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22.12.12

अनुवांशिकी


[ अनुवांशिकी ]
* मैं सोचता हूँ , यदि कोई वैज्ञानिक सचमुच पूरी निष्पक्षता से , निरपेक्ष ढंग से खोज करके यह पाए कि अनुवांशिकी का प्रभाव व्यक्ति के गुण और व्यवहार पर होता है , तो क्या जातिवादी लेखक - विचारक उसे हिन्दुस्तान में जीने देंगे ? लेकिन मैं यह अनुभव करता हूँ कि व्यक्ति अपने कमरों / घर को किस रंग से पुतवाता है , या बाथरूम के टाइल्स की क्या डिज़ाइन और कलर चुनता है , यह तय करने में उसकी अनुवांशिकी का पर्याप्त हाथ होता है |

[ सवर्ण कथा ]
१ - - पापा फेस बुक पर एक किताब की बड़ी चर्चा होती है | मनुस्मृति नाम है उसका | आप ब्राह्मण हैं तो आप के पास वह ज़रूर होनी चाहिए | मुझे भी पढ़ने को दीजिये न !
= नहीं बेटा, मेरे पास तो गीता रामायण भर है | महाभारत भी घर में नहीं रखता | हाँ पड़ोस के अंकल जी से माँग लो | उनके पास ज़रूर होगी | वे आरक्षण समर्थक हैं | आजकल वही लोग मनुस्मृति ज्यादा पढ़ते हैं |

* पचास वर्षों तक प्रेम में आकंठ मुब्तिला रहने  के बाद अब मुझे अनुभव हो रहा है कि प्रेम सचमुच एक रोग ही है | इसमें आनंद बहुत आता है , मीठा मीठा दर्द होता है और महसूस होता है कि हम हवा में उड़ रहे हैं | लेकिन है यह  एक  बीमारी ही |

* दर्शन का काम है तो 'जानना' | लेकिन जानकर वह क्या करेगा ? क्या करता वह जानकारियाँ इकठ्ठा करके ? इसलिए उसका काम हो गया है - आदमी का जीवन कैसे सुखी हो , इसके बारे में सोचना और उसका मार्ग बताना | मनुष्य कैसे प्रसन्न रहे , यह ज़िम्मेदारी है अब दर्शन शास्त्र की | मेरी परिभाषा के अनुसार मानव मात्र को खुश और प्रसन्न देखना ही " दर्शन " है |

* आप चाहें , न चाहें सर्वदलीय , सर्व धर्मी  , सर्व देशीय , सर्व समावेशी सरकार | लेकिन सड़क समाज तो ऐसा होता जा रहा है | अस्पताल डफरिन भी है , झलकारी बाई , श्यामा प्रसाद मुखर्जी , और राम मनोहर लोहिया के भी हैं | इसी प्रकार सड़कें , गलियाँ और पार्क - मोहल्ले भी हैं | कुछ नाम ज़रूर आने शेष हैं पर वे घरों - जलसों में तो प्रतिष्ठा पा ही गए हैं , देर सवेर बाहर भी आ ही जायेंगे | आश्चर्य नहीं कि घरों से निकल कर कब मार्क्स , लेनिन , माओ , हिटलर , नाथू राम गोडसे भी सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित हो जायँ !

शायद धूप


* बलात्कारों के विषय में मेरी अक्ल कुछ काम नहीं कर रही है |

* बलात्कारी को फाँसी , और हत्यारे को प्रधान मंत्री की गद्दी ?

* अप्रामाणिक विचार =
मेरा ख्याल या विचार था कि लडकियाँ पुरुष मित्र बनाने से सुरक्षित होती हैं , उसी प्रकार जैसे पति करने से | दोनों ही बातें गलत साबित हुयीं | पति और पुरुष मित्र के समक्ष भी बलात्कार हो जाते हैं |

* सोचता हूँ , शिव सेना या माओ सेना का आतंक क्या दिल्ली में नहीं होना चाहिए ?

* नैतिकता जिद से आती है | पुरुषों को यह गाँठ बाँधना होगा कि उन्हें औरतों का आदर करना है , माँ समझकर - बहन समझकर या देवी समझकर | या यही समझकर कि वे हमारी रक्षिता हैं | इसमें कोई बुराई नहीं है , भले असमानता का कुछ अंश है | मानना पड़ेगा कि व्यवहारों में विसंगति के कारणों में एक छोटा सा हिस्सा बराबरी और समतावाद का भी है | बराबर हो तो भुगतो | लो करो बराबरी | इसमें तो ताक़तवरों की चाँदी होती है | औरत यदि थोड़ी कमज़ोर दिख जायगी तो उसका कुछ नुक्सान नहीं हो जायगा | लेकिन नहीं , वे न बाप की मानेंगी , न बूढ़ों की सुनेगी | तो जवान भी उनकी नहीं सुनने वाले |

* तथापि , दिन दूर नहीं जब लडकियाँ बलात्कार से बचने में सक्षम और समर्थ हो जायेंगी |

* नवाब लोग पान खाते थे तो उनके बगल में पीक दान भी रहता था | अब के नवाब तो पूरी सड़क को पीकदान बनाये हुए हैं |

