रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
======================
‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।
1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?
2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?
3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?
4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?
17.11.10
रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!
Posted by
Anonymous
0
comments
Labels: उन्मूलन, उपचार, ऑपरेशन, जज, जमानत, जाँच एजेंसी, बास, बीमार, भ्रष्टाचार, मिलावट
20.1.09
न्याय की खातिर
सूचना का अधिकार अपने अधिकार को लेकर एक बार फिर चर्चा में है। इस मुद्दे पर मुख्य सूचना आयुक्त और सुप्रीम न्यायाधीश आमने-सामने हैं। यानी की शीर्ष सत्ता इस एक कानून को लेकर भिड़ी हुई है। मामला बेहद पेचीदा है। सूचना आयुक्त का मानना है कि पद पर रहते हुए किसी भी व्यक्ति के पास मौजूद दस्तावेज निजी नहीं हो सकते वहीं सुप्रीम न्यायाधीश जजों की संपत्ति के मामले में उनके पास उपलब्ध सहायकों के दस्तावेज बेहद गोपन बता उसे सूचना अधिकार के दायरे में लाने से ही इंकार कर रहे हैं। सूचना का अधिकार लोकतंत्र में जनता को सर्वोपरि मानते हुए उसे प्रदत्त यह अधिकार उसकी महत्ता और इस व्यवस्था में उसके शीर्ष पर होने को रेखांकित करता है। यानी जो कुछ भी है वह जनता के लिए हैं। उसे जानने का अधिकार है कि लोकतंत्र के स्तंभ उसके लिए क्या सोच रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा ही इस बात में है कि उसके तीनों स्तंत्र समान हैं, एक दूसरे के पूरक हैं। इन स्तंभों के छोटे या बड़े होने की दशा में वह लोकतंक्ष नाम की इमारत का नक्शा ही बिगाड़ते हैं। सूचना का अधिकार अभी अपने शैशव काल में है। इन तीनों स्तंभों से यह उम्मीद की जाती है कि वह इसके जीवित रहने के लिए जरूरी खाद पानी मुहैया कराएं। लेकिन जिनके हाथों में इसकी जिम्मेदारी है वही आक्सीजन ट्यूब को काटने का काम कर रहे हैं। न्याया सरीखे सम्मानीय किसी भी पद पर रहने वाले किसी भी शख्स के लिए कामकाज में शुचिता और पारदर्शिता का होना बेहद जरुरी है। सूचना का अधिकार इसी पारदर्शिता को बनाए रखने का प्रयोजन मात्र है। अब अगर सम्मानीय न्यायाधीश महोदय इस पद पर रहते हुए किसी सूचना को व्यक्तिगत कह रहे हैं तो इस पर विचार होना ही चाहिए। यह तो ठीक वैसा ही जैसे पड़ोसी के घर भगत सिंह पैदा होने की कामना करना। महा न्यायपालिका की इच्छा तो यही है कि देश में कानून का राज कायम रहे। किताबों में दर्ज कानून की सत्ता सचमुच साकार हो, लेकिन सूचना अधिनियम के आडे आकर तो कमोबेश वह अपनी इस मंशा के विपरीत ही जाती दिखती है। अगर जजों की निजता के गोपन में सब कुछ सही है तो उसके उजागर होने में हर्ज ही क्या है। वैसे भी राजा और दंडाधिकारी के लिए जितना जरूरी ईमानदार होना है उससे ज्यादा जरूरी है ऐसा दिखना। वैसे यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट ने किसी भी सूचना की प्राप्ति के लिए 500 रुपये की फीस तय की थी। यह कदम सूचना अधिनियम के खिलाफ था। इस अधिनियम के मुताबिक यह फीस महज 10 रुपये होनी चाहिए थी। इस मामले को मैने खुद सूचना आयुक्त लखनऊ के यहां उठाया था। बाद में मुकेश केजरीवाल ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी। सूचना आयुक्त ने फैसला हमारे पक्ष में सुनाया था। अब फिर यह दोनों शीर्ष संस्थाओं आमने-सामने हैं।
Posted by
बीहड़
0
comments
Labels: कुकुरमुत्ता, जज, योगेश
