वीरेन्द्र सेंगर की कलम से
सालों के लंबे ऊहापोह के बाद भाजपा नेतृत्व ने एक तरह से मान लिया है कि ‘हार्ड लाइन’ ही पार्टी के लिए राजनीतिक ‘संजीवनी’ बन सकती है। लोकसभा के चुनाव में लगातार दो करारी हार के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी दबाव बढ़ गया है। दूसरी तरफ, कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी खराब सेहत के कारण हाशिए पर चले गए हैं। उनके बाद पार्टी में दूसरे बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी रहे हैं। उन्हें भी संघ के दबाव में हाशिए पर ला खड़ा किया गया है। संघ ने दबाव बनाकर नितिन गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बैठवा दिया है। गडकरी की सबसे बड़ी पूंजी यही मानी जाती है कि वे संघ नेतृत्व के सबसे भरोसे के नेता हैं। संघ परिवार का दबाव रहा है कि पार्टी अपनी मूल दशा और दिशा से भटके नहीं। वरना न घर की रहेगी, न घाट की । पूरा पढें बात-बेबात पर
26.7.10
मोदी के रास्ते पर जाएगी भाजपा!
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23.7.10
विधानसभाएं बन रही हैं जंग- ए- मैदान!
इस बार ‘परचम’ पटना ने लहराया है। यहां विधायिका खुलकर बेशर्मी पर उतर आई। यहां तक कि विधानसभा के माननीय स्पीकर पर चप्पल फेंकी गई। कई ‘माननीयों’ को घसीट-घसीटकर मार्शलों को विधानभवन से बाहर करना पड़ा क्योंकि ये लोग विरोध के नशे में आपा खो बैठे थे। सत्ता पक्ष के लोगों का सिर तोड़ने पर उतारू थे। जवाब में सत्ताधारी भी कानून हाथ में लेने से हिचके नहीं। सबने मिलकर खूब नंगा नाच किया। इस खेल में सबसे ज्यादा आक्रामक राजद के विधायक रहे। इन लोगों ने विरोध के नाम पर विधायिका की मर्यादाओं को जमकर ठेंगा दिखाया। तंग आकर विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने 66 विधायकों को तीन दिन के लिए निलंबित कर दिया है। पूरा देखेबात-बेबात पर
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20.7.10
किस-किस से माफी मांगेंगे मुलायम
सपा की सरकार में राज्यमंत्री रहे और वर्तमान में कांग्रेस से जुड़े डा. सीपी राय ने किये मुलायम सिंह से कुछ सवाल
बड़े भाई माननीय मुलायम सिंह को एक समुदाय विशेष से माफ़ी मागंते देख बड़ा कष्ट हुआ .सत्ता आते ही अहंकार की पराकाष्ठा और जाने के बाद का यह स्वरुप कुछ ठीक नहीं लगा.
2. चौ चरण सिंह से, जिनकी सादगी और किसानों के प्रति समर्पण से आप का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा?
3. राजनारायण और कर्पूरी ठाकुर सहित उन तमाम लोगों से, जो जिंदगी भर दूसरों के लिए संघर्ष करते रहे और आप केवल अपने और अपने परिवार के लिए या बहुत हुआ तो अपने गाँव के लिए या कुनबे के लिए?
4. १९ प्रदेशों के उन लोगो से, जिन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी और आपके परिवार के कुछ लोगों की मनमानी के कारण उनके सपने भी टूटे और पार्टी भी?
5. उन हजारों कार्यकर्ताओं से, जिनके लिए आपके तथा पार्टी दफ्तर के दरवाजे सत्ता के दौरान बंद हो गए थे?
6. उन ९५ प्रतिशत लोगों से, जिन्हें ५ प्रतिशत लोगों के खिलाफ लड़ाई की बात कर आपने साथ लिया था पर आप तो ५ लोगो में जा बैठे?
7. तमाम गरीबों से, जिनका आप सत्ता काल में मजाक उड़ाते रहे फ़िल्मी और पूंजीवादी चकाचौध के कारण?
8. उन तमाम लोगों से जो या तो आप के कारण बर्बाद हो गए या ख़तम ही हो गए?
9. रामपुर तिराहे पर बलात्कार की शिकार बहनों से?
10. समाचार जगत के उन लोगों से जिन पर हल्ला बोल कर आपने तमाम जुल्म किये थे?
11. उन बच्चों से जो नक़ल कर पास तो हो गए आप के स्वार्थ पूर्ण फैसले से लेकिन जिन्हें नौकरी नहीं मिल रही है?
12. राजवीर का आपके आगरा मंच पर ये कहना कि कल्याण और आप अलग जरूर थे पर ह़र काम आपस में बात करने के बाद ही करते थे यानि बाबरी मस्जिद गिराने में भी बात की होगी? इस विश्वासघात से दुखी लोगो से?
13. समाजवाद शब्द को जूतों से रौदने के लिए सच्चे समाजवादियों से?
14. दलालों के कारण समाजवादी आन्दोलन के जिन वफादार सिपाहियों को अपमानित किया या निकाल ही दिया उनसे या अपने आस पास भी जिन तमाम लोगो को लगातार केवल धोखा ही देते रहे हैं उन सभी से?
भाई साहब किन किन से अभी और माफ़ी मांगने की प्लानिंग है ? क्या पिछली सरकार में अत्याचार या भ्रष्टाचार, साथियों का अपमान और अपना फायदा कुछ बाकी रह गया है? सियासत के लिए आप क्या क्या करेंगे भाई साहब? आप के इस रूप की कल्पना ही नहीं की थी, इसलिए सचमुच बड़ा दुःख हो रहा है।
फिर भी आप अपने ह़र दांव में सफल हो, इसकी शुभकामना।
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16.7.10
हमका माफी दै दो, हमसे गलती ह्वै गयी
वीरेंद्र सेंगर की कलम से
उत्तर प्रदेश में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने खास ‘वोट बैंक’ की राजनीतिक कवायद तेज कर दी है। ठीक उसी तरह जैसे कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुस्लिम वोट बैंक को बांधे रखने के लिए ‘बलिदानी’ तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस नए सिरे से अपना जनाधार बढ़ाने में लगी है। उसकी खास उम्मीद मुस्लिम वोटों पर टिकी है। मुलायम यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस वाकई में ‘सेहतमंद’ हुई तो इसकी सबसे ज्यादा कीमत उनकी पार्टी को ही चुकानी पड़ सकती है। उन्हें सबसे ज्यादा खतरा मुस्लिम वोट बैंक से हो गया है। मुसलमानों को रिझाने के लिये ही उन्होंने ‘माफीनामे’ का दांव चला है। उन्होंने मुसलमान भाइयों से सवा साल पीछे की गई ‘गलती’ के लिए माफी चाही है। ‘माफीनामे’ में सपा सुप्रीमो ने कहा है कि पिछले वर्ष लोकसभा के चुनाव में उन्होंने कुछ गलत तत्वों (कल्याण सिंह) का साथ ले लिया था। इससे आपको जो मानसिक कष्ट पहुंचा, उसका दुख है। माफ कर दो। आगे से ऐसी भूल नहीं होगी। पूरा पढ़े बात-बेबात पर
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14.7.10
उमा भारती को लेकर भाजपा के अंदर धमाल
वीरेंद्र सेंगर की कलम से
उमा भारती को लेकर एक बार फिर भाजपा के अंदर धमाल शुरू हो गया है। लाल कृष्ण आडवाणी सहित कई वरिष्ठ नेता अब उमा को लेकर सॉफ्ट हो गए हैं लेकिन मध्य प्रदेश में पार्टी के अंदर उमा की इंट्री का सवाल जोरदार खींचतान में उलझ गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके सिपहसालार मंत्रियों ने उमा के मामले में अड़ियल रुख अपना लिया है। इस मुद्दे पर मध्य प्रदेश में कई मंत्रियों के बीच ‘सिर फुटव्वल’ की नौबत आ गई है। कैबिनेट बैठक में बुजुर्ग नेता बाबू लाल गौड़ ने जोर देकर पार्टीहित में उमा जैसी प्रखर नेता की वापसी को जरूरी बताया, जिस पर मुख्यमंत्री के चहेते कुछ मंत्रियों ने कड़ी आपत्ति की| एक मंत्री ने तो गौड़ को यह कह कर चिढ़ा दिया कि उन पर उम्र हावी हो गई है। इसको लेकर बैठक में बवाल बढ़ा था।
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9.7.10
माननीयों पर आफत
वीरेंद्र सेंगर की कलम से
मंत्रिमंडल में फेर-बदल की तैयारी है। ऐसे में सुगबुगाहट है कि इसमें मंत्रियों के ‘रिपोर्ट कार्ड’ की भूमिका होगी या नहीं। अगर वाकई में ‘रिपोर्ट कार्ड’ की कसौटी बनी, तो कई स्वनामधन्य ‘माननीयों’ का कैबिनेट में टिके रहना मुश्किल हो जाएगा। मेरिट रिपोर्ट का डर कई लोगों को सताने लगा है। वे पता करने में जुट गए हैं कि पीएमओ में उनके कामकाज का आकलन किस तरह से किया गया है। कुछ सहमे हुए मंत्रियों ने तो अपनी कुछ बड़ी खामियों को छिपाने के लिए तरह-तरह से सफाई देनी शुरू कर दी है। इनमें से कुछ राजनीतिक दबाव बढ़ाकर अपनी कुर्सी को टिकाए रखने की जुगाड़ में जुट गए हैं। पूरा पढ़ें बात-बेबात पर
माननीयों पर आफत
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मुक्तिबोध की धर्मपत्नी श्रीमती शांता मुक्तिबोध का निधन
वरिष्ठ साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध की धर्मपत्नी श्रीमती शांता मुक्तिबोध का निधन हो गया है. सृजनगाथा ने यह सूचना प्रकाशित की है.
