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8.12.13

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

चार राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय मतदाता की परिपक्वता दर्शाता है , भारतीय युवा
मतदाता अब अपना भला बुरा सोचने लगा है और यह बात इस चुनाव में यह बात उभर
कर सामने आयी है. भारतीय अब जिंदाबाद और मुर्दाबाद से ऊपर उठ कर देश का सही
मायने में विकास देखना चाहता है।

 कुछ सच्चाईयाँ जो चुनावी परिणाम से सामने आयी है - 

        जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है और वह गलतियों को नजर अंदाज कर
देती है यह बात अब बीत चुकी है।

         जनता मुर्ख होती है उसे मुर्ख बनाने की कला को राजनीति की कभी परिभाषा कहा
जाता था लेकिन अब यह परिभाषा खत्म हो चुकी है।

        जनता आज तक नेता चुनती थी लेकिन अब जनता जनसेवक चुनने कि दिशा में
आगे बढ़ रही है।

        जनता अपने कर के पैसे को कहाँ खर्च किया जा रहा है उसे गहराई से देख रही है
और जैसे ही कोई पार्टी उस धन का दुरूपयोग करने लगती है उसे जनता गेट आउट कहना
सीख चुकी है।

      जनता अपना उचित हक़ हर कीमत पर चाहती है वह किसी नेता या पार्टी की भीख
या दया नहीं चाहती है।

      जनता नेताओं के किए गए वायदो को ध्यान से सुनती है और उसे खुद की सोच के
तराजु पर तोलने के बाद निर्णय लेती है।

        जनता हर मीडिया को सुनती है और खुद निर्णय पर पहुँच रही है कि मीडिया कितना
झूठ या सच है ,वह खबरों पर अँधा विश्वास नहीं  कर रही है।

       जनता जनसेवक का सम्मान तभी करेगी जब जनसेवक अपने कर्मो से यह साबित
करे कि वह राजनीति में पैसा बनाने के लिए नहीं सेवा करने के लिए आया है।

    जनता आंकड़ो के मायाजाल के फेर में नहीं पड़ कर यथार्थ को देखने लगी है जनता को
जब भी उद्घाटन के पाटिये चिड़ाते हैं तो जनता उस नेता को ही चिढ़ा देती है।

    जनता को हाथ जोड़कर वोट ले जाने वाले नेता जब खुद को जनता का राजा समझने
लगता है तो जनता उस अभिमानी को वापिस जनता बना देती है।

  जनता अब तभी बदलाव चाहती है जब सरकारें उसके मिजाज के खिलाफ काम करती
है जब तक जनता कि मर्जी के काम होते रहते हैं तब तक जनता दखल नहीं देती है।

   जनता टीम के कप्तान को ही नहीं पूरी टीम और सरकारी अफसरों को भी ईमानदार
देखना पसन्द कर रही है।

 जनता न तो छद्म धर्मनिरपेक्षता चाहती है और न ही छद्म राजनीति ,जनता धुर्त लोगों
पर कालिख पोतना सीख चुकी है।

जनता का मिजाज अब बदल गया है वह सीधा और सपाट कह रही है -अपना मेहनताना
लो और देश की सेवा करो और सेवा की जगह मेवा पाना है तो रास्ता नापो  …… 
           

