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13.6.08

डा. रूपेश के चेहरे से घूंघट उठा रहा हूं


आप लोगों ने डा. रूपेश जो को खूब पढ़ा, खुब सुना पर उन्हें आज तक देखा न होगा। मैंने भी न देखा था पर जब मुंबई गया था तो उनसे मिला तभी देख सका। आवाज ऐसी की जैसे बूढ़े बाबा लगते हों, लिखते ऐसे हैं जैसे दादा जी हों पर शक्ल ऐसी है जैसे बेटू जी हों।
आज इंडिया न्यूज मैग्जीन में डाक्टर साहब की तस्वीर देखी। इस मैग्जीन में मनीषा दीदी की भी तस्वीर है। इस मैग्जीन ने अबके अंक (20 जून 2008 ) में द थर्ड सेक्स नाम से कवर स्टोरी करी है। इसमें हिजड़ा समाज की दिक्कतों, उनकी परेशानियों, उनकी भावनाओं, उनके सुखों, उनके सपनों को संजोया गया है। जब मैं मैग्जीन पढ़ रहा था तो डाक्टर साहब की फोटो देखकर तुरंत फोन किया और कहा कि भइये, अब फोटो भेज दो मेरे पास ताकि मैं आपकी शक्ल अपने भड़ासी भाइयों को भी दिखा सकूं।
उनसे अनुरोध करता हूं कि वो मनीषा दीदी, जो हिंदी की दुनिया की पहली लैंगिक विकलांग ब्लागर हैं, की भी तस्वीर भेज दें ताकि उन्हें हम ससम्मान भड़ास पर प्रकाशित कर सकें।
इंडिया न्यूज मैग्जीन में वंदना भदौरिया ने जो कवर स्टोरी की है उसमें डाक्टर रूपेश की एक कविता है और उनकी फोटो के साथ उनके बारे में लिखा गया है। उनके बारे में जो लिखा गया है उसे मैं हू ब हू यहां पेश कर रहा हूं.....
यशवंत
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क्योंकि मैं हिजड़ा हूं
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ए अम्मा, ओ बापू, दीदी और भैया
आपका ही मुन्ना या बबली था
पशु नहीं जन्मा था समाज में
आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
कोख की धरती पर आपने ही रोपा था
शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे ने
नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई
फलता भी पर कटी गर्भनाल,
जड़ से उखड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं
सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज
मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में
जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के पंख लिए आप
उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर
फिर मैं ही क्यों पंखहीन
बेड़ी में जकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है
चाचा, मामा, मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं
ममता, स्नेह, अनुराग और आसक्ति पर
मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान
साफ स्वच्छ, निर्लिप्त हर कलंक से
हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं
ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको
चल बोल नहीं सकता, साइंटिस्ट है
और मैं?
सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर
इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं
मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित
बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ
आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है
हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं
पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी;
मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

(लैंगिक विकलांग मनीषा दीदी के लिए ये पंक्तियां डा. रूपेश श्रीवास्तव ने
पिरोई हैं)

कविता में बयां दर्द
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मुंबई के रूपेश श्रीवास्तव पेशे से चिकित्सक हैं। वे किसी एनजीओ से नहीं जुड़े हैं। भारत में किन्नरों के लिए गंभीरता और संजीदगी से काम करने वाले वह ऐसे शख्स हैं जो इस बात के लिए कतई राजी नहीं थे कि हम उनकी तारीफ में कुछ भी लिखें। लेकिन हमारा और आपका उनके बारे में जानना बहुत जरूरी है ताकि उनके कार्यों से सबक ले कर मुंबई की अंधेरी गलियों में बेसहारा और बेबस लैंगिक विकलांगों की मदद के लिए कुछ और हाथ आगे बढ़ें। किन्नर, हिजड़ा या सही मायनों में कहें तो लैंगिक विकलांग के दर्द, छटपटाहट, अधूरेपन को न केवल रूपेश श्रीवास्तव ने शिद्दत से महसूस किया है बल्कि उस दर्द और छटपटाहट को सहलाया भी। उनके अधूरेपन को भरने के लिए रूपेश के प्रयास बहुत कारगर साबित हुए हैं। मुंबई में कई लैंगिक विकलांग को पढ़ा लिखाकर वे उन्हें समाज का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अपनी इस कोशिश में रूपेश समाज और सरकार के व्यवहार से बहुत आहत हैं। उनका मानना है कि लैंगिक विकलांगों के लिए मीडिया का व्यवहार भी सौतेला ही रहा है। कभी किसी ने उनके हक की बात उठाने की कोशिश भी नहीं की। कभी उनके जीवन को खंगालने का प्रयास भी नहीं किया। लैंगिक विकलांगों के लिए काम करते हुए रूपेश ने उनके भीतर की खूबसूरती को काफी करीब से देखा है। उनकी योग्यता को समझा और सराहा है। उसे तराशने की कोशिश की है। रूपेश की उपरोक्त कविता लैंगिक विकलांगों के दर्द की नंगी तस्वीर है।
(कवर स्टोरी द थर्ड सेक्स का पार्ट)