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8.7.10
धधकता कश्मीर
(वीरेंद्र सेंगर की कलम से)
कश्मीर की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतरती नजर आ रही है। घाटी को फिर से अशांति और अराजकता की भट्ठी में झोंकने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। श्रीनगर से 11 जून को हिंसक वारदातों का सिलसिला शुरू हुआ था। करीब एक महीने के अंदर ही सुरक्षाबलों के खिलाफ पूरी घाटी में आक्रोश और नफरत की आग भड़का दी गई है। हालात बेकाबू होते देखकर श्रीनगर सहित घाटी के कई संवेदनशील इलाकों में सेना की तैनाती कर दी गई है।
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6.7.10
यह पाकिस्तान का नया झूठ तो नहीं?
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4.7.10
बड़े दरबार को दलित कार्ड का झटका
(वीरेंद्र सेंगर की कलम से)
वे अंदर से बेचैन तो बहुत हैं लेकिन, राजनीतिक मजबूरी ऐसी है कि सीधे-सीधे नाम के मुद्दे पर ताल नहीं ठोंक सकते। यूँ तो कह दिया जाता है कि अरे नाम में क्या रखा है...? यदि कोई नाम ‘ब्रांड’ बन जाए, तो फिर नाम ही सबसे बड़ी धरोहर बन जाता है। नेहरू-गांधी परिवार का नाम तो कांग्रेस के लिए सुपर राजनीतिक ब्रांड न जाने कब का बन गया है। अब कोई इस ‘ब्रांड’ को चुनौती देने लगे, तो भला कांग्रेसी ‘भद्रलोक’ कैसे चुप बैठ सकता है? फिर भी चुप्पी साधनी पड़ रही है क्योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बार अपने चतुर दांव से कांग्रेसी उस्तादों को पानी पिला दिया है। वे इस मुद्दे पर बस, रणनीतिक नाराजगी जता रहे हैं। यही कह रहे हैं कि मायावती सरकार ने अमेठी संसदीय क्षेत्र की जनता की जनभावनाओं का आदर नहीं किया है। वे लोग तो अमेठी जिले का नाम ‘राजीव नगर’ चाहते थे लेकिन, सरकार ने इसका नामकरण ‘शाहू जी महाराज नगर’ कर दिया। ऐसा नाम रखा जो इस क्षेत्र के लिए ‘अजूबा’ है। कांग्रेस का ‘बड़ा दरबार’ यानी ‘दस जनपथ’ इस प्रकरण पर रणनीतिक चुप्पी साधे है। हां, कुछ दरबारी किस्म के नेता जरूर उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर ‘फनफनाते’ दिख रहे हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता, मनीष तिवारी कह रहे हैं कि दशकों से अमेठी नेहरू-गांधी परिवार की कर्मभूमि है। प्रदेश सरकार ने अकस्मात नाम बदल डाला, फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि, कांग्रेस का फोकस इस पिछड़े क्षेत्र के विकास का है। वह बना ही रहेगा। केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद को लगा है कि नाम के साथ यह ताजा छेड़छाड़ ठीक नहीं है क्योंकि, नेहरू-गांधी परिवार यहां की पहचान का प्रतीक बन चुका है। मौका भी है, पार्टी का दस्तूर भी है कि ‘बड़े दरबार’ के प्रति खास मौकों पर वफादारी के नगाड़े बजाए जाएं, जो बजने भी लगे हैं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि अमेठी जिले का नाम ‘राजीव नगर’ होना चाहिए क्योंकि इस संसदीय क्षेत्र की जनता यही चाहती है। अब यह तो ये प्रवक्ता महोदय ही बता सकते हैं कि उन्होंने कैसे कुछ घंटों में आनन-फानन यह ‘रायशुमारी’ करा ली? पार्टी के वरिष्ठ नेता इस मुद्दे पर सीधा मोर्चा नहीं खोलना चाहते। दरअसल, वे ‘बड़े दरबार’ का संकेत भी समझना चाहते हैं, जो अभी स्पष्ट रूप से उन्हें नहीं मिला है।
सुल्तानपुर जिले में आने वाले अमेठी संसदीय क्षेत्र से नेहरू-गांधी परिवार का काफी पुराना नाता है। इससे सटे हुए रायबरेली क्षेत्र से इंदिरा गांधी चुनाव लड़ती रहीं, जीतती भी रहीं। एक बार (वर्ष 1977) वे जनता पार्टी की लहर में जरूर हार गई थीं। इंदिरा गांधी के जीते जी उनके छोटे पुत्र संजय गांधी ने अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़कर ‘विरासत’ की नींव रखी थी। वे भारी बहुमत से जीते भी थे। उनके आकस्मिक निधन के बाद इस सीट से राजीव गांधी को मैदान में उतारा गया था। वे 1981-1991 तक लोकसभा में अमेठी का प्रतिनिधित्व करते रहे। राजीव के निधन के बाद ‘दस जनपथ’ के खास वफादार सतीश शर्मा को अमेठी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। इसके बाद राहुल गांधी जब राजनीति में कूदे तो उन्होंने अपने पिता की कर्मभूमि अमेठी को ही गले लगाया। वर्ष 2004 का चुनाव जीतने के बाद वे 2009 का चुनाव भी रिकार्ड मतों से जीते थे। राहुल गांधी को कांग्रेसी, भावी प्रधानमंत्री मानते हैं। युवा राहुल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं। दलित और वंचित वर्गों के लिए उनकी राजनीतिक ‘संवेदनशीलता’ अक्सर चर्चा में रहती है। हाल के महीनों में वे दलितों के पर्ण कुटीर में ‘नाइट हाल्ट’ करके यह संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं कि पार्टी को इस वर्ग की हित चिंता की बहुत बेचैनी है। दलित घरों में ‘युवराज’ रुके, तो मीडिया ने दुनियाभर में जमकर ढोल पीटे। कुछ इस भाव में कि देखो... देखो ‘महलों’ में पला-बढ़ा सुकुमार शख्स कैसे दलितों की पीड़ा का अनुभव करने के लिए ‘दरिद्र नारायण’ बनकर उनके घरों में धमक जाता है। उनके यहां की रूखी-सूखी खाकर रात बिताता है। उनका दुख-सुख सुनता है। वह भी अपनी सुरक्षा का जोखिम लेकर।
यह भी चर्चा चली कि राहुल उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पार्टी के खोए जनाधार को पाने के लिए ये तमाम कवायद कर रहे हैं ताकि, दलित वर्ग एक बार फिर पार्टी के साथ जुड़ जाए। ऐसी कोई कारगर राजनीतिक कवायद बसपा के लिए वाकई बड़ी चुनौती बन सकती है क्योंकि मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ने अपने मजबूत दलित वोट बैंक के बल पर ही अपना ‘साम्राज्य’ इतना बढ़ा लिया है कि कांग्रेस यहां हाशिए पर चली गई है। पिछले लोकसभा के चुनाव में जरूर ‘राहुल इफेक्ट’ के चलते यहां बसपा का ‘हाथी’ बिदका था। कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली थी। इस दौर से मायावती की आंखों में राहुल की रणनीति किरकिराती रही है। उन्होंने कई तरीकों से कोशिश की कि अमेठी और रायबरेली में नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक करिश्मा कुछ उतार पर आए। गौरतलब है कि अमेठी के पड़ोस में रायबरेली संसदीय क्षेत्र है। यहां से सोनिया गांधी प्रतिनिधित्व करती हैं। पिछले वर्षों में केंद्र सरकार ने तमाम कोशिशें की कि दोनों क्षेत्रों में विकास के बड़े प्रोजेक्ट चालू कर दिए जाएं। कुछ चालू हुए भी। लेकिन, कुछ अटके भी। आरोप आया राज्य सरकार पर।
राहुल के दलित ‘अनुराग’ पर मायावती कई बार तीखे कटाक्ष कर चुकी हैं। वे इसे कांग्रेस का राजनीतिक पाखंड तक बता चुकी हैं। दरअसल, मायावती अच्छी तरह से समझती हैं कि दलित वर्ग कहीं मासूम चेहरे वाले ‘युवराज’ के मोहपाश में जकड़ गया, तो उनके लिए खतरे की घंटी बज सकती है। शायद इसलिए उन्होंने अपने खास वोट बैंक को पुख्ता करने के लिए कदमताल तेज कर दी है। वे दलितों को सुख-सुविधाएं देने का ही वादा नहीं करतीं, इससे बढ़कर उनके स्वाभिमान को जगाती हैं। इस कड़ी में वे अब तक प्रदेश के नौ जिलों का नामकरण दलित महापुरुषों के नाम पर कर चुकी हैं। ताजा मामला अमेठी संसदीय क्षेत्र का है। इसे अब शाहू जी महाराज नगर से अलग जिले के रूप में पहचाना जाएगा। जिले का मुख्यालय अमेठी की जगह अपेक्षाकृत छोटा कस्बा गौरीगंज होगा। 3070 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रवाले इस नए जिले में तीन तहसीलें सुल्तानपुर और दो तहसीलें रायबरेली की शामिल की गई हैं। ये सब अमेठी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा हैं। कांग्रेस के नेता सवाल उठा रहे हैं कि शाहू जी महाराज का कोई सीधा योगदान यूपी या अमेठी के लिए क्या था? इस पर बसपा के नेता सवाल कर रहे हैं कि पूरे देश में अधिसंख्य परियोजनाएं नेहरू-गांधी परिवार के नामकरण वाली हैं। तब यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया? क्या पूरा देश सिर्फ एक खानदान की जागीर है?
