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27.7.10

हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला

             हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
     तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
     संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
     संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
  हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
    संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा  देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
     आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
   हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
   हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
     वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
    हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
     फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने  ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर  लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देसकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
    
          

8.7.10

हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला

    हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
     तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
     संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
     संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
  हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
    संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा  देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
     आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
   हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
   हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
     वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
    हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
     फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने  ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर  लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देसकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
    
          किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष   
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275 














21.6.10

आरएसएस का मुस्लिम विद्वेष और फासिस्ट कल्पनाएं

     सारी दुनिया में फासीवादी संगठनों के वैचारिक अस्त्र एक जैसे हैं। फासीवादियों में विश्वव्यापी एकता वैसे ही है जैसे पूंजीपतियों में होती है। फासीवादी संगठनों का जनाधार विभिन्न अल्पसंख्यक जातीय समूहों के प्रति घृणा पैदा करके बढ़ता है। फासीवादी संगठनों की विचारधारा की धुरी है नस्लवाद।
     संघ परिवार के अनुसार भारत में रहने वाले मुसलमान राष्ट्रद्रोही हैं। वह सभी गैर हिन्दुओं को विदेशी मानता है और उन्हें किसी भी तरह के मानवाधिकार देने के पक्ष में नहीं है। संघी उन देशभक्त मुस्लिम नेताओं को भी राष्ट्रद्रोही कहते हैं जिनकी कुर्बानियों के सामने संघ के किसी भी बड़े नेता ने कुर्बानी नहीं दी हैं।
   गोलवलकर ने अपनी किताब ‘ हम अथवा हमारा राष्ट्रीयत्व परिभाषित’ में मुसलमानों के बारे में लिखा ‘ ऐसे पराए लोगों के लिए दो ही मार्ग खुले होते हैं। एक यह कि वे राष्ट्रीय संस्कृति को स्वीकार कर उसके साथ एकरूप हो जाएं और दूसरा यह कि वे राष्ट्र की अनुमति लेकर ही देश में रहें तथा जब राष्ट्र यह अनुमति वापस ले ले, तब देश को छोड़कर चले जाएं। अल्पसंख्यकों के प्रश्न के संबंध में यही उचित दृष्टिकोण है। इस प्रश्न का न्यायसंगत उत्तर भी यही है।’
