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16.9.10

सभ्यता के राममार्ग से भटके मोहन भागवत

      आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तर प्रदेश उच्चन्यायालय के फैसले के आने के पहले ही अपनी राय जाहिर कर दी है वे अपने अनुरूप फैसला चाहते हैं । उन्हें बाबरी मस्जिद गिराने का कोई दुख और अफसोस नहीं है। वे अपने मुँह से बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात तक नहीं करना चाहते। उनके इस बयान ने अल्पसंख्यकों में आतंक और भय के संदेश का काम किया है। इन दिनों उत्तर प्रदेश साम्प्रदायिक भावनाओं को लेकर शांत है लेकिन अदालत के फैसले के बाद भी शांत रहेगा कहना मुश्किल है। राममंदिर को लेकर संघ परिवार का जो जिद्दी रूख रहा है उसकी तुलना राजनीति में सिर्फ हिटलर के जिद्दीभाव से कर सकते हैं।
       आरएसएस ने राममंदिर आंदोलन के माध्यम से देश की जो हानि की है उसकी भरपाई शब्दों से नहीं हो सकती। राम के नाम पर उन्होंने समस्त हिन्दुओं की सहिष्णुता को साम्प्रदायिक राजनीति के हाथों गिरवी रख दिया। राम हमारे देवता हैं उनके मार्ग का अनुसरण करने की बजाय संघ परिवार ने शैतान का मार्ग अपनाया । बाबरी मस्जिद तोड़कर सारी दुनिया में भारत की धर्मनिरपेक्ष छबि को कलंकित किया।
    राममंदिर आंदोलन ने धर्मनिरपेक्ष भारत को साम्प्रदायिक भारत का मुकुट पहनाया है। भारत में सभी धर्मों के लोग शांति,सदभाव और सुरक्षा के वातावरण में रहते थे लेकिन इस आंदोलन ने इन तीनों ही चीजों को सामाजिक अशांति,असुरक्षा और अविश्वास में बदल दिया है। खासकर मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा को आम लोगों के जेहन में उतारा है। राममंदिर आंदोलन के द्वारा पैदा की गई घृणा की तुलना सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की गोरों की नस्लभेदीय घृणा से की जा सकती है। आज भी समय है संघ अपना जिद्दी रूख त्याग दे। संघ की जिद है हम मंदिर वहीं बनाएंगे। इस नारे का राजनीतिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण हो चुका है। भारत के दिल को इस नारे ने पीड़ा पहुँचायी है। भारत के दिल में गरीब बसते हैं। मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा गरीब विरोधी साम्प्रदायिक नारा है।
      राममंदिर की जिद करके मोहन भागवत ने भारत के गरीबों को एकबार फिर से आहत किया है। वे हिन्दू होकर आज तक नहीं समझ पाए हैं कि धर्म गरीबों की आह है। वह राजनीति का मुकुट नहीं है। वह मंदिर की अभिव्यक्ति नहीं है। वह कोई इमारत नहीं है। मूर्ति नहीं है। वह तो गरीबों की आह है। हिन्दू धर्म का किसी भी अन्य धर्म के साथ कोई द्वेष नहीं है,प्रतिस्पर्धा नहीं है। हिन्दू धर्म की आत्मा मूर्ति,इमारत,मंदिर,संघ परिवार,भाजपा आदि में नहीं बसती। हिन्दू धर्म की आत्मा भारत के गरीबों की झोपड़ियों में बसती है। राम मंदिर आंदोलन गरीबों का आंदोलन नहीं था बल्कि कारपोरेट फंडिंग से चला कारपोरेट धर्म का आंदोलन था। यही वजह है कि कारपोरेट घरानों ने