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14.9.14

अपनी भाषा अपनी माटी

अपनी भाषा अपनी माटी

 (हिंदी दिवस पर )

जब तक हम अपनी भाषा और माटी पर गर्व करना नहीं सीखेंगे तब तक बदलाव
कागज के फूल से मिलने वाली खुशबु की तरह झूठा है। जब देश स्वतन्त्र नहीं था
तब इस देश के लोग हिंदी या मातृभाषा का उपयोग करते थे और स्वतंत्रता के बाद
हम फिरंगी भाषा के गुलाम होते गये,आज गाँव से महानगर तक हर कोई अंग्रेजी
का आशिक होता जा रहा है ,आज कहीं भी किसी को अपनी भाषा को छोड़ने का
मलाल नहीं है और जानबूझ कर अनावश्यक होते हुए भी विदेशी भाषा बोलने पर
शर्म नहीं है। हिन्दी की समस्या वह पढ़ा लिखा समाज है जो अंग्रेजी की जी हजुरी
करता रहा है।

पिछले 65 वर्षों में हमारी सरकार ने हिंदी भाषा को कुछ नारे के अलावा क्या दिया।
इस देश के संत्री से मंत्री टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं जबकि
सहज रूप से सभी को समझ में आने वाली हिंदी बोलने से भी कतराते हैं। देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री जब सँसद में बोलते थे जो यदा कदा हिंदी में बोलते थे ,कुछ
राजनेता तो वोट लेने के खातिर हिंदी बोलने का दिखावा करते हैं ऐसे में हिंदी का
विकास कैसे हो ?

अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद क्लिष्ट हिंदी में जानबूझ कर किया जाने लगा ?सिर्फ
यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरल भाषा है। सरकारी काम काज में अंग्रेजी का
उपयोग हिंदी भाषा की दुर्दशा करता रहा है। आज विश्व में कितने जापानी,चीनी
अमेरिकी हिन्दी भाषा पर प्रभुत्व रखते हैं ?और कितने भारतीय अंग्रेजी भाषा
पर प्रभुत्व रखते हैं ? हर बार देशी अंग्रेजी पंडित फिजूल का तर्क रखते हैं कि
अंग्रेजी के बिना विश्व स्तर पर तरक्की करना असंभव है जबकि चीन जापान
अपनी भाषा में काम करके विश्व को उनके देश की भाषा सीखने की स्थिति बना
चुके हैं। एक अंग्रेज यात्री जब भारत आता है तो हिंदी के काफी शब्द सीख कर
आता है और वह जब किसी  हिन्दुस्तानी से "नमस्कार" के प्रत्युत्तर में "good
morning "सुनता है तो भौंचक्का रह जाता है।

हिंदी के गौरव के लिए देश के साँसद सँसद में हिंदी में अनिवार्य रूप से बोले,
हर साँसद को अपनी मातृभाषा के साथ सहज हिंदी में बोलने का अभ्यास
करना चाहिए,अंग्रेजी बोल कर काम निकालने का रास्ता बंद करना चाहिए।
हमें विश्व की भाषाएँ सीख कर ज्ञान की वृद्धि करनी है परन्तु अपनी भाषा का
अपमान नहीं करना चाहिए। किसी भी विदेशी के साथ उसकी भाषा में बात
करना अच्छी बात है पर अपने ही देश में एक दूसरे से अन्य देश की भाषा में
बात करना एक ओछी हरकत के अलावा विशेष कुछ नहीं है।

हिंदी सप्ताह नहीं ,हिंदी पखवाड़ा नहीं ,365 दिन हिंदी में काम यह लक्ष्य होना
चाहिये। हिन्दुस्थान को समझना है तो हिंदी जानना और उपयोग में लाना
जरुरी है।         

9.9.14

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

हमारे कश्मीर पर आई विपदा से आज सेना झुंझ रही है और इस विपदा में अपने प्राण
न्योछावर करके भी कश्मीरी भाई बहनों का जीवन बचा रही है। कश्मीर की अलगाववादी
ताकतें की जबान से अभी सेना के प्रति GO BACK के शब्द नहीं निकल रहे हैं और
पाकिस्तान फिरस्त ये अलगाववादी ताकते भारत के कश्मीर और पाकिस्तान के हिस्से
के कश्मीर के राहत काम को देख भी रही है। आज पूरा भारत अपने कश्मीर के लिए
तन मन धन से सहयोग कर रहा है ,आज भारतीयों के मन में जातिवाद का जहर
नहीं है सबके मन में बची है तो विपदिग्रस्त भारतीयों की जिंदगी को पटरी पर लाने की
आशा। जो लोग धारा 370 का विरोध करते हैं क्या वो अब भी यही कहेंगे कि कश्मीर को
उसके हाल में मरने दो,नहीं ना। कश्मीर हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं यह भाव
देश की सरकार में ह्रदय से बह रहा है,मोदी को सांप्रदायिक कहने वाली कांग्रेस और मिडिया
जमात और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले वोट बैंक वाले नेता चुप हैं। क्या देश के
अल्पसंख्यक इस बात को समझेंगे की कौन पार्टियाँ देश में धर्म के नाम पर सत्ता का सुख
भोगना चाहती है ? क्या हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहने वाले चैनल आज सच्चे धार्मिक समभाव
को देख कर अपने पिछले कुकर्मों पर अफ़सोस जाहिर करेंगे कि वे भी जाने अनजाने में
जाती और धर्म के आधार पर मक्कार नेताओं की बातों में आकर भारतीयों को अलग करने
के खेल में शामिल थे।

कश्मीर की जनता आज जो कुछ महसूस कर रही है वह सकारात्मक दृष्टिकोण लम्बे
समय तक बनाये रखें। ये भारतीय जवान आज अपने प्राणों का मोह त्यागकर आपकी
जिन्दगी को बचा रहे हैं ,क्यों ?क्योंकि आप भारतीय हैं। 125 करोड़ भारतीय अपने
कश्मीर को तबाह होते नहीं देखेंगे उसे स्वर्ग बने रहने देंगे और इसके लिए प्रयास भी
करेंगे। क्या कश्मीरी भाई बहन भी भारतीय फौजी भाई की सलामती के लिए भविष्य
में कुछ करेंगे ?हमारे फौजी जवानों का भी परिवार है वे भी किसी के भाई हैं ,पिता हैं ,
पुत्र हैं ,जब पाकिस्तानी आतंकी घाटी में घूम कर उन पर हमला करते हैं तो कश्मीरियों
का फर्ज बनता है उस समय उन आतंकियों को पनाह ना दे.पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे मत लगाये,हिन्दुस्तानी तिरंगे का अपमान ना करे और ना होने दे। अपने देश की
फौज का साथ दे ,उन्हें सही सुचना से अवगत कराते रहे।

कभी कभी विपत्तियाँ भी सौगात लेकर आती है। इस विपति में जो धन हानि हुयी है
उसकी भरपाई हो जायेगी ,यह समय चिंता का नहीं है ,आज सभी भारतीय और विशेष
कर वो अल्पसंख्यक समुदाय जो गुमराह में है प्रण करे कि हम भी भारतीय हैं,भारत
की रक्षा के लिए काम करेंगे, बहुसंख्यक की भावनाओं का आदर करेंगे उनकी बहु -
बेटियों की इज्जत करेंगे।

मोदीजी आपने गुजरात को हर प्राकृतिक आपदा से बचाया और खड़ा किया ,आज
धर्म का तकाजा है आप कश्मीर का नवसृजन करेंगे,आपके पास आज प्रकृति भी
भारतीय एकता की सौगात देने के लिए विपदा के रूप में आई है आप मुकाबला कर
रहे हैं ,जब तक विपति हार नहीं जाती तब तक लड़िये और कश्मीरियों की हर संभव
सहायता कीजिये,शायद नियति आपसे बहुत कुछ करवाना चाहती है जो भारत के
हित में है।          

