दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीति वाकई एक तमाशा है। बोलना अच्छा होता है लेकिन बड़बोलापन अच्छा नहीं। यकीनन आम आदमी पार्टी में कुछ ऐसा ही चल रहा है। जनता ने बड़ी उम्मीदों से अरविंद केजरीवाल को सत्ता दी है, लेकिन उनके खरे उतरने पर सवाल उठ रहे हैं। बात केवल विपक्षी पार्टियों की नहीं बल्कि आम जनता की भी है। हर बात को विपक्षियों की साजिश करार भी नहीं दिया जा सकता। जनता की अपेक्षा से वादों की नाव पर सवार होकर जो वोट हासिल किये हैं उनका बदला तो चुकाना ही होगा। मतदाताओं के मन को टटोलिये उन्हें बहुत कुछ समझ में आने लगा है या यूं कहें कि राजनीति है ही ऐसी कि जो इसमें जाता है उसे खुद को बदलना पड़ता है। बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि ‘पहले तौलो फिर बोलो’ बात छोटी है परन्तु अति महत्वपूर्ण भी है। कई बार इंसान क्या ओर कितना बोल जाता है उ
से खुद भी पता नहीं होता। वैसे केजरीवाल जी को पता होगा क्योंकि वह गंभीर स्वभाव के व्यक्ति हैं। सवाल उठ रहे हैं कि मीडिया में तमाशा ज्यादा हो रहा है। इस बात में दम है तभी सवाल उठ रहे हैं। अपने-पराये पोल खोलकर झूठ पकड़कर सामने ला रहे हैं। अपने ही विधायक बिन्नी झूठा बता रहे हैं। जनता महंगाई ओर भ्रष्टाचार से त्रस्त थी ओर है केवल इसीलिए तो उसने एक नई पार्टी को चुना वह भी इसलिए कि उनमें साधारण झलक थी ओर वादे भी कुछ अलग थे। अब यदि वादे पूरे नहीं होते तो भावनाएं तो आहत होंगी हीं। कथनी ओर करनी में बार-बार फर्क होगा, तो पकड़ में बातें आ ही जाती हैं।
