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6.9.10

कूड़ा नहीं होते क्रांतिकारियों के विचार

     क्रांति को गाली देने वालों की विशव में कमी नहीं है। भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो क्रांति और क्रांतिकारी विचारों को आए दिन गरियाते रहते हैं। क्रांति की असफलता और मार्क्सवाद की असफलता के साथ-साथ कम्युनिस्ट नजरिए की खिल्ली उड़ाते रहते हैं। ऐसे लोगों से यही कहना है कि विचारों की जंग और व्यवस्था परिवर्तन की जंग में फिलहाल पिछड़ गए हैं। लेकिन दुनिया की जटिलतम समस्याओं के बारे में आद भी किसी भी पूंजीवादी विचारक और राजनेता से ज्यादा सटीक समझ किसी क्रांतिकारी के पास ही मिलेगी,किसी मार्क्सवादी के पास ही मिलेगी।
मसलन् हम अपने मौजूदा दौर को ही लें और देखें कि कौन ऐसा नेता है जो ज्यादा सफाई के साथ इस दुनिया को देख रहा है ? इसका एक ही जबाब होगा फिदेल कास्त्रो। फिदेल ने सारी दुनिया को दिखाया है कि संकट के समय में कैसे समाजवाद की रक्षा की जा सकती है और समाजवाद के मार्ग को त्यागे बिना किस तरह आगे बढ़ा जा सकता है। मार्क्सवाद विरोधियों की मुश्किल यह है कि वे मार्क्सवाद के सटीक प्रयोगों और सटीक विचारों की चर्चा नहीं कर कर रहे हैं बल्कि मार्क्सवादियों के भ्रमित विचारों को सामने रखकर चर्चा करते हैं।
  आज सारी दुनिया में नस्लवादी भेदभाव सबसे बड़ी समस्या है। भारत में यह छूत-अछूत, छोटे -बड़े,सवर्ण-असवर्ण, ब्राह्मण-शूद्र, हिन्दू-मुसलमान के भेद के रूप में प्रचलन में है। इस भेदभाव को ईश्वरकृत और स्वाभाविक मानने वालों की समाज में अच्छी-खासी संख्या है। फिदेल कास्त्रो ने इस प्रसंग में लिखा है ‘‘ नस्लवाद, नस्ली भेदभाव और विदेशी द्वेष मानव की सहज स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं नहीं हैं। ये तो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रवृत्तियां हैं जो मानव समाज के पूरे इतिहास में युद्धों, सैनिक विजयों, गुलामी तथा सर्वाधिक शक्तिशाली द्वारा सर्वाधिक कमजोर के वैयक्तिक या सामूहिक शोषण से सीधे-सीधे पैदा होती हैं। ’’  भेदभाव की समस्या को बगैर किसी पूर्वशर्त के सम्बोधित किया जाना चाहिए। यह ऐसी समस्या है जिससे आर पलायन नहीं कर सकते। कुछ लोग हैं जो इस समस्या से ऑखें बंद किए हुए हैं और अपने स्वायत्त लोक में जीना चाहते हैं। नस्लीभेदभाव के आधार पर फिलीस्तीनियों के साथ यहूदीवादी इस्राइल के द्वारा बर्बर व्यवहार किया जा रहा है। इन दिनों फिलीस्तीन और इस्राइल दोनों बातचीत के लिए राजी हो गए हैं। नस्लवादी भेदभाव और फिलीस्तीन के संदर्भ में फिदेल कास्त्रो ने मांग की है कि नस्लवाद के शिकार लोगों को हरजाना दिया जाना चाहिए।
फिदेल का मानना है कि हरजाना देना ‘‘नस्लवाद के शिकार लोगों के प्रति अनिवार्य नैतिक जिम्मेदारी है। इसके पहले हिब्रू जाति के वंशजों को इस तरह का हरजाना दिया जा चुका है जिन्हें यूरोप की हृदयस्थली में नृशंस और घृणित नस्लवादी नरसंहार का सामना करना पड़ा था। हम शताब्दियों से इस तरह की कार्रवाई के शिकार लोगों के वंशजों और देशों को खोज निकालने जैसा असंभव कार्य करने के लिए नहीं कह रहे। लेकिन अकाटय तथ्य यह है कि करोड़ों अफ्रीकियों को बंदी बनाया गया, वस्तु की तरह बेचा गया और गुलाम की तरह काम करने के लिए अटलांटिक के उस पार भेज दिया गया। धरती के उस हिस्से में 7 करोड़ मूल निवासी भी यूरोपीय विजय और उपनिवेशीकरण के कारण मारे गए।’’