5.9.14

आचार्य और टीचर

आचार्य और टीचर

पण्डित विष्णु शर्मा और आचार्य चाणक्य को शिक्षक दिवस पर हिन्दुस्थान नमन
करता है। इनकी बात आज इसलिए क्योंकि हिन्दुस्थान में इनके जैसा शिक्षक
नहीं हुआ। बिना भारी भरकम किताबों के बोझ के इन्होने सम्राट बनाये। विष्णु
शर्मा की पंचतन्त्र की कहानियाँ मुर्ख राजकुमारों को बुद्धिमान और चतुर राजकुमार
बना देती है तो आचार्य चाणक्य की नीति साधारण बच्चे को सम्राट बना देती है। उस
समय भारतीय शिक्षा और शिक्षकों में ऐसा कौनसा गुण था जो नीडर ,साहसी ,देशभक्त
नीतिज्ञ,धर्मात्मा और पुरुषार्थी नागरिक देता था और आज की शिक्षा प्रणाली में कौनसे
ऐसे दोष पनप गए हैं कि राष्ट्र ऐसे नागरिकों के लिए तरस रहा है। आज के अंग्रेजी पढ़े
लिखे युवाओं से जब मैं सवाल करता हूँ कि "तुम आगे क्या करना चाहते हो "?इसका
90 %उत्तर मिलता है -अच्छी नौकरी। पहले हमारे देश के शिक्षक राजा बनाते थे और
आज के शिक्षक नौकरी करने वाले युवा तैयार कर रहे हैं। फिर भी हम गर्व करते हैं कि
हम पढ़ लिख गए हैं ! शिक्षा सर्वांगीण विकास के लिए दी जाती थी और अब मेकाले
आधारित शिक्षा पद्धति पेट भरने का झुगाड़ सिखाती है। शिक्षा जब व्यवसाय बन जाती
है तब शिक्षार्थी शिक्षक का आदर क्योंकर करेगा और शिक्षक को समय पर वेतन मिल
रहा है तो वह छात्रों की चिन्ता क्यों करेगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों को अनुभव पथ
पर चलना सीखा कर मंजिल तक पहुँचाना होना चाहिये और हमारी सरकार बच्चों को
केवल रट्टा तोता बना कर कर्तव्य पूरा कर रही है। आजाद भारत के युवकों को
स्वावलम्बी शिक्षा चाहिये वह कब मिलेगी   … क्या पता !!!   

2.9.14

भारत और जापान

भारत और जापान 

हिन्दुस्थान और जापान में पिछले साठ वर्ष में एक बड़ा अंतर आया है। भारत में पिछली
सरकारों ने भारतीयों के देश प्रेम की धधकती ज्वाला पर ठण्डा पानी डाला है या देश भक्ति
के अँगारे पर राख की मोटी परत जमने दी। पिछली सरकारों ने देश के गौरवपूर्ण इतिहास
को झूठी धर्मनिरपेक्षता की घास को उगाने के लिए तोड़ मरोड़ दिया,देश को विदेशी भाषा के
नागफाँस में झकड दिया ,देश की भाषा और संस्कृति को तहस नहस किया,भारत के वेद
पुराण और शास्त्रों से भारतीयों को अन्धविश्वास कह कर अलग कर दिया। इसका दुष्परिणाम
यह हुआ कि भारतीयों को अपना गौरव पूर्ण इतिहास बासी लगने लगा ,हमारे रामायण ,गीता
से ग्रन्थ काल्पनिक कहानी लगने लगे ,हमारी देवीशक्तियाँ देवत्व खो कर तामसिक बनने
लगी। हमारे देव पुरुष पौरुषहीन होते चले गये जबकि जापान पर अणुबम्ब गिरा कर रीढ़
हीन करने का प्रयास हुआ मगर जापान अपने इतिहास,अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति पर
गर्व और विश्वास करके कर्म पथ पर चलता रहा ,लाखों बार प्राकृतिक आपदाएँ आयी मगर
जापान सिर उठा के चलता रहा। देश भक्ति का जज्बा भारतीयों में जो स्वतंत्रता से पहले
था वो ना जाने कहाँ दफन हो जाने दिया जबकि जापानियों में आज भी देश भक्ति का जज्बा
जगमगा रहा है। हम अपने ही देशवासियों के धन को लोकतंत्र की दुहाई देकर खुद ही लूटते
रहे और भ्रष्टाचार के विषधर को पोषण देते रहे और जापानी लोग देश का पैसा देश का समझ
सबका विकास करते गए।
  आज कितने काँग्रेसी नेता ऐसे बचे हैं जो देश के सामने यह कहने की हिम्मत रखते हैं कि
मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है ,अपने हिंदुत्व पर गर्व है ,श्री राम और कृष्ण जैसे महापुरुषों
की संतान होने पर गर्व है ?कोई नहीं ना ,यही कारण है देश की दुर्गति होने का ,क्योंकि हम
करोडो देशवासी वर्षों तक अपने पर गर्व महसूस ना कर सके,खुद को भूलकर जिन्दा लाश
की तरह घसीटते रहे। 
 इस देश को अब भी जापान के समकक्ष बनाया जा सकता है,यह काम हम हिंदुस्थानी लोगों
को ही करना है चाहे आज करे या कल। हमें अपने धर्म के महापुरुषों से जुड़ना होगा जिनके
एक हाथ में पुष्प है तो एक में चक्र भी है। एक हाथ से शांति की अपील है तो दूसरे हाथ में
धनुष भी है। जिनके एक हाथ में ज्ञान का शास्त्र है तो दूसरे हाथ में शस्त्र भी है। हमारे महा
पुरुष हमें सद्भाव और शक्ति का तालमेल सीखाते हैं।
हम देश भक्त बनने से पहले परिवार भक्त बने,अपने परिवार को सभ्य,सुसंस्कृत ,शिक्षित,
नीडर और धर्म का अनुसरण करने वाला बनाये यदि हम तीन चार साल लगातार इस काम
पर डटे रहे तो देश को जापान से बढ़कर बनने में देर नहीं लगेगी             

15.8.14

हम और हमारा देश

हम और हमारा देश 

हम शिकायत कर्ता बनें ,यह जरूरी भी है परन्तु शिकायत करने से पहले हम अपने
गिरेबान में झाँक कर देखें कि कहीँ सिस्टम की समस्या का एक कारण हम स्वयं
तो नहीं बने हुए हैं।

मतदान करके सरकार चुन कर हम अपने कर्तव्यों से फ़ारिग होते रहे हैं। हम यही
सोचते हैं कि अब सारी समस्याओं पर बैठे -बैठे निराकरण पाना है। घर का एक
मुखिया परिवार को ठीक से चलाने के लिए सब सदस्यों की जरुरत महसूस करता
है वरना घर चलाने में खुद को असहाय महसूस करता है  और हम 125 करोड़ लोगों
का परिवार 550 से कम प्रतिनिधियों पर छोड़ कर अच्छे दिन का सपना पूरा होते
देखना चाहते हैं!!!

इस गरीब देश के नागरिक गरीब होते हुए भी दान देने में जुटे रहते हैं,यह एक श्रेष्ठ
बात है मगर वह दान सृष्टि कर्ता के नाम पर देने के बाद अनुपयोगी रह जाता है।
जब एक सरकार अपने नागरिकों से कर के रूप में दान माँगती है तब उसे अनुपयोगी
कृत्य समझ हम दूर हट जाते हैं। साल में पचास -सौ रूपये भी हर नागरिक सरकार
को सहर्ष कर्तव्य समझ कर देता है तो छोटे-छोटे समाधान रास्ता बनाते जायेंगे।

विदेशी भाषा सीखना उत्तम बात है क्योंकि उस भाषा के माध्यम से हम सृष्टि के
उस भाग में रहने वाले लोगों के विचार समझते हैं लेकिन हद तो तब होती है जब
यह सब हम राष्ट्र भाषा का मूल्य चूका कर करते हैं,जिस भाषा को देश के ९०%
लोग पूरी तरह से समझते भी नहीं है उनके सामने उस भाषा का प्रयोग हमें कैसे
समृद्ध करेगा ?लेकिन हम विदेशी भाषा को कन्धे पर लाद कर अच्छे समय की
आशा करते हैं!!

बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारा मीडिया बे सिर पैर के विश्लेषण कर देश के लोगों
का समय नष्ट करता है या मूल्यहीन खबरें दिखाता है। इनका तो धन्धा है यह
समझा जा सकता है मगर इस देश के नेता,विद्धवान और शिक्षित लोग जब इस
प्रकार के घटिया मूल्यहीन,वास्तविकता से परे विश्लेषणों और बहस में भाग लेते
समय नष्ट करते हैं तब आम नागरिक माथा पीटता है!!      

10.8.14

स्वाधीनता के मायने

स्वाधीनता के  मायने

हमारे पर मुगलों ने शासन किया ,अंग्रेजों ने किया ,लम्बे संघर्ष के बाद देश दासता से मुक्त
हुआ और हम वापिस मानसिकता से गुलाम कर दिये गये।
आजाद होने के बाद देश का नेतृत्व भारतीय नागरिको को भारतीयता की जगह धर्म के
आधार पर देखने का निर्णय किया और देश में विभिन्न धर्मावलम्बी देख एक नई विचार
धारा को रखा जिसे धर्म निरपेक्षता नाम दिया। धर्म निरपेक्षता ने भारतीयता को हासिये
पर धकेल दिया इसका दुष्परिणाम तुष्टिकरण के जहर के रूप में आया और अपने ही देश
में बहुसंख्यक हिन्दुओं को राजनेता सांप्रदायिक परोक्ष रूप में समझने लगे। देश का इतिहास
गलत प्रस्तुत किया गया और पढ़ाया जाने लगा। हम अपने बच्चों को मुग़ल शासनकाल को
महान बता कर पढ़ने को मजबूर करते रहे। क्या जिसने भी हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया
वह समय हमारे लिए स्वर्णयुग हुआ ?फिर मुग़ल आक्रमणकारियों को महान पढ़ कर हम
देश का किस रूप में गौरव बढ़ा रहे हैं ,भविष्य में यह हाल रहा तो अंग्रेजों को भी महान
हमारी पीढ़ियों को पास होने के लिए पढ़ना पड़ेगा !!!