27.10.13

सोच का फर्क

सोच का फर्क 

सब्जी मंडी नहीं कह सकते उस जगह को क्योंकि वह एक चौड़ा रास्ता है उसके आस
पास रहीश और अमीर लोगों की कॉलोनियां हैं। उस चौड़े रास्ते पर कुछ ठेले वाले
सब्जियां बेच कर अपना परिवार चलाते हैं।
एक युवती सब्जी वाले से पूछती है - भईया ,भिन्डी क्या भाव है ?
सब्जी वाले ने कहा -बहनजी ,पचास रूपये किलो।
युवती -क्या कहा !पचास रूपये !! अरे बड़ी मंडी में चालीस में मिलती है  …
सब्जीवाला -बहनजी वहां से लाकर थोड़ी थोड़ी मात्रा में यहाँ बेचना है  में मुश्किल से
दस किलो बेच पाता हूँ ,मुझे तो उसी दस किलो की बिक्री से घर चलाना है
युवती -तो क्या करे हम ,हम भी मेहनत से कमाते हैं ,देख पेंतालिस में देता है तो
एक किलो दे दे ?
सब्जीवाला उसे एक किलो भिन्डी पेंतालिस के भाव से दे देता है और अनमने भाव से
बाकी के पैसे लौटा देता है
वह युवती घर लौटती है और अपने पति से बताती है कि किस तरह वह भाव ताल
करके सस्ती सब्जी लाती है। पति उसको गर्व से निहारता है और मॉल में खरीद दारी
के लिए ले जाता है। वह युवती पर्स पसंद करती है और उसे पेक करने का ऑर्डर दे
देती है यह देख उसका पति बोलता है -रुक ,जरा भाव ताल तय कर लेते है ,तुमने तो
उससे भाव भी नहीं पूछा और सामान पैक करने का भी कह चुकी हो  ….
युवती बोली -आपकी सोच कितनी छोटी है ,ये लोग अपने को फटीचर नहीं समझेंगे ?
युवक बोला -अरे चीज खरीद रहे हैं ,भाव पूछने में क्या जाता है ,वाजिब होगा तो
लेंगे नहीं तो दुसरे से खरीद लेंगे
युवती ने कहा - देख नहीं रहे हो ,यहाँ सभी अपने से ज्यादा पैसे वाले लोग खरीदी
कर रहे हैं और चुपचाप बिल चूका रहे हैं ,आप मेरी इज्जत का कचरा करायेंगे मोल
भाव करके ,ज्यादा से ज्यादा सौ -दो सौ का फ़र्क होगा
 मॉल से पर्स खरीद कर वो दरबान को दस रुपया टीप देकर बाहर निकल आते हैं
ये घटनाएँ छोटी हो सकती हैं मगर बहुत गहरा प्रभाव देश पर छोडती है। एक गरीब
मेहनत करके परिवार का पेट इमानदारी से पालना चाहता है तो हम उससे मोल
भाव करते हैं और वो बेचारा पेट की भूख की मज़बूरी को देख सस्ता देता है और एक
तरफ धन्ना सेठों की दुकानों पर मुहँ मांगे दाम भी देते हैं। कभी हमे पाँच रूपये बचाना
होशियारी लगता है तो कहीं सौ -दो सौ लुटाना वाजिब लगता है।

फैसला कीजिये खुद कि क्या आप सही कर रहे हैं ,आने वाले पर्व त्योहारों पर गरीब
लोगों से सडक पर छोटी छोटी वस्तुओं पर भाव ताव करके पैसे मत बचाईये ,जैसे
आप त्यौहार हर्ष से मनाना चाहते हैं वैसे इन मेहनत कश लोगों को भी त्यौहार के
दिन उनका माँगा मुल्य देकर उनके घर भी कुछ पल रौशनी के आ जाए ,ऐसा काम
कर दीजिये ,  आपके घर जलने वाले दीपक से कोई झोपडी में ख़ुशी आ जाए तो
आप इसमें सह भागी बनिये।

ठीक लगे यह विचार तो आगे अपने दोस्तों में शेयर कीजिये। 

4.11.12

झूठा सच


झूठा सच 

देश में फर्जी आंकड़ो के तहत झूठ फैलाना तथाकथित  शिष्ट लोगो के जीवन का अंग बनता
जा रहा है। सिक्के के एक पहलू  को दिखा कर भ्रम पैदा किया जा रहा है।

आंकड़ा आया देश की 40% फसल उचित व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो जाती है 

एक किसान से पूछा गया -आपके पास कितना बीघा खेत है?

उत्तर था- तीन बीघा।

आपके खेत में एक फसल कितने बोरी होती है?

गेंहू बोने पर आठ बोरी।

क्या तुम्हारे पास साधन नहीं होने से तीन बोरी गेंहू नष्ट हो जाता है?

उत्तर था- क्यों मेरा मजाक कर रहे हैं बाबू, मेरी पूरी पैदावार से पांच सेर गेंहू नष्ट हो जाता
है क्योंकि फसल को भरने के बोरे नहीं हैं मेरे पास,अगर बोरे  मिल जाते तो सेर भर भी
खराब नहीं होते।
                       ----------------------------------------------

एक माली से पूछा गया - आप सब्जी की बाड़ी में सब्जियां उगाते हैं?

उत्तर था -जी,आधा बीघा जमीन पर बाड़ी की है,चार-पांच तरह की सब्जियाँ बोता  हूँ।

आपके पास सब्जियों को मंडी तक ले जाने के पर्याप्त साधन नही होने से आधी सब्जियां
सड़ जाती है ?

