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7.6.08

बड़ी प्यारी सी मजेदार छिद्रान्वेषी टिप्पणी......

कुछ समय पहले यशवंत दादा मुंबई आए थे अपनी पहली हवाई यात्रा करके जिसे उन्होंने अपने अंदाज में एक पोस्ट के रूप में लिखा था। आप सब ने उसका आनंद लिया था और आज उस काफ़ी पुरानी हो चुकी पोस्ट पर भड़ास पर कुछ समय से दिखने वाली हमारी अघोषित भड़ासी बहन(पूरा यकीन है कि नीलोफ़र इस संबोधन का बुरा न मानेंगी) ने एक बड़ी प्यारी सी मजेदार छिद्रान्वेषी टिप्पणी करी है लेकिन हो सकता है कि एक बहुत पुरानी पोस्ट पर करी गयी टिप्पणी का सब लोग मजा न ले पाते तो मैं इस टिप्पणी को ज्यों का त्यों उठा कर एक पोस्ट के रूप में डाल रहा हूं जरा आप लोग भी नीलोफ़र जी के मजेदार-धारदार-पैने से लेखन का आनंद लें जो कि ओशो(?)को रज्जू कहने का गहरा प्रेम भी अपने आप में समेटे हैं, लीजिये सादर है वो टिप्पणी.....
nilofar has left a new comment on your post "दिल्ली-अहमदाबाद-मुंबईः पहली जहाज यात्रा, पहली मुला...": ॰ दुरूस्त, कि मैं आप की फैन ठहरी पर ये क्या लिखा है कि एयरोप्लेन की खिड़की से मिट्टी-२ दिख रही थी। साल में दो हवाई यात्राएं तो कैलीफोरनिया से दिल्ली की करनी ही पड़ती हैं। मुझे तो कभी मिट्टी नहीं नजर आई। ढाई तीन हजार फीट की ऊंचाई से मिट्टी? कुछ ज्यादा तो नहीं हो रहा। टीएडीए कंपनी से ले लिया न, ठीक हां दुरुस्त आइंदा नैरेशन संभाल के। इसे लिटरेचर जो मैं पढ़ाती हूं, उसमें मिशप्रपोरशन कहते हैं। गोर्की ने बेकरी कहानी में मोमबत्ती की रोशनी में दीवार पर आठ परछाईयां दिखा दी थी जबकि कमरे में सात ही लोग थे। तालस्ताय ने टोका था कि मोमबत्ती लगता है गलत जगह रखी हुई है।॰ पांच-छह गिलास पानी- यू मीन टू से अबाउट टू लीटर्स मेकिंग टाइड्स इन योर स्टमक। रात का अल्कोहल अगर पेट में हो तो उसमें मौजूद यूरिक एसिड के कारण गैस बनेगी ही। उसके कैसे दबाया जाना संभव हुआ या अगर ग्रामीण चतुराई से चेहरे पर मासूमियत मिश्रित, निरविकार भाव रखते हुए हंस अकेला की तरह उड़ जाने दिया गया तो बगल वाले अध्ययनशील शरीफ सज्जन की क्या प्रतिक्रिया रही। इसका ब्यौरा होना ही चाहिए था। हां और हां.....एयर पोर्ट पर कैसे हल्के हुए, हाई सिक्योरिटी के कारण वहां निपुण से निपुण कुत्ते भी ऐसा नहीं कर पाते।॰ संजय और दूसरे वाले ब्लागर जिनका टिफिन आपने खाया उनने क्या खाया। नििश्चत ही प्यार, जो अपने साथ भरपूर मात्रा में ले गए थे।॰ भारत की महिलाएं आपके लिए रोती हैं. यह जानकारी मुझे विभोर करके रूला देने वाली है।थोड़ी जलकुकड़ी हूं, इसलिए मजे-मजे में लिख दिया। इसे विदेशी भाषा से अनूदित, स्वतंत्र अपने से असंबद्ध व्यंग रचना की तरह पढ़े मजा आएगा। सेक्स वाले राइटअप में रज्जू (रजनीश) ने क्या कहा है-अपने से अलहदा होकर खुद के अिस्तत्व को महसूस करना, भोगना यही तो जीने और ब्लागिंग की कला है न। वह टाइम मेरे प्यारे ब्लागर........ जब द्रिष्टी आंख को देखने लगती है।
आशा है कि बहन नीलोफ़र मेरी इस हिमाकत का बुरा न मानेंगी और वे भी आनंदोत्सव में शामिल होंगी जो हर पल भड़ास पर घटित होता रहता है।
सादर
डा.रूपेश श्रीवास्तव

4 comments:

nilofar said...