भारत को जबसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना गया है तबसे सबसे बड़ी क्षति देशप्रेम की भावना और
आपसी सौहार्द की हुई है इसका कारण थी तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियाँ। भारत
की ताकत धर्मनिरपेक्षता ना कभी थी और ना कभी होगी। इस देश की असली ताकत वेद से
आई है जो सर्व धर्म समभाव  है। अब सवाल यह उठता है कि क्या संविधान से धर्म निरपेक्ष
भारत की जगह "सर्व धर्म समभाव "भारत लिखने का समय आ गया है ?यदि सर्व धर्म समभाव
आयेगा तब समान नागरिक अधिकार का उदय होगा और पक्षपात/तुष्टिकरण की राजनीती का
नाश होगा।

आज जब भी समान नागरिक अधिकार और कानून की बात आती है तो लोग धर्म के नाम पर
हायतौबा मचाने लगते हैं। क्या भारत के नागरिक एक ही जुर्म पर अलग अलग सजा पाएंगे ,
धर्म प्रधान है या राष्ट्र ?यह तय करने का समय आ गया है।

व्यंग -अंतरिक्ष में भारत से मानव भेजने की बात आई ,बात राजनेताओं तक पहुंची। राजनेताओं
ने सर्वदलीय मीटिंग रखी और सबने तय किया -अंतरिक्ष में चार हिन्दू,दो मुस्लिम ,एक दलित ,एक
ईसाई ,एक पारसी भेजा जाये जब वैज्ञानिकों के पास यह फैसला गया तो वे सर पकड़ कर रह
गए। 

7.7.14

क्या देश करवट बदलेगा ?

क्या देश करवट बदलेगा  ?

देश की नयी सरकार का पहला बजट आने वाला है और देश का बजट ही यह
तय करता है कि देश किस दिशा में जाने वाला है।

आज समस्या बढ़ती हुयी महँगाई नहीं है,समस्या है घटता हुआ रोजगार। यदि
बजट रोजगार उत्पन्न करने में सक्षम होता है तो महँगाई समस्या नहीं रहेगी।

ग्रामीण क्षेत्र हमेशा रोजगार से वंचित रहे हैं क्योंकि आज तक गाँवों को सुदृढ़
बनाने का सोचा तक नही गया। गाँवों तक औद्योगिक विकास नहीं पहुँच पाया
और ना ही कृषि को उद्योग का दर्जा मिला ,गाँवों को मिला अकुशल श्रमिक का
काम जैसे -मनरेगा!!!

                             आप कल्पना कीजिये कि भारत की 65 %से ज्यादा प्रजा
गाँवों में बसती है और इतनी बड़ी जनसँख्या को हम उद्योग से जोड़ने में असफल
रहे हैं। इसका कारण अब तक की सरकारों की नकारात्मक सोच है जो इतने
बड़े जनसमूह का उपयोग देश के विकास में करने में नाकाम रही। आज
महँगाई से सबसे ज्यादा कौन प्रभावित है ? गाँव ही ना। बड़ा अजीब समाधान
है खाद्य सुरक्षा जिसे काँग्रेस लायी थी और भाजपा आगे बढ़ा रही है। सोच जब
बूढी हो जाती है तो अजीबोगरीब उपचार और टोटके ढूंढे जाते हैं ,अगर मोदी
सरकार भी गाँवों के विकास को आगे नहीं बढाती है तो देश की नींद अभी टूटने
वाली नहीं है और विकास के सपने सिर्फ सपने और वादे ही रह जाने वाले हैं
क्योंकि गाँवों में जब तक रोजगार नहीं बढ़ेगा तब तक महँगाई के नाग का तांडव
रुकने वाला नहीं है। आम व्यक्ति गरीब इसलिए है कि उसके पास भरपूर काम
और काम की सही दिशा नहीं है। आज सस्ते में अनाज बाँट देने से क्या गाँवों की
बदहाल हालत सुधर जायेगी ?सरकार गरीब के पेट में रोटी पहुँचाने की जुगत में
है ,मगर यह खाद्य सुरक्षा का हल कब तक ? क्या गरीब का पेट भर देने मात्र से
विकास का रास्ता निकल जायेगा ? किसी भी सुराख़ पर पैबंद लगाना आकस्मिक
व्यवस्था हो सकती है मगर दीर्घकालीन व्यवस्था के लिए नव सर्जन जरूरी होता
है।

मोदी सरकार कृषि को उद्योग की तरह सुविधा दे ,व्यवस्था दे ,तकनीक दे ताकि
देश का अन्न भण्डार बढे और निर्यात से आर्थिक सुदृढ़ता आये।

मोदी सरकार लघु उद्योगो को गाँवों में बढ़ाये ,छोटे उद्यमियों को कर और निवेश
में सहायता दे ,गाँवों में बिजली की आपूर्ति और सड़कों का निर्माण  करे ताकि
लघु उद्यमी वहां रोजगार पैदा कर सके।  

27.6.14

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था 

श्री राजीव गांधी ने कहा था सरकार रुपया खर्च करती है मगर आम जनता को
पंद्रह पैसे ही मिलते है !!बाकी पैसे कहाँ जाते हैं ?इसका उत्तर वो नहीं दे पाये थे।
ट्यूब में एक पंक्चर हो तो गाडी चलती नहीं है फिर 85 %पंक्चर अर्थ व्यवस्था
का कायाकल्प कैसे होगा ?अर्थव्यवस्था में इतने पंक्चर किसने हो जाने दिये ?

    रुपया सरकार की तिजोरी से निकलते ही घिसना चालू हो जाता है। भ्रष्ट
नेता,भ्रष्ट उद्योगपति ,भ्रष्ट नौकरशाही और भ्रष्ट हो रही न्याय व्यवस्था और
इनके दलदल में फँसे हैं 80%भारतीय जो इसलिए ईमानदार हैं क्योंकि उनके
पास तो अर्थ है ही नहीं।

   देश की जन कल्याणकारी योजनायें जनता के लिए तमाशा और उससे जुड़े
भ्रष्ट लोगों के लिए लॉटरी है। देश की नौकरशाही कागजों पर फूल बनाती है और
फाइलों पर चिपका देती है। जनता इसलिए खुश होती है कि ये कागज के फूल
मुरझाते नहीं हैं और बाकी चैनल इसलिए खुश है कि उन्हें असल में खुशबु आती
है।
   हमारी वितरण व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसका recheck का
बटन अँधा ,बहरा और लकवाग्रस्त है। राशन का अनाज बाजार में बिक जाता
है  या बड़ी मिलों में सप्लाई हो जाता है। अनाज सरंक्षण की व्यवस्था हर गरीब
के घर में है परन्तु उसको अनुपयोगी समझ लिया गया है। क्या कोई भी सरकार
रातों रात भंडारण और सरँक्षण व्यवस्था तैयार कर लेगी ?तो फिर उस अनाज
का सड़ना और बाजार के हवाले होना तय है।

  BPL से निचे का बड़ा वर्ग जिसके पास ना गाँव है ,ना समाज ;वह तो फुटपाथ
पर जीता और मर जाता है या जंगलों में गुजर बसर कर जिंदगी घसीट रहा है ,
उसके जीवन में उजाला कैसे होगा क्योंकि सरकार के पास उसके लिए कोई
योजना है ही नहीं। यह वर्ग सरकार की वितरण व्यवस्था के दायरे में कैसे और
कब आयेगा ?

   सरकार की सफलता का पैमाना हम बढ़ते स्टॉक मार्केट,बढ़ते अरबपति और
करोड़पति,बड़े उद्योग धंधों में देखते हैं मगर हम इस चकाचोंध में यह भूल जाते
हैं कि करोड़ों भारतीय बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं। सरकार की कोशिश यह होनी
चाहिये कि पीछे छूटने वाले का रुक कर साथ करे और उन्हें साथ लेकर चले ना
कि उन पर रहम की रोटी बरसायें।     

25.5.14

पड़ोसी पाकिस्तान और भारत की नीति ?

पड़ोसी पाकिस्तान और भारत की नीति ?

देश आजाद हुआ और भारतवर्ष खंडित हो गया और उसका ही अँग उसका शत्रु
बन गया जो आज तक सामने के हाथ में फूल और पीछे के हाथ में छुरा रखता
है। क्या इसके पीछे का मूल कारण प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न कश्मीर है या
पाकिस्तान की काल्पनिक शंका से युक्त मनोदशा ?

