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29.1.08

जनसत्ता में भी हैं कमीने लोग



अखबारों में छपने के लिए तेल लगाने पड़ते हैं, मुझे पता है। लेकिन जनसत्ता के बारे में मेरी राय कुछ अलग रही थी। मेरे सारे मास्टर साहब लोग उसी में छपते हैं और सारे के सारे लगभग प्रगतिशील हैं, सो मैंने सोचा कि वो तो तेल लगाते नहीं होगें। यही सब सोचकर मैंने भी एक लेख भेजने की गलती कर दी। लेकिन लेक भेजते समय मैं ये भूल गया कि मैं एक पाठक की हैसियत से लिख रहा हूं जबकि मास्टरजी स्थापित लोग हैं। और अपने इस हैसियत के हिसाब से जनसत्ता की ओर से जो जबाब मिला, जरा उस पर गौर -
नामवर सिंह से मुझे भी दिक्कत है कि अकेले उस आदमी ने नरक मचा रखा है तो क्या उसकी हत्या कर दें। क्यों छपना चाहते हैं और क्यों लिखना चाहते हैं उसके विरोध में। आपके अकेले लिखने से क्या बिगड़ जाएगा नामवर सिंह का। अगर वाकई आप चाहते हैं कि नामवर सिंह न बोलें तो आप सा-आठ लोगों को जुटाइए और उसके खिलाफ मोर्चा खोल दीजिए कि अब आगे से इसे बुलाना ही नहीं है और तब हम भी आपका साथ देंगे।( सूर्यनाथ त्रिपाठी, जनसत्ता की सलाह)
ये सलाह तो उस आदमी ने तब दी जब उसकी बात सुनने के बाद मेरे मन में अजीब ढ़ंग की बेचैनी हो गयी थी और मैंने दुबारा फोन करके कहा कि- आप छापें अथवा न छापें लेकिन मेरी बात सुनिए और मुझे बहुत अफसोस है कि जनसत्ता अखबार के लिए काम करने वाले शख्स से यह सब सुन रहा हूं। इसके पहले कि कहानी कुछ और ही
२४ जनवरी को मैंने नामवर सिंह से असहमति का आलेख जिसे कि मैंने अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट किया था, नामवर सिंह से घोर असहमति को प्रिंट के लिहाज से थोड़ा और दुरुस्त करके जनसत्ता के लि फैक्स कर दिया। फैक्स करने के बाद फोन किया श्रीश चंद्र मिश्र को, उन्होंने कहा कि लाइन पर रहे मैं देख कर बता रहा हूं। करीब साढ़े चार मिनट तक लाइन पर रहा। देखकर बताया कि आ तो गया है लेकिन तीसरा पेज साफ नहीं है आप एक बार फिर फैक्स कर दें। मैंने फिर फैक्स किया। फिर फोन करके बताया कि फैक्स कर दिया तो उन्होंने कहा ठीक है।एक दिन बाद मैंने फोन करके पूछा कि सर इसका स्टेटस पता करने के लिए क्या करना होगा। उन्होंने नंबर दिया जिस पर फोन करने पर दुबारा जबाब मिला कि प्रिंट साफ नहीं है आप ऐसा करें कि कूरियर कर दें। मैंने उसे फिर कूरियर किया। ऑफिस में बताया कि आपको जिन्होंने कूरियर करने कहा था वो शायद अरविंद रहे होंगे। कल मैंने फिर फोन किया कि सर मैंने एक लेख भेजी थी।