नस्लवादी शोषण के इतिहास पर रोशनी ड़ालते हुए फिदेल कास्त्रो ने आगे कहा ’’एशिया समेत तीन महाद्वीपों के लोगों के अमानवीय शोषण ने तीसरी दुनिया में रह रहे साढ़े चार अरब लोगों की तकदीर और जिंदगी हमेशा के लिए तय कर दी है। इन लोगों में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता, स्वास्थ्य दर, शिशु मृत्यु, जीवन अवधि तथा अन्य बहुत सी चीजों की भयावह तथा रोंगटे खड़े कर देने वाली स्थिति है। वे शताब्दियों तक चले उस अत्याचार के मौजूदा पीड़ित लोग हैं। वे अपने पूर्वजों और देशवासियों के खिलाफ भयंकर अपराध के लिए मुआवजे के हकदार हैं।’’
‘‘वास्तव में बहुत से देशों के आजाद हो जाने तथा गुलामी का औपचारिक उन्मूलन हो जाने के बाद भी यह नृशंस शोषण बंद नहीं हुआ। आजादी के ठीक बाद अमरीकी संघ के विचारकों ने 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश प्रभुत्व से मुक्त 13 उपनिवेशों के बारे में निश्चित रूप से विस्तारवादी विचार और रणनीतियां रखीं।’’
‘‘इस तरह के विचारों के आधार पर ही यूरोपीय मूल के श्वेत बाशिंदों ने पश्चिम की ओर कूच करते हुए उस जमीन पर कब्जा कर लिया जिस पर मूल अमरीकी हजारों सालों से रह रहे थे। इस कवायद में लाखों मूल निवासी मारे गए। लेकिन वे पूर्व में स्पेनी कब्जे वाली सीमा पर भी नहीं रुके। इसके परिणामस्वरूप 1821 में आजाद हुए लैटिन अमरीकी देश मैक्सिको के लाखों वर्ग किलोमीटर इलाके तथा बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों को छीन लिया गया।’’
‘‘इस बीच उत्तरी अमरीका में पैदा हुए शक्तिशाली और विस्तारवादी राष्ट्र में 1776 की विख्यात स्वतंत्रता की घोषणा के लगभग सौ साल बाद तक अमानवीय दास प्रथा चलती रही, जबकि इस घोषणा में ही कहा गया था कि जन्म से सभी मनुष्य मुक्त और बराबर हैं।’’
     ‘‘दास प्रथा से महज औपचारिक आजादी के बाद सौ से अधिक वर्षों तक अफ्रीकी-अमरीकियों के साथ क्रूरतम किस्म का नस्ली भेदभाव चलता रहा। इसके बाद चार से अधिक दशकों तक चले जबर्दस्त संघर्ष तथा 1960 के दशक की उपलब्धियां जिनके लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मैलकम एक्स तथा अन्य विशिष्ट योद्धाओं ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, उनके बाद भी इस दासता की कुछ विशेषताएं तथा प्रथाएं आज भी बरकरार हैं। विशुद्ध रूप से नस्लवादी तर्क के आधार पर अफ्रीकी-अमरीकियों के खिलाफ लंबे तथा अत्यधिक कठोर निर्णय सुनाए जाते हैं। इन्हें धनी अमरीकी समाज में निपट गरीबी और न्यूनतम जीवन स्तर के साथ रहना पड़ता है।’’
‘‘इसी प्रकार संयुक्त राज्य अमरीका के वर्तमान क्षेत्र के बड़े हिस्से में बसे मूल अमरीकी निवासियों के बचे-खुचे वंशजों को भेदभाव और उपेक्षा की बदतर स्थितियों में जीना पड़ रहा है।’’