उल्लेखनीय है कि मायावती ने 2003 में अपनी राजसत्ता के दौरान अमेठी को अलग जिला बना दिया था। इसका नाम शाहू जी महाराज नगर ही रखा गया था। लेकिन, छह महीने के अदंर ही मुलायम सिंह ने सत्ता में आने के बाद सरकार के इस फैसले को पलट दिया था। पर्दे के पीछे कांग्रेसियों ने मुलायम को इसके लिए धन्यवाद ज्ञापित किया था। लेकिन, इस बार मुलायम सिंह ने ये ऐलान नहीं किया कि वे सत्ता में आए, तो इस फैसले का क्या करेंगे? सपा के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव ने यही कहा कि सत्ता में आए, तो इस मामले में पुनर्विचार करेंगे। सपा ने तो पुनर्विचार की बात की भी है लेकिन, कांग्रेस नेतृत्व ने इतनी भी जुर्रत नहीं दिखाई। जबकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में अकेले अपने बूते पर सत्ता में लौटने का उसका मिशन है। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि यह नाजुक मामला है। हमने यदि फैसला पलटने की बात की, तो दलितों के स्वाभिमान को चोट पहुंच सकती है। ऐसा कुछ हुआ, तो राहुल का ‘मिशन यूपी’ हिचकोले खा सकता है। बता दें कि शाहू जी महाराज कोल्हापुर (महाराष्ट्र) स्टेट के पहले दलित शासक थे। उन्होंने समाज सुधार के क्रांतिकारी कदम उठाए थे। अपने राज में उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों के लिए रोजगार में 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले की वजह से शाहू जी महापुरुषों की श्रेणी में माने गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके प्रति सम्मान जताने के लिए अमेठी जिले का नामकरण उनके नाम पर किया है। इसी के साथ सरकार ने कानपुर देहात जिले का नाम रमाबाई नगर कर दिया है। रमाबाई दलित ‘आइकॉन’ डा. भीमराव अंबेडकर की पत्नी थीं।
कानपुर देहात जिले के नए नामकरण को लेकर कुछ लोगों को बेचैनी है। खासतौर पर सवर्ण मानसिकता के लोगों के गले नया नाम नहीं उतर रहा है। ऐसे लोगों से बसपा नेतृत्व सवाल कर रहा है कि कानपुर के लोग सदियों से हैलट हॉस्पिटल, उर्सला हॉस्पिटल व मेस्टन रोड आदि नाम खुशी-खुशी लेते रहे हैं। जबकि, ये नाम अंग्रेजों के थे। वही अंग्रेज जिन्होंने सैकड़ों सालों तक भारत को गुलाम बनाए रखा था। अब यहां के लोग देश के ही एक समाज सुधारक का नाम गले क्यों नहीं उतार पर रहे?
बसपा के एक वरिष्ठ सांसद कहते हैं कि ‘शाहू जी महाराज’ का नाम कांग्रेसियों को खटक रहा है। लेकिन, दिल्ली में हाल के वर्षों में ही कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक, कनॉट सर्कस का नाम इंदिरा चौक व बांद्रा-वर्ली (मुंबई) में अरबों रुपये की लागत से बनाए गए सी-लिंक का नाम राजीव सेतु आराम से रख दिया गया। फिर भी कहीं किसी कोने-कतरे में दलित महापुरुषों को सम्मान देने की बात आती है, तो ‘राजीतिक दांव’ ढूंढ़ा जाता है। बसपा के ऐसे ‘तीरों’ का निशाना इतना मारक लगा है कि कांग्रेस ढंग से ‘उफ’! भी नहीं कर पा रही है।
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2.7.10
पिंजड़े में बूढ़े ‘शेर’ की सूनी आंखें !
(वीरेंद्र सेंगर की रिपोर्ट)
कई बार वक्त ऐसा त्रासद मोड़ लेता है कि दहाड़ लगाने वाला शेर भी ‘म्याऊं-म्याऊं’ बोलने के लिए मजबूर हो जाता है। जब कभी ऐसे मुहावरे किसी की जिंदगी के यथार्थ बनने लगते हैं, तो उलट-फेर होते हुए देर नहीं लगती। शायद ऐसा ही बहुत कुछ स्वनाम धन्य जार्ज फर्नांडीस की जिंदगी में इन दिनों घट रहा है। इमरजेंसी के दौर में शेर कहे जाने वाले इस शख्स को लेकर ‘अपने’ ही फूहड़ खींचतान में जुट गए हैं। अल्जाइमर्स और पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे जार्ज एकदम लाचार हालत में हैं। जो कुछ उनके आसपास हो रहा है, उसका कुछ-कुछ अहसास उन्हें जरूर है। इसका दर्द उनकी सूनी-सूनी आंखों में अच्छी तरह पढ़ा भी जा सकता है। समाजवादी जार्ज इन दिनों एक तरह से ‘अभिशप्त’ जीवन जीने के लिए मजबूर दिखाई पड़ते हैं। कहने को तो वे अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के पास रह रहे हैं, फिर भी उनके तमाम साथी-संगी मान रहे हैं कि उन्हें जानबूझकर तनहाई में रखा जा रहा है। 80 वर्षीय जार्ज दिल्ली में अपनी ‘परित्यक्ता’ पत्नी लैला कबीर और बेटे रेअन के साथ पंचशील एन्कलेव में रह रहे हैं। वे पिछले कई सालों से बीमार चल रहे हैं। उनकी बीमारी ने उन्हें उतना लाचार नहीं बनाया, जितना की घर के लोगों ने विरासत हड़पने के चक्कर में बना दिया है। जो जार्ज अपनी जवानी में ‘धन और धरती बंट के रहेगी’ जैसे खांटी समाजवादी नारों के प्रेरणास्रोत्र होते थे, अब खुद करोड़ों की संपत्ति की बंदरबांट में तमाशा बना दिए गए हैं।
बुधवार को तो यहां उनके 3 कृष्णा मेनन मार्ग के सरकारी निवास में तमाशा ही लग गया था। तीन घंटे तक गेट खोलने को लेकर हंगामा चला। यहां पर जार्ज की खास करीबी जया जेटली डटी हुईं थीं। वे गेट खोलने के लिए जिद कर रही थीं, जबकि पत्नी लैला कबीर के आदेश से जया के लिए ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा था। पुलिस भी थी, चीख-चिल्लाहट के चलते तमाशबीनों की भीड़ भी जुटी थी। जया की भावनाएं जोर मार रही थीं। वे भावुक होकर रो भी रहीं थीं और अधिकारों की याद करके दहाड़ भी रहीं थीं। वे यही कह रही थीं कि बंगले में मेरा कुछ सामान है, लौटा दो...! लेकिन, गेट पर तैनात वर्दी वाले कहते रहे ‘सॉरी मैडम...!’ जया के साथ जार्ज के दो सगे भाई भी आए थे। ये थे माइकल और रिचर्ड। इन लोगों का यही कहना था कि वे बंगले से कुछ अपनी किताबें लेने आए हैं। घंटों जद्दोजहद कर ये लोग लौट गए। जाते-जाते जया बोल गई थीं कि वे गुरुवार को आकर यहीं पर धरने पर बैठेंगी। वो तो जार्ज के शुभचिंतकों ने उन्हें समझा लिया कि धरना देकर वे बूढ़े शेर का और तमाशा न बनने दें। कोई नहीं जानता कि जार्ज के घर अब कौन तमाशा कब हो जाए? यह अलग बात है कि जार्ज के भाइयों ने अपने भाई को ‘मुक्त’ कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इस पर गुरुवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने लैला को 5 जुलाई को जार्ज को अदालत में पेश करने के लिए कहा है।
