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कोई स्वाइन फ्लू से परेशान है, किसी को एड्स का डर है, किसी के डायबिटीज है तो कोई वायरल से ग्रस्त। लेकिन हम सपनों से परेशान है। ऐसे-ऐसे सपने आते हैं कि पूछो मत। अब तो हमें सपनों से डर लगने लगा है। हालांकि कलाम साहब जैसे पहुंचे विद्वानों ने कहा कि जिंदगी में आगे बढऩा है तो सपने देखो। लेकिन आप भी जब हमारे इन गंदे-गंदे सपनों के बारे में सुनेंगे तो हंसने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे। अजी, अब तो सोने से भी डर लगने लगा है।
13.9.09
कोई तो बताए हम इन सपनों का क्या करें!
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अरविन्द शर्मा
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Labels: सपने
28.12.08
हे 2009, मेरी 2008 की बुराइयों को भूल जाना, अच्छाइयों को ही आगे बढ़ाना......उर्फ आइए खुद के दिल में झांकें
नया साल आने वाला है। पुराना जा रहा है। हर नए साल पर कई नए इरादे, वादे किए जाते हैं और बीत रहे साल के बुरे से सबक लेकर नए साल के लिए सब कुछ अच्छा अच्छा करने के मंसूबे बनाए जाते हैं। मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रहा हूं। आप सभी भड़ासी अपने लिए जो कुछ प्लान करें, उसे शेयर जरूर करें ताकि वो इरादा दुनिया को पता चले और उसे पाने के लिए आप अगर खुद भी न चाहें तो भी दुनिया को दिए वचन को निभाने के लिए उस पर आपको जूझकर काम करना पड़े। चलिए शुरुआत मैं करता हूं लेकिन इसके पहले मेरे बहाने से विस्फोट.डाट काम पोर्टल के ब्लाग पर संजय तिवारी जी ने जो कुछ लिखा है, उसे पूरा पढ़िए.............
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हिन्दी ब्लागरी की शुरूआत कोई पुरानी घटना नहीं है. यह ताजा तरीन बात है. मैं आज कुछ आधुनिक तकनीकों पर काम करता हूं. विस्फोट वेबसाईट मैनेज करता हूं और कुछ ऐसी तकनीकों पर थोड़ी बहुत पकड़ बन गयी है जिसके बारे में आज से साल डेढ़ साल पहले तक सोच भी नहीं सकता था. यह सब ब्लागरी की देन है. ब्लागरों का सहयोग है. लेकिन पिछले डेढ़ साल में ब्लागिंग की पृष्ठभूमि में मैं देख रहा हूं कि एक और व्यक्ति ने यह प्रयोग किया है. वो हैं यशवंत सिंह. भड़ास ब्लाग के माडरेटर. अब हिन्दी के अच्छे खासे चलनेवाले मीडिया पोर्टल भड़ास 4 मीडिया के संपादक. उन्होंने जुमला पर काम किया और मैंने वीवो पर. मुझे याद है यशवंत सिंह कहने लगे कि गुरू मेरा पोर्टल बना दो. हम लोग मिलकर बहुत काम कर सकते हैं. मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि मैं रास्ता तो बता सकता हूं लेकिन आपके लिए पोर्टल डिजाईनिंग का काम नहीं कर सकता. मैं चाहता हूं आप खुद जूझिए. लड़िए. हो सकता है आप जीत जाएं और यह भी हो सकता है कि आप हार जाएं. लेकिन जो भी हो, करना आपको ही होगा. मैं यशवंत सिंह से इसलिए भी प्रभावित हूं कि ...........Read More
