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28.1.13

हमारी न्यायिक-प्रणाली दुर्योधनवाली है या युधिष्ठिरवाली-ब्रज की दुनिया

मित्रों,अभी दिल्ली दुष्कर्म पर उबल रहा जनाक्रोश ठंडा भी नहीं पड़ा था कि इसी 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश के गोंडा में विचित्र और अतिशर्मनाक घटना घट गई। ऐसी शर्मनाक घटना जिसने पूरे भारतीय न्यायपालिका को ही शर्मिन्दा कर दिया। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक जज पर अपने चैंबर में 13 साल की नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ का आरोप लगा है। लड़की के परिजनों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि सोमवार को जज ने अपने चैंबर में लड़की के नाबालिग होने की जांच करने के बहाने उसके कपड़े उतरवाए और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की। लड़की का आरोप है कि जज ने उससे शॉल हटाकर कपड़े उतारने को कहा, जिससे वह उसकी उम्र का पता लगा सके। लड़की ने अपने बयान में कहा है कि इसके बाद जज ने उसका सीना छुआ और सलवार उतारने को कहा। इस पर लड़की रोने लगी और कहा कि यह सब मुझसे नही होगा। 21-वर्षीय एक अन्य युवती ने भी उक्त जज पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया है, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि उसने पुलिस में इसकी शिकायत क्यों नहीं की। उसका कहना है कि जज ने कपड़े न उतारने पर गलत बयान लिखने की धमकी भी दी। दोनों लड़कियों ने गोंडा में पत्रकारों को आपबीती सुनाई। पुलिस ने 24 जनवरी की देर शाम तक जज के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की थी। पुलिस के मुताबिक, इसके लिए इलाहाबाद कोर्ट से अनुमति की जरूरत है। यह जज इन दोनों महिलाओं के अपहरण के मामले की सुनवाई कर रहा था।

                                             मित्रों,अब प्रश्न यह उठता है कि जब कानून के देवता ही इस प्रकार दानव बन जाएंगे तो कैसे मिलेगा लोगों को न्याय? प्रश्न तो यह भी उठता है कि अब इस जज को क्या सजा दी जाए? देश का अंधा कानून तो कहेगा कि पहले साबित करो कि उसने छेड़खानी की है।जो होगा ही नहीं क्योंकि इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह तो है ही नहीं। मेडिकल जाँच में भी कुछ नहीं आएगा और फिर बात आई-गई हो जाएगी। जज साहब भविष्य में और भी निर्भीक होकर बंद कमरे में अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के बालिग या नाबालिग होने की डॉक्टरी जाँच करेंगे,बयान बिगाड़ देने की धमकी देकर उनसे कपड़े उतरवाएंगे और स्पर्श-सुख का आनन्द लेंगे।

                        मित्रों,दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में एक ऐसी ही कथा आती है जो अक्षरशः ऐसी तो नहीं है लेकिन इस मामले पर हमारा मार्गदर्शन जरूर कर सकती है। हुआ यह कि जब कौरव और पांडव गुरूकुल से वापस आए तो उसी समय हत्या का एक मामला राजदरबार में पेश हुआ। ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र चारों जातियों से संबद्ध एक-एक अपराधी दरबार में लाए गए। चारों ने हत्या की थी। पहले महाराजकुमार दुर्योधन से न्याय करने को कहा गया। दुर्योधन ने चारों को एकसमान सजा सुना दी। फिर मामले को धर्मराज युधिष्ठिर के सामने लाया गया। धर्मराज ने शूद्र को सिर्फ कुछ कोड़े लगाकर छोड़ देने को कहा। वैश्य को कोड़े के साथ-साथ सम्पत्ति जब्ती का भी दंड दिया। क्षत्रिय को आजीवन कारावास की सजा दी और ब्राह्मण को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। तब राजा धृतराष्ट्र ने उससे पूछा कि अपराध तो चारों ने एकसमान किए हैं फिर चारों की सजा अलग-अलग क्यों? धर्मराज ने उत्तर में कहा कि महाराज इन चारों ने कतई एकसमान अपराध नहीं किया है। यह शूद्र समाज द्वारा विद्या से वंचित है इसलिए भले-बुरे की पहचान नहीं कर सकता इसलिए इसका अपराध काफी कम और क्षम्य है। वैश्य अल्पशिक्षित है अतः इसका अपराध शूद्र से ज्यादा गंभीर है। क्षत्रिय शिक्षित तो है ही इस पर समाज में व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है अतः इसका अपराध अक्षम्य है। ब्राह्मण समाज के लिए नीतियाँ बनाता है,कानून बनाता है और अगर वह खुद आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त हो जाएगा तो फिर उन नीतियों और कानुनों पर कौन अमल करेगा और इस तरह राज्य और समाज में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी, इसलिए इसका अपराध जघन्य है। महाराज,ऊपरी तौर पर इन चारों के अपराध समान दिखते जरूर हैं पर समान हैं नहीं और इसलिए मैंने इन चारों को सजा भी अलग-अलग दी है।

                        मित्रों,कहना न होगा कि हमारे वर्तमान भारत की न्याय-प्रणाली भी दुर्योधनी है। यह दुर्योधन जैसा कि मैं अचूक भविष्यवाणी चुका हूँ इन जज साहब को बाईज्जत बरी कर देगा परंतु इस स्थिति में युधिष्ठिर क्या करते? वे कदाचित् इसे मृत्युदंड से कमतर सजा देते ही नहीं क्योंकि इसने न सिर्फ एक नाबालिग लड़की की मजबूरी का बेजा लाभ उठाया है बल्कि इसके कुकृत्य के चलते लोगों का कानून में विश्वास भी कम हुआ है,उसे गंभीर क्षति पहुँची है। परन्तु क्या भारत में हमें कभी युधिष्ठिर-सदृश न्यायपालिका देखने को मिलेगी? हमें कब तक दुर्योधनी न्यायिक-प्रणाली का बोझ उठाना पड़ेगा? मैं मानता हूँ कि न्याय को त्वरित तो होना ही चाहिए गतिशील भी होना चाहिए। फैसले सब धन बाईस पसेरी की तर्ज पर नहीं बल्कि प्रत्येक मामले के गुण-दोष के आधार पर आने चाहिए। इसके साथ ही फैसले सदियों पुरानी धूल से सनी जर्जर विदेशी पुस्तकों के आधार पर भी नहीं किए जाने चाहिए। मैं पूछता हूँ अपने देशवासियों से कि दिल्ली बलात्कार मामले में सबसे बड़ी भूमिका निभानेवाले अपराधी को सबसे सस्ते में छोड़ देना कैसा न्याय है,कहाँ का न्याय है? क्या पाँच-सात साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में सजा पूरी कर चुके सुनील सुरेश उर्फ पप्पू साल्वे को उसके पहले अपराध की गंभीरता को देखते हुए तभी फाँसी नहीं दे दी जानी चाहिए थी?  तब क्या हम एक और मासूम को उसका शिकार होने और मृत्यु को प्राप्त होने से नहीं बचा सकते थे जिसके साथ उसने जेल से छूटने के कुछ ही दिनों बाद दुष्कर्म किया और फिर मौत के घाट उतार दिया? मैं पूर्व न्यायाधीश श्री जगदीश शरण वर्मा जी से जानना चाहता हूँ कि दिल्ली दुष्कर्म कांड में अगर दामिनी के स्थान पर उनकी बेटी या पोती होती तब भी क्या उनकी रिपोर्ट वही होती जो अब है? लेकिन इसमें वर्माजी का क्या दोष? वे बेचारे भी तो इसी दुर्योधनी न्यायपालिका की उपज हैं जो न्याय करना जानती ही नहीं है,नाबालिग लड़कियों के कपड़े उतरवाना जरूर जानती है। नहीं तो वर्माजी यह कैसे भूल जाते कि जहाँ हत्या शरीर का हनन करती है बलात्कार सीधे आत्मा की हत्या करता है,हनन करता है। जहाँ हत्या ईन्सान को लाश में बदल देती है बलात्कार पीड़िता को जिंदा लाश में बदल देता है। इसलिए बलात्कारी को तो हत्यारे से भी ज्यादा सख्त सजा मिलनी चाहिए,दुनिया की सबसे सख्त संभव सजा मिलनी चाहिए। वर्माजी फरमाते हैं कि इस समय पूरी दुनिया में मृत्युदंड के खिलाफ माहौल बन रहा है। क्या वर्माजी को पूरी दुनिया के लिए सिफारिश करनी थी या फिर सिर्फ भारत के लिए? अर्जुन की तरह सिर्फ पक्षी की आँख देखने के बदले वर्माजी तो पेड़ और डालियों को भी देखने लगे। मैं वर्माजी से पूछना चाहता हूँ कि क्या भारत में भी इस समय मृत्युदंड के खिलाफ माहौल बना हुआ है? अगर नहीं तो फिर कैसे उन्होंने जनभावना की उपेक्षा कर दी? कोई भी कानून जनता के लिए होता है या जनता कानून के लिए होती है? क्या भारत के लोकतंत्र को भी,लोकतंत्र के प्रत्येक आधार-स्तम्भों को भी जनता का,जनता के द्वारा और जनता के लिए नहीं होना चाहिए?