जरा जार्ज की पत्नी के बारे में जान लीजिए। ये हैं लैला कबीर। लैला एक जमाने के चर्चित वकील और शिक्षाविद् हुंमायू कबीर की बेटी हैं। करीब 30 साल पहले वे जार्ज के जीवन से चली गई थीं। इसके पीछे वास्तविक कारण क्या थे, यह तो लैला ही जानें क्योंकि जार्ज जानते भी होंगे तो ज्यादा कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि जया जेटली पिछले तीन दशकों से जार्ज के साथ ‘छाया’ की तरह छाई रही हैं। वे एक प्रबुद्ध महिला हैं। जार्ज की छत्रछाया में उन्होंने राजनीति की एबीसीडी सीखी थी। जया से जार्ज की करीबी कई बड़े विवादों का कारण भी बन चुकी है। लैला के करीबी तो यह भी कहते हैं कि जार्ज की जिंदगी में जया के आने के बाद ही लैला की ‘विदाई’ हो गई थी। हालांकि, अभी तक लैला ने औपचारिक रूप से इसका कोई खुलासा नहीं किया है। बिडंबना यह है कि जो जार्ज पूरी जिंदगी अक्खड़ समाजवादी जीवन मूल्यों के लिए जाने जाते रहे, अब संपत्ति को लेकर उनके अपने आपस में जूझने लगे हैं। वह भी जार्ज के जीते जी।
जार्ज एक जमाने में प्रखर समाजवादी योद्धाओं में एक माने जाते थे। दबंग ट्रेड यूनियन नेता के रूप में उनकी पहचान देशभर में बनी थी। वर्ष 1974 में ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल की अगुवाई उन्होंने ही की थी। जून 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी थी, तो इसको सबसे मुखर चुनौती जिन लोगों ने दी थी, उनमें जार्ज भी प्रमुख थे। इमरजेंसी के दौर में तमाम बड़े नेता तो सहज गिरफ्तार हो गए थे, लेकिन जार्ज ने इंदिरा गांधी के प्रशासन को चुनौती दे दी थी। वे पूरे एक साल तक इमरजेंसी के खिलाफ देशभर में घूम-घूमकर गोपनीय ढंग से अलख जगाते रहे। बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो उन पर चर्चित बड़ौदा डायनामाइड कांड का आरोप लगाया गया। इमरजेंसी खत्म होने के बाद, जार्ज नायक बनकर उभरे थे। उन्हें इमरजेंसी के ‘शेर’ के रूप में याद किया गया था। जेल से ही उन्होंने मुजफ्फरपुर (बिहार) से चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बेड़ियों में जकड़े जार्ज के पोस्टरों ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। वोटिंग के बाद जार्ज रिकार्ड मतों से जीते थे। चुनाव के बाद मोरार जी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी, तो उसमें जार्ज उद्योग मंत्री बने थे। हमेशा राज व्यवस्था के खिलाफ जूझने वाले जार्ज जब ‘सरकार’ बन गए, तो भी उन्होंने अपनी ‘फितरत’ नहीं छोड़ी। मंत्री बनते ही बहुराष्ट्रीय कंपनी- आईबीएन और कोको कोला को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। वीपी सिंह की सरकार में वे कुछ समय के लिए रेल मंत्री भी बने थे। इस दौर में उन्होंने रेलवे के ड्रीम प्रोजेक्ट कोंकण रेलवे को आगे बढ़ा दिया था। बाद में जनता दल से अलग होने के बाद 1994 में उन्होंने समता पार्टी बना ली थी, जोकि बाद में जद (यू) के रूप में अवतरित हुई। इस तरह से जार्ज जद (यू) के संस्थापकों में एक थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे प्रतिरक्षा मंत्री थे। इस कार्यकाल में उन्होंने सेना के जवानों के कल्याण के लिए कई ऐतिहासिक फैसले कराए थे।
पहली बार किसी रक्षा मंत्री ने फाइटर विमानों में उड़ान भरके सेना का हौसला बढ़ाया था। लेकिन इसी कार्यकाल में उनकी करीबी जया जेटली ‘तहलका’ के एक चर्चित स्टिंग में फंस गई थीं। वे चंदे के नाम पर रक्षा मंत्रालय से कोई काम कराने का ‘सौदा’ कर रहीं थीं। इस विवाद में जार्ज को मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था। इसके साथ ही जार्ज को अपने खांटी राजनीतिक तेवरों से बहुत समझौता करना पड़ा था। जार्ज का राजनीतिक जीवन एक तरफ जुझारू तेवरों वाला रहा, तो दूसरी तरफ धुर अंतरविरोधों से भी भरा रहा। जनता सरकार के दौर में जार्ज ने अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के मामले में यह आपत्ति की थी कि ये लोग संघ के भी सदस्य हैं और सरकार में भी हैं। यह ठीक नहीं है। इसी विवाद को लेकर मोरार जी की सरकार भी डूब गई थी। संघ की राजनीति से इतना परहेज करने वाले जार्ज, वाजपेयी की सरकार में भागीदार ही नहीं थे, बल्कि उन्हें संघ लॉबी का चहेता माना जाता था।
इस स्थिति को लेकर जार्ज के तमाम समाजवादी साथी दुखी रहे हैं। अक्सर जार्ज इस मामले में सफाई देते-देते परेशान हो जाते थे। ऐसे एक दो अनुभव इस प्रतिनिधि को भी जार्ज के साथ संवाद के दौरों में हो चुके हैं। तरह-तरह के आरोपों से दुखी होकर जार्ज तो एक बार रो भी पड़े थे। मैंने सवाल किया था कि आखिर संघ की विचारधारा के साथ उनका तालमेल कैसे हो गया? अनौपचारिक बातचीत में वे बोले थे कि उनके दिल में इंदिरा गांधी के दौर से कांग्रेस के लिए नफरत भर गई है। ऐसे में तो वे संघ क्या, कांग्रेस के खिलाफ ‘शैतान’ से भी हाथ मिला सकते हैं। रक्षा मंत्री जैसे संवेदनशील पद पर रहते हुए भी जार्ज के सरकारी निवास 3 कृष्णा मेनन मार्ग के दरवाजे हर किसी के लिए खुले रहते थे। जिद में आकर उन्होंने अपने निवास में गेट तक नहीं लगने दिया था। अक्सर वे तुड़े-मुड़े कुर्ते-पैजामे में देखे जाते थे। शहर में वे अपनी पुरानी फियट कार से चलते थे। लंबे समय तक उनके घर में एसी तक नहीं थे। हालांकि, विरोधी जार्ज की इस सादगी को ढोंग बताते थे लेकिन ढोंग बताने वाले ज्यादा ऐसे लोग थे, जो राजनीति में अय्याशी और विलासिता भरे जीवन के लिए जाने जाते रहे हैं। जार्ज कभी उनकी परवाह भी नहीं करते थे।
हाल के वर्षों में जद (यू) की राजनीति में वे शिखर पुरुष नहीं रहे थे। इसकी खास वजह उनका बीमार रहना ही था। इन दिनों वे राज्य सभा के सदस्य हैं। वास्तविक अर्थों में उनकी सुध-बुध कम हो गई है। मुलाकात के समय वे बहुत कम बोलते हैं लेकिन अखबारों के जरिए वे देश के घटनाक्रमों से अवगत रहते हैं। शायद इसी वजह से वे ज्यादा लाचारी महसूस करते हैं क्योंकि खुद कुछ न कर पाने के लिए अपने को ‘अभिशप्त’ पाते हैं। उनकी करीब 25 करोड़ रुपये की संपत्ति है। इसी पर कई परिजनों की नजरे हैं। उनके जो दो सगे भाई इन दिनों जार्ज की ‘शुभचिंता’ ज्यादा जता रहे हैं, वे पहले कभी जार्ज के पास नहीं आते थे। बेटा और पत्नी तो दूर ही थे। 3 कृष्णा मेनन मार्ग में दो दशकों से जिन जया जेटली का ‘राज’ चलता था, अब वही गेट पर खड़ी होकर अंदर आने के लिए गुहार लगा रही हैं। तीन दशकों से दूर रहीं लैला को अपने बूढ़े पति की सेहत की चिंता हो गई है। वे उन्हें हरिद्वार से लेकर ऋषिकेश के तमाम मठों तक घुमाकर लाई हैं ताकि किसी के ‘आशीर्वाद’ से वे कुछ ठीक हो सकें।
