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17.3.14

भँग की तरँग में नेताजी

भँग की तरँग में नेताजी 

नेता और तरँग एक साथ चलते हैं ,जिसमें तरँग नहीं वो नेता कैसा ?नशा और तरँग में
यही एक मोटा फर्क है नशा उतरने के बाद असलियत बता देता है और तरंग उतरती -
चढ़ती है इसलिए नेता भूतपूर्व हो सकता है मगर तरँग के कारण खुद को नेता ही
मानता है।

एक बूढ़े अर्थ विज्ञानी को एक नेता ने तरँग की घुट्टी पिला दी,घुट्टी पीने के बाद वो
भी नेता बन गए और अर्थ पर घूम घूम कर यह बताते फिरते हैं कि मेने किया बहुत
कुछ मगर नजर नहीं आता है। अब उन्हें कौन समझाये कि ताऊ काले रँग में सब
छिप जाता है नजर आता है केवल रँग। …

एक उप प्रमुख तो भँग की तरँग में सपने देख कर उसका लाइव प्रसारण भी करने
लग गए। कम मत समझना ,इस बार पप्पू 200 अँक से पास होगा,सब कुछ रट
लिया है बस 2 G, खेल ,मकान ,जमीन ,रक्षा और कोयला ये पाठ दर्द बढ़ा रहे हैं।
ये कोर्स में नहीं है ,बाहर से जोड़ दिए गए हैं ,भूल जाओ   …

एक दल की माँ तो भाँग की तरँग को दस साल से उतरने ही नहीं दे रही है सुबह
शाम हर पत्ते को पिसती है मगर हर तरँग में छुटकू फिर भी छुटकू ही नजर आता
है ,बड़ा ही नहीं होता छुटकू !हे राम ,कब बड़ा होगा ,सयाना होगा ,घोड़े चढ़ेगा  …

एक दल के नेता तरँग में चैन उतरी साइकिल पर पेडल मारे जा रहे हैं। साँस
फूलने के बाद उतरती तरँग में खुद को वहीं का वहीं पाते हैं। एक दौ गाली
और झिड़की पुरानी कुर्सी को देते हैं और चढ़ती तरँग से जोर से पेडल मारते हैं,
सपने देखते हैं,शम्भू मेले का आयोजन करते हैं ,हरे -हरे पत्ते घिसते हैं मगर
तरँग ठहरती ही नहीं है  .... 

एक नेता तो अभी तक खाये हुए पत्ते चारे को पचाने के लिए तिहाड़ यात्रा पर जाते हैं
भँग के पत्ते को बट्टे पर पिसते हैं और नहीं खाने पर लठ बंधन पर ठुमका लगा देते
हैं खाने के बाद तरँग में गठबंधन की ताल पर उछलते हैं

एक विद्रोही ने कुछ समय पहले भंग कि नशीली घुट्टी बनायी ,पढ़े लिखे लोगों
पर आजमाई जब सबको एक साथ चढ़ गयी तो सबने तरँग में बैठा दिया टीले पर।
वहाँ ऊँचे टीले पर बैठने से विद्रोही का नेता में रूपांतरण हो गया। चढ़ती तरँग
में टीले पर कूदा कूद की ,निचे गिरा और रायता बना कर भंग घोटने लगा। भँग
की तरँग में चिल्लाने लगा -जोर लगा के  … सा ,खुद को तरँग में उड़ते पाया
लेकिन जनता ने रायता पी लिया और तरँग से बाहर आ गयी मगर भाई अभी
भी झूल रहा है ,जोर लगा के ही ई सा  …

एक नेता ने 15 साल पहले भंग की तरँग का बगीचा लगाया ,छक कर पी और
सबको घुट्टी पीने का न्योता दिया ,पहले गाँव वालो ने पी और झूम कर नाचने
लगे ,तरँग ऐसी चढ़ी की उतरी ही नहीं तब उस परफेक्ट पुड़िया को ले घर घर
पहुँच गए जो भी जिस भी कोने में बैठ कर पी रहा है तो तरंग में गाता है -हर
हर हर हर हर   …… घर घर घर घर     ....  यही तो तरँग की अद्भुत देन  ……       

