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16.10.10

अमेरिका का भयावह यथार्थ और मार्क्सवाद की वापसी

                     (स्व.कार्ल मार्क्स)
 यह मार्क्सवाद की ओर लौटने की बेला है। जो लोग नव्य उदारतावाद के साथ साम्यवाद पर हमलावर हुए थे वे अपने हाथों अपने पेट में छुरा भोंक चुके हैं। हम भारतवासी सच को देखें और आंखें खोलें। आर्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे थे। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन भावी सुनहरे समय का सपना दिखा रहे थे और आश्वासन पर आश्वासन दे रहे थे उनके लिए आर्थिकमंदी ने पराभव का मुँह दिखाया है। मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मार्क्सवाद सही और नव्य-उदारतावाद गलत का साफ संदेश है।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद और भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की गयी। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जगत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
      मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्तव्यापार, मुक्तबाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके।
      हमारे देश में अमेरिका के बारे में तरह-तरह के भ्रम पैदा किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा भ्रम तो यही पैदा किया जा रहा है कि अमेरिका हमारा स्वाभाविक दोस्त है। बड़े कौशल के साथ यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों के बारे में बताया जा रहा है कि वे हमारे देश में सिर्फ विकास के लिए आ रही हैं। शोषण और उत्पीड़न से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे तो हमारी मदद के लिए आ रही हैं। वे हमें आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि हमें अपने यहां विकास का चरमोत्कर्ष हासिल करना है तो अमेरिकी मॉडल का अनुकरण करें। अमेरिकी मॉडल का इस्तेमाल करते हुए हम अपनी भौतिक संपदा और आम लोगों की जीवनशैली में जबर्दस्त उछाल पैदा कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति भौतिक उपभोग को उच्चतम स्तर तक ले जा सकते हैं।
    अमरीकी आर्थिक मॉडल कितना सार्थक है इसके लिए आज किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमराकर गिर गयी है। आज अमेरिका में चारों ओर दुख ही दुख है। नव्य उदारतावाद का ग्लैमर, मीडिया और संचार क्राति का जादू अपना असर खो चुका है। विगत 25 सालों में अमेरिकी जनता के जीवन में दुखों में इजाफा हुआ है । अमेरिकी जनता के जीवन में दुख बढ़े हैं और सुख घटे हैं।
      अमेरिकी मॉडल जनोन्मुख है या जनविरोधी है इसका आधार है शांति और तनावमुक्त जीवनशैली। अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चल रही है तो आम जनता के जीवन में शांति ,सुरक्षा ,विश्वास और आनंद का विकास होना चाहिए, लेकिन परिणाम इसके एकदम विपरीत आए हैं अमेरिकी जीवन में अशांति,असुरक्षा और सामाजिक और व्यक्तिगत तनाव में इजाफा हुआ है। हताशा बढ़ी है। सामान्य अमेरिकी नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि उनके जीवन में इतनी व्यापक अशांति,असुरक्षा और तनाव कैसे आ गया। समाज के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली का तानाबाना तहस-नहस हो गया है।
      सामाजिक-आर्थिक स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि कमाऊ और मौज उडाऊ के बीच में वैषम्य घटा नहीं है बल्कि बढ़ा है। सन् 1968 में जनरल मोटर्स के सीईओ को इसी कंपनी के कर्मचारी की तुलना में 66 गुना ज्यादा पगार मिलती थी। यह वैषम्य घटने की बजाय बढ़ा है आज वालमार्ट कंपनी के सीईओ की पगार इसी कंपनी के एक कर्मचारी की पगार की तुलना में 900गुना ज्यादा है। अकेले वालमार्ट परिवार के पास 90 बिलियन डॉलर की संपदा है जबकि इतनी संपदा अमेरिकी की 40 फीसदी आबादी के पास है।
      संपदा के निजी इजारेदारियों के हाथों में केन्द्रीकरण ने भयानक आर्थिक वैषम्य पैदा किया है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘नेशन’ के अनुसार अमेरिका के अति समृद्धों का आर्थिकमंदी में कुछ नहीं बिगाड़ा है लेकिन मझोले अमीरों पर इसकी मार पड़ी है। न्यूयार्क टाइम्स ने अगस्त 2009 में लिखा था कि अमेरिका में जिन लोगों के पास 30 मिलियन डॉलर की संपत्ति है ऐसे लोगों की संपदा घटी है।
     अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी-अमेरिकन,कम कौशल का काम करने वाले कर्मचारियों की आय में गिरावट आयी है। ‘नेशन’ ने लिखा ‘‘Although they differ in theme and emphasis, the essays here, commissioned in conjunction with the Next Social Contract Initiative of the New America Foundation, are united by a belief that deep, persistent inequality doesn't merely affect less privileged Americans. It affects everyone, rending the social fabric, distorting our politics and preventing America from fulfilling its promise as a nation that offers a measure of equality and opportunity to all. Inequality is also a bipartisan phenomenon, exacerbated by the neglect of both political parties and by a society whose chattering classes have grown oblivious to wealth and income disparities that no other advanced democracy tolerates.’’
   अमेरिका की वास्तविकता पर पर्दा डालकर जो लोग भारत में अमेरिकी मॉडल का जयगान कर रहे हैं और अमेरिका जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि अमेरिकी मॉडल खुद अमेरिका में धराशायी हो चुका है।
   अमेरिका में व्याप्त आर्थिक असुरक्षा के बारे में रॉकफेलर फाउण्डेशन की रिपोर्ट में जो कहा गया है वह हमारी आंखे खोलने के लिए काफी है। यह संस्थान घनघोर प्रतिक्रियावादी विचारकों का अड्डा है। इस रिपोर्ट को येल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेकब हेकर ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों की आय में गिरावट आयी है। इन परिवारों की आय में अचानक से आई गिरावट का किसी को पहले से आभास तक नहीं था। 
      रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1985 में आर्थिक असुरक्षा से अमेरिका में 12.2 प्रतिशत परिवार प्रभावित थे। जिनकी संख्या सन् 2000 में बढ़कर 17 प्रतिशत हो गयी। सन् 2007 को सुंदर आर्थिक साल माना जाता है इस साल आर्थिक असुरक्षा 1985 के स्तर से ज्यादा थी।यानी 13.7 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के दायरे में थे।
    सन् 2009 से आर्थिक तबाही का जो सिलसिला आरंभ हुआ है उसके कारण स्थिति और भी भयावह बनी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1996 और 2006 के बीच में तकरीबन 60 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के घेरे में आ चुके हैं। आम अमेरिकी नागरिक की पगार स्थिर है या कम हुई है। जबकि अनिवार्य खर्चे बढ़े हैं। ज्यादातर अमेरिकी नागरिकों के पास किसी भी किस्म की बचत नहीं हो पाती। बैंकों में उनके नाम से एक भी पैसा बचत खातों में नहीं है। वे जितना कमाते हैं उससे ज्यादा के उनके पास खर्चे हैं।
   पहले अमेरिका में बेकार नागरिकों को थोड़े अंतराल के बाद काम मिल जाता था लेकिन विगत कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि बेरोजगारों को काम के लिए बहुत ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ता है। बेकारी का समय लंबा होने से आर्थिक असुरक्षा ने एक नया आयाम हासिल कर लिया है। अब बेकार और मध्यवर्ग के लोग 35 साल की उम्र में ही बूढ़ापे का अनुभव करने लगे हैं।
      अमेरिका के फिलिप्स सेण्टर फॉर हेल्थ एंड वेल-बिंग का ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक संकट और बेकारी के कारण मध्यवर्ग के अमरीकी नागरिक 35 साल की उम्र में ही बूढ़ा महसूस करने लगे हैं। 75 पर्तिशत लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिरे हुए हैं। बूढ़ापा और बीमारियां 30 साल की उम्र में एक अमेरिकी युवा को घेर रही हैं। 
    डेनिस पाराडिनिज ने अपनी किताब  ‘‘Quality of Life’’ में लिखा “Feeling there is a possibility of losing your job and not being able to afford to pay your child’s school fees, or having to cancel that trip you planned a long time ago, certainly causes worry and anxiety”. एक मनोशास्त्री ने कहा है “And of course this begins to affect other areas of quality of life, causing insomnia, anxiety and even depression”.  इस सबका उनके मोटापे,शरीर और उम्र पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।
     आम अमेरिकी की इन दिनों पूरी जीवनशैली बदल गयी है। एक जमाना अमेरिकी स्वस्थ माने जाते थे आज मोटे हो गए हैं। आजकल फ्रेंच लोगों से ज्यादा अमेरिकी लोग सोने और खाने पर समय खर्च करते हैं। सवाल उठता है क्या हम इसके बावजूद अमेरिकी मॉडल पर चलना पसंद करेंगे ?   

