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25.5.08

तो मुझमें कौन सांसें ले रहा है?

मेरे अंदर कोई मुझसे जुदा है
मैं चुप हो जाऊं तो वो बोलता है

किसी का हल किसी का मसअला है
मुहब्बत अपना अपना तजुर्बा है

अगर सब आरजुएं मर चुकी हैं
तो मुझ में कौन सांसें ले रहा है

बदलते ही नहीं नज़रें कभी वो
बहुत अच्छा है जो नाआशना है

बहर गाम आ रही है एक आहट
मुसलसल कोई पीछा कर रहा है

दुखों ने राब्ते कायम किये हैं
वर्ना कौन किसको चाहता है

मेरा भी चाहने वाला था कोई
वो बिछड़ा है तो अंदाज़ा हुआ है

....................................रियाज़