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3.9.10
अमरीका का पुनर्पाठ- अमरीकी नव उदार फासीवाद का पतन अपने दुस्साहस के कारण होगा-राउल वालदेस विवो
इस मसले की तीन बुनियादी परिस्थितियां इस प्रकार हैं :
इराक के खिलाफ हमले का कारण उसका पेट्रोलियम है जो कि उनके अपने पेट्रोलियम से दस गुने से अधिक सस्ता और प्रचुर है। संयुक्त राज्य के एकाधिकारियों का यह पेट्रोलियम चाहिए। साथ ही वे यूरोप और जापान में अपने प्रतिद्वंद्वियों को इससे दूर रखना चाहते हैं।
इसी क्षेत्र में (उदाहरण के लिए बंगलादेश में) भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस उपलब्ध है। 21वीं शताब्दी पेट्रोलियम के मुकाबले कम नुकसानदायक तथा सस्ती गैस की शताब्दी होगी। यह माइक्रोचिप्स और बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े ज्ञान की शताब्दी होगी।
इस सबके पीछे अमरीका की स्थायी नीति काम कर रही है जिसके तहत वह भू-रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र (फिलिस्तीन सहित) पर जबर्दस्ती बर्चस्व कायम करना चाहता है ताकि जनसंख्या और क्षेत्र की दृष्टि से बड़े देशों : चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान तथा ऊर्जा स्रोत वाले देशों जैसे कि सउदी अरेबिया को डराया-धमकाया जा सके।
हम निम्नलिखित मुद्दों की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं :
संभवत: हमने समाज वैज्ञानिक तत्व पर पूरा विचार नहीं किया है। पहले विश्वयुध्द के बाद जो कुछ हुआ उसके बारे में मारियाटेगुई पहले ही बता चुके हैं। यूरोप में विषाक्त मानसिक वातावरण पैदा हो गया था जिसमें से फासीवाद का जन्म हुआ।
उग्र दक्षिणपंथियों और मियामी में उनके फासीवादी माफिया की चालबाजी और जादू से बेटे जार्ज बुश की सरकार सत्ता में आई। उसके सलाहकारों के समाज विज्ञान में दुस्साहस शामिल है।
लेनिन ने पूरी ताकत के साथ क्रांतिकारियों में अत्यधिक व्यक्तिपरकता की आलोचना की। ये व्यक्तिवादी लोग द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, वास्तविक और वस्तुपरक स्थितियों को भूल गए और सोचने लगे कि कोई छोटा सा एक समूह ऐतिहासिक परिवर्तन कर सकता है और वह भी अंधाधुंध हिंसा का सहारा लेकर।
पूंजीवाद आज भी इसलिए मौजूद है क्योंकि पूरी दुनिया में अवाम ने इसके स्थान पर अपनी सत्ता कायम करने में देरी कर दी। इस पूंजीवाद के बेकाबू होने का एक संकेत यह है कि उसके हृदय में फिर से प्रतिक्रियावादी किस्म की हलचलें पैदा होने लगी हैं। इनके
हामीदारों को नकारवादी नहीं कहा जा सकता। ये उसके उलट हैं। 19वीं शताब्दी के अंत में रूसी पोपुलिस्ट अनास्था सिखा रहे थे जबकि ये खुद को धार्मिक कट्टरपंथियों, रूढ़िवादियों के रूप में पेश कर रहे हैं। सबसे अधिक विख्यात मामला ओसामा बिन लादेन का है। उसने अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी ताकतों के खिलाफ अमरीका का साथ दिया था, उसकी मदद से सत्ता में आया। बाद में उसने 11 सितंबर 2001 को वहशियाना हमले कराए। इससे रूढ़िवादी तथा उतनी ही कट्टर लेकिन ईसाई बुश बेटे की ऐंग्लो-सेक्शन सरकार को पूरी दुनिया में सैनिक तानाशाही के लिए मुहिम चलाने का अच्छा बहाना मिल गया। इस बात को कोई भी नहीं मान सकता कि अमरीका के राष्ट्रपति दयालुतापूर्ण चरम-रूढ़िवाद के पक्षधर हैं।
संक्षेप में दुस्साहसवाद वाम और दक्षिण दोनों बिलकुल अलग राजनीतिक और सामाजिक ताकतों से पैदा हो सकती है। तो इसका क्या अर्थ निकाला
जाए?