                                           मित्रों,मैं अपने पहले के आलेखों में भी अर्ज कर चुका हूँ कि सरकार ने वर्मा कमीशन का गठन जनता को सिर्फ मूर्ख बनाने के लिए और समय खराब करने के लिए किया था। उसे अगर सचमुच सख्त कानून बनाना होता तो वो अविलंब संसद का विशेष सत्र बुलाती जो उसने नहीं किया। आलेख के अंत में मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि आपको कौन-सी न्याय-प्रणाली चाहिए? नराधम दुर्योधनवाली जो अभी अपने यहाँ प्रचलन में है या धर्मावतार युधिष्ठिरवाली जो महाभारत-युद्ध के बाद कुछ ही समय के लिए सही भारतवर्ष में प्रचलन में थी।

अवसर बनाये जाते हैं


अवसर बनाये जाते हैं

अवसर की प्रतीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि अवसर अनुकूल या प्रतिकूल हर परिस्थिति में
छिपा हुआ रहता है ,आवश्यकता है परिस्थिति को दृढ़ता के साथ अपने सपने के अनुसार
बदल देने की।

किस्मत अवसर को पहचान कर पकड पाने वाले दिलेर लोगों की सफलता को कहते हैं,इसके
अलावा किस्मत हाथ पर हाथ धरे बैठे लोगों की असफलता को भी कहा जाता है।

हमारी संस्कृति हमें अवसर गढ़ना सिखाती है।रामायण काल में श्री राम का वनवास एक घटना
थी,जिसे दुखद कहा जा सकता है परन्तु श्री राम द्वारा उस परिस्थिति को दृढ़ता से राष्ट्र के हित
में मोड़ देना इतिहास का सुखद अवसर बन गया क्योंकि श्री राम ने वनवास काल के दरमियान
अयोध्या से सुदूर फैल रहे आतंक को समूल नष्ट कर दिया और शांति स्थापित कर दी थी।

कृष्ण का जन्म बहुत विपरीत परिस्थियों में हुआ।माँ -बाप कैद थे और खुद की जान जन्म के
साथ ही जोखिम में थी मगर उन्होंने उन विपरीत परिस्थियों में भरपूर संघर्ष किया और आतंक
का खात्मा किया और शांति की स्थापना की।

हमारे वेद कहते हैं कि देव भी कितना भी प्रतिकूल हो मगर आखिर में वह भी पुरुषार्थी के साथ
आ खड़ा होता है

हमारे शास्त्र कहते हैं तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों में है,अपना हाथ जगन्नाथ।पुरुषार्थी व्यक्ति
अपनी हाथों की लकीरे खुद तय करता है और निट्ठलो की लकीरे समय तय कर देता है।

चाणक्य ने नन्द के आतंक को ख़त्म करने का दृढ संकल्प लिया और चल पड़े अवसर को
खोजने,जो व्यक्ति अवसर आने की प्रतीक्षा में बैठा रहता है वह अवसर को पहचान नहीं पाता
है मगर जो अवसर को खोजने निकल पड़ता है उसको अवसर का साक्षात्कार हो जाता है,जैसे
चाणक्य को अवसर चन्द्रगुप्त के रूप में मिला था।वेद का सन्देश है -"चरेवेति,चरेवेति "

अवसर कहाँ पाया जाता है?

अवसर का निवास प्रतिकूल परिस्थितियों में छिपा है,विपरीत दिशा से बहती हवा में छिपा
है ,बारिस को तरसती फटी जमीन पर पड़ा है,भयंकर संघर्ष में छिपा है उसे पकड़ने के लिये
राणा प्रताप ने घास की रोटी में ढूंढा,पृथ्वीराज ने शब्दबाण में ढूंढा,शिवाजी ने साहस में ढूंढा,
सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फोज में ढूंढा,गांधी ने अहिंसा में ढूंढा,शास्त्री जी ने "जय जवान-
जय किसान में ढूंढा,कलाम ने विज्ञान में ढूंढा,सचिन ने बल्ले में ढूंढा,साइना ने बेडमिन्टन
में ढूंढा और पाया भी। आवश्यकता है कदम बढ़ाने की ,कहा है-दाना खाक में मिलकर गुलो-
गुलजार होता है।

अवसर कैसे मिलता है?

अवसर का रास्ता असफलताओं के दलदल से होकर गुजरता है,संघर्षों की भीषणता से
निकलता है। पानी में भयंकर जोखिम है मगर तैरना सीखना है तो उसमे उतरना ही पड़ता
है केवल किताबी ज्ञान से तैरना नहीं आ जाता।हमारा समय खराब चल रहा है यह सोच
कर जो अच्छे समय के इन्तजार तक बैठे रहने का निर्णय कर चुके हैं उनके लिए कोई
अवसर दस्तक देने नहीं आता है।जो विषम परिस्थियों में कदम दर कदम बढ़ाते जाते हैं
उनकी पकड़ में अवसर आ ही जाता है।

क्या अवसर दर्शन देता है ?

हाँ, अवसर को देखने के लिए किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है,हम हर दिन
अवसर को अपने से निकट गुजरते हुए देख सकते हैं।परीक्षा में प्रथम आने वाले विधार्थी में,
खेल में प्रथम आने वाले खिलाड़ी में,भयंकर मंदी में मुनाफा कमाने वाली कम्पनी के
संचालक में,युद्ध में विजयी होने वाले सैनिक में,निर्धनता को पछाड़ कर धनी बने लोगों में
मिलता ही है,जरूरत है खुली आँखों से देखने की।

अवसर को कैसे पकड़े ?

अवसर को पकड़ने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं दृढ़ संकल्प करे,सिर्फ लक्ष्य नहीं पक्का ध्येय
बनाये,कुछ कदम नहीं लगातार चले,डर भय घबराहट को छोड़े और निडर बने,खुली आँखों
से सपने देंखे और उन्हें साकार करने के लिए अध्यव्यवसाय करे ,निरन्तरता बनाये रखे,
खुद में विश्वास रखे,कर्म पर ध्यान दे फल की चिन्ता ना रखे।  
                     

27.1.13

मोदी के आगे राजनाथ भी नतमस्तक !


2014 का चुनाव करीब है ऐसे में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने को बेचैन भाजपा में ये सवाल जोरों से उठ रहा है कि अगर 2014 में एनडीए की सरकार बन गई तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा..? भाजपा के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की भी इच्छा तो होगी ही लेकिन अफसोस उनकी ये हसरत पूरी तो होगी नहीं..! दौड़ में तो और भी बहुत नेता हैं जिनमें सुषमा स्वराज, अरुण जेटली के अलावा अब राजनाथ सिंह का नाम भी जुड़ गया है लेकिन जिस नाम का जिक्र मैंने अभी तक नहीं किया वही दौड़ में सबसे आगे दिखाई दे रहा है।
बात गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी की हो रही है। भले ही वे भाजपा के राष्ट्रीय नेता न हों...गुजरात की राजनीति में सक्रिय हों लेकिन इसके बाद भी वे लोकप्रियता के मामले में भाजपा के तमाम दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं से दो कदम आगे ही हैं। विरोधियों को छोड़िए अपनी ही पार्टी में भी वे खासा दम रखते हैं...फिर उनके सामने भले ही पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों न हो..?
नरेन्द्र मोदी दिल्ली में पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिलने और उनको बधाई देने जब राजनाथ सिंह के निवास पर पहुंचे तो राजनाथ सिंह अपने निवास के बाहर मोदी के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठे थे। ऐसा लग रहा था कि पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर मोदी राजनाथ सिंह को नहीं बल्कि राजनाथ सिंह मोदी को बधाई दे रहे हों।
ये पार्टी में मोदी का बढ़ता कद नहीं तो और क्या था कि उनकी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के स्वागत के लिए अपने निवास के बाहर खड़ा था..!
क्या किसी और भाजपा शासित राज्य का मुख्यमंत्री पार्टी के नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने पहुंचे तो राजनाथ सिंह इसी तरह उसका स्वागत करेंगे…उसके स्वागत में अपने निवास के बाहर खड़े मिलेंगे..? लेकिन मोदी के मामले में ऐसा हुआ क्योंकि राजनाथ सिंह ये जानते हैं कि 2009 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा की हार का जो दाग उनके माथे पर लगा हैवो दाग 2014 में केन्द्र में एनडीए की सरकार बनवाकर कोई शख्स अगर मिटा सकता है तो वो शख्स कोई और नहीं नरेन्द्र मोदी ही है। ऐसे में क्यों न पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के स्वागत में पलकें बिछाए अपने निवास के बाहर खड़ा हो। सही कहा न राजनाथ सिंह जी।

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दलित, पिछड़े सबसे भ्रष्ट..!