-वंदना भदौरिया (संवाददाता, इंडिया न्यूज, साप्ताहिक पत्रिका)

11.6.08

डाक साहब, लीजिए फिर आई आपकी नीलोफर- फड़फड़ाती, गरियाती हुई

अपने डाक्टर साहब, रूपेश श्रीवास्तव जी, सर्वे भवंति सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः वाले आदमी। जड़, चेतन, जगत, अदृश्य, नश्वर, अनश्वर सबकी फिक्र करने वाले, बस अपनी छोड़ के। अपनी क्या, जी ही लेंगे। बाल बढ़ गए, लाओ घर में रखी कैंची से ही काट लें। क्या होगा, किसी साइड का छोटा, किसी साइड का बड़ा हो जाएगा। इससे क्या होगा। लोग बुरा मानेंगे। मानने दो। लोगों के बुरा मानने से क्या होता है, कुछ नहीं होता, सिर्फ लोगों का टाइम खराब होता है, अपना तो कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि और मस्त रहते हैं।

जूता फट गया। लाओ खुद सी लें। जब मोची भइया सी सकते हैं सुई धागा से तो हम काहे नाहीं। घर में रखा सूजा और धागा मिलाकर बैठ गए सिलने। रात में जब फोन करो, सो गए क्या डा. साहब? तुरंत खनकती आवाज आती है, नहीं मैं सोता कहां हूं, कई बार जगते हुए दिखे लोग सोते रहते हैं और कई बार सोए लोग जगे रहते हैं। ये तो देखने वाले की दृष्टि है।

जहां जो दिखा मुसीबत में उसी के संग हो लिए, उसी के लिए लड़ने लगे। दुखियों, पीड़ितों, परेशाहालों की जैसी मदद संभव हुई की। नकली शराब विक्रेताओं से निपटने के लिए उनकी शराब खरीदकर बहानी शुरू कर दी। जब शराब माफियाओं को पता चला तो हमला बोल दिया इन पर। धूल झाड़ पोंछकर फिर उठ खड़े हुए। चल पड़े।

बिल्डर के बनाए फ्लैट में दरारें आ गईं और पार्किंग की जगह न होने पर सवाल उठाया तो बिल्डर ने शिवसेना वालों को आगे कर धमकाना शुरू कर दिया। डाक्टर साहब ठहरे पगले, उन्होंने कहा कि आ जाओ बेटा, यहीं हूं। बिल्डर ने पूरी बिल्डिंग की पानी रोक दी और कहा कि डाक्टर को भगाओ तो पानी सप्लाई करेंगे। डाक्टर साहब बन गए हनुमान और बिल्डिंग के दर्जनों घरों में बड़ी बड़ी बाल्टी (बल्कि बाल्टों) से ले जाकर पानी भर दिया और आश्वस्त किया कि बिल्डर केवल दरार डालना चाह रहा है हम लोगों की एकता में ताकि उसकी बनाई बिल्डिंग की दरार किसी को नजर न आ सके और उस पर कोई सवाल न उठा सके। आखिरकार मोहल्ले के लोग डाक्टर साहब से दूर न हुए, बिल्डर को भीगी बिल्ली बनकर आना पड़ा।

ये सब बातें इसलिए नहीं लिख रहा हूं क्योंकि मुझे तेल लगाने का शौक है। इसलिए लिख रहा हूं कि ये जो अनाम नागिन नीलोफर है ना, जो अपनी पहचान छिपाकर इतनी रीयलिस्टिक बातें बोल रही है जैसे वो तस्लीमा के ठीक बाद उनका उत्तराधिकार लेने वाली हो। नीलोफर लिखती है...दुनिया के इस छोर से वहां तक बरास्ते समुद्र गए अजगर इंटरनेट केबिल के किसी एक तार के किसी हिस्से में मेरे या आपके ई-पते या पासवडॆ का अस्ित्तव एक बिंदु, एक स्फुरण से ज्यादा कुछ नहीं होगा। वहां हमारा सूक्ष्म है स्थूल नहीं। । सही लिखा, लेकिन उसे नहीं पता कि सूक्ष्म और अति सूक्ष्म के रिवर्स स्थूल और महा स्थूल और मानव और महा मानव भी होता है और ये दोनों एक ही परिघटनाएं हैं। सूक्ष्म या घटिया ही स्थूल या महान हो जाता है और महान या स्थूल ही घटिया या सूक्ष्म हो जाता है। दोनों में कोई दिक्कत नहीं है।