9.9.10

क्या भारत के कम्युनिस्ट बदलेंगे ?

         पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा गंभीर संकट में है। इस संकट का एक पहलू सांगठनिक है और दूसरा पहलू राजनीतिक है। सांगठनिक स्तर पर किस तरह के बदलाव की जरूरत है इसे वामदल अपने अनुभवों की रोशनी में दुरूस्त करें। इसमें दो चीजें ध्यान देने योग्य हैं। पहली चीज है भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को अपने फ्रंट के सहयोगी दलों के प्रति समानता और लोकतंत्र के आधार पर व्यवहार करने की आदत पैदा करनी होगी। पार्टी निर्देश का चक्कर चलाना बंद करना होगा। वामदल सिर्फ मोर्चा का हिस्सा रहेंगे और प्रशासन में सिर्फ माकपा की चलेगी यह नहीं हो सकता। यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वामदलों में संकट के समय फूट नजर आती है। वाममोर्चा एक राजनीतिक मोर्चा है। उससे व्यवहार में भी राजनीतिक मोर्चा होना चाहिए। प्रशासन के कामकाज में भी वामदलों का ख्याल रखा जाना चाहिए। खासकर उन मंत्रालयों में जिन्हें माकपा चलाती है।
       दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली में लाने की जरूरत है। राज्य के मंत्री प्रशासनिक नियमों और पब्लिक रिलेशन के आधार पर काम करें न कि पार्टी निर्देश के आधार पर। पार्टी के इशारे पर चलने के कारण मंत्रालयों में निकम्मापन, भाई-भतीजावाद और पक्षपात बढ़ा है। प्रशासनिक अक्षमता बढ़ी है।
       वाम मोर्चा सरकार के प्रति व्यापक असंतोष का तीसरा बड़ा कारण माकपा के कार्यकर्ताओं का स्थानीय पर अलोकतांत्रिक हस्तक्षेप है। इसके कारण दादागिरी की संस्कृति पैदा हो गयी है जिसे सामान्य भाषा में गुण्डागर्दी कहते हैं। सामान्य लोगों के निजी जीवन में पार्टी के लोगों का अहर्निश हस्तक्षेप ही है जिसके कारण समूचे राज्य में आम लोगों में व्यापक असंतोष पैदा हुआ है। इसके लिए वाकायदा भूल सुधार अभियान चलाया जाना चाहिए।
    जिन लोगों को पार्टी के कार्यकर्ताओं ने तकलीफें दी हैं उन्हें पार्टी की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से हटाया जाना चाहिए और निचली ईकाईयां उत्पीडि़त लोगों के पास जाकर माफी मांगे। समाजवाद की उपलब्धियों को गुण्डागिरी के कारनामों और गलत पार्टी सदस्यों के कारण धूल में नहीं मिलाया जा सकता। इन गलतियों और घमण्ड का ही दुष्परिणाम है बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवियों ने वाम का साथ छोड़ दिया।   
    इसके लिए सबसे पहले माकपा को अपने नेताओं के दिमाग की धुलाई करनी चाहिए। पार्टी में सर्वोच्च स्तर के अनेक नेताओं में बुद्धिजीवियों के प्रति संशय,अविश्वास, घृणा भरी हुई है। इस तरह के घृणा के पुजारियों को पार्टी पदों से मुक्ति दी जानी चाहिए। जो पार्टी नेता बुद्धिजीवियों के प्रति घृणा का प्रचार करता हो उसे नेतृत्वकारी भूमिका नहीं दी जानी चाहिए। यदि माकपा ऐसा कर पाती है तो बौद्धिकों में उसकी इमेज वापस लौट सकती है।      
       इसबार के विधानसभा चुनाव को ममता बनर्जी बनाम वाम या माकपा के बीच की जंग के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। इसबार के चुनाव में दांव पर गरीबों की जमीन लगी है। जो लोग वाम से नाराज हैं वे गंभीरता से सोचें क्या व्यक्तिगत राग-द्वेष के आधार पर गरीबों के हितों और संपदा को दांव पर लगाया जा सकता है ? वाम यदि चुनाव हारता है तो यह तय है गांव के जिन गरीब किसानों को भूमिसुधार के लाभ मिले हैं,जमीन मिली थी वह जमीन एक ही झटके में उनके हाथ से नकल जाएगी क्योंकि कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस किसानों की जमीन छीनने के मामले में एकमत हैं।
    कांग्रेस सारे देश में नंगे तरीके से कारपोरेट घरानों के लिए किसानों की जमीन छीनने का रिकार्ड कायम कर चुकी है और देश के विभिन्न इलाकों में माकपा ने किसानों के संघर्षों में साथ दिया है, अनेक जगह अगुवाई भी की है। पश्चिम बंगाल में पुराने जमींदारों का ममता बनर्जी को एकजुट समर्थन मिला हुआ है और ये जमींदार अपनी खोई जमीन पाना चाहते हैं। जमींदारों के इस गठजोड़ को कईबार रंगे हाथों केशपुर वगैरह में देखा गया है। ममता बनर्जी वाम की गलतियों का फायदा उठाकर पश्चिम बंगाल के जमींदारों के जीवन में रैनेसां लाने जा रही हैं। वामपंथी दलों ,जमींदारों के विरोधियों और गरीब किसानों के पक्षधरों को इस मसले पर एकजुट होना चाहिए।