पाकिस्तान मामले में भारत का रुख हमेशा से नरम रहा है या ढुलमुल रहा ,इसके
पीछे का कारण अदूरदृष्टा राजनीतिज्ञ रहे या भारतीय लोकतन्त्र की वोटबैंक साधने
की कुटिल नीति ,कारण चाहे दोनों ही रहे हो या एक लेकिन नतीजा यह रहा कि
हमारी सरहद अकारण सुलगती रही और अन्य विदेशी ताकतें जो भारत के बढ़ते
प्रभुत्व को सह नहीं पा रही थी वे अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान का
बेजा और भारत का साधारण इस्तेमाल अपना आर्थिक और सामरिक हित साधने
में करती रही।

स्वतंत्र भारत अब अपना नया युग शुरू कर रहा है और ऐसे में सारा विश्व अपनी
निगाहें गड़ाये हर हलचल का अपने -अपने स्वार्थ के अनुसार नफा नुकसान का
गणित पढ़ रहा है। भारत की नीति इस बात को केंद्र में रख कर होनी चाहिए कि 
हमारा बिलकुल भी अहित ना हो और दुश्मन का भी जहाँ तक बन सके वहाँ तक 
भला हो। क्षमा वीरस्य भूषणम  यह नीति है कोई आध्यात्मिक चिन्तन नही है। 
भारत ने आज तक इस नीति का दुरूपयोग किया है और आज तक इसका 
दुष्परिणाम भोगा है। जब शत्रु का अपराध प्रमाणित हो जाता है और वह उचित 
दण्ड से बचा रहता है इसे क्षमा का दुरूपयोग माना जाता है। प्रमाणित अपराध 
पर शत्रु को उचित दण्ड देना ही क्षमा नीति का उपयोग होता है। 

पडोसी देश छोटा है या बड़ा यह बाद की बात है हमारी सीमायें उसकी सीमाओं
से सटी है इसलिए हमारे लिए सबका महत्व है। भारत के विकास के लिए
आवश्यक है पडोसी देशों में सुख समृद्धि और विकास का होना। यदि हमारे
पडोसी देशों में गरीबी ,भुखमरी ,बीमारी और अशिक्षा है तो इसका असर हमारे
पर पड़ना ही है। भारत अपने पडोसी देशों के साथ मिलकर इन मुद्दों पर सार्थक
बात करे यदि ये रुग्णता मिटेंगी तो सरहद पर काफी समस्याएँ खत्म हो जाएगी।
गरीबी और अशिक्षा आतँकवाद को प्रश्रय देते हैं ,हमें खड़ा होना है तो पहले इन
रुग्णताओं को नेस्तनाबूद करना है, अपने देश से भी और पडोसी देशो से भी।
जब पेट भरा होगा तो आवाम जीना चाहेगा और जीने के लिए सहयोग और
सहकार के मन्त्र सीखेगा।

हमें अपने पडोसी देशों को स्पष्ट और कड़ा सन्देश देना पड़ेगा कि भारत में अस्थिरता
फैलाने के सपने देखने वाले पडोसी पर कठोर कार्यवाही की जायेगी जो शाब्दिक
नहीं होगी तथा जो पडोसी अपने देश के विकास के लिए भारत से हर स्तर पर
अच्छे सम्बन्ध रखना चाहता है भारत सदैव उसके साथ सहकार और सहयोग रखेगा।
अगर हमारे पडोसी एक फूल भेँट करेंगे तो हम दस करेंगे और वो एक गोली मारेगा
तो हमारी दस बंदूकें गरजेगी।  

18.5.14

हाँ ,यह हिँदुत्व की जीत है।

हाँ ,यह हिँदुत्व की जीत है। 

2014 के चुनाव परिणाम का निष्कर्ष यही है कि यह हिंदुत्व की जीत और छद्म
धर्म निरपेक्षता के दानव की वध कथा है। यह मेरी कट्टर सोच नहीं है क्योंकि
हिन्दुत्व  सर्वधर्म सद्भाव और समभाव की विरासत से लबालब है। स्वतंत्र
भारत के नेताऑ की नई जमात ने फिरंगी नीति पर ही काम किया। देश में
फुट डालो और राज करो की नीति ने राष्ट्रवाद ,राष्ट्र प्रेम और आर्य संस्कृति को
मटियामेट कर दिया। हिन्दू जातियों को जन्म के आधार पर तोड़ने का काम
हजारों वर्षों में नहीं हुआ उतना 60 वर्ष में हुआ। अनपढ़ और गरीब कुचले हिन्दू
अपने सर्वांगीण विकास के लिए देश के मति भ्रष्ट नेताओ के साथ हो गये और
मुस्लिम वर्ग को हिंदुऑ का झूठा भय दिखाकर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से
अलग रख वोट बैंक बना डाला ,मतिभ्रष्ट नेताओं की इस नीति ने उन्हें सत्ता का
सुख दिया मगर देश कंगाल होता गया। सोने की चिड़ियाँ फड़फड़ाती रही।

नास्त्रेदम की भविष्यवाणी थी की एशिया की धरती से एक भगवा सन्त आयेगा
जो विश्व को नयी प्रेरणा देगा ,हम लोगों ने उसे किवदंती मान लिया मगर समय
अपना काम करता है। जब प्रकृति ने वैरागी संत को वापिस जन -जन के कल्याण
के लिये पून: समाज को समर्पित कर दिया तो वह संत सेवा में निस्वार्थ भाव से
लग गया ,विरोधियों ने उस पर नाना तरह के आरोप लगाये,विदेशी ताकतों ने उसे
गिराने की भरपूर कोशिश की मगर दैव उस संत के साथ खड़ा हो गया।

देश ने 16 मई 2014 में अद्भुत युग परिवर्तन देखा। यह युग परिवर्तन जातिवाद के
खिलाफ था,तुष्टिकरण की कुत्सित राजनीती के खिलाफ था ,देश का राष्ट्रवादी समाज
संगठित हो गया क्योंकि वह जाति और आराधना पद्धति पर चल रही राजनीति से
ऊब गया था उसे रोटी, रोजगार और रक्षा चाहिये थी और उसके लिए वह घर से
बाहर निकला और अपने मत के अधिकार का उपयोग किया। फिर वही हुआ जो
विश्व अचम्भे से देख रहा है और अपने उलझे समीकरण सुलझा रहा है ।

हिँदुत्व के इस नये युग में हिँदुत्व अपनी मूल व्याख्या में आयेगा। परहित चिंतन,
सद्भाव,समभाव,सर्वजन सुखाय,पुरुषार्थ,स्वाभिमान के गुणों से युक्त हिँदुत्व का
उदय निश्चित है। घट -घट में राम को देखने की नीति दिखेगी,विश्व समुदाय हिँदुत्व
को कमतर नहीं आँकेगा ,कायर नहीं समझेगा उसका कायल हो जायेगा।             

8.5.14

56 इन्च का जादू ....

56 इन्च का जादू  .... 

देश के बदलाव मे अब आखिरी चरण बाक़ी है। देश बदलाव चाहता है और उस बदलाव
से सुकून चाहता है। 56 इंच  के नाम की आँधी ने सब विपक्षी दलों को नाको चने चबवा
दिये हैं, तथाकथित बुद्धिजीवी दहाड़े मार रहे हैं और स्क्रीन पर खीज निकाल रहे हैँ।
छद्म राजनीतिज्ञ बहरूपिये बन कर शेर का शिकार करने के रास्ते खोजने के लिये भटक
रहे हैं और बाकी दल दिग्भ्रमित हो ङोल रहें हैं। कोई कंठी उतार कर टोपी पहन रहा है
तो कोई रंडवे की लुगाई बनने का दिखावा कर रहा है। जो मीडिया कुछ समय पहले
जिन्हें पानी पी कर कोसने के तरीके बनाता था अब उसे धंधा चलाने के लिये मन मार
कर उनके गीत गाने पड़ रहे हैं।

    नीति में साम,दाम ,दण्ड ,भेद ,माया और इंद्रजाल का उल्लेख है और इसका सफल
उपयोग राजा को करना आना चाहिए क्योंकि विजय का ही महत्व है बाकि सारा किया
धरा व्यर्थ है। इस बार धूर्त,शठ,ठग और चालबाज चित्त पड़े हैं ;किसी को कोई मौका या
जीवनदान नहीं। हर छोटी से छोटी बात का विश्लेषण करके जाल बिछाया गया है जिसमे
हर दल फँसता जा रहा है और फड़फड़ाता जा रहा है ,सब पंछी एक साथ होकर जोर
लगा रहे हैं पर जाल से खुद को छुड़ा नहीं पा रहे हैं। 56 इंच की नीति का हथोड़ा चलता
जा रहा है और जर्जर नुस्खे ध्वस्त हो रहे हैं। 

    इस चुनावी समर मे प्रमुख सेनापति गुम और मौन है या उसका उपयोग जितना
करना था वह कर लिया अब हाशिये पर कर दिया गया है। वोट कटर ने सबसे पहले
उसी डाली को काटा जिसने उसे जन्म दिया था और अब पूरी तरह से भोथरा हो गया
है। ना चाहते हुए भी यह समर उन दौ हस्तियो के बीच खेला जा रहा है जिसमें एक
महारथी है और दूसरा अनाड़ी। अनाड़ी शस्त्र विद्या में काला अक्षर है और महारथी
उसके ही शस्त्र से उस पर वार कर रहा है। अनाड़ी सेना हथियार डाल कर महारथी की
जीत के जश्न को पचाने के उपाय ढूंढ रही है।

प्रजा सिँह के साथ खड़ी है और सियारों के टोलो को खदेड़ रही है.देश के हर कोने से
दहाड़ गूँज रही है। उत्तर ,दक्षिण ,पूर्व और पश्चिम -हर दिशा जग चूकी है और अब
यात्रा अन्तिम चरण पर है। छोटी सी चूक से फायदा उठाते महारथी को देख सियासत
भोंचक्की है ,विपक्षी अपने नुकसान की गिनती मे लगे हैं और हार का ठिकरा फोड़ने
के लिए बलि का बकरा ढूँढ़ रहे है। जनता एक ही नारा लगा रही है - अबकी बार  .............  