ये सूक्ष्म सा रिश्ता ही आज डा. रूपेश और मेरे जैसे भड़ासियों के लिए एक महान रिश्ता बन गया है। इसकी शुरुवात सिर्फ पासवर्ड, इंटरनेट, ई-पते से ही हुई थी। लेकिन जब हम एक दूसरे से मिले तो लगा, अरे, ये तो अपना सुधरा हुआ रूप है, दूसरे ने कहा, अरे ये तो अपना बिगड़ा हुआ रूप है। और हम मिलकर पूर्ण हो गए। जितना जाने, कम ही जाने, जितना जान लिया, बहुत जान लिया।

दिक्कत दृष्ठि, सोच, आत्मा और ऊंचाई का है। कितना विशाल हृदय व मस्तिष्क है आपका। तो नीलोफर, ये सब आप न समझ सकेंगी क्योंकि आपका एप्रोच सैडिस्ट है। क्योंकि आपकी जिंदगी दूसरों की जिंदगी के निगेशन में है। आप अपने जैसा ढूंढ कर बताइए।

दिक्कत है नीलोफर को। डाक साहब से है। हरे भाई से है। हमसे है। तुमसे है। सबसे है।

और ये दिक्कतें तभी भड़ास के रूप में नीलोफर नाम से बाहर निकलती हैं जब नीलोफर के पूर्व का व्यक्तित्व व नाम विलीन हो जाया करता है, जो कि असली नाम व व्यक्तित्व है, पर उस व्यक्तित्व की जाने क्या मजबूरियां हैं जो उसे खुद के अस्तित्व के साथ इन दिक्कतों को प्रकट करने से रोकती है।

नीलोफर को दिक्कत है। वो इसलिए है कि उसे भड़ासियों ने इंटरटेन करना शुरू कर दिया।

किसी को लगा कि अरे देखो, कितनी बड़ी भड़ासिन आई है ये, ये तो रियल भड़ासी है:) कुछ लोग लगे स्वागत करने, आहा...लड़की है, साफ बोलती है, बढ़िया लगती है, लाओ शामिल कर लो अपनी मंडली में:}

और ये सब पहली बार नहीं हुआ है।

शुरू से होता आया है भड़ास के साथ।

जहां कोई अनाम या नामधारी स्त्री, लड़की, महिला आई नहीं कि हम भाई बंधु लगते हैं बल्ले बल्ले करने और उसे तरह तरह से रिझाने, समझाने, पुचकारने। और मैं भी ये करता हूं, मतलब ये फटकार मुझे खुद को भी है :)

........अरे यार, आई है तो आने दो। उसका मन किया कमेंट करने का, करके जाने दो। काहें उसे भाव देते हो। एक तो अनाम, दूसरे न शक्ल-सूरत। मतलब, पूर्ण अदृश्य। और बातें हो रही हैं ब्रह्मांड, योनि, परमाणु बम, बहन, केबिल....जाने क्या क्या। सामने आओ तो बात बने। तो बात करें।

इन अनामों से तो हमेशा से मुझे चिढ़ रही है। ये अनाम लोग बिना नाम के तो इतनी बड़ी बड़ी बातें करेंगे कि लगेगा कि दर्शन उनके हर रोएं रोएं से बरस रहा है। या फिर अनाम नाम से दूसरे किसी नामधारी रूपधारी को लगेंगे गरियाने, दे तेरी की, मांकी, आंखकी, कानकी.....। लेकिन जब नाम के साथ सामने आएंगे तो लगेंगे हिनहिनाने...ये नहीं, वो नहीं, अभी नहीं, तब नहीं, आपका, उनका, जी हां, हां जी, यस सर, नो सर, बिलकुल सर, उचित है, अनुचित है, धैर्य है, अधैर्य है, ये है, वो है, क्रांति है, महिला है, भ्रांति है, शांति है, अराजक है, सर्जक है, चिंतक है, गधा है, उल्लू है, लड़वा है, लहसुन है, चूतिया है, चील है, कौव्वा है, लोकतंत्र है, रेशनल हैं, लाजिकल हैं.....टाइप की बात करने।

पर हम भड़ासी ऐसे नहीं है। एक तो हम जो हैं साफ साफ हैं, नाम से हैं, शक्ल सूरत से हैं, सबके सामने हैं, बुरे हैं तो सामने हैं, अच्छे तो खैर कभी रहे ही नहीं.....गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना टाइप के।

तो ये जो नीलोफर हैं, तस्लीमा की कथित उत्तराधिकारी, उन्हें तभी तस्लीमा का असली उत्तराधिकारी माना जाएगा जब वो अपने असली नाम, पहचान, गांव, घर के साथ हाजिर होंगी। क्योंकि तस्लीमा को यही सब कहने का इस मर्दवादी दुनिया ने कितना बड़ा दंड दिया और अब भी दे रही है। लेकिन वो तस्लीमा रीयल की हीरो है अपन लोगों की जो किसी सत्ता, शासन, मर्द, वर्द की परवाह नहीं करती। चाहों लाठी मारी, चाहे भगाओ, चाहे कुर्सी तोड़ो, चाहे वेश्या कहो, चाहे अधर्मी करार दो...वो जीवट की महिला अपनी बात पर कायम रहेगी, मुश्किलें झेलती रहेगी।