27.2.14

अनुभूत चुनावी नुस्खे

अनुभूत चुनावी नुस्खे

नुस्खे हर कोई जनता है ,प्रयोग करता है और जब फलदायी होते हैं तो अनुभूत
नुस्खे का टैग मार दिया जाता है। लोकतंत्र भी अजब होता है क्योंकि हर नेता
हर नुस्खे को आजमा कर बैतरणी पार करना चाहता है।

   दो कौम में विवाद पैदा करवाना अनुभूत नुस्खा है इसलिए हर छोटा बड़ा
नेता छूट से इसे इस्तेमाल करता है क्योंकि विवाद से गुस्से का जन्म होता है
और गुस्सा दंगे के रस्ते से गुजर कर या खामोश रहकर वोट में बदल जाता है
और वोट से लोकतंत्र साँसे गिनता है।

   फिकरे कसना और ताने मारना भी सफल नुस्खा रहा है ,आम प्रजा को इसमें
रस आता है और जनता को कोई ताना रास आ गया तो हो जाए बम बम। आम
उम्मीदवार खास नेता में बदल जाता है। अभी एक भाई ने नया प्रयोग किया था
ढोल बजा कर पोल खोलने का ,किसी भी नुक्कड़ पर खड़े हो जाओ और ढोल
बजाकर पोल खोलने का स्वाँग रचो ,अगर स्वाँग असली जैसा लगा तो लोक
खुश और लोक खुश तो लोकतंत्र खुश।

पलटी मारना भी अनुभूत नुस्खा है बस जबान और दिमाग पलटने में गजब
कि फुर्ती चाहिए ,हवा का रुख पहचानो और दिशा बदल लो जिसने भी फुर्ती
से बदली कुछ ना कुछ पद पर चिपका दिया जाता है।

 गुट्टी पिलाने का नुस्खा भी रामबाण ईलाज है चुनाव में। कैसी भी गुट्टी हो
गरीबी मिटाने की हो या महँगाई हटाने की सब चलती है। नाव पार लगने पर
कोई परिणाम प्रजा को नहीं भी मिले तो भी अगले चुनावों में वही गुट्टी पुन:
पिला दो ,पूरा असर दिखायेगी ,शर्तियाँ ईलाज है यह।

 भगवान् के नाम के पर्याय शब्द का रटा लगा दो जैसे -राम ,ईसा,खुदा आदि
और पाँच लाईन के भाषण में सब पर्याय को पढ़ दो ,इससे आपकी छबी पर एक
सिक्का लगेगा जिसे लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है। यह सिक्का
जो भी लगाने से चुक गया समझो उसका तो डूबना तय है ,नुस्खा यह बताता
है कि एक कसम या वादा जो भी करो इन सबका नाम ले डालो ,हर कौम अपना
बना लेगी और नैया पार लगा देगी।

अनशन और धरना फिर से फैशन में आ गए हैं ,बात बात पर प्रदर्शन करो ,
सड़क पर जोर जोर से समस्या पर गला फाड़ो ,लोग सुनेंगे ,उनकी दुखती
रग को पकड़ो और खुद को मसीहा बताकर रग को दबाओ ,दबाने से जनता
का दर्द हरा हो जाएगा और तड़फड़ा कर बूथ पर ठप्पा लगा देगी और प्रजा
के दुःख से नए लोकयुग का प्रसव होगा जिससे जनसेवक का जन्म होगा ही।

गोल -मोल बातें करो ,बिना परिणाम की कथा सुनाते जाओ,जो कुछ अच्छा
हुआ उसे खुद के खाते में कैसे भी फिट करो और जो भी ख़राब हुआ उसे सामने
वाले के गले में लटका दो।

ये सब करने से भी 272 ना आये तो भी घबराओ मत ,अन्तिम अचूक नुस्खा
अपना लो ,कुछ हरे हरे लक्ष्मीजी के पत्ते हाथ में लो और शम्भुमेले की भीड़
पर उछाल दो ,शर्तियाँ सरकार बना लोगे ,आजमाया हुआ वशीकरण नुस्खा
है सांप नेवले को भी गले मिला देता है।   
        

26.2.14

बहुत टर्र टर्र करते हो ना !!

बहुत टर्र टर्र करते हो ना !!