3.5.14

सब दलों का प्रमुख मुद्दा मोदी विरोध ही क्यों ?

सब दलों का प्रमुख मुद्दा मोदी विरोध ही क्यों ?

देश मतदान के अन्तिम पड़ाव पर है ,सभी दल एक ही उद्देश्य लेकर खड़े हैँ -मोदी
नहीं आना चाहिये ,क्या कारण है इतनी बड़ी कसरत करने के पीछे ?

1. क्या मोदी के आ जाने से इनके नकली मुखोटे उतर जाएँगे और असली चेहरा  देश
के सामने आ जायेगा जिसे देखने के बाद इनकी दूकानें बन्द हो जायेगी।

2. क्या वास्तव मे सबसे बड़े भ्रष्टाचारी लोग इन्ही नेताओं मे से है जिन्होंने देश
के धन को लूट कर विदेशों मे जमा कर रखा है और मोदी के आने से विदेशों मे
छुपाया गया धन भारत के खजाने में आ जायेगा और ये काँव -काँव मचाने वाले
नेता सलाखों में होंगे और इनकी पीढ़ियाँ कंगली हो जायेगी।

3. क्या मोदी के आने से देश के लोग अपने भारतीय होने पर गर्व महसूस करने
लगेंगे और तुष्टिकरण,जातिवाद और छद्म धर्म निरपेक्षता का दौर मटियामेट हो
जायेगा और लूले-लँगड़े नेता अपने बोरियाँ -बिस्तर बाँध कर वनवास को स्वत:
स्वीकार कर लेंगे।

4. क्या मोदी युग के उदय होने के बाद काली राजनीति करने वाले नेताओ के
काले और घिनौने कारनामो से पर्दाफाश हो जायेगा और देश गुज़रात की प्रजा
की तरह सालों तक मोदी के पीछे एकजुट खड़ा हो जाएगा।

5. क्या विदेशी ताकतें जो अभी तक भारत को अस्थिर करने के प्रयत्न मे लगी
रहती है उन पर नकेल कस दी जायेगी और भारत सशक्त बन कर विकास के
नये इतिहास लिखने की ओर आगे बढ़ जायेगा।

6. क्या देश का धन गरीबों पर वास्तव मे रुपया मे से रुपया ख़र्च होने लग जायेगा
जो अभी तक नेताओ ,अफसरों की तिकड़मबाजी से 85 पैसा जितना बीच में ही
लूट लिया जाता था।

7. क्या मोदीयुग आ जाने पर देश की सँपदा पर चलती आ रही लूट खसोट खत्म
हो जायेगी और अब तक के पापियों के कर्मों का लेखाजोखा बिना लाग -लपेट के
त्वरित गति से होगा।

8. क्या मोदीयुग से मुखौटे सेनापति खडे करने की दुषित प्रणाली अवशिष्ट और
महत्वहीन हो जायेगी और धूर्त नेताओं की फौज सदा -सदा के लिए विसर्जित
हो जायेगी।

9. क्या मोदीयुग आने से आतंकी लोग अनँत नींद मे सो जायेंगे और सैन्य बल
मुस्तैद होकर हिम्मत से खड़ा हो जायेगा। 

देश एक बदलाव की ओर चल पड़ा है जिसका रुकना नामुमकिन है , जैसे -जैसे
मोदी की परीक्षाएँ होती जायेंगी वैसे -वैसे देश की जनता मोदी के पीछे लामबंध
होती जाएँगी ,मोदी अपने विरोधियों के कारण इस अन्तिम पड़ाव मे और मज़बूत
होकर उभरेंगे। जब चर्चा होगी -मोदी युग क्यों आया ,तब सबसे बड़ा काऱण मोदी
का सब दल मिलकर एक स्वर मे मोदी विरोध करना होगा।  

19.4.14

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

राष्ट्रवाद के सामने छद्म धर्मनिरपेक्षता बुरी तरह हिल गयी ना। पूरा देश एक लहर में
है और वो लहर है राष्ट्रवाद की। इस देश को लम्बे इन्तजार के बाद एक ऐसा नेता
मिला है जो छाती ठोक कर कहता है मैं हर धर्म का आदर करता हूँ पर मुझे अपने
हिंदुत्व पर गर्व है,संस्कृति पर गर्व है ,भारत भूमि पर गर्व है।

इस देश से काँग्रेस का सफाया क्यों हो रहा है ?अध नंगे फकीर की काँग्रेस भारत से
विलीन क्यों हो गयी ? कारण साफ है इस सत्ता ने भारतीयों को दौ समुदाय में बँटने
दिया -अल्प संख्यक और बहु संख्यक इतना ही नहीं बहु संख्यक को बाँटने के लिए
दलित,पिछड़ा ,अति पिछड़ा वर्ग को जाति के आधार खण्डित किया इसका गलत
असर देश के विकास पर पड़ा क्योंकि सभी वर्ग आपस में भ्रमित हो गए। इसका
नुकसान देश और देशवासियों को हुआ और फायदा  … ?

इस प्रपंच से देशवासी विकास से दूर होते गये उनके हिस्से में आई बेकारी,भ्रष्टाचार,
धार्मिक कटटरता,अशिक्षा,भुखमरी और गरीबी। देशवासी स्वराज्य और स्वतंत्रता
के स्वरूप को तरसते रह गये और लालफीताशाही,अफसरशाही तथा नेताशाही के
नागपाश में बंध गए। लोकतंत्र के नाम पर वर्षो तक लूट चली, गरीब और गरीब
होता रहा और राज नेताओ की दया नीतियों पर मृत्यु की प्रतीक्षा करता जीता रहा।

किसे मालुम था कि एक साधारण परिवार से निकला बच्चा देश की पीड़ा को दूर
करने के लिए चट्टान बन कर छद्म धर्मनिरपेक्षता के तूफान को इस तरह रोक देगा !!
आज देश का हर वर्ग बेहाल है,सबको रोजी रोटी चाहिये। पेट की भुख धार्मिक
कटटरता के भाषण से दूर नहीं होती है ,तुष्टिकरण की नीति से दूर नही होती है।
नागरिकों के अधिकारों में जातिगत पक्षपात से सामाजिक भाईचारा ना तो पैदा
होने वाला था और ना हुआ,जातिगत पक्षपात से भाईचारा दूर होता गया और आपस
में मन मुटाव और द्वेष पैदा हुआ।

वर्षो तक अँधेरे में जीने के बाद देशवासी जागरूक होने लगे। सम्मान से रोजी रोटी
कमाकर भाईचारे का सपना देखने लगे। कौन सच्चा और कौन धुर्त है कि पहचान
करने लगे। राष्ट्रवाद के लिए,अमन चैन के लिए,सर्व धर्म समभाव के लिए ,रोजी -
रोटी की सुव्यवस्था के लिए देश ने अब तक के सेक्युलर आकाओ को धराशायी
करके उस नेता का हाथ थाम लिया जो दुसरो के सम्मान की रक्षा का वचन दे रहा
है और खुद के सम्मान की रक्षा में भी समर्थ है। अब परिवर्तन निश्चित है जिसे
रोकने का माद्दा स्वार्थी नेताओं में नहीं है ,यह परिवर्तन नए युग की नींव रखेगा
हम भारतवासी अपने मताधिकार का प्रयोग करके इस दीप की लौ को स्थिर
रखने में सहयोग दे ,यही समय का तकाजा है और छद्म लोगों को तमाचा।           
   

10.4.14

मतदान को अवसर में बदलने का समय

मतदान को अवसर में बदलने का समय 

राष्ट्र के सामने रास्ता चुनकर आगे बढ़ने का समय है और समय को अवसर में बदल 
देने का मौका हर वोटर के हाथ में है ,हम अपने अधिकार का सदुपयोग और दुरूपयोग 
करने को स्वतंत्र हैं मगर इसके परिणाम भी हम खुद ही पाने वाले हैं इसलिए वोट 
देने से पहले राष्ट्र की अस्मिता पर विचार करना,अपने कर्तव्य पर विचार करना ,राष्ट्र 
वाद पर विचार करना। वोट देने से पहले इतना जरुर सोचना कि -

भारत में भुखमरी के लिए जिम्मेदार कौन है ?

