पेश-ए-खिदमत हैं चार लाइनें.....
यशवंत जी को मिल गया गूगल जी से चैक,
इसके पीछे है सभी हम मित्रों का बैक।
चैक प्राप्ति की यात्रा को लगे न कोई चेक,
समय तेरा अनुकूल है दांव बड़े तू फेंक।।
-Maqbool
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14.6.08
चार लाइनें
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Maqbool
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Labels: कविता, गूगल, चार लाइनें, मकबूल, यशवंत
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