यह व्यक्तिपरकता का अति प्रयोग है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक निर्णय निर्णय करने वाले व्यक्ति पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार उसके द्वारा देखा गया सत्य उसी तक सीमित रह जाता है। हीगेल और उसके बाद प्रोटागोरस का कथन है कि मनुष्य सभी चीजों का मापदंड है। इसकी दो व्याख्याएं हैं। एक, प्रतिक्रियावादी, आदर्शवादी जो ज्ञान को व्यक्ति के ज्ञान तक सीमित कर देती है। दूसरी क्रांतिकारी द्वंद्वात्मक और भौतिकवादी व्याख्या है क्योंकि वह मानव जाति को इतिहास के केंद्र में रखती है।
दुस्साहसवादी व्यक्तिपरकता से खुद को जोड़कर अमरीकी पूंजीपतियों के प्रभुत्वशाली हिस्से ने ऐंग्लो-अमरीकी व्यावहारिकता को छोड़ दिया है। यह व्यावहारिकता तर्कसंगत प्रत्यक्षवाद पर आधारित थी। इस प्रत्यक्षवाद ने ही काफी लंबे समय तक बुध्दिवादियों के विरोध में उनका आचरण तय किया। उन्होंने बुध्दिवादियों के इस दावे को दूषित बताया कि तर्क के अनुसार हमारा आत्म वास्तविकता की प्रतिकृति है।
अमरीका का वर्तमान शासक व्यावहारिकता का ही शत्रु नहीं है। वह बुध्दिवाद का भी शत्रु है क्योंकि वह मानता है कि वास्तविकता को उसकी इच्छा के हिसाब से मोड़ा जा सकता है।
यह स्थिति मार्क्सवाद-लेनिनवाद से मेल नहीं खाती। उसके अनुसार दर्शन का प्रमुख लक्ष्य संसार की व्याख्या करना नहीं बल्कि इतिहास के वस्तुपरक प्रयाण के अनुरूप उसका क्रांतिकारी कायाकल्प है। मार्क्सवादी-लेनिनवादी हीगेल के इस विचार को ग्रहण करते हैं कि बाध्दिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास मानव स्वतंत्रता अर्थात कम स्वतंत्रता से अधिक स्वतंत्रता की ओर जाने का रिकार्ड है। अवाम की भूमिका की बात कर वे इस विचार को वास्तविक अर्थ देते हैं। हीगेल इससे नफरत करता था।
इसके विपरीत फासीवादियों की कोशिश रहती है इस असंगत संसार में कुछ भी न बदले जिससे कि वे बॉस बने रहें, लोगों को आजादी न हो। 250 धनी लोगों की आय 2.5
अरब लोगों की आय के बराबर बनी रहे और जिससे मानव जाति के लुप्त हो जाने का खतरा बना रहे।
फासीवाद की प्रबल अनिवार्य मनोवैज्ञानिक विशेषता अर्थात उसका दुस्साहस ही हमेशा उसके पतन का कारण बनता है। लेकिन यह विचार सही नहीं है कि उसका पतन अपने आप होगा। सोवियत संघ के विभिन्न नेता लेनिन के मार्ग से भटक गए। उनके द्वारा की गई गलतियों के कारण मानवता ने 20वीं शताब्दी गंवा दी। फासीवाद के पहले मॉडल की पराजय से जो महान अवसर मिला था उसे उन्होंने गंवा दिया और मानव तर्क की सार्वभौमिक जीत होने से रह गई। सवाल 21वीं शताब्दी को गंवा देने का नहीं है। यहां तो हर दिन के नुकसान से धरती पर मानवता के अस्तित्व को खतरा बढ़ता जा रहा है।
फासीवाद बुर्जुआ लोकतंत्र के विपरीत है, हालांकि दोनों का ताल्लुक पूंजीवाद की अधिरचना (सुपर स्ट्रक्चर) से है।
इनमें अंतर कई रूपों में देखा जा सकता है जिसे कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। बुर्जुआ लोकतंत्र पूंजी के संचय और विस्तारित पुनरुत्पादन के आर्थिक तंत्र के भीतर उत्पादन के बुनियादी साधनों के मालिकों के वर्चस्व को कायम रखता है। फासीवाद गैर आर्थिक बलप्रयोग का अधिक आश्रय लेता है। बुर्जुआ लोकतंत्र सर्वसम्मति पर आधारित होता है लेकिन बीच-बीच में हिंसा (प्रदर्शनों और हड़तालों आदि का दमन) का सहारा लेता है। फासीवाद हिंसा का निरंतर प्रयोग या उसके प्रयोग का खतरा है।
बुर्जुआ लोकतंत्र नस्लवाद या विदेशी द्वेष का उन्मूलन तो नहीं करता लेकिन उसके खिलाफ कदम उठा सकता है। फासीवाद बहुत ऊंचे दर्जे का नस्लवाद और विदेशी द्वेष है।