‘‘अफ्रीका की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में आंकड़े देने की आवश्यकता नहीं है। पूरे के पूरे देश यहां तक कि पूरा सब-सहारा क्षेत्र समाप्ति के कगार पर है। यह सब आर्थिक पिछड़ेपन, असह्य गरीबी तथा महाविपत्ति बन चुकी नई-पुरानी बीमारियों के अत्यंत जटिल संयोग का परिणाम है। बहुत से एशियाई देशों में भी स्थिति कम भयावह नहीं है। इन देशों पर कभी न चुकाए जा सकने वाले भारी ऋण हैं, व्यापार की विषम शर्तें हैं, बुनियादी वस्तुओं की तबाह कर देने वाली कीमतें हैं, नव उदार भूमंडलीकरण है तथाजलवायु बदलाव है जिसके कारण कभी लंबे अकाल पड़ते हैं तो कभी भारी वर्षा और बाढ़। यह बात गणितीय ढंग से सिद्ध की जा सकती है कि ऐसी स्थिति को संभाला नहीं जा सकता।’’
















5.9.10

रेल के एक ही डिब्बे में बैठे हैं माओवादी और मनमोहनसिंह

                          कार्ल मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है कि  ‘ इस दुनिया में पूंजी का प्रत्येक अंश सिर से पैर तक खून और धूल से सना है।’ खून और धूल के रूपक के बहाने मार्क्स ने सामाजिक संबंधों की ओर ध्यान खींचा है। पूंजीवाद अपने शोषण को बनाए रखने के लिए सामाजिक संबंधों और सामाजिक समूहों को विस्थापित करता है। उल्लेखनीय विभिन्न देशों में पूंजीपतिवर्ग ने विभिन्न धातुओं और कच्चे मालों का खानों से उत्खनन करके लाखों-करोड़ों लोगों को विस्थापित किया है।
     पूंजीपतिवर्ग ने भारत से लेकर अफ्रीका तक अपनी लूट का अभियान जारी रखा। आधुनिककाल के आने के साथ साम्राज्यवाद का उदय हुआ। यूरोप के राष्ट्रों ने सारी दुनियाभर के सुदूरवर्ती देशों में अपने शासन और संपदा के शोषणतंत्र को स्थापित किया। भारत में इस क्रम में ही ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हुआ। औपनिवेशिक सभ्यता और यूरोपीय बस्तियों का विस्तार हुआ।
      उपनिवेश बनाने और कच्चे मालों का दोहन करने के लिए बड़ी संख्या में किसानों को विस्थापित किया गया। यह कहानी अमेरिका,एशिया,अफ्रीका,लैटिन अमेरिका,वेस्टइंडीज आदि में एक ही तरीके से दोहराई गयी। आज भी पूंजीपतिवर्ग की नजर पृथ्वी के कच्चे मालों को पूंजी में तब्दील करने पर लगी हुई है। ज्यादा से ज्यादा संपदा संचय करने की अपनी प्रवृत्ति के कारण पूंजीपतिवर्ग ने समाज के अन्य वर्गों को हाशिए पर पहुँचा दिया है। संचय करने की यह मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है। यही वह बुनियादी परिप्रेक्ष्य है जहां से हमें पूंजीवादी हिंसा और माओवादी हिसा को देखना चाहिए।
    मीडिया और आम विमर्श में माओवादी हिंसा की जब भी चर्चा होती है तो उसके पीछे निहित पूंजीवादी संचय,दोहन,शोषण और विस्थापन को हटाकर चर्चा की जाती है। मसलन् प्रतिवादी आदिवासियों ने पुलिसवालों को जान से मारा। रेल में आग लगाई वगैरह-वगैरह। जाहिरा तौर पर किसी भी व्यक्ति से जब यह सवाल किया जाएगा कि प्रतिवादियों का आग लगाना सही था या गलत,तो प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा गलत।  
       मीडिया बड़ी चालाकी से आदिवासियों के विस्थापन और खानों के उत्खनन के कारण पैदा हो रही समस्याओं को छिपा लेता है। आदिवासियों के प्रतिवाद का खान उत्खनन और तदजनित विस्थापन के साथ संबंध है ,इस तथ्य को छिपा लेता है। यहीं पर मीडिया पूंजीपतिवर्ग की वैचारिक-सामाजिक सेवा करता है। हिंसा के लिए पूंजीपति और राज्य नहीं आदिवासी जिम्मेदार हैं ,इसका प्रचार करता है।
