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19.4.08

....तिल का ताड़ न बनाते हुए, हम अपनी गलती सुधारते हैं....

पंकज जी, आपकी उपस्थिति भड़ास पर न होने के चलते पिछले दिनों मैंने कई पोस्टों में जिक्र किया कि अपने पंकज जी आजकल नहीं दिक्खे हैं। पंडित नीरव जी से भी पूछा कि अपन के पंकज जी कहां हैं जो नीरव जी जैसे हीरे को खोजकर भड़ास के हवाल किया।

खैर, आपने बहुत दिनों बाद भड़ास पर अपनी जो पोस्ट डाली है उसमें दुख, क्षोभ, वेदना...सब कुछ झलक रहा है। आपकी भावनाओं को मैं समझ सकता हूं। पिछले 48 घंटों से मैं भी खुद इस मामले को समझने सुलझाने की कोशिश कर रहा हूं। मैं यहां पर पूरे मामले का जिक्र करना उचित नहीं समझता पर आपको मैं जानकारी देना चाहूंगा कि डा. रूपेश जी, पंडित नीरव जी से बातचीत के आधार पर (हरेप्रकाश जी का फोन नहीं मिल रहा है, वो संभवतः गांव गये हुए हैं), मैंने पोस्ट लेखक साथी से बात की और उन्हें सारी स्थितियों से अवगत कराया। किसी के प्रति जल्दबाजी में कोई धारणा बना लेना, किसी के निजी जीवन की स्थितियों के आधार पर उसकी सार्वजनिक छवि को गलत बताना......ऐसे ढेर सारे पेंच होते हैं जिनको हम सभी को समझने की जरूरत है। अगर हम बेहद जनरलाइज तरीके से कुछ कहते करते हैं तो उससे बजाय फायदा होने के, नुकसान ही होता है।

मैं जो कुछ हुआ, उसके लिए भड़ास संचालक मंडल की तरफ से माफी मांगता हूं और पोस्ट लेखक साथी ने पूरी स्थिति को समझने के बाद बेहद संवेदनशीलता का परिचय देते हुए अपनी पोस्ट को संपादित कर दी है। मैंने उस पोस्ट को देख लिया है और उसमें अब कुछ ऐसा नहीं है जो आपत्तिजनक माना जाए। मैं निजी तौर पर इस प्रकरण से जुड़े सभी साथियों से अनुरोध करूंगा कि इस मामले को अब यहीं खत्म समझा जाए।

अगर जो खत्म न मानने पर अड़ा हो वो निजी तौर पर मेरे लिए सजा तय कर दे, मैं उसे भुगतने के लिए तैयार हूं। ऐसा मैं भड़ास संचालक मंडल की तरफ से कह रहा हूं। वैसे भी अब तक की ज़िंदगी में सजा ही सहता आया हूं, जाने किन किन की बददुवाएं हैं साथ-साथ।

पंकज भाई, मैं आपसे बेहद विनम्रता से कहना चाहूंगा कि.....

अगर मैं चाहता तो इस मामले को बेहद मसालेदार बनाते हुए ढेर सारे एंगिल से कई कई पोस्ट डाल कर बहस करा देता और न्याय करने की मुद्रा में आकर लास्ट में फैसला सुना देता, जैसा कि कई स्वनाम धन्य ब्लागर करते हैं। पर मैं निजी तौर पर इस बात से इत्तफाक रखता हूं कि किसी के चरित्र पर उंगली उठाने से पहले उस व्यक्ति को ठीक से देखना समझना और महसूस करना चाहिए। आप खुद सोचिए, अगर कोई व्यक्ति अपनी पूरी आइडेंटिटी के साथ आकर किसी के खिलाफ कुछ कहता है तो उसे आप कैसे गलत मान सकते हैं? गलत तब होता जब कोई अनाम नाम से आकर लिख जाता। जैसा कि मेरे साथ एक स्वनामधन्य ब्लागर ने किया। उन्होंने अनाम नाम से मेरे खिलाफ अपने ब्लाग पर ऐसी ऐसी टिप्पणियां लिखीं कि मुझे उनके खिलाफ अपने नाम के साथ खड़ा होना पड़ा और फिर मैंने भड़ास पर उनके खिलाफ अपने नाम से अभियान चलाया।