बुर्जुआ लोकतंत्र युध्द कराता है लेकिन उनके बीच में शांति भी कायम करता है। सोवियत संघ रूपी गढ़ के कारण यूरोप की तीन पीढ़ियों ने युध्द नहीं देखा। सोवियत संघ और यूरोप में उसके द्वारा निर्मित समाजवादी शिविर के खत्म हो जाने के बाद यूगोस्लाविया के टूटने के साथ युध्द शुरू हो गया। फासीवाद निरंतर और स्थायी युध्द है। शांति केवल युध्द विराम होती है।
चेग्वेरा द्वारा दी गई जबर्दस्त परिभाषा बार-बार चरितार्थ होती है : जब तक अवाम का डर नहीं होता तब तक बुर्जुआ लोकतंत्र का सहारा लेता है। जब उसे उनका डर लगने लगता है तो वह फासीवाद की ओर चला जाता है।
बुर्जुआ लोकतंत्र को बरकरार रखने वाले शासन बहुत सी बातों का ध्यान रखते हैं। फासीवादी की ओर झुके शासन स्वभाव से ही दुस्साहसी होते हैं। यह दुस्साहस उनके अक्खड़पन, दूसरों के प्रति उनकी नफरत, अपनी वहशी ताकत के ज्यादा अनुमान तथा दूसरों की क्षमता के कम अनुमान से पैदा होता है।
दुस्साहस और फासीवाद के ताल्लुक का यदि विश्लेषण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अपने वहशीपन के पोषण के लिए दोनों झूठ और मसीहा के मनोविज्ञान का सहारा लेते हैं। पहले हिटलर ने जर्मनी के लिए जरूरी 'जगह' तथा 'अयोग्यों' को खत्म करने और 'सुपरमैन' उत्पन्न करने वाली 'नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के बारे में झूठ बोला।
आज (ब्लेयर, अजनार और बेरलुस्कोनी जो ब्रिटिश, स्पेनिश और इतालवी अवाम से कट गए हैं के समर्थन से) बुश स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकार कायम करने की अपनी दिव्य नियति तथा इराक और अन्य देशों में मौजूद आम विनाश के हथियारों के बारे में झूठ बोल रहा है। ऐसे हथियार कहीं नहीं थे।
फासीवादी अवधारणा के अंतर्गत वित्तीय कुलीन तंत्र के सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी तबके की सत्ता की रक्षा के लिए हर चीज में गैर आर्थिक हिंसा का सहारा लिया जाता है। यह अवधारणा किसी राष्ट्र, प्रजाति या धर्म के प्रतिनिधि के रूप में खुद को विशुध्द बताने वाले लोगों की दूसरे राष्ट्रों, प्रजातियों या धर्मों के प्रति नफरत पर आधारित है। यह सभ्यताओं के टकराव का मसला है। जोसे मारती ने इस बारे में कहा है कि यह उपनिवेशवादियों का विश्वासघाती बहाना है।
दुस्साहस विदेशी-द्वेष, नस्लवाद या धार्मिक असहिष्णुता से खुराक लेता है तथा उसमें कमांड और आदेश देने की उन्मादपूर्ण ललक होती है। उसे यह विश्वास होता है कि दूसरों पर आसानी से वर्चस्व कायम किया जा सकता है।
समकालीन इतिहास से कुछ उदाहरण
मूल फासीवादियों का दुस्साहस इस विचारधारा से जुड़ी तीन शक्तियोंनाजी जर्मनी, मुसोलिनी के इटली और सैन्यवादी जापानके आचरण में प्रकट हुआ। जर्मनी ने ग्रेट ब्रिटेन पर हमला करने से पूर्व सोवियत संघ पर हमला किया जहां उसे रोक लिया गया। इटली एबिसिनिया (इथियोपिया) को जीतना चाहता था लेकिन उसके पास आवश्यक सेना नहीं थी। जापान ने ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका के एशियाई उपनिवेशों पर ध्यान केंद्रित कर दिया जिसकी वजह से वह स्तालिनग्राद की निर्णायक लड़ाई में जर्मनी की सहायता के लिए नहीं आ सका। तीन फासीवादी ताकतों की यह निर्णायक पराजय सिध्द हुई।
व्यावहारिकता का परिचय देते हुए अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने सोवियत नेता स्तालिन के साथ संधि की। इनके गंठजोड़ ने जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी गुट को पराजित किया। फासीवाद के विनाश में सोवियत अवाम की प्रमुख भूमिका रही। उसने अपने एक बटा पांच सपूत इसमें बलि चढ़ा दिए। यह संख्या अमरीका और ग्रेट ब्रिटेन की संख्या से कहीं अधिक थी। फासीवाद की दुस्साहसी प्रवृत्ति की उपेक्षा करके यदि स्तालिन हिटलर के साथ युध्द न करने का करार करने की भूल नहीं करते तो जान-माल का इतना नुकसान नहीं होता।
