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19.8.25

गड़बड़ियां तो साबित हैं, पर जिम्मेदार कौन सिर्फ बीएलओ या शीर्ष कर्ता-धर्ता!

केपी सिंह-

देश की चुनाव प्रणाली कितनी गड़बड़ रही है इसे लेकर एक के बाद एक नये धमाके हो रहे हैं और हर धमाका पहले से अधिक विस्फोटक साबित हो रहा है। राहुल गांधी ने कर्नाटक के बंगलुरू में महादेवपुर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 1 लाख फर्जी वोटर पंजीकृत किये जाने का मीडिया के सामने प्रेजेंटेशन देकर पहला धमाका किया था। इसके बाद जबाबी कार्रवाई के बतौर भारतीय जनता पार्टी पहले तो अपने को चुनाव आयोग के वकील के रूप में पेश करने लगी और इसके बाद वह खुद भी मतदाता सूची बनाने में व्यापक धांधली होने की शिकायतों पर उतर आई। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने रायबरेली और वायनाड में हुए लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची में 1-1 लाख फर्जी वोटर गिना डाले। उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री और पूर्व पुलिस अधिकारी असीम अरुण ने कन्नौज के लोकसभा चुनाव में भी फर्जी वोटरों की कारामात सुना डाली। उधर तेलंगाना में जगन रेडडी ने अपने राज्य की विधानसभा चुनाव में फर्जी वोटरों के इस्तेमाल से चुनाव परिणाम बदले जाने का कथित रहस्योदघाटन कर डाला। अगर सभी मतदाता सूचियों को बनाने की प्रक्रिया को गड़बड़ बता रहे हैं तो इससे यह सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित होता है कि शुद्ध मतदाता सूचियां बनाने में चुनाव आयोग विफल रहा है। अब मीमांसा यह होनी चाहिए कि ऐसा लापरवाही या जल्दबाजी की वजह से है या इसमें कोई षणयंत्र और बदनियती है।

राजनीतिक दलों के अलावा तटस्थ संगठनों ने भी मतदाता सूचियों की पड़ताल में हाथ बटाया है। उनके निष्कर्षो पर भी गौर कर लिया जाये। द रिपोटर्स कलेक्टिव की 17 अगस्त 2025 की रिपोर्ट में बताया गया है कि कई दक्ष पत्रकारों ने बिहार विधानसभा के तीन विधानसभा क्षेत्रों पिपरा, बगहा और मोतिहारी में अपडेटेड मतदाता सूचियों का सर्वे किया जिसमें 80 हजार से अधिक मतदाताओं को गलत या गैर मौजूद पतों पर पंजीकृत पाया गया। कुछ जगह यह पाया गया कि एक ही घर में सैकड़ों की संख्या में अलग-अलग धर्म और अलग-अलग जाति के मतदाताओं को दर्ज कर लिया गया था। ऐसे एक-दो नही बल्कि 3590 मामले सामने आये। फिर याद दिला दें कि यह सिर्फ तीन निर्वाचन क्षेत्रों की कहानी है। जाहिर है कि पूरे बिहार की हालत क्या होगी।

रिपोटर्स कलेक्टिव की टीम ने संबंधित बीएलओज से इस बारे में बात करने का प्रयास किया। जिन कुछ लोगों ने मुंह खोला उनके अनुसार उनके पास इतना समय नही था कि वे संदेह होते हुए भी ऐसे घरों में सत्यापन के लिए पहुंच सकें। उनके बयान विपक्ष के इस आरोप की तस्दीक करने वाले हैं कि चुनाव आयोग किसी गलत मंशा से सघन पुनरीक्षण के संबंध में दुराग्रह पर आमादा था। अन्यथा उसे भी यह समझ थी कि बिहार में नये विधानसभा चुनाव का समय सिर पर है तो सघन पुनरीक्षण का कार्य सीमित समय में नही हो सकता। अगर इसके लिए हठधर्मिता न छोड़ी गई तो जल्दबाजी में बीएलओज से बड़ी गलतियां होना अवश्यम्भावी है। फिर भी उसने प्रतिपक्ष की आपत्ति पर विवेकपूर्ण ढंग से गौर करने की जरूरत क्यों नही समझी। क्या उसके फैसलें कहीं और से प्रेरित हो रहे थे।

