भड़ास के इस भड़भड़ाते प्रयास और उसकी सफलता के साझीदार ही नहीं उसकी चेतना के अंग बन चुके हम सभी अभिषेक, राघवेंद्र और मैं स्वयं योगेश जादौन, सोच रहे हैं कि काश कल हम भी दिल्ली हो सकते। करुणाकर की खुशियां बांटने। उसके दर्द को कम करने में। फिर भी हमारी ढेरों बधाइयां जन्मदिन पर और हां.....हवाओं से टूट कर बिखर जाएं वो पत्ते हम नहींआंधियों से कह दो औकात में रहे।।
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3.7.08
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