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12.3.09

गंदी लड़की नाम का ब्लाग मैंने बनाया और लिखा

ब्लागिंग के अपने अनुभवों पर कभी विस्तार से लिखूंगा लेकिन आज एक बात बताना चाहता हूं। बताने की वजह है एक ब्लाग पर पड़ी एक पोस्ट जिसमें 'गंदी लड़की' ब्लाग की तारीफ करते हुए बहुत दिनों से कुछ न लिखे जाने की शिकायत की गई है। 'कौन है ये गंदी लड़की' शीर्षक से ठेकेदार ब्लाग www.thekedar.blogspot.com पर प्रकाशित पोस्ट इस प्रकार है-
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कौन है ये गंदी लड़की

यूं ही बैठे-बैठे ब्लॉग्स पर कुछ सर्च कर रहा था। अचानक एक ब्लॉग में आ गिरा। ब्लॉग का नाम था गंदी लड़की । किसी लड़की ब्लॉग बनाया था। जियो अपनी ज़िंदगी, करो अपनी मनमर्जी, उन्हें कहने दो हमें-तुम्हें गंदी लड़की.... ये है उस ब्लॉग का विवरण। साफ है जिस किसी ने भी ये ब्लॉग बनाया है, उसने एक क्रांतिकारी विचार सामने रखा है। इस ब्लॉग पर जाएंगे तो आपको एक अलग ही अहसास होगा। ऐसे धारदार विचार जो एक बारगी आपको सोचने के लिए मजबूर कर देंगे। ऐसी बातें जो भले ही आप-हम खुले तौर पर स्वीकार नहीं करते हों, उन्हीं बातों को दिलखोल कर लिखा है गन्दी लड़की ने। पहली निगाह डालेंगे तो लगेगा कि किसी ऐसी लड़की ने इस ब्लॉग को माध्यम बनाया है जिसे इस समाज ने, खासकर पुरुषों ने बहुत दुख दिया है। लगातर लगी चोटों से घायल उस लड़की ने हार न मानकर एक रौद्र रूप अपनाया है। गुमनाम ही सही लेकिन अपने विचारों को, अपनी भड़ास को बाहर निकाल रही है। ऐसी खरी-खरी बातें कर रही है। दुख की बात ये है कि पिछले एक साल से गंदी लड़की ने कुछ नहीं लिखा। आखिर है कौन ये गन्दी लड़की जो वास्तव में आईना है, वह आईना समाज जिसमें अपना गन्दा चेहरा देखकर आईने को गन्दा करार दे रहा है। स्नोवा वार्नो की तरह की रहस्य है यह लड़की। हम नहीं चाहते कि गन्दी ल़ड़की खुल कर सामने आए, लेकिन हम ये चाहते हैं कि गन्दी लड़की फिर से लिखना शुरु करे। क्योंकि हमें चाहिए एक ऐसा ठेकेदार, जो नारी हितों की बात करता रहे। और सिर्फ बातें ही नहीं करे बल्कि कुछ सकारात्मक करे। तो आप जानते हैं कि कौन है ये गन्दी लड़की?

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इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि सच बता देना चाहिए, जो पहले से ही मेरे आसपास के कई लोगों को ज्ञात है, उपरोक्त पोस्ट पर मेरी टिप्पणी इस प्रकार है-

1 टिप्पणियाँ:

यशवंत सिंह yashwant singh ने कहा…

भाई,
इस ब्लाग को मैंने यह सोचकर बनाया था कि अगर मैं लड़की होता तो किस तरह भड़ास निकालता। गंदी लड़की ब्लाग बनाने के बारे में मैंने अपने कई मित्रों को पहले ही बता दिया था। मुंबई में पिछले साल ब्लागर मीटिंग के दौरान मौजूद कई ब्लागरों को गंदी लड़की ब्लाग के जरिए एक प्रयोग करने की बात बताई थी। आज जब आपने यह पोस्ट प्रकाशित की है, तो मुझे लगा कि सच्चाई बता देना चाहिए। इन दिनों भड़ास4मीडिया पर व्यस्तता के चलते गंदी लड़की तो छोड़िए, भड़ास ब्लाग तक पर समय नहीं दे पाता हूं। उम्मीद है मेरी भावनाओं को समझेंगे।