* शायद धूप
कुछ निकल आये
कविता लिखूँ |
[ 'शायद धूप' नाम से मेरी कविता / हाइकू की कोई किताब हो सकती है ]

* थोडा ओंकार
ज्यादा सा अहंकार
मेरी ज़िन्दगी |

* लाभकारी है
निरुद्देश्य घूमना भी
यह जानिए |

* शांत चित्त हो
बैठो हमारे पास
उपासन में |

* शून्य में जाओ
जब भी मौक़ा मिले
ध्यान प्रणाली |

* अच्छा होता है
शून्य में विचरण
शांति समग्र |

* मिलेगा उसे
जो उसका देय है
निश्चित मानो |

* समतावादी
अपने बराबर
किसी को नहीं |

* पड़ता ही है
चाहना को रोकना
कुछ न कुछ |

* चाहें न चाहें
कोई लड़कियों को
मारता नहीं |

* यही तो हुआ
कि तुम बूढ़ी हुई
मैं बूढ़ा हुआ !

* बहुत आये
तुम्हारे जैसे बली
बहुत गए |

* कहा तो मैंने
मुझे प्यार चाहिए
सुनो तब न !

* कोई इंतज़ार
बढ़ा देता है उम्र
अनेक बार |

* नो प्राबलम
बहुत बड़ा मन्त्र
जीवनाधार |

* एक उम्मीद
हज़ार नेमत है
जीवन दायी |

* अन्याय होता
अन्याय लगता भी
कुछ ज्यादा है |

* लिखता जाऊँ
ख़त्म ही नहीं होतीं
बातें , क्या करूँ ?

* Do you know God ? If you know God , send him a friend request .:-)

* देखिये , अन्याय होता तो है | लेकिन इसके साथ यह भी है कि कौन किस बात को और कहाँ  तक किसी बात को अन्याय समझता है, इससे भी फर्क पड़ता है | वह उदाहरण लिख दूँ, जिससे यह विचार आया | मान लीजिये आप के किसी अवैध कब्ज़े को पालिका कर्मियों ने उजाड़ दिया , या ट्रैफिक वाले ने आपका चालान कर दिया | ज़ाहिर है , आप ने उन्हें देख -पहचान लिया | आप इज्ज़तदार -रसूखदार हैं | आपने इसे अपनी बेईज्ज़ती समझी और अवसर पाकर उन्हें पीट दिया बिना यह सोचे कि वे तो अपना  कर्तव्य निभा रहे थे | [ यही आजकल अधिकाँश हो ही रहा है ] | इसलिए मेरी स्थापना यह है कि इस तरह का अपमान हो या सचमुच का , अन्याय हो या अन्याय होता लगे , किसी भी दशा में बल अथवा शस्त्र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए |

* [ उवाच ]
# आत्मसंयम का नाम है संस्कृति - संस्कार | बलात संयम को कहते हैं राजनीति- सरकार |
# हास्य आदमी के अहंकार को मिटाने में मदद करता है | वह किसी के मजाक का बुरा जो नहीं मानता  !
# यदि मैं जानता और मानता हूँ कि ' भय बिनु होय न प्रीत ' , तो मुझे इस्लाम की कथित कड़ाई का समर्थन करना चाहिए |
# आप ने किसी से उसकी जात पूछ ली , तो यकीन मानिए आपने तो अपनी जात बता दी |
# मुझे कुछ शब्दों से आपत्ति है , जिसे मैं शब्दों के द्वारा व्यक्त करता हूँ |  OR =
मेरे कुछ शब्दों का , शब्दों के लिए , शब्दों के द्वारा विरोध है | [अस्पष्ट?]
# कनेक्टिकट विद्यालय में हुए संहार की घटना को सन्दर्भ में लें | अब समय आ गया है कि अस्त्रों का सम्पूर्ण समापन करें और " किसी का भी किसी भी दशा में वध नहीं का मन्त्र अपनाएँ " |

* [ अमानव वाद ]
# मत बंद कीजिये /
अपने जानवर का दरबा /
वरना जानवर अन्दर /
बंद हो जायगा /
तुम्हे ज्यादा जानवर बना देगा | $

# [ अमानव वादी ]
आप होंगे मनुष्य /
यह नाम तो आपने दिया /
मुझको गलत , जैसे /
किसी का नाम आपने /
ईश्वर दे दिया /
वरना मै तो जानवर हैं /
यह नाम मैं अपने लिए /
स्वीकार करता /
धारण करता हूँ /
अपने पशु बंधुओं के साथ /
भाईचारे में | $

# मनुष्य बनने , या कहें , महज़ कहलाने के चक्कर में हम कई असहज -अस्वाभाविक -अप्राकृतिक और  गैर ज़रूरी किंवा , आप की भाषा में अमानवीय हरकतें कर जाते हैं कि हम जानवरों को शर्म आती है | क्योंकि वे साधारण जैविक आचरण के विरुद्ध होती हैं |

* बीड़ी पिया था उसने
उसने मुझे चूमा
सर अभी तक
चकरा रहा है |
$
* ऐसा करेंगे
वह मिलें तो हम
वैसा करेंगे
सोचता रह गया
क्या क्या करेंगे ?
$
[ BADMESH ]
* उर्दू और हिंदी में वही फर्क है जो मुशायरे / कवि सम्मलेन के दौरान नीरज और बशीर बद्र में है |
[सुना है जहाँ नीरज जाते हैं वहां बशीर बद्र नहीं जाते, और जहाँ बशीर बद्र होते हैं वहां नीरज नहीं होते]

* वेश्या वृत्ति कानूनी होनी चाहिए या नहीं , यह उसी तरह का प्रश्न है जैसे F D I आनी चाहिए या नहीं ?