बीएलओ भी इतने मासूम नही हैं। अगर उनके लिए अपने क्षेत्र में घर-घर पहुंचना संभव नही था तो उन चुनिंदा घरों में तो उन्हें जाना ही चाहिए था जिनमें अलग-अलग जाति और अलग-अलग धर्म के अलग-अलग सैकड़ों वोटर वे दर्ज कर रहे थे। उनकी बुद्धि बालक को भी समझ में आ जाने वाली इस गड़बड़ी को नोटिस में क्यों नही ले सकी। फिर यह है कि आखिर एक ही घर में इतनी बड़ी मात्रा में मतदाताओं के फार्म उसे सौंपने वाले लोग कौन थे। क्या वे ऐसे लोग थे जिनके द्वारा थोक में सौंपे गये फार्मों पर संदेह जताने की स्थिति में बूथ लेवल अधिकारियों को अपनी नौकरी पर आ जाने का खतरा दिख रहा था।

इस सबसे तो यह लगता है कि मतदाता सूचियों में जिन गड़बड़ियों को स्थापित किया जा रहा है वे केवल लापरवाही का नतीजा नही हैं। दिखाई तो यह दे रहा है कि आपराधिक मंशा से और सुनियोजित तरीके से मतदाता सूचियों में विकृति का समावेश किया गया है। पहले भी चुनाव में गड़बड़ियां होती रहीं हैं लेकिन उस समय आवाज उठाने वालों में किसी ने कभी आयोग पर उंगली नही उठाई। यह हाल के वर्षों में है जब आयोग के जिम्मेदारों पर आक्षेप लगाये गये और आयोग ने आरोपों को पुख्ता ढंग से नकारने की कोशिश करने की बजाय संदेह के रंगों को और अधिक गाढ़ा करने की मशक्कत दिखाई। उदाहरण के तौर पर अगर बीएलओ और एसडीएम बगैरह चुनाव आयोग की साख पर बटटा लगाते हुए विपक्ष ने पकड़ लिए थे तो आयोग का काम था कि वह पार्टी बनने की बजाय स्वयं हस्तक्षेप करके दोषी अमले को दंडित करने का फरमान सुना डालता। पर आयोग तो ढिठाई पर उतर आया। उसने जांच का कोई कदम उठाने की बजाय संदिग्ध मतदाता सूचियों को सही ठहराने का बोझ अपने ऊपर ले लिया। इण्डिया टुडे की टीम महादेवपुरम में उस कमरे में पहुंच गई जहां दर्जनों मतदाता पंजीकृत थे। लेकिन चुनाव आयोग ने जहमत नही उठाई कि अपने स्तर से किसी अधिकारी को मौके पर भेजता। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से महादेवपुरम विधानसभा क्षेत्र के बारे में शपथ पत्र पर आरोप मांगे लेकिन अनुराग ठाकुर ने रायबरेली और वायनाड में फर्जी मतदाताओं की मौजूदगी का जो खुलासा किया था इस मानक से उनसे भी तो शपथ पत्र पर लिखकर देने की मांग की जानी चाहिए थी। उनसे, असीम अरुण और जगन रेडडी से शपथ पत्र मांगने के नाम पर उसकी जुबान पर ताला क्यों लग गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने सपा द्वारा 17 हजार शपथ पत्रों को उसे सौंपे जाने के बावजूद कार्रवाई न की जाने के आरोप पर कहा कि उन्हें कोई शपथ पत्र नही मिला तो अखिलेश यादव ने पावती की रसीदें सोशल मीडिया पर डाल दीं। अब मुख्य चुनाव आयुक्त इस पर क्यों नही बोल रहें। अगर अखिलेश द्वारा प्रदर्शित की जा रहीं रसीदें फर्जी हैं तो ज्ञानेश कुमार को यह कहना चाहिए। वे अकबकाये से क्यों हैं। इसीलिए चुनाव आयोग संदेह के लपेटे में आ रहा है। कई और विवादित काम ऐसे हुए हैं जिनमें बीएलओ की नही सीधे चुनाव आयोग की भूमिका है। जैसे उसने हरियाणा के एक चुनाव में फंसने पर जब हाईकोर्ट का यह आदेश आया कि मतदान के दिन की वीडियो फुटेज याची को सौंपी जाये तो प्रधानमंत्री के साथ बैठकर उसने यह नियम लागू कर दिया कि कोई भी मतदान के वीडियो फुटेज नही मांग सकता। एकदम साफ है कि किसी चीज को छुपाने के लिए गले के नीचे न उतरने वाला यह नियम लागू कराया गया। इसी तरह उसने मतदाताओं की ऑनलाइन डिजिटल सूची को राहुल गांधी के खुलासे के बाद हटा दिया और स्केन सूची डाल दी जो सर्च नही हो सकती। जब सवाल पूंछा गया तो मुख्य चुनाव आयुक्त ने 2019 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की आड़ ले ली। फिर इस पर भी कायम नही रहा। अब बिहार के हटाये गये 65 लाख मतदाताओं का डिजिटल डाटा लोड कर दिया है। आखिर चुनाव आयोग इतना हड़बड़ाया क्यों है। इसीलिए चुनाव आयोग को पहली बार गड़बड़ियों में संलिप्त करार दिया जा रहा है।