आभार के साथ
यशवंत

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दोस्तों, ब्लागिंग और आनलाइन दुनिया में ढेर सारे लोग नाम बदलकर या पहचान छुपाकर मेल करते हैं, ब्लाग लिखते हैं या मोर्चेबंदी करते हैं। भड़ास ने दिल की बात कहने के लिए हमेशा अपनी पहचान के साथ सामने आने को उचित माना है। 'गंदी लड़की' एक संवेदनात्मक प्रयोग था जिसमें खुद को मानसिक स्तर पर लड़की की पीड़ा के साथ एकाकार कर लिखने की कोशिश की। बहुत कम पोस्टें लिख पाया लेकिन इन पोस्टों पर जिस तेजी से टिप्पणियां मिलीं, वो अचंभित करने वाली थीं। कुछ लोगों ने तो स्पेशली मेल कर गंदी लड़की के दुख को दूर करने की बात कही। कई लोगों ने तो सीधे सेक्स का प्रस्ताव कर दिया। आप अगर गंदी लड़की ब्लाग पर जाकर कमेंट पढ़ें तो वाकई आपको समझ में आएगा कि किसी लड़की द्वारा कुछ लिखने पर किस तरह लोग वाह वाह या हुआं हुआं करने लगते हैं। गंदी लड़की ब्लाग का यूआरएल है- www.gandiladki.blogspot.com

क्या 'गंदी लड़की' नाम से ब्लाग बनाकर मैंने कोई गलत काम किया? अब जबकि इस ब्लाग पर नहीं लिख पा रहा हूं, क्या गंदी लड़की ब्लाग को मुझे डिलीट कर देना चाहिए? या इसे यूं ही छोड़ देना चाहिए?

उम्मीद है, आप लोग मुझे जरूर गाइड करेंगे।

आभार के साथ
यशवंत

4.4.08

कहा जाता था कि मैं एक गंदी लड़की हूं

मुझे आज भी याद है जब मैं पांच साल की थी, अपने पिताजी को खोजते-खोजते मैं एक ऑटो वर्कशॉप में पहुच गई थी। वहां कारीगरों के समूह ने मुझे बुलाया और फिर अपने गंदे हाथ मेरी जांघों पर फेरने लगे। सात साल की उम्र में खेल के दौरान एक दोस्त के बड़े भाई ने मुझे बाथरूम में छिपने में मदद की। वहां वो मुझे इधर-उधर छूने और सहलाने लगा। 12 साल की उम्र में मेरे एक चाचा ने मेरा यौन शोषण किया। जब मैं पुरुषों की इन हरकतों के बारे में अपनी मां से कहती, वो मेरे ऊपर यकीन ही नहीं करती थीं और कभी-कभी तो वो जो हुआ उसे मेरी ही गलती बताती थीं। मुझे तब ये पता नहीं था कि ये क्या था लेकिन ऐसा लगता था कि ये मेरे साथ बार-बार होता था।

हमेशा कहा जाता था कि मैं एक गंदी लड़की हूं। बीती बातें दोहराने, अपनी राय देने, कहने के मुताबिक काम न करने या फिर सवाल पूछने पर भी मुझे दंडित किया जाता था। कम उम्र में ही मेरा शरीर विकसित हो गया था और इसने मेरी परेशानियां और भी बढ़ा दी थीं--12 साल की उम्र में ही मैं सी-कप वाली ब्रा पहनने लगी थी। लंबे समय तक मुझे लगता रहा कि मेरे साथ जो कुछ भी होता है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। हालांकि अब मैं वैसा नहीं सोचती लेकिन जवाब मैं आज भी ढूंढ़ रही हूं।