इस औरत को दिल से चाहता हूं मैं। उसे चूमता हूं मैं। उसे प्यार करता हूं मैं। उसे मैं असली भड़ासी मानता हूं।

वो मर्दों की इस दुनिया में असली औरत है। बाकी में से कुछ तो अपनी योनियों और अपनी छातियों का खुलकर इस्तेमाल करतीं हैं, अलग अलग हालात व हालत के चलते और कुछ इन्हें बचाती छिपाती लिए फिरतीं स्त्रियां हैं। और कुछ इन दोनों के बीच में है, जहां जैसा मौका देखा, वैसा और ये श्रेणी कथित बौद्धिक महिलाओं के लिए ज्यादा फिट होती है।

मतलब, इन तीनों ही कैटगरी में महिलाओं के लिए मुख्य उनकी योनि और उनकी छाती आदि ही हैं। वे चाहें जितनी बौद्धिक बातें करें।

लेकिन तस्लीमा, किरण बेदी जैसी हजारों हजार महिलाएं अपने नाम और काम के जरिए यह साबित करती हैं कि कोई लड़की तभी तक लड़की मानी जाती है जब तक कि वो अपनी लड़कीपने को जीती है। आप ऐसा क्यों जाहिर करती हैं कि आप लड़की हैं। आपकी बातें, नखरे, अंदाज....सब इस तरह गढ़े गए हैं कि लगता है कि देखो लड़की है। पर अब लड़कियों की जो एक नई ब्रीड आई है वो इन सबसे परे है। उन्हें जैसे एहसास ही नहीं है कि वो लड़की हैं। ये सही शरुआत है। खुद के होने से उबरना ही एक नए होने की शुरुआत होती है।

तो नीलोफर, अगर आप ये बातें अपनी पहचान के साथ कहतीं, तो यकीन मानिए, आप हिंदी ब्लागिंग की ही नहीं, इस देश की इस वक्त की सर्वाधिक तेवरदार महिला नेता होतीं और मीडिया आपके आगे पीछे भागती, लड़कियां आपको रोल माडल मानतीं। लेकिन जाने क्या बंधन है कि इतना अच्छा दिमाग रखते हुए भी आपको छिप के ये सब बातें कहनी पड़ रही हैं। जरूर आप किसी पार्टी के अनुशासन से बंधी है, वो पार्टी राइटिस्ट तो होगी नहीं, लेफ्टिस्ट ही होगी। और ये अनुशासन आप भंग करती हैं लेकिन अनाम नाम से करती हैं। इस प्रकार आपके व्यक्तित्व के द्वंद्व से आपको थोड़े समय के लिए मुक्ति मिल जाती है क्योंकि आपकी भड़ास निकल चुकी होती है और आप हलका महसूस कर रही होती हैं। पर यकीन मानिए, जिस अनुशासन ने आपको अपनी बात कहने के लिए मुखौटा पहनने पर मजबूर किया है, वो अनुशासन आपको जीवन के आखिर में कठमुल्ला बना देगा और आप किसी चौराहे पर खड़ी होकर हर आने जाने वाले को गालियां देंगी क्योंकि चीजें कभी आपके हिसाब से चली ही नहीं। खैर, ये आपका मामला है। हर आदमी को अपने तरीके से जीने का अधिकार है, यह अधिकार सुरक्षित है सभी के लिए। आपने जो छुप छुप के भड़ास निकालने वाली जिंदगी चुनी है, वो आपको मुबारक। पर ये मंच आप जैसे छुपे रुस्तमों के लिए नहीं है। हम आपसे थोड़े उन्नत लोग हैं क्योंकि हम खुलकर भड़ास निकालते हैं। ऐसा कर पाने में आपको और आपकी स्त्री जाति को अभी एकाध सदी तो लग ही जाएंगे क्योंकि हमारा हिंदी समाज बड़ा ही कमीना और काइयां है। लाख खुलेपन और आजादी की बातें करे, साला असल में लगता है शुद्धता और गुणवत्ता मापने। कुछ उसी तरह जैसे सैफ को करीना का गाउन पहनना पसंद नहीं, सैफ का करीना का खुले घूमना पसंद नहीं, ये न करो, वो न करो.....। वैसे साले बातें करेंगे ऐसी कि जैसे इनसे बड़ा विचारक और आजादी समर्थक कोई नहीं है। यही हम हिंदी वालों की हिप्पोक्रेसी है जिसके खिलाफ भड़ास लगातार मुहिम चलाता रहता है बल्कि कहिए कि भड़ास इसी हिप्पोक्रेसी के रिएक्शन में जन्मा और बढ़ा है।