भारत में भ्रष्ट राजनीति का पोषण कौन कर रहे हैं ?

भारत की राजनीति में विभिन्न धर्मावलम्बियों में फूट और सन्देह पैदा करके 
लड़ाने से किनका स्वार्थ पूरा हुआ ?

धूर्त ,कुबुद्धि,पाखण्डी,पक्षपाती ,अराजक ,शक्तिहीन ,अहँकारी ,ढोंगी और कामी को 
वोट का दान ना करे क्योंकि कुपात्र को दिया गया दान व्यर्थ का कर्म होता है ,इससे 
अच्छा है मत का उपयोग नहीं करे यदि आवश्यक लगे तो जो कम दुर्गुणी हो उसे 
वोट दे दे।

बदलाव का अर्थ यह नहीं कि खोटी उठा पटक करो ,बदलाव को उन्नति और विकास से 
जोड़कर देखो। बार बार वादा खिलाफी करने वाले, कहकर मुकरने वाले,कथनी करनी 
में अंतर रखने वाले निरंकुश लोगो के हाथ में शासन मत सौंपो। 

राष्ट्र की सरहदों की असलामती, अन्य राष्ट्रों की गुलामी और जी हजूरी, राष्ट्र के लिए 
अनर्थकारी नीति निर्माण, राष्ट्र मे आंतरिक अव्यवस्था, सद्भाव की जगह पक्षपात,
राष्ट्रिय सम्पदा की लूट खसोट और कमरतोड़ राजस्व की वसूली ने हमको गहरी 
खाई में धकेला है इसके लिए जिम्मेदार कौन ?क्या फिर से उनको वोट करना हमारी 
राष्ट्रभक्ति होगी ?सोचो ,सोचो ! वोट करो ,सब को जागृत करो ,देश भक्त सरकार चुनने 
का समय आया है ,अपने एक एक वोट से राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनो।            

    

9.4.14

विकसित भारत के लिए वोट करो

विकसित भारत के लिए वोट करो 

भारत रुग्ण अर्थव्यवस्था वाला देश क्यों बन कर रह गया ?क्या यहाँ का नागरिक
बुद्धि बल में कमजोर है या फिर सही नेता के अभाव में निराश हो गया है,यदि नेता
के अभाव में निराश है तो आशा का दीप जलाना कहाँ मना है ,आप का एक वोट
भारत के सुन्दर भविष्य के लिए मूल्यवान है वह भी तब जब आप बुद्धि का इस्तेमाल
करके वोट डालते हैं

आश्चर्य भी और विडम्बना भी !! हम पढ़े लिखे लोग वोट करने के लिए निकलते
नहीं हैं और देश की बदहाली पर हर दिन घंटो भड़ास निकालते हैं ,क्या फायदा ?
घंटो बहस करने की जगह सही और योग्य व्यक्ति को वोट किया होता तो आप
की कार्य क्षमता में 365 *5 घंटे और देश की कार्य क्षमता 365 *5 *800000000
घंटे से बढ़ जाती।

इससे भी बड़ी विडंबना कि पढ़े लिखे लोग जब वोट नहीं करते हैं तब नेता चुनने का
सारा बोझ उन लोगों पर आ जाता है जो निरक्षर या मामूली पढ़े लिखे हैं। जब ये
लोग नासमझी से गलत व्यक्ति को संसद में भेज देते हैं तब पढ़े लिखे लोग अखबारो
में ,मीडिया में ,सार्वजनिक मंचो से उनके खिलाफ जागृति फैलाने का काम करते हैं
जब जागने का समय आया तो हम नींद ले रहे थे और नींद लेनी थी ,चैन से रहना
था तब हायतौबा मचाते हैं।

हम आरोप लगाते हैं कि गरीब और भूखे भारतीय वोट की ताकत नहीं समझते और
वोट बेचते हैं चन्द रुपयों के लालच में, मगर वोट नहीं देकर हम लोकतन्त्र का या
खुद का क्या भला कर पाये हैं ?

हम उम्मीदवार की जीत और हार के लिए जाति और धर्म को प्रधानता देते हैं क्योंकि
खुद को पंडित और त्रिकालदर्शी ठहराने वाले लोग मतदान केंद्र पर पहुँचना हीन काम
मानते हैं जबकि वो जानते हैं कि उनके वोट ना करने से देश की तस्वीर पर गर्त जम
गयी है।

हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम राष्ट्रवादी लोगों को चुनकर भेजे और वे चुने हुए योग्य
लोग देश के उत्थान के लिए काम करे। देश को भ्रष्टाचार से ,गरीबी से ,बेरोजगारी से ,
छद्म निरपेक्षता से ,धूर्त सियासत से बचाना है तो वोट देने के लिए मतदान केंद्र तक
जाना सीखो,उसके बाद जो परिणाम होगा उससे वंशवाद,तुष्टिकरण,भय,वोटबैंक ,
गरीबी,बेकारी,दंगे -फसाद,अशिक्षा,भ्रष्टाचार ,नौकरशाही जैसे भयंकर रोग खत्म
होते नजर आयेंगे।                  

5.4.14

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण 

आजाद भारत में जातिगत और धर्म के नाम पर भ्रम और भय फैलाने वाले लोग
कौन है और उनको कब तक सहना है ?यह तय करने का समय पक गया है।

वर्त्तमान भारत में भारतीयों को लड़ाने वाले सत्ताधीश क्या शासक बनने के पात्र
हैं,गलत गंतव्य की ओर भूल से बढ़ जाने का मतलब यह नहीं कि आप विपरीत
दिशा में मुँह घुमाकर कदम नहीं बढ़ा सकते हो,बस मुँह फेर कर कदम बढ़ाने की
जरुरत है,भारतीयों को लड़ाने वाले नेता धूल फाँकते नजर आयेँगे। 

आजाद भारत इतने वर्षों बाद भी मुलभुत नागरिक सुविधाओं के लिए (बिजली,
पानी,सड़क,शिक्षा और मकान ) क्यों तरस रहा है ?  इतने सालों तक
जनता से कर के रूप में वसूला गया धन का बड़ा हिस्सा किसकी जेब में गया ?

आजादी के बाद से आज तक अल्पसंख्यकों के तारणहार बनने वाले यह स्पष्ट
करें की आज भी अल्प संख्यक विकास की मुख्यधारा से दूर निम्न जीवन
स्तर पर जीने को मजबूर क्यों हैं ?उन्हें राष्ट्रवाद की धारा से दूर रखने का नीच
कृत्य कौन लोग कर रहे हैं और क्यों ?

तुष्टिकरण और धर्म के आधार पर मानव -मानव में फर्क करना किन लोगों ने
सिखाया और इस अधम नीति से किसे फायदा हुआ ?

सर्व धर्म समभाव के आधार पर चल रहे हिंदुत्व की साम्प्रदायिक व्याख्या करने
वाले सत्ताधीश किस के हित के लिए मिथ्या भय भारतीयों में फैला रहे हैं ?इस
मिथ्या भय से राष्ट्र ने क्या खोया और किन लोगों ने कितना पाया।

हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है तो इसका सँकुचित अर्थ करने वाले क्या राष्ट्र विरोधी
नहीं है ?क्या ऐसे निकृष्ट नेताओं का साथ देना राष्ट्र हित में है ?

क्या निर्धन भारतीयों को रोजगार देने की जगह उन्हें मुफ्त या सस्ता देने की
चाल चलने वाले नेता देश की बहुत बड़ी जनसँख्या को निठल्ला और कामचोर
नहीं बना रही है?उन्हें तुष्ट करके पुरुषार्थ से रोकने का काम राष्ट्र हित में है ?