20 साल की उम्र में पहली बार मुझे अपने पैतृक घर की चारदीवारी से बाहर निकलने का मौका मिला और मैंने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। मेरे पड़ोस वाले घर में खड़े लड़के में मैंने अपने प्रियतम को देखा और जब उसने मेरे सामने प्रस्ताव रखा तो मैंने तुरंत ही उसे स्वीकार कर लिया। उसके साथ घूमते फिरते परिस्थितियां हाथ से निकल गई। आज मैं शायद इसे डेट रेप की संज्ञा दूंगी। मगर उस समय मैं सिर्फ अपनी मां के उस संभावित गुस्से के बारे में ही सोच पा रही थी जो वो तब करतीं जब उन्हें ये पता चलता कि मैं अब कुंआरी नहीं रही और शायद मैं गर्भवती भी हो सकती हूं। मैं बुरी तरह डर गई थी और किसी से बात भी नहीं कर सकती थी। इन परिस्थितियों में शादी ही मुझे सबसे बुद्धिमानी भरा विकल्प लगा। मुझे इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि मेरा ये क़दम कढ़ाई से सीधे आग में उतरने के जैसा है। एक बार शादी करने के बाद सब कुछ खुल कर सामने आ गया। वो शराबी था, बंदूकों और शिकार का शौकीन था और इसके अलावा उसकी दो बहने हद से ज्यादा मेरी ज़िंदगी में दखल देती थी। मुझे वो ऐसी जादूगरनियां लगती थी जिन्होंने मेरी ज़िंदगी की ज्यादातर चीज़ों पर कब्जा कर लिया था।

मैं बहुत बेसब्री से अपने पहले बच्चे का इंतज़ार कर रही थी। कोई ऐसा जो मेरा अपना होगा, जिसके लिए मैं मां होऊंगी ऐसी इच्छा मेरी हमेशा से ही रही थी। लेकिन उसके पैदा होने के बाद जल्द ही मेरे पति ने बात-बात पर मुझे पीटना भी शुरू कर दिया। दुविधा की हालत में मैंने कई बार आत्महत्या करने की भी कोशिशें की। ये शादी मैंने अपनी मर्जी से की थी इसलिए इस बारे में मैं अपने मां-बाप से भी कुछ नहीं कह सकती थी। कुछ सालों बाद मुझे दूसरा बेटा पैदा हुआ। दो छोटे बच्चे मेरे साथ थे और मेरा कोई सहारा नहीं था। मैं सिर्फ ये उम्मीद कर सकती थी कि एक दिन हालात जरूर बेहतर होंगे। मुश्किलों का पारावार न था मगर दोनों बच्चे मेरी ज़िंदगी में अपार खुशियां लेकर आए थे। वो मेरे सूरज थे और मैं पृथ्वी की तरह उनके इर्द-गिर्द घूमती रहती थी।

31 साल की उम्र में मुझे अपने स्तन कैंसर के बारे में पता चला। मुझसे कहा गया कि मेरे पास जीने के लिए कुछ महीने या फिर शायद एक साल हैं। हालात हमेशा के लिए बदल गए। मेरे छोटे बेटे को मेरी जरूरत थी और मुझे संघर्ष करना भी सीखना था। एकाएक अपनी प्राथमिकता में मैं खुद ही सबसे ऊपर पहुंच गई थी। मैंने सर्जरी करवायी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी का सहारा लिया। हर रात बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं अपने कैंसर से बात करती थी, "चले जाओ, मैं तुमसे लड़ कर जीतने वाली हूं। मैं ज़िंदा रहूंगी।"

जब मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा तब मैंने अपनी ज़िंदगी में कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने का दृढ़ निश्चय किया। मुझे पता था कि मुझे अपने वैवाहिक बंधन से मुक्त होना होगा और अपने बच्चों की देख रेख का अधिकार भी हासिल करना होगा। लेकिन उस वक्त मुझे झटका लगा जब मेरे बच्चों ने अपने पिता के साथ रहने का विकल्प चुना यद्यपि मैं देख सकती थी कि वो कितने टूट चुके थे। वो 14 और 11 साल के थे। मैं उनके एकमात्र घर को छोड़कर जा रही थी। उनके लिए ये समझना बहुत मुश्किल था कि मैं सिर्फ उनके पिता को छोड़ रही हूं उन्हें नहीं।