[बदमाश चिंतन]
* यदि किसी को सपने बहुत आते हैं , तो उसे स्वप्न दोष का रोगी नहीं माना जा सकता |
* मुझे बूढ़ों का व्यक्तित्व बहुत जमता है | इरफ़ान हबीब , हबीब तनवीर , रजनी कोठारी को मैंने देखा और सराहा है | अब मुझे बूढ़ा होना अच्छा लगने लगा है |
* मुझसे कोई व्यापार करा ले , और मेरा दिवाला निकलने से बच जाए तो मैं अपनी जाति और पूरी जाति प्रथा के खिलाफ हो जाऊँगा |

[ शेरो शायरी ]
* जेहि विधि मिले खूब विज्ञापन ,
समझो पत्रकारिता आपन |

* खुद के घर तो बहुत हैं , उनमें वह रहता नहीं है ,
कभी वह घर पर हो, तो सोचता हूँ मिल आऊँ |

* हर आदमी चालाक बहुत है , अपनी अपनी पारी में ,
हर मनई बुरबक है भारी , अपनी अपनी पारी में |
मुँह बाये हर लोग यहाँ पर अमृत घट पी जाने को ,
हर मनाई गू खोद रहा है अपनी अपनी पारी में ||

* न हिंदी से मेरा नाता , न उर्दू से मेरा मतलब ,
जसमे बातें मेरी आ जायँ, वही भाषा मकतब |

* एक शायर का यह मिसरा बहुत प्रभाव शाली है =
" तुम्हारे क़दमों को रोक पाए , किसी में इतनी मजाल क्या है "

2.12.12

धार्मिक नाम केवलम


Published in "Humanist Outlook", a journal of INDIAN HUMANIST UNION - Vol. 13 No. 4 - Summer 2012 . Pages 127-130
Hindi Column by - Ugranath Nagrik 
                     - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 
                                                             धार्मिक नाम केवलम 

        इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत देश में धर्म की परिभाषा कर्म , कर्तव्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है | मूल्य [ value ] को भी यहाँ धर्म कहा जाता है | सामान्य जीवन में भी राष्ट्र धर्म, राजधर्म, आपद धर्म, पुत्र - पितृ - मातृ - भ्रातृ - पति -पत्नी - पड़ोसी धर्म, शिक्षक - गुरु धर्म आदि शब्द सब कर्तव्य चेतना के के रूप में ही प्रचलित हैं | यहाँ तक कि सबंध भी धर्म से जुड़े हैं | धर्मपत्नी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है | श्री कृष्ण का सिर्फ एक ही प्रसिद्ध उपदेश सम्पूर्ण गीता और भारतीय वांग्मय के परिचय का पर्याय बन गया है - ' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ' | धर्म की परिभाषा का एक सूत्र भी है - धारयति इति धर्मः | इसकी व्याख्या कुछ अन्य भी है, पर मानववादी समझ के अनुसार -  हम जो आचरण, जो नैतिकता अपने दुनियावी ज़िन्दगी के लिए ' धारण ' करें या करते हैं, वह ' धर्म ' है | यहाँ तक कि हमारे सम्बन्ध भी धर्म से जुड़े हैं | धर्मपत्नी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है | यहाँ चैरिटी [ कल्याण, परोपकार ] को भी धर्म ही कहा जाता है | चैरिटेबुल हास्पिटल, यानी धर्मार्थ चिकित्सालय | भारतीय लोकधर्म है - परहित सरिस धर्म नहिं भाई | हाँ , यह भी एक परिभाषा है धर्म की - आग का धर्म है जलाना, फूल का धर्म है सुगंध बिखेरना, सूर्य का रौशनी, चन्द्र का शीतलता प्रदान करना | बोलिए, अब कहाँ जायँगे धर्म से भागकर भारतवर्ष की इस परिभाषा के अनुसार ? क्योंकि ' धारण ' तो करते हैं हम भी नैतिकता, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व इत्यादि मूल्य ! इसलिए मैं स्वयं लोकतंत्र , डिमोक्रेसी को एक धर्म मानता हूँ, और इसे इसी रूप में लेने का आग्रह करता हूँ |
लेकिन मज़हब नहीं | क्योंकि निश्चित ही धर्म, मज़हब और रिलीजन से कुछ भिन्न अर्थ रखता है, और निस्संदेह किसी भी शब्द के अर्थ की आत्मा को उसकी अपनी ही भाषा में ठीक से समझा जा सकता है | लेकिन विकास के क्रम में संसार इतना सिकुड़ गया, भाषाएँ इतनी सम्मिश्रित और मनुष्य इतना बहुभाषी हो गया है कि शब्दों के अर्थों के सूक्ष्म विभेद समाप्त हो गए | अब गोंड, ईश्वर, अल्लाह एक हो गए और धर्म, मज़हब, रिलीजन एक दूसरे के समानार्थी - पर्यायवाची | अब इस विलाप से कोई लाभ नहीं कि हाय ! हमारा धर्म कोई रिलीजन, मज़हब नहीं है , वह तो एक जीवन शैली है | हो तो हो , पर अब वह अन्य अर्थों में भी जाना जायगा |
          फिर भी चलिए, कर्म पर ही थोड़ा ध्यान देकर इसकी विडम्बना देखते हैं | जब कोई व्यक्ति अपना परिचय किसी धर्म के साथ जोड़कर देता है तो क्या हम कह सकते हैं कि वह किसी कर्तव्य संहिता के प्रति प्रतिबद्ध है ?
[नरेंद्र मोदी को अटल जी ने राजधर्म निभाने की हिदायत दी थी,क्या मोदी जी ने उसे व्यवहृत किया ?] 