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अगर आपने Read More पर क्लिक कर संजय जी के ब्लाग पर पूरा पढ़ लिया तो आगे बढ़ते हैं। मेरे लिए निजी तौर पर 2008 बेहद भयानक उतार-चढ़ावों वाला रहा। इस साल मैंने खुद को दुनिया के सामने विशुद्ध 24 कैरेट वाला खलनायक बना पाया तो साल बीतते बीतते एक नायक की तरह लोग मुझे सम्मान देने लगे। इन दो विपरीत ध्रुवों की सवारी करवाना, वर्ष 2008 की देन है। वैसे, ज्योतिष में मेरा विश्वास बहुत ज्यादा तो नहीं है लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शौकिया तौर पर ज्योतिष की जो पढ़ाई की है, अंक ज्योतिष की और हस्त ज्योतिष की, उसके आधार पर मैंने अपने बारे में कुछ भ्रांतियां बना रखी हैं। जैसे, एक तो ये कि मेरा जन्मांक आठ है और मूलांक 9 इसलिए ये दोनों अंक मेरे व्यक्तित्व में शामिल हैं और यही तकनीक, कंटेंट, नेतृत्व, अच्छे-बुरे आदि को करवाते रहते हैं। अंक ज्योतिष के थोड़े भी जानकार हैं उन्हें पता होगा कि आठ और नौ अंक अलग अलग गुण-अवगुण वाले अंक होते हैं, और अगर ये दोनों किसी के व्यक्तित्व में समाहित हैं तो वो फ्रस्टेट तो कुछ समय के लिए हो सकता है लेकिन हार नहीं मान सकता। दूसरे, हस्त ज्योतिष के मुताबिक मेरा भाग्य बहुत अच्छा नहीं है लेकिन माइंड लाइन ने हथेली के इस पार से उस पार तक जो विभाजनकारी रेखा खींच रखी है उससे पता चलता है कि खोपड़िया में उम्दा किस्म की खुराफातें चलती-पनपती रहेंगी और जीने-खाने, नाम कमाने और बदनाम होने भर का माल-माद्दा मिलता रहेगा।
लेकिन दोस्तों, ज्योतिष तो एक बहाना होता है। असल चीज तो कर्म ही है। बुरा किया तो बुरा पाओगे, अच्छा किया तो अच्छा पाओगे वाली कहावत अब इस दुनिया में भले कम लागू हो लेकिन है ये सौ फीसदी सच। हां, कई बार आंखों देखा जो होता है वो झूठा साबित होता है और कई बार जो कानों सुना होता है वो भी बिलकुल बकवास साबित होता है। बावजूद इसके, जो आप अंदर से खुद होते हैं और खुद को जो आप समझते हैं, उसे दुनिया के सामने भले न आप प्रकट करें या प्रकट करें तो दुनिया भले ही उसे सही या झूठ माने, ये अंदर और अंतस की जो मेटल, मूल है वो ही आपको गाइड करने और आगे-पीछे ले जाने के लिए जिम्मेदार होता है। 2008 की अच्छाइयों-बुराइयों से निकलकर, संजय भाई ने उपर जो बात कही है उस पर आते हैं क्योंकि उसी में मेरे लिए वर्ष 2009 के वादे-इरादे भी छिपे हैं।
हम हिंदी पट्टी वाले, जो बचपन से, पैदा होते ही, नोकरी करने के लिए सिखाए-बनाए-तैयार किए जाते हैं, 2009 में क्यों नहीं सोचें कि हम पैदा ही हुए हैं मालिक बनने के लिए। हम क्यों बने-बनाए मालिकों के नौकर बनें। हम क्यों नहीं मालिक बनने की रेस में शामिल हों। जाहिर है, इसके लिए हमें न सिर्फ अपने माइंड सेट में भयंकर बदलाव लाने होंगे बल्कि खुद को इसके अनुरूप तैयार करना होगा और कंटेंट के साथ-साथ तकनीक, ब्रांड, मार्केट, बिजनेस, फाइनेंस आदि की बुनियादी चीजों को समझना होगा। ये शब्द देखने में तो लगते काफी बड़े बड़े हैं लेकिन असल में ये हैं किसी मुर्गे जैसे, जिसे हम मारकर अक्सर खा जाते हैं। या नहीं खाते तो दौड़ाकर पकड़ लेने की क्षमता रखते हैं। तो ये जो बड़े बड़े शब्द दिक्खे हैं, इन्हें दौड़ाकर पकड़ा जा सकता है। हां, ये कतई जरूरी नहीं है कि आप मालिक बनने के लिए हिंदी को छोड़ें, अपनी चाल-ढाल या स्टाइल बदलें, या अच्छे अच्छे कपड़े पहनें। आपको केवल एक चीज गांठ बांधनी पड़ेगी, मुश्किलें चाहें जितनी आएंगी, पीछे नहीं हटेंगे, सीखने से परहेज नहीं करेंगे, झुकेंगे लेकिन उतना ही जितने से दिल पर कोई बोझ न आ पाए।