माली बोला -बाबू, आधी सब्जी कैसे सड़ने दूंगा? हर दिन बाड़ी की देखरेख करता हूँ,जो
सब्जी पैदा होती है उसे ताज़ी ही साईकिल पर रख कर कस्बे में ले जाता हूँ और बेच
देता हूँ।
                      --------------------------------------------------

एक फल वाले से पूछा - आपने क्या बोया है।

उत्तर था -चीकू की फसल लेता हूँ।

क्या आपके पास साधन नही होने के कारण चीकू पेड़ पर या खेत में पड़े-पड़े सड़ जाते हैं

उत्तर था -बाबू,आप शहर से आये लगते हैं।पेड़ पर चीकू पका हुआ नहीं पैदा होता।फल को
लगाने और पकने में समय लगता है।हम अधपका चीकू  उतारते रहते हैं और बाजार में
बेचते हैं।अधपका चीकू सप्ताह भर तक खराब नहीं होता है।

                ---------------------------------------------------------

 एक किसान से पूछा -आपने खेत में क्या बोया था ?

उत्तर था- इस बार जीरा लगाया था

क्या जीरे की फसल का उचित भंडारण नहीं होने से जीरा  40% तक सड़ जाता है

उत्तर था-सा,ब, आपको कागजी ज्ञान है व्यवहारिक ज्ञान में कोरे लगते हो।आगे से ऐसा
सवाल किसी से ना करो इसलिए बता देता हूँ कि जीरा सालों तक सड़ता नहीं है।

                         --------------------------------------------------

हम आगे बढे और एक किसान से पूछा -आपने क्या बोया है
उत्तर था -ग्वार
क्या आपके गाँव में शीत गृह है जिसमे गवार की फसल को रखा जा सके ताकि ग्वार सड़े
नहीं।
उत्तर था -हा-हा-हा- ग्वार दस साल तक भी नहीं सड़ता है बाबू ! मगर तुम ये सब क्यों
पूछ रहे हो !!

मेने कहा -भाई ,सरकार कहती है कि किसान जो उपजाता है उसका 40%भाग साधन
नहीं होने के कारण नष्ट हो जाता है।उसकी उपज नष्ट नहीं हो इसलिए देश को FDI की
आवश्यकता है जो घर बैठे आपकी फसल खरीद लेगी और उचित भाव भी देगी।

उत्तर था- किस सरकार की बात करते हो भाई ,जो किसान को अच्छा बीज और खाद भी
मुफ्त में नहीं दे सकती है ,बीजली का भारी बिल भरवाती है और समय पर बिजली भी
नहीं देती है, रही बात फसल बेचने की तो इतनी समझ तो हम में भी आ गयी है कि खेत
पर फसल नही बेचना है ,उचित भाव बाजार में मिलने तक इन्तजार करना है।

                     ---------------------------------------------

ये सब सुन कर क्या अब भी रिटेल FDI की जरुरत किसान के लिए महसूस करेंगे ,
देश को गुमराह ना करे।रिटेल में FDI सिर्फ बेरोजगारी उत्पन्न करेगी।पेट दुखता है
माथा दबाने से क्या फायदा ?FDI हर बिमारी का राम बाण इलाज तो नहीं हो सकती है                   
   

20.6.12

साम्प्रदायिकता को पहला पत्थर कोई धर्म निरपेक्ष ही मारे !


साम्प्रदायिकता को पहला पत्थर कोई धर्म निरपेक्ष ही मारे !

क्या कोई वास्तव में निरपेक्ष हो सका है ? क्या पृथ्वी पर जितने भी धर्म हैं उनमे से कोई निरपेक्ष है
क्या विश्व का कोई भी नेता निरपेक्ष था या है ?क्या कोई समाज,जाती ,वर्ण ,वर्ग या व्यक्ति धर्म
निरपेक्ष हो सकता है ? नहीं ...नहीं ...नहीं.........

          विश्व के सभी धर्म सांप्रदायिक ही होते हैं ,विश्व की सभी जातियां साम्प्रदायिक ही होती है
विश्व के कोई भी एक धर्म का नाम बता सकते हैं जो निरपेक्ष है सापेक्ष नहीं है .विश्व की एक भी जाती
ऐसी नहीं है जो साम्प्रदायिक नहीं है .