      पश्चिम बंगाल और उसके बाहर मध्यवर्ग के लोगों में माकपा के नीतिगत और व्यवहारगत आचरण को लेकर अनेक लोगों को शिकायतें हैं ,ये जेनुइन शिकायतें हैं। उन्हें कुछ बुनियादी आधारों पर दूर किया जाना चाहिए। इस क्रम में वाम को नए सिरे से एजेण्डा तय करना चाहिए। इसमें दो तरह का एजेण्डा हो सकता है पहला व्यवहारिक और दूसरा नीतिगत।
     व्यवहार के स्तर पर बुद्धिजीवियों का दिल जीतने के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर यूजीसी के नए वेतनमान और उससे जुड़ी सिफारिशों को समग्रता में अविलम्ब लागू किया जाना चाहिए। अभी सिर्फ वेतनमान लागू किया गया है, शिक्षकों की रिटायरमेंट की उम्र को 60 से बढ़ाकर 65 किया जाना चाहिए। इस काम में जितनी देरी होगी बुद्धिजीवियों में असंतोष और बढ़ेगा।
     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि केन्द्र के बराबर मकानभत्ता  और यात्राभत्ता कोलकाता और पश्चिम बंगाल के शिक्षकों को भी दिया जाना चाहिए। वाममोर्चा सरकार यदि शिक्षकों को यूजीसी के नियमानुसार सुविधाएं नहीं दे पाती है तो यह तय है बड़े पैमाने पर शिक्षक और छात्र उनके साथ से चले जाएंगे। दूसरी बात यह भी कि आने वाली दूसरी पार्टी उन्हें वह सब देगी जो यूजीसी ने सिफारिश की है क्योंकि उन्हें वोट चाहिए। इसके अलावा शिक्षा में ड्रापआउट की समस्या को कम करने लिए शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए। खासकर गरीबों और लड़कियों के लिए एमए तक छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी बसों,ट्राम और प्राइवेट बसों में न्यूनतम चार्ज पर विद्यार्थी पास जारी किए जाने चाहिए।
      वाम को अपना नया केन्द्रीय एजेण्डा बनाते समय नव्य उदार नीतियों के विरोध को केन्द्र में रखकर व्यापक मोर्चा बनाना चाहिए। इस मोर्चे में सिर्फ वाम दल ही न हों बल्कि गैर वाम मनोदशा और विचारधारा के नव्य उदार नीतियों का विरोध करने वालों को भी शामिल करना चाहिए। आज के दौर में मार्क्सवाद प्रधान एजेण्डा नहीं है। बल्कि नव्य उदार नीतियों के खिलाफ व्यापक मोर्चा ही लक्ष्य होना चाहिए। ममतापंथी लोगों को भी इस मोर्चे के प्रति आकृष्ट करने की जरूरत है । आम लोगों को बताने की जरूरत है कि ममता बनर्जी और उसकी पार्टी नव्य उदार नीतियों की अंध समर्थक हैं।
    नव्य-उदार नीतियों के खिलाफ व्यापक मोर्चे में विचारधारात्मक भेदभाव के बिना लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। इसमें धर्मप्राण जनता से लेकर देशभक्तों के लिए जगह होनी चाहिए। अभी तक वाम मोर्चा के आधार पर आम लोगों को गोलबंद किया गया था अब लोकतांत्रिक हितों,मानवाधिकार रक्षा और नव्य उदार नीतियों के विरोध के आधार पर व्यापक फ्रंट बनाना चाहिए और इसके लिए ऊपर से तैयारियां आरंभ होनी चाहिए।
    वाम मोर्चा की दिक्कत यह है कि वह नव्य उदार नीतियों का सिर्फ वाम के आधार से विरोध करना चाहता है। वाम का आधार सीमित है वह ज्यादा दूर नहीं ले जाता। वाम के आधार को बृहत्तर राष्ट्रीय आधार बनाया जाना चाहिए। इसके लिए अलग से साझा मंच बनाया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि नयी बदली परिस्थितियों में वामदलों को अपने कार्यक्रम,संगठन और मोर्चे की रणनीतियों को बदलना चाहिए। मुश्किल यह है कि वामदलों में,खासकर कम्युनिस्टों की कार्यप्रणाली में बदलाब बेहद धीमी गति से हो रहे हैं और इसके कारण सामयिक राजनीतिक यथार्थ में उन्हें करारे झटके झेलने पड़ रहे हैं। अलगाव का सामना करना पड़ रहा है। यह अलगाव कम हो सकता है बशर्ते कम्युनिस्ट अपनी कार्यप्रणाली को मौजूदा युग की गति के अनुरूप बना लें। वरना मौजूदा संकट उन्हें ले डूबेगा।    
       