 समस्या यह है कि संघ परिवार अपनी अल्पसंख्यक विरोधी मुहिम कब तक चलाता रहेगा। हमारे अनुसार यह अभियान तब तक चलेगा जब तक पाकिस्तान समाप्त नहीं हो जाता और अखंड भारत नहीं बन जाता। इसका अर्थ यह भी है इस कल्पना का साकार होना असंभव है,असंभव और अवैज्ञानिक कल्पनाओं में अपने अनुयायियों को व्यस्त रखना संघ की फासिस्ट कला है। 
    संघ परिवार का मानना है कि भारत की संस्कृति,परंपरा आदि का उत्तराधिकारी सिर्फ हिन्दू ही हो सकता है,गैर हिन्दुओं को यह हक नहीं है। क्योंकि हिन्दू ही भारतीय है। गैर हिन्दुओं को संघ परिवार भारतीय नहीं मानता।
    संघी प्रवक्ता के शब्दों में ‘ कोई भी सच्चा भारतीय,जो भारतवर्ष के वेदांग, उपनिषद, गीत, पुराण,दर्शन,संस्कृति और कला का उत्तराधिकारी है,हिन्दू है। केवल तभी जब हिन्दू परिवार में पैदा हुआ कोई व्यक्ति अपने सांस्कृतिक अतीत को अस्वीकार कर देता है या मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति ,अपनी राष्ट्रीय मूल जड़ों से अपने को अलग कर सिर्फ कुरान पर ही भरोसा करता है अथवा ईसाई परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति केवल पाश्चात्य साहबों और मेम साहबों की नकल करता है और जिसमें राष्ट्रीय आत्म-सम्मान नहीं होता तथा जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में गहराई में नहीं जातीं,वह भारतीय नहीं रह जाता और इस तरह मातृभूमि की सच्ची संतान नहीं रह जाता।’
     क्या संघी नेता भूल गए हैं कि भारत का संविधान किसे भारतीय मानता है ? भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय है चाहे उसका धर्म कोई भी हो। संविधान के अनुसार उसे सभी नागरिक हक प्राप्त हैं। संघ की यह धारणा गलत है कि सिर्फ हिन्दू ही देशप्रेमी हो सकता है। यह सोच भी गलत और असंवैधानिक है कि भारत में रहना है तो हिन्दू धर्म को मानना होगा। यह फासिस्ट सोच है।
    भारत में सैंकडों सालों से आस्तिक और नास्तिकों की परंपरा रही है। भारत के श्रेष्ठतम ज्ञानसर्जक नास्तिक और अनीश्वरवादी थे। गैर-हिन्दू परंपराओं और संस्कृतियों का भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा असर रहा है। भारत का सामाजिक,धार्मिक और सास्कृतिक तानाबाना सिर्फ हिन्दुओं और हिन्दूधर्म ने नहीं रचा है। इसमें गैर हिन्दुओं की हमेशा से बड़ी भूमिका रही है। भारत कभी सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं रहा बल्कि सदियों से गैर हिन्दू यहां निवास करते आ रहे हैं। ये वे लोग हैं जो मुसलमान कौम के उदय के पहले से भारत में रह रहे हैं।
    भारतीय समाज में गैरहिन्दुओं के प्रति गैर बराबरी की परंपरा क्षीण रही है। बल्कि इसके विपरीत गैर हिन्दुओं से सीखने,ज्ञान ,संगीत ,स्थापत्य ,ज्योतिष, साहित्य की धारणाएं लेने की परंपरा ज्यादा प्रबल रही है। हिन्दुओं ने अन्यों को जितना दिया है उससे ज्यादा लिया है। इस प्रक्रिया में भारत का मिश्रित समाज बना है। मिश्रित संस्कृति बनी है। भारत कभी भी शुद्ध हिन्दू समाज नहीं था। भारत में कभी शुद्ध हिन्दू संस्कृति नहीं रही है। संस्कृति कभी शुद्ध एक समुदाय द्वारा नहीं बनती बल्कि उसमें समूचे समाज की भूमिका रहती है। शुद्ध हिन्दू समाज की खोज संघ के सरसंघचालकों की फासिस्ट कल्पना की सृष्टि है।        
वे इसके लिए कुतर्क गढ़ते रहे हैं और गैर हिन्दुओं को समय-समय पर हिंसाचार का शिकार बनाते रहे हैं। यदि संघ अपनी इस फासिस्ट कल्पना को त्याग दे तो देश में शांति और सदभाव स्थापित हो जाए।