        मनुष्य समूह में रहता है और जो समूह में रहता है उसने अपने समूह के कुछ सिद्धांत बना रखे
हैं ,उन सिद्धांतो पर चलने वाले अपने सम्प्रदाय से प्यार करते हैं .सभी मनुष्य बुद्धिजीवी हैं ,सभी ने
अपने-अपने सिद्धांत समूह के अनुकूल बनाए हैं, हो सकता है एक  समूह विशेष को दुसरे के सिद्धांत 
परस्पर प्रतिकूल लगे मगर एक बात पक्की है की व्यक्ति जिस वर्ण ,जाती,धर्म या देश में 
रहता है तथा जिस समूह के सिद्धांतो को मान्यता देता है वह सांप्रदायिक होता ही है .

          मेरे देश के राजनैतिक दलों में संप्रदाय वाद कूट-कूट कर भरा है .कोई पूंजीपति का सम्प्रदाय
है ,कोई दल समाजवाद का सम्प्रदाय है ,कोई दल दलित सम्प्रदाय है,कोई दल हिन्दू सम्प्रदाय है
तो कोई दल मुस्लिम सम्प्रदाय . सभी दल मनुष्य ने बनाए है जो अपने अपने सम्प्रदाय को अच्छा 
मानते हैं मगर वास्तव में देखा जाए तो सब के सब साम्प्रदायिक ही हैं क्योंकि सब निश्चित सिद्धांतो 
से बंधे व्यक्तियों का समूह जो हैं .

          अब प्रश्न यह उठता है कि इस देश का प्रधान धर्म निरपेक्ष होना चाहिए ! इस देश में कोई भी
ऐसा नेता है जो धर्म निरपेक्ष है .यदि एक भी नेता अपने को निरपेक्ष सिद्ध कर सके तो फिर हमें
साम्प्रदायिकता को पत्थर मारना चाहिए .पहला पत्थर साम्प्रदायिकता को वो दल का नेता मारे जो
अपने को निरपेक्ष समझता है .क्या किसी भी सम्प्रदाय में रहने वाला कोई भी निरपेक्ष व्यक्ति है ?

       इस विश्व को किसी न किसी सम्प्रदाय में रहना है ,इसलिए साम्प्रदायिक होना बुरा नहीं है .यदि
बुरा है तो हर समूह में पाए जाने वाले निंदनीय आपराधिक कृत्य . आपराधिक कृत्य /दुर्गुण /पाप ही
बुरा है ,कोई भी सम्प्रदाय बुरा कैसे हो सकता है.

10.6.12

भारतीय राजनैतिक दलों की छत्तीसी


भारतीय राजनैतिक दलों  की छत्तीसी  


1.परिवारवाद का दलदल
2.व्यक्ति ही सर्वेसर्वा
3.कुर्सी से चिपके नेता
4.देशहित से किनारा
5.मज़बूरी के गठबंधन
6.खोखला चरित्र
7.लोकव्यवहार की कमी
8.आम जनता से कोसों दूर
9.भ्रष्ट आचरण
10.जी हुजुरी
11.चाटुकारों की भीड़
12.सत्य को अनदेखा करने की प्रवृती
13.जातिवाद के समीकरण
14.धन का कुप्रयोग
15.जिसकी लाठी उसकी भैंस
16.अपराधिक गतिविधियों में लिप्तता
17.गलतियों के पुतले
18.ठीकरे दुसरो पर फोड़ने का स्वभाव
19.फटे में टांग अडाने में आगे
20.वचन भंग के दोषी
21.धूर्तता ही नीति
22.इन्द्रिय लोलुपता
23."आ बैल मुझे मार" वाले निर्णय
24."चलता है" तो बदलाव क्यों
25. देखना है! देख रहे है!!देखेंगे !!!
26.गंभीर निर्णय के समय टालमटोल 
27.आडम्बर में विश्वास
28.भाषण बाजी में अगाड़ी
29.अलग डफली अलग राग
30.झूठे का बोलबाला
31.वोट मेनेजमेंट
32.आंकडों की कलाबाजी
33.समय का दुरूपयोग
34.हवन में हड्डियाँ डालना
35.संवेदन हिन हर्दय
36.केंकड़ा वृती    