लेकिन भड़ास पर जिसने लिखा उसने अपनी पूरी आइडेंटिटी के साथ पोस्ट लिखी। वो भले आवेग में लिख गया हो, सतही किस्म की अफवाह आधारित जानकारियों पर लिख गया हो.....ये अलग बात है लेकिन वो अपनी बात पर अड़े रहना चाहता है, खड़े रहना चाहता है, तो उसे आप कैसे गलत कह सकते हैं? तो मेरा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति खुल के आरोप लगा रहा है तो उस आरोप का जवाब दिया जाना चाहिए, न कि दबाव बनाया जाना चाहिए कि इस पोस्ट को हटा दें। वो भी पोस्ट हटाने को कहने का अंदाज ऐसा कि जैसे मैं निरा मूर्ख, चूतिया, विवेकहीन टाइप का प्राणी हूं (वैसे हैं ही हम सब, क्योंकि ये बातें हम हमेशा कहते रहते हैं लेकिन अगर कोई दूसरा किसी दूसरे इरादे से कहता है तो वो बर्दाश्त नहीं) तो मैंने फिलहाल कुछ भी करने से मना कर दिया। भई, प्रेम से गला काट लो, मंजूर है। दबाव देकर कुछ नहीं करा सकते। क्योंकि इतनी बनियागिरी अभी हमने सीखी नहीं है। मैंने उन साथी से कहा कि आप अपना पक्ष लिख के दो, कहो तो आपकी बात लिखकर मैं डाल दूं....पर वो तैयार नहीं हुए। वो चाहते थे कि मैं पोस्ट डिलीट कर दूं। कैसे कर दूं भाई? ये कम्युनिटी ब्लाग है और अगर कोई व्यक्ति अपनी पूरी पर्सनाल्टी सामने लाकर लिख रहा है तो उसे कैसे इग्नोर कर दूं, उसकी पोस्ट को कैसे डिलीट कर दूं। ये तो आपका साहस होना चाहिए न कि आप उसे फेस करो, आप उसकी बातों का जवाब दो। पर आप ऐसा करने के बजाय फोन करके मुझे ही उल्टा सीधा सुना रहे हो। अरे यार, थोड़ा सब्र, थोड़ी बुद्धिमानी, थोड़ा विवेक लगाया जाना चाहिए।

बावजूद इसके, इस मामले में मैं पोस्ट लेखक के साथ संपर्क कायम कर उनके साथ बातचीत कर एक लोकतांत्रिक रास्ता निकालने का प्रयास करता रहा। अब जबकि उन्होंने खुद बेहद साहस के साथ, हम सभी साथियों के अनुरोध पर अपनी पोस्ट को संपादित कर दिया है, तो मैं दरअसल बड़प्पन पोस्ट लेखक का मानूंगा जिन्होंने पहले तो खुल कर कहा और बाद में सबकी बातें सुन कर महसूस कर खुद को दुरुस्त करने का कदम उठाया।

आशय ये कि इस विवाद को मैं जबरदस्त रूप से तूल दे सकता था, ढेर सारे अनाम कमेंटों के जरिए, नामधारी पोस्टों के जरिए तिल का ताड़ बना सकता था, पर ऐसा छल कपट अपन लोग के अंदर नहीं है। आदमी कुछ कर जाता है। बाद में लगता है कि यार थोड़ा गलत हो गया। और उसे महसूस करते हुए गलती सुधार ले तो यही मनुष्यता है।

तो पंकज भाई, हमारी नीयत खराब नहीं है। हमारा ईमान खराब नहीं है। हम गल्तियां करते हैं क्योंकि हम इंसान हैं, हम गल्तियां सुधारते हैं क्योंकि हम सच्चे इंसान हैं। दोगले, हिप्पोक्रेट या बनावटी नहीं।

आपसे एक निजी शिकायत। आप भड़ास के वरिष्ठ साथियों में से हैं। आप सलाहकार हैं। आपने एक भी फोन करना मुनासिब नहीं समझा। आपने अपनी आपत्ति बड़ी देर से और वो भी पब्लीकली की है, इसकी बजाय आप उसी दिन मुझसे अपनी आपत्ति एक भड़ासी होने के नाते दर्ज करा सकते थे, पोस्ट लेखक से सीधे बात कर सकते थे, या उनका पता मोबाइल नंबर मांग कर उन्हें समझा सकते थे.....

पर आपने ऐसा नहीं किया। ऐसा करना ज्यादा उचित होता। संबंध तोड़ लेना बड़ा आसान होता है, उसे बनाए रखना, उसे बचाए रखना, उसे मेंटेन करना बहुत मुश्किल।

हम आपको खोना नहीं चाहते। मैं भड़ास टीम की तरफ से आपसे अनुरोध कर रहा हूं....

प्लीज पंकज भाया, मान जाओ।
अब तो थोड़ा सा मुस्कराओ।
गुस्सा थूको और पान खाओ।
इनको, उनको दोनों को सिखाओ।


उम्मीद है, आपकी तबीयत ठीक होगी। आपसे जल्द ही मिलूंगा। मैंने अपनी पूरी बात यहां रख दी है, सिर्फ इसलिए रखी है कि एक वरिष्ठ भड़ासी साथी हमसे दुखी है, इसलिए रखी है। उम्मीद है आप हम चूतियों की गल्तियों को इग्नोर करेंगे और अच्छाइयों पर ध्यान देंगे।

जय भड़ास
यशवंत