून तेल के लिए मरते रहे
हर शाम पीकर बकते रहे, बड़ बड़ बकते रहे
गाली वाली देकर, कुछ लिखकर, कुछ बोलकर
बताते रहे कि हम लोग, आप एलीट व सभ्य
लोगों के आगे बड़े बुरबक हैं, और प्लीज जीने दें हमें
अपने तरीके से, अपनी गंदगी में लोटते हुए, हंसते हुए, रोते हुए
पर आपको नहीं था यह मंजूर कि आपकी प्रसिद्धि की हवेलियों के आसपास
बसी रहे, बढ़ती रहे कोई मलिन बस्ती जहां असभ्य लोग
खाते हगते मूतते हंसते रोते जीते सोते एक ही कमरे में गुजार लेते हों जिंदगी
आपको तो चाहिए हर रोज उनसे जीने का करारनामा
जिसमें लिखा हो कि हम नीच लोग, सताए लोग
आप महान वैचारिक सभ्य लोगों को वचन देते हैं कि
हम हर रोज उठते हुए आपको नमन करेंगे, यहां जीने देने के लिए
और जब भी दिखेंगे आप, या आपकी तरफ से आएगी कोई हवा
हम सम्मान में उठ खड़े होंगे और सिर झुकाकर कहेंगे हुजूर हुजूर हुजूर
पर माफ करना मठाधीश, तु्म्हारे चिलांडुओं....
तुम ये भूल गए कि कई लोग डर डर के जीने से बेहतर
एक रोज मरना समझते हैं
और जो मर मर के जीने से इनकार कर दे तो वो
तुम्हारी अट्टालिकाओं में घुसकर अपने सिर से दीवारों को फोड़ सकता है
और तुम्हारे फौज फाटे बस यूं ही हल्ला करते हुए
दाएं बाएं कुछ सक्रिय दिखने की कोशिश भर करते रहेंगे
प्लीज, आगे से ध्यान रखना, गंदे लोगों को भी जीने का हक है माई लार्ड
(यह पहला और अंतिम पार्ट उन अनाम कमेंटों के जवाब में है, जो मठाधीश ने मेरे खिलाफ अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रखे हैं, अगर उसी जैसे फिर अनाम कमेंट आए तो पहले पार्ट के आगे दूसरा पार्ट भी शुरू होगा, फिलहाल हिसाब बराबर कर लेने के कारण इस पहले पार्ट को ही अंतिम पार्ट घोषित करता हूं, हालांकि मठाधीश अभी हरकत से बाज नहीं आएगा और अपने पुराने पिट चुके दांव आजमाता रहेगा, रुक रुक कर चिंतनशील मुद्रा में जाने किस किस एंगिल से बौद्धिक बाजीगरी की पिपहिरी बजाता रहेगा, पर हम लोगों के पास और भी काम हैं भाया, सो इस मुद्दे को सलाम..........यशवंत)
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प्रकरण खत्म, साथ देने के लिए आप सभी साथियों का आभार
मैं इन्हीं गद्द और पद्द भरी बातों के साथ इस प्रकरण को समाप्त घोषित करता हूं। अपने भाई और कवि हरेप्रकाश उपाध्यय, डा. रूपेश श्रीवास्तव, मनीष राज, अंकित माथुर.....समेत सभी लोगों से इसलिए माफी चाहता हूं कि मैंने इस प्रकरण को लंबा खींचा, पर दोस्तों ये जरूरी था वरना हम लोग अब तक निगले जा चुके होते और बिना हमारा पक्ष सुने ही हमारे चरित्र पर अदालत से फैसला दिलाकर हमें फांसी पर लटकाया जा चुका होता। मैं निजी तौर पर वादा करता हूं कि मैं भड़ास पर खुद किसी पोस्ट में किसी महान ब्लागर का उल्लेख अब नहीं करूंगा और न ही किसी को अपना गुरु वुरु मानूंगा। हम लोग अपने दम पर लड़े भिड़े और आगे बढ़े लोग हैं जो अपनी मस्ती की धुन में पूरी टीम भावना के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं ताकि देसजपने की खुशबू या बदबू उन राजमहलों तक भी पहुंचे जहां हमारा जाना वर्जित है।
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भड़ासी अपने पोस्टों में दूसरे ब्लागरों का नाम न लें, किसी पर टिप्पणी न करें
मैं आप लोगों से भी अनुरोध करूंगा कि अब किसी पोस्ट में किसी ब्लाग का नाम, किसी ब्लागर का नाम जो भड़ास का मेंबर न हो, न लिया जाए। हम लोगों के लिए भड़ास निकालने के ढेर सारे बिंदु अभी बाकी है, क्यों खामखा किसी के मुंह लगा जाए। हर हम लोग अपनी रक्षा हर हालत में करेंगे, एकजुटता के साथ, यह वादा है। भड़ास को हम कई हिस्सों में बांट सकते हैं जैसा आर्थिक भड़ास, राजनीतिक भड़ास, सांस्कृतिक भड़ास, देसज भड़ास, शहरी भड़ास, व्यंग्य भड़ास, गुस्सा भड़ास....और आप पाएंगे कि हमने अभी कई सेक्शन पर कुछ लिखा ही नहीं।
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सीनियर ब्लागरों को विशेष आभार....
