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16.10.10

अमेरिका का भयावह यथार्थ और मार्क्सवाद की वापसी

                     (स्व.कार्ल मार्क्स)
 यह मार्क्सवाद की ओर लौटने की बेला है। जो लोग नव्य उदारतावाद के साथ साम्यवाद पर हमलावर हुए थे वे अपने हाथों अपने पेट में छुरा भोंक चुके हैं। हम भारतवासी सच को देखें और आंखें खोलें। आर्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे थे। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन भावी सुनहरे समय का सपना दिखा रहे थे और आश्वासन पर आश्वासन दे रहे थे उनके लिए आर्थिकमंदी ने पराभव का मुँह दिखाया है। मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मार्क्सवाद सही और नव्य-उदारतावाद गलत का साफ संदेश है।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद और भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की गयी। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जगत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
      मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्तव्यापार, मुक्तबाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके।
      हमारे देश में अमेरिका के बारे में तरह-तरह के भ्रम पैदा किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा भ्रम तो यही पैदा किया जा रहा है कि अमेरिका हमारा स्वाभाविक दोस्त है। बड़े कौशल के साथ यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों के बारे में बताया जा रहा है कि वे हमारे देश में सिर्फ विकास के लिए आ रही हैं। शोषण और उत्पीड़न से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे तो हमारी मदद के लिए आ रही हैं। वे हमें आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि हमें अपने यहां विकास का चरमोत्कर्ष हासिल करना है तो अमेरिकी मॉडल का अनुकरण करें। अमेरिकी मॉडल का इस्तेमाल करते हुए हम अपनी भौतिक संपदा और आम लोगों की जीवनशैली में जबर्दस्त उछाल पैदा कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति भौतिक उपभोग को उच्चतम स्तर तक ले जा सकते हैं।
    अमरीकी आर्थिक मॉडल कितना सार्थक है इसके लिए आज किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमराकर गिर गयी है। आज अमेरिका में चारों ओर दुख ही दुख है। नव्य उदारतावाद का ग्लैमर, मीडिया और संचार क्राति का जादू अपना असर खो चुका है। विगत 25 सालों में अमेरिकी जनता के जीवन में दुखों में इजाफा हुआ है । अमेरिकी जनता के जीवन में दुख बढ़े हैं और सुख घटे हैं।
      अमेरिकी मॉडल जनोन्मुख है या जनविरोधी है इसका आधार है शांति और तनावमुक्त जीवनशैली। अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चल रही है तो आम जनता के जीवन में शांति ,सुरक्षा ,विश्वास और आनंद का विकास होना चाहिए, लेकिन परिणाम इसके एकदम विपरीत आए हैं अमेरिकी जीवन में अशांति,असुरक्षा और सामाजिक और व्यक्तिगत तनाव में इजाफा हुआ है। हताशा बढ़ी है। सामान्य अमेरिकी नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि उनके जीवन में इतनी व्यापक अशांति,असुरक्षा और तनाव कैसे आ गया। समाज के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली का तानाबाना तहस-नहस हो गया है।
      सामाजिक-आर्थिक स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि कमाऊ और मौज उडाऊ के बीच में वैषम्य घटा नहीं है बल्कि बढ़ा है। सन् 1968 में जनरल मोटर्स के सीईओ को इसी कंपनी के कर्मचारी की तुलना में 66 गुना ज्यादा पगार मिलती थी। यह वैषम्य घटने की बजाय बढ़ा है आज वालमार्ट कंपनी के सीईओ की पगार इसी कंपनी के एक कर्मचारी की पगार की तुलना में 900गुना ज्यादा है। अकेले वालमार्ट परिवार के पास 90 बिलियन डॉलर की संपदा है जबकि इतनी संपदा अमेरिकी की 40 फीसदी आबादी के पास है।
      संपदा के निजी इजारेदारियों के हाथों में केन्द्रीकरण ने भयानक आर्थिक वैषम्य पैदा किया है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘नेशन’ के अनुसार अमेरिका के अति समृद्धों का आर्थिकमंदी में कुछ नहीं बिगाड़ा है लेकिन मझोले अमीरों पर इसकी मार पड़ी है। न्यूयार्क टाइम्स ने अगस्त 2009 में लिखा था कि अमेरिका में जिन लोगों के पास 30 मिलियन डॉलर की संपत्ति है ऐसे लोगों की संपदा घटी है।
     अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी-अमेरिकन,कम कौशल का काम करने वाले कर्मचारियों की आय में गिरावट आयी है। ‘नेशन’ ने लिखा ‘‘Although they differ in theme and emphasis, the essays here, commissioned in conjunction with the Next Social Contract Initiative of the New America Foundation, are united by a belief that deep, persistent inequality doesn't merely affect less privileged Americans. It affects everyone, rending the social fabric, distorting our politics and preventing America from fulfilling its promise as a nation that offers a measure of equality and opportunity to all. Inequality is also a bipartisan phenomenon, exacerbated by the neglect of both political parties and by a society whose chattering classes have grown oblivious to wealth and income disparities that no other advanced democracy tolerates.’’
   अमेरिका की वास्तविकता पर पर्दा डालकर जो लोग भारत में अमेरिकी मॉडल का जयगान कर रहे हैं और अमेरिका जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि अमेरिकी मॉडल खुद अमेरिका में धराशायी हो चुका है।
   अमेरिका में व्याप्त आर्थिक असुरक्षा के बारे में रॉकफेलर फाउण्डेशन की रिपोर्ट में जो कहा गया है वह हमारी आंखे खोलने के लिए काफी है। यह संस्थान घनघोर प्रतिक्रियावादी विचारकों का अड्डा है। इस रिपोर्ट को येल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेकब हेकर ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों की आय में गिरावट आयी है। इन परिवारों की आय में अचानक से आई गिरावट का किसी को पहले से आभास तक नहीं था। 
      रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1985 में आर्थिक असुरक्षा से अमेरिका में 12.2 प्रतिशत परिवार प्रभावित थे। जिनकी संख्या सन् 2000 में बढ़कर 17 प्रतिशत हो गयी। सन् 2007 को सुंदर आर्थिक साल माना जाता है इस साल आर्थिक असुरक्षा 1985 के स्तर से ज्यादा थी।यानी 13.7 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के दायरे में थे।
    सन् 2009 से आर्थिक तबाही का जो सिलसिला आरंभ हुआ है उसके कारण स्थिति और भी भयावह बनी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1996 और 2006 के बीच में तकरीबन 60 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के घेरे में आ चुके हैं। आम अमेरिकी नागरिक की पगार स्थिर है या कम हुई है। जबकि अनिवार्य खर्चे बढ़े हैं। ज्यादातर अमेरिकी नागरिकों के पास किसी भी किस्म की बचत नहीं हो पाती। बैंकों में उनके नाम से एक भी पैसा बचत खातों में नहीं है। वे जितना कमाते हैं उससे ज्यादा के उनके पास खर्चे हैं।
   पहले अमेरिका में बेकार नागरिकों को थोड़े अंतराल के बाद काम मिल जाता था लेकिन विगत कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि बेरोजगारों को काम के लिए बहुत ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ता है। बेकारी का समय लंबा होने से आर्थिक असुरक्षा ने एक नया आयाम हासिल कर लिया है। अब बेकार और मध्यवर्ग के लोग 35 साल की उम्र में ही बूढ़ापे का अनुभव करने लगे हैं।
      अमेरिका के फिलिप्स सेण्टर फॉर हेल्थ एंड वेल-बिंग का ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक संकट और बेकारी के कारण मध्यवर्ग के अमरीकी नागरिक 35 साल की उम्र में ही बूढ़ा महसूस करने लगे हैं। 75 पर्तिशत लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिरे हुए हैं। बूढ़ापा और बीमारियां 30 साल की उम्र में एक अमेरिकी युवा को घेर रही हैं। 
    डेनिस पाराडिनिज ने अपनी किताब  ‘‘Quality of Life’’ में लिखा “Feeling there is a possibility of losing your job and not being able to afford to pay your child’s school fees, or having to cancel that trip you planned a long time ago, certainly causes worry and anxiety”. एक मनोशास्त्री ने कहा है “And of course this begins to affect other areas of quality of life, causing insomnia, anxiety and even depression”.  इस सबका उनके मोटापे,शरीर और उम्र पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।
     आम अमेरिकी की इन दिनों पूरी जीवनशैली बदल गयी है। एक जमाना अमेरिकी स्वस्थ माने जाते थे आज मोटे हो गए हैं। आजकल फ्रेंच लोगों से ज्यादा अमेरिकी लोग सोने और खाने पर समय खर्च करते हैं। सवाल उठता है क्या हम इसके बावजूद अमेरिकी मॉडल पर चलना पसंद करेंगे ?   