दोहरा तत्व : सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी के मजबूत होने, तीसरी दुनिया के देशों की स्वतंत्रता प्रक्रिया तथा चीन, वियतनाम और क्यूबा में वास्तविक सामाजिक क्रांतियों के कारण अमरीका को कलह की रणनीति पर आना पड़ा। इसके भीतर वे लोग भी थे जो समाजवाद के विध्वंस तथा उपनिवेशवाद और नव उपनिवेशवाद से मुक्त देशों की स्वतंत्रता की रणनीति के पक्षधर थे। समाजवाद के सोवियत मॉडल तथा सोवियत संघ सहित इसके शासनों के समाप्त हो जाने के बाद ये दोनों रणनीतियां जारी रहीं। इन्हें अंग्रेजी में 'कंटेनमेंट (घेराबंदी)' और 'रोल बैक (पलट देना)' कहा जाता है। रीगन, पिता बुश और क्लिंटन ने पहली रणनीति अपनाई। लेकिन बेटा बुश उस हर चीज को नष्ट करने की रणनीति अपना रहा है जो स्वतंत्र रास्ता अख्तियार कर रही है (फ्रांस और जर्मनी सहित) या सामाजिक प्रगति की ओर जा रही है।
अमरीकी केंद्र (विश्व अर्थव्यवस्था का एक तिहाई, विश्व व्यापार का 18 प्रतिशत, शेष दुनिया से बड़ा सेना बजट, डालर का सार्वभौमिक मुद्रा बनना, जिस पर यूरो के आने से प्रश्न चिह्न लग गया है, आदि) वाली एक ध्रुवीय दुनिया तो स्थापित हो गई है लेकिन इस बात को लेकर सतर्कता भी है कि दुनिया का फिर बहु धु्रवीय होना तय है जिसका एक धु्रव चीन होगा और साथ ही तीसरी दुनिया के देश विशेषकर क्यूबाई क्रांति के पीछे पड़े हमारे अमरीका के देश फिर से ऐतिहासिक पहल करेंगे। इसकी वजह से नव फासीवाद की समस्याएं तथा इसका जन विरोधी मनोविज्ञान जगजाहिर हो रहा है। सिएटल तथा अन्य कई शहरों में पूंजीवाद का जबर्दस्त विरोध हुआ जिसके केंद्र में अमरीकी अवाम का अत्यधिक सतर्क तबका था। इसकी वजह से अति दक्षिणपंथी अमरीकी तबके में हर तरीके से सत्ता लेने की हड़बड़ी पैदा हो गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अमरीकी लोग विश्व क्रांति के लिए आरक्षी सेना में शामिल हो सकते हैं। लूट तथा गुलाम बनाने के लिए अपनी ही सरकार द्वारा चलाए जा रहे युध्दों को रोकने के संघर्ष में शामिल हो सकते हैं। बेटे बुश के नेतृत्व में जो दुस्साहसवादी शासन स्थापित हुआ है उसने अमरीकी साम्राज्यवाद के पक्षधर लोगों की भाषा ही बदल दी है। इस भाषा में अधिक ढिठाई आ रही है।
9 अक्टूबर 2001 को वॉल स्ट्रीट जरनल ने लिखा : 'आतंकवाद का जवाब? उपनिवेशवाद।' अमरीकी बैंकरों के महत्वपूर्ण स्वर के रूप में फाइनेंसियल टाइम्स ने 10 अक्टूबर 2001 को लिखा : 'हमें साम्राज्यवाद की जरूरत है।' इसके 19 दिन बाद वाशिंगटन पोस्ट ने दृढ़ता के साथ कहा : 'हमें संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक जैसी उपनिवेशवाद के बाद की संस्थाओं को नया साम्राज्यवादी आवेग देना चाहिए।' 17 जुलाई 2003 को अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा, 'आज अंतर्राष्ट्रीय नीति के तहत इससे खतरनाक सिध्दांत नहीं हो सकता कि अमरीकी शक्ति के खिलाफ प्रतिस्पर्धी शक्तियां हों।'
लेबर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता रॉबर्ट कॉपर ने लंदन ऑब्जर्वर में और भी साफ तौर पर कहा, 'आज उपनिवेशवाद की पहले से ज्यादा जरूरत है। विश्व में व्यवस्था पैदा करने