गणतंत्र दिवस पर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने अपने विचारों के गणतंत्र से  नया भूचाल पैदा कर दिया। आशीष नंदी कहते हैं कि भारत में दलित और पिछड़े ही सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं..! नंदी साहब इसके पीछे पश्चिम बंगाल का एक उदाहरण भी देते हुए कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में पिछले 100 सालों में दलितों और पिछड़ों को सत्ता के नजदीक आने का मौका नहीं मिला इसलिए वहां पर भ्रष्टाचार कम हैं..!
आशीष नंदी साहब की बात अगर सही है फिर तो इसका एक और मतलब ये निकलता है कि भ्रष्टाचार का जीन तो दलितों और पिछड़ों के खून में है और फिर तो ये बड़ी ही खतरनाक स्थिति है..!
ऐसे में तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल अपने मंत्रिमंडल से दलित और पिछड़े वर्ग के मंत्रियों को निकाल बाहर करना चाहिए..!
लोकसभा अध्यक्ष पद से मीरा कुमार को हटा देना चाहिए..!
सरकार को सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए..!
सरकार को दलितों और पिछड़ों के लिए चलाई जा रही सारी योजनाओं पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए..!
आशीष नंदी साहब आपने तो कमाल कर दिया...जिस भ्रष्टाचार रूपी कैंसर को खत्म करने में बड़े-बड़े नाकाम हो गए आपने तो उसकी जड़ ही पकड़ ली..! आपकी बात पर अमल करते हुए सरकार को तो अब भ्रष्टाचार की जड़ को ही उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि भारत से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए..!
नंदी साहब आप तो समाजशात्री और आलोचक ठहरे...भ्रष्टाचार पर आपने चिंता की बड़ा अच्छा लगा लेकिन आपने तो दलितों और पिछड़ों पर ही सवाल खड़ा कर दिया। माना साहित्य सम्मेलन हर मुद्दे पर खुली चर्चा के लिए होता है लेकिन आपने तो अपनी जुबान कुछ ज्यादा ही खोल दी। आपने सफाई भी पेश कर दी...माफी भी मांग ली लेकिन क्या इतने भर से आपकी जुबान से छूटे दलितों और पिछड़ों के अपमान के तीर वापस हो जाएंगे..?
नंदी साहब भ्रष्टाचार किसी के खून में नहीं होता और न ही इसका किसी धर्म या जाति से कोई लेना देना है। भ्रष्टाचार तो नेता(सभी नहीं) भी करते हैं, अधिकारी- कर्मचारी(सभी नहीं) भी करते हैं, छोटे-बड़े व्यापारी(सभी नहीं) भी करते हैं, आम आदमी(सभी नहीं) भी करते हैंलेकिन आपने तो भ्रष्टाचार की जाति और वर्ग ही तय कर दिया..!
पैसे पर जिसकी नीयत खराब हो जाती है नंदी साहब वो ही भ्रष्टाचारी हो जाता है बस भ्रष्टाचार करने के तरीके अलग – अलग होते हैं...कोई ज्यादा करता है तो कोई कम करता है।
चलिए नंदी साहब आपने अपने कहे पर सफाई भी दे दी, माफी भी मांग ली, आपके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो गई...आखिर जयपुर साहित्य सम्मेलन की सारी सुर्खियां भी तो आपने बटोर ही ली...इस बात का तो संतोष होगा ही आपको..! आजकल तो ट्रेंड भी है इसका।

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2014- नरेन्द्र मोदी बनेंगे प्रधानमंत्री !


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर कोई कुछ बोले लेकिन जब बात 2014 की होती है तो मोदी का जिक्र खुद ब खुद आ जाता है। कांग्रेस में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर नंबर दो की पोजीशन में बैठा दिया जाता है तो 2014 में मोदी बनाम राहुल पर चर्चा होती है। सोशल नेटवर्किंग साईट्स से लेकर तमाम ओपिनियन पोल मोदी बनाम राहुल पर केन्द्रित दिखाई दे रहे हैं और भाजपा के लिए खुशी की वजह हो सकती है कि मोदी हर जगह राहुल गांधी पर भारी दिखाई देते हैं हालांकि कांग्रेसी इससे इत्तेफाक नहीं रखते लेकिन इससे मुंह मोड़ना कांग्रेसियों के लिए इतना आसान भी नहीं है।
ऐसे में केन्द्र की सत्ता में वापस लौटने को बेताब दिखाई दे रही भाजपा मोदी को निकट भविष्य में इलेक्शन कैंपेन कमेटी का प्रभारी नियुक्त कर दे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। ये बात सही है कि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय होने के बावजूद एनडीए के साथ ही भाजपा में भी फिलहाल सर्व स्वीकार्य नेता नहीं हैं लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मोदी फिलहाल राष्ट्रीय राजनीति में न होकर भी तमाम राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय नेताओं पर भारी पड़ते हैं।
मोदी के दामन में गोधरा का दाग जरूर है लेकिन गुजरात को बिना रूके विकास के पाथ पर आगे ले जाने का श्रेय भी मोदी के ही पास है। हालिया विधानसभा चुनाव में गुजरात की जनता ने इस पर मुहर लगाकर इस बात को साबित भी कर दिया है कि वे उसी का साथ देंगे जो विकास की बात करेगा।  
2014 के मद्देनजर मोदी को भाजपा अगर इलेक्शन कैंपेन कमेटी का प्रभारी नियुक्त करती है तो इससे न सिर्फ मोदी का कद पार्टी में और बढ़ जाएगा बल्कि ये संकेत भी होगी कि भाजपा ये मान चुकी है कि मोदी के बिना 2014 फतह करना आसान नहीं है। महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर यूपीए 2 सरकार के कई फैसलों के खिलाफ जनता की नाराजगी के बावजूद भी 2014 की राह भाजपा के लिए इतनी आसान नहीं है जितनी वास्तव में दिखाई दे रही है लेकिन माना भाजपा 2014 फतह कर भी लेती है तो सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा..?
जाहिर है प्रधानमंत्री भाजपा का ही होगा और नरेन्द्र मोदी का नाम दूसरे नामों से बहुत आगे है लेकिन मोदी के नाम को लेकर भाजपा में अंतर्विरोध छिपा नहीं है ऐसे में एनडीए से पहले भाजपा को पूरी पार्टी को मोदी के नाम पर एकमत करना होगा जो काम आसान तो नहीं है लेकिन बहुत मुश्किल भी नहीं है मतलब मोदी के नाम पर भाजपा में सहमति बन सकती है..! लेकिन भाजपा की मुश्किल यहीं आसान नहीं हो जाती क्योंकि पार्टी के बाद एनडीए में मोदी के नाम पर सर्वसम्मति बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
यहां पर एनडीए का मुख्य घटक जद यू ही मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है...बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मोदी की खटपट किसी से छिपी नहीं है ऐसे में भाजपा के लिए पीएम की कुर्सी के लिए मोदी के नाम पर जद यू को राजी करना ही होगा..!
बहरहाल 2014 में जनता किसका साथ देगी और देश का अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन तमाम ओपिनियन पोल और सोशल नेटवर्किंग साईट्स में सिर्फ दो ही नाम चर्चा में हैं...नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी। इन दोनों नामों में भी नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी को पीछे छोड़ते नजर आ रहे हैं।   

