ज्बां सिली है और ओठ फड़फडा़ते हैं।
ल्फ्ज़ बेबस हैं, इसी बात पर रोना आया।
मिला सुकून तो दिल से मिलायेगें तुझको।
जिसके जरिये से ये आंसू का बिछौना आया।
भटक रहा हूं शबाबों के असर में जिसके,
उसे गुलफाम बनाने का ये टोना आया।
हम पे खारों ने किया देखिये हर लम्हा क्रम,
नाम पर यारों के गम का ही खिलौना आया।
हसरतें कितनी है हमको ये बता दें कातिल,
हमको खुद अपने सलीबों को ही ढोना आया।
हम तो सूरज की तरह जगते हुए हैं मकबूल,
अपनी फितरत में कभी यार न सोना आया।
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(मकबूल साहब ने अपनी रचना क्रुतिदेव फांट में मेल से रवाना किया था, जिसे यूनीकोड में करके यहां प्रकाशित कर रहा हूं। मकबूल साहब, मैंने आप को मेल से वो लिंक भी भेज दिया है, जिसके जरिए आप खुद ब खुद क्रुतिदेव को यूनीकोड में बदल सकेंगे....यशवंत)