दिल करता है पाँच -सात लाफे चटका दूँ  या फिर पोने दस कोड़े मारु बद जबान को !
जितनी साल जितनी खुराफातें करी थी साले ने पूरी की पूरी गिन गिन कर लिख
डाली दिवार पर ! और तो और उसकी बात को हवा देने के लिए एक गुनाह की
तस्वीर को लाख जगह चिपका डाला और वह भी फोकट में !किस घडी का पाप था
जो खुल कर सामने आ गया !!

क्या हुआ ताऊ,क्यों गर्म भजिये की तरह उफन रहे हो? हमने जानबूझ कर पूछ
लिया।

 अरे! कुछ साल हेराफेरी कर ली तो कौनसा गुनाह कर दिया,आज तक सबने
मिलकर कब पुण्य का काम किया था,65 बरस से यही सब तो हो रहा था ;मेने
थोडा संगठित तरीके से किया ,पूरा गिरोह बनाया ,बड़ी सफाई से चाटा था तिजोरी
को !पूरा का पूरा नहीं डकारा था ,इतना नुगरा नहीं था ,जहाँ -जहाँ नजर गई वहाँ
तक सबको चाटने का मौका दिया,कोई चाटते देख ना ले इसलिए सब पर नजर
भी रखी और तो और इन भिनभिनाती मक्खियों को भी चीनी के दाने वक्त बेवक्त
डालता रहा ,मगर आज ये मक्खियाँ सबके कानों में जा जाकर पोल खोल रही है
और वह भी ऐसे वक्त में जब खाली हो रही जगह को फिर से भरना था !!!

अरे ताऊ ,इनका क्या बुरा मान बैठे ,ये तो भुलक्कड़ हैं ,सब किया धरा माफ कर
फिर से विजयी भव: कह दिया करते हैं। मेने सांत्वना देते हुए कहा

अरे !तुम समय को समझ नहीं पा रहे हो बच्चू ,वक्त बड़ा ख़राब आ रहा है,मेने
पहले ही कहा था मत लाओ सोशल मीडिया को ,इन सबको जाहिल ,अनपढ़ ही
रहने दो पर वो बाप खुद तो चला गया और अब हम छाती कूट कूट कर रो रहे हैं !
ये अखबार वाले कोई कम तंग करते हैं हमको,थोडा सा हाथ सफाई में चुक गये
तो गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने लगते हैं ,ऐसा रिप्ले दिखाते हैं दिन भर कि
लोग उसे बार बार असली मान लेते हैं और ये जब थकते हैं तो सोशल मिडिया
के करोड़ों मेढ़क टर्र -टर्र करने लग जाते हैं। बोलते हैं पगार लेते हैं तो काम करो,
हम इनके चाकर हैं क्या !जब से ककहरा सीखा है इन लोगों ने तब से उपदेश देने
लगे हैं। ये तो हमारे ही हिये फूटे थे बच्चू ,फिरंगी साहबों के किस्मत ठीक थे ,मजे
से लूट लिया करते थे।

मगर अब तो ताऊ तेरे बचने के रास्ते नहीं दिख रहे हैं मन्ने तो।  मेने ताऊ को छेड़ा

मेरी बात सुन ताऊ गुर्राया और बोला -कम ना समझ हमको बच्चू !हमने दुनियाँ
देखी है, दौ चार टर्राते मेढ़को को पकड़ कर टेंटुआ दबा दूँगा ना सब कुएँ में छलाँग
मारते नजर आयेंगे !!

फिर शुभ काम में देरी क्यों ताऊ ,अभी तो लकड़ी भी तूने ही पकड़ रखी है ,घुमा दे
ताऊ, मेने पुन: उकसाते हुए कहा

ताऊ बोला -छोरे,बात तो तेरी नेक लागे और तेरा नँबर भी पहले आवै मगर सामने
जो समय है ना वो मेढ़कों का ही है। इबकै बार ये मेढ़कों ने मेरे पर ठप्पा मार दिया
और मैं फिर जीत के आ गया तो ये पक्का जाण ले कि सोशल मीडिया कोई कहानी
बन जावेगा!!