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स्थानीय पुलिस बल की मौजूदगी में केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाकर खूब आग तापी भाजपाइयों ने
बीते दिनों हुये सिवनी वृहत्ताकार सहकारी समिति के चुनाव में एक बार इंका और भाजपा के बीच सियासी नूरा कुश्ती सरे आम दिखायी दी। कांग्रेस के एक उप गुट ने भाजपा के एक गुट से तालमेल बिठाकर सदस्यों का चुनाव लड़ा। इसमें यह समझोता किया गया कि सहकारी बैंक का प्रतिनिधि एवं एक उपाध्यक्ष भाजपा काहोगा तथा समिति का अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष इंका का होगा। इंका और भाजपा की लाल बत्तियों से लेकर चिमनियों तक के बीच खेली जा रही नूरा कुश्ती के चलते आज यह कहना संभव नहीं हैं कि जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर किस पार्टी के किस गुट का नेता बन जायें। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पूरे देश में चौंकाने वाला साबित हुआ। प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समर्थक नरेश तोमर की ताजपोशी के बाद डॉ. बिसेन को राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में प्रस्तावक बनाया जाना भाजपायी हल्कों में खासा चर्चित हैं। जिला भाजपा ने अध्यक्ष नरेश दिवाकर के नेतृत्व में केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के विवादास्पद बयान को लेर धरना प्रदर्शन किया और यू.पी.ए. तथा शिंदें का पुतला दहन भी किया। उल्लेखनीय है कि शिंदे ने जयपुर में  यह कह दिया था कि संघ और भाजपा में भगवा आतंकवादी तैयार किये जाते हैं। स्थानीय पुलिस बल की भारी उपस्थिति में गांधी चौक में भाजपा के कार्यकर्त्ताओं ने केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाया और आराम से पूरा पुतला जलते तक भीषण ठंड़ के मौसम में खूब आग भी तापी।  
सहकारी समितियों के चुनेाव में भी चर्चित रही नूरा कुश्ती-बीते दिनों हुये सिवनी वृहत्ताकार सहकारी समिति के चुनाव में एक बार इंका और भाजपा के बीच सियासी नूरा कुश्ती सरे आम दिखायी दी। कांग्रेस के एक उप गुट ने भाजपा के एक गुट से तालमेल बिठाकर सदस्यों का चुनाव लड़ा। इसमें यह समझोता किया गया कि सहकारी बैंक का प्रतिनिधि एवं एक उपाध्यक्ष भाजपा काहोगा तथा समिति का अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष इंका का होगा। नूरा कुश्ती के इस समझोते के तहत लड़े गये चुनाव में इन्हें सफलता मिली और कांग्रस के शिव सनोड़िया अध्यक्ष एवं भाजपा के सहकारी क्षेत्र के एक पुरोधा विजय सिंह बघेल बैंक प्रतिनिधि चुन लिये गये। वैसे तो कांग्रेसी यह दावा कर रहें है कि उन्हें 75 प्रतिशत समितियों में सफलता मिल गयी हैं। यदि इसमें कांग्रेस के बैंक प्रतिनिधि और अध्यक्ष चुने गये हैं तो यह माना जाना चाहिये कि जिलासहकारी बैंक के अधिकांश संचालक कांग्रेस के चुन जायेंगेंऔर बैंक पर कांग्रेस का कब्जा हो जायेगा। लेकिन यदि सिवनी सह. समिति की तर्ज पर चुनाव हुये है तो यह दावा अंत में खोखला भी साबित हो सकता हैं। वैसे वर्तमान में भाजपा के अशोक टेकाम बैंक के अध्यक्ष हैं और वे पूरी ताकत से दोबारा अध्यक्ष बनने की जुगत जमा रहें हैं लेकिन भाजपा के अलग अलग गुट अपने पाले में अध्यक्ष पद लाने की जुगाड़ जमा रहें हैं। इस गुटबाजी के चलते कौन सा गंट कांग्रेस के हाथ मिलाकर संचालक के चुनावों में कौन सा खेल खेल जाये? इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह के कयासे लगाये जा रहे हैं। वैसे सिवनी सहकारी समिति के शपथ ग्रहण समारोह मेें विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने मंड़ी और इन चुनावों में मिली सफलता के जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी की रणनीति की तारीफ की हैं। दूसरी तरफ मंड़ी चुनावों में मिली हार के कारण जिला भाजपा अध्यक्ष एवं मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर भी यह कोशिश कर रहें हैं कि येन केन प्रकारेण ना केवल भाजपा का वरन उनके अपने गुट का  भाजपा नेता बैंक का अध्यक्ष बन जाये। इंका और भाजपा की लाल बत्तियों से लेकर चिमनियों तक के बीच खेली जा रही नूरा कुश्ती के चलते आज यह कहना संभव नहीं हैं कि जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर किस पार्टी के किस गुट का नेता बन जायें। आज आलम यह हैं कि अपने हितों के सामने इस जिले के इंका और भाजपा नेताओं के लिये पार्टी हितों की बलि चढ़ा देना कोई अनहोनी बात नहीं रह गयी हैं। 
राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावक बनने से कद बढ़ा डॉ. बिसेन का-भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पूरे देश में चौंकाने वाला साबित हुआ। आर.एस.एस. की सहमति से वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी का दोबार अध्यक्ष चुना जाना लगभग निश्चित था। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी संघ ने गडकरी को हरी झंड़ी दे दी थी लेकिन भाजपा की आपसी घमासान और एक दिन पहले गडकरी के ठिकानों पर डले आयकर विभाग के छापों ने सारे पासें एक बार में ही पलट का रख दिये। रातों रात सारा खेल बदल गया और पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह की एक बार फिर से ताजपोशी हो गयी। जितना राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव चर्चित रहा उससे कम जिले में भी यह चर्चित नहीं रहा। इसका प्रमुख कारण यह था कि प्रदेश से अध्यक्ष पद के लिये प्रस्तावकों की सूची में जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को शामिल किया गया था। प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समर्थक नरेश तोमर की ताजपोशी के बाद डॉ. बिसेन को राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में प्रस्तावक बनाया जाना भाजपायी हल्कों में खासा चर्चित हैं। ऐसा माना जा रहा है कि डॉ. बिसेन की इस उपलब्धि से जिले की  भाजपा में उनका कद और अधिक बढ़ जायेगा। उल्ललेखनीय है कि डसॅ. बिसेन बरघाट विस से चार बार विधायक रहें हैं इस दौरान वे विधानसभा में भाजपा विधायक दल के सचेतक एवं 2003 से 2008 के बीच प्रदेश के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रह चुके हैं। प्रदेश भाजपा से वे राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी रहें हैं। 
पुलिस बल की मौजूदगी में देश के गृह मंत्री शिंदे का पुतला फूंका भाजपाइनेयों -जिला भाजपा ने अध्यक्ष नरेश दिवाकर के नेतृत्व में केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के विवादास्पद बयान को लेर धरना प्रदर्शन किया और यू.पी.ए. तथा शिंदें का पुतला दहन भी किया। उल्लेखनीय है कि शिंदे ने जयपुर में  यह कह दिया था कि संघ और भाजपा में भगवा आतंकवादी तैयार किये जाते हैं। राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय भाजपा के अध्यक्ष बनने के तत्काल बाद ही इसके विरोध का राष्ट्र व्यापी आव्हान किया था। इसकी के तहत जिला मंख्यालय में यह आयोजन किया था। इस धरने को भाजपा के कई नेताओं ने संबोधित किया और केन्द्र सरकार और सोनिया गांधी पर निशाने साधे। भाजपा नेताओं ने महामहिम राष्ट्रपति महोदय से गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को बर्खास्त करने की भी मांग की हैं। स्थानीय पुलिस बल की भारी उपस्थिति में गांधी चौक में भाजपा के कार्यकर्त्ताओं ने केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाया और आराम से पूरा पुतला जलते तक भीषण ठंड़ के मौसम में खूब आग भी तापी। वैसे तो उपस्थिति के हिसाब से यह धरना सिर्फ औपचारिक ही कहा जा सकता है लेकिल भारी ठंड़ और बारिश तथा बदली के बीच संपन्न इस आयोजन  में भाजपा नेताओं के तेवर काफी आग उगलने वाले थे। वैसे तो महात्मा गांधी की हत्या के बाद से ही संघ विवादों के घेरे में रहा हैं तथा उसे अपने आप को हिन्दूवादी संगठन कहने में कभी कोई संकोच भी नहीं रहा हैं। लेकिन केन्द्र सरकार के गृह मंत्री के बयान ने उन्हें और भाजपा को आक्रमक होने का एक मौका दे दिया और मिशन 2013 और मिशन 2014 में जुटी भाजपा ने इसका पूरा पूरा फायदा उठानें में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। सभा स्थल पर मौजूद एक आम आदमी यह टिप्पणी बहुत अधिक सटीक थी कि वैसे तो राजनीति में सारे नेता सब कुछ करते औा कहते हैं लेकिन राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुये ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिये जिससे पड़ोसी देश की सीमाओं पर सेनिकों के साथ हाने वाले अत्याचार और अधिक बढ़ जाये। बात भले ही कुछ अटपटी लगे लेकिन यह आम आदमियों की नेताओं के बारे में बनी सोच को जरूर उजागर करती हैं। “मुसाफिर“
दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
 26 जनवरी 2013 से साभार      