अभी तक की पड़ताल से जो सामने आया है उससे कुछ बातें स्पष्ट हैं। एक तो यह है कि गड़बड़ियां स्थानीय और इक्का-दुक्का नही हैं इसके पीछे व्यापक और संगठित अभियान है। इसमें किसी दल के आधिकारिक कार्यकर्ता शामिल नही हैं। ऐसा लगता है कि कतिपय कारपोरेट कंपनियों ने राजनैतिक कामों के लिए अघोषित तौर पर बनाये गये दस्तों को इस टास्क में इन्वाल्व किया है। लेकिन यह बात हम प्रमाणिक तौर पर नही कह सकते। अगर कोई जांच हो तभी इसकी वास्तविकता स्पष्ट हो सकती है। इस देश में पहले भी बड़ी-बड़ी धांधलियां होती रहीं हैं। लोगों ने एनटी रामाराव को अपनी नाजायज बर्खास्तगी के खिलाफ दिल्ली में उनके बहुमत को साक्षात करने वाले विधायकों की संख्या के साथ भटकते देखा और उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता इसके बावजूद अपनी सरकार को सही करार देने में लगे हुए थे। हरियाणा में जब ऐसी ही धृष्टता के कारण देवीलाल ने गवर्नर जीडी तपासे को राजभवन में ही तमाचा जड़ दिया था तब भी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता अपनी सरकार के कुकृत्य को जायज करार देने में संकोच नही कर रहे थे। आखिर कार्यकर्ताओं को क्यों नही लगता कि पार्टी के प्रति वफादारी एक अच्छा गुण है लेकिन अगर पार्टी के नेता ऐसे फैसले ले रहे हों जो राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और हमारी व्यवस्था की मजबूती के लिए घातक बनने वाले हैं तो हम देश पहले पार्टी बाद में कहने के लिए आगे आ जायें। जिस दिन राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं का जमीर इतना मजबूत हो जायेगा उस दिन किसी पार्टी का नेता निरंकुश होने का साहस नही दिखा पायेगा। 

3 comments:

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