शायद यह भी जार्ज के जीवन की एक बिडंबना ही है कि जो व्यक्ति पूरी जिंदगी अनीश्वरवादी रहा, उसी को संतों-महात्माओं के चमत्कार से ठीक कराने की कोशिश हो रही है। यह अलग बात है कि बचपन में मंगलौर (कर्नाटक) में उनके पिता ने अपने इस बेटे को चर्च का ‘पुजारी’ बनाने के लिए भेज दिया था लेकिन उस चर्च के तमाम ‘पाखंड’ देखकर जार्ज का बाल मन विद्रोह कर बैठा था और वे वहां से भाग निकले थे। फिर पूरी जिंदगी सामाजिक पाखंडों के खिलाफ वे लड़ते रहे। अब त्रासदी यह है कि उनके करीबी संपदा के लिए झगड़ रहे हैं और मजबूर जार्ज सब कुछ टकटकी लगाकर देख रहे हैं। पिछले दिनों जार्ज के कुछ खास करीबी मित्रों फारुख अब्दुल्ला, जस्टिस वेंकेटचलैया, जसवंत सिंह व उद्योगपति राहुल बजाज ने एक खुली चिठ्ठी लिखकर लैला कबीर से अपील की थी कि वे उनके साथी जार्ज को पंचशील एन्कलेव जैसी अनजानी जगह से 3 कृष्णा मार्ग में ले आएं। क्योंकि, जार्ज यहां दो दशकों से रह रहे हैं और यही घर वह जगह हो सकता है, जहां उन्हें ‘कैद’ न महसूस हो।
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1.7.10
29.6.10
हंगामा है क्यूँ बरपा
विवेका बाबाजी ने खुदकुशी क्या कर ली, हंगामा मचा हुआ है। मारीशस से मुंबई आयी एक लड़की देखते-देखते सुपरमाडल बन गयी और कुछ ही वर्षों में अकूत पैसा जमा कर लिया। सारी सुख-सुविधाएं, ठाट-बाट, ऐश्वर्य भोग के बाद भी आखिर क्या करे पैसे का। सो बिजिनेस में लगा दिया। यह सब कुछ ध्यान से देखें तो एक लिजलिजी कहानी की ओर संकेत जाता है। ऐसी कहानियां जिस हाई-फाई अंदाज में शुरू होती हैं, उसी तरह खत्म हो जाती हैं। जहां जीवन का मतलब केवल पैसा कमाना हो, अनहद भोग करना हो, वहां लालची निगाहें पहुंच ही जाती हैं। और पैसे के लिए जिस तरह की छीना-झपटी, बेहयाई और अपराध हमारे समाज में चारों ओर दिखायी पड़ रहा है, उसके खतरे से कोई भी मुक्त नहीं है। लेकिन जिस तरह सरकार इस मामले को लेकर सक्रिय है, पुलिस मुस्तैद है और मीडिया रोज नयी-नयी सूचनाएं जुटाने में लगा हुआ है, क्या वह एक ऐसे देश में निरर्थक सी बात नहीं है, जहां हर साल सैकड़ों बच्चे मानसिक दबाव में खुदकुशी कर लेते हैं और हजारों किसान कर्ज में डूबकर अपनी जान दे देते हैं। दरअसल बाबाजी की खुदकुशी भी बिकाऊ माल बन गयी है। बच्चों और किसानों की खुदकुशी में वैसा गलैमर कहां? पूरा पढ़ें
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28.6.10
भारत व्यर्थ के आशावाद में उलझा
भारत व्यर्थ के आशावाद में उलझा हुआ है। हिंदुस्तान के नेता यहां जिस तीखे अंदाज में बोलते हैं, पाकिस्तान की जमीन पर पहुंचते ही उनकी आवाज ठंडी हो जाती है। पता नहीं कौन सा अपनापन उमड़ आता है, किस तरह का दया भाव पैदा हो जाता है कि वे नरम पड़ जाते हैं। गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि मुंबई हमले की जांच को लेकर पाकिस्तान की मंशा पर भारत को कतई संदेह नहीं है परंतु परिणाम तो आना चाहिए। शायद उन्हें यह भय सताता रहता है कि ज्यादा सख्त हुए तो बातचीत टूट जायेगी। क्या बातचीत जारी रखने की जिम्मेदारी केवल भारत की है? पाकिस्तान चाहे जितना ऐंठता रहे, हम उसकी मनौवल करते रहेंगे, यह कौन सी बात है?
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21.6.10
धड़कनों पर संकट
आम तौर पर हिंदुस्तानियों का हृदय मजबूत होता है, ऐसा माना जाता रहा है लेकिन हाल के वर्षों में हृदय की बीमारियां हमारे देश में तेजी से बढीं हैं। जिंदगी जटिल हो गयी है, तनाव बढ़ा है, जिससे रक्तचाप, मधुमेह, धमनियों में अवरोध की बीमारियां भी बढ़ीं हैं। लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक तो हुए हैं फिर भी इन बीमारियों पर ज्यादा अंकुश नहीं लग सका है। एक नया सर्वे बहुत चौंकाने वाला है। अपोलो समूह द्वारा किये गये इस सर्वेक्षण से पता चला है कि देश के 35 साल से कम उम्र के लोग बड़ी तादात में हृदय की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। जितनी परेशानी पश्चिमी देशों में 60 साल की उम्र में दिखायी पड़ती है, उतनी हमारे देश में 35 साल पूरा करते-करते दिखायी पड़ने लगी है। और जो लोग अपनी जीवन शैली सुधारने के मौके गंवा देते हैं, जो अपने मोटापे, अपने खान-पान पर नियंत्रण करने की कोशिश नहीं करते, जो तनिक भी व्यायाम नहीं करते, उनके लिए तो संकट और भी ज्यादा है।
यह बहुत ही खतरनाक संकेत है। इसके पीछे मूल रूप से भारतीयों का अपनी पारंपरिक जीवन-शैली से छूट जाना है। आर्थिक और मानसिक दबाव तेजी से आदमी को बीमारियों की ओर ले जा रहा है। यह दबाव जो वंचित हैं, उन पर तो है ही, जो संपन्न हैं, उन पर भी है। जिसे जीवन की मौलिक सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, वह परिवार को ठीक से न रख पाने के कारण दबाव में है और जो जरूरत से ज्यादा वैभव हासिल कर चुके हैं, वे उसे सुरक्षित रखने और अपना संग्रह बढ़ाने की चिंता के दबाव में हैं। बच्चे अपने मां-बाप की अति महत्वाकांक्षा के कारण सफलता का मानक स्थापित करने की चुनौती को लेकर दबाव में हैं। यही बीमारियों का मूल कारण है। पर इनसे बचा कैसे जाय, एक गंभीर प्रश्न है। हमारी भारतीय जीवन-शैली में संतुष्ट रहने, जरूरत से ज्यादा संग्रह न करने और मिल-बांटकर जीने का जो दर्शन पहले काम करता था, वह गायब हो गया है। इसमें आगे बढ़ने और प्रगति करने की मनाही नहीं हैं, पर सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन करते हुए। सभी क्यों न साथ-साथ आगे बढ़े, एक दूसरे का सहयोग करते हुए।
पर अब जीवन नितांत वैयक्तिक हो गया है, घर में भी दीवारें हैं। सब एक-दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं, किसी से तनिक भी डर है तो उसे निपटा देने की चालें भी चलते हैं, कोई किसी की मदद नहीं करता, इसीलिए सब के सब असंतुष्ट हैं, सब बीमार हैं। यही हाल रहा तो बीमारियां और बढ़ेंगी। हृदय प्रेम की जगह है, करुणा का स्थल है, परंतु वह आजकल इन दोनों से खाली है। इस खाली जगह को ईर्ष्या, द्वेष भर रहा है, यही बीमारियों की जड़ है। इसलिए जरूरी है कि चिकित्सक की बात तो मानें ही, व्यायाम करें, संतुलित भोजन करें परंतु मन को नकारात्मक भावनाओं से मुक्त रखें। तभी दिल मजबूत होगा। किसी शायर ने कहा है--
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16.6.10
प्रणव के तर्क झूठे और गढ़े हुए
भोपाल गैस कांड को लेकर कांग्रेस, उसकी सरकार और उसके मंत्रियों के पाखंड प्रलाप का भंडाफोड़ हो गया है। अमेरिका की एमोरी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर गार्डन स्ट्रीब के एक बयान से कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्य प्रणव मुखर्जी के उस तर्क की धज्जियां उड़ गयीं हैं, जो हाल में उन्होंने दिया था। प्रणव ने बड़ी मेहनत करके 26 साल पुराने समाचारपत्रों की कतरनें जुटायीं और बताया कि यूनियन कार्बाइड के मुखिया वारेन एंडरसन को मुक्त करने का फैसला मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने किया था और इसमें केंद्र सरकार और राजीव गांधी का कोई भी हाथ नहीं था। परंतु जो बात स्ट्रीब ने कही है, उससे प्रणव के तर्क झूठे और गढ़े हुए लगते हैं।