अबकि दूसरे व्यक्ति थे सूर्यनाथ त्रिपाठी, उन्होने कहा अभी तक तो मिला नहीं, चलिए देखता हूं। चार घंटे बाद फिर फोन किया तो बताया कि अभी-अभी आया है। लेकिन ये छपने लायक नहीं है. मैंने पूछा क्यों. तो उनका जबाब कुछ इस तरह से था-आपने नामवर सिंह पर पर्सनल अटैक किया है। ऐसा हम नहीं छापते। आपने देखा है जनसत्ता में कभी इस तरह का छापते हुए। आपने इसे दुनिया मेरे आगे नाम से दिया है, इसमे तो कभी ऐसा लेख गया ही नहीं। मैंने कहा सर कोई बात नहीं, हमने तो लेख दिया आप देख लीजिए। उन्होंने साफ कहा कि छपेगा तो नहीं लेकिन रख लेता हूं। ये तो सीधे-सीधे किसी के उपर पर्सनली अटैक करना हुआ। मैंने उनसे बात करने की कोशिश की- सर मैं पाठक हूं, नामवर सिंह का श्रोता, मुझे उनके रवैये से असहमति हुई सो लिख दिया और मैं कोई पहली बार तो लिक नहीं रहा इस तरह से.
करीब सात साल से जनसत्ता पढ़ता आ रहा हूं और शान समझता रहा कि जनसत्ता पढ़ता हूं। ये तो भ्रम तब टूटी जब चैनलों और मीडिया हाउस के इंटरव्यू में पूछे जाने पर कि कौन सा अखबार पढ़ते हो और जनसत्ता बताता तो लोग मुस्कराते और उपहास उड़ाते। फिर भी हिन्दी से हूं और जनसत्ता मे हिन्दी कलह के लिए ठीक-ठाक स्पेस है, सो बिना राजनीति में शामिल हुए, किसी पर कीचड़ उछाले बिना सबकी खबर मिल जाती है, इसलिए खरीदता रहा। मैंने उन्हें इस बात का भी हवाला दिया कि सर ये बड़े-बड़े लोग लेख के नाम पर यही सब कलह तो लिखते हैं, राजनीत और साहित्य के नाम पर कोरा बकवाद। उइनका कहना था कि वो तो सिर्फ संडे को न. कुल मिलाकर बात यही रही उनका कहना था कि नामवर से इस तरह से लिखना पर्सनल अटैक है .
पूरी तरह हिल गया, नहीं छपने के कारण नहीं बल्कि त्रिपाठीजी के इस घटिया लॉजिक से। सो दुबारा फोन किया जिसमें उन्होंने सलाह दिया कि आप नामवर के विरोध में मोर्चा खोल दें और मैं भी शामिल होता हूं। मैं कहता रहा कि मैं पैसिव ऑडिएंस नहीं हूं, जो नहीं पचेगा, उस पर लिखूंगा हीं। लेकिन त्रिपाठीजी की बात समझें तो आप लिखिए मत नामवर सिंह के नाम पर राजनीति कीजिए मोर्चा खोलकर।.....अंत में आवाज कट गई औ जब दुबारा फोन मिलाया तो रवीन्द्र नाम के व्यक्ति ने फोन उठाया और कहा कि त्रिपाठीजी तो कैंटीन चले गए। मतलब किसी पाठक से दो मिनट बहस करने के लायक नहीं।मैं रात से सुबह के चार बजे तक इस मुद्दे पर सोचता रहा कि मठाधीशी की तो हद हैऔर काफी कुछ सोचता रहा।