8.6.12

डीजल,पैट्रोल और राशन प्रणाली


डीजल,पैट्रोल और राशन प्रणाली

हमारे देश की अर्थ व्यवस्था डीजल तथा पैट्रोल की बढती दरों के कारण डगमगा जाती है .हमारे देश में
पेट्रोलियम पदार्थों की खोज पर अभी तक गंभीरता से किसी भी सरकार ने काम नहीं किया है .हमें
अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विदेशो पर निर्भर रहना पड़ रहा है .दिन -प्रतिदिन खपत बढ़ती
जा रही है और आपूर्ति के लिए बहुमूल्य विदेशी धन के कोष को खर्च करना पड़ता है .सरकार इस सेवा
को धीरे -धीरे सब्सिडी मुक्त करना चाहती है और इस कारण डीजल तथा पेट्रोल महंगा होता जा रहा है .
सरकार पेट्रोलियम पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दे मगर इन सभी पेट्रोलियम पदार्थो को राशन प्रणाली
के अन्तर्गत वितरण भी सुचारुरूप से करना शुरू करे ताकि आम गरीब भारतीय पर पेट्रोलियम पदार्थों
की बढती दरो का दुष्प्रभाव कम से कम पड़े .
   वर्तमान में डीजल तथा पेट्रोल खुल्ले बाजार में सबको समान भाव में उपलब्ध है ,अगर इनकी दरे
बढती है तो उच्च वर्ग पर इसका कुछ भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है .उच्च वर्ग बिना कोर कसर के इन
पदार्थो का भरपूर उपयोग करता है .उच्च वर्ग के पास क्रयशक्ति है मगर आम भारतीय की क्रयशक्ति
कम होती जा रही है ऐसे में सरकार जो वर्तमान में पेट्रोलियम पदार्थो पर सब्सिडी दे रही है उसका
फायदा आम भारतीय को नहीं मिल रहा है क्योंकि ना तो आम भारतीय के पास कारे हैं और ना ही
टू व्हिलर .इन पदार्थों की सब्सिडी का उपयोग धनी भारतीय ही कर रहा है जबकि बोझ समान रूप
से सब भारतीयों पर पड़ रहा है .
   अगर सरकार वास्तव में आम भारतीयों का हित चाहती है तो पैट्रोल और डीजल पर राशन प्रणाली
लागू कर देनी चाहिए .टू व्हिलर, ट्रेक्टर,ऑटो तथा टेक्सी को एक निश्चित मात्रा में सस्ती दर पर पैट्रोल
तथा डीजल मिले तथा  सरकारी परिवहन के साधनों को पूरी जरुरत का पेट्रोल -डीजल सस्ता उपलब्ध
हो बाकी सब साधनों को बाजार भाव से पेट्रोलियम पदार्थ उपलब्ध हो ,इससे आम भारतीयों पर बढती
दरो का कम प्रभाव पडेगा .जितना पेट्रोल डीजल इन लोगो को सस्ती दरो पर उपलब्ध कराया गया है
उसका भार भी मुक्त रूप से उपलब्ध पेट्रोलियम पदार्थो पर जोड़ दिया जाए ताकि बढ़ी दरो का प्रभाव
उसी वर्ग पर पड़े जो उसे उठाने में सक्षम है .      

27.2.12

चोर सांसद को चोर कहने से लोकतंत्र कमजोर होता है तो ऐसा कमजोर लोकतंत्र मंजूर है


टीम अन्ना के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने गाजियाबाद में शनिवार को जो बयान दिया था उसमें खरी
सच्चाई है .पूरा देश जानता है की वर्तमान में संसद के मंदिर में १६३ सांसदों के खिलाफ जघन्य अपराध
 के मामले चल रहे हैं.

       नेताजी को अपना गुनाह भी पुण्य लगता है !जो नेता खुद के गुनाह को गुनाह कबूल करते हैं वे तो
वास्तव में जनसेवक हैं क्योंकि उनमे छोटी सी उम्मीद की किरण दिखाई देती है की वे खुद को सुधारने
के लिए प्रयत्न करेंगे और उनको तो टीम अन्ना के सदस्य केजरीवाल या देशवासी गाली नहीं दे रहे हैं
मगर यदि स्वच्छ छवि के जनसेवक को गुनाहगार सांसदों को दी हुई कडवी सच्ची बात बुरी लगती है तो
फिर वो लोग भी स्वच्छ जनसेवक कैसे हुए ? हमारे लोकतंत्र की यह कमजोरी है की हमारा कानून  चुनाव
में उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र भरने की अनुमति आपराधिक लोगों को  दे देता है.

     अपराधी लोग आज तो १६३ हैं यदि ये बहुमत में आ जाए तो संसद कैसी होगी ?कैसे कानून  बनेंगे?
क्या अपराधी लोग जनहित की बात सोचेंगे ?

     सवाल यह उठता है की ऐसे लोगों को चुनता कौन है और क्यों चुन कर भेजता है ?