स्ट्रीब उन दिनों भारत में अमेरिकी राजदूत के सहायक थे और राजदूत के बाहर होने के कारण दूतावास का कार्यभार उन्हीं के पास था। उन्होंने बगैर किसी लाग-लपेट के कहा है कि एंडरसन को केंद्र सरकार के साथ हुई सहमति के नाते छोड़ा गया। दरअसल दुर्घटना के समय एंडरसन अमेरिका में थे। जब उन्होंने सुना कि फैक्ट्री में गैस रिसने के कारण हजारों लोगों की मौत हो गयी है तो वे कंपनी के मुखिया होने के नाते भोपाल आकर जानना चाहते थे कि आखिर हुआ क्या, गलती कहां हुई। अमेरिकी प्रशासन उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित था, इसलिए इस बारे में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से संपर्क साधा गया। विदेश मंत्रालय की ओर से अमेरिका को आश्वस्त किया गया कि, एंडरसन की सुरक्षित वापसी का इंतजाम कर दिया जायेगा।
इस आश्वासन के बाद ही एंडरसन भोपाल आये पर उनके हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें धर लिया गया। उस समय उन्हें छुड़ाने और वापस पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में स्ट्रीब ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्हीं के प्रयासों से विदेश मंत्रालय सक्रिय हुआ और एंडरसन साहब वापस अपने देश पहुंच सके। ऐसा लगता है कि जीवन भर बड़ी जिम्मेदारियों पर बनाये रखने के एहसान की कीमत कांग्रेस अर्जुन सिंह से वसूलना चाहती है। शायद उन्हें कह दिया गया है कि वे मुंह न खोलें, चुप रहें। पार्टी के भविष्य के लिए यह एक तोहमत अपने सिर पर लेने के लिए अर्जुन सिंह भी, लगता है राजी हो गये हैं। पर इससे सच जानने का जनता का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। लोगों को पता चलना चाहिए कि कौन झूठ बोल रहा है, कौन बेवकूफ बना रहा है। पाखंडी चेहरे बेनकाब होने ही चाहिए।
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15.6.10
ब्लागलेखन की संभावनाएं और खतरे
ब्लॉगों की दुनिया धीरे-धीरे बड़ी हो रही है. अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों के प्रति जन्मते अविश्वास के बीच यह बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है. कोई भी आदमी अपनी बात बिना रोक-टोक के कह पाए, तो यह परम स्वतंत्रता की स्थिति है. परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ. यह स्वाधीनता बहुत रचनात्मक भी हो सकती है और बहुत विध्वंसक भी. रोज ही कुछ नए ब्लॉग संयोगकों से जुड़ रहे हैं. मतलब साफ है कि ज्यादा से ज्यादा लोग न केवल अपनी बात कहना चाह रहे हैं बल्कि वे यह भी चाहते हैं कि लोग उनकी बात सुने और उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें. यह प्रतिक्रिया ही आवाज को गूंज प्रदान करती है, उसे दूर तक ले जाती है. जब आवाज दूर तक जाएगी तो असर भी करेगी. पर क्या हम जो चाहते हैं वह सचमुच कर पा रहे हैं? क्या हम ऐसी आवाज उठा रहे हैं जो असर करे? और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि हमें कैसे पता चले कि हमारी बात का असर हो रहा है या नहीं ?
यहाँ एक बात समझने की है कि लोग एक पागल के पीछे भी भीड़ की शक्ल में चल पड़ते हैं, एक नंगे आदमी का भी पीछा करते हैं और उसका भी जो सचमुच जागरूक है, जो बुद्ध है, जो जानता है कि लोगों कि कठिनाइयाँ क्या हैं, उनका दर्द क्या है, उनकी यातना और पीड़ा क्या है. जो यह भी जानता है कि इस यातना, पीड़ा या दुःख से लोगों को मुक्ति कैसे मिलेगी. अगर हम लोगों से कुछ कहना चाहते हैं तो यह देखना पड़ेगा कि हम इन तीनों में से किस श्रेणी में हैं. कहीं हम कुछ ऐसा तो नहीं कहना चाहते जो लोग सुनना ही नहीं चाहते और अगर सुनते भी हैं तो सिर्फ मजाक उड़ाने के लिए. यह निरा पागलपन के अलावा कुछ और नहीं है. एक ब्लॉग पर मुझे एक तथाकथित क्रांतिकारी की गृहमंत्री को चुनौती दिखाई पड़ी. उस वक्त जब नक्सलवादियों ने दर्जनों जवानों की हत्या कर दी थी, वे महामानव यह एलान करते हुए दिखे कि वे खुलकर नक्सलियों के साथ हैं, गृह मंत्री जो चाहे कर लें. उनकी पोस्ट के नीचे कई टिप्पड़ियाँ थीं, जिनमें कहा गया था , पागल हो गया है. जो सचमुच पागल हो गया हो, वह व्यवहार में इतना नियोजित नहीं हो सकता, इसीलिए उस पर अधिक ध्यान नहीं जाता पर जो पागलपन का अभिनय कर रहा हो, जो इस तरह लोगों का ध्यान खींचना चाह रहा हो, वह भीड़ तो जुटा लेगा, पर वही भीड़ उस पर पत्थर भी फेंकेगी, उसका मजाक भी उड़ाएगी.
कुछ लोग खुलेपन के नाम पर नंगे हो जाते हैं. नग्नता सहज हो तो कोई ध्यान नहीं देता. जानवर कपडे तो नहीं पहनते, पर कौन रूचि लेता है उनकी नग्नता में? छोटे बच्चे अक्सर नंगे रहते हैं, पर कहाँ बुरे लगते हैं? यह सहज होता है. बच्चे को नहीं मालूम कि नंगा रहना बुरी बात है, पशुओं को इतना ज्ञान नहीं कि नंगापन होता क्या है, यह बुरा है या अच्छा. पर जो जानबूझकर नंगे हो जाते हैं ताकि लोग उनकी ओर देखें, उन्हें घूरे या उनकी बात सुनें, वे असहज मन के साथ प्रस्तुत होते हैं. यह नग्नता खुलेपन के तर्क से ढंकी नहीं जा सकती. ऐसे लोग भी मजाक के पात्र बन जाते हैं. असहज प्रदर्शन होगा तो असहज प्रतिक्रिया भी होगी. लोग फब्तियां कसेंगे, हँसेंगे और हो सकता है, कंकड़, पत्थर भी उछालें.
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो किसी की प्रतिक्रिया की परवाह नहीं करते, भीड़ भी जमा करना नहीं चाहते, लोगों का ध्यान भी नहीं खींचना चाहते पर अनायास उनकी बात सुनी जाती है, उनके साथ कारवां जुटने लगता है, उनकी आवाज में और आवाजें शामिल होने लगाती हैं. सही मायने में वे जानते हैं कि क्या कहना है, क्यों कहना है, किससे कहना है. वे यह भी जानते हैं कि उनके कहने का, बोलने का असर जरूर होगा क्योंकि वे लोगों के दर्द को आवाज दे रहे हैं, समाज की पीड़ा को स्वर दे रहे हैं, सोये हुए लोगों को लुटेरों का हुलिया बता रहे हैं. केवल ऐसे लोग ही समय की गति में दखल दे पाते हैं. असल में ऐसे ही लोगों को मैं स्वाधीन कह सकता हूँ. स्व और कुछ नहीं अपने विवेक और तर्क की बुद्धि है. अगर व्यक्ति विवेक-बुद्धि के अधीन होकर चिंतन करता है, तो वह समस्या की जड़ तक पहुँच सकता है. फिर यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि समाधान के लिए करना क्या है.