26.1.13

मायावती और आसाराम बापू के हाथी
कल ही आज़म खान ने कहा है कि लोग जिन्दा रहकर ही अपनी मूर्तियाँ लगवा देते हैं । अल्ला से दुआ है कि बेटी दे तो दे पर मायावती जैसी न दे । गुस्साए एक बी एस पी नेता का बयान आया है - आज़म की मानसिकता ही ऐसी है । बी एस पी का हाथी बहुत आगे जाएगा । हाथी चलता रहता है और कुत्ते भौंकते रहते हैं । एक बार सोचा - कुछ लिखूं लेकिन तभी एक अन्य संत की विगत दिनों की वाणी याद आई जिन्होंने दामिनी  के लिए कहा था कि दामिनी को उन बलात्कारियों को भाई बनाना चाहिए था । यदि उसने दीक्षा ली होती तो उसकी ऐसी दुर्गत न होती । बाद में बवाल मचा तो आसाराम मीडिया पर बिगड़कर बोले  - कुत्ते भौंकते रहते हैं और हाथी चलता रहता है । यह आसाराम का हाथी था । एक संत का हाथी । हाथी संत का हो या मायावती का । बाकि सब कुत्ते ही हैं । आज़म खान का बयान तो कोई अर्थ नहीं रखता । मायावती ने मूर्ति अपने अज्ञान के कारण ही लगाईं होगी । उन्हें मालूम न रहा हो कि जिन्दे आदमी की मूर्ति नहीं लगवाई जाती । हो सकता है मालूम भी रहा हो आ लेकिन अब सोचता हूँ - यदि एक विज्ञापन में दिवंगत ग़ज़ल गायक आज भी एक खांसी की दवा का प्रचार कर सकते हैं तो मायावती ने भी कोई ख़ास बुरा नहीं किया था । उसने जो किया वह वास्तव में सम्मान के लिए वर्षों से तरसते एक समाज का उतावलापन  ही था । पता नहीं , कल क्या हो और कोई मायावती को याद करे भी या न करे । कुछ लोग समाज में ऐसे भी होते हैं जिन्हें जब पुत्रों से कोई उम्मीद नहीं होती तो वे अपना श्राद्ध का इंतजाम भी अपने आप ही कर जाते हैं । भारत में सन्यासी बनने से पहले स्वयं अपना श्राद्ध करने की परम्परा है । मायावती सन्यासी बनने तो नहीं ही जा रही थी लेकिन उतावलापन तो दिखाई ही देता है । लेकिन आज़म खान का कहना कि कोई बेटी मायावती न बने , वास्तव में मानसिक दिवालियेपन का ही परिचय है । मायावती की उस भूल पर अब सपा ने ही अपमान की चादर चढ़ा दी है । मूर्ति लगवा दी , लोग तो मूर्ति उखाड़ रहे हैं । यदि आसाराम जैसे संतों की बुद्धि का दिवाला निकल रहा है तो राजनीति के नाले में श्वास प्रश्वाश ले रहे इन राजनेताओं के मुख से निकलते इन शब्दों पर कैसा शोक ? संस्कृत में शब्द नित्य माना गया है । शब्दो नित्यः , शब्द एव ब्रह्म , ऐसा ही संस्कृत शास्त्रों में लिखा गया है । वैज्ञानिक इसे प्रतिपादित भी कर चुके हैं । वह ब्रह्म  इनके मुख से इस रूप में निकल कर गुफा से निकलने वाले शब्द की तरह कहीं गूंजता होगा । गूंजता रहेगा । गुफाओं से संतों की वाणी ॐ के रूप में निकला करती थी । आसाराम जैसे संतो की वाणी नहीं । ऋषियों की वाणी । इन नेताओं की वाणी से निकले ये शब्द हमेशा इस बात की याद दिलाते रहेंगे कि भारतीय राजनीति में इन अपशब्दों का उच्चारण करने वाले इन लोगों ने माँ सरस्वती के साथ भी पाशविकता का ही बर्ताव किया था । कालिदास ने कहा था -
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतिपरमेश्वरौ ।।
पार्वती और परमेश्वर वाणी और अर्थ की तरह एक दुसरे से संपृक्त हैं । शब्द और अर्थ की प्रतिपत्ति यानि बोध के लिए मैं उनकी वंदना करता हूँ ।
निश्चित रूप से जहां शब्द और अर्थ को इतना सम्मान दिया गया है उस देश में शब्दों और अर्थों का इतना दुरूपयोग देश को कितना भारी पड़ने वाला है निश्चित रूप से ये तो वे जानते ही नहीं होंगे ।

ये वही राजपथ है...वही “गण’ ‘तंत्र” है !


चारों तरफ गणतंत्र दिवस की धूम है...हो भी क्यों न आज से 63 साल पहले 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान आज ही के दिन लागू हुआ था। भारत का संविधान अस्तित्व में आने के बाद भारत एक संप्रभु देश बना था। दिल्ली में आज राष्ट्रपति ने तिरंगा फहराया जिसके बाद राजपाथ में जमीन से आसमान तक भारत की बहुमूल्य संस्कृति और सैन्य ताकत का भव्य नजारा दिखाई दिया।
राज्यों की रंग बिरंगी संस्कृति से देश रूबरु हुआ तो विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत ने दुनिया को अपनी ताकत का एहसास भी कराया। पांच हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल के साथ ही अवॉक्स प्रणाली और पानी के भीतर दुश्मन की निगरानी में सक्षम नौसैनिक सोनार प्रणाली की भी नुमाइश हुई तो अर्जुन टैंक, सर्वत्र पुल, पिनाक मल्टी बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम भी नजर आया। वहीं  इस साल नौसेना में शामिल होने वाले विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य का लघु संस्करण भी परेड में दिखा।
64वें गणतंत्र दिवस पर राजपथ देश प्रेम से ओतप्रोत दिखाई दे रहा था लेकिन इस गणतंत्र दिवस पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस राजपथ पर देश की संस्कृति और सैन्य ताकत पर आज हम इठला रहे हैं...इस राजपथ पर दिसंबर में दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ देश के युवाओं में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला था। उस वक्त न तो देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति भवन से बाहर निकले न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने युवा आक्रोश को समझने की कोशिश की। देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो इनकी तुलना नक्सलियों से तक कर दी थी।
राजपाथ पर युवाओं को न सिर्फ अपनी आवाज बुलंद करने से रोका गया बल्कि दिल्ली पुलिस ने तो उन पर पानी की बौछार करने के साथ ही लाठियां भांजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि देर से ही सही लेकिन राजपाथ पर उमड़ा युवाओं का आक्रोश रंग भी लाया और सरकार न सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संजीदा दिखाई दी बल्कि महिला अपराधों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की कवायद भी शुरु हुई।
गणतंत्र दिवस से ठीक पहले जनवरी के पहले सप्ताह में सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बरता ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था लेकिन उस वक्त पाकिस्तान को मुंहतोड़  जवाब देना तो दूर हमारे प्रधानमंत्री को मुंह खोलने में पूरे एक सप्ताह का वक्त लग गया। इस घटना के बाद भारत के कमजोर और ढीले रवैये ने दुश्मन के हौसले को बढ़ाने का ही काम किया फिर वो एक हफ्ते बाद पीएम की चुप्पी टूटने की बात हो या फिर गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का गैर जिम्मेदाराना बयान।
अहम मुद्दों पर देर से चुप्पी तोड़ने वाले हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इस गणतंत्र दिवस पर तमाम मुद्दों के अलावा महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा देने के साथ ही पाक की बर्बर कार्रवाई पर पाकिस्तान को चेताया तो है...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या सिर्फ महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा महिलाओं के साथ हो रहे अपराध को कम कर पाएगा या फिर पाकिस्तान को चेतावनी मात्र देने से सीमा पर ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी..?
क्या ये वक्त नहीं है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए सिर्फ जांच कमेटी, रिपोर्टों से आगे बढ़कर इस दिशा में न सिर्फ ठोस कदम उठाए जाएं बल्कि उनका क्रियान्वयन भी हो..? क्या ये वक्त नहीं कि सीमा पर बर्बरता दिखाने वाले पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए बजाए इसके कि हमारी सरकार में शामिल लोग हिंदू आतंकवाद जैसे बयान देकर उनकी हौसला अफज़ाई करें..?
उम्मीद करते हैं इस गणतंत्र दिवस के बाद से एक नई शुरुआत होगी...महिलाएं बिना डर के घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा पाएंगी तो भारत की तरफ पलटकर देखने से पहले पाकिस्तान सौ बार सोचेगा..! हालांकि ये बात सही है कि इसके लिए सिर्फ तंत्र को ही नहीं बल्कि गणको भी संकल्प लेना होगा इसी उम्मीद के साथ आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।। जय हिंद ।।

deepaktiwari555@gmail.com

जर्जर मकान


जर्जर मकान 

एक पोत्र अपने दादा के हाथ के बनाये मकान को जमीनदोस्त करवा रहा था।मेने उससे
पूछा -" आप अपने दादा के हाथ का मकान क्यों तुडवा रहे हैं ?"