मैं अंत में उन ढेर सारे वरिष्ठ ब्लागरों को दिल से शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुश्किल घड़ी में हम भड़ासियों का साथ दिया और हौसला बंधाया। मैं उन लोगों की सलाह पर ही इस विवाद को यहीं विराम देता हूं। साथी बोधिसत्व, अभय तिवारी, दिलीप मंडल, संजय तिवारी, मसिजीवी, अशोक पांडे, अरुण अरोरा, प्रमेंद्र प्रताप सिंह.....समेत ढेरों ऐसा ब्लागर साथी हैं जिनके लिखे, कहे से मैं प्रेरणा पाकर यह सारा झगड़ा खुद अपनी तरफ से खत्म कर रहा हूं।
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मनीषा पांडेय जी, हम भड़ासी बिना शर्त माफी मांगते हैं
मैं बेदखल की डायरी वाली मनीषा पांडेय से कहना चाहूंगा कि अगर हमारे बार-बार सफाई देने के बावजूद उन्हें यह लगा कि भड़ास ने उनकी भावनाओं को दुख पहुंचाया है, खिल्ली उड़ाई है, टारगेट कर लिखा है, बदनाम करने की साजिश की है....तो मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं। हम लोगों की कभी ऐसी मंशा नहीं रही। हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी लड़ाई के साथ खुद को जोड़कर देखते हैं। ऐसे में हम किसी भी आम खास महिला साथी को टारगेट बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो कुछ सब हुआ वो गलफहमी व संवादहीनता के चलते हुआ। मैं इसी के साथ विश्वास दिलाता हूं कि भड़ास में जो कुछ छपा है, कहा गया है, उसके पीछे कतई आप नहीं थीं। आपके लिखे पर मुझे जो कुछ कहना था मैं उन्हीं दिनों एक पोस्ट के जरिए आपको संबोधित करते हुए आपके आरोपों के जवाब में कह दिया था। उसके बाद आपको टारगेट नहीं किया गया। यह दुर्योग था कि उन्हीं दिनों मुंबई के एक लैंगिक विकलांग साथी ने अपना ब्लाग शुरू किया और कुछ पोस्टें भड़ास पर भी डालनी शुरू कीं, और वो साथी ये काम डा. रूपेश के सहयोग से कर रहीं थीं। आपसे विवाद के बहुत पहले से मुंबई की उस लैंगिक विकलांग साथी के नाम का जिक्र डा. रूपेश अपनी पोस्टों में करते रहे हैं, ये बात हम लोगों ने कई बार कही है।
खैर, अब सफाई देने का वक्त नहीं है, और माफी मांगते समय सफाई देनी भी नहीं चाहिए। माफी के साथ कोई शर्त नहीं होती सो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं और आपकी गरिमा का सम्मान करते हुए आपकी मेधा की भूरि भूरि तारीफ करते हैं। अब तो ये कहने का वक्त है कि अगर दिल में कोई मलाल हो तो, प्लीज... उसे निकाल दीजिए। आपके लिखे का मैं हमेशा कायल रहा हूं, और रहूंगा, वैचारिक मतभेद तो होते रहते हैं लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। उम्मीद है, भूल चूक लेनी देनी को माफ करते हुए आप मुझ अज्ञानी मूरख समेत सारे नासमझ भड़ासियों को भी क्षमा कर देंगी, जिनके मन में किसी के लिए कोई पाप नहीं होता है और जो होता है वो सबके सामने होता है। आपकी माफी के इंतजार में....यशवंत
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अंत में भड़ासियों के लिए संदेश
हे प्यारे भड़ासियों, अब मस्त रहिए, डटे रहिए, किसी दूसरे के ब्लाग को न देखिए। भड़ास पर आप लिखते रहिए, आपस में लड़ते रहिए, आपस में सुलह करते रहिए, हम खुद ही इतनी संख्या में हैं कि हमें लड़ने के लिए भड़ास के बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है लेकिन अगर बाहर से भड़ास को चुनौती मिलती है तो हम सब मिलकर नाक तोड़ देंगे, इसकी गारंटी करिए। ये जंग थी, जिसमें न कोई हारा है न कोई जीता है। जैसे को तैसा वाले अंदाज में बातें की गईं हैं। लेकिन अब इसे खत्म करना चाहिए। बहुत हुआ।
और मैं ये चैप्टर अब बंद करता हूं। आपसे भी अनुरोध करता हूं कि कोई भी साथी अब अपनी पोस्ट में पीछे हुए किसी विवाद का कोई जिक्र नहीं करे। और हो सके तो हमें अपने विरोधियों, दुश्मनों से भी माफी मांग लेनी चाहिए तो वो अपनी महानता कायम रख सकें और हम हारे हुए लोग फिर हारकर जीने का सुख ले सकें। जीने का मजा इसी में है प्यारे.....
अंत में मेरी प्रिय लाइन...