       समस्या यह है कि खानों का उत्खनन किया जाए या नहीं ? एक ही उत्तर होगा किया जाए। खानों का उत्खनन जब होगा तो विस्थापन से कैसे निपटा जाए। सामाजिक तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था किए वगैर किया गया विस्थापन श्रृंखलाबद्ध हिंसा को जन्म देता है। खानों के उत्खनन से पैदा हुई हिंसा और उसके परिणाम शहरों को भी स्पर्श करते हैं। गांवों से शहरों की ओर हुआ विस्थापन और स्थानान्तरण विश्वव्यापी फिनोमिना है। यह पूंजीवादी व्यवस्था की हिंसा है। तेल,प्राकृतिक गैस, .यूरेनियम,विभिन्न किस्म की धातुओं के उत्खनन के कारण समाज में व्यापक स्तर पर अस्थिरता पैदा हो रही है। इस अस्थिरता के शिकार गरीब लोग हो रहे हैं।
    भारत सरकार ने हाल में माओवादियों की हिंसा से प्रभावित इलाकों में हजारों पुलिस और अर्द्ध सैन्यबलों को तैनात किया है,तथाकथित तौर पर माओवाद पभावित इलाकों में विकास के नाम पर कई हजार करोड़ रूपये खर्च करने की योजना बनायी है। माओवादियों को आम जनता से अलग-थलग करने के लिए मीडिया को लामबंद किया जा रहा है। इस सबसे लगता है कि माओवाद सबसे बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार कह रहे हैं कि माओवाद सबसे बड़ा खतरा है। मीडिया इस उक्ति को दिशा निर्देश मानकर माओवाद पर हमला करता चला जा रहा है।
      इस प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि मैं माओवादियों के हिंसाचार के खिलाफ हूँ। हिंसा को किसी भी तर्क के आधार पर वैध नहीं बनाया जा सकता। हिंसा स्वभावतः अवैध है। हिंसा के तर्क असामाजिक और अवर्गीय हैं। हमें हिंसा पर बात करते समय दो स्तरों पर सोचना होगा। पहला दीर्घकालिक स्तर है और दूसरा अल्पकालिक स्तर है।
   प्रधानमंत्री स्वयं अर्थशास्त्री हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि आखिरकार हिंसा की जड़ में माओवादी नहीं हैं बल्कि खानें हैं। खानों का पूंजीपतिय़ों के लिए दोहन किया जा रहा है। इस दोहन से ध्यान हटाने के लिए वे माओवाद का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं। माओवाद का हल्ला उनकी ध्यान हटाने की टेकनीक का हिस्सा है।
    दूसरी मबत्वपूर्ण बात यह कि माओवादी हिंसा वगैर केन्द्र के हस्तक्षेप के,पुलिस ऑपरेशन के बिना तत्काल बंद हो सकती है बशर्ते खानों का उत्खनन तत्काल बंद कर दिया जाए। खानों के उत्खनन को जारी रखने के कारण हिंसा हो रही है। माओवाद या आदिवासियों के कारण हिंसा नहीं हो रही।
   आदिवासियों को खानों को देशी-विदेशी कंपनियों को बेचते समय विस्थापन और पुनर्वास के काम को प्राथमिकता में सबसे नीचे रखा गया है। वरना यह कैसे हो सकता है कि आदिवासी इलाकों में 60 सालों की आजादी के बाद भी बिजली,पानी,रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं पहुँची हैं। अगर खानों के इलाकों में वैकल्पिक संरचनाओं का समय रहते निर्माण कर दिया गया होता तो आज माओवादी हिंसा का हौव्वा खड़ा करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। विभिन्न किस्म के विस्थापनों के कारण 4 करोड़ से ज्यादा लोग आदिवासी इलाकों से पिछले 60 सालों में विस्थापित हुए हैं। इनका पुनर्वास करने में सरकार अभी तक कामयाब नहीं हुई है।
        माओवादी हिंसा के पक्ष में हो सकता जेनुइन तर्क हों,लेकिन माओवादी हिंसा अंततःबड़ी पूंजी की सेवा कर रही है। मसलन माओवादी हिंसाचार से आदिवासियों के इलाकों के विकास का प्रश्न केन्द्रीय सवाल नहीं बन पाया है बल्कि माओवादियों से इलाके को मुक्त कराने का लक्ष्य प्रमुख हो गया है।