अब तो नींद से जागो भारतीयों, हम सब एक और नेक बनें। राष्ट्र के विकास के
लिए जाग जाए वरना आने वाली पीढ़ियाँ माफ नहीं करेगी,आने वाले भविष्य
की समृद्धि के लिए राष्ट्र हित में फैसला ले। आने वाले पाँच साल के लिए ऐसा
नेता मत चुन लेना जो विकास की बातें करके राष्ट्र का सिर झुकाता हो ,ऐसा
नेता चुनना जो सतत विकास की राह पर चल रहा है,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष
कर रहा है।                  

30.3.14

विस्थापित कश्मीरी और गूँगे नेता

विस्थापित कश्मीरी और गूँगे नेता 

विचित्र नाम है धर्म निरपेक्षता ,हमारे देश के वोट बैंक परस्त नेता इस लिबास से खुद
को ढके रहना पसँद करते हैं ,तुष्टिकरण के रास्ते पर बढ़ती हुयी धर्म निरपेक्षता गन्दा
नाला बन रही है और उसकी इस बदबू से हर कौम बेहाल है। कोई नेता अपनी वोट बैंक
को खुश करने के लिए किसी अन्य नेता को "नपुँसक "कहता है तो कोई जबरदस्ती
"धार्मिक टोपी "पहनाना चाहता है तो कोई नेता वोटबैंक को चरमपन्थ की ओर धकेलता
हुआ "आतँकी सोच" की आग बरसाता है। अपने को धर्म निरपेक्ष कहने वाली पुरानी पार्टी
किस प्रकार की सोच रखती है यह देश देख भी रहा है और भुगत भी रहा है। जब देश का
प्रधान भी वोटबैंक के मोह में राजधर्म भूल कर तुष्टिकरण वाली सोच को सरे आम यह
कह कर प्रगट करता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ वोटबैंक वाले समूह का है
तो समानता की आशा खत्म हो जाती है।

 उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय दल,बिहार के क्षेत्रीय दल ,आसाम के क्षेत्रीय दल और बंगाल के
क्षेत्रीय दल सब के सब दोगली वाणी और दोगला आचरण रखते हैं। एक भारतीय से
सौतेला व्यवहार और दूसरे से वोटबैंक के कारण तुष्टिकरण का व्यवहार। इन प्रदेशो
में केवल दंगे ,गरीबी ,धार्मिक और सामाजिक कटुता की फसल पकती है। बहु संख्यक
में जातिगत फूट पैदा करना और वोटबैंक को विकास की मुख्य धारा से अलग -थलग
रख कर शासन चलाना यही इनकी नीति रही है।

नयी नयी राजनीति में आयी पलटू की सोच भी इन पार्टियों जैसी ही है ,वोटबैंक को
बनाने के चक्कर ये तो राष्ट्र विरोधी विचार भी खुल कर बकते हैं इनके पास कश्मीरी
विस्थापितों के दर्द के लिए शब्दों की सहानुभूति भी नहीं है मगर कश्मीर पर जनमत
संग्रह कराने की वकालात जरुर करते हैं।

बहुसंख्यक हित की रक्षा की बात करना आज कितनी पार्टियों को सुहाता है ?वोट बैंक
का अनुचित हित साधने के लिए ये सब तत्पर रहते हैं ?क्या विस्थापित हुए कश्मीरी
लोगों के लिए इन पार्टियों ने कभी कोई वादा भी किया है,कभी संवेदना भी जतायी है ?
क्या गुनाह था इनका जो आज भी अपने देश में विस्थापित की तरह जीना पड़ता है ?
देश के आतंकियों के जनाजे पर आँसू बहाने वाले तथाकथित निरपेक्ष नेताओं की
आँखे उस समय क्यों सूख जाती है जब विस्थापित कश्मीरियों के हक़ की बात आती है ?
ये मानवाधिकार की बातें करने वाले भद्र कहलाने का शौक रखने वाले लोग तुष्टिकरण
के पक्ष में घंटो बहस करते हैं मगर कश्मीरी विस्थापितों के हक़ की बात नहीं करते हैं।
प्रशांत भूषण जैसे लोग इन पण्डितों के दर्द को भूल कर कश्मीर पर क्या बयान देते हैं
यह हर राष्ट्रवादी को याद है।

इस चुनाव में हम राष्ट्र के लिए वोट करें ,विस्थापित भाइयों के दर्द को दूर करने के लिए
वोट करे,देश से घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए वोट करे,आतँकवादी सोच से लड़ने के
लिए वोट करे,हर भारतीय को मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए वोट
करे ,शांति और सुरक्षा के लिए वोट करे,जिन लोगो ने देश को सिर्फ वादे दिए हैं हम
भी उन्हें सपना ही दिखाए और वोट विकास के लिए करे।             

27.3.14

छद्म निरपेक्षता के अलावा सब सलामत

छद्म निरपेक्षता के अलावा सब सलामत 

जब भी हिन्दुस्थान में चुनाव आते हैं देश के अकर्मण्य नेताओं को धर्मनिरपेक्षता की
याद सताती है। सबको साम्प्रदायिकता से भय लगता है ,परन्तु कोई राजनेता स्पष्ट
नहीं करता है कि उसको किस साम्प्रदायिकता से खतरा है।

विश्व का हर धर्म दया ,करुणा और मैत्री का सन्देश देता है और मानवीय सहयोग की
भावना से ओतप्रोत है। इस देश में हर धर्म सलामत है ,हर आस्था सलामत है सिवाय
छद्म निरपेक्षता के।

मानव -मानव में भेद का पाठ इस देश को किस राजनीति ने सिखाया ?क्या पक्षपात
करके राजनीतिज्ञों ने हिन्दू प्रजा का दिल नहीं दुखाया ,आज कितने राजनीतिज्ञ ऐसे
बचे हैं जो खुले मंच से इस देश को हिन्दुस्थान कहते हैं या हिन्दुस्थान जिंदाबाद का
नारा देते हैं ,हमारे बौने राजनीतिज्ञों से तो अच्छे वो पडोसी देश हैं जो हमारे देश की
पहचान "हिन्दुस्तानी सल्तनत "से करते रहे हैं। जब इस देश का प्रधान सरे आम
मानव -मानव में भेद धर्म देख कर करता है तो हिन्दुस्तानियों का माथा शर्म से झुक
जाता है। हिन्दू अपने धर्म पर गर्व करे ,अपनी हिंदुत्व की संस्कृति पर गर्व करे तो
इसमें अँधे राजनेताओं के पेट में दर्द क्यों होता है ,हिन्दुस्थान पर राज करने की इच्छा
भी है और हिंदुत्व से परहेज भी।

यह देश तभी सलामत रहेगा जब हम अपने -अपने धर्म पर गहरी निष्ठा और गर्व रखेँगे।
हिन्दू  अपने धर्म के प्रति निष्ठावान बने ,मुस्लिम अपने धर्म के प्रति निष्ठावान बने ,ईसाई
अपने धर्म के प्रति आस्थावान बने क्योंकि सब धर्म मानवता की भलाई के लिए बने हैं ,
हम सबको धर्म के मूल सिद्धान्त को कस कर पकड़ लेना है जो परोपकार से जुड़ा है। इस
देश में धर्म कभी विवाद उत्पन नहीं करते हैं ,विवाद उत्पन करते हैं सत्ता के भूखे
राजनीतिज्ञ,इन लोगों को सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए अच्छे हथियार की जगह ओछे
हथियार के रूप में एक धर्मावलम्बी को दूसरे धर्मावलम्बी से लड़ाते हैं और ये निकृष्ट
खेल आजादी के पहले से अभी तक खेल रहे हैं। आज हर संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ने
वाला उम्मीदवार जाती और धर्म की अंक गणित देख कर पर्चा भरता है ,क्यों ?हम
भारतीय नागरिक भी इसी निगाह से चुनाव की गणित का अभ्यास करते हैं ?हम
मतदान भी जातिगत और धर्म के आधार पर करते हैं ,क्यों ? जब तक विकास के मुद्दे
को हासिये पर धकेलते रहेंगे तब तक हम अभावग्रस्त जीवन ही जियेंगे।

इस देश में हर धर्म सलामत है इसमें शंका का कोई स्थान नहीं है। विश्व का हर धर्म
सही राह पर आगे बढ़ना सिखाता है इसमें किसी को शँका नहीं है। हम अपने -अपने
धर्म पर गर्व करे इसमें किसी को ऐतराज नहीं है। ऐतराज है तो सिर्फ भ्रष्ट बुद्धि वाले
राजनीतिज्ञों को ,क्योंकि जैसे ही हम मानव धर्म को मुख्य मान लेँगे तो उनकी चूलें
हिल जायेगी। आओ ,इस बार हम विकास के लिए मिलकर मतदान करे,हम गरीबी
को मात देने के लिए मतदान करे,उज्जवल भारत के लिए मतदान करे। निर्भीक बने
और निर्भीक सरकार चुने।   
    

26.3.14

धुर्त राजनीतिज्ञों से बच के रहना हिन्दुस्तानियों

धुर्त राजनीतिज्ञों से बच के रहना हिन्दुस्तानियों 

हर पाँच साल बाद भारत में चुनावी महाभारत खेला जाता है और गरीब भारतीय
शास्त्री और वाजपेयी के समय को छोड़ हर बार धुर्त राजनीति में फँस जाता है ।
हिन्दुस्थान अपनी असल पहचान को तरस गया। राजनीतिज्ञों ने बुरी तरह से
भारतीयता को घिस दिया ,मानव -मानव के बीच विद्वेष का जहर घोल दिया।
हिन्दू धर्म के लोगों को आपस में लड़ाया और बाँटा। मुस्लिम समाज को मुख्य
धारा से अलग रखा। भारतीयों को आपस में धर्म ,जाति और संस्कृति के बहाने
लड़ाया ,आपस में भय और शंका के माहौल में रहने को विवश किया। इससे देश
पिछड़ गया मगर धुर्त राजनीतिज्ञ कुबेर बन गये।