मेने जाते जाते कहा -ताऊ फिर तो पक्का जाण कि तेरे करम फुट ही गए।  सोशल
मीडिया तो रहेगा पर तूं कहीं नजर ना आवेगा। 

23.10.13

प्याज और सिंहासन

 प्याज और सिंहासन 

प्याज एक सब्जी भर नही है क्योंकि किसी भी सब्जी में आज तक वह दम देखने को
नहीं मिला जो प्याज में है। सत्ता के सिंहासन से जमीन पर पटकने का काम सिर्फ
प्याज ही करता है।
             जिन राज्यों में चुनाव माथे पर है उन सत्ताधिशो को नींद नहीं आ रही है
कारण यह नहीं कि विरोधी हावी है बल्कि प्याज गरीबी रेखा से ऊपर उठ गया है और
मीडियम वर्ग के ठीक ऊपर से निकल कर रहीश लोगों की थाली में जा गिरा है।
          वैसे आज तक बहुत घोटाले हुये मगर आम आदमी सब घोटाले पचा जाता
है इसे हम लोगों के बढिया हाजमे के उदाहरण के तोर पर देखा जा सकता है मगर
प्याज का घोटाला  …. सब की जबान से चक चक शुरू हो जाती है!
         एक भाई वातानुकूलित दूकान में सब्जी खरीदने गये  काफी सब्जियां देखी
और कुछ सौ दो सौ ग्राम खरीदी भी थोड़ी देर में पहुँच गए प्याज के काउंटर के
पास ,गहरा साँस लिया और प्याज को नाजुकता से छुआ ,पुरे शरीर में करंट दौड़
गया। प्याज का गुलाबी चेहरा दमक रहा था और मादक खुशबु से भरा था। भाई
प्याज को एकटक निहारने का आनन्द लेते रहे और फिर मिलने का वादा कर
पेमेन्ट काउन्टर की और बढ़े। जब बिल मिला जो प्याज का दस रूपये भी लिखा
था। उसने दूकान वाले से कहा -मेने प्याज ख़रीदा नहीं तो दस रूपये क्यों लिखे हैं ?
दुकानदार बोला -प्याज के काउंटर के पास से गुजरने के पाँच रूपये और हाथ से
उठाकर या कुछ देर रुक कर खुशबु लेने के पांच ,श्रीमान आपने ये दोनों काम किये
इसलिए दस का चार्ज लगा।
         प्याज के दाम बढ़ने से बहुत सारे सरकारी महकमे और छोटे बड़े व्यापारी
संतुलित बल्ड प्रेशर से जीते हैं। जब ये दोनों पॉइंट जुड़ जाते हैं तो इन दोनों के
घर सिक्के खनकते हैं ,रोता है बेचारा पैदा करने वाला या फिर प्याज की बलि देने
वाली।
       प्याज के दाम बढ़ते ही विरोधी दल इस तेज गेंद को हवा में तैर कर पकड़ने
की फिराक में रहते हैं। प्याज के नाम पर आंसू टपकाते हैं ताकि जनता की संवेदना
टपके और फिर चालु खटखटिया सरकार टपके। जो काम विरोधी दल के बड़े बड़े
मुद्दे नहीं कर सकते वो अकेले प्याज देवता कर देते हैं।
    देश की हर रूलिंग पार्टी जगती और सोती रहती है। जागने और सोने को रेशियो
कुछ भी हो यह मुख्य नहीं है मुख्य बात है उसके पास पक्के आंकड़े प्याज की
पैदावार के सम्बन्ध में होने चाहिए बाकी सब आंकड़े मौसम विभाग वाले हो तो
चलेगा क्योंकि प्याज के अलावा सब जगह सुंदर भड़कीले बहाने मिल जाते हैं मगर
प्याज के मुद्दे पर असल ही चाहिये यदि प्याज पर लीपापोती कर दी तो पक्का मानो
कि उस सरकार की पुताई होनी ही है
       यदि प्याज गरीबी की रेखा के नीचे भी भरपूर मिले तो समझिये आप फिर
सरकार बनाने वाले हैं और प्याज गायब तो वे सरकारे भी गायब  …………….

चलते चलते ---

       हम देश के सभी गरीबों को भरपेट भोजन देंगे क्योंकि हमारे पास खाद्य सुरक्षा
है मगर हमसे प्याज गारंटी ना मांगे क्योंकि इसका मिलना या ना मिलना भाग्य के
हाथ में है !!        