4.9.10

आर्थिकमंदी और लूट की राजनीति



                
          र्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे हैं। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन आने वाले सुनहरे समय का सपना देख रहे हैं और आश्वासन पर आश्वासन देते रहे हैं लेकिन मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद ने भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की है। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जनत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
   मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का हाइपर नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्त व्यापार, मुक्त बाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके। 

3.9.10

अमरीका का पुनर्पाठ- अमरीकी नव उदार फासीवाद का पतन अपने दुस्साहस के कारण होगा-राउल वालदेस विवो







इस मसले की तीन बुनियादी परिस्थितियां इस प्रकार हैं :

इराक के खिलाफ हमले का कारण उसका पेट्रोलियम है जो कि उनके अपने पेट्रोलियम से दस गुने से अधिक सस्ता और प्रचुर है। संयुक्त राज्य के एकाधिकारियों का यह पेट्रोलियम चाहिए। साथ ही वे यूरोप और जापान में अपने प्रतिद्वंद्वियों को इससे दूर रखना चाहते हैं।


इसी क्षेत्र में (उदाहरण के लिए बंगलादेश में) भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस उपलब्ध है। 21वीं शताब्दी पेट्रोलियम के मुकाबले कम नुकसानदायक तथा सस्ती गैस की शताब्दी होगी। यह माइक्रोचिप्स और बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े ज्ञान की शताब्दी होगी।
इस सबके पीछे अमरीका की स्थायी नीति काम कर रही है जिसके तहत वह भू-रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र (फिलिस्तीन सहित) पर जबर्दस्ती बर्चस्व कायम करना चाहता है ताकि जनसंख्या और क्षेत्र की दृष्टि से बड़े देशों : चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान तथा ऊर्जा स्रोत वाले देशों जैसे कि सउदी अरेबिया को डराया-धमकाया जा सके।
हम निम्नलिखित मुद्दों की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं :
संभवत: हमने समाज वैज्ञानिक तत्व पर पूरा विचार नहीं किया है। पहले विश्वयुध्द के बाद जो कुछ हुआ उसके बारे में मारियाटेगुई पहले ही बता चुके हैं। यूरोप में विषाक्त मानसिक वातावरण पैदा हो गया था जिसमें से फासीवाद का जन्म हुआ।
उग्र दक्षिणपंथियों और मियामी में उनके फासीवादी माफिया की चालबाजी और जादू से बेटे जार्ज बुश की सरकार सत्ता में आई। उसके सलाहकारों के समाज विज्ञान में दुस्साहस शामिल है।
लेनिन ने पूरी ताकत के साथ क्रांतिकारियों में अत्यधिक व्यक्तिपरकता की आलोचना की। ये व्यक्तिवादी लोग द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, वास्तविक और वस्तुपरक स्थितियों को भूल गए और सोचने लगे कि कोई छोटा सा एक समूह ऐतिहासिक परिवर्तन कर सकता है और वह भी अंधाधुंध हिंसा का सहारा लेकर।
पूंजीवाद आज भी इसलिए मौजूद है क्योंकि पूरी दुनिया में अवाम ने इसके स्थान पर अपनी सत्ता कायम करने में देरी कर दी। इस पूंजीवाद के बेकाबू होने का एक संकेत यह है कि उसके हृदय में फिर से प्रतिक्रियावादी किस्म की हलचलें पैदा होने लगी हैं। इनके
हामीदारों को नकारवादी नहीं कहा जा सकता। ये उसके उलट हैं। 19वीं शताब्दी के अंत में रूसी पोपुलिस्ट अनास्था सिखा रहे थे जबकि ये खुद को धार्मिक कट्टरपंथियों, रूढ़िवादियों के रूप में पेश कर रहे हैं। सबसे अधिक विख्यात मामला ओसामा बिन लादेन का है। उसने अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी ताकतों के खिलाफ अमरीका का साथ दिया था, उसकी मदद से सत्ता में आया। बाद में उसने 11 सितंबर 2001 को वहशियाना हमले कराए। इससे रूढ़िवादी तथा उतनी ही कट्टर लेकिन ईसाई बुश बेटे की ऐंग्लो-सेक्शन सरकार को पूरी दुनिया में सैनिक तानाशाही के लिए मुहिम चलाने का अच्छा बहाना मिल गया। इस बात को कोई भी नहीं मान सकता कि अमरीका के राष्ट्रपति दयालुतापूर्ण चरम-रूढ़िवाद के पक्षधर हैं।
संक्षेप में दुस्साहसवाद वाम और दक्षिण दोनों बिलकुल अलग राजनीतिक और सामाजिक ताकतों से पैदा हो सकती है। तो इसका क्या अर्थ निकाला
जाए?