करोड़ों  रूपये का चंदा इस आंदोलन को दिया। राममंदिर के नाम पर चंदा वसूली का फायदा हिन्दू धर्म को नहीं मिला, बल्कि संघ परिवार को मिला। संघ परिवार ने करोड़ों रूपये का चंदा बाजार से उठाया है और इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर देशी कारपोरेट घरानों ने दिल खोलकर मदद की। लेकिन सारा पैसा कहां गया कोई नहीं जानता लेकिन इन्कमटैक्स विभाग के पास इसके प्रमाण हैं कि विश्वहिन्दू परिषद ने राममंदिर आंदोलन के नाम पर करोड़ों की वसूली की।
    राममंदिर आंदोलन का उत्तर प्रदेश और देश के अन्य इलाकों में एक असर हुआ है भाजपा अचानक कारपोरेट घरानों, धर्म के सिंडीकेट चलाने वालों, बाहुबलियों ,बमबाजों की पार्टी बन गयी। अपराधियों और कारपोरेट धर्मगुरूओं की बड़ी -बड़ी टोलियां संघ परिवार के विभिन्न संगठनों में घुस आयीं और संघ परिवार और उसकी राजनीति का उसने चरित्र ही बदल दिया।
    राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा का जनाधार छोटे दुकानदार,व्यापारी और मध्यवर्ग के दब्बू और सभ्य किस्म के लोग हुआ करते थे,लेकिन राममंदिर आंदोलन ने भाजपा और संघ परिवार के संगठनों के इस सामाजिक चरित्र को गुणात्मक तौर पर बदल दिया। अब भाजपा बाहुबलियों और आक्रामक लोगों की पार्टी बन गयी। पहले भाजपा और संघ के लोग छिपकर दंगे करते थे। लेकिन इस आंदोलन के बाद दंगा करना, समूह बनाकर हमले करना,आम बातचीत में हिंसक और घृणा की भाषा बोलना। खासकर मुसलमानों के खिलाफ संघ परिवार ने अहर्निश हिंसाचार का रूख अख्तियार कर लिया। मुसलमानों के खिलाफ वाचिक हिंसा के जरिए माहौल बनाया और उन पर शारीरिक हमले किए।
    राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा और संघ परिवार की जो राजनीतिक इमेज थी वही इमेज इस आंदोलन के बाद नहीं रही। राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा ने भय की भाषा का इस्तेमाल न्यूनतम किया था लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद भय और आतंक की भाषा ने भाजपा के नेताओं और समूचे संगठन पर कब्जा जमा लिया।
     संघ  परिवार की जीलगाकर बोलने की शैली खत्म हो गयी और अब संघ के नेता लगातार आक्रामक भाषा, माफिया सरदारों की भाषा बोलने लगे। इनका नया बाहुबली नारा था जयश्रीरामजयश्रीरामके नारे और राममंदिर आंदोलन के बहाने संघ परिवार ने अपना कायाकल्प किया। अपने को उग्र मुस्लिम विरोधी बनाया। इतिहास को विकृत किया। कानून की अवमानना की। लोकतंत्र का अपमान किया। लोकतंत्र के अपमान की भाषा को राजनीति और मीडिया की आमभाषा बना दिया।
   आरएसएस प्रधान मोहन भागवत का ताजा बयान नए खतरे के संकेतों से भरा है। उन्होंने कहा है कि वे  उपलब्ध कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे। आश्चर्य की बात है कि संघ परिवार का अभी तक यही मानता रहा है कि मंदिर के मसले पर अदालत की राय नहीं मानेंगे। सिर्फ वही फैसला मानेंगे जो उनके पक्ष में आएगा। सवाल यह है कि कानून के प्रति यह नजरिया क्या सभ्यता का प्रतीक है ?   
 