28.9.13

बुरे फंसे नानसेंस

बुरे फंसे नानसेंस 

चने के झाड़ पर पंच चढ़ गए तो गुज्जु ने हाथ खिंच लिए और हाथ खींचते ही पंच
फस गए कि अब इस हड्डी को कैसे उगले.उस दिन तो गुज्जु बड़ा भाईपना दिखा
रहा था -जोर जोर से चिल्ला रहा था -  चोर-चोर मोसेरे भाई !माँ ने कहा था कि ये
गुज्जु  बड़ा तीसमारखा है मगर हम ही नहीं माने ,माँ तो पटखनी खा चुकी थी
इसलिए डांट रही थी . सब पंचों ने विलाप किया -बबलू ,कुछ सोचो ,वो तो अनर्थ
करके भाग लिया और पिंडा अपने बांध गया .

बबलू बोला- तुम लोग तो खाए खेले हो ,ये फैसला तो सबके हक़ मैं था ,मेरे जीजू के
हक़ में था ,ये वाले अंकलजी ,छुक छुक वाले अंकलजी ,सिगड़ी वाले अंकलजी ,
फोन वाले अंकलजी ,भेंस वाले और बंगले वाले अंकलजी सबके हक़ में था ,नाश
हो उस गुज्जु अंकल का जो हाँ -हाँ में सर हिलाता रहा और अब साफ ना कर बैठा ,
अब मैं तो नया रंगरूट ,मैं क्या जानू कि चक्रव्यूह कैसे तोडा जाता है ,मैं तो इस
खटपट से दूर मामा के घर जाउंगा .

बबलू की बात सुन सब के मुंह उतर गए ,सब गले में अटकी हड्डी को लेकर परेशान
थे ,आखिर में तकले अंकल ने कहा - लुन्गीवाले,सब लपेटे में आ गए हैं ,गले में अटकी
ये हड्डी से गला लहुलुहान हो गया ,करमजले तूने ही तो कहा तो सब सेट हो गया ?

लुन्गीवाला बोला -सब सेट था ,मगर ये गुज्जु !हाँ कह रहा था की ना कह रहा था
ये समझने में मार खा गया और ऊपर से दादा भी दांत किटकिटा रहे हैं और सुपर
सर तो दूसरा धमाका नापसंद बम्ब से भी कर चुके हैं .

खुरखुरे बोला -एक उपाय है ,अम्मी के पास चलते हैं ,विलायती बादाम की खोपड़ी
में जरुर कुछ छटकने का उपाय होगा .

सब के सब अम्मी के घर की ओर भागे .सबको भागते देख अम्मी समझ गयी की
जरुर कुछ कलई खुलने वाली आफत आन पड़ी है .

अम्मी बोली -क्यों सिटपिटाये हो कर्मजलों?

दुग्गी बोला -गेम पेक होना है ,वो तो साहूकार बन गाँव भर में डुगडुग्गी पिट रहा है
और कह रहा है -मैं साहूकार ,अब अम्मी क्या करे ,हाय रे हड्डी ....

अम्मी बोली -फिक्र ना करो ,बड़ा चमचा तो अब काम आने वाला नहीं है इसलिए
उसे तोड़ दो !

सब एक साथ बोले -हैं ...!!! .फिर समझ गए तो तालियाँ बजा उठे और लगे बड़े
चमच्चे को घिसने .

बबलू भी जोश में आ गया और बोला -देखो,मैं इस चमचे के दो टुकड़े करता हूँ ,
तुम सब जयजयकार करना .

बबलू ने गाँव की टंकी पर चढ़ कर ऐलान किया -बेवकूफ,अब नयी पिक्चर का
हीरो अपुन खुद बनेगा  और बड़े चमच को घिस दूंगा

बाकी के कुछ चमचों ने तालियाँ बजाई ,समर्थन किया ,तुरंत थूंका तुरंत चाटा
और बड़ा चमचा दूर पड़ा कराहा-अपुन ने कुछ नहीं किया ,अपुन ने सबको खिलाया ,
अपुन का पेट भूखा है     

20.8.13

धड़ाम से ………

धड़ाम से  ……… 

बात मौन के महत्व की है ,बड़ी ताकत है मौन में। जो काम चिल्लाने से पूरा नहीं होता
वह मौन से हो जाता है। सब कुछ इस तरह करो कि किसी के कानो कान खबर भी ना
हो ,कुछ सालों से मौन अपनी पराकाष्ठा पर है ,बिना कुछ चूं चपाटा किये रुपया धडाम
हो गया ,बस सब देखते रह गए मोहनी अदा से  …।