तथा उसे संगठित करने के लिए हमें नव साम्राज्यवाद की जरूरत है।' दुस्साहसवादी भावना डब्ल्यू.टी.ओ. के दोनों टावरों के गिरने के बाद अचानक नहीं आई। वह शीत युध्द के शुरू होने से परिपक्व हो रही थी। इसी भावना के अनुरूप अमरीकी संयुक्त सेना कमान के प्रमुख हेनरी शेल्टन ने कहा, 'अमरीका को निरंकुश पूर्ण आधिपत्य कायम करना चाहिए।' शांति, स्वतंत्रता और प्रगति के लिए दुनिया के देशों के लोगों की इच्छा तथा अमरीकी अवाम की लोकतांत्रिक उपलब्धियोंजो कि देश में फासीवादी दृष्टिकोण को लागू करने की दिशा में जबर्दस्त बाधा हैको चुनौती देते हुए सी.आई.ए. के प्रचालन निदेशक क्रोंगर ने हाल ही में कहा : 'आज एक ही नियम मौजूद है और वह यह कि कोई नियम नहीं है।'
नव उदार फासीवाद के पुराने समर्थक तथा कोंडोलीजा राइस के साथी बिगनीव ब्रजेजिंस्की ने पूरी साफगाई के साथ लिखा : 'अमरीका का लक्ष्य अपने दासों को अधीन बनाए रखना, जनता की आज्ञापरायणता और सुरक्षा की गारंटी तथा असभ्यों को एकजुट होने से रोक होना चाहिए।'1
अमरीकी दुस्साहस की सर्वाधिक स्पष्ट मौजूदा मिसालें हैंइराक के खिलाफ युध्द और एफ.टी.टी.ए.।
संयुक्त राष्ट्र संघ से नफरत करने वाले तथा फासीवादी दुस्साहस के पैरोकार सी.आई.ए., पेंटागन और व्हाइट हाउस के दबदबे के कारण ही अमरीकी सरकार ने यह सोचा था कि इराक की बहुसंख्यक शिया जनसंख्या फूलों के साथ अमरीकी सैनिकों का स्वागत करेगी क्योंकि उन्होंने सुन्नियों का दमन सहा है। लेकिन शिया यह देखकर पूरा विरोध कर रहे हैं कि बुश ईरान जैसा शिया शासन यहां कायम नहीं कर सकता। साथ ही कुर्दों के इस्तेमाल से तुर्की के साथ अनसुलझी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
अमरीकी दमन कर रहे हैं। बच्चों को मारते समय वे धर्म का भेद नहीं करते। इसी कारण विरोध की भावना बढ़ रही है और वह देशभक्ति का रूप ले रही है। इसमें शिया लोग शामिल हो रहे होंगे। यदि ऐसा नहीं होता तो बगदाद तथा दूसरे शहरों, जहां वे बहुसंख्या में हैं, में विरोध नहीं होता। जिन देशों को खतरा है वे भी विरोध के लिए तैयार हैं। स्वतंत्र, प्रभुत्ता संपन्न समाजवादी क्यूबा, फिदेल, राउल, पार्टी, यू.जे.सी., उसका जन संगठन और उसकी सशस्त्र सेनाएं पूरी जनता के युध्द के लिए तैयार हैं। प्लाया गिरोन की तरह विजय हमारी होगी।
एफ.टी.टी.ए. भी दुस्साहस का चिह्न है जो बुश की हार का कारण बनेगा। कमांडर-इन-चीफ ने कहा है, 'यदि अमरीकी साम्राज्यवाद हमारे अमरीका को निगलता है तो वह उसे पचा नहीं पाएगा।' जैसा कि वेनेजुएला से प्रकट हो रहा है और ब्राजील, अजर्ेंटीना, बोलिविया तथा अन्य बहुत से देशों में गंभीर परिवर्तनों से साफ हो रहा है, दुस्साहस का समय खत्म हो गया है। लेकिन अमरीका के अवाम को इस छलावे से मुक्त होना होगा तथा समकालीन इतिहास के सबसे बड़े दुस्साहसी के भाग्य का फैसला करना होगा।
डॉ. राउल वालदेस विवो,
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा के हायर पार्टी स्कूल के रेक्टर)
जनवरी 2004
( नवउदारवाद का फासीवादी चेहरा,फिदेल कास्त्रो,अनुवाद,रामकिशन गुप्ता,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली-110092,फोन-22025140,65179059)
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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27.7.10
हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला
हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रखना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देख सकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
Posted by
जगदीश्वर चतुर्वेदी
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Labels: फासीवाद, मासकल्चर, साम्प्रदायिकता
8.7.10
हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला
हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रखना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देख सकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
लेखक- रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष
चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092, मूल्य -275
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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21.6.10
आरएसएस का मुस्लिम विद्वेष और फासिस्ट कल्पनाएं
सारी दुनिया में फासीवादी संगठनों के वैचारिक अस्त्र एक जैसे हैं। फासीवादियों में विश्वव्यापी एकता वैसे ही है जैसे पूंजीपतियों में होती है। फासीवादी संगठनों का जनाधार विभिन्न अल्पसंख्यक जातीय समूहों के प्रति घृणा पैदा करके बढ़ता है। फासीवादी संगठनों की विचारधारा की धुरी है नस्लवाद।
संघ परिवार के अनुसार भारत में रहने वाले मुसलमान राष्ट्रद्रोही हैं। वह सभी गैर हिन्दुओं को विदेशी मानता है और उन्हें किसी भी तरह के मानवाधिकार देने के पक्ष में नहीं है। संघी उन देशभक्त मुस्लिम नेताओं को भी राष्ट्रद्रोही कहते हैं जिनकी कुर्बानियों के सामने संघ के किसी भी बड़े नेता ने कुर्बानी नहीं दी हैं।
गोलवलकर ने अपनी किताब ‘ हम अथवा हमारा राष्ट्रीयत्व परिभाषित’ में मुसलमानों के बारे में लिखा ‘ ऐसे पराए लोगों के लिए दो ही मार्ग खुले होते हैं। एक यह कि वे राष्ट्रीय संस्कृति को स्वीकार कर उसके साथ एकरूप हो जाएं और दूसरा यह कि वे राष्ट्र की अनुमति लेकर ही देश में रहें तथा जब राष्ट्र यह अनुमति वापस ले ले, तब देश को छोड़कर चले जाएं। अल्पसंख्यकों के प्रश्न के संबंध में यही उचित दृष्टिकोण है। इस प्रश्न का न्यायसंगत उत्तर भी यही है।’
समस्या यह है कि संघ परिवार अपनी अल्पसंख्यक विरोधी मुहिम कब तक चलाता रहेगा। हमारे अनुसार यह अभियान तब तक चलेगा जब तक पाकिस्तान समाप्त नहीं हो जाता और अखंड भारत नहीं बन जाता। इसका अर्थ यह भी है इस कल्पना का साकार होना असंभव है,असंभव और अवैज्ञानिक कल्पनाओं में अपने अनुयायियों को व्यस्त रखना संघ की फासिस्ट कला है।
संघ परिवार का मानना है कि भारत की संस्कृति,परंपरा आदि का उत्तराधिकारी सिर्फ हिन्दू ही हो सकता है,गैर हिन्दुओं को यह हक नहीं है। क्योंकि हिन्दू ही भारतीय है। गैर हिन्दुओं को संघ परिवार भारतीय नहीं मानता।
संघी प्रवक्ता के शब्दों में ‘ कोई भी सच्चा भारतीय,जो भारतवर्ष के वेदांग, उपनिषद, गीत, पुराण,दर्शन,संस्कृति और कला का उत्तराधिकारी है,हिन्दू है। केवल तभी जब हिन्दू परिवार में पैदा हुआ कोई व्यक्ति अपने सांस्कृतिक अतीत को अस्वीकार कर देता है या मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति ,अपनी राष्ट्रीय मूल जड़ों से अपने को अलग कर सिर्फ कुरान पर ही भरोसा करता है अथवा ईसाई परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति केवल पाश्चात्य साहबों और मेम साहबों की नकल करता है और जिसमें राष्ट्रीय आत्म-सम्मान नहीं होता तथा जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में गहराई में नहीं जातीं,वह भारतीय नहीं रह जाता और इस तरह मातृभूमि की सच्ची संतान नहीं रह जाता।’
क्या संघी नेता भूल गए हैं कि भारत का संविधान किसे भारतीय मानता है ? भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय है चाहे उसका धर्म कोई भी हो। संविधान के अनुसार उसे सभी नागरिक हक प्राप्त हैं। संघ की यह धारणा गलत है कि सिर्फ हिन्दू ही देशप्रेमी हो सकता है। यह सोच भी गलत और असंवैधानिक है कि भारत में रहना है तो हिन्दू धर्म को मानना होगा। यह फासिस्ट सोच है।