8.7.10

हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला

    हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
     तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
     संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
     संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
  हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
    संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा  देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
     आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
   हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
   हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
     वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
    हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
     फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने  ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर  लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देसकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
    
          किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष   
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275 














21.6.10

आरएसएस का मुस्लिम विद्वेष और फासिस्ट कल्पनाएं

     सारी दुनिया में फासीवादी संगठनों के वैचारिक अस्त्र एक जैसे हैं। फासीवादियों में विश्वव्यापी एकता वैसे ही है जैसे पूंजीपतियों में होती है। फासीवादी संगठनों का जनाधार विभिन्न अल्पसंख्यक जातीय समूहों के प्रति घृणा पैदा करके बढ़ता है। फासीवादी संगठनों की विचारधारा की धुरी है नस्लवाद।
     संघ परिवार के अनुसार भारत में रहने वाले मुसलमान राष्ट्रद्रोही हैं। वह सभी गैर हिन्दुओं को विदेशी मानता है और उन्हें किसी भी तरह के मानवाधिकार देने के पक्ष में नहीं है। संघी उन देशभक्त मुस्लिम नेताओं को भी राष्ट्रद्रोही कहते हैं जिनकी कुर्बानियों के सामने संघ के किसी भी बड़े नेता ने कुर्बानी नहीं दी हैं।
   गोलवलकर ने अपनी किताब ‘ हम अथवा हमारा राष्ट्रीयत्व परिभाषित’ में मुसलमानों के बारे में लिखा ‘ ऐसे पराए लोगों के लिए दो ही मार्ग खुले होते हैं। एक यह कि वे राष्ट्रीय संस्कृति को स्वीकार कर उसके साथ एकरूप हो जाएं और दूसरा यह कि वे राष्ट्र की अनुमति लेकर ही देश में रहें तथा जब राष्ट्र यह अनुमति वापस ले ले, तब देश को छोड़कर चले जाएं। अल्पसंख्यकों के प्रश्न के संबंध में यही उचित दृष्टिकोण है। इस प्रश्न का न्यायसंगत उत्तर भी यही है।’
 समस्या यह है कि संघ परिवार अपनी अल्पसंख्यक विरोधी मुहिम कब तक चलाता रहेगा। हमारे अनुसार यह अभियान तब तक चलेगा जब तक पाकिस्तान समाप्त नहीं हो जाता और अखंड भारत नहीं बन जाता। इसका अर्थ यह भी है इस कल्पना का साकार होना असंभव है,असंभव और अवैज्ञानिक कल्पनाओं में अपने अनुयायियों को व्यस्त रखना संघ की फासिस्ट कला है। 