9.9.10

समाजवादी क्यूबा के प्रेरणाप्रद अनुभव -1-

           अभी दो दिन पहले शिक्षक दिवस था और उसके मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्या कहा शायद ही किसी को याद होगा। वे ऐसे शिक्षक हैं जिसने भारत के गरीबों के भाग्य बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया। शिक्षक दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री के पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि उनके शासनकाल में शिक्षा की स्थिति में और भी गिरावट आई है। गुण और मात्रा दोनों ही दृष्टियों से भारत का स्थान विश्व में काफी नीचे है।
       इन दिनों जो लोग समाजवाद को गाली देते हैं। मार्क्सवाद को निरर्थक साबित करने में लगे हैं और अमेरिका के पदचिह्नों का अनुकरण करते हुए भारत में शिक्षा को विदेशी विद्यालयों के हाथों सौंप देना चाहते हैं और उन्हें नव्य उदार शिक्षा नीति से बेहतर कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा ऐसे लोगों के लिए समाजवादी क्यूबा से सीखना चाहिए। जो लोग मार्क्सवाद की असफलता का अहर्निश राग अलापते रहते हैं और मार्क्सवाद के ऊपर कीचड़ उछालने के लिए मिथ्या प्रचार करते रहते हैं उन्हें क्यूबा की शिक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों पर गौर करना चाहिए। क्यूबा की सच्चाई को हम फिदेल कास्त्रो के नजरिए से देखें तो कुछ नई चीजों पर भी रोशनी पड़ेगी।
      फिदेल कास्त्रो ने लिखा है कि ‘‘मेरा हमेशा से विश्वास रहा है कि शिक्षा श्रेष्ठ और मानवीय कार्य है जिसमें लोगों को अपना जीवन लगाना चाहिए। इसके बगैर न विज्ञान होगा, न कला और न साहित्य; न उत्पादन होगा और न अर्थव्यवस्था, न स्वास्थ्य होगा और न कल्याण, न अच्छा जीवन होगा और न मनोरंजन तथा आत्म-सम्मान। सामाजिक जागरूकता भी नहीं होगी।’’
‘‘ज्ञान और संस्कृति सुलभ हो जाने मात्र से नैतिक सिध्दांत प्राप्त नहीं हो जाते। लेकिन ज्ञान और संस्कृति के बगैर कोई नीतिशास्त्र तक नहीं पहुंच सकता। इनके बिना किसी तरह की समानता या स्वतंत्रता संभव नहीं है। शिक्षा और संस्कृति के बगैर किसी भी तरह का लोकतंत्र संभव नहीं है। 100 से अधिक साल पहले जोसे मार्ती ने बड़े साफ तौर पर कहा था, 'शिक्षा ही मुक्ति का द्वार है।' ’’
‘‘हमारे मंत्री ने कहा कि क्रांति के समय हमारे देश में 23.6 प्रतिशत साक्षरता थी। मेरा जन्म गांव में हुआ और मैंने बचपन पूरी तरह से ग्रामीण इलाके में बिताया। मुझे उस समय की बहुत सी बातें याद हैं। मैं यहां कह सकता हूं कि वहां 20 प्रतिशत से कम लोग मुश्किल से पढ़-लिख सकते थे। बहुत मुश्किल से बहुत कम बच्चे छठी कक्षा तक पहुंच पाते थे। शहरों में अधिक स्कूल थे। इसलिए वहां निरक्षरों का प्रतिशत कम था।
इस तरह के आंकड़ों का अपेक्षाकृत अधिक मूल्य होता है। क्रांति की जीत के समय कितने बच्चे छठी कक्षा पास थे इस बारे में जांच करने से पता चला कि लगभग सत्तर लाख बाशिंदों में इनकी संख्या चार लाख थी। और वह छठी कक्षा कैसी थी! संक्षिप्त आंकड़े वास्तविकता को प्रकट नहीं करते। यदि सभी निरक्षरों को लिया जाए तो उस समय 90 प्रतिशत से अधिक क्यूबाई छठी कक्षा से आगे नहीं गए थे।’’
‘‘1959 के विश्वविद्यालय स्नातकों के सही आंकड़े मेरे पास नहीं हैं लेकिन इनकी संख्या तीस हजार से अधिक नहीं रही होगी। अपने लोगों को शिक्षा तथा पुनर्प्रशिक्षण और इसकी उच्च गुणवत्ता बनाए रखने की चार दशकों की जद्दोजहद के बाद आज हमारी 1 करोड़ 10 लाख से अधिक की आबादी में ऐसे बहुत कम नागरिक हैं जिन्होंने कम से कम नौवीं कक्षा तक शिक्षा नहीं पाई है। विश्वविद्यालय स्नातक और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या 8 लाख है। शिक्षा से जुड़े विभिन्न मानदंडों जैसे कि प्रति व्यक्ति अध्यापक संख्या, प्रति क्लासरूम बच्चों की संख्या तथा प्राथमिक स्कूली बच्चों के गणित और भाषा ज्ञान की दृष्टि से पूरी दुनिया जिसमें अत्यधिक विकसित देश शामिल हैं में क्यूबा का पहला स्थान है। स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई में बने रहने और छठी तथा नौवीं कक्षा पूरी करने वाले बच्चों जैसे मानदंडों की दृष्टि से कोई देश हमसे आगे नहीं है। वास्तव में बहुत कम देश बच्चों, किशोरों और युवकों की शिक्षा तथा सांस्कृतिक प्रशिक्षण पर इतना ध्यान देते हैं।’’
‘‘लेकिन अपनी वर्तमान उपलब्धियों से संतुष्ट होने का मतलब अपने दंभ, उग्र राष्ट्रीयता, आत्म संतोष और धृष्टता का प्रदर्शन होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली में अभी भी बहुत कमियां हैं। यह सही है कि आज हमारा एक भी बच्चा सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में अकेला बच्चा भी बगैर स्कूल या अध्यापक के नहीं है। भौतिक या मानसिक अक्षमताओं वाला शिक्षा के योग्य एक भी बच्चा या नवयुवक बगैर विशेष स्कूल के नहीं है। यह सही है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों में 20 गुना वृध्दि हुई है, जरूरतमंदों के लिए लाखों बोर्डिंग स्कूल हैं, शिक्षा के लिए निधियां हमेशा उपलब्ध रहती हैं, शिक्षा पर प्राथमिक ध्यान दिया जा रहा है, शिक्षा के क्षेत्र में हमारे पास लाखों प्रोफेसर, अध्यापक और कार्यकर्ता हैं जिनमें से बहुत उत्कृष्ट कोटि के हैं, नि:स्वार्थ, समर्पित तथा मूल्यवान नागरिक हैं फिर भी हम आदर्श शिक्षा प्रणाली कायम नहीं कर पाए हैं।’’