भारत में सैंकडों सालों से आस्तिक और नास्तिकों की परंपरा रही है। भारत के श्रेष्ठतम ज्ञानसर्जक नास्तिक और अनीश्वरवादी थे। गैर-हिन्दू परंपराओं और संस्कृतियों का भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा असर रहा है। भारत का सामाजिक,धार्मिक और सास्कृतिक तानाबाना सिर्फ हिन्दुओं और हिन्दूधर्म ने नहीं रचा है। इसमें गैर हिन्दुओं की हमेशा से बड़ी भूमिका रही है। भारत कभी सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं रहा बल्कि सदियों से गैर हिन्दू यहां निवास करते आ रहे हैं। ये वे लोग हैं जो मुसलमान कौम के उदय के पहले से भारत में रह रहे हैं।
भारतीय समाज में गैरहिन्दुओं के प्रति गैर बराबरी की परंपरा क्षीण रही है। बल्कि इसके विपरीत गैर हिन्दुओं से सीखने,ज्ञान ,संगीत ,स्थापत्य ,ज्योतिष, साहित्य की धारणाएं लेने की परंपरा ज्यादा प्रबल रही है। हिन्दुओं ने अन्यों को जितना दिया है उससे ज्यादा लिया है। इस प्रक्रिया में भारत का मिश्रित समाज बना है। मिश्रित संस्कृति बनी है। भारत कभी भी शुद्ध हिन्दू समाज नहीं था। भारत में कभी शुद्ध हिन्दू संस्कृति नहीं रही है। संस्कृति कभी शुद्ध एक समुदाय द्वारा नहीं बनती बल्कि उसमें समूचे समाज की भूमिका रहती है। शुद्ध हिन्दू समाज की खोज संघ के सरसंघचालकों की फासिस्ट कल्पना की सृष्टि है।
वे इसके लिए कुतर्क गढ़ते रहे हैं और गैर हिन्दुओं को समय-समय पर हिंसाचार का शिकार बनाते रहे हैं। यदि संघ अपनी इस फासिस्ट कल्पना को त्याग दे तो देश में शांति और सदभाव स्थापित हो जाए।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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18.6.10
संघ परिवार का संविधान विरोधी खेल
भारत में आरएसएस सबसे बड़ा फासीवादी संगठन है। कहने को यह संगठन अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन इसका बुनियादी लक्ष्य है भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना। कांग्रेस पार्टी समय-समय पर संघ परिवार के सामने समर्पण करती रही है। कांग्रेस की नीतियां उदार रही हैं,उसका बुनियादी चरित्र ढुलमुल धर्मनिरपेक्ष है।
लेकिन कांग्रेस में उदार और अनुदार दोनों ही किस्म के लोग हैं। कांग्रेस की नीतियां समय-समय पर पापुलिज्म के दबाब में आती रही हैं। यही वजह है कांग्रेस का राष्ट्रीय चरित्र अनेक बार कई मसलों पर उसकी स्थानीय इकाईयों और नेताओं की भूमिका के साथ मेल नहीं खाता। कांग्रेस इन दिनों नव्य-उदारवादी आर्थिक नीतियों के दबाब में है और इन नीतियों का गहरा असर संघ परिवार से भी है। जहां-जहां ये नीतियां लागू हुई हैं वहां अनुदारवादी राजनीति को इससे मदद मिली है। अनुदार या कंजरवेटिव मसले संघ के एजेण्डे पर आए हैं।
कंजरवेटिव राजनीति और फासीवाद का गहरा संबंध है। सारी दुनिया में फासीवादी ताकतों के उदारवादी पूंजीवाद का विरोध किया था और आज भी कर रहे हैं। भारत में बिहार के 1974 के जेपी आंदोलन और 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में संघ परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी, नरेद्र मोदी,लालूयादव,नीतीश कुमार आदि उसी समय की राजनीतिक खेती की देन हैं।
सन् 1974 में संघ परिवार ‘इन्दिरा गांधी हटाओ देश बचाओ ’ के नारे लगाने वालों में सबसे आगे था। यही संघ परिवार जून 1975 में आपात्काल लगते ही इंदिरा का भक्त हो गया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक ने इन्दिरा गांधी को आपात्काल लागू करने के लिए पूरे सहयोग का वादा किया था,आपात्काल का समर्थन किया था। उल्लेखनीय है उस समय संघ पर केन्द्र सरकार ने पाबंदी लगा दी थी।
