28.1.13
अवसर बनाये जाते हैं
अवसर बनाये जाते हैं
अवसर की प्रतीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि अवसर अनुकूल या प्रतिकूल हर परिस्थिति में
छिपा हुआ रहता है ,आवश्यकता है परिस्थिति को दृढ़ता के साथ अपने सपने के अनुसार
बदल देने की।
किस्मत अवसर को पहचान कर पकड पाने वाले दिलेर लोगों की सफलता को कहते हैं,इसके
अलावा किस्मत हाथ पर हाथ धरे बैठे लोगों की असफलता को भी कहा जाता है।
हमारी संस्कृति हमें अवसर गढ़ना सिखाती है।रामायण काल में श्री राम का वनवास एक घटना
थी,जिसे दुखद कहा जा सकता है परन्तु श्री राम द्वारा उस परिस्थिति को दृढ़ता से राष्ट्र के हित
में मोड़ देना इतिहास का सुखद अवसर बन गया क्योंकि श्री राम ने वनवास काल के दरमियान
अयोध्या से सुदूर फैल रहे आतंक को समूल नष्ट कर दिया और शांति स्थापित कर दी थी।
कृष्ण का जन्म बहुत विपरीत परिस्थियों में हुआ।माँ -बाप कैद थे और खुद की जान जन्म के
साथ ही जोखिम में थी मगर उन्होंने उन विपरीत परिस्थियों में भरपूर संघर्ष किया और आतंक
का खात्मा किया और शांति की स्थापना की।
हमारे वेद कहते हैं कि देव भी कितना भी प्रतिकूल हो मगर आखिर में वह भी पुरुषार्थी के साथ
आ खड़ा होता है
हमारे शास्त्र कहते हैं तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों में है,अपना हाथ जगन्नाथ।पुरुषार्थी व्यक्ति
अपनी हाथों की लकीरे खुद तय करता है और निट्ठलो की लकीरे समय तय कर देता है।
चाणक्य ने नन्द के आतंक को ख़त्म करने का दृढ संकल्प लिया और चल पड़े अवसर को
खोजने,जो व्यक्ति अवसर आने की प्रतीक्षा में बैठा रहता है वह अवसर को पहचान नहीं पाता
है मगर जो अवसर को खोजने निकल पड़ता है उसको अवसर का साक्षात्कार हो जाता है,जैसे
चाणक्य को अवसर चन्द्रगुप्त के रूप में मिला था।वेद का सन्देश है -"चरेवेति,चरेवेति "
अवसर कहाँ पाया जाता है?
अवसर का निवास प्रतिकूल परिस्थितियों में छिपा है,विपरीत दिशा से बहती हवा में छिपा
है ,बारिस को तरसती फटी जमीन पर पड़ा है,भयंकर संघर्ष में छिपा है उसे पकड़ने के लिये
राणा प्रताप ने घास की रोटी में ढूंढा,पृथ्वीराज ने शब्दबाण में ढूंढा,शिवाजी ने साहस में ढूंढा,
सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फोज में ढूंढा,गांधी ने अहिंसा में ढूंढा,शास्त्री जी ने "जय जवान-
जय किसान में ढूंढा,कलाम ने विज्ञान में ढूंढा,सचिन ने बल्ले में ढूंढा,साइना ने बेडमिन्टन
में ढूंढा और पाया भी। आवश्यकता है कदम बढ़ाने की ,कहा है-दाना खाक में मिलकर गुलो-
गुलजार होता है।
अवसर कैसे मिलता है?
अवसर का रास्ता असफलताओं के दलदल से होकर गुजरता है,संघर्षों की भीषणता से
निकलता है। पानी में भयंकर जोखिम है मगर तैरना सीखना है तो उसमे उतरना ही पड़ता
है केवल किताबी ज्ञान से तैरना नहीं आ जाता।हमारा समय खराब चल रहा है यह सोच
कर जो अच्छे समय के इन्तजार तक बैठे रहने का निर्णय कर चुके हैं उनके लिए कोई
अवसर दस्तक देने नहीं आता है।जो विषम परिस्थियों में कदम दर कदम बढ़ाते जाते हैं
उनकी पकड़ में अवसर आ ही जाता है।
क्या अवसर दर्शन देता है ?