‘‘हमारे प्राथमिक स्कूली छात्र, जिनका पूरा दुनिया में उत्कृष्ट स्थान है, आज के मुकाबले तीन गुना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और करेंगे।’’
सब जानते हैं कि माध्यमिक शिक्षा जिसमें सातवीं, आठवीं और नौवीं कक्षाएं आती हैं पूरी दुनिया में घोर संकट का क्षेत्र है। किशोरों की इस नाजुक उम्र में जब उन्हें उत्कृष्ट शिक्षा और अधिकतम ध्यान की जरूरत होती है तो उन्हें कुलीन समाज के जमाने में प्रचलित विचार पढ़ाए जाते हैं। ये विचार उस समय के हैं जब जन शिक्षा के बारे में कोई सोचता भी नहीं था।’’
    ‘‘मैं सत्य का एक मात्र ज्ञाता होने का दावा नहीं करता लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इस समय प्रचलित प्रणाली मूर्खतापूर्ण है। इन कक्षाओं में तथा इस उम्र में अति विशेषज्ञता लाद दी जाती है। 25-30 या उससे अधिक छात्रों के बड़े समूह को अध्यापक देखते हैं। वे विभिन्न समूहों में 200 या उससे अधिक छात्रों को पढ़ाते हैं। वे छात्रों के नाम तक याद नहीं कर सकते, वे उनके परिवार तथा सामाजिक माहौल से वाकिफ नहीं हो सकते, उनके माता-पिताओं से संपर्क नहीं रख सकते, प्रत्येक छात्र की विशेषताओं का ज्ञान नहीं रख सकते तथा उनमें अंतर के अनुसार उनके साथ अलग-अलग तरीके से ध्यान नहीं दे सकते। नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और छात्रों का ज्ञान पाठय पुस्तकों में समाविष्ट ज्ञान के 30 फीसदी से आगे नहीं जाता। यहां हम यह मानकर चल रहे हैं कि ये पाठय पुस्तकें पूरी गंभीरता से साथ तैयार की गई हैं। यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि परंपरा या आत्मतुष्टि के कारण हम युवाओं के लिए कथित रूप से अद्वितीय अध्यापन व्यवसाय को बढ़ा-चढ़ाकर सम्मान देते हैं। यदि आप 12वीं कक्षा पास विद्यार्थियों से यह पूछें कि भविष्य में अध्यापकों के रूप में वे क्या पढ़ना चाहते हैं तो उनकी इच्छाएं कार्यक्रम की आवश्यकताओं तथा विषयों की साप्ताहिक आवृत्ति से कभी मेल नहीं खाएंगी। इसके फलस्वरूप अध्यापक कभी अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर सके।
प्राथमिक शिक्षा स्तर तक ऐसी स्थिति नहीं है। यहां अध्यापक चौथी कक्षा तक एक ही समूह के साथ रहते हैं तथा पांचवीं और छठी कक्षा में किसी अन्य अध्यापक के साथ विषय बांटते हैं।’’
‘‘सातवीं से नौवीं कक्षा के दरम्यान अचानक तथा पूरा परिवर्तन हो जाता है। प्राथमिक स्कूलों में कोई न कोई हर बच्चे को देख रहा होता है। माध्यमिक शिक्षा में हर कोई हर किसी को देखता है, कोई किसी को विशेष रूप से नहीं देखता।
इस विषय पर खुद अध्यापकों के साथ चर्चा करना आसान नहीं है। विकल्प में रूप में हमने सातवीं, आठवीं और नौवीं के लिए कई विषय पढ़ाने वाले अध्यापक रखने के बारे में सोचा है जो भाषा और शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ अन्य विषय पढ़ा सकें तथा प्रति 15 विद्यार्थी एक अध्यापक के अनुपात में उन तीनों साल छात्रों के साथ आगे बढ़ सकें। ’’
‘‘इस विचार की कड़ी जांच की जा रही है। तत्काल बदलाव की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हम हजारों नए अध्यापकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। ये अध्यापक 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों में से चुने गए हैं। इस समय वे जबर्दस्त उत्साह के साथ इस सघन अभ्यास में जुटे हुए हैं। हमें अभी तक प्राप्त शिक्षा परिणामों से तसल्ली हुई है। उत्साहजनक बात यह भी है कि परंपरागत प्रणाली के अंतर्गत कार्य करने वाले बहुत से अध्यापक दो, तीन या इससे अधिक विषय पढ़ाने और यहां तक कि बहु-विषय अध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए भी तैयार हो रहे हैं। इससे इस दिशा में काफी प्रगति हुई है। अधिक पढ़े जाने वाले विषयों में अध्यापकों की कमी दूर हुई है तथा अध्यापन व्यवसाय के प्रति आकर्षण बढ़ा है।’’
‘‘माध्यमिक शिक्षा में दोपहर के भोजन की उचित व्यवस्था के साथ दोहरे सत्र मुस्तैदी के साथ शुरू किए जाएंगे। यह कार्य राजधानी से शुरू किया जाएगा जहां हर चीज अधिक उलझी होती है। 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा वाले सीनियर हाई स्कूल स्तर पर बुनियादी और तकनीकी दोनों तरह की शिक्षा के लिए कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। छात्रों की ओर विशेष ध्यान दिए जाने की योजना के अंतर्गत विशेषज्ञ अध्यापक रखे जाएंगे। किसी को इस बात का डर नहीं है कि इन योजनाओं के कारण अध्यापकों की संख्या कम हो जाएगी तथा माध्यमिक शिक्षा में इस समय कार्य कर रहे अध्यापक फालतू हो जाएंगे। इसके विपरीत हर स्तर पर अध्यापकों की संख्या बढ़ेगी और यदि आवश्यक हुआ तो एक रिजर्व तैयार किया जाएगा ताकि अध्यापन निकाय में लगातार प्रशिक्षण चलता रहे। मैंने इस मुद्दे पर बहुत समय दिया है क्योंकि उच्चतम जोखिम के इस युग में यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक देश, जिसमें 100 प्रतिशत छात्र इस शैक्षिक स्तर से गुजरते हैं, में सब बच्चों को इस जोखिम से गुजरना होगा। इस तरह से हम अध्ययन को पांच गुना बढ़ाने की आशा करते हैं।’’