करीब ५:३० बजे अखबार दे गया और सच बताउँ जनसत्ता देखकर मन किया कि राजू से कहूं कि कल से मत लाना जनसत्ता जैसी शिक्षा त्रिपाठीजी ने हमें देने की कोशिश की फिर रुक गया हल ये नहीं ।अब मेरा बड़ा मन कर रहा है कि एक दिन जनसत्ता के ऑफिस में जाउं और पूछू- क्या सर आप सारे लेखको को यही राय देते हैं कि लिखो मत, सीधे मैंदान में उतर आओ जैसा कि हमें त्रिपाठीजी ने दिया

28.1.08

मैं ऋचा आइबीएन 7 से, मुझसे प्यार करोगे

टीवी एंकर को पत्रकार से जमूरे बनने में समय नहीं लगता और न ही देश के टैलेंट को बंदर-बंदरिया बनाकर नचाने में। लगभग सारे न्यूज चैनलों ने लत पाल लिया है कि मौका चाहे जो भी हो, रियलिटी शो में शामिल बच्चों को अपने स्टूडियो में ले आओ और फिर शुरु कर दो वही सब करना जो मीका और राखी को बुला कर करते हैं।
आप इन बच्चों की बातों को जरा गौर से सुनिए आपको कहीं से नहीं लगेगा कि अब ये बच्चे रह गए हैं, उम्र के पहले ही इतने मैच्योर हो गए हैं कि जब असल में मैच्योर होने की उम्र आएगी तो जानने-समझने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। सारेगम के हॉस्ट आदित्य ने आठ साल की लड़की के अच्छा गाने पर अपनी गर्लफ्रैंड मान लिया है और एंकर इसे मजे से पूछती है कि तुम्हें क्या लगता है। बच्ची का जबाब है, इस बारे में आप आदि से ही बात करें। इधर उसी उम्र के एक बच्चे को रिचा भा गई है जो कि उम्र में 15-16 साल बढ़ी होगी। संयोग से आइबीएन 7 की इस एंकर का भी नाम रिचा है तो वो अपने बारे में भी पूछ लेती है कि मेरे बारे में क्या ख्याल है, मैं ऋचा कि वो ऋचा। बच्चे का जबाब है दोनो। लीजिए अब समझिए और समझाइए परस्त्री और एक के रहते दूसरी नहीं वाला फंड़ा।
मैं ये नहीं कह रहा कि इन चैनलों ने ही इन्हें इस तरह की बातें और जबाब देने को कहा होगा लेकिन इस ओर मानसिकता बनाने में चैनलों का कम हाथ नहीं है। अब बताइए आपको क्या जरुरत पड़ गयी है कि आप आठ साल के बच्चे से ये पूछें कि कौन गर्लफ्रैंड मैं या वो वाली ऋचा। कभी आपके दिमाग ये बात आती है कि इसका इस कोमल मन पर क्या असर होगा। आपको तो बस बकते रहना है और आधे घंटे के लिए बुलाए हो तो उसे दुह लेना है। कभी नहीं पूछते कि तुम इतना आगे आ गए अपने उम्र के लोगों के बारे में क्या सोचते हो और उनके लिए क्या कुछ करना चाहते हो।
मैं जब भी स्कूल के बच्चों से खासकर दिल्ली के बच्चों से मिलता हूं तो आठ साल, दस साल के बच्चों की उलझनों को सुनकर परेशान हो जाता हूं। थोड़ी देर तो अपनी पढ़ाई-लिखाई की बात करता है लेकिन जब मैं उससे खुलने लगता हूं तो बताता है कि कैसे उसकी कोई गर्लफ्रैंड नहीं होने पर और बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं। मतलब बच्चे की कोई गर्लफ्रैंड नहीं है तो उसकी कोई पर्सनालिटी ही नहीं है। दस साल का एक बच्चा, मेयो कॉलेज, अजमेर में पढ़ता है। रोते हुए बताने लगा कि सब खत्म हो गया भइया, मेरा तो ब्रेकअप हो गया। बताइए दस साल, बारह साल में बच्चे ब्रेकअप को झेल रहे हैं और उनमें जिंदगी के प्रति एक अजीब ढ़ंग का असंतोष है। एक ने कहा क्या होगा अब पढ़कर और नंबर लाकर, जिसके लिए पढ़ता रहा साली वो ही दगा दे गई।इसी उम्र में डिप्रेशन, जिंदगी के प्रति अरुचि। कितनी खतरनाक स्थिति हैं।
टीवी चैनल टैलेंट हंट के दौरान स्टेज पर अफेयर को खूब खाद-पानी देते हैं और अपने हीमेश जी एक बंदे को प्यार के लिए प्रमोट करते हैं, उसके प्यार की खातिर वोट मांगते हैं। क्यों भाई, क्या साबित करना चाहते हो आप। कभी ब्च्चों के उपर इसका सोशियोलॉजिकल स्टडी किया कि आपके इस छद्म कल्चर को बढ़ावा देने से बच्चों पर क्या असर पड़ता है। इसी बीच जब कोई बच्चा सोसाइड कर ले तो फिर न्यूज चैनलवाले विशेषज्ञों की पूरी पैनल बिठा देगें। कभी अपने उपर भी रिसर्च कर लो।अच्छी बात है कि आप देश भर में भटक-भटककर बच्चों को खोजते हो, उसे ट्रेंड करते हो लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि टीवी की दुनिया में घुसते ही वो बच्चा रह ही न जाए, उसका बचपन ही चला जाए। और इधर जो बच्चे टीवी से बाहर हैं वो अपने को किसी लायक समझे ही नहीं। उसके दिमाग में बस एक ही बात चलती रहे कि चुन लिए जाते तो खूब सारी गर्लफ्रैंड मिलती और फिर ऐश......। पढ़ने से क्या मिल जाएगा, इस कॉन्सेप्ट को इतनी बरहमी से मत बढ़ाओ, आपको कोई अधिकार नहीं है कि आप देश के इन नौनिहालों का भविष्य इतना डार्क बना दें।