   यहाँ एक मनोरंजक विचार मस्तिष्क में आता है | क्यों न ऐसा किया जाय कि देश में प्रचलित धर्मों की आचार संहिताएँ बनवाकर उनका पंजीकरण कर लिया जाय और धार्मिक सदस्यों से तदनुसार उनके पालन की अपेक्षा की जाय | यदि वह उस पर खरा न उतरे तो उसे सम्बंधित समूह से बहिष्कृत कर दिया जाय | अनुमान किया जा सकता है भारत की आधे से अधिक जनसंख्या धर्मों से निकल कर सामान्य नागरिक की उपाधि धारण कर लेगी और तब कामन सिविल कोड सबको स्वीकार हो जायगा | लेकिन ऐसा होगा नहीं | इससे यह सिद्ध है कि धर्म का कोई रिश्ता कर्म से नहीं रहा | ये सब मात्र पहचान चिन्हों के रूप में है मनुष्यों में अंतर हेतु, बिल्कुल जातियों की तरह, जन्म से सुनिश्चित विभेद स्वरुप हैं | बिल्कुल प्रासंगिक है यहाँ यह मुद्दा उठाना कि व्यक्ति का धर्म उसके पैदा होने के साथ ही उसके माता-पिता क्यों तय कर दें ? अभी तो उसने न कुछ पढ़ा है, न जाना है | वयस्क होने पर वह अपना कोई धर्म चुने या न चुने ,यह उसकी स्वतंत्रता होनी चाहिए | महत्त्वपूर्ण है यह भी प्रश्न कि नागरिकों की व्यक्तिगत आस्था विश्वास और धर्म से सेकुलर राज्य को कोई मतलब क्यों हो ? वह जनगणना में धर्म का कालम रखे ही क्यों ?
    अलबत्ता इससे भी व्यक्तियों में उनके धार्मिक परिचय का राक्षस पीछा छोड़ने वाला नहीं है | यहाँ तो नाम ही बता देते हैं आप का धर्म क्या है ? अब माँ-बाप अपने बच्चों का नाम अपनी पसंद के अनुसार कुछ तो रखेंगे ही , यह उनका अधिकार है | इसलिए धर्म , जैसे भी हों , उनके आधार पर जनगणना सचमुच जटिल मामला है | अपने ही साथियों का मानना है कि इसकी डेमोग्राफी राज्य के पास होनी आवश्यक होती है | इससे सहमत हुआ जाय या नहीं पर जब तक यह प्रश्न हमसे पूछा जायगा , हमें कोई न कोई उत्तर देने के लिए तो तैयार ही होना होगा | इस उद्देश्य से विगत जनगणना के अवसर पर              लखनऊ में हम कुछ लोग सक्रिय हुए | [स्व के के जोशी जी के आवास पर] मीटिंग की गई कि धर्म के कालम में हम लोग क्या लिखायें ? कोई नहीं , अन्य , मानववादी , मानवतावादी, सेकुलर, सर्वधर्मी  आदि नामों पर इतनी चर्चा हुई कि तय कुछ नहीं हुआ | इसे खाली छोड़ना भी एक विकल्प था लेकिन फिर उसे जनगणना कर्मचारी के विवेकाधीन हो जाने का अंदेशा भी तो था |
        तय नहीं हुआ , लेकिन तय होना तो है मानववादियों की एक पहचान के साथ सर्वाइवल के लिए | 
 कोई मानववादी कर्त्तव्यविमुख अर्थात धर्महीन तो नहीं होगा, लेकिन इससे उस कागज़ के प्रपत्र [फार्म ] से क्या मतलब ? वह तो कहता है अपने धर्म का नाम बताओ, हमको तुम्हारे " गुण धर्म " से क्या मतलब ? बिल्कुल सही है उसका पूछना | क्या हम लोग ही सेकुलरवाद के तहत यह नहीं कहते रहे हैं कि धर्म एक निजी मामला, व्यक्तिगत आस्था का विषय है ? तो इसलिए नैतिक गुण तो हमारे आचरण   के लिए हैं | इस युग में अपने मूल्यों के अनुरूप या कोई तो शाब्दिक नाम भी होना चाहिए मानववादियों के परिचय के लिए ! 
वह नाम हमें कौन देगा ? हमारा कोई गुरु तो है नहीं , न कोई देवदूत , न कोई ईश्वर , न कोई किताब ! हमारी कोई परंपरा या लौकिक प्रतीक पुरुष [ ICON ] भी नहीं है | ऐसे में इसे तो हमें स्वयं तय करना पड़ेगा | चलिए , आरम्भ इस विचार से करते हैं कि हम सब दायित्वबोधयुक्त , कर्त्तव्यपरायण, सत्यनिष्ठ लोग हैं | तो यह तो हमारी नागरिकता के गुण समूह में ही अंकित हैं, हमारी संवैधानिक बाध्यता है | किसी भी देश के नागरिक का यह तो स्वाभाविक गुण है या होना चाहिए | हम किसी देश के अंश हैं , तो देश की नागरिकता हमसे कुछ मूलभूत कर्तव्यों की अपेक्षा रखती ही है , और हम उस पर खरा उतरने के लिए तैयार भी हैं | अतः हमारे धर्म का स्वाभाविक और अनिवार्य नाम हुआ - " नागरिक धर्म " | अलबत्ता , इसमें एक राष्ट्र - विशेष के प्रति निष्ठां हमारी अंतरराष्ट्रीय मानववादी चेतना के विपरीत है, लेकिन यह भी तो है, कि देश तो है | वह एक यथार्थ है, हमारी रिहाइश यहीं है, उसके राज्य के हम निर्माता हैं, हमारी संपत्ति इसी के सिक्के में है और इसके अलावा दुनिया में हमारा कोई ठौर नहीं | अंतरराष्ट्रीयता (Internationalism) के लिए भी एक राष्ट्रीयता (Nationalism) ज़रूरी है |