22.6.10

भूलों के आंगन के पार मार्क्सवाद

               एक जमाना था भारत में कहावत थी कि मास्को में सर्दी पड़ती है तो कॉमरेड को दिल्ली में जुकाम होता है। भारत में सोवियत संघ के गुणगान गाने वालों की समाजवाद के जमाने या सोवियत जमाने में कमी नहीं थी। जब से समाजवादी व्यवस्था गिरी और सोवियत संघ का विघटन हुआ ,तब से भारत और खासकर हिन्दी के सोवियत भक्तों का दूर-दूर तक पता नहीं है।
     विगत 20 सालों में मैंने किसी भी हिन्दी के सोवियत भक्त का सोवियतों ,सोवियत समाजवाद और सोवियत जनता के बारे में कुछ भी लिखा हुआ नहीं देखा है। बेरुखी का आलम यह है कि कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रकाशनों में पुराने सोवियत की ताजा खबरें अब नजर नहीं आतीं।
      एक जमाना था भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सलाह लेने सोवियत संघ जाया करते थे। पार्टी कक्षाओं में बढ़-चढ़कर अपनी सोवियत भक्ति का प्रदर्शन किया करते थे। अब ये लोग किसी भी तरह अपनी सोवियत भक्ति का प्रदर्शन नहीं करते।
     ऐसा क्या हुआ है कि भू.पू.सोवियत संघ के बारे में प्रगतिशीलों ने दिलचस्पी ही लेनी बंद कर दी ? भू.पू.सोवियत में सब कुछ पुराना बाकी है। सिर्फ समाजवाद बदला है। देश का अनेक देशों में रूपान्तरण हुआ है। कम्युनिस्ट पार्टी हाशिए पर चली गयी है।
     किसी भी देश में समाजवाद रहे या पूंजीवाद रहे यह फैसला वहां की जनता करेगी। उस देश के राजनीतिक दल करेंगे। हमारे प्रगतिशीलों की सोवियतों में दिलचस्पी इस परिवर्तन के कारण कैसे खत्म हो सकती है ?
     सवाल उठता है कि सोवियतों के प्रति,सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति हमारे सोवियत भक्तों का प्रेम क्या समाजवाद के कारण था ? क्या हमारे सोवियत भक्तों का सोवियत जनता,सभ्यता,संस्कृति आदि से कोई प्रेम नहीं था ? यदि था तो जब सोवियत संघ इतने व्यापक परिवर्तनों से गुजर रहा था तो इस दौरान हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों ने इन परिवर्तनों और विगत 20-25 साल में घट रही घटनाओं पर हिन्दी के पाठकों को जानकारी देने की कोई कोशिश क्यों नहीं की ? क्या भू.पू.सोवियत संघ से हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का सिर्फ मलाई खाने का संबंध था ? सोवियत संघ से मलाई मिलनी बंद हो गयी तो उन्होंने सोवियतों के बारे में बताना ही बंद कर दिया।
    आश्चर्य है कि भू.पू. सोवियत देश अभी भी मौजूद हैं। रूस आज भी दुनिया की महान शक्तियों में से एक है। महान रूसी जनता व्यवस्था परिवर्तन के चक्रव्यूह को भेदते हुए शानदार ढ़ंग से उन्नति के मार्ग पर आगे जा रही है।
     भूमंडलीकरण की पहली चोट सोवियत समाजवादी समूह के देशों पर हुई थी। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी अपने आंतरिक क्रिया-कलापों के कारण बिखर गयी। चूंकि पार्टी ने अपने विस्तार के क्रम में सारे सोवियत संघ की जनता को अपना बना लिया था ,अन्य कोई राजनीतिक दल वहां पर नहीं  था। पार्टी ही देश का पर्याय थी। फलतः जब पार्टी टूटी तो देश भी टूटा।
    सोवियत समाजवादी मॉडल की विशेषता थी पार्टी ,जनता और राष्ट्र का एकीकरण। इस एकीकरण की धुरी थी पार्टी । कमोबेश यही मॉडल सारी दुनिया में आदर्श के रूप में प्रचारित किया गया। चीन,यूगोस्लाविया,चैकोस्लोवाकिया,पोलैण्ड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी, क्यूबा, कम्बोडिया,उत्तरी कोरिया आदि में यही मॉडल लागू किया गया।
      सोवियत संघ में समाजवाद के पराभव की जड़ में समाजवाद कम और समाजवादी सोवियत मॉडल ज्यादा जिम्मेदार था। पार्टी,जनता और देश के एकीकरण के खिलाफ प्रतिवाद के स्वर पोलैण्ड में पहले सुनाई दिए और कम्युनिस्ट पार्टी धराशायी हुई।
     पार्टी,जनता और राष्ट्र के एकीकरण पर टिका समाजवाद किस कदर ताकत अर्जित कर लेता है इसका शानदार प्रयोग पश्चिम बंगाल में माकपा ने करके दिखाया है और उसमें रूसी-चीनी मॉडल की विशेषताओ के साथ भारतीय विशेषता के रूप में लोकतंत्र को शामिल कर लिया है। पश्चिम बंगाल के समाजवादी मॉडल में लोकतंत्र निर्णायक नहीं है निर्णायक है पार्टी संगठन। पार्टी संगठन का तानाबाना टूटने के साथ ही सोवियत संघ में परिवर्तन आए और 11 स्वतंत्र देशों का उदय हुआ। पुराने सोवियत संघ का विघटन हुआ।
     सोवियत संघ का विघटन किसी साजिश का परिणाम नहीं था। बल्कि पार्टी,जनता और राष्ट्र के बीच में जो एकीकरण हुआ था उसकी त्रासद परिणति थी। किसी भी देश में पार्टी,जनता और राष्ट्र का एकीकरण इसी तरह के त्रासद मार्ग से गुजरेगा। पार्टी के नाम पर देश या प्रांत को बांधना अवैज्ञानिक है। आप जोर-जबर्दस्ती करके कुछ समय तक तो बांधे ऱख सकते हैं लेकिन अनंतकाल तक नहीं।
     राष्ट्र और जनता को दल विशेष या विचारधारा विशेष में बांधना और सबको एक ही दिशा में सोचने के लिए बाध्य करना अवैज्ञानिक है,तानाशाही है और सामाजिक वैविध्य का अस्वीकार है। समाजवाद के इस सोवियत मॉडल से साम्यवादियों ने ही प्रेरणा नहीं ली, बल्कि फासीवादियों और फंडामेंलिस्टों को भी यह मॉडल पसंद है। वे भी एक पार्टी और एक ही विचारधारा के खूंटे से देश विशेष की जनता को बांधना चाहते हैं। यह एक तरह से जनता को नपुंसक बनाने, गुलाम बनाने और उसके मानवाधिकारों को छीनने की कोशिश है। यह उदारतावादी विचारधाराओं का अस्वीकार है।
     सवाल यह है कि मार्क्सवाद का पूंजीवादी उदारतावाद के साथ किस रूप में संवाद बनता है ? राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक वैविध्य को स्वीकार करते हुए मार्क्सवाद का कैसे विकास किया जाए ? अन्य विचारधाराओं और गैर सर्वहारा वर्गों के प्रति सदभाव बनाए रखकर मार्क्सवाद को कैसे लागू किया जाए यही वह चुनौती है जिसे सोवियत मॉडल बनाने वाले समझने में असमर्थ रहे। उनकी .ही असमर्थता एक दिन उन्हें देश-विभाजन और समाजवाद के विसर्जन तक ले गयी।   
   