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
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जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: खत्म, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीश, मनीषा पांडेय, विवाद, समाप्त, स्त्री
29.2.08
सस्ती शोहरत कमाने के टोटके और मनीषा पांडेय
भाई लोग,जो लोग भी किसी स्त्री के मोबाइल नंबर को कच्छे-बनियान की तरह छिपा कर रखने की बात कर रहे हैं वे लोग स्त्री को दोयम दर्जे पर रखना चाहते हैं वरना जो लड़की खुद नहीं डर रही है आप सब उसे क्यों फ़ीमेल-फ़ीमेल कर के कुछ अलग सा महसूस करवाना चाहते हैं । रही बात डा.रूपेश की तो उन्हें किस बात का डर होगा वो तो पैदाइशी नंगे हैं और अंदाज़ फकीराना है ,चौबीस घंटे में एक टाइम खाना खाने वाले को क्या पैसा ,क्या प्रसिद्धि खोने का डर ? मैं अल्लाहताला से शिकायत रखती हुं कि उन्हें मेरा बेटा बना कर क्यों नहीं भेजा ? जो बंदूक की गोलियों से नहीं डरता उसे कौन धमका सकता है ,मेहरबानी करके यशवंत भाईसाहब उनकी वकालत न करें इस मुद्दे पर । मुझे पक्का यकीन है कि यह मनीषा पांडेय नाम की लड़की जो है वह मात्र औरत होने का नाजायज़ फायदा ले रही है और सस्ती शोहरत कमाने के टोटके आजमा रही है । उस पर ध्यान देकर उसका भाव मत बढ़ाइए । मनीषा दीदी को तो मैं भी जानती हूं और अब मैं खुद अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर रही हूं ,मेरा नंबर है - ०९८९२८०९६९२
यशवंत भाईसाहब मेहरबानी करके मेरा नंबर न हटाएं ।
भड़ास ज़िन्दाबाद
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मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ
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Labels: डा. रूपेश, धमकी, भड़ास, मनीषा पांडेय, विवाद
मुझे तो कई बार फ़ांसी की सजा होनी चाहिए
डरे हुए,सत्ता हिल जाने के कारण,मठाधीशी खतरे में आ जाने की वजह से बौखलाए हुए लोग ऐसी ही प्रतिक्रिया कर सकते हैं । आवाज को दबाने के लिये इस तरह की हरकतें तो हमेशा से होती आयी है । आज अभी हाल ही में मुझे मनीषा पांडेय जी की तरफ़ से मेरे मोबाइल पर फोन आया कि उनके परिवार से सारे लोग मुंबई में हैं सभी एडवोकेट हैं वगैरह वगैरह ..... आप लोग मुझे बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं, मेरे मम्मी-डैडी आपके साथ जाकर मनीषा से मिलेंगे.......(बहन लिखती हिन्दी में हैं और अंग्रेजी बोलने में विशेष गर्व महसूस करती हैं शायद अंग्रेजी में प्रखर अभिव्यक्ति हो सकती है उनका मानना हो ) ...... उन्होने अजीब से अंदाज में बोला कि मेरे पास आपका मोबाइल नंबर है अब मैं आपको बताती हूं कि मैं क्या करती हूं (क्योंकि मैंने उन्हें यह कहा कि अब तो मैं मनीषा दीदी से तभी किसी को मिलवाऊंगा जब मेरी लिखी हालिया पोस्ट की शर्तों में से कोई एक शर्त उन्हें मंजूर हो ,मैंने यह भी कहा कि अगर आपको मंजूर नहीं है तो आप मुझे जाहिल ,गंवार,अनपढ़,उजड्ड जो चाहें मान लीजिए ; क्योंकि बहन तो भड़ास देखने को भी राजी नहीं थीं तो मैंने कहा तो मैं आपसे बात करने को राजी नहीं हू )...... हो सकता है कि उन्होने मुझे यह बात साधारण ढंग से कही हो पर भाई हम तो डर गए और हाथ पांव सब कांप रहे हैं ,टाइप करने में भी हवा तंग है कि कब पुलिस हथकड़ियां लगा कर जेल में न डाल दे कि पूरे देश में एक ही तो मनीषा है और तू उस महान लेखिका,महानतम ब्लागर के नाम की बेइज्जती कर रहा है तुझे तो कई बार फ़ांसी की सजा होनी चाहिए । लेकिन हो सकता है कि इससे पहले ही हार्ट अटैक से मेरी मौत हो जाए तो भाई लोग आज से ठीक तेरह दिन बाद आप सब लोग मेरी त्र्योदशी में आमंत्रित हैं क्योंकि मेरा तो कोई मेरे बाद निमंत्रण देने वाला भी नहीं है...........
अब तो जय भड़ास लिखने में भी डर लग रहा है पर डरते-डरते ही सही लिख रहा हूं । चलो भाई-भैन लोग गुड बाय नर्क के ग्राऊंड फ़्लोर पर सारे भड़ासी मिलेंगे मैं सबसे पहले वहां पहुंचने वाला हूं आप सब की अगवानी का इंतजाम करके रखूंगा.....
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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