    संघ परिवार का मानना है कि भारत की संस्कृति,परंपरा आदि का उत्तराधिकारी सिर्फ हिन्दू ही हो सकता है,गैर हिन्दुओं को यह हक नहीं है। क्योंकि हिन्दू ही भारतीय है। गैर हिन्दुओं को संघ परिवार भारतीय नहीं मानता।
    संघी प्रवक्ता के शब्दों में ‘ कोई भी सच्चा भारतीय,जो भारतवर्ष के वेदांग, उपनिषद, गीत, पुराण,दर्शन,संस्कृति और कला का उत्तराधिकारी है,हिन्दू है। केवल तभी जब हिन्दू परिवार में पैदा हुआ कोई व्यक्ति अपने सांस्कृतिक अतीत को अस्वीकार कर देता है या मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति ,अपनी राष्ट्रीय मूल जड़ों से अपने को अलग कर सिर्फ कुरान पर ही भरोसा करता है अथवा ईसाई परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति केवल पाश्चात्य साहबों और मेम साहबों की नकल करता है और जिसमें राष्ट्रीय आत्म-सम्मान नहीं होता तथा जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में गहराई में नहीं जातीं,वह भारतीय नहीं रह जाता और इस तरह मातृभूमि की सच्ची संतान नहीं रह जाता।’
     क्या संघी नेता भूल गए हैं कि भारत का संविधान किसे भारतीय मानता है ? भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय है चाहे उसका धर्म कोई भी हो। संविधान के अनुसार उसे सभी नागरिक हक प्राप्त हैं। संघ की यह धारणा गलत है कि सिर्फ हिन्दू ही देशप्रेमी हो सकता है। यह सोच भी गलत और असंवैधानिक है कि भारत में रहना है तो हिन्दू धर्म को मानना होगा। यह फासिस्ट सोच है।
    भारत में सैंकडों सालों से आस्तिक और नास्तिकों की परंपरा रही है। भारत के श्रेष्ठतम ज्ञानसर्जक नास्तिक और अनीश्वरवादी थे। गैर-हिन्दू परंपराओं और संस्कृतियों का भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा असर रहा है। भारत का सामाजिक,धार्मिक और सास्कृतिक तानाबाना सिर्फ हिन्दुओं और हिन्दूधर्म ने नहीं रचा है। इसमें गैर हिन्दुओं की हमेशा से बड़ी भूमिका रही है। भारत कभी सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं रहा बल्कि सदियों से गैर हिन्दू यहां निवास करते आ रहे हैं। ये वे लोग हैं जो मुसलमान कौम के उदय के पहले से भारत में रह रहे हैं।
    भारतीय समाज में गैरहिन्दुओं के प्रति गैर बराबरी की परंपरा क्षीण रही है। बल्कि इसके विपरीत गैर हिन्दुओं से सीखने,ज्ञान ,संगीत ,स्थापत्य ,ज्योतिष, साहित्य की धारणाएं लेने की परंपरा ज्यादा प्रबल रही है। हिन्दुओं ने अन्यों को जितना दिया है उससे ज्यादा लिया है। इस प्रक्रिया में भारत का मिश्रित समाज बना है। मिश्रित संस्कृति बनी है। भारत कभी भी शुद्ध हिन्दू समाज नहीं था। भारत में कभी शुद्ध हिन्दू संस्कृति नहीं रही है। संस्कृति कभी शुद्ध एक समुदाय द्वारा नहीं बनती बल्कि उसमें समूचे समाज की भूमिका रहती है। शुद्ध हिन्दू समाज की खोज संघ के सरसंघचालकों की फासिस्ट कल्पना की सृष्टि है।        
वे इसके लिए कुतर्क गढ़ते रहे हैं और गैर हिन्दुओं को समय-समय पर हिंसाचार का शिकार बनाते रहे हैं। यदि संघ अपनी इस फासिस्ट कल्पना को त्याग दे तो देश में शांति और सदभाव स्थापित हो जाए।