18.6.10

संघ परिवार का संविधान विरोधी खेल



           भारत में आरएसएस सबसे बड़ा फासीवादी संगठन है। कहने को यह संगठन अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन इसका बुनियादी लक्ष्य है भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना। कांग्रेस पार्टी समय-समय पर संघ परिवार के सामने समर्पण करती रही है। कांग्रेस की नीतियां उदार रही हैं,उसका बुनियादी चरित्र ढुलमुल धर्मनिरपेक्ष है।
     लेकिन कांग्रेस में उदार और अनुदार दोनों ही किस्म के लोग हैं। कांग्रेस की नीतियां समय-समय पर पापुलिज्म के दबाब में आती रही हैं। यही वजह है कांग्रेस का राष्ट्रीय चरित्र अनेक बार कई मसलों पर उसकी स्थानीय इकाईयों और नेताओं की भूमिका के साथ मेल नहीं खाता। कांग्रेस इन दिनों नव्य-उदारवादी आर्थिक नीतियों के दबाब में है और इन नीतियों का गहरा असर संघ परिवार से भी है। जहां-जहां ये नीतियां लागू हुई हैं वहां अनुदारवादी राजनीति को इससे मदद मिली है। अनुदार या कंजरवेटिव मसले संघ के एजेण्डे पर आए हैं।
    कंजरवेटिव राजनीति और फासीवाद का गहरा संबंध है। सारी दुनिया में फासीवादी ताकतों के उदारवादी पूंजीवाद का विरोध किया था और आज भी कर रहे हैं। भारत में बिहार के 1974 के जेपी आंदोलन और 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में संघ परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी, नरेद्र मोदी,लालूयादव,नीतीश कुमार आदि उसी समय की राजनीतिक खेती की देन हैं।
    सन् 1974 में संघ परिवार ‘इन्दिरा गांधी हटाओ देश बचाओ ’ के नारे लगाने वालों में सबसे आगे था। यही संघ परिवार जून 1975 में आपात्काल लगते ही इंदिरा का भक्त हो गया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक ने इन्दिरा गांधी को आपात्काल लागू करने के लिए पूरे सहयोग का वादा किया था,आपात्काल का समर्थन किया था। उल्लेखनीय है उस समय संघ पर केन्द्र सरकार ने पाबंदी लगा दी थी।
      आपात्काल में जनता के सभी अधिकार छीन लिए गए थे, विपक्ष के सभी नेता जेलों में बंद थे,संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ता जेलों में बंद थे, इसके बावजूद संघ परिवार ने आपात्काल में सहयोग का प्रस्ताव देकर अपने बुनियादी जनतंत्र विरोधी और अधिनायकवादी नजरिए का प्रतिपादन किया था। संघ परिवार का ऐसा करना उसके उदारवाद विरोधी राजनीतिक नजरिए का हिस्सा है।
     इसी प्रसंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फासीवाद के निर्माताओं के उदारतावाद विरोधी नजरिए को देखें तो पता चलेगा कि संघ परिवार का देशी विचारों का दावा गलत है और वह फासीवाद के विदेशी विचारों का प्रचारक-प्रसारक है।
    फासीवादी संगठनों का प्रधान शत्रु है मार्क्सवाद। मार्क्सवाद को विध्वस्त करने के लिए उदार पूंजीवाद पर हमला करना जरूरी है। क्योंकि उदार पूंजीवादी वातावरण में मार्क्सवाद फलता-फूलता है। सारी दुनिया में समाजवाद के पराभव में मार्क्सवाद की आंतरिक कमजोरियों के साथ उदार पूंजीवाद विरोधी नीतिगत रूझानों की बड़ी भूमिका है। मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको ने जमकर उदार पूंजीवाद का विरोध किया था। भारत में संघ परिवार के अनुदारवादी राजनीतिक नजरिए के ये ही मार्गदर्शक हैं।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक किताब में लिखा है कि फासीवाद के तीन तिलंगों मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको द्वारा ‘‘ उदारवाद की आलोचना इस विचार पर आधारित है कि उदार राज्य मार्क्सवाद के खिलाफ प्रभावी संघर्ष में असमर्थ है। राजनीतिक स्तर पर उदार राज्य की जन्मजात कमजोरी उसे मार्क्सवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाने से रोकती है।
     विचारधारा के स्तर पर न्याय संगत परिवेश के दर्शन के पास बृहत्तर जनता को आकर्षित करने वाली कोई जीवंतता नहीं है। मुसोलिनी अपने वक्तव्यों में उदार राज्य की कृतियों और सिद्धांत की नपुंसकता की भर्त्सना करता है। हिटलर घोषित करता है : 'एक ऐसा राज्य जो एक कोढी, मार्क्सवाद वास्तव में यही तो है, के विकास को नहीं रोक सका वह भविष्य के किसी अवसर का क्या इस्तेमाल कर पायेगा।’’ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमाम भाषण मुसोलिनी की इसी हुंकारभरी शैली में ही होते हैं।
     भारत में संघ परिवार समानता के सिद्धांत का विरोध करता है और राष्ट्रवाद, वर्णव्यवस्था और हिन्दू वर्चस्व को नैसर्गिक मानता है। अगर हम इन चीजों को नैसर्गिक मान लेंगे तो फिर समानता की सभी बातें खोखली हैं। समानता को सही रूपों में लागू करने के लिए वर्णव्यवस्था,जातिप्रथा, राष्ट्रवाद और हिन्दू वर्चस्व या धार्मिक वर्चस्व की धारणा को त्यागना जरूरी है। अगर कोई संगठन इन चीजों में विश्वास करता है तो वह स्वभावतः संविधान विरोधी राजनीतिक भूमिका निभाता है। इस अर्थ में भारत के संविधान की बुनियादी स्प्रिट के साथ संघ परिवार का कोई मेल नहीं बैठता। भारत का संविधान उदार पूंजीवाद की शानदार अभिव्यक्ति है। जबकि फासीवाद को उदार पूंजीवाद से घृणा है।

            किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष    
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275 
  