        

12.4.10

पी. सी. जोशी के साथ अनुभवों की एक रोमांचक यात्रा- सरला माहेश्वरी,भू.पू.सांसद,राज्यसभा

    पूरन चंद्र जोशी की पुस्तक यादों से रची यात्रा एक विकल्प की तलाशकिसी तपती गर्मी, उमस और बेचैनी के समय में ठंडी फुहार की तरह सचमुच एकबारगी मन को हरा कर गयी। विचारों और चिंताओं से भरी इस किताब को दो दिन में पूरी पढ़ गयी। बहुत दिनों बाद मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियां फिर कानों में गूंज उठी
जड़ीभूत ढ़ांचों से जरूर लड़ेगें हम
चाहे प्रतिनिधि तुम
चाहे प्रतिनिधि हम।
यह एक ईमानदार समाजशास्त्री और एक न्यायपूर्ण समाज को धरती पर देखने को आतुर संवेदनशील बुद्धिजीवी का अपने अतीत, वर्तमान और आनेवाले कल से वादविवाद और संवाद है। जनता के संघर्षों और उसकी जिजीविषा में अटूट आस्था रखने वाला व्यक्ति जिस तरह हमेशा एक नयी सुबह का सपना संजोए रखता है और यह विश्वास करता है–‘ऐसा जमाना हमेशा नहीं रहेगा। एक समय आयेगा, जब हम फिर अपनी जमीन से जुड़ेगें, और फिर से हमारे जीवन में वसंत आयेगा (इसी पुस्तक से) , जोशी जी न सिर्फ‍ अपने समय से ही साक्षात्कार करते हैं बल्कि उससे दोदो हाथ करते हुए चरैवेतिचरैवेति के संकल्प के साथ , ‘वैंक्विश्ड टुडे बट नाट फारएवर, टुमारो वी शैल राइज विद ग्रेटर विजडम एडं डिसिप्लिन‘ (लेखक की पुस्तक से उद्धृत) के विश्वास के साथ यह कहते हैं कि आम आदमी के लिये कोई पैराडाइस लॉस्ट , स्वर्ग का लोप नहीं है और नहीं उसके लिये कोई दॅ एण्ड ऑफ सिविलाइजेशन‘, सभ्यता का अंत है।
जोशी जी की यह पुस्तक हमेशा बेहतर की तलाश की मनुष्य की सतत चेष्टा और इस चेष्टा के तहत उसकी निर्मितियों, उनकी कमियों, कमजोरियों और उनसे उबरकर एक नये विकल्प की खोज की यात्रा है।
उनकी यह यात्रा वैकल्पिक सभ्यता की जन्मभूमि रूस से शुरू होती है। जोशी जी लिखते हैं–‘‘ रूसी क्रांति की सबसे महत भूमिका यही थी कि उसने व्यापक जनसाधारण को इतिहास के हाशिए से इतिहास की मुख्य प्रेरक शक्ति, मुख्यकर्ता के रूप में इतिहास के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। रूसी क्रांति मुख्य रूप से हमेशा इसीलिये याद की जायेगी, अमर रहेगी कि उसने श्रमिक जनता में आत्मसम्मान जगाया और अदम्य आत्मविश्वास पैदा किया और उसकी सर्जनात्मक ऊर्जा, उसमें निहित रचनात्मक अंत:शक्ति को नये समाज, नए अर्थतंत्र, नई राजव्यवस्था, नई संस्कृति के निर्माण का माध्यम बनाया।’’ जोशी जी रूसी क्रांति की इस महान भूमिका के बारे में गांधी, रवींद्रनाथ और जवाहरलाल नेहरू की स्वीकारोक्तियों का स्मरण करते हैं और यह सवाल उठाते हैं कि आज अभिजात वर्गों द्वारा उस महान स्मृति को मिटाने का जो अभियान चलाया जा रहा है, उसके पीछे वाशिंगटन समझौते के तहत चलायी जा रही नवउदारवादी संस्कृति की तो भूमिका है ही, इसके साथ ही क्या स्वयं रूस के अंदर की सोवियत व्यवस्था के विघटन के बाद की घटनाएं इसका प्रमाण नहीं है कि श्रमिक और जनसाधारण आज फिर से अपनी मानवीय स्थिति और नियति के मूक निष्क्रिय दर्शक बना दिये गये हैं और आज रूस में भी एक देश दो राष्ट्रवाला अमीर गरीब का विभाजन और अलगाव पैदा हो गया है।