तो भाई, हम भड़ासियों, नीलोफर जी ने तीन चार कमेंट क्या कर दिए, आप लोगों ने इन्हें सिर माथे पर चढ़ा लिया और वो लगातार सिर चढ़कर मूत रही हैं क्योंकि उन्हें भी मजा आने लगा है। आप तो अपने पूरे नाम व पहचान के साथ यहां हैं और वो एक नकली फर्जी नाम से लिख रही हैं। तो उन्हें तो बड़ा मजा आ रहा है कि डाक्टर रूपेश, जो बहन बोल दिए तो उन्हें डांटकर कह दिया कि, हे डाक्टर सुनो, कोई बहन वहन नहीं। जब डाक्टर साहब ने थोड़ा और दुलराया तो नीलोफर ने दांत और जीभ से चिढ़ाते हुए डाक्टर साहब से कहा नितंब- तंब, तंब, तननन अनंब, अनंब। स्तन- तुम तनतनननना। जांघे-एघें गें-घें (यकीं न हो तो नीचे वाला कमेंट पढ़ लें) और ये सब डाक्टर साहब को झेलना होगा क्योंकि डाक्टर साहब ने एक अनाम को इतना मान दिया पर उस अनाम के पास खोने के लिए कुछ नहीं है क्योंकि जो दृश्यमान नहीं है उसके सामने तो खुला आकाश है। जितना चाहें बकचोदी करो, आपकी पहचान जानने वाला कोई नहीं और अगला जिसके लिए बकचोदी की जा रही है बेचारा सोचेगा कि कहां फंस गए।

पर नीलोफर जी जान लीजिए, डा. सुभाष भदौरिया के शब्दों में, विष कन्याओं के वश में भाई भड़ासी आ जाते हैं पर ये भड़ासी भी पहुंचे हुए संत हैं, समय से सीख लेकर इन विष कन्याओं से छुटकारा पा ही लेते हैं।

आप अपनी जांघों, नितंबों, योनियों आदि को लेकर अचार डालिए और अपने पास रखिए। हम रुखे सूखे अकेले ही सही।

मुझे पता है कि इस पोस्ट के बाद तुम्हारी गरजती गरियाती हुई पोस्ट आएगी लेकिन अफसोस, उसे छापने के लिए तुम्हें कोई फर्जी ब्लाग बनाना होगा, कठपिंगल की भांति और उस पर ढेर सारा मसाला लेपन करके सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करना होगा.......जैसे...यशवंत ने किया अपनी मां से बलात्कार, यशवंत ने की अपनी बेटी से छेड़छाड़....यशवंत फिर गया जेल, कोर्ट से जमानत नहीं मिली....टाइप की हेडिंग लगाकर। क्योंकि तुम लोग जनता को मूर्ख समझते हो, उसे मीडिया की भांति हाइप क्रिएट करके बरगलाना चाहते पर भाई, ये पब्लिक है, सब जानती है।

नीलोफर का आज से कोई कमेंट इस ब्लाग पर नहीं आएगा क्योंकि एक तो हम अनाम लोगों से वैसे ही चिढ़ते हैं, दूसरे किसी अनाम के लफ्फाजी भरे कमेंटों को दो चार बार से ज्यादा इंटरटेन करना पूर्ण चूतियापा है।

उम्मीद है, भड़ास संचालक मंडल मुझे माफ करेगा, तल्ख और खरी खरी बात कहने पर। पर क्या करूं, कई दिन से देख रहा तमाशा, आज भड़ास के रूप में बाहर निकल आया।

नीलोफर, तुमसे माफी नहीं मांगूंगा क्योंकि तुम्हारा कोई वजूद ही नहीं, तुम मर्द हो, स्त्री हो, हिजड़ा हो, जानवर हो, पौधे हो.....क्या हो, हमें नहीं पता। इसलिए इस हवा हवाई इंटरनेटीय दुनिया में अनाम चीजों को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है क्योंकि इस तरह की अनाम चीजें अरबों खरबों की संख्या में यहां वहां बिखरी पड़ी हैं औ उन्हें कोई घास नहीं डालता। यही अनामों व उनके द्वारा लिखे गए का हश्र होता है। ये तो हम लोगों का, डा. रूपेश का, हरे भाई का, रजनीश के झा का बड़प्पन था कि उन्होंने आपको अनाम होते हुए भी इतना इंटरटेन किया और आपके कमेंटों को ससम्मान बड़ी बड़ी हेडिंग के साथ पेश किया।

यशवंत सिंह

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(नीलोफर की मूल टिप्पणी)

[भड़ास] New comment on नीलोफ़र की एक और खनखनाती हुई टिप्पणी सादर कर रहा हू....

nilofar has left a new comment on your post "नीलोफ़र की एक और खनखनाती हुई टिप्पणी सादर कर रहा हू...":

