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13.2.09

हम भी करेंगे इज़हार-ऐ-मुहब्बत

मुहब्बत तेरे मुकाम पे रोना रोना आया
मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जज्बा रखते थे खाक होने का हम भी
खाक होने से पहले नया दिलदार आया

बाअदब, बामुलाहिजा सावधान... कहानी--वलेंटाइन जुबानी--खाकसार आपके हुजुर मे पेश होने जा रहा है...

हमने भी देखी है अपनी जवानी मे प्रेम को पनपते और अंकुरित होने से पहले ही कुम्हलातेवो जज्बा भी 'खाक हो जायेंगे हम सनम तुमको ख़बर होने तक' और आज का वैलेंटाइन प्यार कि '
दिया है आज तुझे गुलाब,
जिसमे भरा है मेरा प्यार,
चलो चलते है डेट पर,
होटल है, सुरा और बिस्तर भी है तैयार,
अब बोलो भी, मुह खोलो भो,
वरना दुसरे पर ट्राई करे यार

हर साल वैलेंटाइन आना है और ये खुला मौका देता है हमे अपने प्यार के इज़हार काइज़हार--मुहब्बत था कभी इतना आसान और देख लो जाने कितने मूढ़मति इसका विरोध करने को तैयार बैठे हैपर चुप भी करो यार आज तो प्यार का साथ देने को जाने कितने है तैयार, भेज रहे है गुलाबी चड्ढी और देख लेना वैलेंटाइन डे को भेजेंगे अपनी बेटी बहन को घुमने पब और बार, कहेंगे उन्हें कर लो खुल्लम खुल्ला प्यार, क्यूंकि ये है वैलेंटाइन डे का त्यौहार
मन छोटा मत करो, अभी तो और भी बहुत कुछ होना बाकि हैतुम्हे क्या लग रहा है कि ये जो बड़ी बड़ी कंपनिया वैलेंटाइन डे पर करोडो का बाज़ार पर दाव लगा रखी है, वो तुम्हे अकेले छोड़ देंगी? ना जी ना, आपके साथ तो पुरा बाज़ार खड़ा है, प्यार के इस व्यापर के लिए
खाक होने के लिए आज किसी खाकसार की जरुरत किसे है आज कितनो को याद है सोहनी महिवाल कि कथा? कौन याद करना चाहता है हीर राँझा के प्यार को? जब पुरी दुनिया ही result oriented हो गई है तो प्यार पर इसका प्रभाव क्यों ना पड़े? पहले हम कालेजो मे मुहब्बत की कहानिया ढूंढा करते थे और बदले मे कही कही से धुँआ उठता नजर आता था, पर आज स्कुलो मे बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड ना होने पर बच्चो के मन मे हीन ग्रंथि आने लगती हैवे ख़ुद को पिछड़ा मानने लगते हैऔर यहाँ धुवां को खोजने कि जरुरत कहा होती है, हर तरफ़ आग ही आग मिलती है
याद रही है जयशंकर प्रसाद की कुछ पंक्तिया
पागल रे, वह मिलता है कब, उसे खो देते है सब
और इसी खोने पाने के खेल मे ना जाने कितने किशोर अपना भविष्य खो दे रहे हैऔर बाज़ार हर दिन उन्हें एक नया उत्सव और एक नया त्यौहार देने पर आमद है कि लो बच्चो मैंने दिया तुझे एक और मौका, कर लो खरीददारी, दे दो उपहार, भेजो ग्रीटिंग कार्डऔर प्रेम का त्यौहार खूब फल फूल रहा है

और प्रेम का एक नया रूप भी देखने को मिल रहा है, सोशल नेट्वर्किंग साईट जैसे की ऑरकुट या फ़ेसबूक परजहा प्रेम का आरम्भ ही होता है सेक्स के साथ, ना जाने कितने तरुण-तरुणिया वर्जित फल को पाने के लिए इन सोशल नेट्वर्किंग साइट्स के खुले प्लेटफोर्म का उपयोग करने को बेचैन हैयहाँ भी वैलेंटाइन का खुमार सर चढ़ कर बोल रहा हैइस प्रेम और व्यापार के बाढ़ मे हम जाने क्यों याद करते है वो दिन जब प्यार दो दिलों की आरजू हुआ करता था, चढ्ढिया शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से को छुपाने के साथ साथ ख़ुद भी छुपी रहती थी, प्यार के इज़हार पर गुलाब का फूल दिया जाता था डेट पर जाने का निमंत्रण नही और प्यार कामना नही भावना हुआ करता था