अपने लेख स्तालिन के आखिरी मुलाकातीमें जोशीजी भारत के भूतपूर्व विदेश सचिव तथा बाद में मास्को में भारत सरकार के राजदूत श्री के.पी.एस. मेनन और भारतीय पुलिस के एक बड़े अधिकारी तथा रूस के इतिहास में विशेष दिलचस्पी रखने वाले श्री निगमेंद्र सेन के अध्ययन तथा जवाहरलाल नेहरू की यात्रा के हवाले से सोवियत संध के पूरे घटनाचक, स्तालिन की भूमिका को समझने की कोशिश करते हैं।

    वे सोवियत संध, यानी विश्व का पहला समाजवादी देश जिसके सामने अभूतपूर्व चुनौतियां थी, जहां बाहर और भीतर समाजवाद के दुश्मन इस नवनिर्मित देश को मिटाने पर तुले हुए थे, उस समय मार्क्स की धारणा के विपरीत एक अंत्यंत पिछड़े हुए राष्ट्र में संपन्न हुई समाजवादी क्रांति को बचाने और देश को विकसित करने का गुरु दायित्व किस तरह संभाला गया, इस पर गंभीरता से विचार करते हैं। वे फ्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लाक की इस बात को याद करते हैं कि ‘‘जहां तक महान ऐतिहासिक विभूतियों का सवाल है उनके बारे में तुरंत फैसला देना आसान है। लेकिन उन्हें समझना और उनके साथ न्याय करना अत्यंत कठिन।‘‘
      जोशी जी का कहना है कि स्तालिन के व्यक्तित्व का मूल्यांकन भी एक इतिहासकार के लिये गंभीर चुनौती भरा काम है। वे स्तालिन के बारे में लेनिन की एक टिप्पणी का हवाला भी देते हैं जिसमें लेनिन यह कहते हैं कि जनरल सेक्रटरी बनने के बाद स्तालिन ने अपने हाथ में अपार शक्ति केंद्रित कर ली है और मुझे इस बात का विश्वास नहीं होता कि वे इस शक्ति का प्रयोग एहतियात के साथ करना जानते हैं। इसके साथ ही वे स्तालिन को सनकी और स्वेच्छाचारी भी बताते हैं।
जोशी जी एक समाज वैज्ञानिक के नाते जहां पूरी निष्ठा के साथ उस पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने की कोशिश करते हैं जिसने स्तालिन की इन सब कमजोरियों के बावजूद उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचा दिया, वहीं वे गंभीरता के साथ यह भी संधान करते हैं कि क्या स्तालिनवाद के बीज रूस की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज नहीं थे?
     जोशी जी इतिहासकार ई.एच. कार की पुस्तक, ‘द बोल्शेविक रिवोल्यूशनतथा पत्रकार मौरिस हिंडस की चर्चित पुस्तक मदर रशाके हवाले से बताते हैं कि रूस के इतिहास में दो तरह की प्रवृतियां रही है, एक यूरोप के साथ जुड़ने और खुलेपन की प्रवृति थी जिसका प्रतिनिधित्व पीटर द ग्रेट ने किया था और लेनिन भी इसी परंपरा को जीवित रखने के लिये प्रयत्नशील थे और दूसरी परंपरा रूस के गैर यूरोपीय चरित्र को प्राथमिकता देने की और उसे यूरोप के मुकाबले एक महाशक्ति के रूप में सुदृढ़ करने की प्रवृति थी।
      ई.एच. कार के अनुसार रूस के बुद्धिजीवी भी दो खेमों में बंटे हुए थे। स्तालिन इसी दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे। जोशी जी का कहना है कि स्तालिन लेनिन की तरह मार्क्सवाद के मूल प्रेरणास्रोत, विवेकवाद और प्रबुद्धवाद के कठिन रास्ते से मार्क्सवाद तक नहीं पहुंचे थे। वे एक छलांग में धार्मिक प्रीस्टसे मार्क्सवादी प्रीस्टमें तब्दील हो गये थे और उन्होंने मार्क्सवाद को भी एक धार्मिक पंथ या संप्रदाय के रूप में ढ़ाल दिया। इसके चलते रूस अपने इतिहास की विवेकवाद और प्रबुद्धवाद की परंपरा से कट गया और रूस की आयरन कर्टेन से घेराबंदी कर स्तालिन का रूस पीटर द ग्रेट के रूस की मानसिक खिड़कियां और दरवाजे खोलने की परंपरा से भी कट गया।
     आश्चर्य होता है कि जब श्री मेनन स्तालिन को रूसी इतिहास में इवान द टेरिबलके समकक्ष रखते हैं तो जोशी जी ही उनकी बात का खंडन करते हुए यह कहते हैं कि रूस के आधुनिकीकरण में स्तालिन की महत भूमिका को देखते हुए उनका स्थान रूसी आधुनिकीकरण के प्रथम महानायक पीटर द ग्रेटके समकक्ष क्यों नहीं !
     मार्क्सवाद हमें बताता है कि ‘‘मानवजन अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं, पर अपने मनचाहे ढ़ग से नहीं। वे उसे अपनी मनचाही परिस्थितियों में नहीं, अपितु ऐसी परिस्थितियों में बनाते हैं, जो उन्हें अतीत से प्राप्त और अतीत द्वारा सम्प्रेषित होती है और जिनका उन्हें सीधेसीधे सामना करना पड़ता है।‘‘ स्तालिन के गुणदोष को भी हमें उस कालविशेष के संदर्भ में ही देखना पड़ेगा। लेकिन फिर भी प्रश्न तो स्वाभाविक रूप में मनुष्य के विवेक के सामने खड़े होते ही हैं। रवीन्द्रनाथ ने कहा थालेकिन सभ्यता का एक बुद्धिरूप भी होता है जो अन्न रूप से बड़ा है। जो सभ्यता जनता के मनरूपी खेत का कर्षण करके उसमें फल उत्पन्न कर पाती है वही महान होती है। इस कर्षण का अभाव जरूर कहीं तो रहा होगा।