     इस बाधा को पार करने के बाद अब जो बाधा आती है वह यह है कि इस पर प्रबुद्धजनों की यह आपत्ति होती है कि - " यह भी एक धर्म बन जायगा " | यानी एक बुराई को ख़त्म करने के लिए दूसरी बुराई क्यों पालें ? ऐतिहासिक अनुभवों से गुज़रते हुए उनका यह भय वाजिब भी है | लेकिन करें क्या ? हमारे लिए तो हमारा नाम भी अनावश्यक है जो मनुष्यों में भेद कराता है | लेकिन क्या नाम के बगैर कोई रह सकता है | उसी तरह क्या धर्म के नाम के अभाव में हमारा परिचय पूरा होगा ? जाति तो यूँ ही जोंक की तरह चिपका हुआ है जिसे हम अपने शरीर से निकल नहीं पा रहे हैं , धर्म का क्या विनाश करेंगे ? अतः हमारा " युगधर्म " है धर्मों का विकल्प देना | मेरा तो मत है कि हम अपना काम करें और  इस विश्वास के साथ करें कि हम अपना कर्तव्य निभा रहे हैं | इतनी अनिश्चयता तो हमें कहीं नहीं ले जायगी | कहा भी है - संशयात्मा विनश्यते | इसलिए हम भरोसा करें अपनी आने वाली पीढ़ियों पर | सचमुच वे हमारे प्रयासों से इतने बुद्धिवादी, जागरूक और वैज्ञानिक चेतना में संस्कारित हो चुके होने चाहिए, कि वे चाहेंगे तो हमारे धर्म को मानेंगे, उसमें फेरबदल कर लेंगे, कोई नया बना लेंगे और हमारी निर्मिति को कूड़ेदान में फेंक देंगे |   
    अब  समस्या आती है व्यवहार की | हमारी बाधा यह है कि हम स्वतंत्रचेता मुक्तमानस जन किन्ही बंधनों में नहीं बंधना चाहते , भले वह नाम भर के धर्म का बंधन क्यों न हो | एक दृष्टि से यह उचित तो है, लेकिन लौकिक जीवन के यथार्थ हमें इतनी स्वतंत्रता लेने कहाँ देते हैं ? हम किसी न किसी धर्म के दायरे में रहने को विवश हैं | तो क्यों न ऐसे धर्म का अविष्कार करें जिसके अंतर्गत हम जितना चाहें उतना स्वतंत्र हो सकें ?  
      धर्म के रूप में ' मानववाद ' एक आदर्श सिद्धांत, और ' मानववादी ' एक सही शीर्षक हो सकता है | पर इस पर हक तो पहले ही धर्मों द्वारा जताया जा चुका है | इस शब्द के साथ मूल खामी यह है कि इसे मानवतावाद , इंसानियत के अर्थों में लिया जाता है , जो कि स्वाभाविक है | यदि वाद की गहराई में न जायँ तो दोनों में बहुत अंतर है भी नहीं | तब तो सारे धर्म कहेंगे तुम नाहक अलग हो रहे हो | हम इंसानियत ही तो सिखाते हैं ? यह देखो हमारी किताब , यहाँ समता है, भाईचारा है, सारी तो मानवता की बातें हैं | इसलिए उनसे कतई बच निकलने और उनका सही विकल्प बनने के लिए ऐसा रणनैतिक शब्द ढूँढने की ज़रुरत है जो उनकी हर तरह से काट भी कर सके और धार्मिक मूल्यों के लिए पराया भी न हो | 
        आखिर, वे किसी भी धर्म के हों , अपने को धार्मिक ही तो बताते हैं ? उन्होंने हमारे वार करने के लिए जगह यह बना रखी है कि धर्म के साथ हिन्दू - मुस्लिम नाम जोड़ रखा है , जो कि फालतू और अनावश्यक है | बस उसी को हम हटा दें और उनकी तुलना में एक लम्बी लकीर खींच कर कुछ बड़े हो जायँ | हम अपने धर्म का नाम केवल ' धर्म ' कर दें , विशुद्ध धर्म, स्पष्ट कर्तव्य, निष्कपट मानव मूल्य, ईमान से इंसानियत और जनगणना रजिस्टर या सामान्य सामाजिक परिचय में भी, ' धार्मिक ' हो जायँ |
देखिये, अब आपके सामने है एक पूरा खुला सारा आकाश | धर्मों के जगत में और अध्यात्म की दुनिया में खूब विचरण कीजिये | थोड़ी सी रणनैतिक दृष्टि से जीवन में कितना परिवर्तन, विस्तार आ गया ? पहले केवल पैदाइशी धर्म आपके पास था , अब सारे धर्म आपके हो गए | आपने सबको हथिया लिया अमरीका के आक्युपायी वाल स्ट्रीट आन्दोलन जैसे कार्यक्रम के फलस्वरूप ! अब सारे ईश्वर-अनीश्वर आपके, सारी किताबें आपकी, सारे धर्मगुरु और उपदेशक आपके | जो भी चुनना है चुनिए, स्वीकार कीजिये , खाइए - पचाइए | इनसे प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व मिलेंगे, जो आपको मानवता की सेवा के मार्ग में प्रशस्त करेंगे, कभी थकने नहिं देंगे |
   अंततः , संदेह न करें | धर्म का कोई नाम नहिं होता | वह तो सनातन, शाश्वत होता है - आप ही कहते हो ! तो फिर प्यार को प्यार और धर्म को धर्म ही रहने क्यों नहिं देते , कोई नाम क्यों देते हो ?             
      निष्कर्षतः , हम अपने धर्म का नाम ' धार्मिक ' बतायें , और अपना आचरण एवं व्यवहार भी इसके अनुकूल बनायें | धार्मिक नाम केवलम , और कुछ नहीं | देखिये कौन हराता है आपको ? आप विजेता होते हैं या नहीं ?  
      किधर से बर्क चमकती है देखें ऐ वाइज़ ,
      मैं अपना जाम उठता हूँ तू किताब उठा |    
      [ ज़िगर मुरादाबादी ]    # 
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 
-- उग्रनाथ नागरिक  