7.2.09

वैलेंटाइन डे और प्यार का व्यापार

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री रेणुका चौधरी के 'पब भरो' आन्दोलन और श्री राम सेना के नैतिक पुलिस का कार्य करने और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सांस्कृतिक क्षरण रोकने और बार बार अपने बयान बदलने के साथ साथ आने वाले वैलेंटाइन डे की तयारी आरम्भ हो गई है
एक तरफ़ श्री राम सेना का कहना है कि वे 14 फ़रवरी को पंडीत और मंगल सूत्र से लैस होकर निकालेंगे और प्रेमी जोड़े को नजदीकी मदिर मे ले जाकर शादी करा देंगेवही दुखतरन--मिल्लत ने वैलेंटाइन डे से सम्बंधित सामग्री नही बेचने के लिए दूकानदारों से अपील किया हैवैसे सारे बरसती मेंढक जाने क्या होता है कि फ़रवरी आरम्भ होते ही टर्राना शुरू कर देते है और महीने के अंत तक फिर गायब हो जाते हैवैलेंटाइन डे हुआ बस एक थोथी लोकप्रियता (बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ) पाने का चोचला बन जाता है
वैसे अति समर्थन (रेणुका चौधरी) या अति विरोध (श्री राम सेना जैसे अतिवादी) को छोड़ दे तो भी एक बार वैलेंटाइन डे के अस्तित्व और उसका समाज पर पड़ रहे प्रभाव को रेखांकित करना सामायिक होगाऔर समर्थन और विरोध की बात भी मुख्य रूप से बड़े शहरों तक ही सिमित होता है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री को पब भरो आन्दोलन का विचार रखते समय शायद यह बात ध्यान मे भी नही होगा कि भारत मे 80% से भी ज्यादा जनता पबो मे नही जाती है तो महिलाओं को कहा से पबो मे भेजेंगीये तो दिल्ली, मुंबई, बंगलौर और कुछ तेजी से आधुनिक होते जा रहे शहरों की संस्कृति है
चलो फिर वापस वैलेंटाइन डे पर आते हैमै बहुत स्पष्ट रूप से श्री राम सेना जैसे अतिवादियों का विरोध करता हूँपर वलेंटाइन डे के नाम पर हमारे यहाँ जो कुछ चल रहा है उसका भी कही से समर्थन नही किया जा सकता हैपश्चिमी देशो मे जहाँ खुलापन और आधुनिकता के कारन किशोरों को भी स्त्री पुरूष संबंधो के बारे मे जानकारी होती हैपर हमारे यहाँ तो बस अधकचरी जानकारी मिलाती है टेलीविजन और कुछ पत्रिकायों सेऔर आपको बता दे कि वलेंटाइन डे पर सबसे सक्रिय रहने वालों मे 80% पढ़ने या नौकरी करने के कारण घर से बाहर अकेले रहने वाले लडके और लड़कियां होती हैइनमे से भी 75% लड़के लड़किया बस उत्सुकता के कारण बाहर निकल पड़ते हैकिशोरावस्था मे जब ये सब अच्छा लगता है और विचारों कि परिपक्वता नही होती तब सब कुछ सुनहरा दिखता हैमुझे ये कहने मे तनिक भी हिचक नही है कि इस दिन का उपयोग अगर 10% लोग सच्चे प्यार के लिए करते है तो 90% का एक ही मकसद होता है कि किसी तरह सेक्स सम्बन्ध कायम कर लिया जाए
ऐसा भी नही है कि वैलेंटाइन डे जब नही था तब ऐसा कुछ नही होता थाहोता तो तब भी था, पर उसे इस ढंग से स्वीकृति नही मिली थीऔर उस समय इस तरह से सीनाजोरी की भी इजाजत नही थी, इसलिए इसका प्रतिशत भी कम थाआज अगर सर्वे किया जाए कि वैलेंटाइन डे पर कितने जोड़े अवांछित सेक्स सम्बन्ध बनते है तो सच ख़ुद सामने जाएगा.
फिर भी मै यह कभी नही कह सकता कि अतिवादी सही कह रहे है पर रेणुका चौधरी जैसे लोगों को भी सोचना चाहिए और सबसे बड़ी बात हम ख़ुद के गिरेहबान मे झांकना शुरू कर दे कि हम क्या है और हम क्या होने दे रहे है।

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