         अपने आलेख महायुद्ध के बाद का रूस : भारतीय मूल्यांकनमें जोशी जी प्रोफेसर आशाराम, जो इलाहबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग के प्रोफेसर थे और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे तथा प्रसिद्ध समाजशास्त्री और बंगला साहित्यकार धूर्जटी प्रसाद मुखर्जी की रूस यात्राओं के जरिये यह बताने की कोशिश की है कि किस प्रकार क्रांति के बाद का रूस मेहनतकश जनता का ही नहीं प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी मक्का सा बन गया था। यानी जैसे किगडम ऑफ गाड आन अर्थईसाई धर्म के लोगों के लिये आस्था जागृत करता है, आलोचनात्मक विवेक नहीं उसी प्रकार रूस भी विश्वासी कम्युनिस्टों का आदर्श स्वप्न लोक बन गया था।
       जोशी जी के अनुसार आशाराम जी ने सोवियत समाज के अन्तर्विरोधों को देखा था और उसे अभिव्यक्त भी किया था लेकिन बंधे अंधविश्वासी कम्युनिस्टों ने उसे स्वीकार नहीं किया, उल्टे आशाराम जी की प्रतिबद्धता पर ही सवाल उठा कर उनकी भर्त्सना की।
     धूर्जटी बाबू की रूस यात्रा के अनुभवों का जिक्र करते हुए जोशी जी कहते हैं कि उन्होंने रूस को खुली आंखों से देखा था और उसके सकारात्मक पक्षों की सराहना करते हुए जहां उसे बच्चों, युवाओं, महिलाओं, वृद्धों और शिक्षकों का स्वर्ग बताया, वहीं उन्होंने इस बात पर आशंका भी जाहिर की थी कि महायुद्ध के बाद रूस को एक नयी दिशा देने में रूसी नेतृत्व कितना सफल और सक्षम होगा यह नहीं कहा जा सकता।
     उनके अनुसार इसके लिये रूस को वैचारिक पूर्वाग्रहों से मुक्त, नई दिशा के चिंतन में समर्थ स्वतंत्र बुद्धिजीवी समुदाय की जरूरत थी जिसकी उपस्थिति लगातार क्षीण होती जा रही थी और स्तालिन के नेतृत्व काल में तो बुद्धिजीवियों पर शासक वर्ग का सर्वसत्तावादी वर्चस्व कायम हो गया और रूस का स्वतंत्र बुद्धिजीवी वर्ग एक कैप्टिव बुद्धिजीवी वर्ग में तब्दील हो गया, वह सिर्फ‍ शासक वर्ग का व्याख्याता और टीकाकार बन कर रह गया। इसके बाद ही जोशी जी धूर्जटी बाबू और कामरेड पी.सी. जोशी के बीच हुई एक दिलचस्प बातचीत का हवाला देते हैं जहां इन दोनों में इस बात पर बहस होती है कि एक बुद्धिजीवी की पार्टी में क्या कोई जगह होती है, क्या वह सिर्फ‍ मंच की शोभा बढ़ाने की चीज भर है।
    धूर्जटी बाबू कहते हैं कि कम्युनिस्ट आंदोलन में तो बुद्धिजीवी पार्टी का बंदी है या महज पार्टी लाइन का व्याख्याता, प्रवचनकार, टीकाकार या प्रचारक। इन सबमें बुद्धिजीवी की जगह कहां है? धूर्जटी बाबू की इस बात के जवाब में पी.सी. जोशी कहते हैं कि एंटीइंटैलेक्चुएलिज्म का जवाब एंटीपोलिटीकल होकर तो नहीं दिया जा सकता। सच तो यह है कि राजनैतिक आंदोलन, राजनैतिक पार्टी, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं से अलग होकर तो बुद्धिजीवी लोकतंत्र में कोई सक्रिय और सार्थक भूमिका नहीं निभा सकता।...राजनीतिक क्षेत्र में बुद्धिजीवियों का प्रवेश और हस्तक्षेप ही राजनीति के अंदर एंटीइंटैलेक्चुएलिज्म की कड़ी दीवार को तोड़ सकता है। धूर्जटी बाबू पलटकर सवाल करते हैं कि : क्या बुद्धिजीवी के राजनीति में प्रवेश और हस्तक्षेप की यह जरूरी शर्त है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य बने और उसका अनुशासन स्वीकार करे। ...अनुभव बताता है कि पार्टीबद्ध, अनुशासनबद्ध बुद्धिजीवी अंत में एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी नहीं पार्टी का प्रवचनकार और व्याख्याता बनकर बुद्धिजीवी के रूप में समाप्त हो जाता है।‘‘
     जोशी जी भी धूर्जटी बाबू की इस बात को स्वीकारते हुए कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी जब सत्ता में आ जाती है तो उसका संगठन रेडिकल चेतना और चिंतन क्रिटिकल सोच का प्रतिरोधी बन जाता है। जोशी जी के अनुसार कम्युनिस्ट आंदोलन ने दुनिया भर में प्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को जितना अपनी ओर आकर्षित किया उतना और किसी आंदोलन ने नहीं, लेकिन इसके साथ ही जितने बड़े पैमाने पर उनके बुद्धिजीवी चरित्र पर कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन और अनुशासन ने आघात कर उन्हें स्वायत्त चिंतन में असमर्थ बनाया, उसकी भी कोई मिसाल नहीं है।
‘‘हम सामान्यतया उस स्वतंत्रता‘‘ को पसंद नहीं करते, जो केवल बहुवचन के लिये सार्थक है। इंग्लैंड हमें इस बात का बड़े ऐतिहासिक पैमाने पर प्रमाण प्रस्तुत करता है कि ‘‘ स्वतंत्रताओं‘‘ का संकुचित क्षितिज स्वतंत्रता के लिये कितना खतरनाक है।
‘‘स्वतंत्रताओं की, विशेषाधिकारों की बात,‘‘ वोल्तेयर कहते हैं, ‘‘मातहती की पूर्वकल्पना करती है। स्वतंत्रताएं सामान्य दासता में अपवाद का द्योतक है।‘‘ ( मार्क्स : पत्रपत्रिकाओ की स्वतंत्रता पर वादविवाद)

मार्क्स के उपरोक्त कथन के संदर्भ में हम बुद्धिजीवी की स्वतंत्रता को समझने की कोशिश करें तो नि:संदेह हमें यह समझते देर नहीं लगती कि बुद्धिजीवी की स्वतंत्रता और बुद्धिजीवी की स्वायत्तता भी अपने आप में एक मिथक ही है। वर्गों में विभाजित और शोषण पर टिके समाज में सिर्फ‍ पूंजी ही स्वायत्त होती है। लेकिन इसके बावजूद यह भी सच है कि पूंजी की स्वतंत्रता और मनुष्य की गुलामी का यह द्वंद्व ही मनुष्य की स्वतंत्रता का वह मूल्य भी पैदा करता है, जो अंतत: मनुष्य की गुलामी को खत्म करने में एक सहायक की भूमिका अदा करता है।
    जहां तक कम्युनिस्ट पार्टी में बुद्धिजीवी की परजीवी भूमिका का प्रश्न है यह सिर्फ‍ कम्युनिस्ट पार्टी का ही दोष नहीं है। कोई भी संगठन, समाज और दर्शन यदि अपने भीतरी लोकतांत्रिक स्वरूप को खो देता है, तो वह न सिर्फ‍ सत्य के संधान के अपने रास्ते को ही अवरुद्ध कर देता है बल्कि अपने मूल उद्देश्य से ही भटक कर कितनी ही विकृतियों और अंतत: अपने विनाश का भी कारक बन जाता है। इसलिये सवाल सिर्फ‍ बुद्धिजीवी की स्वतंत्रता का नहीं है बल्कि जैसा कि मार्क्स ने कहा, बहुवचन की स्वतंत्रता का है। बहुवचन की इस स्वतंत्रता का प्रश्न हमारे मन को सालता रहे और हम मुक्तिबोध की तरह खुद से यह पूछते रहें तो एक बुद्धिजीवी की भूमिका का शायद कुछ हद तक निर्वहन कर सकेंगे :