हमारे देश में शिक्षा का अभाव ,जातिगत समीकरण,धन से वोटो की खरीद ,मतदान के प्रति अनुत्साह,
बाहुबल ,मतदान केन्द्रों पर कब्जा आदि कारण हैं जिनके कारण अपराधी तत्व सांसद और विधायक
बन जाते हैं .

किसी अपराधी के  सांसद या विधायक चुन लिए जाने मात्र से  क्या उसका अपराध ख़त्म हो जाता है ?
क्या कुकर्मी भगवा वस्त्र पहन लेने या हज कर आने से पवित्र हो जाता है ? क्या अपराधी सांसद
या विधायक संसद की गरिमा को बढाते हैं ? क्या किसी अपराधी ने साम ,दाम ,दंड या भेद किसी भी
कारण से चुनाव जीत लिया है तो जनता उसके दोषों को नजर अंदाज कर दे ?

केजरीवाल ने कोई गप्प नहीं लगाई है या किसी को भ्रमित नहीं किया है उन्होंने तो उस जनता को
जागरूक करने का प्रयास किया है कि यदि जनता सोच समझ कर फैसला नहीं करती है और मत
का सोच समझ कर उपयोग नहीं करती है तो लोकतंत्र के बुरे परिणाम भी भुगतने के लिए उसे तैयार
रहना पडेगा .

      करोडो -अरबों कि राशि का गबन करने वाले सांसदों कि जय जयकार या वाहवाही क्यों चाहते हैं
आज के जनसेवक ? क्यों बुरे सांसदों को बुरा कहने पर भड़कते हैं सफेद कॉलर नेता ? यदि वो लोग
देश और देश के संविधान के प्रति वफादार हैं तो बुरे को बुरा कहने मात्र से क्यों मिर्ची लग जाती है?
क्यों आपराधिक सांसदों के प्रति सहानुभूति रखते हैं स्वच्छ छवि रखने वाले सांसद?

   सभी दल के नेता क्यों टिकिट देते हैं आपराधिक छवि वाले लोगों को ? सभी दल बाहुबलियों को
टिकिट देते हैं ,सभी दलों के नेता उन अपराधियों को चुनने के लिए जनता के दरवाजे पर दस्तक देते
फिरते हैं और यही कारण है कि केजरीवाल जैसे देशवासीयों को गाली देने के लिए आज सभी दल
उतारू हैं.

   चोर सांसद को चोर कहने से ,हत्यारे सांसद को हत्यारा कहने से ,बलात्कारी सांसद को बलात्कारी
कहने से यदि लोकतंत्र कमजोर होता है तो ऐसा लोकतंत्र ही क्या काम का ? मीडिया को चाहिए कि
वो भी राष्ट्र धर्म का पालन करते हुए केजरीवाल जैसे लोगो के पक्ष में माहोल बनाए क्योंकि आज
मिडिया की ताकत से अनेको राज पर्दाफाश हुए हैं और अपराधी विधायक ,सांसद जेल कि हवा खा
रहे हैं .     

15.1.12

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय  

कथनी करनी का फर्क राजनेताओ ,धार्मिक बाबाओं और समाजसेवको में फैला है और इस कारण
आम भारतीय व्यथित है इस आक्रोश को वो चप्पल जूते उछालकर,थप्पड़ मरकर या कालिख पोतकर
दिखा रहा है .यह बात सही है की ऐसी घटनाएं निंदनीय होनी चाहिये क्योंकि सभ्य लोकतंत्र में विरोध
प्रगट करने के और भी तरीके हैं मगर सवाल यह उठता है कि फिर आम भारतीय ऐसा क्यों कर रहा है.
इसका कारण है -भ्रष्ट नेता ,धन के लोभी बाबा लोग,कथनी करनी का फर्क ,निचे दर्जे क़ी सियासत,
आश्वासनों का ढेर ,लालफीताशाही ,रिश्वत ,कालाबाजारी,काम  में लेटलतीफी,महंगाई और बेरोजगारी .