वो बोला - मकान जर्जर हो रहा था .......

मेने बीच में टोकते हुए कहा-लेकिन ये आपके दादा के हाथ की अंतिम निशानी है ,इसे
जमीनदोस्त करने से उनकी आत्मा को कष्ट होगा ?

वो बोला -मेरे दादा की आत्मा को कष्ट नही ,सुकून मिलेगा क्योंकि इस पुनर्निर्माण से
आने वाली पीढियाँ उन्हें याद रख पायेगी कि हमारे दादा के दादा ने इस जमीन पर घर
बनाया था।

मैं बोला-आपके विचार से पुनर्निर्माण एक आवश्यक प्रक्रिया है।

वो बोला- हाँ ,मगर आप यह प्रश्न क्यों कर रहे हैं ?

मैं बोला- मैं इसलिए कह रह हूँ कि जो बात तुम समझ पाये ,अनपढ़ आम आदमी भी
समझ पाता है लेकिन हमारे नेता नहीं समझ पाते .......!

वो बोला- मतलब .......

मेने कहा- हमारा गणतंत्र  पुनर्निर्माण चाह्ता है मगर इसे मजबूती देने के लिए कोई
तैयार नहीं है।हम वर्षों से कमियों को देख रहे हैं,समझ रहे हैं मगर पुनरोत्थान नहीं
कर पाये हैं।न्याय ठहरा सा लगता है,काम पेपर पर दीखता है,किसान मूर्छित सा लगता
है,औरत पीड़ा झेलती दिखती है,आतंकवादी सम्मानित होते हैं ,देश प्रेमी तड़फते दीखते
हैं,चरित्रहीन संसद में शोभा पा रहे हैं,देश की सम्पदा को समर्थ लूट रहे हैं,गरीब पिसता
जा रहा है,धूर्त अट्टहास लगा रहे हैं,गांधी दीवाल पर टंगे हैं गांधीवाद फट गया है,अधिकार
की माँग से कोड़े पड़ते हैं,नेता आंकड़ो का मायाजाल फैला रहे हैं,कोई पानी को तरस रहा
है,कोई बिजली के लिये चिल्लाता है,कोई शिक्षा को तड़फता है,कोई रोजगार की कतार में
खड़ा है,कहीं अन्न सड़ता है ,कोई भूखा सोता है,सरकार कर लाद रही है,कोई राजस्व में
चुना लगा रहा है ,कोई .............

वो बोला- आपका पुराण खत्म नहीं होगा इसमें नये अध्याय तब तक जुड़ते रहेंगे जब
तक हम जागरूक होने का दिखावा करते रहेंगे।पुनर्निर्माण के लिये जरुरी है कि जर्जर
को जमीनदोस्त किया जाए तभी नवनिर्माण संभव है।

उसकी बात सुनकर मैं आकाश की ओर ताकता रहा ,शून्य को घूरता रहा ,वर्षों से जटिल
रहे प्रश्न को ताकता रहा ...........कोई तो लाल कभी तो आयेगा और नव सर्जन करेगा !        

राष्ट्रपति का संबोधन- हिंदी और अफजल गुरु गायब !


26 जनवरी की पूर्व संध्या पर डीडी न्यूज पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का देश के नाम संबोधन सुना। राष्ट्रपति ने पहले अंग्रेजी में देश को संबोधित किया तो उसके बाद हिंदी में संबोधन की जानकारी टीवी स्क्रीन पर फ्लैश हुई तो पता चला कि प्रणव मुखर्जी साहब हिंदी में भी बोलते हैं लेकिन दुख के साथ ही हैरानी तब हुई जब देखा कि राष्ट्रपति जी अंग्रेजी में ही बोल रहे हैं और दाहिनी तरफ नीचे एक छोटी विंडो में डीडी न्यूज का एक एंकर उसका हिंदी में अनुवाद कर रहा था। देश है हिदुंस्तान लेकिन देश के राष्ट्रपति आम दिन तो छोड़िए गणतंत्र दिवस पर भी हिंदी बोलने से परहेज करते दिखाई दिए।
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी औऱ तब से ही हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। दुनिया में करीब 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और भारत में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी दफ्तरों में भी हिंदी को ही तरजीह देने की बातें की जाती हैं लेकिन जब देश का प्रथम नागरिक गणतंत्र दिवस पर 121 करोड़ भारतीयों के सामने हिंदी को तिलांजलि देकर अंग्रेजी को तरजीह देते हुए दिखाई देता है तो दुख होना लाजिमी है।
चलिए अंग्रेजी के ही सही राष्ट्रपति के संबोधन की अगर बात करें तो वैसे तो ये संबोधन अपने आप में सब कुछ समेटे हुए था लेकिन पूरा सुनने के बाद यहां भी एक उम्मीद धराशायी होती दिखाई दी। राष्ट्रपति ने 1947 से लेकर 2013 तक की बात की। दिल्ली गैंगरेप की घटना पर चिंता जतायी तो सीमा पर पाकिस्तान की बर्बरता पर दुख जताते हुए पाकिस्तान को चेताया भी। प्रणव मुखर्जी ने युवाओं की चिंता की तो साथ ही आने वाले 10 सालों में पिछले 60 सालों से ज्यादा तरक्की और बदलाव की उम्मीद भी जतायी।
राष्ट्रपति ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर चिंता जताते हुए लोगों को नया सवेरा होने का भरोसा तो दिलाया लेकिन बड़ा अच्छा लगता अगर राष्ट्रपति अपने भाषण की शुरूआत संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की दया याचिका खारिज करने की बात के साथ करते। चूंकि 2005 से अफजल की दया याचिका गृह मंत्रालय से राष्ट्रपति भवन के बीच घूम रही है ऐसे में राष्ट्रपति अपने दफ्तर से एक फाइल और देश से एक आतंकी को कम करने की शुरुआत करते तो अच्छा लगता लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ..!
राष्ट्रपति ने आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक पर चिंता जतायी लेकिन प्रणव मुखर्जी संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु के नाम पर आतंक के अंत का पहला अध्याय गणतंत्र दिवस पर अपने हाथों से लिखते तो शायद देशवासियों की खुशी दोगुनी हो जाती लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
राष्ट्रपति ने भारत की चुप्पी को उसकी कमजोरी न समझने की चेतावनी तो पाकिस्तान को दी लेकिन लोकतंत्र के मंदिर पर हमला करने वाले की फांसी का रास्ता साफ करने के साथ प्रणव मुखर्जी पाकिस्तान को चेतावनी देते तो ये ज्यादा असरदार होती लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
64वें गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के संबोधन ने देशवासियों की उम्मीदों को नए पंख लगाने की कोशिश तो की लेकिन ये कोशिश वास्तव में कितनी साकार हो पाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।
उम्मीद करते हैं आने वाली 15 अगस्त पर राष्ट्रपति का संबोधिन देश को हिंदी में सुनने को मिलेगा और अफजल गुरु की फांसी का रास्ता साफ होने का जिक्र भी राष्ट्रपति के संबोधन में होगा...इसी उम्मीद के साथ आप सभी को 64वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद।