2.8.08

हिन्दुओ तुम विवाद पैदा करते हो

बम-धमाके, मन्दिर-मुद्दा, अमरनाथ यात्रा जमीन विवाद, गोधरा काण्ड, गुजरात दंगे, श्रीराम जन्मभूमि विवाद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, विश्वनाथ मन्दिर विवाद, अक्षरधाम मन्दिर पर हमला..............क्या-क्या गिनाएं........कितना-कितना गिनाएं............कितनी-कितनी बार गिनाएं? चलिए गिनाते नहीं हैं बताते हैं, ये सब क्या हैं कुछ विवाद. इन विवादों के पीछे एक समानता है और वो है हिंदू होने की समानता. कुछ समझे आप? इन विवादों के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू जुडा है। अब कुछ समझ में आया? यानि कि हर विवाद के पीछे हिंदू रहता है. आख़िर हिन्दुओं को भी चैन नहीं है कि वे शान्ति से बैठ सकें। अरे कोई आकर उनके आराध्यों का अपमान करता है तो करने दो. क्या वे अराध्य आकर हिन्दुओं से कहते हैं कि फलां-फलां उनका अपमान कर गया? कोई आराध्य क्या हिन्दुओं को खाने को देता है, किसी को नौकरी देता है? नहीं न, फ़िर किस बात पर हिंदू अपने आराध्यों के लिए विवाद खड़ा कर देते हैं? कुछ नहीं ये हिन्दुओं के खुरापाती दिमाग की उपज है कि अपने आराध्यों का नाम लेकर विवाद खडा करदो और फ़िर मुसलामानों को, सरकार को कोसते रहो. चलो मान भी लिया कि आराध्यों से हिन्दुओं को कुछ लाभ भी होता है तो क्या देश की सुरक्षा से बड़ा, भाईचारे से बड़ा हो गया आराध्यों का मामला कि हिंदू उनकी थोड़ी सी बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सके? इतनी छोटी सी मानसिकता लेकर हिंदू कहते हैं कि वे सच्चे देशभक्त हैं? वह हिंदू! थोड़ा सा भी बर्दास्त नहीं कर सकते। देश के लिए तो लोग जाने क्या-क्या बर्दाश्त नहीं करते. वैसे देखा जाए तो हिदुओं ने सिवाय विवादों को जन्म देने के कुछ भी नहीं किया है। अरे मन्दिर (राम जन्मभूमि) का विवाद है, उसको हवा तो हिन्दू ही दे रहे हैं. तमाम सारे जागरूक नागरिक, नेता, धर्मनिरपेक्ष ताकतें बार-बार कह रहीं हैं कि विवादित भूमि पर हिंदू-मुस्लिम मिल कर कोई स्कूल, हॉस्पिटल या कोई समाज सेवा जैसा भवन बनवा दे. मुस्लिम तो तैयार है पर ये कट्टर हिंदू बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं हैं. हुई न विवाद की शुरुआत. अरे यदि मन्दिर न बन पाये कोई बात नहीं कुछ और बन जाने दो और अपनी सांस्कृतिक पहचान नष्ट हो जाने दो. वैसे भी हिन्दुओं की पहचान रह ही क्या गई है? यहाँ तुम अपनी पहचान, अपनी अस्मिता, अपने आराध्यों की जमीन पर कुछ भी बनवा लेने दो (सुलभ शौचालय ही सही) आख़िर भाईचारे का मामला है पर अपने बाप-दादाओं की गांवों-शहरों की एक-एक इंच जमीन पर सारी उमर मुकदमा लड़ते रहना, क्योंकि वो तुम्हारी संपत्ति है और ये भूमि विवादित है. विवाद हिन्दू पैदा कर रहा है, भाईचारा नहीं बना रहा है. ओ हिन्दुओ! जागो, तुम्हारे देश के लोग धर्म-निरपेक्ष हैं और तुम विवाद पैदा करते जा रहे हो। सोचो जब तुम बड़े ही प्रेम से किसी से कहते हो सलाम साहब तो कहा जाता है कि कितना आदर है और जब तुम्ही कह देते हो जे श्रीराम तो कहा जाता है कि तुम्हारे अन्दर साम्प्रदायिकता की बू आ रही है. अब तुम हिन्दुओ ख़ुद सोचो तुम्हारा राम साम्प्रदायिकता लाता है तो तुम कैसे शान्ति लाओगे? भूल जाओ अपना अस्तित्व और जुट जाओ जी-हुजूरी करने में क्योंकि इस देश में जहाँ हिन्दुओं को छोड़ किसी भी धर्म की बात करो तो वो उनके विकास की बात होती है, धर्म-निरपेक्षता की बात होती है पर हिन्दू की बात करना भी विवाद का विषय होता है, साम्प्रदायिकता फैलाने वाला होता है. साम्प्रदायिकता न फैलाओ, देश हित में, भाईचारे में, तुष्टिकरण में, आराध्यों की पूजा-अर्चना करने में, अपने धर्म-स्थानों की यात्रा करने में, हिन्दुओं के मरने पर दुःख प्रकट करने में, जे श्री राम बोलने में, विवादित देव-स्थानों को खाली करने की बात करने में, अपने धर्म के लिए कुछ भी करने में यदि जूते भी खाने पड़ें तो खाओ क्योंकि तुम हिन्दुओ सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ भी नहीं करते.