     अब इन इलाकों में शांति नहीं है। जाहिरा तौर पर सवाल किया जाएगा कि आपको शांति चाहिए या स्कूल, तो एक ही जबाब होगा शांति चाहिए। शांति स्थापित करने के सरकारी अभियान के पीछे इस तरह साधारण जनता को गोलबंद किया जा रहा है और जनता की संपदा के शोषण,खानों के शोषण को छिपाया जा रहा है। यही वह बिंदु है जहां से प्रच्छन्नतःमाओवादी संगठन कारपोरेट घरानों की सेवा करने लगते हैं।
      पुलिस ऑपरेशन के नाम पर पूंजीपतिवर्ग को खानों के इलाकों और उनसे आने-जाने वाले मार्गों पर पूरी सुरक्षा मिल जाती है। सरकार के लिए सीधे पूंजीपतिवर्ग के लिए लूट के लिए सुरक्षा देने में असुविधा होती है क्योंकि लोकतंत्र में जनता की नजरों में गिर जाने का खतरा रहता है और जनता की नजरों में गिरने से बचने का मार्ग है माओवादी हिंसा का अहर्निश प्रचार और मदद।
   माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि उनके हिंसाचार से खानों का उत्खनन और आदिवासियों का विस्थापन बंद होने वाला नहीं है। वे यह भी जानते हैं कि उनकी प्रतिवादी कार्रवाई का पूंजीपतिवर्ग को लाभ मिलेगा। खानों के इलाकों में पूंजीपतिवर्ग और उनके गुर्गों की तूती बोलने लगेगी। माओवादी हिंसा इसी अर्थ में कारपोरेट घरानों की सेवा करती है।
     कारपोरेट घरानों के साथ माओवादियों का याराना है,उन्हें खानों के मालिकों से चौथ मिलती है,मंथली पैसा मिलता है, माओवादी हिंसा के कारण बाजार बंद रहते हैं,ट्रेन बंद रहती हैं,सरकारी ऑफिस बंद रहते हैं लेकिन खानों का उत्पादन बंद नहीं होता। झारखंड की प्रत्येक खान से माओवादियों को 10-25 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। यह बात स्वयं सीबीआई के छापों में मधुकौड़ा के यहां मिले दस्तावेजों से सामने आई है। अकेला मधुकौड़ा की खानों से सालाना 125 करोड़ रूपयों चौथ माओवादियों को मिलती है।  ऐसे ही छापे यदि अन्य खानों के मालिकों के यहां भी ड़ाले जाएं तो माओवादियों और खान मालिकों के बीच का अन्तस्संबंध आसानी से उजागर हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि माओवादियों और मनमोहन सिंह का साझा लक्ष्य एक है कि किस तरह खान मालिकों की कैसे मदद की जाए। दोनों बंदूक की नली के सहारे खान मालिकों की सेवा कर रहे हैं। माओवाद के उन्मूलन के नाम पर सरकारी स्वांग चल रहा है उसके लक्ष्य है खानों के अबाध शोषण को जारी रखना और आदिवासियों को विस्थापित और पिछड़ा रखना।                  
             

4.9.10

आर्थिकमंदी और लूट की राजनीति



                
          र्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे हैं। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन आने वाले सुनहरे समय का सपना देख रहे हैं और आश्वासन पर आश्वासन देते रहे हैं लेकिन मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद ने भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की है। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जनत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
   मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का हाइपर नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्त व्यापार, मुक्त बाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके।