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24.4.12

कार्टून का कार्टून

कार्टून का कार्टून 

नदी किनारे लम्बे रूखे बिखरे बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी वाले को पिंछी घुमाते देख हम ठिठक गये.हमने 
उससे पूछा - आप हुनरमंद लगते हैं मगर अस्त-व्यस्त रहने के तरीके से आप कार्टून जैसे लगते हैं .

वो बोला- अरे भाई ,हम क्या कार्टून लग रहे हैं हमें तो सुधारवादी उदारीकरण की व्यवस्था के बाद 
       इस देश में ज्यादातर लोग कार्टून के योग्य ही नजर नहीं आते हैं .

हमने कहा -बात तो आपकी सोलह आने सच है .अब ये बताइये महाशय कि इस समय आप क्या कर 
        रहे हैं ?

वो बोला- मैं कार्टून बना रहा हूँ .

हमने पूछा -किसका ...?

वो बोला- जो सच को सहन कर सके उसका .

हमने पूछा -क्या किसी नेता का ,मंत्री का, संत्री का.......भी बनाते हो ?

वो बोला -आप भी अजीब हैं..! कार्टून का कार्टून ..! मैं भला क्यों बनाऊँगा ? कार्टून बनाना भी एक विद्या  
है ,कार्टून सच्चाई की तस्वीर होता है ,जो व्यक्ति सच के वजन को सहने की ताकत नहीं रखता उसका 
कार्टून बनाने से समाज का क्या भला होगा ?

हम बोले- .....तो फिर बताओ कि कार्टून किसका बनाया जाता है ?

वो बोला- जो व्यक्ति भूल सुधार की कोशिश में लगा रहता है ,खुद की कमजोरियों का सतत आंकलन 
       करता रहता है उसी का कार्टून बनाया जाता है .

हमने कहा -हमने तो भूल पर भूल करने वाले के कार्टून ही ज्यादा बनते देखे हैं.कार्टून मसखरी का 
         दूसरा नाम बनता जा रहा है .....

वो हमारी बात काट कर बोला -आप सही नहीं हैं .कार्टून की शक्ति से एक सामान्य नेता जन नायक 
       और जन नायक भी खल नायक बन जाता है .

......तो फिर तुम नेता का कार्टून क्यों नहीं बनाते ?किससे डरते हो ? मेने उससे सवाल किया उसके
     उत्तर में वो बोला -क्या इस देश में आपको कोई जन नेता दिखता है जिसका कार्टून बनाया जाए ?
जिसे तुम नेता समझ रहे हो वो कार्टून की परिधि से बाहर है .सत्ता चलाना या सियासत करना अलग
बात है और नेता बनना अलग .नेता वो होता है जिसका दिल आम आदमी में धडकता हो .

मेने पूछा -फिर इस देश में कार्टून पर नेता बवाल क्यों मचा रहे हैं ?

वो बोला -तुम जिसे नेता मानने का भ्रम पालते हो तो पालो ,मैं तो २५ साल का युवा हूँ जिसने अपने 
जीवन काल मैं एक भी नेता नहीं देखा है .कार्टून बनाना मेरा कर्म है मगर कार्टून का कार्टून बनाना 
मेरा पेशा नहीं है .मैं कार्टून बना कर आम आदमी को जाग्रत करूंगा मगर एक कार्टून का कार्टून 
हरगिज नहीं बनाऊँगा .  
 हम उसका उत्तर सुन सन्न रह गए और वही से लौट गये.आज समझे थे कि कार्टून एक विधा है मगर 
कार्टून का कार्टून बनाना विधा नहीं है मसखरी है .         

22.11.11

...उम्मीदवार चाहिये (विज्ञापन )



....  उम्मीदवार  चाहिये (विज्ञापन )


चाहिये चुनावों के समय मतदारो से वोट दिला सकने वाले उम्मीदवार !! ना -ना चौंकिये मत !आजकल
हर चीज की मार्केटींग हो रही है ,यह काम भी अच्छी प्रोफेशनल एजेंसी को सौंप देने जैसा है .इस काम
का भविष्य भारत जैसे देश में चमकीला हो सकता है ,काफी संभावनाओं से भरा नया क्षेत्र है ,इसका
कारण भी है क्योंकि---------------

 इस देश में भ्रष्ट ,कामचोर नेताओं की बाढ़ आ रही है ,उनकी छवी बढ़िया क्रीम -मक्खन लगाने के बाद
 भी नाजुक होती जा रही है ,अब नाजुक दागदार छवी वाले उम्मीदवार वोट लेने में कारगार साबित नहीं
हो रहे हैं और नए मलाईदार उम्मीदवारों का भी राजनैतिक पार्टियों में टोटा है जो भी उम्मीदवार नए
मिलते हैं वे दांव पेच नहीं जानते और ऐसे अनाड़ी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पायेंगे क्योंकि ज्यादातर (सज्जन) भोले किस्म के मिलते हैं.

     नए व्यक्ति  को झूठ बोलने में पारंगत करने के लिए भी काफी समय लग जाता है और मुश्किल
से ५-७% ही लोग सफल होते हैं क्योंकि झूठ भी सलीके से बोला जाता है और भोले नागरिक या तो झूठ
बोलते नहीं या फिर बोलना जानते ही नहीं ,ऐसे में बड़ी मुश्किल हो जाती है की चुनाव में किस व्यक्ति को
उम्मीदवार बनाया जाए.

   ज्यादातर पार्टियों ने दूरगामी परिणाम को ध्यान में रखे बिना ही भूतकाल में ऐसे  उम्मीदवारों का चयन
कर लिया था ,वे लोग अनाड़ी की तरह जनता के धन पर इस तरह उतावल में झपटे कि अब दागी हो गये.
धन को पचाना और वह भी जनता के धन को ,बहुत ही भेजाबाज शातिर का काम है .ऐसे काम किसी सेवा
 भावी इंसान के बूते के बाहर होता है

     हर व्यक्ति कि अपनी विशिष्टता होती है और चुनाव जीत सके ऐसा व्यक्ति भी विशिष्ट गुणों से युक्त होना
चाहिये .उसकी बोलने कि शैली में शहद सी मिठास हो ,उसकी आँखों में धूर्तता दिखाई ना दे ,नए नए
आश्वासन देने में माहिर हो ,रिश्वत लेने के तरीके में परिवर्तन शीलता हो ,नवीनता का सृजन कर नए
तरीके इजाद करने वाला हो

      नयी योजनाओं के उदघाटन ,शिलारोपण जैसे तरीके पुराने होते जा रहे हैं .लोग जानने लग गये हैं कि
ये सब बढ़िया ढकोसले के सिवाय कुछ नहीं है ,इन परम्परागत तरीको से मतदाता को गाफिल करना
मुश्किल होता जा रहा है .वोट लेने के नए नुस्खे पैदा करने वाले बाजीगर ही आज कि आवश्यकता बन
गये हैं .नए सपनो को जनता के मन में उतार देने वाले सृजक ही कुछ करामात दिखा सकते हैं .

     नए उम्मीदवार कि साख हो ,जैसे बगुला महाराज माला जपने का स्वांग बहुत निपुणता के साथ करते
हैं और मछली गटक कर पुन: शांत अवस्था में आ जाते हैं ,ठीक ऐसे ही साख वाले लोग मिल जाए जो
संत जैसे स्वांग में बिना चबाये माल गटक सके और मिलझुल कर बाँट खा सके .

        

5.11.11

मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !


मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !

नेताजी चलते चलते मुहँ के बल गिरे ,हमने दौड़ कर उनको उठाया और पूछा-"चोट तो नहीं आई ?"
नेताजी बोले -बेटे,चोट तो गिरने पर आती है हम गिरे ही कब थे ?
मेने कहा -"नेताजी अभी-अभी तो मेने आपको अपने हाथों से उठाया है".........वो हमारी बात काट कर बोले 
इसको गिरना नहीं कहते हैं ,गिरने का मतलब होता है टांग का चित्त हो  जाना .हम जब गिरे तो हमारी टांग
 दबी नहीं थी ऊपर हो गयी थी .हम उनके गिरने की व्याख्या से अभिभूत हो उठे और मुहं से "वाह" निकल
 ही गया
हमने उनसे पूछा -नेताजी महंगाई आसमान छू रही है?कारण?

वो बोले-"बेटा महंगाई अभी तो मेरे घुटने तक ही नहीं पहुंची है ,आसमान छूने बात गले नहीं उतर रही है और
घुटने तक महंगाई पहुचने का कारण हमारे त्यौहार हैं .हम त्योहारों पर डटकर पोष्टिक भोजन लेते हैं .आप
त्यौहार मनाना बंद कीजिये और एक समय उपवास करके गांधीवादी बन जाईये फिर देखिये महंगाई सरपट
कम हो जायेगी ."

हम खुद त्यौहार मनाने के गुनाहगार थे इसलिए बात बदलते हुए पूछा -नेताजी पेट्रोल,गेस,बिजली,और
केरोसिन की बढती कीमतों के बारे में कुछ निवेदन करेंगे?

वो बोले-"ये सब सेठ लोगो की घाटे की पूर्ति की कवायद है ,आप देखिये जिसका भी मन करता है दौ पहिया
वाहन खरीद रहा है .कार चलाने वालो को सड़क पर जगह ही नहीं मिलती यदि पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे तब ही
 तो आप लोग दुपहिया चलाना बंद करेंगे फिर सडको पर सिर्फ कारे दोड़ेंगी और देश की उन्नति की तस्वीर
विदेशो तक जायेंगी.

हम निरुत्तर होकर बात बदलते हुए बोले -नेताजी, बेरोजगारी पर भी आपको कुछ कहना है ?"

नेताजी बोले-"आप लोग एक तो बच्चे पैदा करना बंद नहीं करते और ऊपर से उनको पढ़ाते भी हैं ,यदि बच्चे आपके  नहीं पढ़ते तो मनरेगा में काम की गारंटी तो पाते ."

हम अपनी बात को कटते देख फिर नेताजी से प्रश्न दाग बैठे-"नेताजी ,भ्रष्टाचार पर कोई मीमांसा पेश करेंगे?'

वो बोले-"यह काम हो जाने की गारंटी है ,एक व्यवहार है ,इसे बंद कर देने से आप ही लटक जायेंगे .जो काम
 उत्साह के साथ आफिसर कर रहे हैं उनका काम करने से उत्साह भंग हो जाएगा .भ्रष्टाचार एक टोनिक
है ,स्फूर्ति से काम करने की रामबाण दवा है और आप मुर्खता वश बंद कराने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं.

नेताजी किसान रो रहे हैं ,गरीब चिल्ला रहा है ,इसका चुल्हा भी एक समय जल रहा है ,आप कुछ कर क्यों
नहीं रहे हैं ? हमने फिर प्रश्न दागा .

नेताजी बोले-"किसान  की रोने की आदत है ,समय पर बारिस नहीं होती है तो इसमें सरकार क्या करे ,
गरीब का चिल्लाना बंद कर देंगे क्योंकि हम गरीबी रेखा ही ख़त्म कर देंगे ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी
और रहा सवाल चूल्हे का तो सड़ा अनाज सस्ते में बटवा देंगे वैसे भी गौदामो में रखने की जगह नहीं है .

हमारे प्रश्न खत्म होते जा रहे थे और नेताजी को घेरने के लिए हमने अंतिम सवाल पूछा -देश की अर्थव्यवस्था
बेहाल है ,विदेशी कर्ज बढ़ रहा है ,काला धन विदेशो में जमा है ,आप क्या कर रहे हैं ?

नेताजी बोले- जैसे नौरत्नो को अमीरों को बेचा है और देश की तिजोरी भरी है वैसे ही और बेच देंगे ,सरकारी
उद्योग के बिकने के बाद देश का कोई भी टुकडा चीन या अमेरिका के हवाले कर देंगे ,जिससे विदेशी ऋण भी
चुकता हो जाएगा और रहा सवाल काले धन का तो वह तेरे बाप का नहीं ,हमारी बिरादरी का है ,तुमको क्या ?

हम अपना सा मुंह लेकर रह गए और नेताजी चलते बने .

   

25.10.11

कैसी ये दिवाली





चिकनी माटी से,
चाक पर, 
दीये का सृजन,
कर  रहा था कुम्हार .
कभी खो जाता था पुरानी यादों में ,
पिछली  दिवाली पर,
खायी थी पूरी ,कचोरी!
साथ में कुछ मिठाई भी !! 
मगर
 पेट फिर भी भरा न था.
इस बार बनाने हैं दीये ज्यादा,
ताकि,
ना रहे मन की कोई हसरत अधूरी.
मगर- 
हाट बाजार में , 
आम आदमी,
क्षण भर ठिठक,  
खुबसूरत दीये देख,
आगे बढ़ जाता है.
क्योंकि-
बस के बाहर हो रही जब दाल  चपाती.
दीप जलाने को कहाँ तेल ,रुई की बाती .
  
  

21.5.10

अब ये नेता नामक प्राणी किस वर्ण में आएगा?-कुंवर जी,

मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै कैसे पूछूं!



क्या वर्ण वयस्था उचित थी या है या हो सकती है?


उस हिसाब से चार वर्ण-
एक-पंडित जो ज्ञान बांटता है,
एक क्षत्रिय-जो अपनी जान की भी परवाह नहीं करता दूसरो की रक्षा करने में,
एक वैश्य-जो सभी के लिए 'अर्थ' को सही अर्थो में प्रयोग करता है,व्यापार करता है,
एक शुद्र-जो सेवा करने में ही अपनी मुक्ति जानता है!

अब ये नेता नामक प्राणी किस वर्ण में आएगा?
आदरणीय गोदियाल जी की पोस्ट पर टिप्पणी करते समय आया ख्याल आपके हवाले...
कृप्या सभी वर्णों की गरीमा और सम्मान को ध्यान में रख कर जवाब देना!


मुझे आपसे बहुत उम्मीदे है.....






जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,