अब से आने वाले हर पाँच साल का चुनाव भारी परिवर्तन लाता जायेगा क्योंकि
आने वाला वक्त शिक्षित भारतीयों का आ रहा है जिसके पास ज्ञान है ,श्रम है ,
तथ्य को परखने की ताकत है। लोक लुभावन योजनाओं की घोषणाएँ करने
वाले राजनीतिज्ञ हासिये पर आते जायेंगे मगर शिक्षित भारतीयों को हर पल
जागरूक रहना होगा क्योंकि अभी से कुछ शिक्षित लोग धुर्त राजनीतिज्ञों के
चरण चाटने लग गये है ,समाजसेवियों की छवि का सहारा लेकर उत्पात के
मार्ग पर देश को ले जाना चाहते हैं ।

इस बार परिवर्तन हो रहा है ,स्पष्ट दिखता है और उसके पीछे जो ऊर्जा लगी
है वह युवा भारत है जो काम चाहता है ,विकास चाहता है ,रोजगार के अवसर
चाहता है। युवा भारत माला ,टोपी या क्रॉस के नाम पर झगड़ नहीं रहा है और
ना ही इस अंक गणित पर वोट करता है,युवा भारत अब अपने भविष्य को
उज्जवल देखना चाहता है इसलिए वह भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ लड़ भी रहा है और
विकास का साथ दे रहा है। युवा भारत एक बार विश्वास करके धोखा खा सकता
है पर मौका मिलते ही, तुरंत, बिना लाग लपेट के धुर्त नेताओं को मुख्य राजनीति
के पथ से बाहर धकेल देता है ,बराबर झाड़ पोंछ के साफ कर देता है।

बड़े -बड़े महारथी इस बार चुनावी मैदान से भाग कर चोर दरवाजे को खटखटा
रहे हैं ,बड़े -बड़ों की नींद हराम हो रखी है,यह सब मोदी के कारण नहीं हुआ है ,
मोदी ने तो सिर्फ युवाओं को जखजोरा है ,जागृत किया है ,स्वाभिमानी भारत
का सपना मोदी ने दिखाया और युवा उसे साकार करने में जुटा है। अब वादे
नहीं चलने वाले,नारे नहीं चलने वाले ,छद्मवाद या धुर्तता नहीं चलने वाली,यह
चुनाव युवा भारत संचालित कर रहा है जिसे ताकतवर नेता का चयन करना
आता है ,झूठे समाचार ,सडी-गली अफवाहें,भ्रम और मायाजाल का तिस्लिम
ख़त्म हो चूका है। भारत इस बार से ठोस इरादों वाले ऊर्जा सम्पन्न लोगों को
चुनेगा ,इस बार उनकी हार तय है जो केवल नारे देते हैं या कर्त्तव्य छोड़ भाग
खड़े होते हैं। युवा भारत धुर्त नेताओं के जाल से बचा रहे, यही अहम है।            

20.3.14

इस तरह सफल होगा 272 + का प्लान

इस तरह सफल होगा 272 + का प्लान

भारत के लोकतंत्र में वर्षों बाद किसी नेता ने पूर्ण सपना देखा वरना इससे पहले
तो सभी नेता चाहे किसी भी दल के हो सबने जुगाड़ तंत्र के सपने देखे थे। जुगाड़ी
नेताओं ने मान लिया था कि भारत में आने वाले कई चुनावों में जुगाड़ तंत्र ही
चलने वाला है इसलिए सबकी मानसिकता जुगाड़ वाली हो गई। नरेंद्र मोदी ही
एक ऐसा नेता निकले जिन्होंने फिर पूरा सपना देखा ,उनकी टक्कर के नेता
जोड़ तोड़ की तन्द्रा में अभी भी घसीट रहे हैं। आइये देखते हैं एक तस्वीर जो
272 + की बन चुकी है

1. 272 + की जिद्द -सफल और आत्म विश्वास से भरे नेता की विशेषता होती
है कि वे अपने टारगेट को सफलता के पड़ाव बिंदु से आगे देखना चाहते हैं।
मोदी ने अपनी जीत के सपने को स्पष्ट रखा इससे उनकी पार्टी के कार्यकर्त्ता
जोश से लबालब भर गए ,जोश ही ऊर्जा बनता है और ऊर्जा ही प्रकाश फैलाती
है।
2.विशिष्ट  छवि - मोदी ने अपनी छवि को राष्ट्रवादी हिन्दू के रूप में रखा जो
सबको साथ लेकर चलने को तैयार है। मोदी ने हिंदुत्व को अन्य नेताओं की
तरह जन्म या धर्म से जोड़ कर नहीं देखा उन्होंने भारतीयता से जोड़ कर देखा
कोई भी कोम जो भारत पर गर्व करती है मोदी उनका विकास चाहते हैं।

3. वाक चातुर्य -मोदी उन गिने चुने नेताओं में से है जो वाक पटु हैं। शब्दों का
चयन,विषय पर पकड़ और जनता को बाँधे रखने की गजब की  क्षमता है।
विरोधियों की हलकी सी चूक को पूरी ताकत से पकड़ते हैं और उसकी विशाल
विकरालता को जनता के सामने उछाल देते हैं। बेचारे विपक्षी उसकी काट
ढूँढने में समय बर्बाद कर देते हैं।

4. लक्ष्य को पाने की ललक - मोदी के आर्थिक मॉडल में जटिलता नहीं है
इसलिए हर कोई उससे प्राप्त लाभ को महसूस करता है। मोदी जटिल काम
को निरन्तरता से अंजाम देते हैं जब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो जाता तब
तक पसीना बहाते रहते हैं।

5. सरकार की हर भूल को भुनाना - सरकार की हर भूल पर पैनी नजर रखना
और अपने राज्य में उस भूल की जड़ को मिटाना,यह बड़ी मेहनत का काम
है मगर मोदी ने किया ,गुजरात के काम की तुलना में हर सरकार के काम को
देखना और उनकी कमजोर नस को बीच बाजार दबाना।

6. विरोधियों से प्रचार करवाना -मोदी को अपने प्रचार के लिए खुद के साथियों
के अलावा विरोधियों से भी मुफ्त प्रचार मिलता रहता है। हर एक पार्टी का नेता
अपने -अपने भाषण में मोदी का जिक्र करता रहता है जैसे हर एक सीट से मोदी
ही उम्मीदवार हैं। मोदी की आलोचना से उनके चाहने वाले पक्के बनते रहते हैं
और जो उनको नहीं जानते थे उनका ज्ञान हर नेता जनता को हर पल करवाता
रहता है।

7. पैनी व्युह रचना - मोदी की व्युह रचना उत्तम कोटि की होती है। छोटे से छोटे
पाशे पर गम्भीर चिन्तन और छोटे से छोटे विरोधी से सजग। साथीयों की खोज
में रहना और विरोधियों की फूट को अपने पक्ष में भुनाना। समाज के वर्ग विशेष
के मन को टटोलने की कवायद में लगे रहना। बूथ रचना से सोशियल मीडिया तक,
प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक सब जगह सुव्यवस्था।

8. विकास और व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे -मोदी की राष्ट्रवादी छवि और विकास
तथा परिवर्तन के मुद्दों की सरल व्याख्या जनता के दिल को छू लेती है। लोग
मोदी में भविष्य के सपने ढूँढ़ते हैं और मोदी गुजरात के विकास कामों को एक -
एक कर बताते जाते हैं और लोगों से आह्वान करते हैं उन पर भरोसा जताने का ,
विरोधीयों के तर्कों की धज्जियाँ उड़ाने में मोदी माहिर हैं।

9. राज्य के अनुसार टीम वर्क - मोदी जानते हैं की केवल विकास की बातों से
पूरी बात नहीं बनेगी। सपने को साकार करने के लिए जीत चाहिए और उसमें
जो नीति फीट बैठती हो उस पर डटे रहना है। राज्य के हिसाब से हर कार्ड को
खेलना है। मीडिया उनके बारे में क्या सोचता है या आलोचना करता है ,वे उस
पर कभी टिप्पणी नहीं करते ,उनकी अपनी टीम है और मौलिक सोच है।

10. अधूरे प्रतिस्पर्धी - मोदी को मजबूत प्रतिस्पर्धी नहीं मिले हैं ,विरोधियों
के कारनामें ,उनका कार्यकाल ,उनके राज्य की आन्तरिक अव्यवस्था ,
तुष्टिकरण की नाव में बैठे सभी प्रतिस्पर्धी ,विरोधियों की कथनी करनी का
फर्क ,बढ़ती महँगाई ये सब उनकी जीत में सहयोग कर रहे हैं।