24.1.08

जरा बच के, मां-बहन भी पढ़तीं हैं ब्लॉग

भाई हमने तो अपना मामला नोट्स से हटाकर यूआरएल लिंक तक पहुंचा दिया। पहले जो जूनियर्स नोट्स या किताब मांगते थे अब वे मेरे ब्लॉग का लिंक पूछते हैं, धीर-धीरे ब्लॉग की दुकान जम रही है।परसों ही एक जूनियर मेरे ब्लॉग का लिंक लिखकर ले गई और आज मिलने पर बताया कि अच्छा लिखते हैं सर आप। मैंने तो मम्मी को भी दिखाया।
मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि अच्छा है दिल्ली की आंटी लोग जो कि मां के बहुत दूर होने की वजह से मां ही लगती है, इम्प्रेस होगी और कभी खाने पर बुला लिया तो एक पोस्ट की मेहनत तो सध जाएगी, सो पूरे ध्यान से उसकी बात सुन रहा था। लेकिन आगे उसने जो कुछ कहा उससे मेरे सपने तो टूटे ही, आगे के दिनों के लिए चिंता भी होने लगी। जूनियर का कहना था कि सर मैं अपनी मम्मा को आपका ब्लॉग पढ़ा रही थी कि अचानक एक लाइन आ गयी। आपने लिखा था कि- हिन्दी की ही क्यों लेने लगते हो। मम्मा ने कहा ऐसा लिखना ठीक नहीं है, ऐसे नहीं लिखना चाहिए और फिर उठकर वहां से चली गई। मैं समझ गया कि आंटी ने इस शब्द को अश्लील समझा।
इधर वीचैनल को लगातार देख रहा हूं। उस पर एक कैंपस शो के लिए एड आती है जिसमें लाइन है- किसकी फटेगी। आंटी इसका अर्थ भी उसी हिसाब से लगा सकती है और चैनल को अश्लील कह सकती है। मुझे याद है मैं अपने कॉलेज के दिनों में खूब एक्टिव रहा करता था- क्या डिवेट, क्या प्ले। करता भी और कराता भी और हांफते हुए अपनी मैम के पास पहुंचता और मैम पूछती कि क्या हुआ तो अचानक मेरे मुंह से निकल जाता मैंम सब तेल हो गया या फिर मेरे दोस्त राहुल ने स्पांसर्स का केला कर दिया और मैम मेरे कहने का मतलब समझ जाती।एफएम में आए दिन आपको ऐसे शब्द सुनने को मिल जाएंगे। तीन-चार दिनपहले ही तो रेडएफएम पर बज रहा था जब इंडिया ने पर्थ में परचम फैलाया था- मैं भज्जी, आपका हरभजन सिंह रेड एफएम 93.5 बजाते रहो, किसकी पता नहीं। अब तक तो यही समझ रहे थे किरेड एफएम बजाते रहना है, अभी समझ रहे हैं कि आस्ट्रेलिया जैसी टीम को बजाते रहना है और फिर धीरे-धीरे एक मुहावरा बन जाता है कि यार उसकी तो बजा कर रख दूंगा। मेरा दोस्त कहा करता है उसकी टू मैंने रेड लगा दी, हम मतलब समझ जाते हैं लेकिन कभी भी अश्लील अर्थ की तरफ नहीं जाते।
पॉपुलर मीडिया में शब्दों की तह तक जाने की बात नही होती, लोग संदर्भ के हिसाब से उसका मतलब समझ लेते हैं, खुलापन सिर्फ जीने के स्तर पर नहीं आया है। व्हीस्पर का एड देखिए हर लड़की एक दूसरे के कन में दाम घटने की बात करती है बावजूद इसके हम सुन लेते हैं और फिर सुनेगें नहीं तो बिकेगा ।
आंटी को मेरी पोस्ट को देखने पर उठकर जाना पड़ा और मैं सोचने लगा कि वाकई कैंपस में बोली जानेवाली इस भाषा पर विचार करने की जरुरत है। ये भाषा के स्तर पर संस्कारी होने का मामला है, अच्छा बच्चा होने का आग्रह है या फिर बदलती बिंदास हिन्दी को नहीं बर्दास्त कर पाने का हादसा। फिलहाल लड़की ने मेरा हौसला बढ़ाया कि सर आप लिखिए- मैंने तो मम्मा को बताया कि हिन्दी में लोग अब ऐसे ही लिखते हैं।
अपने ब्लॉगर साथियों से तो इतना ही कहूंगा कि भाई लोग आपलोग जो इतना धुंआधार गालियां लिखते हो, जरा चेत जाओ। पहले चेक कर लो कि ये मां-बहन के पढ़ने लायक है भी या नहीं।