मैंने 2008 में इरादा करके 40 हजार रुपये की महीने की नौकरी से इस्तीफा दिया और दो प्रयोगों पर काम शुरू किया। एक ग्रामीण भारत के लिए मीडिया मिशन का प्रोजेक्ट था और दूसरा हिंदी मीडिया की खबरों के लिए प्रोजेक्ट। पहला प्रोजेक्ट शुरू हुए कुछ ही समय हुआ कि समझ में आ गया कि इसे करने के लिए एक व्यवस्थित टीम और आफिस का होना जरूरी है लेकिन मेरे पास तो दोनों में से कुछ भी नहीं है क्योंकि इन दोनों चीजों के लिए पैसा होना चाहिए जो मेरे पास बिलकुल नहीं था। मेरे पास था तो केवल एक महीने का अग्रिम वेतन जिसे कंपनी ने नोटिस पीरियड के दौरान का वेतन ससम्मान दिया था। इसी एक महीने के अग्रिम वेतन से एक लैपटाप खरीदा, तीन साइट डिजाइन कराईं और जुट गया काम में। मुश्किलें इतनी आईं कि अगर उनपर लिखना शुरू करूं तो शायद एक मोटी किताब तैयार हो जाए, और इसे भविष्य में लिखूंगा भी लेकिन अभी फिलहाल इतना कि कई कई दिनों तक पाकेट में एक रुपये न होने के बावजूद उधारी मांग मांग कर मिशन में डटा रहा। अपने 14 सालों के मीडिया के विभिन्न तरह के अनुभवों और छह महीने तक मार्केटिंग के अनुभवों और एक साल के ब्लागिंग के अनुभवों को निचोड़कर एक में पिरो दिया और इन सभी फंडों-अनुभवों का व्यवस्थित इस्तेमाल करता रहा। आज मैं कह सकता हूं कि छह महीने पहले चालीस हजार रुपये की नौकरी करने वाला यशवंत अब एक लाख रुपये महीने का व्यय केवल भड़ास4मीडिया के आफिस के संचालन, स्टाफ की सेलरी व अऩ्य खर्चों में खर्च करता है और ये पैसा न तो कहीं से उधार लिया गया है और न ही कहीं से उगाही करके इकट्ठा किया गया है। ये सब भड़ास4मीडिया नामक कंपनी के एकाउंट में विभिन्न कंपनियों द्वारा विज्ञापन, ब्रांडिंग आदि के मद में लिखित में किया गया भुगतान है जिसके कागजात हमारे पास मौजूद हैं।
मेरे कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि मैं अब सफल हो गया हूं, महान हो गया हूं या मालिक बन गया हूं। छह महीने के वक्त में अगर कोई ऐसा मानने लगे तो उससे बड़ा उल्लू का पट्ठा कोई नही हो सकता लेकिन मैं ये बातें इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मुझे पता है अपन के देश में मेरे जैसे हजारों लाखों नौजवान हैं जो बेहद प्रतिभाशील हैं और कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखते हैं लेकिन उन्हें कोई गाइड करन वाला नहीं है, उन्हें कोई इन्सपायर करने वाला नहीं है, उन्हें कोई दिशा देने वाला नहीं है क्योंकि जितने भी मालिक लोग होते हैं वो अपने सक्सेस मंत्राज छिपाकर रखते हैं। उसे कतई डिस्क्लोज नहीं करते। पर मैं खुद को और भड़ास4मीडिया को हिंदी वालों के प्यार का देन मानता हूं इसलिए उनका कर्ज मेरे पर है और रहेगा। इसे मैं अपने जैसे लोगों को तैयार करके ही चुकाने की कोशिश कर सकता हूं।
वर्ष 2009 में अगर जिंदा रहा (...बहुतों से पंगा लिया है इसलिए ये संभव है कि कोई बददुआ मुझे जीने न दे:) तो मेरा अपने लिए जो इरादा है वो इस प्रकार है-
1- भड़ास आश्रम की स्थापना। एक ऐसा आश्रम जहां सात्विक और तामसिक दोनों प्रकार के लोग एक साथ, अपने-अपने गुण-दोषों के साथ आ सकें और खुद को कुंठाओं से मुक्त कर सकें। कुंठा मुक्ति के लिए जो कुछ होगा, वो डिटेल कभी बाद में दूंगा लेकिन उसमें कुछ भी अनैतिक नहीं होगा, ये वादा है। उसमें गाना, बजाना, नाचना, चिल्लाना, रोना, खाना, पीना, लड़ना आदि शामिल है। ये ऐसी चीजें हैं जो हम लोग रोज करते हैं लेकिन अवचेतन में करते हैं इसलिए ये चीजें दवा की जगह रुटीन का हिस्सा बन जाती हैं।