यह व्यक्तिपरकता का अति प्रयोग है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक निर्णय निर्णय करने वाले व्यक्ति पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार उसके द्वारा देखा गया सत्य उसी तक सीमित रह जाता है। हीगेल और उसके बाद प्रोटागोरस का कथन है कि मनुष्य सभी चीजों का मापदंड है। इसकी दो व्याख्याएं हैं। एक, प्रतिक्रियावादी, आदर्शवादी जो ज्ञान को व्यक्ति के ज्ञान तक सीमित कर देती है। दूसरी क्रांतिकारी द्वंद्वात्मक और भौतिकवादी व्याख्या है क्योंकि वह मानव जाति को इतिहास के केंद्र में रखती है।
दुस्साहसवादी व्यक्तिपरकता से खुद को जोड़कर अमरीकी पूंजीपतियों के प्रभुत्वशाली हिस्से ने ऐंग्लो-अमरीकी व्यावहारिकता को छोड़ दिया है। यह व्यावहारिकता तर्कसंगत प्रत्यक्षवाद पर आधारित थी। इस प्रत्यक्षवाद ने ही काफी लंबे समय तक बुध्दिवादियों के विरोध में उनका आचरण तय किया। उन्होंने बुध्दिवादियों के इस दावे को दूषित बताया कि तर्क के अनुसार हमारा आत्म वास्तविकता की प्रतिकृति है।
अमरीका का वर्तमान शासक व्यावहारिकता का ही शत्रु नहीं है। वह बुध्दिवाद का भी शत्रु है क्योंकि वह मानता है कि वास्तविकता को उसकी इच्छा के हिसाब से मोड़ा जा सकता है।
यह स्थिति मार्क्सवाद-लेनिनवाद से मेल नहीं खाती। उसके अनुसार दर्शन का प्रमुख लक्ष्य संसार की व्याख्या करना नहीं बल्कि इतिहास के वस्तुपरक प्रयाण के अनुरूप उसका क्रांतिकारी कायाकल्प है। मार्क्सवादी-लेनिनवादी हीगेल के इस विचार को ग्रहण करते हैं कि बाध्दिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास मानव स्वतंत्रता अर्थात कम स्वतंत्रता से अधिक स्वतंत्रता की ओर जाने का रिकार्ड है। अवाम की भूमिका की बात कर वे इस विचार को वास्तविक अर्थ देते हैं। हीगेल इससे नफरत करता था।
इसके विपरीत फासीवादियों की कोशिश रहती है इस असंगत संसार में कुछ भी न बदले जिससे कि वे बॉस बने रहें, लोगों को आजादी न हो। 250 धनी लोगों की आय 2.5
अरब लोगों की आय के बराबर बनी रहे और जिससे मानव जाति के लुप्त हो जाने का खतरा बना रहे।
फासीवाद की प्रबल अनिवार्य मनोवैज्ञानिक विशेषता अर्थात उसका दुस्साहस ही हमेशा उसके पतन का कारण बनता है। लेकिन यह विचार सही नहीं है कि उसका पतन अपने आप होगा। सोवियत संघ के विभिन्न नेता लेनिन के मार्ग से भटक गए। उनके द्वारा की गई गलतियों के कारण मानवता ने 20वीं शताब्दी गंवा दी। फासीवाद के पहले मॉडल की पराजय से जो महान अवसर मिला था उसे उन्होंने गंवा दिया और मानव तर्क की सार्वभौमिक जीत होने से रह गई। सवाल 21वीं शताब्दी को गंवा देने का नहीं है। यहां तो हर दिन के नुकसान से धरती पर मानवता के अस्तित्व को खतरा बढ़ता जा रहा है।
फासीवाद बुर्जुआ लोकतंत्र के विपरीत है, हालांकि दोनों का ताल्लुक पूंजीवाद की अधिरचना (सुपर स्ट्रक्चर) से है।
इनमें अंतर कई रूपों में देखा जा सकता है जिसे कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। बुर्जुआ लोकतंत्र पूंजी के संचय और विस्तारित पुनरुत्पादन के आर्थिक तंत्र के भीतर उत्पादन के बुनियादी साधनों के मालिकों के वर्चस्व को कायम रखता है। फासीवाद गैर आर्थिक बलप्रयोग का अधिक आश्रय लेता है। बुर्जुआ लोकतंत्र सर्वसम्मति पर आधारित होता है लेकिन बीच-बीच में हिंसा (प्रदर्शनों और हड़तालों आदि का दमन) का सहारा लेता है। फासीवाद हिंसा का निरंतर प्रयोग या उसके प्रयोग का खतरा है।
     बुर्जुआ लोकतंत्र नस्लवाद या विदेशी द्वेष का उन्मूलन तो नहीं करता लेकिन उसके खिलाफ कदम उठा सकता है। फासीवाद बहुत ऊंचे दर्जे का नस्लवाद और विदेशी द्वेष है।
बुर्जुआ लोकतंत्र युध्द कराता है लेकिन उनके बीच में शांति भी कायम करता है। सोवियत संघ रूपी गढ़ के कारण यूरोप की तीन पीढ़ियों ने युध्द नहीं देखा। सोवियत संघ और यूरोप में उसके द्वारा निर्मित समाजवादी शिविर के खत्म हो जाने के बाद यूगोस्लाविया के टूटने के साथ युध्द शुरू हो गया। फासीवाद निरंतर और स्थायी युध्द है। शांति केवल युध्द विराम होती है।
चेग्वेरा द्वारा दी गई जबर्दस्त परिभाषा बार-बार चरितार्थ होती है : जब तक अवाम का डर नहीं होता तब तक बुर्जुआ लोकतंत्र का सहारा लेता है। जब उसे उनका डर लगने लगता है तो वह फासीवाद की ओर चला जाता है।
बुर्जुआ लोकतंत्र को बरकरार रखने वाले शासन बहुत सी बातों का ध्यान रखते हैं। फासीवादी की ओर झुके शासन स्वभाव से ही दुस्साहसी होते हैं। यह दुस्साहस उनके अक्खड़पन, दूसरों के प्रति उनकी नफरत, अपनी वहशी ताकत के ज्यादा अनुमान तथा दूसरों की क्षमता के कम अनुमान से पैदा होता है।
     दुस्साहस और फासीवाद के ताल्लुक का यदि विश्लेषण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अपने वहशीपन के पोषण के लिए दोनों झूठ और मसीहा के मनोविज्ञान का सहारा लेते हैं। पहले हिटलर ने जर्मनी के लिए जरूरी 'जगह' तथा 'अयोग्यों' को खत्म करने और 'सुपरमैन' उत्पन्न करने वाली 'नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के बारे में झूठ बोला।