           कुछ सालों से अभी तक बेचारी ईमानदारी का जनाजा निकाला जा रहा है,किसी
ने यह पूछने की हिम्मत नहीं करी कि ये मरी कैसे ?ईमानदारी शिखर पर खड़ी थी और
मौन ने बड़ी मासूमियत से खाई की तरफ धकेल दिया ,ईमानदारी कुछ समझे उसके
पहले धड़ाम से खाई में जा गिरी  ……………. धड़ाम

         अर्थ का पहिया बड़े जोर से चक्कर खा रहा था ,यह चक्कर घूमता हुआ ऊपर जा
रहा था ,सब खुश थे कि ये चक्कर बड़ी तेजी से घूम रहा है लेकिन बड़ी शिफ्त से कब
रिवर्स लगा कि भागा धड़ाम से निचे की तरफ …….कोई रूकावट नहीं लगता है खाई
में जाकर विश्राम लेगा  …धड़ाम हो खुद ही ठहर जाएगा 

     पहली पार से उथल पुथल हुयी ,हमने उस ओर इशारा किया मगर वो बोले -बेटे ,
मौन  … थोड़े समय बाद एक आवाज आई - धड़ाम -धड़ाम  … और कुछ रण बाँकुरे
को सदा के लिए मौन कर गयी  …!!

    दामाद जी अपना कारोबार भी मौन हो चला रहे थे ,बड़ी अच्छी कट रही थी। रुपया
खुद ब खुद बढ़ रहा था ,सिलसिला आगे बढ़ रहा था क्योंकि कुछ चला था और मीलों
चलना था पर वाह रे किस्मत !ना जाने कैसे खे -खे करता मका आया और धड़ाम से
धक्का दिया ,इससे कुछ उल्टी बाहर आई मगर मौन हो कर वापिस निगल ली  …।

    वो बेतहाशा भागे जा रहे थे ,जब भी पीछे मुड़ कर देखते तो गरीबी पीछा करती
दिखती ,उनकी साँसे फुल रही थी मगर दौड़े जा रहे थे ,हमने उनको रोक कर पूछा -
यूँ भागने से क्या होगा ,इससे मुकाबला करो. वो बोले - रुकते ही यह पकड कर मुझे
धड़ाम से गिरा देगी इसलिए रुकना उपाय नहीं है मुझे किधर भी भागना है ,दोड़ना
है ताकि मेरा धड़ाम होना टल जाये !

       हम घर पर बैठे थे ,सोचा कुछ समाचार जान लूँ। टी वी ऑन किया कि समाचार
वाचक अजीब हरकतें करता हुआ बोला - हाय राम ,जोरदार मंदी की आंधी से पूरा
शेयर मार्केट धड़ाम से ओंधे मुंह गिर पड़ा। …….

        टी वी पर धड़ाम सुन हम घर के बाहर निकले शायद इस धड़ाम से पीछा छूटे
घर से कुछ दुरी पर एक अँधा माथे पर भारी बोझ रखे पृथ्वी की तरह गोल घेरे में
घूम रहा था। मेने उसके सर के बोझ को हटाना चाहा तो वो बोला -ये क्या कर रहा
है छोरा ,दीखता नहीं मैं निर्माण कर रहा हूँ ,सालो से दौड़ रहा हूँ और सालो तक
दौड़ने की अदम्य इच्छा रखता हूँ  … और तू इस बोझ को धड़ाम से मुझसे अलग
करना चाहता है ?

  मेने कहा -बूढ़े बाबा ,समय को पहचान ,अब तेरा सूरज अस्त हो रहा है क्योंकि
अब क्षितिज से शेर दहाड़ रहा है ,कट ले बाबा वरना शेर तेरा धडाम कर ही देगा !!    

9.8.13

सियार के बारे में ..............

सियार के बारे में ..............