औरत कर लीजिये


[ उवाच ]
१ - अगर आप को कहीं ' बिल्कुल समय ' से पहुंचना हो , तो अपने साथ एक औरत कर लीजिये |

२ - लड़ाई लड़ना दलित क्या जानें ? देखिएगा , उनकी लड़ाई उनसे ऊपर वाले लड़ेंगे | वही लड़ ही रहे हैं |

३ - बाराती लोग यह काम अच्छा कर रहे हैं | कुछ पेशेवर नर्तक - नर्तकियों को बाराती बनाकर नाचने के लिए ले जाते हैं |

४ - जीभ मुलायम होता है इसलिए टूट कर नहीं गिरता दाँतों की तरह | कड़े नाखूनों को पानी से भिगो - मुलायम करके कटर से उड़ा दिया जाता है |

५ - वीसा अग्रवाल शायद उन्हें कहा जाता है जिन्हें विदेश जाने के लिए वीसा कि ज़रुरत नहीं होती होगी |

६ - यदि आपको कभी संदेह हो कि आदमी जानवर है , तो किसी बफे पार्टी में हो आइये न !

७ - जिन्हें बार - बार पेशानी पर आती लटों को समेटने की ज़रुरत पड़े , ऐसी औरतों से नारी मुक्ति आन्दोलन तो संभव नहीं है |

८ - जिसने कभी - कभी चोरी कर ली हो , झूठ बोला हो , सर से पाँव तक कपडे पहनता हो , वह गांधी के बारे में कैसे बोल सकता है ?