deepaktiwari555@gmail.com

25.1.13

इक नुक्कड़ : सफ़दर हाशमी





डर गयी सरकार कि, कोई जा रहा है भूखों नंगों के बीच, उन्हें समझाने हक की बात कर रहा है नुक्कड़ ( street play )....कहीं बहक न जाये लोग, मांग न ले अपना हक...कहीं भूखे-नंगों को भी न हो जाये एहसास हक का....तो भेज दिए कुछ लाठी लिए तामीलदार, और हुक्मरानों के तामीलदार गुलामों ने सरे बाज़ार कर दिया क़त्ल 'सफ़दर हाशमी' का. गिर पड़ी एक लाश, और गिर पड़ा एक जूनून. हुक्मरान खुश, मूक तमाशा देखते सरकार बहादुर खुश.....क्यूंकि जो आवाज़ उठी थी गिरा दी गयी....एक पेड़ जो सींचने चला था कई लोग, उखाड़ दिया गया!
              मैं नहीं हूँ सैफ़्रोन, न ही हरा और न ही लाल....फिर भी सफ़दर हाशमी पर पड़ा हर डंडा मुझे उन सभी के सीने पे पड़ता लगता है, जो चाहते हैं कुछ बदलना, चाहते है मुल्क की सलामियत और जो चाहते हैं, कि समाज में हो सके समरसता. आ सके लोग एक ही दर्जे तक. सफ़दर हाशमी का क़त्ल, सफ़दर का नहीं, इरादों का क़त्ल था. कोशिशों का क़त्ल था. ये हार थी हुक्मरानों की.....
            सत्ता को शायद नहीं पता, कि इरादे मरते नहीं हैं हैं और ना ही राहनुमा भी. कोई न कोई फिर कहेगा 'हल्ला बोल'.

'मुल्क कि बर्बर सत्ता,
ऑंखें घुमा के देख लो,
 इक सफ़दर मरा था जहां,
                                                                 बीसियों सफ़दर खड़े हैं.'   ~V!Vs

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सैफ़्रोन, हरा, लाल- क्रमश: हिन्दू, मुस्लिम, कम्युनिज्म प्रतीक.




समाज और स्त्रियों का जबरन अपहरण ..

Sudheer Maurya 'Sudheer'
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संसार का निर्माण होते ही शायद स्त्रियों को पुरषों का गुलाम समझा जाने लगा।एक ही स्थान से, एक ही प्रक्रिया से पैदा होने के बावजूद उन्हें कभी भी पुरषों के समकक्ष स्थान  प्राप्त न हो सका।    

भारतीय संस्क्रीत में स्त्रियों को माँ , बहन और बेटी के रूप में पूजनीय माना गया है। पर  पत्नी के रूप उसे कभी भी पुरषों ने अपने बराबर नही स्वीकारा। पुरषों में बहुपत्नी रखने का चलन रहा और उनकी कई पत्निया के साथ - साथ कई - कई रखेले भी होती थी। सामन्ती पुरष पराई स्त्रियों का हरण करके उनका बलात्कार करते और फिर उन्हें अपने रनिवास योनि सुख की प्राप्ति के लिए रख लेते। भारत में मुस्लिम आकर्मण के साथ ही स्त्रियों और लडकियों के अपहरण और उन्हें रखेल बनाने के आंकड़े में बहुत तेजी से इजाफा हुआ।

स्त्र्यियो को पुब्लिक प्लेस पर भी काफी समय पहले से अपमानित किया जाता रहा है। द्रौपदी इसका ज्वलंत उदहारण है। ये बात अलग है वो अपने एक मित्र कृष्ण की मदद से बच  गई। वरना पुब्लिक प्लेस पर अपने परिवार के तमाम लोगो की मौजूदगी में ही उसका सामूहिक बलात्कार होना तय था। हा ये बात अलग है की बाद में द्रौपदी के परिवार वालो ने उसके अपमान का बदला कुरुक्षेत्र की ज़मीन को लाल करके लिया।

लगभग द्रौपदी के काल में ही, उससे कुछ वर्ष पहले ही अम्बा नाम की एक राजकुमारी का भी अपहरण करके उसे अपमानित किया गया। उसका बलात्कार तो नहीं हुआ पर जबरन अपहरण की पीड़ा वो सारी उम्र झेलती रही। इस जबरन अपहरण की वजह से उसका पुरुष मित्र उसे छोर कर चला गया।    

इन सब घटनाओं से पहले सीता के अपहरण की घटना तो सबको ज्ञात ही है। उन्हें भी इस जबरन अपहरण का दंश सारी उम्र झेलना पडा और वो कभी भी सुखी जीवन न जी सकी।

जेसा की ऊपर मेने लिखा की भारत में मुस्लिम आकर्मण के साथ ही लडकियों के अपहरण में बड़ी तेजी आई। मुस्लिम लोगो को दुसरे की स्त्रियों और क्वारी लडकियों को अपनी पत्नी या रखेल बनाने में एक विशेष सुख हासिल होता था। अल्लुद्दीन ने गुजरात की रानी कमला देवी और वह की राजकुमारी देवल देवी को जबरन अपने हरम में रखा। और उन्हें योनि दासी के रूप में भोगा। ये बात अलग है की राजकुमारी देवल देवी ने कुछ समय बाद ही अपने इस अपमान का बदला अल्लुद्दीन के सरे परिवार को ख़त्म करके ले लिया। चित्तोड़ की रानी पद्मनी को अलाउद्दीन के हाथो अपहरण होने से बचने के लिए आत्महत्या करनी पड़ी।

 अकबर ने अपने और अपने शहजादों के लिए हिन्दू पत्निया संधि में प्राप्त की पर कभी भी अपने घर की किसी लड़की की शादी उसने किसी हिन्दू राजकुमार से नहीं की। ये बात अलग है की कुछ समय बाद इस मुगुल खानदान की शहजादियो की अस्मत, अफगान आक्र्मंकारियो और अंग्रेजो ने तार - तार कर दी। 

आज हम कहने को सभ्य समाज में जी रहे है पर पिछले साल पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में हुए एक हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी के जबरन अपहरण ने हमे हिला के रख  दिया। रिंकल चीख -  चीख के अपने माँ - बाप के सतह जाने की गुहार लगाती रही पर उसकी आवाज़ को जबरन दबा दिया गया। वो आज भी एक योनि दासी का दंस झेल रही है। और न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। पर क्या पुरुष प्रधान संसार में ये मुमकिन है। और फिर उस जगह जहाँ शिक्षा के लिए आवाज़  उठाने के लिए मलाला युसुफजई को सरफिरे गोली मार देते है।

लडकियों के जबरन अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, जबरन विवाह और भोग की वस्तु से बचाने के लिए एक विश्व्यापी सार्थक पहल की जरुरत है। ये पहल कोन  करेगा ? शायद हम लोग। पर जल्दी। कही बहुत देर न हो जाये।

सुधीर 'मौर्य सुधीर'
गंज जलालाबाद उन्नाव 
209869         

   

आदरणीय भारत सरकार
आदरणीय भारत सरकार ! हेडली पर शोक मनाना छोडिये । वह अमेरिका है जो पाक के घर में घुसकर ओसामा को मारता है । वह हिंदुस्तान नहीं है जिसके दिग्विजय सिंह महोदय के लिए ओसामा ओसामा जी था । उस अमेरिका से प्रत्यर्पण की लड़ाई हार गए हैं तो अब खिसिया रहे हैं । उसने प्रत्यर्पण भी नहीं किया और पैतीस साल की सजा भी  दे दी । आपसे जो होता हो आप कर लें । वो अमेरिका है जिसके यहाँ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरने के बाद उसने एक एक के कपडे उतरवा दिए । उसने तमाम लोगों के फिंगर प्रिंट्स ले लिए और किसी ने चूं  भी नहीं की । समरथ को नहीं दोष गोसाईं । आप रोना रोते रहिये । आप कर भी क्या लेते । आप से क्या होता भारत सरकार ! आपके गृहमंत्री की नजर में तो हेडली भी श्री हेडली होगा और दिग्विजय सिंह जी के लिए वह हेडली साहब होगा । आप को शायद दुःख हो रहा हो कि आप उस की खातिर दारी कसाब की तरह नहीं कर पाए या अफजल गुरु की तरह उसके माफ़ी नामा के लिए राष्ट्रपति के पास एप्लीकेशन नहीं लगवा पाए । आप गिडगिडाते रहिये । उसकी मुट्ठी में जहां है और वह उसको फांसी दे चुका है और आपके करोड़ों रुपये बच गए हैं । आपकी कानूनी प्रक्रिया का नज़ारा सारी  दुनिया देख रही है आपसे क्या उम्मीद की जाये ।

rahul ji ke sambhaavit tyaag



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हेडली पर हल्ला...अफजल पर खामोश क्यों..?


