5.4.11
चिरंतन कहानियाँ । (अकबर-बिरबल)
Posted by
Markand Dave
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Labels: अकबर, पिता, बिरबल, मज़ाक, माता, मार्कण्ड दवे, हास्य-व्यंग
11.5.08
मदर्स डे पर अभागिन मां से मिला पुत्र
सभी भड़ासी साथियों को मदर्स डे का बेमिसाल तोहफा
मै पिछले कई दिन से एक अभागिन मां को उसके घर पहुचाने के प्रयास में लगा था, आखिर आज शाम 7 बजे सफलता हासिल हो गयी।
कानपुर नगर स्थित वृद्धाश्रम में रोहतास जिले के सुजानपुर गांव की रहने वाली माता जी श्रीमती राजमणि दुबे विगत तीन माह से अपने परिवार से बिछुड कर रह रही थी। हर पल घर की याद हर पल अपने बच्चो की याद में समय काट रही थी। उधर उस मां के बच्चे भी अपनी मां को लगातार ढूंट रहे थे, बिना किसी पते के।
दिनांक 08।05.2008 को मैने एक पोस्ट भड़ासी साथियों के लिये डाली जिसमें साथियों से अनुरोध किया था कि वह इस अभागी मां के बच्चों को ढूढने मे हमारी मदद करें, अभी 12 घण्टे भी नही बीते थे कि दिल्ली के राजीव रंजन व सासाराम के मुकेश जी जो अब दिल्ली में रह रहे है तथा भड़ासी भी है, ने फोन पर पता सूचित किया, जिसके बाद मैने धन्यवाद भडासियों जीत ली जंग शीर्षक से एक पोस्ट डाली थी।
भड़ास में प्रकाशित पोस्ट के बाद, भड़ास से सूचना पाकर आज श्रीमती राजमणि दुबे का पुत्र कानपुर आ गया और अभी अभी वृद्धाश्रम अपनी मां के पास पहुंच चुका है, वह अपनी मां को अभी पुरूषोत्तम एक्सप्रेस से वापस घर ले जाने के लिये निकल रहा है।
यहां पर एक दु:खद पहलू यह हे कि अपनी मां को खोजते-खोजते इनके एक पुत्र का निधन हो गया जिसका दंसवा संस्कार परसो उसके घर पर होगा।
मदर्स डे को ये तोहफा सभी भड़ासियों की तरफ से राजमणि व उसके परिवार को है।
आज भडास ने वह कर दिखा दिया जिसके लियें लोग सिर्फ बाते ही करते है।
मै इस इचीवमेन्ट के लियें बडे भाई यंशवत जी, राजीव रंजन जी, मुकेश जी, रूपेश जी, रजनीश जी को एक बार पुन: धन्यवाद दे रहा हू।
5/10/०८
8:21 PM
मां मैं अंश हूं तेरा
मां मैं अंश हूं तेरा।
मुझमे समाहित हैं तेरे विचार
संस्कार तेरा प्यार।।
तू जननी है मेरी, मेरे गुणों की।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
तूने ही मुझको चलना सीखाया।
ये जीवन है क्या तुम्ही ने बताया।।
मुसीबत से लडना भी तुमने सीखाया।
मैं आवाज हूं मां तेरी धडकनों का।
तू जननी है मेरी, मेरे व्यक्तित्व की।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
जहां भी रहूंगा तेरा नाम लूंगा।
तेरे आंसुओं को अपनी पलकों पर थाम लूंगा।
मेरी हर खुशी तेरी चरणों में माते।
मैं कर्जदार हूं तेरी हर एक सांस का।
तू जननी है मेरी, मेरी भावनाओं की।
मां मैं अंश हूं तेरा।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
मां यह शब्द सुनते ही हम खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं। यह केवल एक शब्द ही नहीं ममता की वह विशाल छांव है जो हमे हर मुसीबत और विपदा से बचा कर रखती है। यह शब्द सुनते ही हम खुद को एक बच्चा महसूस करते हैं चाहे हमारी उम्र जो भी हो। साथ ही हमारा बचपना भी झलकने लगता है। सभी साथियों से अपील है कि इस कविता को पढने के बाद एक बार मां शब्द का उच्चारण जरूर करें। देखिएगा इससे कितना सुकून मिलेगा। तो कहिए मां।