९ - इतना पाप तो नहीं किया होगा मैंने ! मेरी उनसे मुलाक़ात ज़रूर होनी चाहिए |

१० - अब तो मुझे यह कहने में संकोच होता / हिचक होती है कि मैंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था | इतने तो इस आशय के उन लोगों के समाचार छपते हैं अखबारों में , उनके मरणोपरांत |

११ - मैं कभी अपने को बूढ़ा नहीं देखना चाहता , इसलिए मैंने अपने आप को बड़ा भी नहीं होने दिया |

25.11.12

अपने ही पैमानों पर


* लोग कहते हैं तो ठीक ही तो कहते हैं ,
मैं अपने ही पैमानों पर खरा नहीं उतरा |

स्त्री के देह का अधिकार


[ कविताभ्यास ]
१ - सच है कि
ज़िन्दगी के फेजेज़ होते हैं
आते हैं , तो जाते भी हैं |
मैं तो यह पूछ रहा था कि
जीवन में ऐसे कालखंड
आते ही क्यों हैं ?
# #

२ - स्त्री का है ज़रूर
स्त्री के देह का अधिकार ,
तो करें न इस्तेमाल
स्त्री अपनी देह पर अपने
अधिकार का , अधिकारपूर्वक !
कौन रोकता है ?
# #

नेता का मात्र काम


* सत्य संत को
कहीं चैन नहीं है
यहाँ या वहाँ |

* कुछ भी करो
धर्म के नाम पर
सब जायज़ |

* फीता काटना
नेता का मात्र काम
दीप जलाना |
[ आग लगाना ]

18.11.12

बाल ठाकरे की मौत

* आयु में कमी आड़े आ रही होगी , वरना जो लोग बाल ठाकरे की मौत पर ख़ुशी मना रहे हैं , वे जिन्ना की मौत पर तो ज़रूए रोये होते |

17.11.12

आदमी की पहचान


* अब आदमी की पहचान
उसके कपडे जूते , मोटर गाड़ी से
होने लगी है ,
और प्यार की मात्रा नपने लगी
इस बात से कि वैलेंटाइन दिवस का
कार्ड कितना लम्बा था, या आपने
कितना मँहगा तोहफा दिया |

क्या कहा जाय कि -
दुनिया अब सचमुच
" दुनिया " हो गई है , और
इसमें दुनिया से अलग
अब कुछ भी नहीं है ?
# # #
[ यह कविता नहीं है ]

हम भी चुप


* हम भी चुप
आखिर बात क्या है
तुम भी चुप |

* तनाव में हूँ
कारण कुछ नहीं
अकारण ही |

* मैं दुनिया के
पाखण्ड देखता हूँ
सन्न होता हूँ |

* बिना त्याग के
मिलता नहीं कुछ
फल तो दूर |

* परेशान हूँ
अनिवार्य चिंतन
दुखद होता |

16.11.12

बराबरी अच्छी बात


[ नागरिक उवाच ]
* बराबरी तो अच्छी बात है , लेकिन इसके झाँसे में नहीं आना चाहिए |

* सत्ता का तो हो सकता है , पर जनता का कोई विकल्प नहीं है | उसे बदला नहीं जा सकता |

दुःख जायेगा


* दुःख आएगा
सहना ही पड़ेगा
दुःख जायेगा |

*  थोडा पढ़ते
काम पर चलते
अब लिखते |

* एक कमी हो
तो उसे बताऊँ भी
क्या क्या गिनाऊँ ?

* ये हिंदी वाले
देश को बाँट देंगे
ये हिन्दू वाले |

* पसंद नहीं
लाइक का अर्थ है
जी , देख लिया |

* नहा धोकर
बैठे सिस्टम पर
बैठे ही रहे |

* यफ बी पर
न व्यक्ति न विचार
सब गलत |

* उद्धत होते
शक्ति संतुलन में
बाल ठाकरे |

* मैं तो बैठा था
तुम नाराज़ हुए
मैं चला आया |

* जो लिखता है
वह पत्रकार है
भले कविता |

28.8.12

स्वप्न संसार


* प्रेम कल्पना लोक , स्वप्न संसार है | जबकि विवाह ज़िन्दगी का यथार्थ | यथार्थ में सपने नहीं चलते | अच्छा हुआ जो मेरा सपना यथार्थ में नहीं तब्दील हुआ |

* मैं कोई सौन्दर्य प्रसाधन इस्तेमाल नहीं करता | यहाँ तक कि दाढ़ी बनाने के लिए भी शीशा देखने की ज़रुरत नहीं होती मुझे | पर नहाने के बाद अगल बगल थोड़ा पावडर लगाने की आदत है मेरी | क्या यह विलासिता की श्रेणी में आता है
* औरतें सुंदर तो बहुत होती हैं | अच्छी भी लगती हैं | लेकिन दुःख बहुत देती हैं |
* किसी को याद है मुमताज को शाहजहाँ से कितने बच्चे जनने पड़े थे ? शायद दर्ज़न भर | यह प्रेम विवाह का नतीजा था | भुगतना ज्यादा तो मुमताज को पड़ा | थोड़ा शाहजहाँ को भी ज़रूर, ताजमहल तीमार करवाने में |

दो धर्म मनुष्य के

* अब दो धर्म बनते हैं मनुष्य के | जैसा वी एम तारकुंडे ने महात्मा गाँधी पर लिखते हुए उसका शीर्षक दिया था = SECULAR AND RELIGIOUS MORALITY  | उसी तरह दो धर्म मनुष्यों द्वारा धारण किये जायेंगे | सारे किताबी , ईश्वरवादी , परलोकवादी  धार्मिक नैतिकतावादी होंगे , और नास्तिक इहलोक वादी , बुद्धिवादी , विज्ञानवादी , लोग सेक्युलर होंगे |     