आजकल ब्लॉगों पर लिख रहे हजारों लोग इन्हीं तीन श्रेणियों में से किसी न किसी में मिलेंगें. अगर आप किसी लेखन की गंभीरता और शक्ति का मूल्यांकन टिप्पड़ियों की संख्या से करेंगे तो गलती करेंगे. बहुत भद्दी और गन्दी चीज ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है. कई बार ज्यादा प्रतिक्रिया आकर्षित करने के लिए लोग ब्लॉगों पर इस तरह की सामग्री परोसने से बाज नहीं आते. अभी हाल में एक ब्लाग अपने अश्लील आमंत्रण के लिए बहुत चर्चित हुआ था. वहां टिप्पड़ियों की बरसात हो रही थी. पर इस नाते उस गलीच लेखन को श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता. चर्चा में आने की व्याकुलता कोई रचनात्मक काम नहीं करने देगी. ऐसे ब्लॉगों के होने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वे उन लोगों को भी विचलित करते हैं जो किसी गंभीर दिशा में काम करते रहते हैं. मेरी इस बात का अर्थ यह भी नहीं लगाया जाना चाहिए कि जहाँ ज्यादा टिप्पड़ियाँ आतीं हैं, वह सब इसी तरह का कूड़ा लेखन है. ब्लॉगों की इस भीड़ में भी वे देर-सबेर पहचान ही लिए जाते हैं, जो सकारात्मक और प्रतिबद्ध लेखन में जुटे हैं. चाहे वे सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर विचारोत्तेजक टिप्पड़ियाँ हों, चाहे ह्रदय और मस्तिष्क को मंथने वाली कविताएं हों, चाहे देखन में छोटे लगे पर घाव करे गंभीर वाली शैली में लिखे जा रहे व्यंग्य हों. सैकड़ों की सख्या में ऐसे ब्लाग दिखाई पड़ते हैं, जो अपनी यह जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं. उनसे हमें उम्मीद रखनी होगी.
दरअसल निजी और सतही स्तर पर गुदगुदाने वाले प्रसंगों से हटकर हम ब्लागरों को अपने समय की समस्याओं पर केन्द्रित होने की जरूरत है. भ्रष्टाचार, गरीबी, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक रुढियों से उपजी दर्दनाक विसंगतियां और मनुष्यता का अवमूल्यन आज हमारे देश की ज्वलंत समस्याएं हैं. आदमी चर्चा से बाहर हो गया है, उसे केंद्र में प्रतिष्ठित करना है. सत्ता के घोड़ों की नकेल कसकर रखनी है, ताकि वे बेलगाम मनमानी दिशा में न भाग सकें. इन विषयों पर समाचार माध्यमों में भी अब कम बातें होती हैं. वे विज्ञापनों के लिए, निजी स्वार्थों के लिए बिके हुए जैसे लगने लगे हैं. पूंजी का नियंत्रण पत्रकारों को जरूरत से ज्यादा हवा फेफड़ों में खींचने नहीं देता. वे गुलाम बुद्धिवादियों की तरह पाखंड चाहे जितना कर लें पर असल में वे वेतन देने वालों की वंदना करने, उनके हित साधने और कभी-कभार उनके हिस्से में से अपनी जेब में भी कुछ डाल कर खुश हो लेने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पाते. ऐसी विकट स्थिति में अगर ब्लागलेखन की अर्थपूर्ण स्वाधीनता अपनी पूरी ताकत के साथ समने आती है तो वह लोकतंत्र के पांचवें स्तम्भ की तरह खड़ी हो सकती है. जिम्मेदारियां बड़ी हैं, इसलिए हम सबको मनोरंजन , सतही लेखन और शाब्दिक नंगपन से मुक्त होकर वक्त के सरोकार और मनुष्यता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ आगे आकर अग्रिम मोर्चे की खाली जगह ले लेनी है. मैं मानता हूँ कि अनेक लोग सजग और सचेष्ट हैं, अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं पर आशा है सभी ब्लागर बंधु अपना कर्तव्य और करणीय समझ सही पथ का संधान करेंगे.
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11.6.10
गाँव से आगे, गाँव के पीछे
गाँव खतरे में हैं. शहर धीरे-धीरे उन्हें निगल रहे हैं. शहरों में अंग्रेजी है, बड़े बाज़ार हैं, खूब पैसा है. लोग वैभव भरी जिंदगी में मस्त हैं. कुछ भी खरीद सकते हैं. अच्छे से अच्छा फोन, बड़ी से बड़ी गाड़ी, खूबसूरत कपडे. मजदूर भी. शहर में केवल वैभव ही है, ऐसा नहीं. उसके भी दो चेहरे हैं. गरीब, मजदूर भी है और उसकी मेहनत को खरीदने वाला अमीर भी है. मजदूर की मजबूरी है, वह मामूली कीमत लेकर दिन-रात पसीना बहाता है और उसी का पसीना सम्पन्न लोगों की तिजोरी में सोना बनकर जमा होता है.
शहर बहुत ही कठोर है, निर्मम है, उद्धत है.वह पश्चिम के असर में है, वह अपने रंग में सबको रंगना चाहता है. जो राजी-ख़ुशी तैयार हों , उसके साथ नाचे, गाएं , सुख सुविधा पर पैसा लुटाएं और यह न कर पायें तो उसके उत्सव में दरी-गलीचा बिछाएं , झाड़ू लगायें , पसीना बहाकर उसका आनंद बढ़ाएं . जो शहर के इस नए संस्कार का विरोध करता है, शहर या तो उसे खरीदकर कचरे में डाल देता है या समूचा निगल जाता है. गाँव ललचाया हुआ भी है और संकोच में भी है. वह इस नए वैभव का मजा भी उठाना चाहता है और अपनी धोती भी नहीं उतारना चाहता. यह दुविधा बहुत प्रतिरोध करने की हालत में नहीं है, क्योंकि शहर में पढ़ रहे गाँव के बच्चों को धोती-कुरता बिल्कुल पसंद नहीं, वे रोटी-डाल की जगह पिज्जा में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं. इन्हीं की बांह पकड़कर शहर गाँव में घुस आया है. गाँव के समर्पण में अब ज्यादा देर नहीं दिखती.
मैं बहुत दिनों बाद गाँव गया. मैंने बस ड्राइवर से कहा कि मुझे बड़ा गाँव उतार देना. उसने ऐसा ही किया, पर शायद उसे पता नहीं था कि वह जहाँ मुझे उतार रहा है, वह गाँव से एक किलोमीटर आगे कोई जगह है. मैं अपने गाँव को एक ऐसी जगह पर खड़ा होकर ढूंढ़ रहा था, जहाँ मेरी पहचान की कोई चीज नहीं थी. गलत फैसला किया और गाँव से दूर बढ़ गया. कुछ चलने के बाद भी गाँव नहीं आया तो मैंने चारों ओर आकाश के तट पर कोई पहचान तलाशनी शुरू की. थोड़ी देर बाद मेरे उजड़ गये बाग के कुछ पेड़ नजर आये,गाँव के बाहर जा बसे यादव परिवार का घर दिखा.आश्चर्य मैं अपने गाँव को ही नहीं पहचान पाया और दो किलोमीटर आगे चला गया. झिझकते-झिझकते वापस लौटा.
शहर से कम नहीं है मेरा गाँव. बड़ी-बड़ी कोठियां, कारें, टी वी, फ्रिज, बिजली सब कुछ है. वहां भी लोग सुबह मैदान नहीं जाते. हर घर में ताइलेट है, बाथरूम है. कुछ बच्चे पढने बाहर गये तो वे बाहरी ही हो गये. उनके घर वाले खुश हैं कि वे डालर कमाते हैं. कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे शौच के बाद अब पानी का नहीं कगज का इस्तेमाल करते हैं. गाँव बिकने को तैयार है, वह उनकी प्रतीक्षा में है, जो ज्यादा से ज्यादा बोली लगायें. वह अपनी बोली, अपना संस्कार, अपनी करुणा सब कुछ छोड़कर पैसा बटोरना चाहता है. असल में मैं अपने एक साहित्यकार मित्र के न्योते पर गया था. अभिनव कदम के संपादक जय प्रकाश धूमकेतु के बेटे ने शादी कर ली, इस ख़ुशी में उन्होंने रिसेप्सन दिया था. वे वामपंथी विचारों के हैं, फिर भी वहाँ काफी चमक-दमक थी. खाने -पीने का बेहतरीन इंतजाम था.