प्रिय डाक्टर,

नितंब- तंब, तंब, तननन अनंब, अनंब।
स्तन- तुम तनतनननना।
जांघे-एघें गें-घें

इन शब्दों का उच्चारण अजब, सेसुअस, फोनेटिक सांगितिक विस्तार में लिपटी प्रतिक्रियाएं जगाता है न। जिन्हें मुझे कहना होगा ताकि आप जान-सुन सकें। जानिए। हिंदी फिल्मों में ज्यादतर आइटम गानों में, आइटम बाला ही अपने अंग-उपांगों का ब्यौरा क्यों देती है ? ( कजरारे-२ मेरे कारे कारे, मेरा लंहगा बड़ा है मंहगा, मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने वगैरा) शायद इसलिए कि जब औरत अपने अंगों का ब्यौरा दे तो लगता है कि अपनी दूकान के आइटमों का विग्यापन कर रही है। इस तकनीक का इस्तेमाल पुरूष में फतांसी जगा पाने के लिए अनिवार्य उपलब्धता-बोध इंजेक्ट करने के लिए किया जाता है। खैर किसी को भी उसके लैंगिक पहचानों से अलग कर के देखना असंभव है।

यहां अमेरिका में भी हिलेरी िक्लंटन जो प्रेशिडेंसियल रेस में पिछड़ती लग रही है को कार्टूनों में योनि में ही परमाणु बम छिपाया दिखाया जा रहा है, और कोई जगह माकूल नहीं मिली। नारीवाद के मदीना अमेरिका में हिलेरी जैसी ताकतवर औरत का चित्रण भी वैसा ही किया जा रहा है जैसा हमारे यहां थोड़ी फूहड़ किंतु बेहद लोक प्रिय लोक कथाओं में भेड़ों, सूयॆ, चंद्रमा, आदमी वगैरा को अपने गुप्त कोटरों में छिपा लेने वाली चरवाहिनों या पराकामुक िस्त्रयों का किया जाता रहा है तो फिर क्या कहा जाए।

खैर मेरा मतलब सिफॆ अपनी अस्िमता और वैचारिक पहचान से है। हम नेट के आभासी अंतरिक्ष में सिफॆ विचार ही तो हैं। कहां के भाई और कहां की बहन। दुनिया के इस छोर से वहां तक बरास्ते समुद्र गए अजगर इंटरनेट केबिल के किसी एक तार के किसी हिस्से में मेरे या आपके ई-पते या पासवडॆ का अस्ित्तव एक बिंदु, एक स्फुरण से ज्यादा कुछ नहीं होगा। वहां हमारा सूक्ष्म है स्थूल नहीं।

फिर भी पता नहीं क्यों तुम्हें कर्मवती की चुटिया में बंधा हुमांयू छाप सेकुलर लाल रिबन कहने का मन हो रहा है। आशा है बुरा नहीं मानोगे। मान भी जाओ तो क्या...........।

Posted by nilofar to भड़ास at 11/6/08 3:37 PM


नीलोफर विवाद से जुड़ी पिछली पोस्टें पढ़ने के लिए क्लिक करें...

एक और खनखनाती टिप्पणी

और

बड़ी प्यारी सी मजेदार...

17.4.08

दशानन देसाई के तीनों फोन नंबरों पर एक बार खतरे की घंटी जरूर बजाइये, थोड़ी गांधीगिरी आजमाइये

....उस सुअर अधिकारी का नाम, पता और टेलीफोन नं. लिखने को कहा है कि अगर हो सके तो उसे गांधीगिरी करते हुए फूल और गिफ़्ट भेजिये उसके कमीनेपन के व्यवहार के लिये धन्यवाद करिये-------

नाम : ए.के.देसाई
पद : चीफ़ आफ़िसर(मुख्याधिकारी)
पता: पनवेल नगर परिषद,जिला रायगढ़(नई मुंबई)-४१०२०६
फोन: ०२२-२७४५५७५१(आफ़िस)
०२२-२७४५२२०६(निवास)
०९३२४९८३३४४(मोबाईल)

Posted by मोहम्मद उमर रफ़ाई
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उपरोक्त बातें नीचे की एक पोस्ट से ली गई हैं जिसमें बताया गया है कि किस तरह एक बददिमाग अफसर देसाई ने सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) को हथियार बनाकर जनता की लड़ाई लड़ने वाले, सामाजिक सरोकारों वाले, जनता के पक्ष में हर हाल में खड़े होने वाले मशहूर आयुर्वेदिक डाक्टर और भड़ास के माडरेटर डा. रूपेश श्रीवास्तव के साथ सरेआम आफिस में बदतमीजी की और अपने सहकर्मियों को डाक्टर साहब की बेइज्जती करने के लिए उकसाया। अब्बा जान मोहम्मद उमर रफ़ाई भी उस वक्त डाक्टर साहब के साथ थे, जब ये बदतमीजी की जा रही थी।