2- हिंदी पट्टी के लोगों को इंटरप्रेन्योर, उद्यमी, प्रोपराइटर, डायरेक्टर बनने के लिए प्रेरित करना। अपनी हिंदी और अपने गांव में इतनी ताकत है कि कई हजार नई चीजें करने के लिए बाकी हैं पर हमारे लोगों का माइंडसेट ऐसा ही कि वो खुद लाख-दो लाख रुपये महीने कमाने की बजाय बीस-तीस हजार रुपये महीने की नौकरी के लिए मरे जाते हैं।
3- कुछ आध्यात्मिक प्रयोगों को अंजाम देना। इसमें ध्यान, नृत्य, गायन, भोजन (कुछ और चीजें भी हैं, जिनका यहां जिक्र नहीं करना चाहता) के जरिए शरीर से लंबे समय तक मुक्ति के लिए प्रयोग करना शामिल है। इस मुक्ति की झलक मैं पिछले कई वर्षों से गाहे-बगाहे अप्रयोजित तरीके से पाता रहा हूं लेकिन उसे लंबा करने, उसे व्यवस्थित तरीके से करने का वक्त नहीं निकाल पाता। अगले साल इस छूटे हुए काम को जरूर करने की कोशिश करूंगा।
4- हारमोनियम बजाना सीखना है। बचपन मे एक लेसन आप सभी ने पढा होगा साइकिल की सवारी वाला। जिस तरह साइकिल चलाना सीखना एक चुनौती भरा काम होता है उसी तरह मेरे लिए हारमोनियम बजाना सीखना भी एक बड़ी चुनौती है। इस काम को इस वर्ष जरूर करूंगा।
5- भड़ास4मीडिया के लिए कुछ योजनाएं हैं जिसे नए साल में इंप्लीमेंट करना है लेकिन ये योजनाएं क्या हैं, उसे यहां बताने की बजाए, उसे करके दिखाना ज्यादा अच्छा होगा, रणनीतिक वजह के चलते भी और शेखी न हांकने की मनोवृत्ति के चलते भी।
6- ग्रामीण भारत के मीडिया मिशन के प्रोजेक्ट को शुरू करना। इस सौ फीसदी आजमाए हुए प्रोजेक्ट को सुव्यवस्थित रूप से नए साल में शुरू कर सकूंगा, ये मुझे पूरा विश्वास है। बस, कुछ साथी मुझे चाहिए जो मार करने से लेकर कंप्यूटर व फील्ड में महारत दिखाने तक का जज्बा रखते हों।
दोस्तों.....आप सभी भड़ासी साथियों, भड़ास के पाठकों और भड़ास विरोधियों के लिए भी, दिल से दुवा करता हूं कि नया साल आपके, आपके परिवार, आपके पड़ोस व आपके-हमारे समाज व देश में खुशियां ही खुशियां लाए, सफलता ही सफलता लाए, मुक्ति ही मुक्ति लाए, प्यार ही प्यार लाए......।
इस बीत रहे वर्ष में जिन-जिन साथियों-दोस्तों-कथित दुश्मनों का मैंने जाने-अनजाने तरीके से दिल दुखाया है, उनसे नम आंखों के साथ दिल से क्षमा याचना करता हूं क्योंकि हमारी-आपकी अच्छाइयां और हमारी-आपकी सकारात्मक ऊर्जा ही इतनी ज्यादा हैं कि हमें बुरी और नकारात्मक प्रवृत्तियों के बारे में सोचने-जीने के लिए बिलकुल वक्त नहीं होना चाहिए। खुद से घृणा करने वालों से उम्मीद रखता हूं कि वे भले ही मुझे माफ न कर पाएं लेकिन माफ करने के बारे में सोचने की शुरुआत जरूर करेंगे। वैसे भी, हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वो जिंदगी के किसी भी पल से खुद को व्यवस्थित व पाजिटिव बनाने की शुरुआत करे और मैं यह शुरुआत इस बीत रहे वर्ष के अंतिम तीन महीनों से कर सका हूं और इसको नए साल में आगे बढ़ाऊंगा।
आभार के साथ
जय भड़ास
यशवंत सिंह
09999330099
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: 2008, 2009, इरादे, नया साल, बीत रहा साल, भड़ास, यशवंत, वादे, सपने
4.4.08
कहा जाता था कि मैं एक गंदी लड़की हूं
मुझे आज भी याद है जब मैं पांच साल की थी, अपने पिताजी को खोजते-खोजते मैं एक ऑटो वर्कशॉप में पहुच गई थी। वहां कारीगरों के समूह ने मुझे बुलाया और फिर अपने गंदे हाथ मेरी जांघों पर फेरने लगे। सात साल की उम्र में खेल के दौरान एक दोस्त के बड़े भाई ने मुझे बाथरूम में छिपने में मदद की। वहां वो मुझे इधर-उधर छूने और सहलाने लगा। 12 साल की उम्र में मेरे एक चाचा ने मेरा यौन शोषण किया। जब मैं पुरुषों की इन हरकतों के बारे में अपनी मां से कहती, वो मेरे ऊपर यकीन ही नहीं करती थीं और कभी-कभी तो वो जो हुआ उसे मेरी ही गलती बताती थीं। मुझे तब ये पता नहीं था कि ये क्या था लेकिन ऐसा लगता था कि ये मेरे साथ बार-बार होता था।