वहां जाना अच्छा रहा. इसी एक शाम के लिए मैंने तीन दिन बर्बाद किया. वहां मेरे तमाम पुराने दोस्त मिले, प्रशंसक मिले. लेखकों, कवियों से मुलाकातें हुईं. कुछ ऐसे लोग भी मिले, जो जानते तो थे मगर पहचानते नहीं थे. खाना, गपियाना, मुस्कराना , इससे ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ, पर इतना भी क्या कम था. आजकल जिस तरह आदमी की हंसी खोती जा रही है, उसमें बनावटी हंसी भी कम फायदेमंद नहीं है. राम निवास मेरा छात्र जीवन का दोस्त है. बहुत ही मजाहिया लहजा है उसका. मेरी एक फोटो है उसके पास, कहता है बिल्कुल ड्रेकुला जैसा दिखता हूँ . यह कहकर इतनी जोर का ठहाका लगाता है कि मुझे मेरे दांत सचमुच बाहर निकले महसूस होने लगते हैं. उसने डा अनिल कुमार राय से परिचित कराया, हालाँकि हम दोनों एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, बस पहचानते नहीं थे. वे हिंदी के स्थापित लेखकों में शुमार किये जाते हैं. मेरे गुरुओं हिंदी के बड़े समीक्षक डा कन्हैया सिंह और संत साहित्य के विद्वान डा चन्द्र देव राय का वहां होना मेरे लिए एक अभूतपूर्व अवसर था.
मेरे बड़े भाई, साहित्यकार और वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति डा वी एन राय , डा अनिल कुमार अंकित, सुपरिचित गीतकार डा कमलेश राय, समीक्षक राम निवास कुशवाहा और अन्य अनेक रचनाधर्मियों का मिलना बहुत आनंदवर्धक रहा.
मैं भी वहां जाकर गाँव को भूल गया, गाँव के संकट को भूल गया. यह एक शाम मेरे भीतर इतनी उर्जा भर गयी कि मैं अब कई महीने अपनी गाड़ी बिना ठेले ही दौडाता रहूँगा.इसका श्रेय धूमकेतु जी को दूं या उन बच्चों को जिन्होंने हमें शादी के धूम-धड़ाके में शामिल होने से वंचित कर दिया और इस तरह चुनौती खड़ी कर दी कि रिसेप्सन शादी से भी बढ़िया होना चाहिए. और वह हुआ भी.दर असल धूमकेतुजी के बेटे ने प्रेम विवाह कर लिया था. हम सब खुश थे और यह बताने में सफल रहे कि हम उसकी पीढ़ी से पीछे नहीं हैं, हमें उनका प्रेम स्वीकार है.
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7.6.10
लाल साडी ने मचाई हलचल
स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक द रेड साड़ी ने दिल्ली के राजनीतिक क्षेत्र में हलचल मचा रखी है। यह पुस्तक सोनिया गांधी की जीवनी पर आधारित है और स्पेन तथा इटली में पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। देश के कई हिस्सों में किताब में लिखे गये अंशों की होली चलायी जा रही है। पार्टी के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मोरो को कानूनी नोटिस भेजा है। उनका कहना है कि कोई किसी के निजी मामलों को बिना उसकी अनुमति के कैसे प्रस्तुत कर सकता है, वह भी काल्पनिक और अर्धसत्य के रूप में। मोरो कभी सोनिया गांधी से मिले ही नहीं,उनसे बातचीत नहीं की, उन्हें जानने का प्रयास नहीं किया तो वे उनके बारे में अधिकृत तौर पर कुछ भी कैसे लिख सकते हैं।
दरअसल मोरो ने अपनी पुस्तक में 1977 में कांग्रेस की भारी पराजय के बाद सोनिया गांधी और उनके परिजनों में हुई बातचीत को सीधे कोट किया है, जिसमें सोनिया पर उनके परिवार द्वारा इटली चले आने का दबाव डालते दिखाया गया है। इस अंश पर कांग्रेस को इसलिए आपत्ति है क्योंकि इसके सच होने का कोई प्रमाण मोरो के पास नहीं है। मोरो स्वयं यह बात स्वीकार करते हैं कि उनकी सोनिया गांधी से बात नहीं हुई लेकिन कई ऐसे लोगों से बात हुई, जो इंदिरा गांधी के करीब रहे और ऐसे भी कई लोगों से जो सोनिया के परिवार से नजदीक रहे। उन्हीं जानकारियों के आधार पर उन्होंने अपनी साहित्यिक कल्पना के सहारे पूरी बातचीत गढ़ने की कोशिश की है। वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं कि उनकी रचना कितनी सच है इसीलिए वे इसे एक औपन्यासिक जीवनी बताते हैं।
उनका यह भी कहना है कि उनकी कोशिश निरंतर यह रही है कि सोनिया गांधी और उनके परिवार के चरम बलिदान को, उनके आदर्शों को सही संदर्भ में रखा जाय। सिंंघवी के नोटिस के बाद मोरो ने भी उन पर मुकदमा करने की चेतावनी दी है। उन्होंने पूछा है कि जब पुस्तक अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है तो उसकी सामग्री तक सिंघवी पहुंचे कैसे? यह गैरकानूनी है और इसके लिए उन पर मुकदमा चलना चाहिए। कांग्रेस के एतराज की पा्रमाणिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी भी लेखक को यह अधिकार लिखने की स्वतंत्रता के नाम पर नहीं मिल सकता कि वह किसी व्यक्ति के निजी जीवन के बारे में अपुष्ट, अप्रामाणिक, अविश्वसनीय जानकारी लोगों को दे। मोरो की स्वीकारोक्ति से लगता है कि इस मामले में उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण किया है। अगर उनकी पुस्तक के विवरण ऐसी कल्पना पर आधारित हैं, जिसके सच होने की वे संभावना भर जता सकते हैं तो उन्हें सोनिया गांधी का नाम लेने से बचना चाहिए था।
पुस्तक में कई जगह सोनिया गांधी का नाम इस तरह लिया गया है, जैसे उनके बारे में प्रामाणिक सामग्री दी जा रही हो, पर ऐसा है नहीं। इस नाते लेखक पर व्यावसायिक लाभ के आशय से संचालित होकर पुस्तक लिखने का आरोप लगाना गलत नहीं लगता। हो सकता है पश्चिमी देशों के नेता इस मामले में उदार हों, हो सकता है भारत में भी कई लोग इसे बुरा न मानें, एतराज न करें पर केवल इस कारण मोरो अधिकारपूर्वक यह नहीं कह सकते कि सोनिया गांधी को भी इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। बेहतर होता कि वे इसे केवल उपन्यास कहते, जीवनी नहीं क्योंकि जीवनी में कल्पना या गल्प की गुंजाइश नहीं होती। वह भी ऐसी कल्पना जो संबंधित व्यक्ति के हृदय को ठेस पहुंचाने वाली हो।
इस शब्द-युद्ध में लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना चाहिए। बहुत अच्छी बात है पर यह विचार पार्टी ने तब क्यों नहीं किया, जब जसवंत सिंह की जिन्ना पर पुस्तक आयी थी। अब अगर जेवियर मोरो चाहते हैं कि उनकी पुस्तक भारत में भी प्रकाशित हो तो उन्हें उसे औपन्यासिक रूप में ही प्रस्तुत करने में क्या परेशानी है। फिर उन्हें सोनिया गांधी का जिक्र पुस्तक से हटाना पड़ेगा। एक और रास्ता है कि सोनिया इसके लिए अनुमति दे दें, जो शायद मुश्किल लगता है।
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6.6.10
मुझे आगे भी जाना है
सुबह का सूरज
तुम्हारे भाल पर
उगा रहता है अक्सर
मेरे ह्रदय तक
उजास किये हुए
मेरी सबसे सुन्दर
रचना भी कमजोर
लगने लगती है
जब देखता हूँ
तुम्हें सम्पूर्णता में
दिए की तरह जलते
तुम्हारे रक्ताभ नाख़ून
दो पंखडियों जैसे अधर
काले आसमान पर लाल
नदी बहती देखता हूँ मैं
सचमुच एक पूरा
आकाश है तुम्हारे होने में
जिसमें बिना पंख के
भी उड़ना संभव है
जिसमें उड़कर भी
उड़ान होती ही नहीं
क्योंकि चाहे जितनी दूर
चला जाऊं किसी भी ओर
पर होता वहीँ हूँ
जहाँ से भरी थी उड़ान
तुम नहीं होती तो
अपने भीतर की चिंगारी से
जलकर नष्ट हो गया होता
बह गया होता दहक कर
तुम चट्टान के बंद
कटोरे में संभाल कर
रखती हो मुझे
खुद सहती हुई
मेरा अनहद उत्ताप
जलकर भी शांत
रहती हो निरंतर
जो बंधता नहीं
कभी भी, कहीं भी
वह जाने कैसे बंध गया
कोमल कमल-नाल से
जो अनंत बाधाओं के आगे भी
रुकता नहीं, झुकता नहीं
कहीं भी ठहरता नहीं
वह फूलों की घाटी में
आकर भूल गया चलना
भूल गया कि कोई और भी
मंजिल है मधु के अलावा
सुन रही हो तुम
या सो गयी सुनते-सुनते
पहले तुम कहती थी
मैं सो जाता था
अब मैं कह रहा हूँ
पर तुम सो चुकी हो
उठो, जागो और सुनो
मुझे आगे भी जाना है.
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