            हमारे देश के नेता कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं ,समस्याओं का हल आरोप -प्रत्यारोप मढने
तर्क-कुतर्क देकर या बहाना बनाकर खोजते हैं . बात महंगाई क़ी आती है तो महंगाई के गिरते आंकड़े
दिखाकर जनता को बरगलाने क़ी कोशिश क़ी जाती है .बात बेरोजगारी क़ी आती है तो जनता को
विकसित भारत के सपने दिखा कर चुप कर दिया जाता है ,बात रिश्वत खोरी क़ी आती है तो सभी दल
सोगंध के सच्चे  बन कर रिश्वत खोरी से लड़ने के लिए मुठ्ठियाँ कसते दिखाई जरुर देते हैं मगर यथार्थ
में नतीजा ढाक के तीन पात होता है .काम के लिए समय तय करने क़ी बात होती है मगर काम नहीं
होता है .युवाओं को काम देने क़ी बात कही जाती है तो सरकार मुंह लटका के खड़ी हो जाती है.बढ़ते
भाव से जनता निजात चाहती है तो सस्ते में चीजे उपलब्ध कराने क़ी राजनीति खेली जाती है .आखिर
क्या करे आम आदमी ,कहाँ जाए और किससे कहे अपना दुखड़ा ......जब सारे रास्ते बंद नजर आने
लगे तो हताश आदमी का आक्रोश जूते ,चप्पल,कालिख का सहारा लेकर बाहर उभर जाता है .

              जनसेवक पैसेवाले बनते जा रहे हैं और आम भारतीय गरीब .ऐसा क्यों हुआ .हमारे ही द्वारा
निर्मित सिस्टम के कारण .आज जैसे ही कोई दल चुनाव जीत जाता है तो जनता के साथ पांच साल
तक अपनी विचारधारा थोप देता है ,कोई उनसे ये कहने क़ी जरुरत करता है आप गलत हैं तो उत्तर
मिलता है जनता ने हमें चुनकर भेजा है इसलिए पांच साल तक हम सर्वोपरि हैं ,हमें भोगिये ,सहन
कीजिये .जब देश हित गौण हो जाता है पक्ष का हित ऊपर हो जाता है तब आम व्यक्ति व्यथित हो
खुद के ठगे जाने को सह नहीं पाता है और अपनी जान पर खेल कर भी किसी को थप्पड़ या किसी को
जूता मार देता है .

         मेरे राष्ट्र के बाबा लोग आज धन लोलुप हो गए हैं .हर नामी बाबा आलिशान फार्म हाउस यानि
आश्रम के नाम पर देश में जगह-जगह सम्पत्ति खड़ी कर रहे हैं .आलिशान चमचमाती कारों में घूमते हैं
अपने कारखाने चला रहे हैं ,पुस्तके बेच रहे हैं .ऐसे ढोंगी बाबा जब जनता को आदर्शो क़ी माला जपने
का उपदेश देते हैं तो जनता पर क्या सही असर पडेगा?बाबा लोग कंचन और कामिनी में लिप्त पाए
जाते हैं और आम जनता को उपदेश करते हैं क़ी सदाचारी बने ,क्या ऐसा उपदेश और ऐसे बाबा ढोंगी
नहीं हैं .अस्तेय और अपराग्रह को बाबा लोग अपने जीवन में नहीं उतार पाते हैं और लोगों को शिक्षा
देते हैं .आज देश का हर नामी बाबा करोडो रूपये संचय कर रहा है ,आखिर क्या जरुरत है संचय करने
क़ी ,वास्तव में ये लोग जिस भी धर्म के प्रचार में लगे हैं उस धर्म के आस्थावानों क़ी भावनाओं का
शोषण करते हैं ,भगवा  पहन कर राजनीती के आदर्श उपस्थित करने क़ी जगह खुद अपनी राजनैतिक
पार्टी खड़ी करने क़ी बात करते हैं या अपनी सशस्त्र सेना खड़ी करने का एलान करते हैं ,क्या धार्मिक
चोले पहनने का यही अर्थ बाकी बचा है .और ऐसे में कोई व्यथित स्याही उंढेल देता है तो ..........

         मेरे गणतंत्र में यदि राष्ट्रिय नेता कथनी करनी के फर्क को कम कर दे ,बाबा लोग कूटनीति क़ी
जगह आदर्श नागरिक गढने क़ी प्रक्रिया में लग जाए तो व्यथित भारतीय को नयी दिशा मिल सकती है
                

19.10.11

हम राजनीति में नहीं आयेंगे !!


हम राजनीति में नहीं आयेंगे !!

हम राजनीति में नहीं आयेंगे,यह बात बार बार अन्ना टीम क्यों कहती है ? एक तरफ आप व्यवस्था में 
आमूलचूल परिवर्तन की बात करते हैं और दूसरी और व्यवस्था को हाथ में नहीं लेना चाहते हैं .इसका 
अर्थ तो ये हुआ जिन्हें आप देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मानते हैं उन मक्कारों में ही  इमानदारी या 
देशभक्ति ढूंढना चाहते हैं.ऐसा प्रयोग तो असफल ही होगा .