अब तक क्या किया जीवन क्या जिया
अपने ही कीचड़ में धंस गये
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये
बहुत बहुत ज्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम
मर गया देश अरे जीवित रह गये तुम।

अपने आलेख ‘‘स्तालिन के बाद का रूस : साहित्य की भूमिका‘‘ में जोशी जी ने चुप्पी के उस काल का जीवंत चि़त्रण रूसी कवियों की जानदार कविताओं से किया है। इसके साथ ही उन्होंने अपने कुछ जीवंत अनुभवों का भी जिक्र करते हुए यह बताया है कि किस तरह वैचारिक सेमिनारों में भी रूसी प्रतिनिधि मंडल हमेशा एक ही स्वर में बोलते थे, जबकि निजी बातचीत में उनके विचार अलग होते थे। जोशी जी की पुस्तक में ही उद्धरित त्वारद्वास्की की पंक्तिया बहुत कुछ कह देती है, जो इस प्रकार हैं:

‘‘जो कुछ रह गया था अनकहा
फर्ज कहता है कि हम आज वह सब कहें ‘‘

और अपने फर्ज के मानवीय बोध की यह चेतना ही है जो हर अंधेरे को तोड़ कर उजाले का रास्ता प्रशस्त कर देती है। इसीलिये खुद जोशी जी भी इस बात को स्वीकारते हैं कि पूरा परिदृश्य अंधकारमय नहीं है। वे लिखते हैंबाद की सोवियत यूनियन की अन्य यात्राओं के उपरांत सोवियत व्यवस्था की गहराती समस्याओं का अहसास और बोध मन में गहरा संशय पैदा करता था कि यह व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों से मुक्त होने और संकटग्रस्त होने की तरफ जाने से क्या बचने में समर्थ हो पायेगी? दूसरी ओर संशय से जूझता हुआ अंतर्मन का एक विश्वास भी बना रहा जो तर्क और बुद्धि से परे था, लेकिन मन में आशा जगाए हुए था समाजवाद निश्चय ही अपनी समस्याओं से जूझने में उसी प्रकार सफल होगा जैसे बीते दौर के संकटों पर विजयी हुआ है।
‘‘सलाम लेनिनग्राद‘‘ में उन्होंने फासीवाद पर सोवियत संघ की लाल फौज और उस देश की जनता की वीरता और कुर्बानियों का बेहद सजीव चित्रण किया है। रूसी कवियत्री अन्ना अख्मातोवा की कविताएं अत्यंत मार्मिक है, एक बानगी देखिये ‘‘हिम्मत‘‘ कविता की

‘‘मालूम हमें कि क्या गुजरती हम पर इस पल/मालूम नहीं क्या होगा कल सब कुछ तो अनिश्चित इस पल/मगर निश्चित है यह कि न छोड़ेगी हिम्मत हमारा साथ/घड़ी बताती है कि है यही हिम्मत की घड़ी आज/डर नहीं अगर ऊपर से बरसता सीसे का लावा/कोई साया न सिर पर मगर न कोई गिला न पछतावा/हर हालत में रखेगें महफूज तुझे, ओ हमारी शान/हमीं से पहुंचेगी हमारी जुबान हमारे बच्चों के बच्चों तक/आजाद और पाक, इंसानियत के लिये हिम्मत का यह सबक।‘‘ और इस अपराजेय हिम्मत पर मुस्कुराता हुआ लेनिनग्राड मौत को पराजित कर फिर उठ खड़ा होता है। लेखिका लिखती है– ‘‘और यह बिना तारों की/जनवरी की रात/इसकी अनोखी किस्मत से आश्चर्यचकित/मौत की अगाध गहराइयों से वापस लौटा/लेनिनग्राड स्वयं को करता है सलाम।
अन्ना अखमातोव की ये कविताएं और उनसे प्रभावित, बल्कि अभिभूत होकर लिखी गई शिशिर दास की मूल बांग्ला कविता, ‘कोथाय छिलाम आमी, कोथायका अंग्रेजी, रूसी और हिंदी में रूपांतरण और फिर इसका रूसी प्रतिनिधियों के बीच पाठआसुंओं की कोई भाषा नहीं होती, विश्व मानवता जैसे एक ही स्वर में बोल रही थी।

‘‘नई राह की खोज‘‘ में लेखक नवउदारवादी चिंतक फ्रांसिस फुकुयामा के चिंतन की आलोचना करता है और यह बताता है कि किस तरह येल्तसिन ने तथाकथित आर्थिक सुधारों को लागू करके प्रगति के जो सपने दिखाये थे, वे सपने पूरा होना तो दूर उसने तो रूसी जनता को उपलब्ध सारी सुविधाओं को ही छीन लिया।
    अर्थतंत्र से राज्य का वर्चस्व हटाकर सबकुछ बाजार के हाथों सौंप देने के परिणाम सब उल्टे ही साबित हुए। लेखक का कहना है कि सोवियत समाजवादी व्यवस्था की असफलता और नवउदारवाद की असफलता ने एक न्यायसम्मत समाज की मनुष्य की आकांक्षा को पराजित नहीं किया है। उसकी विकल्प की तलाश अभी जारी है। विकल्प की इसी तलाश में लेखक यह सवाल करता है कि क्या जनसाधारण की व्यापक गरीबी और अभाव के बीच अमीरी के ये द्वीप नई सभ्यता के स्थायी प्रतीक हैं या समाज के प्रबुद्ध तत्वों के लिये एक चेतावनी है और विकास के नाम पर हो रहे इस अपविकास को रोकने और विकास का नया मॉडल खोजने के लिए एक चुनौती। लेखक इसी द्वंद्वात्मक सामाजिक संदर्भ में नए वैचारिक क्षितिज, नई राहें खोजने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करता है। जोशी जी के विचारों, उनके निष्कर्षों से आप सहमत हों या न हों, लेकिन आप उनकी चिंताओं से खुद को अलग नहीं कर सकते। इस बेहद रोचक विमर्श के लिये जोशी जी को अकूत धन्यवाद।