    आज (ब्लेयर, अजनार और बेरलुस्कोनी जो ब्रिटिश, स्पेनिश और इतालवी अवाम से कट गए हैं के समर्थन से) बुश स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकार कायम करने की अपनी दिव्य नियति तथा इराक और अन्य देशों में मौजूद आम विनाश के हथियारों के बारे में झूठ बोल रहा है। ऐसे हथियार कहीं नहीं थे।
फासीवादी अवधारणा के अंतर्गत वित्तीय कुलीन तंत्र के सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी तबके की सत्ता की रक्षा के लिए हर चीज में गैर आर्थिक हिंसा का सहारा लिया जाता है। यह अवधारणा किसी राष्ट्र, प्रजाति या धर्म के प्रतिनिधि के रूप में खुद को विशुध्द बताने वाले लोगों की दूसरे राष्ट्रों, प्रजातियों या धर्मों के प्रति नफरत पर आधारित है। यह सभ्यताओं के टकराव का मसला है। जोसे मारती ने इस बारे में कहा है कि यह उपनिवेशवादियों का विश्वासघाती बहाना है।
दुस्साहस विदेशी-द्वेष, नस्लवाद या धार्मिक असहिष्णुता से खुराक लेता है तथा उसमें कमांड और आदेश देने की उन्मादपूर्ण ललक होती है। उसे यह विश्वास होता है कि दूसरों पर आसानी से वर्चस्व कायम किया जा सकता है।
समकालीन इतिहास से कुछ उदाहरण
मूल फासीवादियों का दुस्साहस इस विचारधारा से जुड़ी तीन शक्तियोंनाजी जर्मनी, मुसोलिनी के इटली और सैन्यवादी जापानके आचरण में प्रकट हुआ। जर्मनी ने ग्रेट ब्रिटेन पर हमला करने से पूर्व सोवियत संघ पर हमला किया जहां उसे रोक लिया गया। इटली एबिसिनिया (इथियोपिया) को जीतना चाहता था लेकिन उसके पास आवश्यक सेना नहीं थी। जापान ने ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका के एशियाई उपनिवेशों पर ध्यान केंद्रित कर दिया जिसकी वजह से वह स्तालिनग्राद की निर्णायक लड़ाई में जर्मनी की सहायता के लिए नहीं आ सका। तीन फासीवादी ताकतों की यह निर्णायक पराजय सिध्द हुई।
      व्यावहारिकता का परिचय देते हुए अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने सोवियत नेता स्तालिन के साथ संधि की। इनके गंठजोड़ ने जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी गुट को पराजित किया। फासीवाद के विनाश में सोवियत अवाम की प्रमुख भूमिका रही। उसने अपने एक बटा पांच सपूत इसमें बलि चढ़ा दिए। यह संख्या अमरीका और ग्रेट ब्रिटेन की संख्या से कहीं अधिक थी। फासीवाद की दुस्साहसी प्रवृत्ति की उपेक्षा करके यदि स्तालिन हिटलर के साथ युध्द न करने का करार करने की भूल नहीं करते तो जान-माल का इतना नुकसान नहीं होता।
      दोहरा तत्व : सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी के मजबूत होने, तीसरी दुनिया के देशों की स्वतंत्रता प्रक्रिया तथा चीन, वियतनाम और क्यूबा में वास्तविक सामाजिक क्रांतियों के कारण अमरीका को कलह की रणनीति पर आना पड़ा। इसके भीतर वे लोग भी थे जो समाजवाद के विध्वंस तथा उपनिवेशवाद और नव उपनिवेशवाद से मुक्त देशों की स्वतंत्रता की रणनीति के पक्षधर थे। समाजवाद के सोवियत मॉडल तथा सोवियत संघ सहित इसके शासनों के समाप्त हो जाने के बाद ये दोनों रणनीतियां जारी रहीं। इन्हें अंग्रेजी में 'कंटेनमेंट (घेराबंदी)' और 'रोल बैक (पलट देना)' कहा जाता है। रीगन, पिता बुश और क्लिंटन ने पहली रणनीति अपनाई। लेकिन बेटा बुश उस हर चीज को नष्ट करने की रणनीति अपना रहा है जो स्वतंत्र रास्ता अख्तियार कर रही है (फ्रांस और जर्मनी सहित) या सामाजिक प्रगति की ओर जा रही है।
     अमरीकी केंद्र (विश्व अर्थव्यवस्था का एक तिहाई, विश्व व्यापार का 18 प्रतिशत, शेष दुनिया से बड़ा सेना बजट, डालर का सार्वभौमिक मुद्रा बनना, जिस पर यूरो के आने से प्रश्न चिह्न लग गया है, आदि) वाली एक ध्रुवीय दुनिया तो स्थापित हो गई है लेकिन इस बात को लेकर सतर्कता भी है कि दुनिया का फिर बहु धु्रवीय होना तय है जिसका एक धु्रव चीन होगा और साथ ही तीसरी दुनिया के देश विशेषकर क्यूबाई क्रांति के पीछे पड़े हमारे अमरीका के देश फिर से ऐतिहासिक पहल करेंगे। इसकी वजह से नव फासीवाद की समस्याएं तथा इसका जन विरोधी मनोविज्ञान जगजाहिर हो रहा है। सिएटल तथा अन्य कई शहरों में पूंजीवाद का जबर्दस्त विरोध हुआ जिसके केंद्र में अमरीकी अवाम का अत्यधिक सतर्क तबका था। इसकी वजह से अति दक्षिणपंथी अमरीकी तबके में हर तरीके से सत्ता लेने की हड़बड़ी पैदा हो गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अमरीकी लोग विश्व क्रांति के लिए आरक्षी सेना में शामिल हो सकते हैं। लूट तथा गुलाम बनाने के लिए अपनी ही सरकार द्वारा चलाए जा रहे युध्दों को रोकने के संघर्ष में शामिल हो सकते हैं। बेटे बुश के नेतृत्व में जो दुस्साहसवादी शासन स्थापित हुआ है उसने अमरीकी साम्राज्यवाद के पक्षधर लोगों की भाषा ही बदल दी है। इस भाषा में अधिक ढिठाई आ रही है।