हाँ, अवसर को देखने के लिए किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है,हम हर दिन
अवसर को अपने से निकट गुजरते हुए देख सकते हैं।परीक्षा में प्रथम आने वाले विधार्थी में,
खेल में प्रथम आने वाले खिलाड़ी में,भयंकर मंदी में मुनाफा कमाने वाली कम्पनी के
संचालक में,युद्ध में विजयी होने वाले सैनिक में,निर्धनता को पछाड़ कर धनी बने लोगों में
मिलता ही है,जरूरत है खुली आँखों से देखने की।
अवसर को कैसे पकड़े ?
अवसर को पकड़ने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं दृढ़ संकल्प करे,सिर्फ लक्ष्य नहीं पक्का ध्येय
बनाये,कुछ कदम नहीं लगातार चले,डर भय घबराहट को छोड़े और निडर बने,खुली आँखों
से सपने देंखे और उन्हें साकार करने के लिए अध्यव्यवसाय करे ,निरन्तरता बनाये रखे,
खुद में विश्वास रखे,कर्म पर ध्यान दे फल की चिन्ता ना रखे।
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27.1.13
मोदी के आगे राजनाथ भी नतमस्तक !
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दलित, पिछड़े सबसे भ्रष्ट..!
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2014- नरेन्द्र मोदी बनेंगे प्रधानमंत्री !
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ASHUTOSH VERMA
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26.1.13
कल ही आज़म खान ने कहा है कि लोग जिन्दा रहकर ही अपनी मूर्तियाँ लगवा देते हैं । अल्ला से दुआ है कि बेटी दे तो दे पर मायावती जैसी न दे । गुस्साए एक बी एस पी नेता का बयान आया है - आज़म की मानसिकता ही ऐसी है । बी एस पी का हाथी बहुत आगे जाएगा । हाथी चलता रहता है और कुत्ते भौंकते रहते हैं । एक बार सोचा - कुछ लिखूं लेकिन तभी एक अन्य संत की विगत दिनों की वाणी याद आई जिन्होंने दामिनी के लिए कहा था कि दामिनी को उन बलात्कारियों को भाई बनाना चाहिए था । यदि उसने दीक्षा ली होती तो उसकी ऐसी दुर्गत न होती । बाद में बवाल मचा तो आसाराम मीडिया पर बिगड़कर बोले - कुत्ते भौंकते रहते हैं और हाथी चलता रहता है । यह आसाराम का हाथी था । एक संत का हाथी । हाथी संत का हो या मायावती का । बाकि सब कुत्ते ही हैं । आज़म खान का बयान तो कोई अर्थ नहीं रखता । मायावती ने मूर्ति अपने अज्ञान के कारण ही लगाईं होगी । उन्हें मालूम न रहा हो कि जिन्दे आदमी की मूर्ति नहीं लगवाई जाती । हो सकता है मालूम भी रहा हो आ लेकिन अब सोचता हूँ - यदि एक विज्ञापन में दिवंगत ग़ज़ल गायक आज भी एक खांसी की दवा का प्रचार कर सकते हैं तो मायावती ने भी कोई ख़ास बुरा नहीं किया था । उसने जो किया वह वास्तव में सम्मान के लिए वर्षों से तरसते एक समाज का उतावलापन ही था । पता नहीं , कल क्या हो और कोई मायावती को याद करे भी या न करे । कुछ लोग समाज में ऐसे भी होते हैं जिन्हें जब पुत्रों से कोई उम्मीद नहीं होती तो वे अपना श्राद्ध का इंतजाम भी अपने आप ही कर जाते हैं । भारत में सन्यासी बनने से पहले स्वयं अपना श्राद्ध करने की परम्परा है । मायावती सन्यासी बनने तो नहीं ही जा रही थी लेकिन उतावलापन तो दिखाई ही देता है । लेकिन आज़म खान का कहना कि कोई बेटी मायावती न बने , वास्तव में मानसिक दिवालियेपन का ही परिचय है । मायावती की उस भूल पर अब सपा ने ही अपमान की चादर चढ़ा दी है । मूर्ति लगवा दी , लोग तो मूर्ति उखाड़ रहे हैं । यदि आसाराम जैसे संतों की बुद्धि का दिवाला निकल रहा है तो राजनीति के नाले में श्वास प्रश्वाश ले रहे इन राजनेताओं के मुख से निकलते इन शब्दों पर कैसा शोक ? संस्कृत में शब्द नित्य माना गया है । शब्दो नित्यः , शब्द एव ब्रह्म , ऐसा ही संस्कृत शास्त्रों में लिखा गया है । वैज्ञानिक इसे प्रतिपादित भी कर चुके हैं । वह ब्रह्म इनके मुख से इस रूप में निकल कर गुफा से निकलने वाले शब्द की तरह कहीं गूंजता होगा । गूंजता रहेगा । गुफाओं से संतों की वाणी ॐ के रूप में निकला करती थी । आसाराम जैसे संतो की वाणी नहीं । ऋषियों की वाणी । इन नेताओं की वाणी से निकले ये शब्द हमेशा इस बात की याद दिलाते रहेंगे कि भारतीय राजनीति में इन अपशब्दों का उच्चारण करने वाले इन लोगों ने माँ सरस्वती के साथ भी पाशविकता का ही बर्ताव किया था । कालिदास ने कहा था -
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतिपरमेश्वरौ ।।
पार्वती और परमेश्वर वाणी और अर्थ की तरह एक दुसरे से संपृक्त हैं । शब्द और अर्थ की प्रतिपत्ति यानि बोध के लिए मैं उनकी वंदना करता हूँ ।
निश्चित रूप से जहां शब्द और अर्थ को इतना सम्मान दिया गया है उस देश में शब्दों और अर्थों का इतना दुरूपयोग देश को कितना भारी पड़ने वाला है निश्चित रूप से ये तो वे जानते ही नहीं होंगे ।
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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ये वही राजपथ है...वही “गण’ ‘तंत्र” है !
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जर्जर मकान
जर्जर मकान
एक पोत्र अपने दादा के हाथ के बनाये मकान को जमीनदोस्त करवा रहा था।मेने उससे
पूछा -" आप अपने दादा के हाथ का मकान क्यों तुडवा रहे हैं ?"
वो बोला - मकान जर्जर हो रहा था .......
मेने बीच में टोकते हुए कहा-लेकिन ये आपके दादा के हाथ की अंतिम निशानी है ,इसे
जमीनदोस्त करने से उनकी आत्मा को कष्ट होगा ?
वो बोला -मेरे दादा की आत्मा को कष्ट नही ,सुकून मिलेगा क्योंकि इस पुनर्निर्माण से
आने वाली पीढियाँ उन्हें याद रख पायेगी कि हमारे दादा के दादा ने इस जमीन पर घर
बनाया था।
मैं बोला-आपके विचार से पुनर्निर्माण एक आवश्यक प्रक्रिया है।
वो बोला- हाँ ,मगर आप यह प्रश्न क्यों कर रहे हैं ?
मैं बोला- मैं इसलिए कह रह हूँ कि जो बात तुम समझ पाये ,अनपढ़ आम आदमी भी
समझ पाता है लेकिन हमारे नेता नहीं समझ पाते .......!
वो बोला- मतलब .......
मेने कहा- हमारा गणतंत्र पुनर्निर्माण चाह्ता है मगर इसे मजबूती देने के लिए कोई
तैयार नहीं है।हम वर्षों से कमियों को देख रहे हैं,समझ रहे हैं मगर पुनरोत्थान नहीं
कर पाये हैं।न्याय ठहरा सा लगता है,काम पेपर पर दीखता है,किसान मूर्छित सा लगता
है,औरत पीड़ा झेलती दिखती है,आतंकवादी सम्मानित होते हैं ,देश प्रेमी तड़फते दीखते
हैं,चरित्रहीन संसद में शोभा पा रहे हैं,देश की सम्पदा को समर्थ लूट रहे हैं,गरीब पिसता
जा रहा है,धूर्त अट्टहास लगा रहे हैं,गांधी दीवाल पर टंगे हैं गांधीवाद फट गया है,अधिकार
की माँग से कोड़े पड़ते हैं,नेता आंकड़ो का मायाजाल फैला रहे हैं,कोई पानी को तरस रहा
है,कोई बिजली के लिये चिल्लाता है,कोई शिक्षा को तड़फता है,कोई रोजगार की कतार में
खड़ा है,कहीं अन्न सड़ता है ,कोई भूखा सोता है,सरकार कर लाद रही है,कोई राजस्व में
चुना लगा रहा है ,कोई .............
वो बोला- आपका पुराण खत्म नहीं होगा इसमें नये अध्याय तब तक जुड़ते रहेंगे जब
तक हम जागरूक होने का दिखावा करते रहेंगे।पुनर्निर्माण के लिये जरुरी है कि जर्जर
को जमीनदोस्त किया जाए तभी नवनिर्माण संभव है।
उसकी बात सुनकर मैं आकाश की ओर ताकता रहा ,शून्य को घूरता रहा ,वर्षों से जटिल
रहे प्रश्न को ताकता रहा ...........कोई तो लाल कभी तो आयेगा और नव सर्जन करेगा !
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राष्ट्रपति का संबोधन- हिंदी और अफजल गुरु गायब !
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25.1.13
इक नुक्कड़ : सफ़दर हाशमी
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VIVEK VK JAIN
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समाज और स्त्रियों का जबरन अपहरण ..
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Sudheer Maurya 'Sudheer'
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आदरणीय भारत सरकार ! हेडली पर शोक मनाना छोडिये । वह अमेरिका है जो पाक के घर में घुसकर ओसामा को मारता है । वह हिंदुस्तान नहीं है जिसके दिग्विजय सिंह महोदय के लिए ओसामा ओसामा जी था । उस अमेरिका से प्रत्यर्पण की लड़ाई हार गए हैं तो अब खिसिया रहे हैं । उसने प्रत्यर्पण भी नहीं किया और पैतीस साल की सजा भी दे दी । आपसे जो होता हो आप कर लें । वो अमेरिका है जिसके यहाँ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरने के बाद उसने एक एक के कपडे उतरवा दिए । उसने तमाम लोगों के फिंगर प्रिंट्स ले लिए और किसी ने चूं भी नहीं की । समरथ को नहीं दोष गोसाईं । आप रोना रोते रहिये । आप कर भी क्या लेते । आप से क्या होता भारत सरकार ! आपके गृहमंत्री की नजर में तो हेडली भी श्री हेडली होगा और दिग्विजय सिंह जी के लिए वह हेडली साहब होगा । आप को शायद दुःख हो रहा हो कि आप उस की खातिर दारी कसाब की तरह नहीं कर पाए या अफजल गुरु की तरह उसके माफ़ी नामा के लिए राष्ट्रपति के पास एप्लीकेशन नहीं लगवा पाए । आप गिडगिडाते रहिये । उसकी मुट्ठी में जहां है और वह उसको फांसी दे चुका है और आपके करोड़ों रुपये बच गए हैं । आपकी कानूनी प्रक्रिया का नज़ारा सारी दुनिया देख रही है आपसे क्या उम्मीद की जाये ।
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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rahul ji ke sambhaavit tyaag
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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हेडली पर हल्ला...अफजल पर खामोश क्यों..?
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इश्वर सबको सदबुद्धि दे...
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ASHUTOSH VERMA
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