मुंबई आतंकी के हमले में मदद करने के आरोपी डेविड हेडली को अमेरिकी अदालत ने भले ही 35 साल कैद की सजा सुनी दी हो लेकिन भारत सरकार ने हेडली को दी गई सजा को नाकाफी बताते हुए कहा कि हेडली को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही भारत ने अमरिका से हेडली के प्रत्यपर्ण की भी मांग दोहराई है।
निश्चित तौर पर मुंबई हमला जिसमें 6 अमेरिकी समेत 166 लोगों की मौत हो गई थी में शामिल आतंकी हेडली को बख्शा नहीं जाना चाहिए और उसे मौत की सजा दी जानी चाहिए लेकिन क्या भारत सरकार के साथ ही कांग्रेस के नेताओं को ये कहने का हक है...? ये सवाल आपको भले ही अटपटा लगे लेकिन भारत की संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को घटना के 12 साल बाद भी फांसी की सजा न होना और अफजल की फांसी को लटकाए रखने के सवाल के बाद शायद आप इस बात से सहमत हों कि सरकार हेडली को मौत की सजा की मांग करने का हक क्यों नहीं है..?
सरकार हेडली के भारत प्रत्यर्पण के बाद भारतीय अदालत में केस चलाने की बात कर रही है लेकिन अफजल को फांसी क्यों नहीं दी गई इसका जवाब हमारी सरकार के पास नहीं है जबकि सुप्रीम कोर्ट 4 अगस्त 2005 को अफजल की फांसी की सजा पर मुहर लगा चुका है। 13 दिसंबर 2012 को हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि वे 22 दिसंबर 2012 को संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के बाद अफजल गुरु की फाइल पढ़ेंगे लेकिन शिंदे के पास हिंदुओं को तो आतंकवादी साबित करने का समय है लेकिन संसद पर हमले के आरोपी अफजल की फाइल पढ़ने का वक्त नहीं है..!
मुंबई हमले के आरोपी कसाब का केस ही ले लें...कसाब की फांसी की फाइल लंबे समय तक राष्ट्रपति और गृहमंत्रालय के बीच घूमती रहती है और आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद एक दिन गुपचुप कसाब को फांसी दे दी जाती है...हालांकि कहा तो ये तक जा रहा है कि कसाब की मौत डेंगू से हो गई थी..!   
ये सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि हमारी सरकार का रवैया सीमा पार से घुसपैठ पर भारत में घुसकर वारदात को अंजाम देने वाले आतंकियों के प्रति तो नरम दिखाई देता है लेकिन हमारे देश के गृहमंत्री हिंदू आतंकवाद के नाम को जन्म देकर दुनिया में ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि भारत एक आतंकवादी राष्ट्र है..!
हमारी सरकार खुद को हाथ पर हाथ धर कर बैठी है लेकिन अमेरिका में हेडली को सजा सुनाई जाती है तो आप उस पर बयान देने में देर नहीं करते। हम सरकार की इस मांग के साथ हैं कि हेडली का प्रत्यर्पण हो और उसे मौत की सजा मिले लेकिन मन में आशंका भी उत्पन्न होती है कि प्रत्यर्पण के बाद अगर हेडली को फांसी की सजा हो भी गई तो क्या गारंटी है कि हेडली को फांसी पर लटका दिया जाएगा..? क्या गारंटी है कि हेडली देश का दूसरा अफजल गुरु नहीं बनेगा..? जब तक सरकार संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी नहीं देगी तब तक सरकार की नीयत पर सवाल उठते रहेंगे।

deepaktiwari555@gmail.com

इश्वर सबको सदबुद्धि दे...

मै पलकें नीची किये बगल से गुजर जाऊंगा जब तुम किसी पार्क में --------------.रही होगी, क्योंकि मेरे बाप का क्या जाता है?, मै देख कर भी अनदेखा करूँगा क्योंकि, मुझसे क्या मतलब होगा?...तुम कुछ भी करो, मै अपने काम से काम रखूँगा, जब किसी दीवार के पीछे या झाडियों की ओट से या किसी तनहा कमरे से तुम्हारी आहट मिलेगी क्योंकि, तुम्हें अपना भला-बुरा अच्छी तरह पता है!!..पर याद रखना मै उस वक्त भी चुप रहूँगा जब तुम किसी के एक फोन पर उससे मिलने जाओगी इंडिया गेट, या किसी पब या बार के बाहर जब तुम्हारे कपडे तार-तार हो रहे होंगे या जब किसी चलती बस में तुम्हारा बालात्कार हो रहा होगा ....मुझे डर होगा कही तुम फिर मुझे अपना रास्ता देखने की नसीहत न पकड़ा दो ..... मुझे हमेशा दुख रहेगा उन माँ-बाप के लिए जो तुमपर भरोसा करते है...इश्वर सबको सदबुद्धि दे.


गण और तंत्र देश हित को सर्वोपरि माने तभी सार्थकता 
15 अगस्त 1947 को देश गुलामी की जंजीरों से आजाद हुआ था। 26 जनवरी 1950 को देश ने अपने संविधान को अंगीकार कर एक विशाल गणतांत्रिक देश के रूप में अपनी पहचान बनायी ।आज हम गणतंत्र दिवस की 63 वीं सालगिरह मना रहें हैं। इन सालों में एक सवाल हमारे सामने जरूर आया है कि आखिर हमारे देश में गण के लिये तंत्र है या तंत्र के लिये गण ? यह सवाल क्यों आज हमारे सामने आया इसके लिये कमोबेश गण और तंत्र दोनों ही अपनी जवाबदारी  से मुकर नहीं सकते हैं। संविधान बनाने वालों की धारणा थी कि गण देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को बखूबी निभाये और तंत्र निष्पक्ष और निर्भीक होकर गण की सेवा करें। संविधान में गण याने आम आदमी को मताधिकार देकर सबसे अहम जवाबदारी डाली थी कि वो अच्छी जन प्रतिनिधियों को चुनकर देश को दे। क्या हम आज यह कह सकते हैं कि गण अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से कर रहें है? क्या चुनावी राजनीति में सदगुणों और बुद्धिबल पर धनबल और बाहुबल हावी नहीं हो गया है?यदि इन आधारों पर जन प्रतिनिधियों का निर्वाचन होगा तो फिर प्रजातांत्रिक मूल्यों में गिरावट तो आयेगी ही जिसके परिणाम अंततः हमें भोगने पड़ेंगें।
गण जब तंत्र चलाने के लिये अच्छे एवं गुणवान जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं देंगें तो भला तंत्र को नियंत्रित करने का अधिकार रखने वाली सरकार अच्छी कैसे बन पायेगी? राजनैतिक दल भी सिद्धान्तों और नीतियों को दर किनार करके महज सत्ता पाने के लक्ष्य को लेकर गठबंधन करते दिखायी दे रहें है। समाज के हर क्षेत्र में राजनीति के हावी हो जाने के कारण प्रशासनिक तंत्र में भी राजनैतिक हस्तक्षेप इतना अधिक बढ़ गया है कि नैतिक अनैतिक के बीच की विभाजन रेखा ही कहीं गुम हो गयी हैं। महज वोट हासिल करने की खातिर सर्व धर्म समभाव की भावना कहीं गुम होते दिखायी दे रही हैं।
गणतंत्र दिवस की 63 वीं वर्षगांठ पर आज इन सवालों के जवाब तलाशना समय की मांग बन गयी हैं। ऐसा भी नहीं है कि आजादी के बाद देश में कुछ विकास हुआ ही नहीं हैं। हां इस बात पर विवाद जरूर हो सकता हैं कि जितना विकास होना था उतना शायद ना हुआ हो। आज यह वक्त का तकाजा हैं कि गण सिर्फ यह ना सोचे कि देश हमें क्या दे रहा है वरन वे ये भी सोचें कि वे देश को क्या दे रहें ? इसके साथ ही चुनाव की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में जो विकृतियां आ गयी हैं और धनबल और बाहुबल का जो बोलबाला हो गया हैं उसे रोकने के उपाय किये जायें। प्रशासनिक तंत्र को भी अपने मात्र हितों के लिये राजनैतिक हस्तक्षेप को नकार कर निष्पक्ष और निर्भीक बनना समय की मांग हैं। देश में ना सिर्फ गण के लिये तंत्र या तंत्र के लिये गण हो वरन गण और तंत्र आपसी तालमेल से देश हित को सर्वोपरि मान कर देश की पताका पूरी दुनिया में शान के साथ फहरायें, यही गणतंत्र दिवस पर हमारी हार्दिक शुभकामनायें हैं।