पिता के घर मेरी वापसी ने मुझे पूरी तरह से बिखरने से बचाया। मुझे एक नौकरी मिल गई। मैं काम में मशगूल हो गई और सप्ताहांत में अपने बच्चों से भी मिल लेती थी। अपनी ज़िंदगी से संघर्ष के दिनों में मैं अपने बच्चों से पूरी तरह अलग हो गई थी। एक नया आदमी मेरी ज़िंदगी में शामिल हो गया था जिसके सहारे के बिना अपना मानसिक संतुलन बनाए रखना मेरे लिए मुश्किल होता। भारत में किसी औरत को वेश्या घोषित कर देना बहुत आसान है। और मेरे बच्चों को मेरे बारे में ऐसा ही सोचने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने मुझसे मिलना बंद कर दिया यहां तक कि दो साल तक उन्होंने मुझसे बात तक नहीं की।

लेकिन दृढ़ता से कुछ भी संभव हो सकता है। मैंने अपना सारा ध्यान भविष्य पर लगा दिया- जब मेरे सिर पर अपनी छत होगी, जिसके नीचे मैं अपने बच्चों के साथ डाइनिंग टेबल के चारो तरफ बैठूंगी, खाना बनाउंगी, बातें करूंगी और हंसूंगी। आज ये सभी सपने करीब करीब-करीब सच हो चुके हैं। मेरा कैंसर खत्म हुए दस साल बीत चुके हैं। लोग कहते हैं मैं पहले से भी सुंदर दिखती हूं, मैं खुद भी ऐसा ही सोचती हूं। मेरे पूर्व पति ने हाल ही में दूसरी शादी कर ली है। 19 साल और 16 साल के दोनों बेटे मुझसे फिर से बातें करने लगे हैं। वो अपने विचारों और योजनाओं पर मुझसे चर्चा करते हैं, मेरे साथी के साथ मेरे रिश्तों को समझते हैं। बुरे दौर में मेरे साथ खड़े रहने पर उनकी सराहना करते हैं। उन्हें हम दोनों के साथ रहने पर भी कोई आपत्ति नहीं है।

मैंने ज़िंदगी मैं कई चीज़े झेली हैं और उन पर पार पाया है मगर इन पर अलग-अलग कुछ कहने की बजाय मैं खुद को बस एक विजेता ही कहना चाहूंगी। मैं आगे की ओर देखना चाहती हूं। मेरे बच्चे अक्सर मुझे फोन करके बताते रहते हैं कि वो मैं जब चाहूं मेरे लिए खड़े हैं। मैं उनके लिए अक्सर किताबें और फिल्में भेजती रहती हूं और उम्मीद करती हूं कि वो इनका लुत्फ भी उठाते होंगे। वो कहते है कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं और मैं भी यही प्रार्थना करती रहती हूं कि ऐसा जल्दी हो। शायद हमें एक दूसरे को फिर से जानने की जरूरत है।

जनक

बयालीस साल की जनक कोलकाता में रहती हैं और इस समय एक अकाल्पनिक किताब पर कार्य कर रही हैं।
sabhar: TEHELKA (HINDI )http://www.tehelkahindi.com/SthaayeeStambh/----/541.html

7.3.08

तमाशा है महिला दिवस, अपने घर की स्त्रियों को तो आजाद करो

साल के एक दिन केवल याद करने के लिए है महिला दिवस। अगर ऐसा न होता तो जो मर्द महिला दिवस के बारे में लिखते हैं, वो अपने घरों में अपनी महिलाओं--मां, बेटियों, पत्नी....को कभी कैद करके नहीं रखते। ये तो कैद ही है ना...कि तुम कहां गई थी, किससे बात कर रही थी, क्या पहन रखा है, छत पर क्यों खड़ी थी, टाइम से खाना क्यों नहीं बनाया, तुमने क्यों सब खा लिया, सड़क पर वहां क्या कर रही थी, घर देर से क्यों लौटी, किसका फोन आया था, इतनी देर तक क्यों सोती रही.....