हमेशा कहा जाता था कि मैं एक गंदी लड़की हूं। बीती बातें दोहराने, अपनी राय देने, कहने के मुताबिक काम न करने या फिर सवाल पूछने पर भी मुझे दंडित किया जाता था। कम उम्र में ही मेरा शरीर विकसित हो गया था और इसने मेरी परेशानियां और भी बढ़ा दी थीं--12 साल की उम्र में ही मैं सी-कप वाली ब्रा पहनने लगी थी। लंबे समय तक मुझे लगता रहा कि मेरे साथ जो कुछ भी होता है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। हालांकि अब मैं वैसा नहीं सोचती लेकिन जवाब मैं आज भी ढूंढ़ रही हूं।
20 साल की उम्र में पहली बार मुझे अपने पैतृक घर की चारदीवारी से बाहर निकलने का मौका मिला और मैंने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। मेरे पड़ोस वाले घर में खड़े लड़के में मैंने अपने प्रियतम को देखा और जब उसने मेरे सामने प्रस्ताव रखा तो मैंने तुरंत ही उसे स्वीकार कर लिया। उसके साथ घूमते फिरते परिस्थितियां हाथ से निकल गई। आज मैं शायद इसे डेट रेप की संज्ञा दूंगी। मगर उस समय मैं सिर्फ अपनी मां के उस संभावित गुस्से के बारे में ही सोच पा रही थी जो वो तब करतीं जब उन्हें ये पता चलता कि मैं अब कुंआरी नहीं रही और शायद मैं गर्भवती भी हो सकती हूं। मैं बुरी तरह डर गई थी और किसी से बात भी नहीं कर सकती थी। इन परिस्थितियों में शादी ही मुझे सबसे बुद्धिमानी भरा विकल्प लगा। मुझे इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि मेरा ये क़दम कढ़ाई से सीधे आग में उतरने के जैसा है। एक बार शादी करने के बाद सब कुछ खुल कर सामने आ गया। वो शराबी था, बंदूकों और शिकार का शौकीन था और इसके अलावा उसकी दो बहने हद से ज्यादा मेरी ज़िंदगी में दखल देती थी। मुझे वो ऐसी जादूगरनियां लगती थी जिन्होंने मेरी ज़िंदगी की ज्यादातर चीज़ों पर कब्जा कर लिया था।
मैं बहुत बेसब्री से अपने पहले बच्चे का इंतज़ार कर रही थी। कोई ऐसा जो मेरा अपना होगा, जिसके लिए मैं मां होऊंगी ऐसी इच्छा मेरी हमेशा से ही रही थी। लेकिन उसके पैदा होने के बाद जल्द ही मेरे पति ने बात-बात पर मुझे पीटना भी शुरू कर दिया। दुविधा की हालत में मैंने कई बार आत्महत्या करने की भी कोशिशें की। ये शादी मैंने अपनी मर्जी से की थी इसलिए इस बारे में मैं अपने मां-बाप से भी कुछ नहीं कह सकती थी। कुछ सालों बाद मुझे दूसरा बेटा पैदा हुआ। दो छोटे बच्चे मेरे साथ थे और मेरा कोई सहारा नहीं था। मैं सिर्फ ये उम्मीद कर सकती थी कि एक दिन हालात जरूर बेहतर होंगे। मुश्किलों का पारावार न था मगर दोनों बच्चे मेरी ज़िंदगी में अपार खुशियां लेकर आए थे। वो मेरे सूरज थे और मैं पृथ्वी की तरह उनके इर्द-गिर्द घूमती रहती थी।
31 साल की उम्र में मुझे अपने स्तन कैंसर के बारे में पता चला। मुझसे कहा गया कि मेरे पास जीने के लिए कुछ महीने या फिर शायद एक साल हैं। हालात हमेशा के लिए बदल गए। मेरे छोटे बेटे को मेरी जरूरत थी और मुझे संघर्ष करना भी सीखना था। एकाएक अपनी प्राथमिकता में मैं खुद ही सबसे ऊपर पहुंच गई थी। मैंने सर्जरी करवायी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी का सहारा लिया। हर रात बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं अपने कैंसर से बात करती थी, "चले जाओ, मैं तुमसे लड़ कर जीतने वाली हूं। मैं ज़िंदा रहूंगी।"
