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5.3.08

पेट और पेट से नीचे की ही ........

कल की ही बात है कि एक हैल्थ मैगजीन में बहुत पहले प्रकाशित हुआ अपने डा.रूपेश का एक लेख पढ़ रही थी कि गर्भवती स्त्री का गर्भावस्था के दरम्यान आचरण कैसा होना चाहिए । चूंकि मैं ठहरी उर्दू स्कूल की टीचर और जनाब डा.रूपेश का लिखना तो बस ऐसा रहता है कि जब वो आयुर्वेद पर लिख रहें ओं तब हमें तो डिक्शनरी ही लेकर बैठना पड़ता है । इस लेख में एक शब्द दिखा - "मैथुनोदरपरायण",
अर्थ देखा तो समझ में आया कि यह तो बड़ा सार्थक शब्द है जिसका मतलब होता है ऐसे लोग जो को बस पेट और पेट से नीचे की ही हमेशा फ़िक्र में रहते है । अपने एक भड़ासी भाई ने एक ब्लाग बनाया है इस तरह के लोगों के लिए ,जाइए और विद्वान बन जाइए । मैं एक औरत होने के नाते से यह बात कहना चाहती हूं कि जो कथित जिस्म के जानकार यह कहते हैं कि गर्भावस्था में सातवें माह तक सुरक्षित तरीके से सम्भोग किया जा सकता है वे बस "मैथुनोदरपरायण" ही हैं जब ऐसी अवस्था में औरत को उठना-बैठना और सोना तक मुश्किल होता है तो ऐसे में यह सलाह कि ओरल सेक्स या आहिस्ते से सम्भोग कर लेना चाहिए कितनी कमीनेपन से भरी प्रतीत होती है
ऐसे में औरत के दिल में पति के प्रति जो यह भाव डाला जाता है न कि शौहर खुदा होता है शर्तिया टूट जाता है कि अगर खुदा ऐसा है तो बड़ा घटिया सा है जो बस खटिया की ही बात सोचता है हमेशा । जनाब से जब इस विषय पर बात करी तो उन्होंने तो सारा का सारा दोष परमात्मा को ही दिया और बताया कि शरीर में जो एण्डोक्राइन सिस्टम है उसमें आदमियों में सेक्स हार्मोन सामान्यतः औरतों की बनिस्पत लगभग पचास गुना बनता है इसीलिए मर्द हमेशा इसी फ़िराक में रहते हैं , तो क्या यह दोयम दर्जा औरतों को दुनिया बनाने वाले ने ही दिया है ? खुदा को सवालों के कटघरे में खड़ा किया जाए ।
भड़ास जिन्दाबाद