आपात्काल में जनता के सभी अधिकार छीन लिए गए थे, विपक्ष के सभी नेता जेलों में बंद थे,संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ता जेलों में बंद थे, इसके बावजूद संघ परिवार ने आपात्काल में सहयोग का प्रस्ताव देकर अपने बुनियादी जनतंत्र विरोधी और अधिनायकवादी नजरिए का प्रतिपादन किया था। संघ परिवार का ऐसा करना उसके उदारवाद विरोधी राजनीतिक नजरिए का हिस्सा है।
इसी प्रसंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फासीवाद के निर्माताओं के उदारतावाद विरोधी नजरिए को देखें तो पता चलेगा कि संघ परिवार का देशी विचारों का दावा गलत है और वह फासीवाद के विदेशी विचारों का प्रचारक-प्रसारक है।
फासीवादी संगठनों का प्रधान शत्रु है मार्क्सवाद। मार्क्सवाद को विध्वस्त करने के लिए उदार पूंजीवाद पर हमला करना जरूरी है। क्योंकि उदार पूंजीवादी वातावरण में मार्क्सवाद फलता-फूलता है। सारी दुनिया में समाजवाद के पराभव में मार्क्सवाद की आंतरिक कमजोरियों के साथ उदार पूंजीवाद विरोधी नीतिगत रूझानों की बड़ी भूमिका है। मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको ने जमकर उदार पूंजीवाद का विरोध किया था। भारत में संघ परिवार के अनुदारवादी राजनीतिक नजरिए के ये ही मार्गदर्शक हैं।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक किताब में लिखा है कि फासीवाद के तीन तिलंगों मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको द्वारा ‘‘ उदारवाद की आलोचना इस विचार पर आधारित है कि उदार राज्य मार्क्सवाद के खिलाफ प्रभावी संघर्ष में असमर्थ है। राजनीतिक स्तर पर उदार राज्य की जन्मजात कमजोरी उसे मार्क्सवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाने से रोकती है।
विचारधारा के स्तर पर न्याय संगत परिवेश के दर्शन के पास बृहत्तर जनता को आकर्षित करने वाली कोई जीवंतता नहीं है। मुसोलिनी अपने वक्तव्यों में उदार राज्य की कृतियों और सिद्धांत की नपुंसकता की भर्त्सना करता है। हिटलर घोषित करता है : 'एक ऐसा राज्य जो एक कोढी, मार्क्सवाद वास्तव में यही तो है, के विकास को नहीं रोक सका वह भविष्य के किसी अवसर का क्या इस्तेमाल कर पायेगा।’’ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमाम भाषण मुसोलिनी की इसी हुंकारभरी शैली में ही होते हैं।
भारत में संघ परिवार समानता के सिद्धांत का विरोध करता है और राष्ट्रवाद, वर्णव्यवस्था और हिन्दू वर्चस्व को नैसर्गिक मानता है। अगर हम इन चीजों को नैसर्गिक मान लेंगे तो फिर समानता की सभी बातें खोखली हैं। समानता को सही रूपों में लागू करने के लिए वर्णव्यवस्था,जातिप्रथा, राष्ट्रवाद और हिन्दू वर्चस्व या धार्मिक वर्चस्व की धारणा को त्यागना जरूरी है। अगर कोई संगठन इन चीजों में विश्वास करता है तो वह स्वभावतः संविधान विरोधी राजनीतिक भूमिका निभाता है। इस अर्थ में भारत के संविधान की बुनियादी स्प्रिट के साथ संघ परिवार का कोई मेल नहीं बैठता। भारत का संविधान उदार पूंजीवाद की शानदार अभिव्यक्ति है। जबकि फासीवाद को उदार पूंजीवाद से घृणा है।
किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
लेखक- रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष
चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092, मूल्य -275
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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