मुझे खेद है कि मैं सियारों पर अपूर्ण जानकारी दे रहा हूँ ,पाठक वर्ग इसमें एक
नया खंड टिपण्णी के रूप में जोड़ कर अन्य पाठकों की ज्ञान वृद्धि कर सकते हैं।

सियार भी एक अजीब बला है जंगल में. इनके कारनामे और करतूतें थूकने के योग्य
है। सियार की एक खासियत यह होती है कि जब जंगल की व्यवस्था उसके हाथ में
आ जाती है तब वह सबसे पहले शेरों की जान को खतरा पैदा करता है,यह सियारों
का पारिवारिक रिवाज है जो इनके जन्म से जुड़ा है।  

       सियार जंगल में सर्वत्र पाए जाते हैं अक्सर ये राज नगर में निवास करना ज्यादा
पसंद करते हैं .इनका कोई उसूल नहीं होता है.ये खुदगर्जी के उसूल पर पलते हैं.
ये अपनी खाल बचाने के लिए शेरों का शिकार पडोसी भेड़ियों से करवा देते हैं।

सियार रंग बिरंगे होते हैं.इनकी पहचान बिरला ही  कर पाता है क्योंकि ये अपनी
खाल को मनचाहे रंग में रंगने में माहिर होते हैं.इनका कोई धर्म या सिद्धांत नहीं होता
है इनके पाप अक्सर पुण्य में बदल जाया करते हैं।

        सियारों की आपसी लड़ाई के किस्से जंगल में हर वक्त उछलते रहते हैं मगर
जब इनकी अस्मिता पर खतरा मंडराता है तो यह सारी जमात न्यात जात भूल
कर एक हो जाती है इसी विशिष्ठता के कारण गायें और कबूतर इनको जंगल का
राजा बनाते हैं। 

    सियार दहाड़ नहीं सकते ये इनकी मज़बूरी है इसलिए इनसे दहाड़ मारने की
अपेक्षा ना करे,ये जाती मुँह उठाकर रो सकती है ,इनको आप दुसरो के जंगलों
में भी रोते देख सकते हैं.सियार आक्रमण भी करते हैं पर अपने ही जँगल में
दुश्मनों से ये भयभीत रहते हैं.

 कुछ चतुर सियार गूंगे सियार भी पालते हैं ताकि सही वक्त पर गूंगे बने रहे
और कुछ सियार बहरे सियार पालते हैं ताकि सत्य की आवाज ना सुन सके।
चतुर सियार दूर से मूढ़ सियार के कंधे पर शस्त्र रख खुद प्रहार करते हैं। 

सियार वैसे तो अपना पेट भरने की जुगत में सालों लगे रहते हैं परन्तु कभी
कभी बेतरनी पार करने के अवसर पर गायों और कबूतरों को विशेष दाना
डालते हैं।

सियार कूटनीति में माहिर होते हैं। जंगल के प्राणियों में फसाद कराने में इनको
महारत हासिल होती है। ये जब भी रोते हैं पुरे जंगल में आपदा प्रबन्धन हो जाता
है। अपने जँगल को बेच खाने में ये माहिर होते हैं। ये विपदाओं से अपनी रक्षा का
प्रबन्धन करने में निपुण होते हैं इसलिए अपनी पीढ़ियों तक का भोजन दुसरे
जंगलों में सुरक्षित रखते हैं।

सियार अपने जँगल के हितेषी नहीं होते हैं मगर बहरूपिया बन सबको झांसा देते
रहते हैं। इनकी खाल मोटी होने के कारण इनको पाप के प्रभाव से बचाती है। इनका
शिकार करने का मौका सालों में कभी कभार मिलता है पर देखा यह गया है कि ये
शिकारी को धोखा देकर सकुशल अपने मुकाम लौट आते है। 
 
         

6.3.13

दीमक और साँप


दीमक और साँप 



हमने पूछा-
दीमक या साँप
किसे चुनेंगे श्रीमान?
वो बोले-
जीने के लिए
ये कब हुए हैं अच्छे ?
विकल्प में लाइये
कुछ व्यक्तित्व सच्चे
क्योंकि, दीमक-
जहाँ रहे उसे ही चट करता है
मिलजुल के सह कुटुंब हजम करता है
आश्रयदाता के अस्तित्व को खत्म करता है
और, साँप-
अपनी बांबी में रहता है
गाहे बगाहे
कभी अपनों पर
कभी दुश्मनों पर फुंफकारता है
जाने अनजाने विष दंस मारता है
बिना विकल्प के
है इन दोनों से एक को चुनना
तो बस अपनी तो यह इच्छा है
साँप का प्रकोप ही दीमक से अच्छा है
क्योंकि
इतिहास का यह कहना है
साँप का काटा बहुत बार बचता है
मगर
दीमक का चाटा हर बार मरता है