सैकड़ों सवाल इसी तरह के मर्दों की जुबान से निकलते हैं और स्त्रियों को एक सवाल के रूप में खड़ा कर देते हैं। उनकी आत्मा धीरे धीरे इन सवालों के अनुरूप बनने के लिए तैयार होने लगती है। इस प्रकार बन जाती है एक ऐसी स्त्री जो खुद होते हुए भी खुद नहीं होती।

महिला दिवस पर इन तमाशाइयों से केवल एक सवाल करना चाहिए। केवल एक सलाह बोलना चाहिए....आप अपने घर में कृपया अपनी महिलाओं को आजाद कर दो, उन्हें पुरुषों जैसी छूट और अधिकार दे दो, उन्हें रोको टोको मत, वो समझदार हैं, उन्हें खुद पता है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

सेक्स और शरीर की पर्यायवाची बन चुकी स्त्रियों को मुक्ति तभी मिलेगी जब वो सेक्स और शरीर से उपर उठें और यह तभी संभव है जब वो अपने पैरों पर, अपने कदमों पर, अपने दिमाग के आधार पर जीना, चलना, बोलना और लड़ना सीख लें।

नारेबाजी करने वाले पुरुषों, बौद्धिकता झाड़ने वाले विद्वानों, खुद को सहज और सरल बताने वाले मर्दों से अनुरोध है कि जितना वो अपने बेटे को प्यार देते हैं, जितना वो अपने पुत्र को छूट देते हैं, जितना वो अपने लाडले के लिए चिंतित रहते हैं, बस....उतना ही, न उससे ज्यादा और न उससे कम, अपनी बिटिया, अपनी पत्नी, अपनी बहन और अपनी मां के लिए करें। तभी हम सही मायनों में महिला दिवस को सार्थकता प्रदान करेंगे।

सभी साथियों को महिला दिवस की शुभकामनाएं देते हुए अंत में रघुवीर सहाय की चार लाइनों को सिर के बल खड़ा करके उनसे आठ-दस लाइनें निकालकर लिखना चाहूंगी..

मत पढिए गीता
मत बनिए सीता
मत स्वीकार कीजिए
किसी मूर्ख की बनना परिणिता
मत पकाइये भर भर
तसला भात
मत खाइए सब कुछ करके
भी लात
आपही के हाथ में है
आपकी शान
आपको ही बचानी है
खुद की आन
हर पल, हर पग पर लड़ना पड़े
तो लड़िए
पर चीज के लिए कहना पड़े
तो कहिए
बहुत सुना, बहुत रोया, बहुत सोचा
अब चलिए
बहुत सहा, बहुत झेला, बहुत पूछा
अब करिए

निकलिए दर ओ दीवार के पार
दूर तक फैली है धरती
दूर तक फैला है आसमान
छू लो चूम लो उस तारे को
जो अकेले में भी चकमक
अड़ा है खड़ा है बनकर महान

आपकी
गंदी लड़की

28.2.08

मैं हूं गंदी लड़की

सभी भड़ासियों को नमस्कार। मैं हूं गंदी लड़की। नाम छुपाकर एक ब्लाग बना रखा है। काफी पहले से। भड़ास से भी जुड़ी हुई हूं, काफी पहले से। आज हिम्मत कर पा रही हूं, भड़ास पर कुछ लिखने के लिए। यहां मुझे हमेशा से डर लगता है। पुरुषों की भीड़ है। जिसके मन में जो आता है वो बोलता है। नाम भी तो भड़ास है, इसलिए लोग अपनी अपनी भड़ास निकालते हैं। पर हम लड़कियां कहां भड़ास निकालें। यहां तो हम भड़ास निकालेंगे तो आप सभी खा जाएंगे हमें। बोलती बंद कर देंगे हमारी। इसके लिए एक ब्लाग मैंने भी बनाया है। गंदी लड़की नाम से। आप इसे देख सकते हैं। अपना कमेंट दे सकते हैं। लेकिन आप मेंबर नहीं बन सकते। बन सकती है तो सिर्फ और सिर्फ स्त्री। स्त्रियों से भी यही कहूंगी कि वो गंदी लड़की ब्लाग पर जुड़ें तो अपने असली नाम के बजाय नकली नाम से जुड़ें। ताकि उन्हें सही सही और खुलकर कहने में किसी तरह की कोई दिक्कत परेशानी नहीं हो। मेरे ब्लाग का नाम है

gandiladki.blogspot.com



गंदी