मैं जब मुंबई गया था तो उस समय मैंने खुद देखा था कि किस तरह नवी मुंबई के इलाकों के विकास के नाम पर ठेकेदार, बिल्डर, अफसर, नेता, अपराधी गठजोड़ बनाकर पैसे हड़प रहे हैं। अगर इनके किये पर कोई आवाज उठाता है तो उसे ये गठजोड़ डरा धमका कर चुप कराने की कोशिश करता है। पर डाक्टर साहब ठहरे कफन बांधकर घूमने वाले औघड़, सो इन पर किसी की धमकी का कोई असर ही नहीं होता और अपने काम में ये जुटे रहते हैं।

देसाई ने जो कुछ किया वो अनपेक्षित नहीं है क्योंकि मीडिया हाउसों ने अपनी और अपने पत्रकारों की हालत ऐसी बना ही दी है कि कोई भी अफसर या नेता अब पत्रकार को दलाल से ज्यादा मानने को तैयार ही नहीं है। इसी कारण अगर देसाई ने डा. रूपेश के तेवर के आगे घबराकर आंय बांय सांय बकबका दिया हो तो कोई नई बात नहीं है। उसे तो यह भरोसा रहा होगा कि हर पत्रकार की तरह डाक्टर रूपेश भी ले देकर सेट हो जायेंगे पर रूपेश जी ठहरे बाल की खाल निकालने वाले, सो वह बेचार डाक्टर साहब के उकसावे में आ गया और लगा बकबकाने। बस उसने यही गलती कर दी। अब गलती कर दी तो उसे भुगतना भी होगा।

उपर देसाई का जो आफिस, घर का लैंडलाइन फोन नंबर दिया गया है और उसका खुद का पर्सनल मोबाइल नंबर दिया गया है, उस पर सभी भड़ासी एक बार फोन करें, और उसे कहें कि हिंदी पत्रकारों के सबसे बड़े ब्लाग भड़ास के माडरेटर डाक्टर रूपेश के साथ जो तुमने किया है, वो तुम्हारी वाट लगवाने के लिए काफी है और जल्द ही तुम्हारी वाट लगेगी। दिल्ली के पत्रकार शरद पवार से मिलकर महाराष्ट्र के ऐसा घटिया अफसर को तुरंत सस्पेंड करने की मांग करेंगे और अगर यह मांग नहीं मानी गई तो मुंबई दिल्ली के सभी पत्रकार मिलकर शरद पवार के घर के सामने धरना देंगे।

तो सभी भड़ासी साथियों, देसाई के फोन नंबरों पर इतनी घंटी बजाओ की उसे तीनों ही नंबर बंद करा देने पडें और किसी सच्चे पत्रकार से पंगा लेने के नतीजे का उसे अहसास हो सके। मैं तो हर दो मिनट में उपरोक्त नंबरों पर फोन करके उसे नमस्कार कर रहा हूं और डाक्टर रूपेश के साथ किए गए बर्ताव की सजा पाने के लिए तैयार रहने को कह रहा हूं। आप भी काम चालू रखें, साथ में सभी भड़ासी भाई हैं। देसाई जैसे कीड़े खुद ब खुद मर जाएंगे। बस इन्हें थोड़ा परेशान करने की जरूरत है।

मेरी मेल पर एक पत्रकार साथी ने कुछ यूं मेल भेजा हुआ है.....

dr.rupesh ke sath hui ghatna par pratikriya

from nitesh pal
nitesh.pal70@gmail.com

to yashwant
yashwantdelhi@gmail.com
date 16 Apr 2008 22:43
subject dr.rupesh ke sath hui ghatna par pratikriya
mailed-by gmail.com

yeshwant ji me indore or bhopal dono hi jagah reporting karta hu. or2no hi jagah rupesh ji ke sath hui ghatanajesi ghatnae aam baat he.lekin indore ke patrkaro ne iska tarika dundh rakha he.pahle latgiri.bad me gandhigiri.
apni awaz sarkar ke mukhiya tak pahuchane ke bad sarwajanik bahiskar.


Reply Forward Invite nitesh to chat


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उम्मीद है कि एक पत्रकार साथी के साथ एक अफसर द्वारा सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगे जाने के एवज में जो बदतमीजी की गई है उसका बदलना लेने को आप सभी पत्रकार साथी गांधीगिरी का रास्ता अपनायेंगे और देसाई के फोन नंबरों पर एक एक बार फोन करके उसे जरूर धन्यवाद देंगे और खुद को भड़ास का साथी बतायेंगे और ये भी कहेंगे कि उसने जो किया है अब पूरी दुनिया भड़ास के माध्यम से पढ़ रही है और उसकी वाट लगने वाली है। जल्द ही देश भर के पत्रकार दिल्ली में शरद पवार से मिलने के बाद धरना प्रदर्शन शुरू करने वाले हैं।

उम्मीद है, ये छोटा सा प्यारा सा काम आप लोग बेहद मजे में कर देंगे, और आपका ये छोटा सा काम हम लोगों के लिए एक बड़ी सफलता का पैगाम लेकर आएगा। बस यूं ही एकजुट बने रहिए, लगे रहिए....