जब मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा तब मैंने अपनी ज़िंदगी में कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने का दृढ़ निश्चय किया। मुझे पता था कि मुझे अपने वैवाहिक बंधन से मुक्त होना होगा और अपने बच्चों की देख रेख का अधिकार भी हासिल करना होगा। लेकिन उस वक्त मुझे झटका लगा जब मेरे बच्चों ने अपने पिता के साथ रहने का विकल्प चुना यद्यपि मैं देख सकती थी कि वो कितने टूट चुके थे। वो 14 और 11 साल के थे। मैं उनके एकमात्र घर को छोड़कर जा रही थी। उनके लिए ये समझना बहुत मुश्किल था कि मैं सिर्फ उनके पिता को छोड़ रही हूं उन्हें नहीं।
पिता के घर मेरी वापसी ने मुझे पूरी तरह से बिखरने से बचाया। मुझे एक नौकरी मिल गई। मैं काम में मशगूल हो गई और सप्ताहांत में अपने बच्चों से भी मिल लेती थी। अपनी ज़िंदगी से संघर्ष के दिनों में मैं अपने बच्चों से पूरी तरह अलग हो गई थी। एक नया आदमी मेरी ज़िंदगी में शामिल हो गया था जिसके सहारे के बिना अपना मानसिक संतुलन बनाए रखना मेरे लिए मुश्किल होता। भारत में किसी औरत को वेश्या घोषित कर देना बहुत आसान है। और मेरे बच्चों को मेरे बारे में ऐसा ही सोचने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने मुझसे मिलना बंद कर दिया यहां तक कि दो साल तक उन्होंने मुझसे बात तक नहीं की।
लेकिन दृढ़ता से कुछ भी संभव हो सकता है। मैंने अपना सारा ध्यान भविष्य पर लगा दिया- जब मेरे सिर पर अपनी छत होगी, जिसके नीचे मैं अपने बच्चों के साथ डाइनिंग टेबल के चारो तरफ बैठूंगी, खाना बनाउंगी, बातें करूंगी और हंसूंगी। आज ये सभी सपने करीब करीब-करीब सच हो चुके हैं। मेरा कैंसर खत्म हुए दस साल बीत चुके हैं। लोग कहते हैं मैं पहले से भी सुंदर दिखती हूं, मैं खुद भी ऐसा ही सोचती हूं। मेरे पूर्व पति ने हाल ही में दूसरी शादी कर ली है। 19 साल और 16 साल के दोनों बेटे मुझसे फिर से बातें करने लगे हैं। वो अपने विचारों और योजनाओं पर मुझसे चर्चा करते हैं, मेरे साथी के साथ मेरे रिश्तों को समझते हैं। बुरे दौर में मेरे साथ खड़े रहने पर उनकी सराहना करते हैं। उन्हें हम दोनों के साथ रहने पर भी कोई आपत्ति नहीं है।
मैंने ज़िंदगी मैं कई चीज़े झेली हैं और उन पर पार पाया है मगर इन पर अलग-अलग कुछ कहने की बजाय मैं खुद को बस एक विजेता ही कहना चाहूंगी। मैं आगे की ओर देखना चाहती हूं। मेरे बच्चे अक्सर मुझे फोन करके बताते रहते हैं कि वो मैं जब चाहूं मेरे लिए खड़े हैं। मैं उनके लिए अक्सर किताबें और फिल्में भेजती रहती हूं और उम्मीद करती हूं कि वो इनका लुत्फ भी उठाते होंगे। वो कहते है कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं और मैं भी यही प्रार्थना करती रहती हूं कि ऐसा जल्दी हो। शायद हमें एक दूसरे को फिर से जानने की जरूरत है।
जनक
बयालीस साल की जनक कोलकाता में रहती हैं और इस समय एक अकाल्पनिक किताब पर कार्य कर रही हैं।
sabhar: TEHELKA (HINDI )http://www.tehelkahindi.com/SthaayeeStambh/----/541.html
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हरे प्रकाश उपाध्याय
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