प्रिय डाक्टर.
बहन कहलाना मुझे खासा नापसंद है, वह भी किसी एशियाई खासतौर से भारतीय के मुंह से।

हर भारतीय मदॆ के भीतर रक्साबंधन का भव्य चित्रण करने वाली फिल्मों के गाने अवचेतन में बजते रहते हैं। यह एक कांप्लेक्स या कहिए सहूलियत बजरिए कांप्लेक्स रास्ते से है। किसी भारतीय की बहन बनना रिश्ते की पवित्रता के पाखंड के नीचे उसके मर्द अधिपत्य को स्वीकार करना है।....पुरूष बहन बनाकर तुरंत बचपन में प्रवेश करता है और वहां जाकर- तुम अपनी दिखाओ मैं अपना दिखाता हूं- खेलने लगता है। यह बड़ा मासूम सा लेकिन इिश्तयालंगेज खेल है जो भविष्य के जीवन पथ का संकेत देता है।

कुंठित प्रतिबंधों के बीच बहन कहने का सिलसिला तो आजादी के आंदोलन यानि शराब की दुकानों के आगे गांधी प्रेरित पिकेटिंग वगैरा के दौर में शुरू हुआ वरना उससे पहले तो मां कहकर पोटते थे। मात्रिवत परदारेषु- दारा यानि वूमन- सूत्रवाक्य था। दिल्ली सहारा में एक जी विमल हैं, उनका जानने वाला एक जी शैलेंद्र है, जो तब लक्शमी नगर में रहता था और किसी टीवी चैनल में काम करता था, उसकी बेटी का नाम आस्था है, घर का माइनर नौकर जो बिहार से स्मगल किया गया था, बच्ची को आस्था मइया कहता था। जी यशवंत से कन्फमॆ करा सकते हैं।

जब किसी पुरूष को भी भाई कहते हैं तो उसका वही मतलब नहीं होता। यह एक जस्ट टू स्ट्राइक द कनवरसेशन की विधि है-वरना हम उससे हां भ्राता ही नहीं उससे-अबे घुस यह क्या भाई-वाई लगा रखा है, दाऊद का आदमी समझता है क्या? भी सुनने को तैयार रहते हैं।

मैं चाहती हूं या कहूं कि डिजवॆ करती हूं कि मुझे एक स्वतंत्र शरीर, रूह और शख्िसयत के तौर पर देखा और एड्रेस किया जाए। मेरी छातियों, नितंबो, कंमनीय त्वचा, लिपिस्टक लगे होंठों और औरत की आत्मा समेत। मिसाल के तौर पर जैसे आप किसी गबरू जवान या तगड़े मदॆ का जिक्र करते हैं तो उसके सीने, ऊंचाई, मूंछो, रौबदार आवाज, चलने के अंदाज, बाजुऔं की मछलियों वगैरा का व्यौरा देते हैं (जैसा जी यशवंत ने किन्हीं प्रमोद सिंह का दिया है ) तो यह मूलतः भय पैदा करता है। लेकिन जब कदली सी जंघाओं वाली, स्तनों के भार से आगे और नितंब के भार से पीछे झुकी नायिकाओं का वणॆन आता है तो यह उत्तेजना मिक्सड कामना, लालच, खिंचाव पैदा करता है। भय और कामना यही मुझे लगता है भाई और बहन० मदॆ और लेडी बेसिक फकॆ है।

मुझे अच्छा लगता है कि मैं दुनिया में भय जैसी नकारात्मक फीलिंग के बजाय इतनी सी कामना या स्रिजन की लालसा पैदा करती हूं। इसलिए बहन के बजाय मेरा तआर्रूफ अलहदा पर्सनालिटी के बतौर ज्यादा माकूल होगा। आदाब।

nilofar said...

why not being accepted google wala jars.

सिद्धार्थ जोशी said...

बहुत दिन हुए एक बेबाक हसीना को देखे। अब जब आई है तो बिल्कुल खुलकर। कहीं कोई परदा नहीं। अमृता को सात जन्म बनाने पडे एक नीलोफर को पेश करने के लिए यहां यह कौनसी नीलोफर है जो नंगे को नंगा कहती है जबकि रिवाज बिना कपड़ों के कहने का है। जो भी हो यशवंत का छिद्रान्वेषण और डॉक्टर साहब के शब्दान्वेषण दोनों ने आन्दोलित किया। ये तेवर यहां के अलावा कहीं और भी मिल जाएं तो मजा आ जाए।
अभी तक की तो कोशिश महज झील में एक और लहर पैदा करने तक की ही लग रही है।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

बेबाकी की मिशाल इस से बेहतर हो ही नहीं सकती है, सच्चाई को स्वीकारने में जहाँ हम और हमारे सो काल्ड संस्कार बाधक बनते हैं वहीं इस हसीना ने सब को पटक दिया.
मोहतरमा आपकी बेबाकी को इस भडासी का सलाम.