जो चीज होती है ,दिखती है उसके पीछे एक कारण होता है .अन्ना के सुर में करोडो देशवासियों के सुर
मिल गए थे उसका कारण विकराल होता भ्रष्टाचार ही था .अब यदि भ्रष्टाचार का इलाज वास्तव में अन्ना
हजारे जी ढूंढना चाहते हैं तो उन्हें धर्म और न्याय के उपदेश के साथ साथ कर्म में उतरना ही पडेगा या फिर
टीम को बड़ी बनाकर टीम को राष्ट्र धर्म के लिए मैदाने जंग में उतारना पडेगा .

अगर हम यह कह कर बरी होना चाहते हैं की भ्रष्टाचार मुक्त भारत  की बात करने के लिये चुनाव लड़ना
कहाँ जरुरी है तो शायद अन्ना टीम अपने सपने को कभी पूरा भी नहीं कर पायेगी. यदि राजनीती में
निडर ,साहसी ,नैतिक ,समदर्शी ,संवेदनशील और राष्ट्र भक्त जनता नहीं आएगी तो फिर देश स्वार्थी ,झूठे,
गुनाहगार ,निरंकुश ,भ्रष्ट और चोरो के एकाधिकार में ही चलेगा .यदि अन्ना टीम देश की जनता को
वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त भारत देना चाहती है तो अरबों की जनसंख्या वाले देश में ५५० देश भक्त तो उन्हें
मिल ही जायेंगे.

अन्ना कहते हैं मेरे पास बैंक बैलेंस नहीं है या मेरी चुनाव लड़ने पर जमानत जब्त हो जायेगी या इस
गंदगी में मेरा काम नहीं है तो फिर देश का भविष्य भगवान् या वर्तमान पिट्टू नेताओं के भरोसे चलने
दिया जाये. जब हम किसी जगह की गंदगी की सफाई करेंगे तो कुछ धुल ,मिटटी हमारे पर लगेगी ,मगर
उससे डरकर हम सफाई करना ही छोड़ दे या हमारे हाथ गंदगी उठाने के कारण मेले हो जायेंगे और लोग
अन्ना को सफाई करते वक्त मैला देख कर  कुछ गलत समझ बैठेंगे तो फिर सुधार कागज़ पर ही संभव
होगा.

सिर्फ कानून बन जाने से क्या होगा .क्या कानून बन जाने से  समस्या ख़त्म हो जाती है ?असल में कानून
का पालन करने वाले और करवाने वाले कर्मवीर मानव गढ़ने होंगे .प्राचीन भारत में सदाचारी महामानव
ही राजनीती में आते थे वे सदाचारी वशिष्ट हो, विदुर हो या चाणक्य .इन महानुभावो ने कभी नहीं कहा कि
हम देश की गंदगी को साफ स्वयं नहीं करेंगे .इन सबने राष्ट्र के लिए कर्म भी किया और कर्म करने के लिए
लोगों को प्रेरित भी किया .अन्ना यदि भारतीयों को सिर्फ प्रेरित करना चाहते हैं तो संकल्प सिद्ध होने में
संदेह ही है .हमारे देश में उपदेशक बहुत हैं ,धर्म के मर्मग्य भी बहुत हैं ,विवेचक भी कम नहीं हैं लेकिन
हमने आज तक क्या पाया ,कथा सुनी एक कान से और दुसरे से निकाल दी ,अमल नहीं की .इसका कारण
यही है की हमारे उपदेशक स्वयं कर्म नहीं करते सिर्फ जबान हिलाते हैं .

किसी एक को वोट मत दो या कम खराब को वोट दो या किसी को भी मत दो ,यह उत्तर क्या हमारे देश की
उन्नति के लिए सही है ? अन्ना का  उत्तर यह होना चाहिए था- भारतवासियों ,मुझे  हर जिले से ,हर तहसील
से एक एक ऐसा आदमी दो जो नैतिकता पर खरा उतरने वाला हो ताकि मैं भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण
कर सकूँ .लेकिन यह बात अन्ना नहीं कह पा रहे हैं और टीम अन्ना उलझ गयी है छोटा चोर और बड़ा चोर
के फेर में .जिसका नतीजा ढाक के तीन पात वाला होता देख कंही थप्पड़ बरस रहे हैं तो कहीं चप्पल .