9 अक्टूबर 2001 को वॉल स्ट्रीट जरनल ने लिखा : 'आतंकवाद का जवाब? उपनिवेशवाद।' अमरीकी बैंकरों के महत्वपूर्ण स्वर के रूप में फाइनेंसियल टाइम्स ने 10 अक्टूबर 2001 को लिखा : 'हमें साम्राज्यवाद की जरूरत है।' इसके 19 दिन बाद वाशिंगटन पोस्ट ने दृढ़ता के साथ कहा : 'हमें संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक जैसी उपनिवेशवाद के बाद की संस्थाओं को नया साम्राज्यवादी आवेग देना चाहिए।' 17 जुलाई 2003 को अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा, 'आज अंतर्राष्ट्रीय नीति के तहत इससे खतरनाक सिध्दांत नहीं हो सकता कि अमरीकी शक्ति के खिलाफ प्रतिस्पर्धी शक्तियां हों।'
    लेबर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता रॉबर्ट कॉपर ने लंदन ऑब्जर्वर में और भी साफ तौर पर कहा, 'आज उपनिवेशवाद की पहले से ज्यादा जरूरत है। विश्व में व्यवस्था पैदा करने
तथा उसे संगठित करने के लिए हमें नव साम्राज्यवाद की जरूरत है।' दुस्साहसवादी भावना डब्ल्यू.टी.ओ. के दोनों टावरों के गिरने के बाद अचानक नहीं आई। वह शीत युध्द के शुरू होने से परिपक्व हो रही थी। इसी भावना के अनुरूप अमरीकी संयुक्त सेना कमान के प्रमुख हेनरी शेल्टन ने कहा, 'अमरीका को निरंकुश पूर्ण आधिपत्य कायम करना चाहिए।' शांति, स्वतंत्रता और प्रगति के लिए दुनिया के देशों के लोगों की इच्छा तथा अमरीकी अवाम की लोकतांत्रिक उपलब्धियोंजो कि देश में फासीवादी दृष्टिकोण को लागू करने की दिशा में जबर्दस्त बाधा हैको चुनौती देते हुए सी.आई.ए. के प्रचालन निदेशक क्रोंगर ने हाल ही में कहा : 'आज एक ही नियम मौजूद है और वह यह कि कोई नियम नहीं है।'
नव उदार फासीवाद के पुराने समर्थक तथा कोंडोलीजा राइस के साथी बिगनीव ब्रजेजिंस्की ने पूरी साफगाई के साथ लिखा : 'अमरीका का लक्ष्य अपने दासों को अधीन बनाए रखना, जनता की आज्ञापरायणता और सुरक्षा की गारंटी तथा असभ्यों को एकजुट होने से रोक होना चाहिए।'1
अमरीकी दुस्साहस की सर्वाधिक स्पष्ट मौजूदा मिसालें हैंइराक के खिलाफ युध्द और एफ.टी.टी.ए.।
संयुक्त राष्ट्र संघ से नफरत करने वाले तथा फासीवादी दुस्साहस के पैरोकार सी.आई.ए., पेंटागन और व्हाइट हाउस के दबदबे के कारण ही अमरीकी सरकार ने यह सोचा था कि इराक की बहुसंख्यक शिया जनसंख्या फूलों के साथ अमरीकी सैनिकों का स्वागत करेगी क्योंकि उन्होंने सुन्नियों का दमन सहा है। लेकिन शिया यह देखकर पूरा विरोध कर रहे हैं कि बुश ईरान जैसा शिया शासन यहां कायम नहीं कर सकता। साथ ही कुर्दों के इस्तेमाल से तुर्की के साथ अनसुलझी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
अमरीकी दमन कर रहे हैं। बच्चों को मारते समय वे धर्म का भेद नहीं करते। इसी कारण विरोध की भावना बढ़ रही है और वह देशभक्ति का रूप ले रही है। इसमें शिया लोग शामिल हो रहे होंगे। यदि ऐसा नहीं होता तो बगदाद तथा दूसरे शहरों, जहां वे बहुसंख्या में हैं, में विरोध नहीं होता। जिन देशों को खतरा है वे भी विरोध के लिए तैयार हैं। स्वतंत्र, प्रभुत्ता संपन्न समाजवादी क्यूबा, फिदेल, राउल, पार्टी, यू.जे.सी., उसका जन संगठन और उसकी सशस्त्र सेनाएं पूरी जनता के युध्द के लिए तैयार हैं। प्लाया गिरोन की तरह विजय हमारी होगी।
एफ.टी.टी.ए. भी दुस्साहस का चिह्न है जो बुश की हार का कारण बनेगा। कमांडर-इन-चीफ ने कहा है, 'यदि अमरीकी साम्राज्यवाद हमारे अमरीका को निगलता है तो वह उसे पचा नहीं पाएगा।' जैसा कि वेनेजुएला से प्रकट हो रहा है और ब्राजील, अजर्ेंटीना, बोलिविया तथा अन्य बहुत से देशों में गंभीर परिवर्तनों से साफ हो रहा है, दुस्साहस का समय खत्म हो गया है। लेकिन अमरीका के अवाम को इस छलावे से मुक्त होना होगा तथा समकालीन इतिहास के सबसे बड़े दुस्साहसी के भाग्य का फैसला करना होगा।


डॉ.  राउल वालदेस विवो,



कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा के हायर पार्टी स्कूल के रेक्टर)


जनवरी 2004
( नवउदारवाद का फासीवादी चेहरा,फिदेल कास्त्रो,अनुवाद,रामकिशन गुप्ता,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली-110092,फोन-22025140,65179059)