जय भड़ास
यशवंत


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फैलने लगा है राज ठाकरे का जहर

29.2.08

सस्ती शोहरत कमाने के टोटके और मनीषा पांडेय

भाई लोग,जो लोग भी किसी स्त्री के मोबाइल नंबर को कच्छे-बनियान की तरह छिपा कर रखने की बात कर रहे हैं वे लोग स्त्री को दोयम दर्जे पर रखना चाहते हैं वरना जो लड़की खुद नहीं डर रही है आप सब उसे क्यों फ़ीमेल-फ़ीमेल कर के कुछ अलग सा महसूस करवाना चाहते हैं । रही बात डा.रूपेश की तो उन्हें किस बात का डर होगा वो तो पैदाइशी नंगे हैं और अंदाज़ फकीराना है ,चौबीस घंटे में एक टाइम खाना खाने वाले को क्या पैसा ,क्या प्रसिद्धि खोने का डर ? मैं अल्लाहताला से शिकायत रखती हुं कि उन्हें मेरा बेटा बना कर क्यों नहीं भेजा ? जो बंदूक की गोलियों से नहीं डरता उसे कौन धमका सकता है ,मेहरबानी करके यशवंत भाईसाहब उनकी वकालत न करें इस मुद्दे पर । मुझे पक्का यकीन है कि यह मनीषा पांडेय नाम की लड़की जो है वह मात्र औरत होने का नाजायज़ फायदा ले रही है और सस्ती शोहरत कमाने के टोटके आजमा रही है । उस पर ध्यान देकर उसका भाव मत बढ़ाइए । मनीषा दीदी को तो मैं भी जानती हूं और अब मैं खुद अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर रही हूं ,मेरा नंबर है - ०९८९२८०९६९२
यशवंत भाईसाहब मेहरबानी करके मेरा नंबर न हटाएं ।
भड़ास ज़िन्दाबाद

मुझे तो कई बार फ़ांसी की सजा होनी चाहिए

डरे हुए,सत्ता हिल जाने के कारण,मठाधीशी खतरे में आ जाने की वजह से बौखलाए हुए लोग ऐसी ही प्रतिक्रिया कर सकते हैं । आवाज को दबाने के लिये इस तरह की हरकतें तो हमेशा से होती आयी है । आज अभी हाल ही में मुझे मनीषा पांडेय जी की तरफ़ से मेरे मोबाइल पर फोन आया कि उनके परिवार से सारे लोग मुंबई में हैं सभी एडवोकेट हैं वगैरह वगैरह ..... आप लोग मुझे बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं, मेरे मम्मी-डैडी आपके साथ जाकर मनीषा से मिलेंगे.......(बहन लिखती हिन्दी में हैं और अंग्रेजी बोलने में विशेष गर्व महसूस करती हैं शायद अंग्रेजी में प्रखर अभिव्यक्ति हो सकती है उनका मानना हो ) ...... उन्होने अजीब से अंदाज में बोला कि मेरे पास आपका मोबाइल नंबर है अब मैं आपको बताती हूं कि मैं क्या करती हूं (क्योंकि मैंने उन्हें यह कहा कि अब तो मैं मनीषा दीदी से तभी किसी को मिलवाऊंगा जब मेरी लिखी हालिया पोस्ट की शर्तों में से कोई एक शर्त उन्हें मंजूर हो ,मैंने यह भी कहा कि अगर आपको मंजूर नहीं है तो आप मुझे जाहिल ,गंवार,अनपढ़,उजड्ड जो चाहें मान लीजिए ; क्योंकि बहन तो भड़ास देखने को भी राजी नहीं थीं तो मैंने कहा तो मैं आपसे बात करने को राजी नहीं हू )...... हो सकता है कि उन्होने मुझे यह बात साधारण ढंग से कही हो पर भाई हम तो डर गए और हाथ पांव सब कांप रहे हैं ,टाइप करने में भी हवा तंग है कि कब पुलिस हथकड़ियां लगा कर जेल में न डाल दे कि पूरे देश में एक ही तो मनीषा है और तू उस महान लेखिका,महानतम ब्लागर के नाम की बेइज्जती कर रहा है तुझे तो कई बार फ़ांसी की सजा होनी चाहिए । लेकिन हो सकता है कि इससे पहले ही हार्ट अटैक से मेरी मौत हो जाए तो भाई लोग आज से ठीक तेरह दिन बाद आप सब लोग मेरी त्र्योदशी में आमंत्रित हैं क्योंकि मेरा तो कोई मेरे बाद निमंत्रण देने वाला भी नहीं है...........
अब तो जय भड़ास लिखने में भी डर लग रहा है पर डरते-डरते ही सही लिख रहा हूं । चलो भाई-भैन लोग गुड बाय नर्क के ग्राऊंड फ़्लोर पर सारे भड़ासी मिलेंगे मैं सबसे पहले वहां पहुंचने वाला हूं आप सब की अगवानी का इंतजाम करके रखूंगा.....