6.8.12

Haiku


[लघु कविता]

* यह तो चिट्ठी है
जिसका इंतज़ार करता हूँ ,
तुम्हें तो जानता हूँ
तुम नहीं आ पाओगे |

10.6.12

नास्तिक मुनि

विनम्रता पूर्वक  मैं एक बात तय जानता हूँ [ चाहे इसका कोई  बुरा माने या भला , या कोई आरोप लगाये कि मैं तो भविष्यवाणी जैसा  बोल रहा हूँ, या फ़तवा दे रहा हूँ ]  कि यदि भारत में हिंदुत्व को दलितों को नहीं सौंपा  गया तो भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना कभी भी नहीं हो पायेगी  | और यह भी समझ लें कि दलित जो भी नीति अपनाएगा वह हिंदुत्व ही होगा , भले किसी की समझ में आने में अभी मुश्किल लगे | बस जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही राष्ट्रहित में अच्छा होगा | चाहे जितनी उछल कूद में समय नष्ट कर लें , सवर्णों के वश का काम नहीं है हिंदुस्तान में हिन्दू राज्य लाना | {नास्तिक मुनि}

19.5.12

अन - अनुशासन

 अन - अनुशासन :-
फौज के बीच झगड़ा तो होना ही था | सब जनरल के झगड़े का रंग है | 

आँसू के खून


[कविता] - आँसू के खून
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'खून के आँसू'
एक प्रचलित मुहावरा है ,
तो आँसू के भी खून
ज़रूर होते होंगे !
हैं न मेरे पास
शिराओं में दौड़ते !

16.5.12

priyasampadak

' प्रिय संपादक " [ 46167 /84 ] हिंदी मासिक
यह शीर्षक मेरे पास १९८४ से रजिस्टर्ड है | पुराना दिनमान पढ़ते , उसमे लिखते (सीखते) मेरे मन में यह सनक सवार हो गयी कि लोकतंत्र में लोक की आवाज़ को मुखर करती हुयी संपादक के नाम पत्रों की एक पत्रिका चलायी जानी चाहिए / चल सकती है | सो मैंने यह शीर्षक लेकर [संयोगवश यह मिल भी गया] इसे शुरू कर दिया | पर मैं परिवार के पालन के लिए गलत जगह सरकारी नौकरी में था | इसलिए इसे बहुत विस्तार देकर अपने सपनों के अनुकूल सफल न बना सका | कोई ग्लानि नहीं पर उल्लास को संतोष कहाँ ? मेरे मूल विश्वास में अब भी ज़रा भी कमी नहीं आई है कि ऐसा पत्र यदि संसाधनों और पत्रकारिता के कौशल के साथ डटकर चलाया जाय तो इसे दैनिक तक ले जाया जा सकता है और इसकी सफलता , जनतंत्र की सफलता होगी | कोई अभिमान नहीं पर आत्मविश्वास अवश्य है कि अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति मैंने अप्रतिम आस्था अपने भीतर विकसित की , और मिशनरी तरीके से अपनी आमदनी से पत्र को हर संभव तरीके से चलाया , यहाँ तक कि हार्ट अटेक होने पर बिस्तर पर पड़े - पड़े पोस्ट कार्ड लिखकर भी [जिसकी चर्चा उस समय टी वी पर सुरभि कार्यक्रम में भी हुई ] | सार्वजनिक रूप से असफल होने पर फिर उसे अपने व्यक्तिगत रचनाओं का पत्र / किताब बना दिया जो अब भी छिटपुट चल रही है | पर यह तो कोई बात नहीं हुई , और ६६ की उम्र के बाद तो कुछ होना भी नहीं है | उसे अब बंद करना पड़ेगा ,जो मेरी मृत्यु से पूर्व ही मेरी मृत्यु होगी | इसलिए अब प्रस्ताव करना चाहता हूँ अपने तमाम मित्रों से कि कोई इसे ले ले और चलाये | कोई शुल्क नहीं | कोई आग्रह भी नहीं कि उसे मेरे कल्पित रूप में ही चलाया जाय | कैसे भी चले एक आस ,एक प्यास ज़रूर है कि वह अभियक्ति की आग और मशाल बने तो  कितना अच्छा हो ----
उसी तरह का एक और पत्र अंग्रेज़ी में READERS write [weekly ]भी है - A journal of letters to the editor . RNI -1991
एक और पंजीकृत पत्र है " संक्षिप्त सत्य प्रतिलिपि (हिंदी मासिक )" RNI -1991,
और आख़िरी है - " नास्तिक धर्मनिरपेक्षता ( हिंदी मासिक )" RNI -1991 
मेरा ईमेल पता है - priyasampadak@gmail.com  और मोबाइल नं.है - 09415160913 .धन्यवाद !        

हाइकु कविता

[हाइकु कविता ]
इस तन में 
कुछ रखा नहीं है 
फिर भी पिले | #