18.6.10

संघ परिवार का संविधान विरोधी खेल



           भारत में आरएसएस सबसे बड़ा फासीवादी संगठन है। कहने को यह संगठन अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन इसका बुनियादी लक्ष्य है भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना। कांग्रेस पार्टी समय-समय पर संघ परिवार के सामने समर्पण करती रही है। कांग्रेस की नीतियां उदार रही हैं,उसका बुनियादी चरित्र ढुलमुल धर्मनिरपेक्ष है।
     लेकिन कांग्रेस में उदार और अनुदार दोनों ही किस्म के लोग हैं। कांग्रेस की नीतियां समय-समय पर पापुलिज्म के दबाब में आती रही हैं। यही वजह है कांग्रेस का राष्ट्रीय चरित्र अनेक बार कई मसलों पर उसकी स्थानीय इकाईयों और नेताओं की भूमिका के साथ मेल नहीं खाता। कांग्रेस इन दिनों नव्य-उदारवादी आर्थिक नीतियों के दबाब में है और इन नीतियों का गहरा असर संघ परिवार से भी है। जहां-जहां ये नीतियां लागू हुई हैं वहां अनुदारवादी राजनीति को इससे मदद मिली है। अनुदार या कंजरवेटिव मसले संघ के एजेण्डे पर आए हैं।
    कंजरवेटिव राजनीति और फासीवाद का गहरा संबंध है। सारी दुनिया में फासीवादी ताकतों के उदारवादी पूंजीवाद का विरोध किया था और आज भी कर रहे हैं। भारत में बिहार के 1974 के जेपी आंदोलन और 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में संघ परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी, नरेद्र मोदी,लालूयादव,नीतीश कुमार आदि उसी समय की राजनीतिक खेती की देन हैं।
    सन् 1974 में संघ परिवार ‘इन्दिरा गांधी हटाओ देश बचाओ ’ के नारे लगाने वालों में सबसे आगे था। यही संघ परिवार जून 1975 में आपात्काल लगते ही इंदिरा का भक्त हो गया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक ने इन्दिरा गांधी को आपात्काल लागू करने के लिए पूरे सहयोग का वादा किया था,आपात्काल का समर्थन किया था। उल्लेखनीय है उस समय संघ पर केन्द्र सरकार ने पाबंदी लगा दी थी।
      आपात्काल में जनता के सभी अधिकार छीन लिए गए थे, विपक्ष के सभी नेता जेलों में बंद थे,संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ता जेलों में बंद थे, इसके बावजूद संघ परिवार ने आपात्काल में सहयोग का प्रस्ताव देकर अपने बुनियादी जनतंत्र विरोधी और अधिनायकवादी नजरिए का प्रतिपादन किया था। संघ परिवार का ऐसा करना उसके उदारवाद विरोधी राजनीतिक नजरिए का हिस्सा है।
     इसी प्रसंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फासीवाद के निर्माताओं के उदारतावाद विरोधी नजरिए को देखें तो पता चलेगा कि संघ परिवार का देशी विचारों का दावा गलत है और वह फासीवाद के विदेशी विचारों का प्रचारक-प्रसारक है।
    फासीवादी संगठनों का प्रधान शत्रु है मार्क्सवाद। मार्क्सवाद को विध्वस्त करने के लिए उदार पूंजीवाद पर हमला करना जरूरी है। क्योंकि उदार पूंजीवादी वातावरण में मार्क्सवाद फलता-फूलता है। सारी दुनिया में समाजवाद के पराभव में मार्क्सवाद की आंतरिक कमजोरियों के साथ उदार पूंजीवाद विरोधी नीतिगत रूझानों की बड़ी भूमिका है। मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको ने जमकर उदार पूंजीवाद का विरोध किया था। भारत में संघ परिवार के अनुदारवादी राजनीतिक नजरिए के ये ही मार्गदर्शक हैं।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक किताब में लिखा है कि फासीवाद के तीन तिलंगों मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको द्वारा ‘‘ उदारवाद की आलोचना इस विचार पर आधारित है कि उदार राज्य मार्क्सवाद के खिलाफ प्रभावी संघर्ष में असमर्थ है। राजनीतिक स्तर पर उदार राज्य की जन्मजात कमजोरी उसे मार्क्सवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाने से रोकती है।
     विचारधारा के स्तर पर न्याय संगत परिवेश के दर्शन के पास बृहत्तर जनता को आकर्षित करने वाली कोई जीवंतता नहीं है। मुसोलिनी अपने वक्तव्यों में उदार राज्य की कृतियों और सिद्धांत की नपुंसकता की भर्त्सना करता है। हिटलर घोषित करता है : 'एक ऐसा राज्य जो एक कोढी, मार्क्सवाद वास्तव में यही तो है, के विकास को नहीं रोक सका वह भविष्य के किसी अवसर का क्या इस्तेमाल कर पायेगा।’’ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमाम भाषण मुसोलिनी की इसी हुंकारभरी शैली में ही होते हैं।
     भारत में संघ परिवार समानता के सिद्धांत का विरोध करता है और राष्ट्रवाद, वर्णव्यवस्था और हिन्दू वर्चस्व को नैसर्गिक मानता है। अगर हम इन चीजों को नैसर्गिक मान लेंगे तो फिर समानता की सभी बातें खोखली हैं। समानता को सही रूपों में लागू करने के लिए वर्णव्यवस्था,जातिप्रथा, राष्ट्रवाद और हिन्दू वर्चस्व या धार्मिक वर्चस्व की धारणा को त्यागना जरूरी है। अगर कोई संगठन इन चीजों में विश्वास करता है तो वह स्वभावतः संविधान विरोधी राजनीतिक भूमिका निभाता है। इस अर्थ में भारत के संविधान की बुनियादी स्प्रिट के साथ संघ परिवार का कोई मेल नहीं बैठता। भारत का संविधान उदार पूंजीवाद की शानदार अभिव्यक्ति है। जबकि फासीवाद को उदार पूंजीवाद से घृणा है।

            किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष    
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275